Tuesday, May 7, 2019

हिंदुस्तानी फिल्म संगीत में सरोद की गूंज



                                    राजेंद्र बोड़ा


सरोद वादन की दो प्रमुख पद्धतियां प्रचालन में हैं। एक ग़ुलाम अली खान की शैली और दूसरी अल्लाउदीन खान की शैली। दोनों के सरोद की साइज़, उसका आकार तथा उस पर कसे तारों की संख्या भिन्न हैं। दोनों का वाद्य यंत्र बजाने तथा उसे सुर मिलाने का तरीका भी अलग-अलग है।

सरोद की उत्पत्ति के बारे में अनेक बातें कही जाती है। अधिकतर ऐसा माना जाता है कि भारतीय सरोद का मूल अफगानी रबाब में है जो सरोद से आकृति में छोटा और तंबूरे जैसा होता है जिसे अफगन लोग युद्ध में जाते वक़्त बजाते जाते थे।

कहते हैं बंगेश जनजाति के तीन अफगन घुड़सवार कोई सवा दो सौ साल पहले रबाब ले कर हिंदुस्तान आए थे और उत्तर भारत राजाओं के यहां सैनिकों की नौकरियां करते हुए यहीं बस गए। उनके संगीत के हुनर को यहां पहचाना गया और राजाओं के दरबारों में उनकी पहचान बनने लगी। इन तीनों के परिवारों में उनके बाद भी रबाब बजाने की परंपरा जारी रही। लेकिन जैसा कि कला और संस्कृतियों के संपर्कों से नयी-नयी चीजें बनती हैं अफगानी रबाब वाद्य पर भी भारतीय वाद्यों का प्रभाव पड़ा, खास कर वीणा का, जिससे रबाब का सरोद के रूप में विकास हुआ। किसी वाद्य के विकास की बात करें तो उसमें उसका परिष्कार निहित्त है। रबाब में जो कमी हिंदुस्तानियों को शायद लगी वह थी कि उसके तार के छेडने पर स्वर निकलता है उसकी गूंज नहीं बनी रहती। हिन्दुस्तानी तार वाद्यों में यह विशेषता होती है कि तार को छेडने पर स्वर की अनुगूंज देर तक बनी रहती है। रबाब में देसी संगीत के चारित्र्य को प्रस्तुत कर सकने वाला बनाने तथा उसकी ध्वनि को उन्नत करने के लिए उसमें तीन प्रमुख बदलाव लाये गए जिससे वह सरोद के रूप में प्रतिस्थापित होने लगा। ये तीन बदलाव थे उसके तारों और उन पर उंगलियां चलाने वाले बोर्ड को धातु का बनाया जाना और उसमें सिंपाथेटिक तारों का जोड़ा जाना। बाद में उत्तर भारतीय उस्तादों ने अपने-अपने हिसाब से उसमें और परिवर्तन किए। जैसे मैहर घराने के उस्ताद अल्लाउदीन ने उसकी टोनल क्वालिटी को बेहतर बनाने के लिए जो किया उससे यह वाद्य वीणा की तरह लाग्ने लगा।

लेकिन संगीत के इतिहासकारों की दूसरी धारा इस बात से इत्तेफ़ाक़ नहीं करती कि सरोद के उद्गम का स्रोत अफगानी रबाब में है। वे कहते हैं कि रबाब जैसे वाद्य दक्षिण भारत के तमिलनाडु, केरल और कर्णाटक आदि राज्यों में पहले से ही मिलते रहे हैं। उनका यह भी दावा है कि छटी शताब्दी के भारतीय मंदिरों की मूर्तियों में सरोद की अनुकृतियां मिलती है। इसलिए यह कहना ठीक नहीं है कि सवा दो सौ बरस पहले भारत में आए रबाब से सरोद विकसित हुआ।

अब हम देखेंगे हिन्दुस्तानी सिने संगीतकारों ने सरोद का किस भांति उपयोग गानों में किया। आम तौर पर फिल्मी गानों में भारतीय वाद्यों की बात चलती है तो सितार, तबला, बांसुरी, शहनाई, इकतारा और सारंगी की चर्चा होती है और श्रोता भी उन्हें आसानी से पहचान भी लेते हैं। मगर सरोद की आवाज़ किस गाने में प्रमुख रूप से अपने सुनी यह पूछ लिया जाय तो दिमाग पर बहुत ज़ोर डालने पर भी अचानक कोई गाना याद नहीं आता। लेकिन यह बात भी सच है कि उन गानों ने खूब धूम मचाई जिसमें सरोद बजा। सच तो यह भी है कि सरोद के चोटी के उस्तादों ने अन्य संगीतकारों के निर्देशन में फिल्मी गानों के लिए बजाया ही नहीं बल्कि खुद भी फिल्मों में संगीत दिया। और जब कोई सरोदिया किसी फिल्म का संगीतकार हो तो उसके स्वरबद्ध किए गानों या फिल्म के पृष्ठभूमि संगीत में सरोद क्योंकर न बजे।

हिंदुस्तानी फिल्म संगीत के अग्रदूत माने जाने वाले बंगाल के संगीतकार तिमिर बरन जिन्होंने भारतीय वाद्य यंत्रों को लेकर पहला फिल्मी ऑर्केस्ट्रा बनाया वे अत्यंत गुणी सरोदिये थे। हालांकि उन्हों ने पहले राधिका प्रसाद गोस्वामी से सरोद की तालीम ली मगर वे 1920 के दशक में उस्ताद अली अकबर खान के शुरुआती शिष्यों में से एक थे। भारतीय नृत्य को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाने वाले उदय शंकर जब अपनी नृत्य टोली लेकर पहली बार विदेश गए तब तिमिर बरन उनके साथ बतौर संगीत निर्देशक साथ गए। बाद में उन्होंने सरोद वादक के रूप में यूरोप, अमरीका तथा दक्षिण पूर्व एशिया का दौरा किया। 
उनके संगीत वाली 1935 की फिल्म देवदास में केदार शर्मा के लिखे और कुंदनलाल सैगल के गाये गीत बालम आन बसो मोरे मन में तिमिर बरन का बजाया सरोद सुना जा सकता है। कैसी दिलचस्प बात है कि इसके बीस साल बाद बिमल रॉय ने जब फिर से देवदास फिल्म बनाई तो उसमें संगीतकार सचिन देव बर्मन के लिए बरन के गुरु उस्ताद अली अकबर खान ने लता मंगेशकर के गाये ओ जाने वाले रुक जा कि दम गाने में सरोद का टुकड़ा बजाया।
उस्ताद अली अकबर खान की बात चली है तो यह जान लेना जरूरी है कि जोधपुर दरबार में आठ वर्षों तक अपने वाद्य की घमक को बनाए रखने वाले अली अकबर खान ने आज़ादी के बाद 1952 और 1953 में में देव आनंद की निर्माण संस्था नव केतन की दो फिल्मों क्रमश: आंधियां और हम सफर में संगीत दिया। जब कोई सरोदिया फिल्म में संगीत दे और उसमें सरोद न बजे ये कैसे संभव है।

वर्ष 1952 में आई आंधियां में उस्ताद अली अकबर खान ने पहली बार फिल्म संगीत दिया। न केवल फिल्म की नामावली की पृष्ठभूमि में हम उनका सरोज बजता सुन सकते हैं बल्कि लता मंगेशकर के गाये मीठे गीतों में भी सुन सकते हैं। उनकी नव केतन के लिए दूसरी फिल्म हमसफर थी जिसमें साहिर लुधियानवी के लिखे और गीता दत्त के गाये गाने हसीन चांदनी भीगी भीगी हवाएं की धुन में अली अकबर खान साहब का बड़ी ही खूबसूरती से पिरोया हुआ सरोद गूँजता है।
बाद में उस्ताद अली अकबर खान पूरी तरह शास्त्रीय संगीत को समर्पित हो गए। सचिन देव बर्मन ने उनसे देवदास (1955) के लिए सरोद बजवाया था और बाद में ओ पी रल्हन की बड़े बजट की फिल्म तलाश (1969) में उसके शीर्षक गीत तेरे नैना तलाश करे जिसे (मन्ना डे/मजरूह सुल्तानपुरी) के लिए सरोद बजाने के वास्ते विख्यात महिला सरोद वादक ज़रीन दारूवाला को बुलवाया। ज़रीन ने लगभग सभी बडे सिने संगीतकारों के लिए फिल्मों में बजाया।

संगीतकार जोड़ी शंकर जयकिशन ने हिंदुस्तानी फिल्म संगीत को नयी रवानगी दी। उनका संगीत का जादू आज भी लोगों को अपनी गिरफ्त में लिए हुए हैं। उनकी संगीत रचनाओं में चपलता भी है, लोक की उमंग भी है तो साथ में जबर्दस्त गहराई भी है। उन्होंने सीमा फिल्म के गानों में जिस प्रकार सरोद का एकल प्रयोग किया वह अद्भुत है। सुनो छोटी सी गुड़िया की लंबी कहानी जैसे तारों की बात सुने रात सुहानी (लता मंगेशकर/शैलेंद्र) को सुनें तो जिस प्रकार सरोद के तारों की झंकार के साथ इस संगीतकार जोड़ी ने प्रिल्यूड से गाने को उठा कर उसे कालजयी बनाया है उसे सुनकर आज भी उन्हें सलाम करने को जी चाहता है।

जरीन दारूवाला के सरोद का जादू शंकर जयकिशन के संगीत से सजी लेख टंडन की  आम्रपाली (1966) में जम के छाया। इसका यह गीत तुम्हें याद करते करते जाएगी रैन सारी/ तुम ले गए हो अपने संग नींद भी हमारी लता मंगेशकर के श्रेष्ठ गानों में शुमार किया जाता है। लता ने बड़ी ही रूमानियत से शैलेंद्र के शब्दों की भावनाओं को स्वराभिव्यक्ति दी है। इसमें शंकर जयकिशन ने जरीन दारूवाला के सरोद और जे. वी. आचार्य के सितार की जुगलबंदी इस तरह से गूंथी डाली है कि वह इस अर्द्ध शास्त्रीय गीत को किसी और ही धरातल पर ले जाती है।    
संगीतकारों की दूसरी सफलतम जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का भी फिल्म संगीत को अवदान कौन नकार सकता है। उनके संगीत में भी शंकर जयकिशन के संगीत की भांति विविधता मिलती है। उन्होंने मैं तुलसी तेरे आंगन की (1978) के शीर्षक गीत में सरोद का कमाल का उपयोग किया है। लता मंगेशकर हमेशा की तरह इस गाने में भी अपनी सभी खूबियों के साथ श्रोताओं को सुरों के आकाश पर ले जाती है। प्यारेलाल के सुघड़ वाद्यवृंद संयोजन में यह गीत सरोद के स्वरों के साथ शुरू होता है और उन्हीं पर समाप्त ही होता है। बीच में इंटरल्यूड में भी सरोद की धमक बनी रहती है। लगता है जैसे सरोद की रत्नजड़ित तश्तरी पर इबादत के फूलों की मानिंद इस गीत को यह संगीतकार जोड़ी ऊपर उठानी है और प्रेम से लता मंगेशकर को संभलाते है जो बहुत ही सहज तरीके से उसे बुलंदियों पर ले जाती है। संगीत जब यह संसार रच रहा होता है तब आनंद बक्शी के शब्द फिल्म के कथानक की भावनाओं को दर्शकों के दिलों में उतार देते हैं। इस गीत में सरोद बजाया था उस्ताद अली अकबर खान के शागिर्दों में से एक पंडित बृज नारायण ने जो सारंगी के उस्ताद मास्टर राम नारायण के बड़े बेटे हैं।

व्ही शांताराम की फिल्म नवरंग (1959) में संगीतकार सी. रामचंद्र ने भी सरोद का बेहतरीन प्रयोग किया। नवरंग का श्रंगारिक रूप लिए हुए राग खमाज में स्वरबद्ध किया हुआ यह गीत रसिकों को आज भी जरूर याद होगा आ दिल से दिल मिलाले, इस दिल में घर बसा ले (आशा भोसले/भरत व्यास)। खलनायिकाओं के लटकों-खटकों को जीवंत कर देने वाली आशा भोसले को पूर्णत: लता को समर्पित सी. रामचंद्र इस गीत में अलग रंग में प्रस्तुत करते हैं। आम तौर पर फिल्मी गानों में जो वाद्य बजते हैं वे पर्दे पर नज़र नहीं आते। पियानो, गिटार, सितार तबला, या ट्रंपेट जरूर पर्दे पर दिख जाते हैं। नवरंग के इस गाने में सरोद भी परदे पर उपस्थित है। परदे पर एक महिला पात्र यह गीत गा रही है और एक पुरुष पात्र सरोद बजाते हुए उसका साथ दे रहा है।

सरोद को फिल्म के परदे पर देखना हो तो हेमेन गुप्ता की देव आनंद और गीता बाली अभिनीत 1954 की फिल्म फ़ेरी (कश्ती) देखी जा सकती है। उस्ताद अली अकबर खान के सरोद और निखिल बनर्जी के सितार की जुगलबंदी का आनंद भी लिया जा सकता है। परदे पर देव आनंद सरोद बजा रहे हैं और गीता बाली सितार पर हैं। इस दृश्य की एक दिलचस्प बात यह भी है कि दोनों के साथ तबले पर एक छोटा बालक है। यह बालक संगीतकार हेमंत कुमार का बेटा जयंत मुखर्जी है।
बासू चटर्जी की फिल्म रत्न दीप (1979) बॉक्स ऑफिस पर तो कोई करिश्मा नहीं कर पाई मगर संगीतकार राहुलदेव बर्मन ने उसके गुलज़ार जे लिखे गीत कभी कभी सपना लगता है, कभी ये अपना लगता है पर तो सरोद को नक्काशी के तरह टांका था।  



(यह आलेख कला और संस्कृति की मासिक पत्रिका स्वर सरिता के मार्च, 2019 अंक में छपा)        

Monday, January 7, 2019

निजता खो चुका हिंदुस्तानी सिने संगीत अब स्मृतियों में नहीं दर्ज होता

राजेंद्र बोड़ा

यह सच तो सभी स्वीकार करेंगे कि देश की आम जनता में 1950 और 1960 के दशक में हिन्दुस्तानी सिनेमा के लिए जो भारी क्रेज़ उभरा उसमें उस दौर के गीत-संगीत का बहुत बड़ा योगदान रहा। फिल्मी गाने - सिनेमा के परदे पर अदाकारों के लबों पर हों या रेडियो पर बजते हों - लोगों पर जादू का सा असर करते थे। हर एक को हर गाना अपना-अपना सा लगता था। जैसे वह उसी का हाल बयान कर रहा हो।

हिंदुस्तानी सिनेमा संगीत की अहमियत को जानना – पहचानना हो तो उसके लिए पिछली सदी के पांचवें और छठे दशक के सिने संगीत के दौर को टटोलना पड़ेगा। लोगों के सिर चढ़ जाने वाला संगीत ऐसी फिल्मों में भी गूंजा जो ज़्यादातर चवन्नी छाप दर्शकों के लिए मानी गयी।
उस दौर के गाने हमारी स्मृतियों को जगाते हैं और एक प्रकार का नोस्टेल्जिया पैदा करते हैं। उनकी स्मृतियों में लौटना बड़ा भला-भला सा, शुभ-शुभ सा लगता है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि वह देस-काल से परे ले जाने वाला संगीत था। उसमें देश के गावों और शहरों का अपनापा बोलता था। उन गानों से फ़लक का एहसास बनता था। सिने संगीत के रसिक लेखक अजातशत्रु सदियों में एक...आशा’ में कहते हैं "उस दौर का संगीत भला-भला सा, शुभ-शुभ सा लगता था। इसीलिए उस जमाने के लोग हिंदुस्तानी सिनेमा पर मरे-मरे जाते थे क्योंकि उनमें जीवंतता थी, भावों की गहन अभिव्यक्ति थी। जब उस दौर के गीतों को हम आज फिर सुनते हैं तो हम अपनी किशोर वय में लौटते हैं और हमें अपने पुराने घर, मोहल्ले, गालियां, बाज़ार, लोगों व वाहनों की रेल-पेल, पुराने दोस्त, दोस्तों से मिलने के अड्डे, किसी से मिलने के बगीकोन के कोने सभी की स्मृतियां उभर आती हैं।

वे कहते हैं आधी सदी पहले के सिने संगीत में असरदार कविता होती थी। प्रभावशाली अल्फ़ाज़ से संगीतकारों की तब आशिक़ी होती थी। नग्मों के बोल उन्हें आवेश भरते थे। फिर उन्हें मालूम था कि वे जो रच रहे हैं उसे कैसे कंठ की जरूरत है। उसी के हिसाब से वे गायक/गायिका चुनते थे। कई बार अपनी धुन की माफिक कंठ न मिलता और उन्हें किसी और से गवाना पड़ा तो उन्होंने गायक/गायिका की क्षमता के अनुरूप अपनी धुन को व्यवस्थित किया। इसीलिए उस दौर का संगीत इतना कर्णप्रिय था, धुनें मन को मोह लेती थीं।    

आज का सिने संगीत अपना माधुर्य खो बैठा। उसके पास इनटोनेशन या कहें आवाज़ में उतार चढ़ाव का लहजा नहीं रहा। अब गाने दिल से नहीं गाये जाते। लगता है एक यंत्र मानव गीत गा रहा हो।   
हिंदुस्तानी सिने संगीत के रसिक और पेशे से चिकित्सक अशरफ अज़ीज़, जिनके पुरखे तीन पीढ़ी पहले पूर्वी अफ्रीका मजदूरी करने गए थे और वहीं बस गए, कहते हैं फिल्मी गीत धुन के लिफाफे में एक पुराना पैगाम है जो हमारे पुरखों ने हम तक पहुंचाया है ताकि हम अपने को बेहतर बना सकें।

उस जमाने में मनोहारी धुन बनाने के लिए संगीतकार बहुत मेहनत करते थे। उन संगीतकारों में कविता या शायरी की समझ होती थी। वे दृश्यों के भावों को अभिव्यक्ति देते थे। ऐसी अभिव्यक्ति कि कई बार गाने वह सब कुछ व्यक्त कर जाते थे जो निर्देशक कैमरे से नहीं दिखा पाता था। जब भी निर्देशक कैमरे से ज़िंदगी के किसी पहलू तक नहीं पहुंच पा रहा होता तो वह गाने का ही सहारा लेता। हिन्दुस्तानी फिल्मों में गानों ने वो भूमिका निबाही जो कैमरे की पकड़ में न आ सकी। ठेठ हिन्दुस्तानी जज़्बात दिखाने में जब-जब कैमरा असफल रहा तो गानों ने उस जगह को भरा। तब के गाने फिल्म की कथा में नगीनों की भांति जुड़े होते थे। फिल्म के किरदारों के जज़्बातों को व्यक्त करते थे। गाने फिल्म की कहानी के भीतर से आते थे। कहानी की सिचुएशन से ही गानों की मेलोड़ी का उठाव होता था। ऐसे गाने हमें तरसाते थे, तड़पाते थे और एक अजीब से नशे में डुबो देते थे। क्योंकि गाने जिन किरदारों से जुड़े होते थे उनकी खुशियाँ और ग़म की महक उनमें होती थी जो हमारे अंतस तक को सुहासित कर जाती थी। तब के फिल्म के किरदारों में अनोखी सरलता होती थी जो भारतीय मन को भाती थी।  
   
यह बात याद रखने की है कि हिंदुस्तानी फिल्म के माधुर्यपूर्ण संगीत का खासा हिस्सा उन फिल्मों में दर्ज है जो चवन्नी छाप दर्शकों की मानी जाती रही है। इन फिल्मों को बी-ग्रेड या सी-ग्रेड बता कर साहित्यिक कुलीन लोगों ने उन्हें हिकारत की निगाह से देखा। ऐसी फिल्मों में आशिकतर भूत-प्रेत, परियों, दैत्यों, उड़ती हुई जादू की दरियों, राज महलों की साज़िशों, तलवारबाज़ी और अरब की रातों (अरेबियन नाइट्स) के किस्से होते थे और ऐसी फिल्में शहर के टीन-टप्पर वाले हल्के दरजे के सिनेमाघरों में प्रदर्शित होती थीं। ऐसी फिल्मों के ऐसे बेशुमार गाने हैं जो टाकीजों के बाहर न तब सुने गए और न आज उनके रेडियो और टीवी चौनलों पर बजने की कोई संभावना ही है। वे रिकार्डों के ढेर में दबे रह गए और बाज़ार में वे ही गाने चले जो पॉपुलर हो गए या बना दिये गए। माधुर्यपूर्ण ऐसे गानों की खोज में सिनेमा संगीत के रसिक अब भी लगे हुए हैं।

उस दौर के माधुर्यपूर्ण गाने तब की यंत्र तकनीक के कारण लगभग तीन मिनट की समय सीमा में बंधे होकर भी विराट थे। ध्वनि मुद्रण की नई यंत्र तकनीक ने आज के संगीत को भले ही असीमित संभावनाएं दी हों मगर गाने का माधुर्य खो गया है। यही कारण है कि वाद्यों का शोर में शब्दों की अहमियत खो गई। नए जमाने के फिल्म निर्देशक गानों को कथाक्रम में पिरोने का हुनर नहीं सीख पाये। नतीजा यह निकला कि फिल्मी गाने लोगों के दिलों में स्थायी जगह बना पाने में नाकामयाब रहते हैं। इसीलिए आज के गानों की उम्र कुछ हफ्तों की रह गई है। अब कालजयी गाने नहीं बनते। पिछली सदी के उस दौर को हिन्दुस्तानी फिल्म संगीत का स्वर्णिम दौर यूं ही नहीं खा जाता। तब के गाने आज भी रेडियो और टीवी चैनलों पर राज करते हैं और सुनने वालों को मोहते हैं। आज के संगीतकार उस जमाने के गानों के कंधों पर चढ़ कर उनके रीमिक्स बनाकर शिखर छूना चाहते हैं। तब के संगीतकार अपने देश की संगीत परम्पराओं से प्रेरणा लेते थे। जिसे आखरी मुग़ल जैसे विराट संगीतकार की संज्ञा दे सकें वह है नौशाद जिन्होंने एक बार कहा था हमें प्रेरणा के लिए विदेशी संगीत की तरफ क्यों देखना चाहिए। हमारे अपने देश का संगीत इतना भरपूर है कि हम उससे कितना ही लें वह रीता नहीं होगा।

आज की यंत्र तकनीक पर बाज़ार हावी है। बाज़ार को अंतर्राष्ट्रीय ताक़तें नियंत्रित करती हैं जिनके मुख्यालय पश्चिम में हैं। उन्हीं के प्रभाव में हिंदुस्तानी सिने संगीत ने अपनी निजता खो दी है जिसे वापस पाने का कोई फिलहाल तो नहीं सूझता।  

(यह आलेख कला और संगीत को समर्पित मासिक पत्रिका स्वर सरिता के दिसंबर, 2018 के अंक में प्रकाशित हुई)  
                              

Wednesday, May 9, 2018

गजेंद्र नारायण सिंह: संगीत को तिजारत से दूर रखने का अलख जगाने वाला नहीं रहा


  


                          --राजेंद्र बोड़ा


पर्फ़ोर्मिंग आर्टिस्ट समीक्षक नहीं होते और समीक्षक पर्फ़ोर्मिंग आर्टिस्ट नहीं होते। मगर गजेंद्र नारायण सिंह विलक्षण रूप से ये दोनों थे। वे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के कलाविद् होने के साथ-साथ भारतीय शास्त्रीय संगीत के समीक्षक और इतिहासकार भी थे। उनका यह बहुआयामी व्यक्तित्व उन्हें भीड़ से अलग करता था। ऐसे गुणवंत कलाकार, पारखी समीक्षक और भारतीय संगीत को बढ़ावा देने में हमेशा जुटे रहने वाले गजेंद्र नारायण सिंह के सोमवार को पटना में निधन से भारतीय संगीत प्रेमियों में शोक है।   
  
10 दिसंबर 1939 को एक संभ्रांत बिहारी परिवार में जन्मे सिंह को बचपन से ही संगीत का जुनून रहा और उन्होंने 18 वर्षों तक गुरु-शिष्य परंपरा में संगीत का कडा प्रशिक्षण ग्वालियर घराने के सुविख्यात गायक चूड़ामणि और पद्मविभूषण पंडित विनायक बुआ पटवर्धन से जैसों से पाया। कथकली के जाने माने विद्वान केलू नाय इनके नृत्य गुरु रहे। उन्होंने पंडित नारायण राव व्यास, पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर, उस्ताद फ़हीमुद्दीन डागर, उस्ताद विलायत खां, जैसे संगीतज्ञों से भी मार्गदर्शन प्राप्त किया। 

इतने गुणियों से संगीत की तालीम और ज्ञान पाकर भी उन्होंने अपने को संगीत के पेशेवर पर्फ़ोर्मर के रूप में प्रतिष्ठित करने का कभी लोभ नहीं किया। इसकी जगह उन्होंने अन्य काबिल लोगों को आगे बढ़ाया। उनके मार्गदर्शन और प्रोत्साहन से अनेकों गायकों और वादकों ने राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय ख्याति पायी। भारतीय संगीत को सहेजे रखने में उनकी प्रमुख भूमिका रही। 

बेतिया और डुमराव घराने की ध्रुपद परंपरा को जीवंत बनाए रखने में उनका योगदान अविस्मरणीय है। संगीत के जानकारों और कलाकारों में उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। भारत सरकार ने उनकी सेवाओं का मान करते हुए उन्हेंपद्मश्री अलंकरण प्रदान किया था। उन्हें बिहार स्टेट अकादमी पुरस्कार दे कर भी सम्मानित किया गया। वे बिहार संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष भी रहे।

वे मानते थे कि संगीत, पेशा और तिजारत की चीज नहीं हैसिंह ने संगीत पर अनेक मानक ग्रंथ लिखे।महफिल,बिहार की संगीत परंपरा’, सुरीले लोगों की संगत,स्वरगंधा जैसी उनकी किताबें खूब पढ़ी और सराही गई। ये ग्रंथ आज़ादी पूरवे के भारतीय शास्त्रीय संगीत का अनूठा दस्तावेजीकरण भी है।