Monday, January 7, 2019

निजता खो चुका हिंदुस्तानी सिने संगीत अब स्मृतियों में नहीं दर्ज होता

राजेंद्र बोड़ा

यह सच तो सभी स्वीकार करेंगे कि देश की आम जनता में 1950 और 1960 के दशक में हिन्दुस्तानी सिनेमा के लिए जो भारी क्रेज़ उभरा उसमें उस दौर के गीत-संगीत का बहुत बड़ा योगदान रहा। फिल्मी गाने - सिनेमा के परदे पर अदाकारों के लबों पर हों या रेडियो पर बजते हों - लोगों पर जादू का सा असर करते थे। हर एक को हर गाना अपना-अपना सा लगता था। जैसे वह उसी का हाल बयान कर रहा हो।

हिंदुस्तानी सिनेमा संगीत की अहमियत को जानना – पहचानना हो तो उसके लिए पिछली सदी के पांचवें और छठे दशक के सिने संगीत के दौर को टटोलना पड़ेगा। लोगों के सिर चढ़ जाने वाला संगीत ऐसी फिल्मों में भी गूंजा जो ज़्यादातर चवन्नी छाप दर्शकों के लिए मानी गयी।
उस दौर के गाने हमारी स्मृतियों को जगाते हैं और एक प्रकार का नोस्टेल्जिया पैदा करते हैं। उनकी स्मृतियों में लौटना बड़ा भला-भला सा, शुभ-शुभ सा लगता है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि वह देस-काल से परे ले जाने वाला संगीत था। उसमें देश के गावों और शहरों का अपनापा बोलता था। उन गानों से फ़लक का एहसास बनता था। सिने संगीत के रसिक लेखक अजातशत्रु सदियों में एक...आशा’ में कहते हैं "उस दौर का संगीत भला-भला सा, शुभ-शुभ सा लगता था। इसीलिए उस जमाने के लोग हिंदुस्तानी सिनेमा पर मरे-मरे जाते थे क्योंकि उनमें जीवंतता थी, भावों की गहन अभिव्यक्ति थी। जब उस दौर के गीतों को हम आज फिर सुनते हैं तो हम अपनी किशोर वय में लौटते हैं और हमें अपने पुराने घर, मोहल्ले, गालियां, बाज़ार, लोगों व वाहनों की रेल-पेल, पुराने दोस्त, दोस्तों से मिलने के अड्डे, किसी से मिलने के बगीकोन के कोने सभी की स्मृतियां उभर आती हैं।

वे कहते हैं आधी सदी पहले के सिने संगीत में असरदार कविता होती थी। प्रभावशाली अल्फ़ाज़ से संगीतकारों की तब आशिक़ी होती थी। नग्मों के बोल उन्हें आवेश भरते थे। फिर उन्हें मालूम था कि वे जो रच रहे हैं उसे कैसे कंठ की जरूरत है। उसी के हिसाब से वे गायक/गायिका चुनते थे। कई बार अपनी धुन की माफिक कंठ न मिलता और उन्हें किसी और से गवाना पड़ा तो उन्होंने गायक/गायिका की क्षमता के अनुरूप अपनी धुन को व्यवस्थित किया। इसीलिए उस दौर का संगीत इतना कर्णप्रिय था, धुनें मन को मोह लेती थीं।    

आज का सिने संगीत अपना माधुर्य खो बैठा। उसके पास इनटोनेशन या कहें आवाज़ में उतार चढ़ाव का लहजा नहीं रहा। अब गाने दिल से नहीं गाये जाते। लगता है एक यंत्र मानव गीत गा रहा हो।   
हिंदुस्तानी सिने संगीत के रसिक और पेशे से चिकित्सक अशरफ अज़ीज़, जिनके पुरखे तीन पीढ़ी पहले पूर्वी अफ्रीका मजदूरी करने गए थे और वहीं बस गए, कहते हैं फिल्मी गीत धुन के लिफाफे में एक पुराना पैगाम है जो हमारे पुरखों ने हम तक पहुंचाया है ताकि हम अपने को बेहतर बना सकें।

उस जमाने में मनोहारी धुन बनाने के लिए संगीतकार बहुत मेहनत करते थे। उन संगीतकारों में कविता या शायरी की समझ होती थी। वे दृश्यों के भावों को अभिव्यक्ति देते थे। ऐसी अभिव्यक्ति कि कई बार गाने वह सब कुछ व्यक्त कर जाते थे जो निर्देशक कैमरे से नहीं दिखा पाता था। जब भी निर्देशक कैमरे से ज़िंदगी के किसी पहलू तक नहीं पहुंच पा रहा होता तो वह गाने का ही सहारा लेता। हिन्दुस्तानी फिल्मों में गानों ने वो भूमिका निबाही जो कैमरे की पकड़ में न आ सकी। ठेठ हिन्दुस्तानी जज़्बात दिखाने में जब-जब कैमरा असफल रहा तो गानों ने उस जगह को भरा। तब के गाने फिल्म की कथा में नगीनों की भांति जुड़े होते थे। फिल्म के किरदारों के जज़्बातों को व्यक्त करते थे। गाने फिल्म की कहानी के भीतर से आते थे। कहानी की सिचुएशन से ही गानों की मेलोड़ी का उठाव होता था। ऐसे गाने हमें तरसाते थे, तड़पाते थे और एक अजीब से नशे में डुबो देते थे। क्योंकि गाने जिन किरदारों से जुड़े होते थे उनकी खुशियाँ और ग़म की महक उनमें होती थी जो हमारे अंतस तक को सुहासित कर जाती थी। तब के फिल्म के किरदारों में अनोखी सरलता होती थी जो भारतीय मन को भाती थी।  
   
यह बात याद रखने की है कि हिंदुस्तानी फिल्म के माधुर्यपूर्ण संगीत का खासा हिस्सा उन फिल्मों में दर्ज है जो चवन्नी छाप दर्शकों की मानी जाती रही है। इन फिल्मों को बी-ग्रेड या सी-ग्रेड बता कर साहित्यिक कुलीन लोगों ने उन्हें हिकारत की निगाह से देखा। ऐसी फिल्मों में आशिकतर भूत-प्रेत, परियों, दैत्यों, उड़ती हुई जादू की दरियों, राज महलों की साज़िशों, तलवारबाज़ी और अरब की रातों (अरेबियन नाइट्स) के किस्से होते थे और ऐसी फिल्में शहर के टीन-टप्पर वाले हल्के दरजे के सिनेमाघरों में प्रदर्शित होती थीं। ऐसी फिल्मों के ऐसे बेशुमार गाने हैं जो टाकीजों के बाहर न तब सुने गए और न आज उनके रेडियो और टीवी चौनलों पर बजने की कोई संभावना ही है। वे रिकार्डों के ढेर में दबे रह गए और बाज़ार में वे ही गाने चले जो पॉपुलर हो गए या बना दिये गए। माधुर्यपूर्ण ऐसे गानों की खोज में सिनेमा संगीत के रसिक अब भी लगे हुए हैं।

उस दौर के माधुर्यपूर्ण गाने तब की यंत्र तकनीक के कारण लगभग तीन मिनट की समय सीमा में बंधे होकर भी विराट थे। ध्वनि मुद्रण की नई यंत्र तकनीक ने आज के संगीत को भले ही असीमित संभावनाएं दी हों मगर गाने का माधुर्य खो गया है। यही कारण है कि वाद्यों का शोर में शब्दों की अहमियत खो गई। नए जमाने के फिल्म निर्देशक गानों को कथाक्रम में पिरोने का हुनर नहीं सीख पाये। नतीजा यह निकला कि फिल्मी गाने लोगों के दिलों में स्थायी जगह बना पाने में नाकामयाब रहते हैं। इसीलिए आज के गानों की उम्र कुछ हफ्तों की रह गई है। अब कालजयी गाने नहीं बनते। पिछली सदी के उस दौर को हिन्दुस्तानी फिल्म संगीत का स्वर्णिम दौर यूं ही नहीं खा जाता। तब के गाने आज भी रेडियो और टीवी चैनलों पर राज करते हैं और सुनने वालों को मोहते हैं। आज के संगीतकार उस जमाने के गानों के कंधों पर चढ़ कर उनके रीमिक्स बनाकर शिखर छूना चाहते हैं। तब के संगीतकार अपने देश की संगीत परम्पराओं से प्रेरणा लेते थे। जिसे आखरी मुग़ल जैसे विराट संगीतकार की संज्ञा दे सकें वह है नौशाद जिन्होंने एक बार कहा था हमें प्रेरणा के लिए विदेशी संगीत की तरफ क्यों देखना चाहिए। हमारे अपने देश का संगीत इतना भरपूर है कि हम उससे कितना ही लें वह रीता नहीं होगा।

आज की यंत्र तकनीक पर बाज़ार हावी है। बाज़ार को अंतर्राष्ट्रीय ताक़तें नियंत्रित करती हैं जिनके मुख्यालय पश्चिम में हैं। उन्हीं के प्रभाव में हिंदुस्तानी सिने संगीत ने अपनी निजता खो दी है जिसे वापस पाने का कोई फिलहाल तो नहीं सूझता।  

(यह आलेख कला और संगीत को समर्पित मासिक पत्रिका स्वर सरिता के दिसंबर, 2018 के अंक में प्रकाशित हुई)  
                              

Wednesday, May 9, 2018

गजेंद्र नारायण सिंह: संगीत को तिजारत से दूर रखने का अलख जगाने वाला नहीं रहा


  


                          --राजेंद्र बोड़ा


पर्फ़ोर्मिंग आर्टिस्ट समीक्षक नहीं होते और समीक्षक पर्फ़ोर्मिंग आर्टिस्ट नहीं होते। मगर गजेंद्र नारायण सिंह विलक्षण रूप से ये दोनों थे। वे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के कलाविद् होने के साथ-साथ भारतीय शास्त्रीय संगीत के समीक्षक और इतिहासकार भी थे। उनका यह बहुआयामी व्यक्तित्व उन्हें भीड़ से अलग करता था। ऐसे गुणवंत कलाकार, पारखी समीक्षक और भारतीय संगीत को बढ़ावा देने में हमेशा जुटे रहने वाले गजेंद्र नारायण सिंह के सोमवार को पटना में निधन से भारतीय संगीत प्रेमियों में शोक है।   
  
10 दिसंबर 1939 को एक संभ्रांत बिहारी परिवार में जन्मे सिंह को बचपन से ही संगीत का जुनून रहा और उन्होंने 18 वर्षों तक गुरु-शिष्य परंपरा में संगीत का कडा प्रशिक्षण ग्वालियर घराने के सुविख्यात गायक चूड़ामणि और पद्मविभूषण पंडित विनायक बुआ पटवर्धन से जैसों से पाया। कथकली के जाने माने विद्वान केलू नाय इनके नृत्य गुरु रहे। उन्होंने पंडित नारायण राव व्यास, पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर, उस्ताद फ़हीमुद्दीन डागर, उस्ताद विलायत खां, जैसे संगीतज्ञों से भी मार्गदर्शन प्राप्त किया। 

इतने गुणियों से संगीत की तालीम और ज्ञान पाकर भी उन्होंने अपने को संगीत के पेशेवर पर्फ़ोर्मर के रूप में प्रतिष्ठित करने का कभी लोभ नहीं किया। इसकी जगह उन्होंने अन्य काबिल लोगों को आगे बढ़ाया। उनके मार्गदर्शन और प्रोत्साहन से अनेकों गायकों और वादकों ने राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय ख्याति पायी। भारतीय संगीत को सहेजे रखने में उनकी प्रमुख भूमिका रही। 

बेतिया और डुमराव घराने की ध्रुपद परंपरा को जीवंत बनाए रखने में उनका योगदान अविस्मरणीय है। संगीत के जानकारों और कलाकारों में उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। भारत सरकार ने उनकी सेवाओं का मान करते हुए उन्हेंपद्मश्री अलंकरण प्रदान किया था। उन्हें बिहार स्टेट अकादमी पुरस्कार दे कर भी सम्मानित किया गया। वे बिहार संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष भी रहे।

वे मानते थे कि संगीत, पेशा और तिजारत की चीज नहीं हैसिंह ने संगीत पर अनेक मानक ग्रंथ लिखे।महफिल,बिहार की संगीत परंपरा’, सुरीले लोगों की संगत,स्वरगंधा जैसी उनकी किताबें खूब पढ़ी और सराही गई। ये ग्रंथ आज़ादी पूरवे के भारतीय शास्त्रीय संगीत का अनूठा दस्तावेजीकरण भी है।          

Monday, April 23, 2018

शिवरतन थानवी: एक संवादप्रिय शिक्षाविद् का चले जाना

राजेंद्र बोड़ा

शिक्षाविद् शिवरतन थानवी के निधन के साथ ही एक युग का अवसान हो गया। एक ऐसे युग का जिसमें संबंधों की ऊष्मा बनाये रखते हुए गहरी बहस की गुंजाइश बनी रहती थी। वे कहते थे "संवाद-प्रियता नहीं हो तो सही शिक्षा और आजीवन शिक्षा संभव ही नहीं है। संवादप्रिय बनना सीखना भी शिक्षा का और आत्म-शिक्षण का एक अत्यंत महत्वपूर्ण चरण है। संवाद करना एक कसरत है और कला भी है"। संवाद की यह कला दो पीढ़ियों को उनसे मिली। उन्होंने हमें जीवन के सरोकारों को समझने के लिए लगातार शिक्षित किया।

शिक्षा की दीक्षा-प्रशिक्षा की रूढ़ि पर शिवरतन थानवी हमेशा सवाल खड़े करते रहे हैं। उन्हें हमने हमेशा एक ऐसे शिक्षक की भूमिका में पाया जो दुर्गम रास्तों में हमें भटकने से बचाने के लिए हमारा मार्गदर्शन करते रहे। उन्होंने हमें शिक्षा के प्रति एक समग्र समझ दी। उनका मानना था कि मौजूदा शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या यह है कि “अब तक न हम सहिष्णु हुए, न उदार हुए, और न ही हम समझदार हुए”। शिक्षा जरिये वे पूरे समाज को जागरूक रखना चाहते थे जिनमें “नागरिक भी शामिल हों और शासक भी”।

वे राजस्थान में शैक्षिक पत्रकारिता के पुरोधा थे। शिक्षा व्यवस्था जगत में एक बड़ा नाम अनिल बोर्दिया के नवोन्मेषों को शासकीय तंत्र में लागू  करने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निबाही।  वे मूलत: अंग्रेज़ी के शिक्षक रहे मगर सरकारी शैक्षिक पत्रिकाओं – शिविरा’, नया शिक्षक और टीचर टुडे के सम्पादन का जैसा विलक्षण काम उन्होंने किया वह इतिहास के सुनहरे हर्फों में लिखा जाएगा। 

पढ़ने लिखने के साथ विभिन्न कलाओं – संगीत और फिल्मों के साथ साथ वनस्पतियों में उनकी गहरी गहरी रुचि थी उनके अंत समय तक बनी रही। वे एक ऐसे  स्वाभिमानी व्यक्ति थे जो दूसरों पर अपनी बात थोपते नहीं थे। अपनी शर्तों पर उन्होंने अपना सादा और आडम्बर रहित जीवन जीया।    

वे एक विराट बौद्धिक पुरुष थे। उनके जाने से वैचारिक जगत में एक सूनापन आ गया है जिसे भरा जाना संभव नहीं लगता। उनसे प्रेरणा पाने वाले हम सब सदमे मैं हैं। असंख्य लोग जो उनके संपर्क में आये, भले ही थोड़े समय के लिए, वे शिवरतन जी का चले जाना अपनी निजी क्षति मानेंगे।