Wednesday, October 14, 2020

व्यक्तिगत अस्तित्व को सार्वलौकिक बनाने वाली कवयित्री को नोबेल

 राजेंद्र बोड़ा 
 

साहित्य के लिए इस साल का नोबेल पुरस्कार अमरीकी कवयित्री लुईस ग्लूक को दिया गया है। विश्व का यह सबसे बड़ा सम्मान देने वाली स्वीडिश अकादमी ने कहा है कि “ग्लूक की कविताओं की आवाज़ ऐसी है जिनमें कोई ग़लती हो ही नहीं सकती और उनकी कविताओं की सादगी भरी सुंदरता उनके व्यक्तिगत अस्तित्व को भी सार्वलौकिक बनाती है।” वर्ष 2010 से लेकर अब तक वह चौथी ऐसी महिला हैं जिन्हें साहित्य का नोबेल पुस्कार मिला है। नोबेल की शुरूआत पिछली सदी के पहले वर्ष 1901 में हुई और तब से लेकर अब तक ग्लूक यह सम्मान पाने वाली 16वीं महिला हैं। पिछली बार 1993 में अमरीकी लेखिका टोनी मरिसन को साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला था।

इस बार के पुरस्कार का महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि ग्लूक कोई गुमनाम कवियित्री नहीं है जिसे अचानक खोजा गया हो जैसा कि पहले अनेक बार हुआ है कि पुरस्कार मिलने के बाद ही कोई साहित्य का रचनाधर्मी अपने क्षेत्रीय दायरे से बाहर विश्व पटल पर आया हो। ग्लूक एक ऐसी सफल साहित्यधर्मी हैं जिनके नाम पहले ही ढेरों पुरस्कार और सम्मान दर्ज हैं। उनके नाम पुरस्कारों के अंबार में कुछ प्रमुख हैं: उनकी रचना 'द वाइल्ड आइरिश' के लिए उन्हें 1993 में मिला पुलित्ज़र पुरस्कार’, वर्ष 2001 में मिला बोलिंजन प्राइज़ फ़ॉर पोएट्री’, 2008 में मिला वालेस स्टीवेंस पुरस्कार और 2014 में उन्हें मिला नेशनल बुक अवॉर्ड। उन्हें 2015 में नेशनल ह्युमेनिटीज़ मेडल भी मिला। समालोचकों का आदर भी उन्होंने भरपूर पाया है। मगर नोबल पुरस्कार की बात ही कुछ और होती है। जैसा कि किसी भी ईमानदार रचनाधर्मी के साथ होता है यह कवियित्री किसी यश के लिए नहीं लिखती। उनके मन की गहराइयों में जैसा संसार रचता है उसे वे बिना किसी आडंबर के शब्दों में उतार देती हैं। इसलिए जब अकादमी से उन्हें फ़ोन पर जानकारी दी गई कि उन्हें साहित्य के नोबल पुरस्कार के लिए चुना गया है तो उनका 'आश्चर्यचकित' हो जाना स्वाभाविक ही था।

ग्लूक का जन्म न्यूयॉर्क में साल 1943 में हुआ था। वे वर्तमान में येल विश्वविद्यालय विश्वविद्यालय में राइटर-इन-रेजीडेंस हैं और केम्ब्रिज, मेसाचुसेट्स में रहती हैं। उनकी कविताओं के अब तक 12 संकलन प्रकाशित हो चुके हैं। इनके अलावा उन्होंने कविता पर अनेक निबंध भी लिखे हैं जिनके संकलन भी प्रकाशित हो चुके हैं। ग्लूक 1993 में 'बेस्ट अमेरिकन पोएट्री' की संपादक रहीं। उन्होंने 2003-04 में अमरीकी कांग्रेस की लाइब्रेरी में पोएट लिट्रेचर कंसल्टेंट के रूप में भी काम किया। वर्ष 2003 में उन्हें अमरीका के राष्ट्रीय कवि के रूप में शासन ने मान्यता दी।

 

ग्लुक की कविताएं मानवीय दर्द, मौत, बचपन और परिवार की पृष्ठभूमि और उनकी जटिलताओं को बयां करती हैं। बचपन से वे जिन व्यक्तिगत शारीरिक और मानसिक अवस्थाओं से गुजरी और परेशानियां झेली उन अनुभवों को शायद उन्होंने अपनी रचनाओं में अनोखे तरीके से ढाल दिया। वे ग्रीक पौराणिक कथाओं और उसके पात्रों से भी प्रेरणा लेती हैं, जो अक्सर विश्वासघात के शिकार हैं। अकादमी ने माना कि उनका 2006 में प्रकाशित कविता संग्रह एवर्नो एक 'उत्कृष्ट संग्रह' था। नोबेल पुरस्कार कमेटी के अध्यक्ष एंड्रेस ऑल्सन ने कवयित्री की तारीफ़ करते हुए कहा कि उनके पास बातों को कहने का स्पष्टवादी और गैर समझौतावादी अंदाज़ है जो उनकी रचनाओं को और बेहतरीन बनाता है।” उनकी कविता मृत्यु, बचपन और पारिवारिक जीवन जैसे विषयों से मानो दो-दो हाथ करती है। मानव होने के दर्दनाक यथार्थ पर केंद्रित अपनी कविता में वे कहती हैं “क्या आप जानते हैं कि मैं क्या थी, मैं कैसे जीती थी? क्या आप जानते हैं निराशा क्या है? ये जान पाएंगे, तभी कड़ाके की सर्दियां आप के लिए कोई अर्थ रखेंगी।” उनकी जबर्दस्त कसावट भरी कविताएं दुनिया की एक ऐसी तस्वीर प्रस्तुत करती है जिसमें अग्नि परीक्षा भी है और आश्चर्य का भाव भी। जैसे, “मुझे जीवित रहने की उम्मीद नहीं थी/ धरती में दब कर नम धरती को महसूस करने की। मुझे फिर से जागने की उम्मीद नहीं थी। याद ही नहीं थी शुरुआती वसंत की ठंडी रोशनी में फिर से कैसे खुला जाए। डर? हां, वो तो था। लेकिन नई दुनिया की कच्ची हवा में जोखिम और खुशी के बीच आप फिर से रो रहे हैं?” 

देखा जाये तो ग्लुक “अपूर्ण की शक्ति का दोहन" करती है। एक पूर्ण बनाने के लिए। एक ऐसा पूर्ण जो अपूर्ण ही रहता है और अपनी गतिशील उपस्थिति नहीं खोता है। उनका खुद का वक्तव्य है कि "मैं उन कविताओं को नापसंद करती हूं जो बहुत अधिक पूर्ण महसूस होती हैं, वे अच्छे से बंद की हुई होनी चाहिए; मैं निश्चितता को दाद देने की भेड़चाल में शामिल होना पसंद नहीं करती।” 

उनकी कविताओं में हम एक अद्भुत लय महसूस करते हैं जिसमें सहमा हुआ अस्तित्व और प्रचंड बहदुरी दोनों है। कवियित्री जानती है कि उसे सत्य का साथ देने के लिए अपने शब्दों की धार कब कैसी रखनी है। उसके पास एक ऐसा ज्ञान है जो कि सच्चा भी है और सक्षम भी। वे जानती हैं कि सत्य कितना कम कहा जा सकता है और सच कहने के प्रयास में कितनी घनी ऊर्जा लगती है। एक भारतीय शास्त्रीय संगीत के निष्णात गायक की भांति वे जानती हैं कि कविता के स्वर की लय को कब थामना है और कब छोडना है। उनकी कविताओं में अधिकतर आवाज़ें दबी ज़ुबान में या फुसफुसाहट में सुनाई देती है मानो वे विध्वंस के बाद के हालात की जानकारी ले रही हो या उस माहौल में आत्मा का जो स्वरूप बना उसे देख रही हों। उनके संग्रह द वाइल्ड आइरिस की शुरुआती कविता हमें उनकी महान प्रतिभा और उनकी लेखनी की खूबसूरती का एहसास मिलता है जो शुरू होती है: “मेरे दुख के अंत में, एक दरवाजा था।” क्वियित्री ने एक बार बताया कि यह छवि उनके मानस में बरसों तक रही और अंत में कविता की इन पंक्तियों में छलकी। उनके शब्दों से बुनी तीखी कल्पनाएं किसी से झूंझती हुई लगती है। मगर वे सटीक और विचारोत्तेजक है और साथ ही मधुर और कठोर भी है।

न्यूयॉर्क में 22 अप्रेल 1943 में में जन्मी इस अमेरिकी कवयित्री की खासियत भयानक, कठिन, और दर्दनाक हालात का सामना करने की है जिसके परिणामस्वरूप उनकी अंतर्दृष्टि उजागर होती है और एक गंभीर गीतवाद की विशेषता वाली कविता का निर्माण होता है। एक बच्चे की कहानी कविता में वे कहती हैं “हमें वहां वापस लौटना होगा जहां वह खो गया था/ यदि इसे फिर से खोजना चाहते हैं हम।” यहां उनके लिए निराशा ही सत्य है। पीछे छूटते जीवन की पहचान की निराशा ही सत्य है। वे मानती है कि शांत हो कर बैठना सत्य नहीं है। लुईस ग्लूक के लिए कला, युगीन अतीत और अपरिहार्य भविष्य के बीच, चंचलता और स्थायित्व के बीच संवाद है। वे मिथकों का उपयोग करती हैं। उनकी खोज करती नज़र आती हैं। वे अपनी कविताओं में एक स्वप्निल लोक रचती हैं जो काफी हद तक मानवीय कारोबार के प्रति तटस्थ है। हालांकि वे अलगाव की भावना विनाशकारी रूप में प्रस्तुत करती हैं लेकिन कभी-कभी उनमें शुष्क कटु हास्य भी होता है। "क्या कह रहे हो तुम? तुम चाहते हो अनन्त जीवन? क्या तुम्हारे विचार वास्तव में ऐसा लोभ रखते हैं? अरी आत्मा, बहुत हुआ, अरी आत्मा / अंदर झांक।"

उनकी कविता एक बागवान का परमात्मा से वार्तालाप देखें जिसमें माली परमात्मा से कहता है: “आपने अपनी लंबी अनुपस्थिति में, मुझे पृथ्वी के उपयोग की अनुमति दी, अपने निवेश पर कुछ पाने के लिए। मगर परमात्मा को उसके निवेश का प्रतिफल देने में वे अपनी विफलता को स्वीकार करता है लेकिन कहता है “एक रचयिता के रूप में यह सब आप का है” मगर “बीज तो मैंने लगाए। तुषारपात से हुए नुकसान से दिल टूट गया।” उनका तंज़ है कि परमात्मा नश्वर की दुर्दशा को समझ नहीं सकता: “मुझे शक है परमात्मा तुम्हारे पास भी हमारे जैसा ही कोई दिल है/ तू भेद नहीं करता - मृत और जीवित लोगों के बीच/ हम जो अपने कर्मों के परिणाम का पूर्वाभास नहीं कर पाते/ तू नहीं जानता होगा हम कितने आतंक में रहते हैं।” 

ग्लूक की कविताओं में एक अलौकिक असर नज़र आता है जिसमें वे "परे दुनिया" भी देख पाती है। अपनी बनावट और विचित्रता में, उनकी यह कविता खुद एक दुनिया लगती है। उनकी कविता में हम पाते हैं कि वे चीजों की शुरुआत में बार-बार लौटती है - एक कहानी, एक मिथक, एक दिन, एक शादी, एक बचपन। जैसे “प्रश्न, हम नए सिरे से कैसे शुरू करते हैं? फर्स्टबोर्न (1968) से लेकर अपने सबसे हालिया संग्रह, फेथफुल और पुण्य रात्रि (2014) तक, यह कवियित्री इसी प्रकार प्रारम्भ पर लौटती है। हालांकि उनकी शुरुआती, सघन चित्रण  की कविताएं दुनिया को उनके पात्रों के नज़रिये से देखती हैं मगर उनकी बाद की कविताएं लंबी और बिखरी कथाएं कहती हैं जिनमें हम व्यक्तिगत अनुभव तथा दूसरों के जीवन के बीच की अनोखी हिलोलें पाते हैं।

उनकी कविताओं के वर्तमान में शायद ही कोई राजनैतिक संदर्भ मिलें या उनमें कोई नाम का जिक्र हो मगर उनकी प्रतिध्वनि तब जरूर गूंजती है जब व्यक्तियों के लिए, समुदायों के लिए, समाजों के लिए कुछ नए की कल्पना करना भी मुश्किल लग सकता है। ग्लूक, हताशा या पलायन नहीं है, लेकिन "वापस लौटने की इच्छा" का परित्याग जरूर है, चाहे वह पहले बगीचे के लिए हो, पृथ्वी का पहला दृश्य हो, एक मूल कहानी हो, या दुनिया के साथ एक अटूट रिश्ता हो। इसीलिए ग्लूक हमारी चेतना को गहरे तक छूती है।

(राष्ट्रदूत के 14 सितंबर 2020 अंक में संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित)

Saturday, September 19, 2020

कांग्रेस में अंतर्विरोध और अंतर्कलह, मगर संभाले कौन!

 -         राजेंद्र बोड़ा

डेढ़ सदी से अधिक पुरानी कांग्रेस पार्टी में इस समय कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। लगातार दो बार संसदीय चुनाव की हार और चंद राज्यों में उसकी सरकारों के सिमट जाने के बाद अब इस पार्टी में जो अंतर्कलह उभर कर सामने आ रही है वह लक्षण है उसमें आ रहे नेतृत्व के क्षरण का। बीते दो दशकों से अधिक समय से पार्टी की अध्यक्षता नेहरू-गांधी परिवार के ही पास रही है  जिसकी वजह से यह माना जाने लगा है कि अब पार्टी परिवार के ही इर्द-गिर्द घूमती है और परिवार के बिना शायद ही उसका कोई वजूद रहेआज कांग्रेस अन्य राजनैतिक दलों से ऊंची पायदान पर नहीं है। वह भी अन्य राजनैतिक दलों की भांति एक सामान्य पार्टी हो कर रह गयी है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि अब उसमें नेहरू परिवार के नेतृत्व की पुरानी राजनीतिक समझ बदल गई है। नई पीढ़ी का नेतृत्व अपनी विरासत, अपनी परंपरा से कटा हुआ है। सोनिया गांधी, राहुल गांधी या प्रियंका वाड्रा के पास पुश्तैनी संबंधों की धरोहर तो है मगर हिंदुस्तान की राजनीति की समझ, लोकतान्त्रिक सोच तथा वैचारिक अनुभव की विरासत नहीं है। परिस्थितियों ने उन्हें राजनीति में वैसे ही धकेल दिया है जिस प्रकार अनिच्छुक राजीव गांधी को स्थापित किया गया। इनमें वैसी क्षमता नहीं है जो खांटी के राजनेता में होती है। वे ऐसे नेता भी नहीं है जो हमेशा लोगों और कार्यकर्ताओं के बीच रहने का आनंद ले सकें उनके साथ भावनात्मक रूप से जुड़ सकें। लोगों के बीच जाकर घुल मिल जाना उनके लिए सहज नहीं है। वे अपना निजी जीवन भी चाहते हैं और सार्वजनिक जीवन भी। हिंदुस्तान की राजनीति में ऐसा संभव नहीं है। मगर हम देखते हैं कि सोनिया गांधी या राहुल गांधी अपना निजी जीवन भी चाहते हैं। वे हर वक़्त पार्टी के लोगों से मिलने को तैयार नहीं है। कांग्रेस के बड़े नेताओं को भी उनसे मिलने के लिए समय मांगना पड़ता है और उनके बुलावे का लंबा इंतज़ार करना पड़ता है। जब शीर्ष नेतृत्व से सहज संपर्क ही संभव न हो और दूसरी तरफ समस्याएं मुंह बाये खड़ी हों तब पार्टी दिशाहीन ही नहीं हो जाती बल्कि उसमें लोग घुटन भी महसूस करने लगते हैं। पुराने और नये लोग पार्टी छोड़ जाते हैं। कुछ अपनी बात कहने के लिए अंदर फुसफुसाने की कोशिश करते हैं तो पार्टी विरोधी करार दे दिये जाते हैं। हाल ही में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक जिस माहौल में हुई वह इसका प्रमाण है। पार्टी के 23 नेताओं की चिट्ठी अंदर की इसी कश्मकश को उजागर करती है। पार्टी के भविष्य को लेकर कार्यकर्ताओं और नेताओं में जो सर्वत्र चिंता यह चिट्ठी दर्शाती है उस पर राहुल गांधी की प्रतिक्रिया दुर्भाग्यजनक है। लंबे इतिहास वाली कांग्रेस की परंपरा से निकला कोई नेता होता तो वह कार्यसमिति की बैठक में उन मुद्दों पर बात करता और करवाता जो चिट्ठी में उठाए गए थे। वह यह समझने की कोशिश भी करता कि समस्या कहां है, क्या है और क्यों है? यह जग जाहिर है कि पार्टी में अंतर्कलह है। अंतर्विरोध और अंतर्कलह में फर्क होता है। इस पार्टी में जब तक बहुलता की स्वीकार्यता रही तब तक वह अंतर्विरोध को थामे रख सकी। इसी बहुलता के कारण इस पार्टी ने हर क्षेत्र में एक से एक आला नेता दिये। लेकिन अंतर्विरोध और बहुलता को साधना आसान नहीं होता। जब नेतृत्व उसे नहीं साधने में असफल रहता है तब पार्टी की आंतरिक गतिशीलता शिथिल होने लगती है और वह अवसान की ओर बढने लगती है। ऐसा ही आज कांग्रेस में हो रहा है। 

महात्मा गांधी ने कांग्रेस को एक राजनैतिक दल से एक अभियान में तब्दील कर दिया था। एक ऐसा अभियान जिसमें प्रत्येक के लिए जगह थी और जिसमें पार्टी के सिद्धांतों को न छोडते हुए भी सबकी स्वीकार्यता थी। अपने इसी लोकतान्त्रिक स्वरूप और व्यवहार के कारण वह देश के हर कोने में बिना किसी भेद के लोगों को अपने से जोड़ सकी। महात्मा गांधी का यह अभियान सत्ता के लिए नहीं था। धर्म, जाति, क्षेत्र और भाषा से ऊपर उठ कर गरीबों का, मज़लूमों का जीवन बेहतर बनाने के पवित्र उद्देश्य के लिए था। सत्ता पाना उस पवित्र उद्देश्य को हासिल करने का जरिया भर था। व्यक्तियों की महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए सत्ता नहीं थी। इसीलिए शायद इस आधी लंगोटी के फकीर ने आजादी की संध्या पर सुझाया था कि कांग्रेस राज-काज छोड़े और जमीनी स्तर पर काम करके अपने को फिर से अंकुरित करे। मगर आज़ादी के बाद शासन के जरिये कुछ कर गुजरने के उत्साही जज़्बे से लबरेज़ कांग्रेस के तत्कालीन नेताओं ने कोई ध्यान नहीं दिया। फिर शनैः शनैः कांग्रेस यथास्थितिवादी पार्टी बनती चली गई। ऐसे में नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को पर लगने लगे और पार्टी में वैचारिक बहस की जगह अंतर्विरोध और फिर अंतर्कलह उभरने लगे। इसका हल एक मजबूत केंद्रीय नेतृत्व के रूप में उभरा और पार्टी के अंदर की सत्ता का पूरा केन्द्रीकरण हो गया। केंद्रीय नेतृत्व पार्टी में ऊपर से नीचे तक के नेतृत्व का नियंता बन गया। इसका परिणाम यह हुआ कि सभी एक परिवार में सीमित केंद्रीय नेतृत्व के लिए हो कर रह गए। ऐसे में नेतृत्व की विविधता समाप्त हो गई क्योंकि अन्यों के लिए कोई जगह नहीं रह गई और चापलूसी की नई संस्कृति पार्टी में घर कर गई और नेतृत्व आम जन से दूर होता चला गया। कभी कांग्रेस पार्टी एक ऐसा समुद्र थी जिसमें सभी विचारधाराओं, मतों, और हितों की धाराएं आकर मिलती थी। सभी के लिए उसमें जगह थी। यह व्यवस्था हिंदुस्तान जैसे विविधता वाले देश के लिए अनुकूल ही थी। भारतीय जनता पार्टी को भी उसके अकेले का बहुमत होते हुए भी इसीलिए एनडीए को बनाए रखना पड रहा है क्योंकि हिंदुस्तान मुल्क एक रंग का नहीं है। कांग्रेस में जब आंतरिक विविधता खत्म हो गई तो उसे भी यूपीए को अपनाना पड़ा।

साल 2019 की हार के बाद कांग्रेस के हर नेता को ये लग रहा था कि इतनी बड़ी हार के बाद पार्टी में गंभीर चिंतन और मंथन होगा ताकि भविष्य की दिशा तय की जा सके। मगर पार्टी के भीतर कुछ नहीं हुआ। लंबे समय से ऐसी बातें चल रही थी कि कि सोनिया गांधी से इस बारे में बात की जानी चाहिए। लेकिन डर यह भी था कि जो भी आगे बढ़कर बोलेगा उसे विद्रोही माना जाएगा। मगर यह चिट्ठी लिखी गई ताकि नेतृत्व समेत पार्टी के तमाम मुद्दों पर चर्चा हो सके। अभी पार्टी दो धड़ों में बंटी नज़र आती है लेकिन ये गुटबाजी नहीं है। अपनी तमाम असफलताओं बुराइयों और कमजोरियों के बावजूद कांग्रेस इस देश की आवश्यकता है। उसे फिर से आम जन में अपने प्रति भरोसा जगाना है। मगर यह भरोसा धरातल पर लोगों के बीच काम करके ही हासिल किया जा सकता है। राजनीति का जो नया स्वरूप देश में बना है उससे सबको और यहां तक कि निचले स्तर के कार्यकर्ताओं को भी लगने लगा है कि उन्हें जमीनी स्तर पर लोगों के बीच काम नहीं करना है बल्कि ऊपर नेताओं को खुश रखना है और सत्ता में किसी न किसी प्रकार छोटी-मोटी भागीदारी हासिल करनी है। नीचे से ऊपर तक पार्टी के लोगों को लगने लगा कि विचारधारा के आदर्शों के आधार पर लोगों का जीवन बदलने की बजाय राज में बैठ कर वैसा करना अधिक सुविधाजनक है। मगर यह भुला दिया जाता है कि राज मे जाकर नेता जनता को छोड़ कर अपना और अपनों का हो कर रह जाता है। यह तोहमत अब पूरी तरह कांग्रेस पर लग गई है कि वह एक परिवार की पार्टी है। कांग्रेस में नई जान फूंकने की बात तो दूर अभी तो हालात ये है कि इस पार्टी को बचाना ही मुश्किल दिख रहा है। लोगों को यह बात समझ में नहीं रही कि नेहरू गांधी परिवार के प्रति जो श्रद्धा उसकी शक्ति होती थी वही उसकी क़ामयाबी की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है क्यों बन गया है। अब ये सवाल भी पूछा जाने लगा है कि क्या कांग्रेस में गांधी युग का अंत आने वाला है? क्या पार्टी को फिर से खड़ी करने के लिए गांधी परिवार की राजनीति को ख़त्म कर दिया जाना चाहिए? मगर यह आसान नहीं है। उन लोगों की बात में भी दम है कि यह परिवार ही पार्टी को जोड़े रख सकता है। मगर जोड़े रखने के लिए नेतृत्व में जो तत्व होने चाहिए वे दिखने चाहिए। नेतृत्व के ऐसे तत्व जो पार्टी का बुरी तरह कमजोर हो गये ढांचे को फिर से खड़ा कर सके। कांग्रेस के लिए आम लोगों में सहानुभूति की कोई कमी नहीं है। कमी है तो इस बात की कि कोई ज़मीन पर आकार काम नहीं करना चाहता। सभी शासन के गलियारों में बैठना चाहते हैं। कांग्रेस के आज के लोग अपनी पार्टी के जिस गौरवशाली अतीत पर गर्व कर सकते हैं दुर्भाग्य से वे उसे नहीं जानते। कांग्रेस में अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं के लिए वैचारिक शिविर भी लगते रहते थे इसकी जानकारी भी आज के नेताओं को कहां है। पार्टी का संगठन अपनी सरकार का ताबेदार हो कर रह गया है। राहुल गांधी, पार्टी के लोग जिन्हें बार-बार पकड़ कर अध्यक्ष की कुर्सी पर बिठाना चाहते हैं, अन्यमनस्क हैं। वे पार्टी में भूमिका तो निभाना चाहते हैं मगर ज़िम्मेवारी संभालने से कतराते हैं। यह नहीं हो सकता।

(यह आलेख प्रेसवाणी के अगस्त 2020 अंक में प्रकाशित हुआ)

                                    

Saturday, September 5, 2020

भारत के अमीर विश्व सूची में, मगर गरीबी नहीं मिट रही

राजेंद्र बोड़ा 

सारा मीडिया जगत इस बात के इंतजाम करता है कि हम उसकी इस सूचना से इतराएं कि भारतीय व्यापार और उद्योग की हस्तियां विश्व के सबसे अधिक अमीरों की सूची में स्थान पा रहीं हैं। फॉरचून की अमीरों की नई सूची में 40 वर्ष से कम वय वाले तीन भारतीय युवाओं के नाम शामिल हैं। हालांकि उन्हें यह अमीरी पारिवारिक विरासत से मिली है। ऐसा माहौल बनाया जाता रहा है कि नई अर्थ व्यवस्था के चलते देश की संपन्नता में इजाफा हो रहा है जिसके लिए सभी को उत्सव मनाना चाहिए। यह सच है कि दुनिया के अमीरों की सूची में शीर्ष स्थानों पर भारत के लोगों के नाम आने लगे हैं और सरकारी तंत्र से जुड़ा, खास कर शहरी इलाकों का, मध्यम वर्ग का सरकारी नौकरियां करता और अवकाशप्राप्त तबका और उनके साथ निजी सेवा क्षेत्र में लगे उत्साही युवा सुरक्षित वित्तीय संपन्नता की सीढ़ियां चढ़ हे हैं और वह विलासिता की चीजों पर खर्च को बढ़ा कर बाज़ार की अपेक्षाओं को पूरा कर रहा है। गावों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना का पैसा पहुंचाया जा रहा है जिससे बाज़ार को मदद मिलती रहे। मगर कोरोना महामारी तथा उससे निबटने के लिए हुए लॉकडाउन से अचानक सब गड़बड़ा गया है। बाज़ार को साध लेने वाला और उसी का होकर रह आगे बढ़ता आधुनिक समाज आज नई परिस्थिति में अपने को असहज पा रहा है। नए वित्त वर्ष की पहली तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद में करीब 24 प्रतिशत की गिरावट ने सबको सहमा दिया है। सरकारी कर्मियों में नई संपन्नता किस प्रकार आ रही है इसकी मिसालें मिलती हैं उनके यहां भ्रष्टाचार निरोधक विभाग तथा अन्य आर्थिक अपराधों पर नियंत्रण और जांच के अन्य विभागों द्वारा पड़ने वाले छापों और उनके यहां बेशुमार धन और संपत्ति पकड़े जाने की आ रही नियमित खबरों से। आज जिस प्रकार से लोगों में धन कमाने की लोलुपता बढ़ती जा रही है उसके चलते हर कहीं छल, कपट और चोरी से पैसा कमाने की होड लगी है। दूसरी तरफ बड़े कार्पोरेशन, बैंक व अन्य समूह आम जन को लुभा कर उनकी जेबें खाली करवाने में जुटे रहते हैं। बाज़ार का खेल खेलने वाली कंपनियां पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की हिस्सा होती हैंइसीलिए उसी व्यवस्था के हिसाब से व्यवहार भी करती है। मुनाफे का अंबार लगाने में लगे रहना इस व्यवस्था की फितरत होती है। पहले एक व्यक्ति शोषण करता था। अब नई अर्थव्यवस्था शोषण का संगठित औज़ार मुहैया कराती है। इस व्यवस्था का सबसे बड़ा नियम होता है कि हर चीज उत्पाद है और हर उत्पाद मुनाफा कमाने के लिए होना चाहिए क्या चीज बनाई जायेगी इसका निर्धारण समाज की आवश्यकता के अनुरूप नहीं होता। उसकी प्रेरणा मुनाफा होती है। प्रचार के जरिये गैर जरूरी चीजें भी जरूरी बना दी जाती हैं। बाज़ार के आकर्षण ने समाज में कुछ ऐसा माहौल बना दिया है जिसमें हर एक को लगता है कि पैसे से ही काम होता है और अमीर होने के लिए सिर्फ पैसे की जरूरत होती है। यहां तक कि नई अर्थव्यवस्था में सामाजिक रिश्ते भी पैसे की तराजू पर तुलते हैं। बाज़ार यह याद नहीं आने देता कि धन से खुशियां नहीं खरीदी जा सकती। धन से सूचना मिल सकती है ज्ञान नहीं। धन किसी को मकसद नहीं देता, उसे पाना ही मकसद बन जाता है। बाज़ार निर्मित इसी भ्रम में मानवीय मूल्य तिरोहित हो जाते हैं। व्यक्ति स्वकेंद्रित हो जाता है। बाज़ार यह भ्रम भी देता है कि वह व्यक्ति को चुनने की स्वतन्त्रता देता है। इस प्रकार वह एक ऐसा मायाजाल रचता है जिसमें मानव को अपना उत्कर्ष लोभ, लालच और अधिक से अधिक धन संग्रह करने की प्रवत्ति में लगने लगता है। इस व्यवस्था को अपने पालन और विस्तार के लिए राज्य सत्ता की आवश्यकता होती है। यही कारण है बाज़ार की ताक़तें येन केन प्रकरेण सत्ता पर अपना प्रभुत्व बनाए रखती हैं। विश्व में जब से एक ध्रुवीय व्यवस्था हो चली है यह शिकंजा और अधिक मजबूत हो चला है। अब राज्य खुले रूप से ऐसी अर्थ व्यवस्था के पोषण और विस्तार के लिए काम करता है जो समूचे समाज को बाज़ार के रंग में रंग दे। राज्य की इस भूमिका को हम बहुत साफ देख सकते हैं। जब कभी यह अर्थ व्यवस्था गंभीर संकट में आती है राज्य उसे बचाने के लिए तुरंत उपाय करता है। उसे संकट से उबारने के लिए राज्य जो उपाय करता है उसकी कीमत समूचे समाज को चुकानी पड़ती है जिसमें सबसे अधिक गरीब तबका ही कुचला जाता है। कोरोना महामारी के कारण बाज़ार पर आई आफत को निपटने के जो भी लाखों करोडों के इंतजाम सरकार ने किए हैं वे सब उसे ही उठाने के लिए हैं।      

 

बाज़ार आधारित अर्थ व्यवस्था का प्रादुर्भाव औद्योगिक सभ्यता के साथ हुआ। जब उत्पादन संगठित क्षेत्र में होने लगा और अधिकतम मुनाफे के लिए श्रम का शोषण एक जरूरत बन गई। इसी के साथ आधुनिक अर्थशास्त्र भी स्वतंत्र विषय के रूप में स्थापित हुआ। इससे पहले अर्थशास्त्र दर्शन शास्त्र का हिस्सा हुआ करता था। तब अर्थ के साथ जीवन के नैतिक सबब की बात भी होती थी। जीवन का नैतिक सबब खुशी पाना होता है। हर एक के अपने जीवन मूल्य होते हैं जिन्हें पाना सच्ची खुशी होती है। पूंजी की व्यवस्था इस खुशी को बाज़ार के हिमें परिभाषित करती है। जीवन दर्शन से अर्थ को अलग करके बाज़ार के समर्थकों ने पश्चिम में उसे व्यक्तिवादी बना दिया। धर्म, जो समाज में सम की अवधारणा पुष्ट करता था उसे भी नए पूंजी समर्थित अर्थशास्त्र ने संकुचित कर मुनाफे के लिए व्यवसाय बना दिया। धर्म को भी प्रतिस्पर्धी बना दिया। यहां तक कि इस युग में खुद पूंजीवाद एक प्रकार का धर्म बन गया। पहले के धर्म कहते थे अपने लिए नहीं दूसरे के लिए जियो। दूसरे की मदद करो। जीवन का मकसद सच्ची खुशी पाना है जो दूसरे के चेहरे पर मुस्कराहट लाने से मिलती है। मगर आज का बाज़ार संचालित धर्म कहता है जो करो अपने के लिए करो। अपना हिसाधना ही सर्वोच्च मूल्य है। इसमें धन को बढ़ाने की लालसा, लोभ, और लालच कोई बुरी बात नहीं है। पहले जो जीवन मूल्य अवगुण माने जाते थे वे ही आज मानव के लिए श्रेष्ठ गुण बन गए हैं। लोकतन्त्र में सरकारें भले ही उनके बहुमत से चुनी जाती हो जिनका बाज़ार शोषण करता है मगर निर्वाचित प्रतिनिधि बाज़ार के ही हुए रहते हैं और उन्हीं के कार्य साधते हैं। सरकारें आम जन की होकर भी गणशत्रु के रूप में व्यवहार करने लगतीं हैं। कहने को उसकी सारी नीतियां और सारे कार्यक्रम जनहित के लिए होते हैं। बाज़ार को प्रोत्साहन जनहित के नाम पर ही दिया जाता है। अकूत मुनाफा कमाने का के लिए लालच, लोभ और वैसी ही महत्वाकांक्षा की जरूरत होती है। नई अर्थ व्यवस्था इसके लिए नैतिक आधार देती है। संचार के माध्यम व्यवसायजनित होकर मुनाफे के लिए होते हैं इसलिए वे भी सारा जतन यह करते हैं कि किस प्रकार व्यक्ति को इसके लिए लुभाया जाय। वे लोगों के इस भरोसे का फायदा उठाते हैं कि वे उनकी बात करते हैं, उनकी आवाज हैं और उनके लिए लड़ते हैं। वे राज्य की भूमिका के बारे में कोई गंभीर और गहरे सवाल नहीं उठाते और न ही ऐसी कोई बहस छेड़ने में रुचि दिखाते हैं। सतही मुद्दों पर चिल्ला कर बहस प्रस्तुत कर अपने जनहितकारी होने का ढोंग वे जरूर कर लेते हैं। बाज़ार की शक्तियां आज विजेता है और गरीब की हालत बद से बदतर हो रही है। एक व्यक्ति राष्ट्रीय संपत्ति का जो हिस्सा अपनी अमीरी के इजाफे के लिए लेता है वह ऐसा किसी न किसी को गरीब करके ही करता है। मजरूह सुल्तानपुरी ने अपने एक गीत में खूब लिखा था “गरीब है वो इस लिये के तुम अमीर हो गये/ के एक बादशाह हुआ तो सौ फ़कीर हो गये”। गरीब का जब धीरज टूटता है तो वह अपराध की और प्रवत्त होता है। ऐसे में उस गरीब का शोषण आतंकी राजनैतिक विचारधारा के पोषण के लिए तो कभी संकीर्ण धार्मिक प्रसार के लिए होने लगता है। ऐसे माहौल में खुशी पाने का जीवन का नैतिक सबब मृग मरीचिका बन जाता है।  पूंजी आज इस हद तक सफल है कि सारे ही राजनैतिक दल अपनी मूल विचारधाराओं से च्युत होकर सत्ता पाने की होड में लगे रहते हैं ताकि उनके नायक अपना और अपनों का हित साध सकें। राजनीति में लोग जन सेवा के लिए नहीं अपनी और अपनों की सेवा के लिए आते हैं। लोकसेवा का तंत्र इन्हीं नायकों के लिए होकर रह गया है। संविधान का आमुख और उसके प्रावधान कागजों पर रह गए हैं। संविधान के नीति निर्देशक तत्वों को तो पूरी तरह भुला दिया गया है। आज के बच्चों से पूछें कि क्या वे जानते हैं कि संविधान के दस्तावेज़ में नीति निर्देशक तत्व भी शामिल हैं तो इसका जवाब उनकी आंखों का सवालिया निशान ही होगा। इसीलिए ज़मीनी स्तर पर बदलाव की संगठनात्मक राजनीति तिरोहित हो चुकी है और बाज़ार नियंत्रित सत्ता प्रबंधन शैली ने सबको मोह लिया है। नतीजन राज्य सत्ता का रुतबा खत्म हो रहा है और संवैधानिक मर्यादाओं, लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं और कानून के शासन को बार-बार आघात लग रहे हैं।   

(राष्ट्रदूत के 05 सितंबर, 2020 अंक में अतिथि संपादकीय)  

Tuesday, May 7, 2019

हिंदुस्तानी फिल्म संगीत में सरोद की गूंज



                                    राजेंद्र बोड़ा


सरोद वादन की दो प्रमुख पद्धतियां प्रचलन में हैं। एक ग़ुलाम अली खान की शैली और दूसरी अल्लाउदीन खान की शैली। दोनों के सरोद की साइज़, उसका आकार तथा उस पर कसे तारों की संख्या भिन्न हैं। दोनों का वाद्य यंत्र बजाने तथा उसे सुर मिलाने का तरीका भी अलग-अलग है।

सरोद की उत्पत्ति के बारे में अनेक बातें कही जाती है। अधिकतर ऐसा माना जाता है कि भारतीय सरोद का मूल अफगानी रबाब में है जो सरोद से आकृति में छोटा और तंबूरे जैसा होता है जिसे अफगन लोग युद्ध में जाते वक़्त बजाते जाते थे।

कहते हैं बंगेश जनजाति के तीन अफगन घुड़सवार कोई सवा दो सौ साल पहले रबाब ले कर हिंदुस्तान आए थे और उत्तर भारत राजाओं के यहां सैनिकों की नौकरियां करते हुए यहीं बस गए। उनके संगीत के हुनर को यहां पहचाना गया और राजाओं के दरबारों में उनकी पहचान बनने लगी। इन तीनों के परिवारों में उनके बाद भी रबाब बजाने की परंपरा जारी रही। लेकिन जैसा कि कला और संस्कृतियों के संपर्कों से नयी-नयी चीजें बनती हैं अफगानी रबाब वाद्य पर भी भारतीय वाद्यों का प्रभाव पड़ा, खास कर वीणा का, जिससे रबाब का सरोद के रूप में विकास हुआ। किसी वाद्य के विकास की बात करें तो उसमें उसका परिष्कार निहित्त है। रबाब में जो कमी हिंदुस्तानियों को शायद लगी वह थी कि उसके तार के छेडने पर स्वर निकलता है उसकी गूंज नहीं बनी रहती। हिन्दुस्तानी तार वाद्यों में यह विशेषता होती है कि तार को छेडने पर स्वर की अनुगूंज देर तक बनी रहती है। रबाब में देसी संगीत के चारित्र्य को प्रस्तुत कर सकने वाला बनाने तथा उसकी ध्वनि को उन्नत करने के लिए उसमें तीन प्रमुख बदलाव लाये गए जिससे वह सरोद के रूप में प्रतिस्थापित होने लगा। ये तीन बदलाव थे उसके तारों और उन पर उंगलियां चलाने वाले बोर्ड को धातु का बनाया जाना और उसमें सिंपाथेटिक तारों का जोड़ा जाना। बाद में उत्तर भारतीय उस्तादों ने अपने-अपने हिसाब से उसमें और परिवर्तन किए। जैसे मैहर घराने के उस्ताद अल्लाउदीन ने उसकी टोनल क्वालिटी को बेहतर बनाने के लिए जो किया उससे यह वाद्य वीणा की तरह लाग्ने लगा।

लेकिन संगीत के इतिहासकारों की दूसरी धारा इस बात से इत्तेफ़ाक़ नहीं करती कि सरोद के उद्गम का स्रोत अफगानी रबाब में है। वे कहते हैं कि रबाब जैसे वाद्य दक्षिण भारत के तमिलनाडु, केरल और कर्णाटक आदि राज्यों में पहले से ही मिलते रहे हैं। उनका यह भी दावा है कि छटी शताब्दी के भारतीय मंदिरों की मूर्तियों में सरोद की अनुकृतियां मिलती है। इसलिए यह कहना ठीक नहीं है कि सवा दो सौ बरस पहले भारत में आए रबाब से सरोद विकसित हुआ।

अब हम देखेंगे हिन्दुस्तानी सिने संगीतकारों ने सरोद का किस भांति उपयोग गानों में किया। आम तौर पर फिल्मी गानों में भारतीय वाद्यों की बात चलती है तो सितार, तबला, बांसुरी, शहनाई, इकतारा और सारंगी की चर्चा होती है और श्रोता भी उन्हें आसानी से पहचान भी लेते हैं। मगर सरोद की आवाज़ किस गाने में प्रमुख रूप से अपने सुनी यह पूछ लिया जाय तो दिमाग पर बहुत ज़ोर डालने पर भी अचानक कोई गाना याद नहीं आता। लेकिन यह बात भी सच है कि उन गानों ने खूब धूम मचाई जिसमें सरोद बजा। सच तो यह भी है कि सरोद के चोटी के उस्तादों ने अन्य संगीतकारों के निर्देशन में फिल्मी गानों के लिए बजाया ही नहीं बल्कि खुद भी फिल्मों में संगीत दिया। और जब कोई सरोदिया किसी फिल्म का संगीतकार हो तो उसके स्वरबद्ध किए गानों या फिल्म के पृष्ठभूमि संगीत में सरोद क्योंकर न बजे।

हिंदुस्तानी फिल्म संगीत के अग्रदूत माने जाने वाले बंगाल के संगीतकार तिमिर बरन जिन्होंने भारतीय वाद्य यंत्रों को लेकर पहला फिल्मी ऑर्केस्ट्रा बनाया वे अत्यंत गुणी सरोदिये थे। हालांकि उन्हों ने पहले राधिका प्रसाद गोस्वामी से सरोद की तालीम ली मगर वे 1920 के दशक में उस्ताद अली अकबर खान के शुरुआती शिष्यों में से एक थे। भारतीय नृत्य को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाने वाले उदय शंकर जब अपनी नृत्य टोली लेकर पहली बार विदेश गए तब तिमिर बरन उनके साथ बतौर संगीत निर्देशक साथ गए। बाद में उन्होंने सरोद वादक के रूप में यूरोप, अमरीका तथा दक्षिण पूर्व एशिया का दौरा किया। 
उनके संगीत वाली 1935 की फिल्म देवदास में केदार शर्मा के लिखे और कुंदनलाल सैगल के गाये गीत बालम आन बसो मोरे मन में तिमिर बरन का बजाया सरोद सुना जा सकता है। कैसी दिलचस्प बात है कि इसके बीस साल बाद बिमल रॉय ने जब फिर से देवदास फिल्म बनाई तो उसमें संगीतकार सचिन देव बर्मन के लिए बरन के गुरु उस्ताद अली अकबर खान ने लता मंगेशकर के गाये ओ जाने वाले रुक जा कि दम गाने में सरोद का टुकड़ा बजाया।
उस्ताद अली अकबर खान की बात चली है तो यह जान लेना जरूरी है कि जोधपुर दरबार में आठ वर्षों तक अपने वाद्य की घमक को बनाए रखने वाले अली अकबर खान ने आज़ादी के बाद 1952 और 1953 में में देव आनंद की निर्माण संस्था नव केतन की दो फिल्मों क्रमश: आंधियां और हम सफर में संगीत दिया। जब कोई सरोदिया फिल्म में संगीत दे और उसमें सरोद न बजे ये कैसे संभव है।

वर्ष 1952 में आई आंधियां में उस्ताद अली अकबर खान ने पहली बार फिल्म संगीत दिया। न केवल फिल्म की नामावली की पृष्ठभूमि में हम उनका सरोज बजता सुन सकते हैं बल्कि लता मंगेशकर के गाये मीठे गीतों में भी सुन सकते हैं। उनकी नव केतन के लिए दूसरी फिल्म हमसफर थी जिसमें साहिर लुधियानवी के लिखे और गीता दत्त के गाये गाने हसीन चांदनी भीगी भीगी हवाएं की धुन में अली अकबर खान साहब का बड़ी ही खूबसूरती से पिरोया हुआ सरोद गूँजता है।
बाद में उस्ताद अली अकबर खान पूरी तरह शास्त्रीय संगीत को समर्पित हो गए। सचिन देव बर्मन ने उनसे देवदास (1955) के लिए सरोद बजवाया था और बाद में ओ पी रल्हन की बड़े बजट की फिल्म तलाश (1969) में उसके शीर्षक गीत तेरे नैना तलाश करे जिसे (मन्ना डे/मजरूह सुल्तानपुरी) के लिए सरोद बजाने के वास्ते विख्यात महिला सरोद वादक ज़रीन दारूवाला को बुलवाया। ज़रीन ने लगभग सभी बडे सिने संगीतकारों के लिए फिल्मों में बजाया।

संगीतकार जोड़ी शंकर जयकिशन ने हिंदुस्तानी फिल्म संगीत को नयी रवानगी दी। उनका संगीत का जादू आज भी लोगों को अपनी गिरफ्त में लिए हुए हैं। उनकी संगीत रचनाओं में चपलता भी है, लोक की उमंग भी है तो साथ में जबर्दस्त गहराई भी है। उन्होंने सीमा फिल्म के गानों में जिस प्रकार सरोद का एकल प्रयोग किया वह अद्भुत है। सुनो छोटी सी गुड़िया की लंबी कहानी जैसे तारों की बात सुने रात सुहानी (लता मंगेशकर/शैलेंद्र) को सुनें तो जिस प्रकार सरोद के तारों की झंकार के साथ इस संगीतकार जोड़ी ने प्रिल्यूड से गाने को उठा कर उसे कालजयी बनाया है उसे सुनकर आज भी उन्हें सलाम करने को जी चाहता है।

जरीन दारूवाला के सरोद का जादू शंकर जयकिशन के संगीत से सजी लेख टंडन की  आम्रपाली (1966) में जम के छाया। इसका यह गीत तुम्हें याद करते करते जाएगी रैन सारी/ तुम ले गए हो अपने संग नींद भी हमारी लता मंगेशकर के श्रेष्ठ गानों में शुमार किया जाता है। लता ने बड़ी ही रूमानियत से शैलेंद्र के शब्दों की भावनाओं को स्वराभिव्यक्ति दी है। इसमें शंकर जयकिशन ने जरीन दारूवाला के सरोद और जे. वी. आचार्य के सितार की जुगलबंदी इस तरह से गूंथी डाली है कि वह इस अर्द्ध शास्त्रीय गीत को किसी और ही धरातल पर ले जाती है।    
संगीतकारों की दूसरी सफलतम जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का भी फिल्म संगीत को अवदान कौन नकार सकता है। उनके संगीत में भी शंकर जयकिशन के संगीत की भांति विविधता मिलती है। उन्होंने मैं तुलसी तेरे आंगन की (1978) के शीर्षक गीत में सरोद का कमाल का उपयोग किया है। लता मंगेशकर हमेशा की तरह इस गाने में भी अपनी सभी खूबियों के साथ श्रोताओं को सुरों के आकाश पर ले जाती है। प्यारेलाल के सुघड़ वाद्यवृंद संयोजन में यह गीत सरोद के स्वरों के साथ शुरू होता है और उन्हीं पर समाप्त ही होता है। बीच में इंटरल्यूड में भी सरोद की धमक बनी रहती है। लगता है जैसे सरोद की रत्नजड़ित तश्तरी पर इबादत के फूलों की मानिंद इस गीत को यह संगीतकार जोड़ी ऊपर उठानी है और प्रेम से लता मंगेशकर को संभलाते है जो बहुत ही सहज तरीके से उसे बुलंदियों पर ले जाती है। संगीत जब यह संसार रच रहा होता है तब आनंद बक्शी के शब्द फिल्म के कथानक की भावनाओं को दर्शकों के दिलों में उतार देते हैं। इस गीत में सरोद बजाया था उस्ताद अली अकबर खान के शागिर्दों में से एक पंडित बृज नारायण ने जो सारंगी के उस्ताद मास्टर राम नारायण के बड़े बेटे हैं।

व्ही शांताराम की फिल्म नवरंग (1959) में संगीतकार सी. रामचंद्र ने भी सरोद का बेहतरीन प्रयोग किया। नवरंग का श्रंगारिक रूप लिए हुए राग खमाज में स्वरबद्ध किया हुआ यह गीत रसिकों को आज भी जरूर याद होगा आ दिल से दिल मिलाले, इस दिल में घर बसा ले (आशा भोसले/भरत व्यास)। खलनायिकाओं के लटकों-खटकों को जीवंत कर देने वाली आशा भोसले को पूर्णत: लता को समर्पित सी. रामचंद्र इस गीत में अलग रंग में प्रस्तुत करते हैं। आम तौर पर फिल्मी गानों में जो वाद्य बजते हैं वे पर्दे पर नज़र नहीं आते। पियानो, गिटार, सितार तबला, या ट्रंपेट जरूर पर्दे पर दिख जाते हैं। नवरंग के इस गाने में सरोद भी परदे पर उपस्थित है। परदे पर एक महिला पात्र यह गीत गा रही है और एक पुरुष पात्र सरोद बजाते हुए उसका साथ दे रहा है।

सरोद को फिल्म के परदे पर देखना हो तो हेमेन गुप्ता की देव आनंद और गीता बाली अभिनीत 1954 की फिल्म फ़ेरी (कश्ती) देखी जा सकती है। उस्ताद अली अकबर खान के सरोद और निखिल बनर्जी के सितार की जुगलबंदी का आनंद भी लिया जा सकता है। परदे पर देव आनंद सरोद बजा रहे हैं और गीता बाली सितार पर हैं। इस दृश्य की एक दिलचस्प बात यह भी है कि दोनों के साथ तबले पर एक छोटा बालक है। यह बालक संगीतकार हेमंत कुमार का बेटा जयंत मुखर्जी है।

बासू चटर्जी की फिल्म रत्न दीप (1979) बॉक्स ऑफिस पर तो कोई करिश्मा नहीं कर पाई मगर संगीतकार राहुलदेव बर्मन ने उसके गुलज़ार जे लिखे गीत कभी कभी सपना लगता है, कभी ये अपना लगता है पर तो सरोद को नक्काशी के तरह टांका था।  



(यह आलेख कला और संस्कृति की मासिक पत्रिका स्वर सरिता के मार्च, 2019 अंक में छपा)        

Monday, January 7, 2019

निजता खो चुका हिंदुस्तानी सिने संगीत अब स्मृतियों में नहीं दर्ज होता

राजेंद्र बोड़ा

यह सच तो सभी स्वीकार करेंगे कि देश की आम जनता में 1950 और 1960 के दशक में हिन्दुस्तानी सिनेमा के लिए जो भारी क्रेज़ उभरा उसमें उस दौर के गीत-संगीत का बहुत बड़ा योगदान रहा। फिल्मी गाने - सिनेमा के परदे पर अदाकारों के लबों पर हों या रेडियो पर बजते हों - लोगों पर जादू का सा असर करते थे। हर एक को हर गाना अपना-अपना सा लगता था। जैसे वह उसी का हाल बयान कर रहा हो।

हिंदुस्तानी सिनेमा संगीत की अहमियत को जानना – पहचानना हो तो उसके लिए पिछली सदी के पांचवें और छठे दशक के सिने संगीत के दौर को टटोलना पड़ेगा। लोगों के सिर चढ़ जाने वाला संगीत ऐसी फिल्मों में भी गूंजा जो ज़्यादातर चवन्नी छाप दर्शकों के लिए मानी गयी।
उस दौर के गाने हमारी स्मृतियों को जगाते हैं और एक प्रकार का नोस्टेल्जिया पैदा करते हैं। उनकी स्मृतियों में लौटना बड़ा भला-भला सा, शुभ-शुभ सा लगता है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि वह देस-काल से परे ले जाने वाला संगीत था। उसमें देश के गावों और शहरों का अपनापा बोलता था। उन गानों से फ़लक का एहसास बनता था। सिने संगीत के रसिक लेखक अजातशत्रु सदियों में एक...आशा’ में कहते हैं "उस दौर का संगीत भला-भला सा, शुभ-शुभ सा लगता था। इसीलिए उस जमाने के लोग हिंदुस्तानी सिनेमा पर मरे-मरे जाते थे क्योंकि उनमें जीवंतता थी, भावों की गहन अभिव्यक्ति थी। जब उस दौर के गीतों को हम आज फिर सुनते हैं तो हम अपनी किशोर वय में लौटते हैं और हमें अपने पुराने घर, मोहल्ले, गालियां, बाज़ार, लोगों व वाहनों की रेल-पेल, पुराने दोस्त, दोस्तों से मिलने के अड्डे, किसी से मिलने के बगीकोन के कोने सभी की स्मृतियां उभर आती हैं।

वे कहते हैं आधी सदी पहले के सिने संगीत में असरदार कविता होती थी। प्रभावशाली अल्फ़ाज़ से संगीतकारों की तब आशिक़ी होती थी। नग्मों के बोल उन्हें आवेश भरते थे। फिर उन्हें मालूम था कि वे जो रच रहे हैं उसे कैसे कंठ की जरूरत है। उसी के हिसाब से वे गायक/गायिका चुनते थे। कई बार अपनी धुन की माफिक कंठ न मिलता और उन्हें किसी और से गवाना पड़ा तो उन्होंने गायक/गायिका की क्षमता के अनुरूप अपनी धुन को व्यवस्थित किया। इसीलिए उस दौर का संगीत इतना कर्णप्रिय था, धुनें मन को मोह लेती थीं।    

आज का सिने संगीत अपना माधुर्य खो बैठा। उसके पास इनटोनेशन या कहें आवाज़ में उतार चढ़ाव का लहजा नहीं रहा। अब गाने दिल से नहीं गाये जाते। लगता है एक यंत्र मानव गीत गा रहा हो।   
हिंदुस्तानी सिने संगीत के रसिक और पेशे से चिकित्सक अशरफ अज़ीज़, जिनके पुरखे तीन पीढ़ी पहले पूर्वी अफ्रीका मजदूरी करने गए थे और वहीं बस गए, कहते हैं फिल्मी गीत धुन के लिफाफे में एक पुराना पैगाम है जो हमारे पुरखों ने हम तक पहुंचाया है ताकि हम अपने को बेहतर बना सकें।

उस जमाने में मनोहारी धुन बनाने के लिए संगीतकार बहुत मेहनत करते थे। उन संगीतकारों में कविता या शायरी की समझ होती थी। वे दृश्यों के भावों को अभिव्यक्ति देते थे। ऐसी अभिव्यक्ति कि कई बार गाने वह सब कुछ व्यक्त कर जाते थे जो निर्देशक कैमरे से नहीं दिखा पाता था। जब भी निर्देशक कैमरे से ज़िंदगी के किसी पहलू तक नहीं पहुंच पा रहा होता तो वह गाने का ही सहारा लेता। हिन्दुस्तानी फिल्मों में गानों ने वो भूमिका निबाही जो कैमरे की पकड़ में न आ सकी। ठेठ हिन्दुस्तानी जज़्बात दिखाने में जब-जब कैमरा असफल रहा तो गानों ने उस जगह को भरा। तब के गाने फिल्म की कथा में नगीनों की भांति जुड़े होते थे। फिल्म के किरदारों के जज़्बातों को व्यक्त करते थे। गाने फिल्म की कहानी के भीतर से आते थे। कहानी की सिचुएशन से ही गानों की मेलोड़ी का उठाव होता था। ऐसे गाने हमें तरसाते थे, तड़पाते थे और एक अजीब से नशे में डुबो देते थे। क्योंकि गाने जिन किरदारों से जुड़े होते थे उनकी खुशियाँ और ग़म की महक उनमें होती थी जो हमारे अंतस तक को सुहासित कर जाती थी। तब के फिल्म के किरदारों में अनोखी सरलता होती थी जो भारतीय मन को भाती थी।  
   
यह बात याद रखने की है कि हिंदुस्तानी फिल्म के माधुर्यपूर्ण संगीत का खासा हिस्सा उन फिल्मों में दर्ज है जो चवन्नी छाप दर्शकों की मानी जाती रही है। इन फिल्मों को बी-ग्रेड या सी-ग्रेड बता कर साहित्यिक कुलीन लोगों ने उन्हें हिकारत की निगाह से देखा। ऐसी फिल्मों में आशिकतर भूत-प्रेत, परियों, दैत्यों, उड़ती हुई जादू की दरियों, राज महलों की साज़िशों, तलवारबाज़ी और अरब की रातों (अरेबियन नाइट्स) के किस्से होते थे और ऐसी फिल्में शहर के टीन-टप्पर वाले हल्के दरजे के सिनेमाघरों में प्रदर्शित होती थीं। ऐसी फिल्मों के ऐसे बेशुमार गाने हैं जो टाकीजों के बाहर न तब सुने गए और न आज उनके रेडियो और टीवी चौनलों पर बजने की कोई संभावना ही है। वे रिकार्डों के ढेर में दबे रह गए और बाज़ार में वे ही गाने चले जो पॉपुलर हो गए या बना दिये गए। माधुर्यपूर्ण ऐसे गानों की खोज में सिनेमा संगीत के रसिक अब भी लगे हुए हैं।

उस दौर के माधुर्यपूर्ण गाने तब की यंत्र तकनीक के कारण लगभग तीन मिनट की समय सीमा में बंधे होकर भी विराट थे। ध्वनि मुद्रण की नई यंत्र तकनीक ने आज के संगीत को भले ही असीमित संभावनाएं दी हों मगर गाने का माधुर्य खो गया है। यही कारण है कि वाद्यों का शोर में शब्दों की अहमियत खो गई। नए जमाने के फिल्म निर्देशक गानों को कथाक्रम में पिरोने का हुनर नहीं सीख पाये। नतीजा यह निकला कि फिल्मी गाने लोगों के दिलों में स्थायी जगह बना पाने में नाकामयाब रहते हैं। इसीलिए आज के गानों की उम्र कुछ हफ्तों की रह गई है। अब कालजयी गाने नहीं बनते। पिछली सदी के उस दौर को हिन्दुस्तानी फिल्म संगीत का स्वर्णिम दौर यूं ही नहीं खा जाता। तब के गाने आज भी रेडियो और टीवी चैनलों पर राज करते हैं और सुनने वालों को मोहते हैं। आज के संगीतकार उस जमाने के गानों के कंधों पर चढ़ कर उनके रीमिक्स बनाकर शिखर छूना चाहते हैं। तब के संगीतकार अपने देश की संगीत परम्पराओं से प्रेरणा लेते थे। जिसे आखरी मुग़ल जैसे विराट संगीतकार की संज्ञा दे सकें वह है नौशाद जिन्होंने एक बार कहा था हमें प्रेरणा के लिए विदेशी संगीत की तरफ क्यों देखना चाहिए। हमारे अपने देश का संगीत इतना भरपूर है कि हम उससे कितना ही लें वह रीता नहीं होगा।

आज की यंत्र तकनीक पर बाज़ार हावी है। बाज़ार को अंतर्राष्ट्रीय ताक़तें नियंत्रित करती हैं जिनके मुख्यालय पश्चिम में हैं। उन्हीं के प्रभाव में हिंदुस्तानी सिने संगीत ने अपनी निजता खो दी है जिसे वापस पाने का कोई जरिया फिलहाल तो नहीं सूझता।  

(यह आलेख कला और संगीत को समर्पित मासिक पत्रिका स्वर सरिता के दिसंबर, 2018 के अंक में प्रकाशित हुआ)