Tuesday, January 30, 2018

स्मृति शेष: मांगी बाई ने राजस्थानी मांड गायकी को ऊंची पायदान पर बनाये रखा

राजेंद्र बोड़ा 
    
मांड गायकी राजस्थान की पहचान है।  इस गायकी को जिन महिला लोक गायिकाओं ने विश्व प्रसिद्धि दिलाई उनकी एक महत्वपूर्ण कड़ी मांगी बाई का पिछले दिनों निधन हो गया।  बीकानेर की अल्लाह ज़िलाई बाई और जोधपुर की गवरी देवी ने मांड को जिन बुलंदियों पर पहुंचाया उदयपुर की मांगी बाई ने उन बुलंदियों को थामे रखा और इस गायकी की चमक को बनाये रखा। 

मारवाड़ के रेगिस्तानी विस्तार में उपजी मांड मांगी बाई के मेवाड़ी कंठ में ऐसी रची बसी थी कि मानो पथरीली ज़मीन में कोंपलें फूट पड़ रही हो।  लोक गायकी को इस गायिका ने अलग पहचान ही नहीं दी बल्कि इस गायन परंपरा को बनाये रखने और नयी पीढ़ी को उससे जोड़े रखने में प्रमुख भूमिका भी निबाही।

तत्कालीन उदयपुर रियासत के प्रतापगढ़ में कमलाराम और मोहन बाई के यहां जन्मी मांगी बाई कह सकते हैं जन्मजात गायिका थी क्योंकि संगीत उन्हें पारिवारिक विरासत में मिला था।  उनके पिता कमलाराम शास्त्रीय संगीत में निष्णात गायक थे।  वे ही उनके पहले गुरु थे।  कुल चार वर्ष की उम्र से ही नन्ही मांगी बाई की संगीत की शिक्षा शुरू हो गयी।  संगीत के प्रशिक्षण के ही कारण उनकी गायकी में लोक की भूमि होते हुए भी शास्त्रीयता का पुट साफ़ झलकता था। 

उनकी आवाज़ और गायकी में अल्लाह ज़िलाई बाई जैसा सुरों का विस्फोट नहीं था और गवरी देवी जैसी शहरी खनक नहीं थी मगर उसमें एक अजीब सी लहराहट थी जो उन्हें अलग पहचान देती थी। 

मांड अर्द्ध शास्त्रीय राग मानी जाती है जो मांगी बाई के गायन में पूरे भराव के साथ महसूस की जा सकती है।  मांड गायकी का उनका अपना अंदाज़ था जिसमें साज की संगत कुछ मायने नहीं रखती थी।   
मांगी बाई की आवाज़ हलके से झूमते हुए बहती नदी के कलरव की तरह थी जिसमें बीच बीच में मुरकियों के उछाल श्रोताओं को भिगो  देते थे। मांड गायकी का सबसे लोकप्रिय गीत 'केसरिया बालम' इसीलिए उनकी आवाज़ में ढल कर एक नए अंदाज़ में उभरता था।
 
वे अपना पहला गुरु अपने पिता को मानती थी और दूसरा गुरु अपने पति राम नारायण आर्य को जो स्वयं भी शास्त्रीय संगीत के ज्ञाता थे और अपनी पत्नी को मांड गायकी में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते थे।  उन्हों ने शास्त्रीय संगीत की भी विधिवत तालीम ली थी बड़ौदा दरबार के कलाकार उस्ताद फ़ैयाज़ खां साहिब से। शास्त्रीय संगीत की तालीम का असर उनकी मांड गायकी पर साफ़ नज़र आता था।

मांगी बाई उन कलाकारों  में से थीं जो अपना ज्ञान  पीढ़ी को देने को हमेशा तत्पर रहते हैं।  उदयपुर स्थित पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र ने उनका यह सपना पूरा किया और उन्हें बतौर मांड शिक्षिका अपने यहां नियुक्ति दी।  वे पांच-पांच विद्यार्थियों के बैच को गुरु-शिष्य परंपरा से गायकी सिखाती थी।  दो वर्ष का यह कोर्स होता था।  दो-वर्ष बाद दूसरा बैच शुरू होता।  इस प्रकार उन्होंने 20 वर्ष तक यह काम लगन से किया। 

स्वभाव से वे बड़ी सरल थीं और हर किसी से हंस कर ही बात करती थी।  इतना नाम कमाने पर भी उनमें अहं की कोई भावना कभी नहीं आई।  उनकी गायकी को सुन कर देशी लोग ही नहीं विदशी भी मोहित हो जाते थे।
 
अपने जीवन काल में मांगी बाई मांड का अलख जगाते हुए देश विदेश घूमी, यश और लोगों का प्यार बटोरा तो साथ ही सरकार तथा विभिन्न संस्थाओं का औपचारिक मान सम्मान भी पाया। अपनी एक रेडिओ भेंट वार्ता में मांगी बाई ने कहा था कि उन्हें मिले इतने पुरस्कारों में उन्हें केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी का पुरस्कार सबसे अधिक प्रिय है जो उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल के हाथों मिला। इसके अलावा मांगी बाई को राजस्थान संगीत नाटक अकादमी और राजस्थानी भाषा और साहित्य अकादमी के पुरस्कार भी मिले। राजस्थान और मध्य प्रदेश की सरकारों ने उन्हें अपने अपने राज्य स्तरीय पुरस्कार देकर भी सम्मानित किया।

मांगी बाई ने अपने 88 वर्ष की दीर्घ आयु पाते हुए महाराणा कुम्भा संगीत परिषद् पुरस्कार जैसे और भी अनेक पुरस्कार उन्होंने पाए। मगर उनका असली पुरस्कार था श्रोताओं का प्यार जो उनकी गायकी का भरपूर आनंद लेते थे। वे आकाशवाणी की ए श्रेणी की मान्यता प्राप्त कलाकार थी और दूरदर्शन पर भी उन्होंने खूब गाया।

जिस प्रकार मारवाड़ से अल्लाह जिलाई बाई और गवरी देवी ने देश विदेश में पहचान बनाई उसी प्रकार मेवाड़ से मांगी बाई ने वैसी ही पहचान बनाई और मांड की धारा को आगे बनाये रखा। अपने जीवन के संध्या काल तक वे सक्रिय रहीं और गाती रही। अक्षर ज्ञान के लिहाज से वे बहुत पढ़ी लिखी नहीं थी परन्तु उनकी स्मरण शक्ति जबरदस्त थी। लिखा कागज़ सामने रख कर उन्होंने कभी नहीं गाया। मांड के सैकड़ों गीत उन्हें याद थे। 

मांड के गीतों को लिपिबद्ध कर उन्हें अगली पीढ़ी के लिए सुरक्षित रखने का महत्वपूर्ण काम भी मांगी बाई ने किया।  राजस्थान के सांस्कृतिक वैभव के प्रतीक और यहां की मिटटी की सोंधी सुगंध में रचे बसे मांड संगीत में गाये जाने वाले गीतों को लिपिबद्ध कर उन्हें एक किताब के रूप में संकलित किया। यह किताब 'राजस्थान के मांड गीतअब हमारी धरोहर है।  
 

मांगी बाई अब हमारे बीच नहीं रही। उनके योगदान को राजस्थान हमेशा याद रखेगा।

( यह आलेख कला और संस्कृति को समर्पित पत्रिका 'स्वर सरिता' के जनवरी, 2018 अंक में छपा) 

Friday, July 14, 2017

सैलेश कुमार : अभिनेता जो फिल्मी दुनिया के लिए बेगाना ही रहा


राजेंद्र बोड़ा 

मुंबई का सिने जगत हमेशा ही सपनों के नगर के रूप में विख्यात रहा है। रुपहले परदे का ग्लेमर और सितारा चमक युवक-युवतियों को लुभाती रही है। इसीलिए वे आंखों में बड़े सपने लिए इस मायानगरी में पहुंचते रहे हैं। उनमें से चंद ही परदे पर पहुंच पाते हैं। जो परदे पर पहुंचने में सफल होते हैं उनमें से भी थोड़े से लोग अपनी पहचान बना पाते हैं। और जो थोड़े से लोग अपनी पहचान बना पाते हैं उनमें से भी इक्का-दुक्का सितारा हैसियत बना पाते हैं। इस मायाजाल को सब जानते हैं। फिर भी अपने को साबित करने के लिए यहां पहुंचने वालों का रेला लगा रहता है।

आंखों में ऐसा ही सपना लिए एक पढ़ा लिखा खूबसूरत बांका नौजवान शम्भूनाथ पुरोहित फिल्मी दुनिया में अपने पर फैला कर बहुत ऊंची उड़ान भरने की उमंग लिए पिछली सदी के पचास के दशक के उत्तरार्ध में राजस्थान के जोधपुर शहर से चल कर मुंबई पहुंचा था। ऊंचे, पूरे कद, गठीले ज़िस्म और घने बालों वाले इस नौजवान में वह सब कुछ था जो मुंबई की मुख्यधारा की फिल्मों में नायक की भूमिका पाने के लिए जरूरी होता है। फिल्मी दुनिया का हिस्सा बनने के लिए संघर्ष की भी उसकी तैयारी थी।

जोधपुर, मारवाड़, के एक अति संपन्न, परोपकारी और समाज सेवी पुष्करणा ब्राह्मण परिवार में जन्मा यह नौजवान शम्भूनाथ जब सैलेश कुमार का फिल्मी नाम रख कर कुछ कर दिखाने के संघर्ष में कूद पड़ा। फिल्म निर्माता सदाशिव राव जे. कवि ने उसे अपनी फिल्मभाभी की चूड़ियांमें बलराज साहनी और मीना कुमारी के साथ एक प्रमुख भूमिका में ले लिया। फिल्म में उनके साथ रोमेंटिक लीड में थी सीमा देव। 1961 में रिलीज़ हुई यह फिल्म बलराज साहनी के कारण नहीं बल्कि मीना कुमारी जैसी भाव प्रवीण अभिनेत्री और पहली बार परदे पर उतरे सैलेश कुमार के उम्दा अभिनय के कारण आज भी याद की जाती है। फिल्म में सैलेश ने अपनी अभिनय क्षमता का बखूबी प्रदर्शन किया। भावपूर्ण दृश्य हों या युवा उमंग के दर्शकों को रिझाने वाले रोमेंटिक दृश्य सभी में उसने अपना सिक्का मनवाया। यह चलचित्र फिल्म संगीत के इतिहास में भी एक मील का पत्थर है। हिन्दी के प्रकांड कवि पंडित नरेंद्र शर्मा के गीतों का सुधि मराठा संगीतकार सुधीर फडके ने स्वर संयोजन किया था। लता का गाया इस फिल्म का एक गीतज्योति कलश छलकेतो कालजयी बनकर इस फिल्म को अमृत्व प्रदान कर गया। इस फिल्म के दो अन्य गीतों में सैलेश कुमार की बहुमुखी अभिनय क्षमता का परिचय मिलता है। तुमसे ही घर घर कहलाया(मुकेश) में सैलेश ने करुण रस में दर्शकों को भिगोया तो कहां उड़ चले हैं मन प्राण मेरे(मुकेश-आशा भोसले) में इस अभिनेता ने दर्शकों को गुदगुदाया भी।

फिल्म भाभी की चूड़ियां बहुत ही सफल फिल्म रही। इसे बॉक्स ऑफिस पर तो सफलता मिली ही साथ ही समीक्षकों का आदर भी मिला। फिर क्या था। सैलेश को लगा कि बस अब आकाश छूना है। इस फिल्म के बाद वे कुछ फिल्मों के लिए तुरंत अनुबंधित भी हो गए।

यह सिलसिला आगे बढ़ता और यह अभिनेता अपने को साबित करता इसी बीच उसकी दूसरी फिल्म रिलीज़ हुईबेगाना(1963) जिसमें वे उन्हीं के साथ संघर्ष कर रहे धर्मेंद्र के समांतर नायक की भूमिका में था। इस फिल्म के निर्माता भी सदाशिव राव जे. कवि थे। इस फिल्म में सैलेश अपने साथी कलाकार धर्मेंद्र पर भारी पड़ते हैं। गीतकार शैलेंद्र के लिखे और फिल्मों में पहली बार स्वतंत्र रूप से संगीत दे रही संगीतकारों की जोड़ी सपन-जगमोहन (सपन सेनगुप्ता और जगमोहन बक्शी) के जिन दो गानों से यह फिल्म आज भी लोगों की याद में बसी है वे दोनों सैलेश पर ही फिल्माए गए थे। ये गीत थेना जाने कहां खो गया वो ज़माना/यहीं था चमन में मेरा आशियाना(मुकेश) और फिर वो भूली सी याद आई है/ ग़म-ए-दिल तेरी दुहाई है(मोहम्मद रफी)। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर धराशायी हो गई। इसके साथ ही फिल्म नगरी की रिवायत के अनुसार सैलेश कुमार फिल्म निर्माताओं के लिए बेगाना हो गया। मायानगरी का यह सबक फिर दोहराया गया कि कला और बॉक्स ऑफिस में बहुत बड़ा फर्क होता है। खुले आकाश में उड़ने के लिए उसने अपने पर फड़फड़ाए ही थे कि उसे नेगाना की असफलता के रूप में अपने करियर का पहला झटका लगा जो इतना करारा था कि यह अभिनेता उससे उबर नहीं पाया।

फिल्मी दुनिया में किसी कलाकार को उसकी क्षमता और मेहनत से नहीं बल्कि उसकी फिल्म की बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी से आंका जाता है। इस अभिनेता के पास क्षमता और मेहनत अपने समकालीन राजेंद्र कुमार, मनोज कुमार और धर्मेंद्र आदि अभिनेताओं से कहीं कम नहीं थी। मगर उसके साथ शायद वह किस्मत नहीं थी जिसके हाथ में सफलता की कुंजी होती है। मगर सैलेश समर्पण करके भाग खड़े नहीं हुए। उसने पूरी मेहनत की। छोटी फिल्मों में नायक की भूमिकाएं स्वीकार की तो बड़ी फिल्मों में छोटी भूमिकाएं भी की जैसे फिल्मकाजल (1965) में मीना कुमारी के भाई की जिसमें धर्मेंद्र और राजकुमार जैसे स्थापित हो चले अभिनेता बड़ी भूमिकाओं में थे। थोड़े समय के लिए सैलेश ने लोकप्रियता का स्वाद जरूर चखा सहनायक या खलनायक की भूमिकाओं में जैसे आधी रात के बाद(1965), औरये रात फिर ना आएगी(1966) या रहस्य फिल्मों जैसेउस रात के बाद(1969),तेरी तलाश में (1969) और कौन हो तुम(1970) में।

जाने माने निर्माता निर्देशक केदार शर्मा की फिल्ममैखाना (1967) भी सैलेश की कोई मदद नहीं कर सकी क्योंकि नए संगीतकार भूषण के बड़े ही खूबसूरत संगीत से सजी फिल्म नहीं चली। हालांकि इस फिल्म के दो गाने कालजयी बन गएबैठे बैठे दिल-ए-नादान ये खयाल आया है/ हम नहीं आए आए यहां कोई हमें लाया है (मोहम्मद रफी) और एक शब के मुसाफिर हैं हम तो ये दुनिया मुसाफिरखाना है(महेश कुमार)।

साल 1967 के आखरी महीने दिसंबर के दूसरे पक्ष के अपने अंक में मशहूर फिल्म पत्रिकामाधुरी (29 दिसंबर 1967) ने सैलेश को अपने मुखपृष्ठ पर ही जगह नहीं दी उस पर तीन पेज का चित्रमय फीचर भी छापा जिसमें यही सवाल उठाया गया था कि प्रतिभा के होते हुए भी आठ साल के जद्दोजहद के बाद भी यह अभिनेता की पहचान क्यों नहीं बन रही है।माधुरीके फीचर की सवाल पूछती ये पंक्तियां बहुत कुछ कहती है: सैलेश, आठ साल के अपने फिल्मी जीवन को पीछे मूड कर देख सकते हो तुम? अगर देख सको तो बताओ क्या सोच कर तुम अभिनेता बने थे और क्या पाया इस अरसे में तुम ने?सैलेश का जवाब कभी पूरा नहीं हुआ, अधूरा ही रह गया। और समय गुज़र जाने के बाद यह सवाल और सघन होता चला गया। करीब बीस साल तक बड़ी कामयाबी की अमृत बूंद पाने की आस फलीभूत हो सकी और वफिर अपने घर जोधपुर लौट याअपने बीस वर्ष के फिल्मी जीवन में इस अभिनेता ने 29 फिल्मों में काम किया। 

यह अभिनेता परास्त सिपाही की निराशा के साथ फिल्मी नगरी से भाग कर अपनी जन्मभूमि पर नहीं लौटा ऐसा दावा है उसकी दोहिती आसका बोहरा का, जिसने सोशल मीडिया पर एक टिप्पणी में लिखा मेरे दादा ने इसलिए फिल्म उद्योग नहीं छोड़ा कि वे अपनी पहचान नहीं बना सके। उन्हें इसलिए फिल्में छोडनी पड़ी क्योंकि उन्हें बहुत युवा अवस्था में थाईरॉइड की बीमारी हो गई थी और उन्हें उस समय कईं ऑपरेशन कराने पड़े और रेडिएशन (थेरेपी) भी लेनी पड़ी। स्वास्थ्य संबंधी विभिन्न कारणों से इस अभिनेता को बुलंदियों के मुकाम पर पहुंचने के पहले ही जोधपुर लौटना पड़ा और अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देना पड़ा।

लेकिन यह भी सच है कि फिल्मी दुनिया छोड़ कर जोधपुर लौटने के बाद शैलेश कुमार ने उसे फिर मुड़ कर नहीं देखा। यहां तक कि फिल्मी जीवन के अपने काल को उन्होंने जैसे काट कर अलग करके अरब सागर के जल में विसर्जन कर दिया हो। उनके काम की या उनके दौर की फिल्मों के बारे में यदि कोई उनसे बात करने की चेष्टा भी करता तो वे यह कह कर बात समाप्त कर देते कि उस जमाने की उनके पास कोई याद नहीं है। मैं उस वक़्त में नहीं लौटना चाहता। यह उनका तंज़ था या उनकी स्थितप्रज्ञता कहना मुश्किल है। उनकी अभिनीत अंतिम रिलीज़ फिल्म यादगार (1984) रही। 

अपने मन की ज़िंदगी जीने वाले इस अभिनेता का 21 अप्रेल (शुक्रवार) को जोधपुर में निधन हो गया। वह 76 वर्ष का था।

फिल्मों में वे अपनी मौज के लिए, शौक के लिए गए थे, कमाई से घर भरने की लालसा से नहीं क्योंकि वे जिस परिवार से आते थे वहां किसी बात की कमी नहीं थी। उनके पिता अमरनाथ पुरोहित राज के जमाने में हाकिम थे। उनके दादा लाडजी पुरोहित महाराज सर प्रताप के एडीसी थे जिन्होंने अपने समाज की शिक्षा के उत्थान के लिए जो काम किए वही उन्हें अमर कर देने के लिए काफी है। जोधपुर की पुष्टीकर स्कूल उन्हीं की देन हैं। पानी को हमेशा तरसने वाले शहर में उनका बनवाया सार्वजनिक लाडजी का बेरा (कुआ) आज भी नगर की शान है।
पिता अमरनाथ और माता भंवरी देवी के चार संताने – तीन बेटे और एक बेटी – हुई। दो बड़े बेटों रमानाथ और कैलाशनाथ के बाद तीसरे बेटे थे शंभु नाथ जिन्हें हम अभिनेता शैलेश कुमार के रूप में जानते हैं।

सैलेश के दो संतानें हैं - एक बेटा और एक बेटी। बेटी ब्याह के बाद अभी मुंबई में है जबकि बेटा जोधपुर में ही एक भव्य रेस्तरां चलाता है।

(यह आलेख संगीत, कला, संस्कृति और पर्यटन को समर्पित पत्रिका स्वर सरिता के मई, 2017 के अंक में छपा)