<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-5185840046950412717</id><updated>2012-01-08T17:54:16.967-08:00</updated><category term='rajput'/><category term='Jainarayan Vyas'/><category term='vk murthy'/><category term='Royalty'/><category term='Journalism'/><category term='water policy rajasthan tariff'/><category term='Market'/><category term='Mehboob Ali'/><category term='Ravi'/><category term='elections'/><category term='joshilaay'/><category term='kans'/><category term='Commercial'/><category term='Wheat'/><category term='lyrics'/><category term='Kaifi Azmi'/><category term='Police State Authority Democracy Force'/><category term='Empty Streets'/><category term='freedom fighter'/><category term='Bollywood'/><category term='साक्षर भारत'/><category term='jaipur literature festival'/><category term='Population'/><category term='Todd'/><category term='Suryatra'/><category term='V P Menon'/><category term='advertisement'/><category term='Soni'/><category term='संविधान'/><category term='Mander'/><category term='ramlal'/><category term='Balraj Sahni'/><category term='Desert'/><category term='horse'/><category term='V. 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rel='alternate' type='text/html' href='http://itslokayat.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Rajendra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S-Gx1DliFGI/AAAAAAAAArU/4OCr_2fmGn8/S220/photo.JPG'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>58</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5185840046950412717.post-2321938374236468054</id><published>2012-01-08T17:44:00.000-08:00</published><updated>2012-01-08T17:54:16.998-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Rajasthan Jaipur New Year Constitution'/><title type='text'>कुहरे में सना आया नया साल</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;राजेंद्र बोड़ा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक का एक और साल गुजर गया। सर्द कोहरे से ढकी सुबह ने वर्ष 2012 का स्वागत किया। राजधानी जयपुर में साल का पहला दिन धूप की गरमाहट से महरूम रहा। नया दिन सिर्फ नया कलेन्डर लेकर आया। मशहूर कवि दुष्यंत कुमार, जो हिन्दी में गजलें कहते थे, का नए साल के आगाज़ पर एक मुक्तक है “ न दुआ न सलाम दीवार से कलेन्डर उतार ले गई शाम”। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीता साल देश और प्रदेश दोनों के लिए बहुत झमेलों का रहा। नई सुबह ऐसा कोई सकून भरा भरोसा लेकर नहीं आई कि नया साल कुछ राहत देगा। नए जमाने ने हमारे जीवन को जितना उलझन भरा बना दिया है और जिन परेशानियों से हम आज बाबस्ता हैं उससे राहत की कोई किरण नए साल की भोर लेकर नहीं आई। &lt;br /&gt;जिस तरह नए साल का पहला सवेरा धुंध से भरा निकला वैसे ही हमारी परेशानियों से छुटकारे की राह भी कुहरे में खोई रही।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में शासन और जनता के बीच भी पहली जनवरी की सुबह की तरह ही घना कोहरा छाया हुआ है जो दोनों के बीच दूरी बना दे रहा है। एक ऐसे सूरज का इंतज़ार है जो अपनी गरमाहट से इस कोहरे को मिटा दे। &lt;br /&gt;सैकड़ों वर्षों तक सामन्ती व्यवस्था में आम जन शासक के लिए होते रहे। जनता को शासन के हित में अपना सब कुछ न्यौछावर करने के लिए हमेशा तत्पर रहने के अलावा कोई चारा न था। आजादी की लड़ाई सामन्ती शासकों ने नहीं आम जन ने लड़ी इस उम्मीद के साथ आज़ादी की भोर ऐसा शासन लाएगी जो जन के लिए होगा। भारत के संविधान ने आमजन को सार्वभौम बनाया और उनके चुने हुए नुमाइन्दों के हाथ में शासन इस भरोसे के साथ सौपा कि वह जनता के प्रति उत्तरदायी होगा और वह जनता के लिए होगा। इसीलिए बच्चों को पढ़ाया जाता था कि लोकतान्त्रिक सरकार जनता की होती है “जनता द्वारा, जनता के लिए”। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज़ादी के पहले दशक में इस कुहरे के छंटने का बड़ा भरोसा था। शाइर साहिर लुधियानवी ने गाया “जिस सुबहा की खातिर युग-युग से हम सब मर-मर कर जीते हैं/वो सुबह कभी तो आएगी”। जाँ निसार अख्तर ने लिखा “गम की अंधेरी रात में दिल को ना बेकरार कर सुबह जरूर आएगी सुबह का इंतज़ार कर”। वहीं कवि शैलेन्द्र ने ऐसी सुबह की आशा में गाया “ना भूखों की भीड़ होगी ना दुखों का राज होगा/बदलेगा जमाना ये सितारों पे लिखा है”।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन आज़ादी को मिले 65 साल होने को आए कुहरा छँटने का नाम नहीं ले रहा बल्कि और घना होता जा रहा है। नई भोर के इंतज़ार में उत्साही एक पूरी पीढ़ी गुजर गई और निराशा अपनी छाया फैलाने लगी। आम जन की निराशा में डूबा साल गुजर गया। देश और प्रदेश ने आंकड़ों में भारी तरक्की के कीर्तिमान बनाए। आमजन को बताया गया नया कि देश दुनिया के मुल्कों में कितना आगे बढ़ गया है। मगर आमजन तो अपने को वहीं का वहीं खड़ा पाता है। भारत के लोग शाश्वत आशावादी हैं। नये साल में शायद कुछ करिश्मा हो जाये। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आम जन क्या चाहते हैं? वे उससे अधिक कुछ नहीं चाहते हैं जो हमारे संविधान के आमुख में लिखा है और जिसके नाम पर जनता के सभी नुमाइंदे शपथ लेकर हम पर राज करते हैं। संविधान हमें सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचारों की आजादी हैसियत और अवसर की समानता और आत्मसम्मान से जीने का हक़ देता है। मगर जैसी व्यवस्था हो चली है उसकें चलते यह सब कुछ ताकतवर लोगों के लिए मुहैया है। यह ताकत सत्ता की हो सकती है, पैसे की हो सकती है, बाहुबल की हो सकती है। इन्हीं ताकतों के समूह अपने लिए और अपनों के लिए सरकार से उपकृत होते रहते हैं। जनता के नुमाइंदे भी उन्हीं के होकर रह जाते हैं। इन सभी को भ्रष्टाचार पर टिकी व्यवस्था माफिक आती है। इसीलिए सड़कों पर जब भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई मुहिम छिडती है तो विधायिका उससे विमुख हो कर खड़ी हो जाती है। एक तरफ राज में बैठे लोग शासन में आमजन की भागीदारी की दुहाई देते नहीं थकते मगर वे जनता की आवाज़, उसकी अपेक्षाओं उसकी आकांक्षाओं पर उनके कान पर जूं भी नहीं रेंगती। आर्थिक नीतियां बड़े घरानों के लिए बनती है। गरीब आमजन के लिए एक सामान्य सा स्कूल जहां पूरे शिक्षक हों जो पूरी पढ़ाई कराते हों, इलाज के लिए एक सामान्य सा अस्पताल हो जहां डॉक्टर समय पर मिलते हों और इलाज तथा दवा में जेब नहीं काटते हों हरेक के लिए सामान्य रोजी रोटी की व्यवस्था हो इससे अधिक की चाह भी नहीं है। ये छोटी जरूरतें पूरी नहीं होती मगर बड़े पाँच सितारा पब्लिक स्कूल, निजी अस्पताल और बड़े-बड़े मॉल के लिए सरकार तत्पर रहती है। अपनी झोपड़ी का सपना ही रह जाता है क्योकि बड़े बिल्डर हमारे नुमाइंदों को अपने जेब में रखने का दावा करते हैं। ऐसे में नया साल कोई नई सौगात लेकर आ भी कैसे सकता है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;(यह आलेख 'प्रेसवाणी' के जनवरी 2012 अंक में छपा) &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5185840046950412717-2321938374236468054?l=itslokayat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itslokayat.blogspot.com/feeds/2321938374236468054/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5185840046950412717&amp;postID=2321938374236468054' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/2321938374236468054'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/2321938374236468054'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itslokayat.blogspot.com/2012/01/blog-post.html' title='कुहरे में सना आया नया साल'/><author><name>Rajendra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S-Gx1DliFGI/AAAAAAAAArU/4OCr_2fmGn8/S220/photo.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5185840046950412717.post-3635516312764782351</id><published>2011-12-28T12:24:00.000-08:00</published><updated>2011-12-28T12:35:15.964-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Journalism'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Market'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Profit'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='media'/><title type='text'>झगड़े की जड़ 'फिट टू सेल'</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;राजेंद्र बोड़ा&lt;/span&gt;  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पत्रकारों का मीडियाकर्मी बनने का सफर बहुत पुराना नहीं है। वैसे ही जैसे प्रेस का मीडिया में तब्दीली का सफर। इक्कीसवीं सदी की दहलीज़ से शुरू हुए इस सफर को बहुत देर नहीं हुई है। लेकिन छोटे से सफर में ही पत्रकारिता और पत्रकारों का बहुत कुछ बदल गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब तक पत्रकारिता थी तब तक प्रेस थी, तब तक अख़बार थे, तब तक छपे हुए शब्द थे। तब भले ही अख़बार छोटे होते थे परंतु उनके संपादक बहुत बड़े होते थे। अख़बार से 'प्रिन्ट मीडिया' बन गए समाचार पत्र अब बहुत बड़े होने का दावा करने लगे हैं। लाखों में अपनी प्रसार संख्या के बूते पर वे यह दावा दम ठोक कर करते हैं। इस सफर में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने भी धमाकेदार शुरुआत की जिसकी होड़ में प्रिन्ट मीडिया भी पढ़ने के साथ देखने वाला उत्पाद बन गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पत्रकारिता जब बाज़ार का उत्पाद बन जाये तब अख़बार और टीवी चैनलों के दर्शक सभी सिर्फ ग्राहक होते हैं जिनकी जरूरत उत्पादनकर्ताओं के लिये केवल मुनाफा कमाने के लिए होती है। मीडिया का संचालन बाज़ार की ताक़तें करने लगे तब अभिव्यक्ति की आज़ादी, लोकतान्त्रिक सिद्धांत, मानवीय अधिकारों की रक्षा और एक खुले और स्वतंत्र समाचार माध्यम की बातें करना बेमानी हो जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अखबार को कारोबार मानने से समस्या पैदा नहीं हुई बल्कि खबर को कारोबार की वस्तु बना देने से आज की स्थिति पैदा हुई है। पहले भी अखबार कारोबार था मगर उससे मुनाफा कमाना उन्हें निकालने वालों का पहला उद्धेश्य नहीं हुआ करता था। अखबार उनके लिए प्रतिष्ठा की चीज थी। तब केवल दौलत किसी की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ाती थी। मगर पूंजीवाद के आज के युग में ये जीवन मूल्य बादल गए है। आज पैसा ही एकमात्र प्रतिष्ठा की चीज बन गया है। आज की नयी धनाढ्य पीढी जिनके हाथों में अखबारों की नकेलें हैं वे बाजारवाद की उपज हैं जिनके लिए पैसा ही प्रतिष्ठा है, पैसा ही ताकत है. इसे पाने के लिए वे ख़बर का भी सौदा करने को तत्पर रहते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन लोगों के लिए ‘न्यूज़’ या ‘समाचार’ भी एक उत्पाद है। इस उत्पाद को तैयार करने और उसके वितरण में उनके हिसाब से बाज़ार के वही सारे आर्थिक सिद्धांत काम करते हैं जो अन्य औद्योगिक माल के उत्पादन पर लागू होते हैं। अमरीका के फेडरल कम्युनिकेशन्स कमीशन के चेयरमैन थे मार्क फ्राद्लर। उनका कहना था "बाज़ार में लोगों की जैसी पसंद होती हैं उसी से मीडिया के कंटेंट निकलते हैं”।  इसका अर्थ यह हुआ कि जिस प्रकार बाज़ार में ग्राहक की पसंद के हिसाब से उत्पाद आते हैं वैसे ही मीडिया का कंटेंट (विषय वस्तु) भी आएगा। वे यह भी कहते हैं कि “जनता की रुचियाँ ही जनहित को परिभाषित करेंगी”।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर हमें यहाँ यह नहीं भूल जाना चाहिए कि खुले बाज़ार में लुभावनें प्रचारों के जरिये जनता की रुचियाँ बनाई और बिगाडी जाने का खेल बड़े पैमाने पर चलता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसी ही बाज़ार की शक्तियों के चलते आज अख़बारों में क्या हो रहा है ? अख़बारों के समाचार कक्षों में एक अच्छी 'कॉपी' (ख़बर) किसे मानते हैं? वह कॉपी जो लालच, बेवकूफी, और षडयंत्र की कहानी कहती हो। संपादकीय कक्षों में माना जाता है कि चटपटी ख़बरों से ही अख़बार को अधिक पाठक मिलेंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ समय पहले जेम्स टी. हेमिल्टन का अध्ययन पुस्तक के रूप में आया। यह अपने प्रकार का दुनिया में पहला अध्ययन है। इसका शीर्षक है 'हाउ द मार्केट ट्रांसफार्म्स इन्फोर्मेशन इन्टू न्यूज़'। हेमिल्टन कहता है:  "खबरें बाज़ार की ताकतें बनती हैं और ख़बरों (जिसे बाज़ार की भाषा में इन्फोर्मेशन गुड्स कहते हैं) के स्वरुप का निर्धारण अर्थतंत्र करता है।"&lt;br /&gt;    &lt;br /&gt;आज तेजी से बढ़ते अखबार अपने संपादकों को सिखा रहे हैं कि वे अपने पाठक को पहचानें।  अखबारों के नए नियंताओं की निगाहों में उन पाठकों का कोई मोल नहीं जिनकी जेब में बड़े बाजारों में – मॉल्स - में खर्च करने के लिए अतिरिक्त पैसा नहीं है। संपादकों को यह सिखाया जा रहा है कि आप उन पाठकों को लक्ष्य करें जो रंगीन टीवी, फ्रिज, कारें वगैरा खरीद रहें हों।  यदि बाज़ार के ऐसे खरीददार और आपके पाठक एक होंगे तो ही अखबार को बड़े विज्ञापन मिलेंगे। हर साल जब पाठक सर्वे की रिपोर्ट आती है तो अख़बारों में सबसे पहले यही देखा जाता है कि किस अखबार में "हैसियत" वाले पाठकों की संख्या कितनी रही है। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;आम चुनाव का मौसम आता है तब भी वह समय होता है जब कईं अखबार ख़बरों के कारोबार में उतर आते हैं। राजनैतिक पार्टियों और उम्मीदवारों से उनके विज्ञापनों का ही सीधा सौदा नहीं होता बल्कि ‘न्यूज़ कालम’ में छपने वाली विज्ञप्तियों को स्थान देने के लिए भी मोल तय किया जाता है। ऐसे सौदों में पार्टियों का हाथ मरोड़ने के लिए ‘ख़बरों’ को ही हथियार बनाया जाता है। &lt;br /&gt;अभी तक आम लोगों का भरोसा अखबार में छपी ख़बरों पर बना हुआ है इसलिए वे उन पर भरोसा कर लेते हैं और उन्हें पता ही नहीं लगता कि चुनावी कवरेज के नाम पर जो छाप रहा है उससे वे ठगे जा रहे हैं। &lt;br /&gt;पत्रकारिता जगत में एक पुरानी कहावत है जो कभी हर पत्रकार की ज़ुबान पर रहती थी:  "फेक्ट्स आर सेक्रेड, इंटरप्रेटेशन इज माइन"- तथ्य पवित्र हैं मगर उनकी व्याख्या मेरी है। तब अखबारी दुनिया में कहा जाता था "न्यूज़ देट इज फिट टू प्रिंट"। मगर आज के अखबार शायद कहते हैं "न्यूज़ देट इज फिट तो सेल"। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह "फिट टू सेल" सारे झगडे की जड़ है। अखबार पाठकों के लिए नहीं बाज़ार के लिए हो चले हैं। बार बार कहा जाता है कि बाज़ार के भी " मूल्य" होते हैं। मगर बाजारों के उतार-चढाव और घोटालों ने बार-बार यही चेताया है कि बाज़ार का कोई मानवीय चेहरा नहीं होता। दिलचस्प बात यह भी है कि मीडिया ने बड़ी-बड़ी चीजें उजागर कीं है मगर बाज़ार की तरफ अपनी खोजी निगाह कभी नहीं की। बाज़ार से उपकृत होते हुए वह कर भी कैसे सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन दिनों अख़बारों के ‘कंटेंट’ (विषय वस्तु) संपादक नहीं ‘ब्रांड मेनेजर’ तय करते हैं। वे पत्रकारिता और मनोरंजन के बीच की सीमा रेखा को मिटा दे रहे हैं। ब्रांड मेनेजर अखबारों का कलेवर तय करते हुए बताते हैं कि सुबह-सुबह पाठक अखबार में क्या देखना चाहते हैं। वे संपादक से यह भी अपेक्षा करते हैं कि रोज अखबार में कम से कम एक ऐसी चटपटी खबर अवश्य हो जिसकी शहर में दिन भर चर्चा होती रहे। ख़बरों को चटपटा बनाने के लिए ऐसे मसाले डाले जाते हैं जिनका तथ्यों से कोई लेना-देना न हो। ख़बरों में ऐसी मिलावट की आदतें पत्रकारिता को जन सरोकारों से दूर ले जाती है। अख़बारों के नए नियंताओं ने यह भी साध लिया है कि किस प्रकार पाठकों को ऐसे चटपटे मुद्दों पर भटका कर रखा जाय कि वे असली मुद्दों को बिसरा दें। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाठकों के बारे में किसी की टिपण्णी है "रीडर इज नॉट अ किंग। ही इज अ नाइस हिप्पोक्रेट (पाठक कोई शहंशाह नहीं है। वह एक अच्छा पाखंडी है)।" मुक्त बाज़ार जो दिशा देता है अखबार उसी पर चलते हुए जो सामग्री परोसता है वह कईं बार खूब रस लेकर पढ़ी जाती है। पाठक एक तरफ तो ऐसी सामग्री मजे लेकर पढता है और वही बाद में यह आलोचना भी करता है कि अखबार में गंभीरता नहीं रही या वह चलताऊ हो गया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतना सब होते हुए भी सब कुछ ख़त्म नहीं हो गया है. अखबार के सामाजिक सरोकारों की पैरवी करने वालों और उन सरोकारों को अभिव्यक्ति देने वाले संपादकों की कमी नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाठकों की भागीदारी या दबाव अखबारों को सही रास्ते पर चलने पर मजबूर कर सकता है।  मगर उसके लिए पाठक को भी अपनी भूमिका के बारे में सोचना होगा कि क्या वह एक अच्छे अखबार के लिए उसके वाजिब दाम देकर खरीदने को तैयार  है ? यदि वह मुफ्त में या नाम मात्र के दाम पर अखबार चाहता है तो उसे वही मिलेगा जो बाज़ार चाहेगा क्योंकि लागत और बिक्री मूल्य के बीच का अंतर वही भर रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;(यह आलेख प्रेसवाणी के दिसंबर 2011 के अंक में प्रकाशित हुआ)&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5185840046950412717-3635516312764782351?l=itslokayat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itslokayat.blogspot.com/feeds/3635516312764782351/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5185840046950412717&amp;postID=3635516312764782351' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/3635516312764782351'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/3635516312764782351'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itslokayat.blogspot.com/2011/12/blog-post.html' title='झगड़े की जड़ &apos;फिट टू सेल&apos;'/><author><name>Rajendra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S-Gx1DliFGI/AAAAAAAAArU/4OCr_2fmGn8/S220/photo.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5185840046950412717.post-4206181879698195394</id><published>2011-11-26T06:01:00.001-08:00</published><updated>2011-11-26T06:11:36.010-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Commercial'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Capitalism'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Market'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='media'/><title type='text'>सात पीढ़ियों के लिए इंतजाम</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;राजेंद्र बोड़ा &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सारा मीडिया जगत इस बात के इंतजाम करता है कि हम उसकी इस सूचना से इतराएँ कि भारतीय व्यापार और उद्योग की हस्तियां विश्व के सबसे अधिक अमीरों की सूची में स्थान पा रहीं हैं। ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि नई अर्थ व्यवस्था के चलते देश की संपन्नता में इजाफा हो रहा है जिसके लिए सभी को उत्सव मनाना चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सच है कि दुनिया के अमीरों की सूची में शीर्ष स्थानों पर भारत के लोगों के नाम आने लगे हैं और सरकारी तंत्र से जुड़ा, खास कर शहरी इलाकों का, मध्यम वर्ग का एक तबका छठे वित्त आयोग की सिफ़ारिशों के हिसाब से वेतन पाने से वित्तीय संपन्नता से सरोबार हो रहा है और वह विलासिता की चीजों पर खर्च को बढ़ा कर बाज़ार की अपेक्षाओं को पूरा कर रहा है। गावों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना का पैसा पहुंचाया जा रहा है जिससे बाज़ार को मदद मिलती रहे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाज़ार को साध लेने वाला और उसी का होकर रह जाने वाला आज एक पुराने मुहावरे के अनुसार “सात पीढ़ियों का सामान” कर रहा है। आज जिस प्रकार से धन कमाने की लोलुपता बढ़ती जा रही है वह इस मुहावरे को अर्थहीन कर रही है। पहले एक व्यक्ति अपनी आने वाली सात पीढ़ियों के लिए सामान करता था वहीं आज बड़े कार्पोरेशन और बैंक व्यक्तियों के समूहों के लिए सात पीढ़ियों का सामान कर रहे हैं। और ऐसा वे आम जन की जेबें खाली करवा कर करते हैं। गोल्डमेन साक्स का उदाहरण हमारे सामने है। यह बहुराष्ट्रीय कंपनी अब ‘फूड कोमोडिटी’ के काम में लग गई है। जिस बड़े पैमाने पर यह कंपनी सट्टे बाज़ार में उतरी है और उसका खेल खेल रही है उसने दुनिया भर में खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ा दिये है जिसके नतीजे के फलस्वरूप दुनिया में भूख और गरीबी का दानव और विकराल हो गया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाज़ार का खेल खेलने वाली कंपनियाँ पूंजीवादी व्यवस्था की हिस्सा होती है। इसीलिए उसी व्यवस्था के हिसाब से व्यवहार करती है। मुनाफे का अंबार लगाने के लिए लगे रहना इस व्यवस्था की फितरत होती है। पहले व्यक्ति शोषण करता था। अब पूंजीवादी व्यवस्था शोषण का संगठित औज़ार मुहैया करती है। पूंजीवादी व्यवस्था का सबसे बड़ा नियम होता है हर चीज उत्पाद होती है और हर उत्पादन मुनाफा कमाने के लिए होना चाहिए। उसके लिए हर चीज बिक्री के लिए होती है और क्या चीज बनाई जायेगी इसका निर्धारण समाज की आवश्यकता के अनुरूप नहीं होता। उसकी प्रेरणा मुनाफा होती है। इसीलिए मुनाफे की जरूरत के अनुरूप ही उत्पादन होता है। किसी उत्पाद की आवश्यकता उससे होने वाले मुनाफे से ही आंकी जाती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाज़ार के आकर्षण ने समाज में कुछ ऐसा माहौल बना दिया है जिसमें हर एक को लगता है कि पैसे से ही काम होता है और अमीर होने के लिए सिर्फ पैसे की जरूरत होती है। यहां तक कि पूंजीवादी व्यवस्था में सामाजिक रिश्ते भी पैसे की तराजू पर तुलते हैं। बाज़ार यह याद नहीं आने देता कि धन से खुशियां नहीं खरीदी जा सकती। धन से सूचना मिल सकती है ज्ञान नहीं। धन किसी को मकसद नहीं देता, उसे पाना ही मकसद बन जाता है। बाज़ार निर्मित इसी भ्रम में मानवीय मूल्य तिरोहित हो जाते हैं। व्यक्ति स्वकेंद्रित हो जाता है। बाज़ार यह भ्रम भी देता है कि वह व्यक्ति को चुनने की स्वतन्त्रता देता है। इस प्रकार पूंजीवाद एक ऐसा मायाजाल रचता है जिसमें मानव को अपना उत्कर्ष लोभ, लालच और अधिक से अधिक धन संग्रह करने की प्रवत्ति में लगने लगता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिलचस्प बात यह है कि पूंजीवाद को अपने पालन और विस्तार के लिए राज्य सत्ता की आवश्यकता होती है। यही कारण है पूंजीवादी वर्ग सत्ता पर येन केन प्रकरेण सत्ता पर अपना प्रभुत्व बनाए रखता है। विश्व में जब से एक ध्रुवीय व्यवस्था हो चली है पूंजीवाद का शिकंजा और अधिक मजबूत हो चला है। अब राज्य खुले रूप से ऐसी अर्थ व्यवस्था के पोषण और विस्तार के लिए काम करता है जो समूचे समाज को पूंजीवाद के रंग में रंग देना चाहती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राज्य की इस भूमिका को हम बहुत साफ देख सकते हैं। जब कभी यह अर्थ व्यवस्था गंभीर संकट में आती है राज्य उसे बचाने के लिए तुरंत उपाय करता है। उसे संकट से उबारने के लिए राज्य जो उपाय करता है उसकी कीमत समूची मानवता को चुकानी पड़ती है जिससे सबसे अधिक गरीब कुचला जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूंजीवाद का प्रादुर्भाव औद्योगिक सभ्यता के साथ हुआ। जब उत्पादन संगठित क्षेत्र में होने लगा और अधिकतम मुनाफे के लिए श्रम का शोषण एक जरूरत बन गई। इसी के साथ आधुनिक अर्थशास्त्र स्वतंत्र विषय के रूप में स्थापित हुआ। इससे पहले अर्थशास्त्र दर्शन शास्त्र का ही हिस्सा हुआ करता था। तब अर्थ के साथ जीवन के नैतिक सबब की बात भी होती थी। जीवन का नैतिक सबब खुशी पाना होता है। हर एक के अपने जीवन मूल्य होते हैं जिन्हें पाना सच्ची खुशी होती है। पूंजी की व्यवस्था इस खुशी को बाज़ार के हित में परिभाषित करती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवन दर्शन से अर्थ को अलग करके पूंजीवाद के समर्थकों ने पश्चिम में उसे व्यक्तिवादी बना दिया। धर्म जो समाज में ‘सम’ की अवधारणा पुष्ट करता था उसे भी नए पूंजी समर्थित अर्थशास्त्र ने संकुचित कर मुनाफे के लिए व्यवसाय बना दिया। उसे प्रतिस्पर्धी बना दिया। यहां तक कि इस युग में खुद पूंजीवाद एक प्रकार का धर्म बन गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले के धर्म कहते थे अपने लिए नहीं दूसरे के लिए जियो। दूसरे की मदद करो। जीवन का मकसद सच्ची खुशी वह होती है जो दूसरे के चेहरे पर मुस्कराहट लाने से मिलती है। मगर आज का पूंजीवाद का धर्म कहता है जो करो अपने के लिए करो। अपना हित साधना ही सर्वोच्च मूल्य है। इसमें धन को बढ़ाने की लालसा, लोभ, और लालच कोई बुरी बात नहीं है। पहले जो-जो जीवन मूल्य अवगुण माने जाते थे वे ही आज मानव के लिए श्रेष्ठ गुण बन गए हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोकतन्त्र में सरकारें भले ही उनके बहुमत से चुनी जाती हो जिनका पूंजी शोषण करती है मगर निर्वाचित प्रतिनिधि पूँजीपतियों की जेब में ही रहते हैं और उन्हीं के कार्य साधते हैं और सरकारें आम जन की होकर भी गणशत्रु के रूप में प्रस्तुत होने लगतीं हैं। उसकी सारी नीतियां और सारे कार्यक्रम “जनहित” के लिए होते हैं। बाज़ार को बढ़ावा भी जनहित के नाम पर ही दिया जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतना पैसा कमाने के लिए कि सात पीढ़ी का जतन हो जाये लालच, लोभ और वैसी ही महत्वाकांक्षा की जरूरत होती है। नई अर्थ व्यवस्था की नीतियां इसके लिए नैतिक आधार देती है, भरमाती हैं। संचार के माध्यम व्यवसायजनित होकर मुनाफे के लिए होते          हैं इसलिए वे सारा जतन यह करते हैं कि किस प्रकार व्यक्ति को इसके लिए लुभाया जाय। वे लोगों के इस भरोसे का फायदा उठाते हैं कि संचार के माध्यम व्यावसायिक होने पर भी उनकी बात करते हैं, उनकी आवाज होते हैं और उनके लिए लड़ते हैं। वास्तव में वे राज्य की भूमिका के बारे में कोई गंभीर और गहरे सवाल नहीं उठाते आयें और न ही ऐसी कोई बहस छेड़ने में रुचि दिखाते हैं। सतही मुद्दों पर जोरदार बहस प्रस्तुत कर अपने जनहितकारी होने का ढोंग वे जरूर रचते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूंजी की शक्तियां आज विजेता है और गरीब की हालत बद से बदतर हो रही है। एक व्यक्ति राष्ट्रीय संपत्ति का जो हिस्सा अपनी अमीरी के इजाफे के लिए लेता है वह ऐसा किसी न किसी को गरीब करके ही करता है। गरीब का जब धीरज खत्म होता है तो वह अपराध की और प्रवत्त होता है। ऐसे में उस गरीब का शोषण कभी आतंकी राजनैतिक विचारधारा के पोषण के लिए तो कभी संकीर्ण धार्मिक प्रसार के लिए होने लगता है। ऐसे माहौल में खुशी पाने का जीवन का नैतिक सबब मृग मरीचिका बन जाता है क्योंकि जब चारों ओर दुख का वातावरण हो तब कोई अपनी अट्टालिका में बैठा खुशी कैसे पा सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूंजी आज इस हद तक सफल है कि सारे ही राजनैतिक दल अपनी मूल विचारधाराओं से च्युत होकर सत्ता पाने की होड में लगे हैं ताकि उनके नायक अपनी सात पीढ़ियों के लिए धन संचय कर सकें। राजनीति में लोग जन सेवा के लिए नहीं अपनी और अपनों की सेवा के लिए आते हैं। लोकसेवा का तंत्र इन्हीं नायकों के लिए होकर रह गया है। संविधान का आमुख और उसके प्रावधान कागजों पर रह गए हैं। संविधान के नीति निर्देशक तत्वों को तो पूरी तरह भुला दिया गया है। आज के बच्चों से पूछें कि संविधान के दस्तावेज़ में नीति निर्देशक तत्व भी शामिल हैं, क्या वे जानते हैं? तो इसका जवाब उनकी आँखों के सवालिया निशान ही होगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;(प्रेसवाणी के नवंबर 2011 के अंक में प्रकाशित आलेख&lt;/span&gt;)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5185840046950412717-4206181879698195394?l=itslokayat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itslokayat.blogspot.com/feeds/4206181879698195394/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5185840046950412717&amp;postID=4206181879698195394' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/4206181879698195394'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/4206181879698195394'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itslokayat.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='सात पीढ़ियों के लिए इंतजाम'/><author><name>Rajendra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S-Gx1DliFGI/AAAAAAAAArU/4OCr_2fmGn8/S220/photo.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5185840046950412717.post-4940298125728412065</id><published>2011-07-28T09:47:00.000-07:00</published><updated>2011-07-28T09:54:44.617-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Hakra'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Sindhu'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Desert'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='water'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='rajasthan'/><title type='text'>कराख रो तो जल भलो: मगर जल से रिश्ता फिर कैसे बने</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;राजेन्द्र बोड़ा&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सदियों से राजस्थान के लोग पानी की कमी का सामना करते रहे हैं। एक तो यहां का गर्म जलवायु, दूसरी तरफ वर्षा की हमेशा कमी और तीसरे कोई बारहमासी नदी नहीं होना। साथ ही बड़ा भू भाग रेगिस्तानी या अर्द्धशुष्क। मगर प्रकृति से मिली ऐसी कठोर परिस्थितियों में भी यहां जो कला, संस्कृति, तथा जीवन शैली पल्लवित हुई और मानवीय मूल्यों का विकास हुआ वह अनोखा है। यहां के लोगों ने प्राकृतिक विपदा में भी अपने जीवन को उत्सव बनाया। अपने अनुभवों से उन्होंने प्रकृति से सहकार करना सीखा और पीढ़ी दर पीढ़ी अपने अनुभवों से नया ज्ञान पाने और उसे आगे बढाने की परंपरा डाली। जहां वर्षा के देवता इंद्र की मेहरबानी कम होती हो वहां संस्कृति, सामाजिक ढांचा और परंपरा कम पानी में गुजारा करना सिखाते हैं और वैसे ही मानवीय मूल्य प्रतिष्ठित करते हैं। राजस्थान के लोगों ने कभी पानी की कमी का रोना नहीं रोया। जितना प्रकृति ने दिया उसी को प्रसाद मान कर शिरोधार्य किया। हालांकि पानी की कमी से होने वाली मानवीय तकलीफें यहां के लोक गीतों और संगीत में गूंजी मगर वे दुःख के नहीं उत्सव के स्वर थे।    &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महाभारत युद्ध जब समाप्त सोने को होता है तब का एक प्रसंग लोक कथाओं में आता है।  कहते हैं इस रेतीली धरती के लोगों को श्रीकृष्ण ने वरदान दिया कि उनके यहां कभी जल का अकाल नहीं रहेगा। यहां के लोगों ने अपने परिश्रम और बुद्धि से कृष्ण के उस वरदान को झूठा नहीं होने दिया। उन्होंने गांव-गांव, शहर-शहर वर्षा के जल को सहेज कर रखने के खोजे और उन्हें व्यावहारिक स्तर पर अपनी जीवन शैली का अंग बनाया। इसमें सबसे बड़ी खूबी यह थी कि मरू भू-भाग के भिन्न-भिन्न अंचलों में वहां की परिस्थितियों के अनुकूल जल संरक्षण की तकनीकें खोजी गईं और अपनाई गईं। आज जैसा नहीं हुआ कि कोई एक किताबी तकनीक सब जगह प्रचलित कर दी गई हो। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक लोक कथा मारवाड़ में प्रचलित है जिसमें एक ज्ञानी और एक सरल ग्वाले के बीच संवाद है। ज्ञानी कहता है : &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सूरज रो तो तप भलो/नदी रो तो जल भलो&lt;br /&gt;भाई रो तो बल भलो/ गाय रो तो दूध भलो          &lt;br /&gt;चारूं बातों भले भाई/ चारूं बातों भले भाई &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज्ञानी रेगिस्तान में नदी की – किताबी ज्ञान – की बात करता है। रेगिस्तान में कभी नदी रही होगी यह किताबी ज्ञान है। उसका मरू प्रदेश के लोगों के जीवन में आज क्या महत्व। उसकी और बातें भी ऐसे ही किताबी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सीधा-सरल ग्वाला उत्तर देता है: &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आंख रो तो तप भलो/कराख रो तो जल भलो&lt;br /&gt;बाहु रो तो बल भलो/मां रो तो दूध भलो &lt;br /&gt;चारूं बातों भले भाई/ चारूं बातों भले भाई &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह कहता है आंख रो तो तप भलो याने जीवन में अनुभव ही काम आता है। पानी कराख का मतलब कंधे पर लटकी सुराही का, बल अपनी भुजा का ही काम आता है। और दूध तो मां का ही श्रेष्ठ होता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मरुस्थल के सीधे सरल लोगों ने अपने अनुभव से जो सीखा उसे परंपराओं ने आगे बढ़ाया कि वर्षा के पानी की एक-एक बूंद कैसे सहेजी जाये और कैसे पानी के साथ खिलवाड़ नहीं किया जाये। एक छोटा सा उदाहरण इसे प्रमाण देता है। पहले जब जमीन पर बैठ कर भोजन करते थे तो पास में पड़े पानी के लोटे के ठोकर नहीं लग जाये इसकी सीख बार-बार बच्चों को दी जाती थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किताबी ज्ञान और अनुभव के तप में क्या फर्क है यह जानने के लिए मरुस्थल की जल संरक्षण की परंपराओं को देखना होगा। हमारा सारा आधुनिक किताबी ज्ञान हमें सबक देता है “बहता पानी निर्मला”। साफ और स्वस्छ पानी वही होता है जो बहता हुआ होता है। ठहरा हुआ पानी गंदा होता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर मरू समाज का परम्परागत जल संरक्षण का सैकड़ों वर्षों का इतिहास – अनुभव, या कहें आँख का तप, ठहरे पानी का गंदे होने का किताबी ज्ञान झुठला देता है। वर्षा के पानी को – जिसे मरू वासियों ने पालर पानी का नाम दिया – ठहरा कर कुई में, टांके में खडीन में, नाड़ी में सहेज कर अगली वर्षा होने तक अपना काम चलाया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैज्ञानिक कहते हैं कि मानव सभ्यता के ऐतिहासिक प्रमाणों की गणना के हजारों वर्ष पहले आज का जो मरू भूभाग है वहां कभी समंदर ठाटे मारता था। अनोखी बात यह है कि उस विशाल जल फैलाव “हाकड़ो” की स्मृति आज भी जन मानस में है। इसका जवाब वैज्ञानिकों के पास नहीं है कि हाकड़ो के सूख जाने के बाद यहां सभ्यता पनपी तो समंदर जन मानस की स्मृति में कैसे आया? डिंगल भाषा में समुद्र या सागर और उनके दर्जनों पर्यायवाची शब्द आते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सागर की अपनी इस स्मृति का जिक्र यहां की लोक कथाओं या लोक गीतों में विछोह के रूप में नहीं आता है। प्रकृति से शिकायत के तौर पर नहीं आता है। एक ऐसे सपने और विश्वास की तरह आता है कि फिर हाकड़ो का अस्तित्व बनेगा और संपन्नता आएगी :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हक कर बहसे हाकड़ो, बंद तुट से अरोड &lt;br /&gt;सिंघड़ी सूखो जावसी, निर्धनियों रे धन होवसी &lt;br /&gt;उजड़ा खेड़ा फिर बससी, भागियो रे भूत कमावसी &lt;br /&gt;इक दिन ऐसा आवसी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शोधकर्ता भले ही पिछले सौ बरसों से यह जानने की माथापच्ची करते रहें हों कि हाकड़ो समुद्र था या नदी थी। यदि नदी थी तो सिंधु नदी से या वैदिक सरस्वती नदी से उसका क्या संबंध बनाया जाय। मगर मरुस्थल के वासियों के मनों में हाकड़ो एक ऐसी याद है जिसके सहारे उन्होंने अपनी परिस्थितियों के अनुरूप पानी के संरक्षण की ऐसी जुगत की जो परंपराओं से निखरती गई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर हमारा यह लोक-ज्ञान स्कूल कॉलेजों की किताबों में स्थान नहीं पा सका। देश के आज़ाद होने के बाद भी ‘लोक’ को हिकारत से पिछड़े की तरह देखा गया और नई पीढ़ियों को जो किताबों में पढ़ाया गया उसने हमारी इस लोक परंपरा की इबारत को पोंछ डाला। विकास की आधुनिक पाश्चात्य अवधारणा ने आज़ादी के बाद धीरे-धीरे उन सब परम्परागत जल संरक्षण की व्यवस्थाओं को नष्ट कर दिया और मरुस्थल को गरीब बना दिया। किफायत पर लालच हावी हो गया। यहां पर वे सब प्रयास किए गए जो यहां की माटी और प्रकृति के अनुरूप नहीं थे। प्रकृति पर विजय पा लेने के विचार का दंभ था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्ष 1950-51 में पश्चिमी राजस्थान की करीब 78 लाख हेक्टेयर भूमि पर खेती होती थी। इसमें से 363 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में खेती सिंचाई से होती थी जो अधिकतर उसे उत्तरी भाग में नहरों से होती थी। शेष खेती वर्षा पर आधारित थी। खेती के लिए भूमिगत जल का उपयोग बहुत कम था जो क्यों कि तब बिजली या डीजल से चलने वाले पंप नहीं थे। &lt;br /&gt;यह दृश्य पिछली सदी के सत्तर के दशक के शुरू में तब बादल गया जब सरकार ने ग्रामीण विद्युतिकरण को जबर्दस्त बढ़ावा देना शुरू किया। यह वह समय था जब पड़ोसी पंजाब में हरित क्रांति का परचम फैल रहा था। आधुनिक किताबी ज्ञान ने नीति निर्माताओं और निर्वाचित कर्णधारों ने मरू भूमि में भी ऐसी ही हरित क्रांति कर देने का सपना जगाया। वर्ष 1980 के आते राज्य का कृषि क्षेत्र बढ़ कर 10.09 मिलियन हेक्टेयर हो गया जिसमें से 1.39 मिलियन हेक्टेयर सिंचित क्षेत्र हो गया। वर्ष 2005 तक कुल कृषि क्षेत्र तो मामूली बढ़ कर 10.94 मिलियन हेक्टेयर हुआ मगर सिंचित क्षेत्र बढ़ कर 2.77 मिलियन हो गया। कह सकते हैं कि राजस्थान नहर जो आई। लेकिन राज्य के कुल सिंचित क्षेत्र का 43 प्रतिशत ही नहरी तंत्र से सिंचित होता है जबकि 57 प्रतिशत सिंचाई बिजली और डीजल से चलने वाले ट्यूबवैलों से पानी खींच कर भूगर्भ से होने लगी। इफ़रात की इस सिंचाई पद्धति में अच्छे प्रबंधन पर भी ध्यान देने की जरूरत नीति निर्माताओं ने नहीं समझी। आज राज्य में उपलब्ध पानी का 94 प्रतिशत उपयोग खेती के लिए होता है। पीने के पानी या घरेलू उपयोग के लोए पानी की खपत केवल चार प्रतिशत है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रकृति ने इस धरती को कभी कृषि के लिए उपयोग में लाने की मंशा नहीं जताई। इसके बदले उसने यहां के लोगों के लिए चरागाहों, घनी झाड़ियों और बीच-बीच में ऐसे जंगलों की व्यवस्था की जहां विभिन्न प्रजाति के पेड़ों की सौगात दी जो रेत के धोरों को थामे रख सके। खेजड़ी, बबूल, कैर नीम, जाल, और बोरडी जैसे पेड़ों ने न केवल यहां प्राकृतिक दृश्यों की छटा बढाई बल्कि इंसान और जानवर दोनों के लिए उपयोगी भी बने। यहां प्रकृति ने जो बहुतायत में घास दी वह भरपूर पोषण करने वाली थी। मामूली पांच इंच वर्षा में वह पनप जाती है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर सारे आगोर, चरागाह और घास की भूमि आधुनिक विकास की भेंट चढ़ गई। कृषि के अप्राकृतिक ज़ोर से भूमि के गर्भ के पानी का ऐसा दोहन शुरू हुआ कि आज पीने के पानी की त्राहि-त्राहि मची हुई है। जिस सीमा तक भूगर्भ का जल स्तर नीचे चला गया है। उसका सामान्य वर्षा से पुनर्भरण असंभव है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आधुनिक विज्ञान के समझदार विशेषज्ञ अपने नए अध्ययनों में इस प्रकृति विरोधी विकास को रेखांकित करते रहे हैं। वे यहां घनी सिंचाई की व्यवस्था को रोकने, भूमि को कृषि से मुक्त करने, उसकी जगह फलों के बगीचे लगाने, पशुपालन को बढ़ावा देने, ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत काम में लेने, और राजस्थान नहर के तंत्र को पीने के पानी के लिए उपयोग में लेने का सुझाव देते हैं।  इसी के चलते तत्कालीन राजस्थान नहर मंत्री नरेन्द्र सिंह भाटी ने राजस्थान नहर परियोजना के दूसरे चरण में क्रांतिकारी बदलाव लाने के प्रस्ताव का एक नोट तैयार करके सार्वजनिक तौर पर जारी किया था। भाटी मारवाड़ क्षेत्र के ओसियां से विधानसभा में निर्वाचित सदस्य थे। उनका यह नोट पर आधुनिक किताबी ज्ञान वालों ने तो असहमति का रुख रखा मगर सदन में हुई चर्चा के दौरान मारवाड़ से आए सभी प्रतिनिधियों ने शासन से कहा कि वह इस पर ध्यान दे क्योंकि यही समझदारी का रास्ता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जोधपुर में स्थित केन्द्र सरकार के संस्थान एरिड ज़ोन रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिक वर्षा के पानी को बड़े पैमाने पर सहेजने के उपाय सुझाते रहे हैं। मगर नीति निर्धारकों को उनकी राय को जानने और उस पर मनन करके काम करने की कभी फुर्सत नहीं मिली। उनके ये सुझाव इस धरती की परंपराओं को ही आगे बढ़ाने वाले है। परंपरा कभी ठहरती नहीं। नए अनुभव और ज्ञान की धाराएं उसमें मिलकर उसे समृद्ध बनाती है। धरती की कोख से जिस निर्ममता से हम पानी निकाल रहे हैं उसकी भरपाई के लिए वैज्ञानिक सुझाते हैं कि वर्षा में धरती पर बरसा पानी जो कैचमेंट एरिया से बह कर चला जाता है उसे सहेजने की जरूरत है। इसके लिए नई यंत्र तकनीकें भी वैज्ञानिकों ने विकसित की है। पता नहीं कब नीति निर्धारकों का ध्यान उधर जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक सच्चाई हमें समझनी होगी कि राजस्थान मूलतः शुष्क और अर्ध शुष्क मौसमी तंत्र का भाग है जहां वर्षा कम होती है और जहां कोई बारहमासी नदी नहीं बहती और थार रेगिस्तान में वर्षा का पानी ही पीने के पानी का प्राथमिक स्रोत है। यह समझ हमें हमारी परंपराओं से मिलती है। परंपराओं से कट कर विकास की अवधारणा ने हमारी बहुत सी समस्याओं को जन्म दिया है। जिस पंजाब को हमने रोल मॉडल माना वहां भी खेती आज संकट में है क्योंकि वहां भी लोग प्रकृति से अपनी रिश्तेदारी का लिहाज भूल गए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विकास के जिस दौर से गुजर कर हम आज जहां पहुंच गए हैं वहां से कैसे लौटें और इस भूमि यहाँ के जलवायु की प्रकृति के अनुरूप कैसे अपना रास्ता बनायें यही यक्ष प्रश्न है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;('स्वर सरिता' के जुलाई 2011 अंक में प्रकाशित आलेख)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5185840046950412717-4940298125728412065?l=itslokayat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itslokayat.blogspot.com/feeds/4940298125728412065/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5185840046950412717&amp;postID=4940298125728412065' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/4940298125728412065'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/4940298125728412065'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itslokayat.blogspot.com/2011/07/blog-post_28.html' title='कराख रो तो जल भलो: मगर जल से रिश्ता फिर कैसे बने'/><author><name>Rajendra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S-Gx1DliFGI/AAAAAAAAArU/4OCr_2fmGn8/S220/photo.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5185840046950412717.post-4940234744773300998</id><published>2011-07-26T08:33:00.000-07:00</published><updated>2011-07-26T08:40:58.248-07:00</updated><title type='text'>प्रवीणजी भाई साहब : आध्यात्मिक गहराई से लेखन करने वाले पत्रकार</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-C0dsxve21WA/Ti7e5pmVVGI/AAAAAAAAAvw/sQsgkZmWXeE/s1600/Praveenji.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 214px; height: 320px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-C0dsxve21WA/Ti7e5pmVVGI/AAAAAAAAAvw/sQsgkZmWXeE/s320/Praveenji.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5633685265887614050" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;राजेंद्र बोड़ा &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजस्थान के पत्रकार जगत में एक नाम अपनी अलग पहचान रखता है और विशिष्ठ स्थान भी रखता है। यह नाम है प्रवीण चंद छाबड़ा। अपने दोस्तों और सहयोगियों के बीच गहरे अपनत्व से प्रवीण जी भाई साहब के नाम से पुकारे जाने वाले प्रवीण चंद छाबड़ा उन पत्रकारों में से हैं जो  देश की आज़ादी और वर्तमान राजस्थान के बनने से पहले से सामाजिक क्षेत्र और पत्रकारिता  में  सक्रिय हैं। यह हमारा सौभाग्य हैं कि पैसठ सालों की सक्रिय पत्रकारिता और सामाजिक क्षेत्र के कामों  के अपने गहरे अनुभव रखने वाले प्रवीण जी भाई साहब का सानिध्य और आशीर्वाद आज उनके 82वें जन्म दिन पर हमें प्राप्त है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रवीण जी भाई साहब ने राजस्थान का निर्माण होते हुए ही नहीं देखा है बल्कि उसके बनने की प्रक्रिया और उस के बाद से अब तक का समूचा राजनैतिक घटनाक्रम पत्रकार के रूप में बहुत नज़दीक से और बहुत गहराई से देखा है। इसीलिए आप नए राजस्थान बनने की राजनीतिक प्रक्रिया को समझने और उसे विश्लेषित करने की दृष्टि पाने में नयी पीढ़ी के पत्रकारों को रोशनी दिखाने में सक्षम हैं।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रवीण जी के लेखन में एक अद्भुत आध्यात्मिक गहराई है। इसलिए कई लोगों को लगता है जैसे वे अपनी बात सूत्रों में कह रहे हों। पत्रकारिता के लेखन से भी अधिक महत्वपूर्ण उनका भगवान महावीर और जैनत्व के विभिन्न आयामों पर उनका लेखन है जो उन्हें जैन दर्शन के अद्भुत मनीषी के रूप में उन्हें प्रतिष्ठित करता है। वास्तव में जैन धर्म और आद्यात्मिक विषयों पर अपने लेखन में वे जिस प्रकार और जितना गहरे उतरे हैं वह किसी सांसारिक व्यक्ति के लिए आसान नहीं है। मगर वे अपने लेखन में जितने गहरे और गंभीर होते हैं अपने सामान्य व्यवहार में उतने ही सरल, हर एक से दोस्ती कर लेने वाले होते है। उनके लिए कोई त्याज्य नहीं है। वे सबके साथ रहना चाहते हैं। मगर अपना अलग व्यक्तित्व भी चाहते है। वे उनमें नेतृत्व की अद्भुत क्षमता है और दूसरों के हित में हमेशा तत्पर रहते है। मगर समूह का नेतृत्व करते हुए भी बे सामान्य कार्यकर्ता के रूप में बने रहने का भी बड़ा आग्रह रखते है। यह अंतर्विरोध दूसरे नहीं समझ पाते। इसी अंतर्विरोध के कारण शायद उन्हें जो होना चाहिए वैसा नहीं हो पाते।     &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;26 जुलाई 1930 को एक संभ्रांत जैन परिवार में जन्मे प्रवीण जी भाई साहब की साहित्य और राजनीति में शुरू से ही रुचि रही है। सन 1952 में आपने ‘जय भूमि’ अख़बार में उप संपादक के रूप में पत्रकारिता की यात्रा शुरू की जो अब तक अनवरत जारी है। 1953-54 में आपने साप्ताहिक ‘भारत’ का प्रकाशन और संपादन किया। 1954 में आप कलकत्ता चले गए जहाँ ‘दैनिक विश्वामित्र’ और दैनिक ‘लोकमान्य’ के सम्पादकीय विभागों में काम किया। 1956 में आप पुनः जयपुर आ गए और ‘लोकवाणी’ के उप संपादक और नगर संवाददाता रहे। 1974-75 में आप ‘समाचार भारती’ के जयपुर ब्यूरो प्रमुख बने और बाद में समाचार भारती के चंडीगढ़ और कलकत्ता के ब्यूरो प्रमुख रहे। आप राजस्थान पत्रिका के हरियाणा संस्करण 'हरियाणा पत्रिका' के संपादक भी रहे।  &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;प्रवीण जी भाई साहब की रचनात्मक सामाजिक कार्यों में भी भरपूर रुचि रही है। आपके निश्छल और निष्पक्ष स्वभाव के कारण ही जैन समाज के प्रमुख मुनि देशभूषण जी ने आपको दिगंबर जैन समुदाय के अतिशय क्षेत्र चूलगिरी की व्यवस्थापन समिति का संरक्षक बनाया। ऐसी पुण्यवानी विरलों को ही मिलती है। आप जैन समाज की अन्य कई सामाजिक और शैक्षणिक संस्थाओं से जुड़े हैं। गांधी के दर्शन से सरोबार प्रवीण जी भाई साहब सर्वोदय साहित्य समाज जयपुर के संस्थापक सदस्य रहे है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्री छाबड़ा राजस्थान श्रमजीवी पत्रकार संघ के संस्थापक सदस्यों में से है और इसके महामंत्री रह चुके है। आपके नेतृत्व में पत्रकारों ने बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ लड़ी हैं। आप 1964 से 1969 तक भारतीय श्रमजीवी पत्रकार महासंघ की कार्यसमिति के सदस्य रहे तथा वर्तमान में आप महासंघ के सर्वसम्मति से निर्वाचित उपाध्यक्ष हैं। 1963 में विएना में आयोजित पत्रकारों के विश्व सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व किया तथा रूस सहित कईं भूमध्य सागरीय देशो की यात्रा की और वहाँ की पत्रकारिता का अध्ययन किया।    &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप द्वारा भगवान महावीर और जैन धर्म दर्शन पर लिखी पुस्तकें जैन साहित्य में प्रमुख स्थान रखतीं हैं। आपने अहिंसा पर एक वृहद ग्रंथ का संपादन भी किया जो अपने अंदर एक अनूठा उपक्रम हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्री प्रवीण चंद छाबड़ा  अपने जीवन के 81 वर्ष पूरे कर 82 वें वर्ष में प्रवेश कर रहें हैं. इस मंगल अवसर पर राजस्थान के पत्रकारिता जगत के सभी साथियों की तरफ से यही मंगलकामना  है  कि आप शतायु हों। आपकी चिर बालपन की सौम्य शैली बनी रहे और हम सभी आपका मार्गदर्शन हमेशा पाते रहें।  &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;राजधानी के पत्रकारिता जगत को उन्हीं के सक्रिय प्रयासों से प्रेस क्लब का तोहफा मिला। इस क्लब को बनाने में आपने सबसे अहम् भूमिका निबाही। उन्हीं की सक्रियता ने इस क्लब के सपने को हकीकत में बदला। उन्ही की बदौलत वे सारी प्रशासनिक बाधाएं पार की जा सकी  जिससे क्लब के लिए मौजूदा स्थान सरकार से मिल सका। क्लब को अस्तित्व में लाने के लिए भिन्न मतों वालो को एक साथ बिठाना, क्लब का संविधान बनाना, उसे पंजीकृत कराना और उसके पहले खातों का आडिट कराना यह सारा काम आपने अपने प्रयत्नों से किया और पत्रकारों को इस क्लब की सौगात दी जिसके लिए लिए समूचा पत्रकार जगत उनका सदैव ऋणी रहेगा।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपके जन्म दिन पर आज पत्रकार जगत उनके शतायु होने की मंगलकामना करता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;(दैनिक समाचार पत्र 'सीमा संदेश' के 25 जुलाई 2011 के अंक में प्रकाशित)&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5185840046950412717-4940234744773300998?l=itslokayat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itslokayat.blogspot.com/feeds/4940234744773300998/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5185840046950412717&amp;postID=4940234744773300998' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/4940234744773300998'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/4940234744773300998'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itslokayat.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='प्रवीणजी भाई साहब : आध्यात्मिक गहराई से लेखन करने वाले पत्रकार'/><author><name>Rajendra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S-Gx1DliFGI/AAAAAAAAArU/4OCr_2fmGn8/S220/photo.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-C0dsxve21WA/Ti7e5pmVVGI/AAAAAAAAAvw/sQsgkZmWXeE/s72-c/Praveenji.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5185840046950412717.post-4839452833132651038</id><published>2011-06-26T17:50:00.000-07:00</published><updated>2011-06-26T17:58:27.675-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Music'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Daan Singh'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='rajasthan'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='My Lve'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Bhool Na Jaana'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Bollywood'/><title type='text'>संगीतकार दान सिंह : पुकारो मुझे नाम लेकर पुकारो</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-0xaqQyYfb_o/TgfUclOQGDI/AAAAAAAAAvo/Vfb3swY1lsg/s1600/Daan%2BSingh.JPG"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 229px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-0xaqQyYfb_o/TgfUclOQGDI/AAAAAAAAAvo/Vfb3swY1lsg/s320/Daan%2BSingh.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5622696247288666162" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;राजेंद्र बोड़ा&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुंबई की सिने मायावी नगरी में केवल प्रतिभा के बूते सफलता हासिल नहीं होती। यहां भोलेपन के लिए कोई जगह नहीं। क्षूद्र ईर्षाओं, समूहों के हितों और फरेबी लोगों की भीड़ के बीच अपना स्थान बनाने के लिए यदि किसी में व्यावहारिक ज्ञान और चालाकी नहीं है तो बॉलीवुड की दुनिया उसे झटके से दूर फेंक देती है। हीरे ठुकरा दिये जाते हैं। संगीत का ऐसा ही एक नायाब हीरा पिछले दिनों संसार से चला बसा। जबर्दस्त प्रतिभा के धनी संगीतकार दान सिंह की हिन्दी सिने जगत ने उपेक्षा करके अपना ही नुकसान किया। पिछली सदी के साठ के दशक में मुंबई सिने संगीत में स्थान बनाने की जद्दोजहद करने के बाद अपने घर जयपुर लौट आए। मगर मुंबई को अलविदा कहने से पहले उन्होंने अपनी काबिलियत की जो झलक दिखाई उस पर हिंदुस्तानी फिल्म संगीत हमेशा नाज़ करेगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;याद कीजिये रिलीज न हो सकी फिल्म ‘भूल ना जाना’ का मुकेश का दर्दीले सुरों में गाया ‘गमे दिल किससे कहूं कोई गम ख़्वार नहीं’ या फिर जयपुर के ही हरिराम आचार्य का लिखा सोज़ में डूबा बड़ा ही खूबसूरत, गीता दत्त की सुरीली झंकार वाली आवाज़ में गाना ‘मेरे हमनशीं मेरे हमनवां मेरे पास आ मुझे थाम ले। गुलज़ार का लिखा यह गीत भी कौन सा कम पड़ता है ‘पुकारो मुझे नाम लेकर पुकारो मुझे तुमसे अपनी खबर मिल रही है’।  पचास साल बाद आज भी दान सिंह के संगीत के इन मोतियों की चमक फीकी नहीं पड़ी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चमक तो बॉक्स ऑफिस पर असफल रही शशि कपूर, शर्मिला टैगोर अभिनीत फिल्म ‘माई लव’ (1970) के गानों की भी जरा भी फीकी नहीं पड़ी है। गज़ल शैली में आसावरी थाट के सुरों में पिरोया गाना ‘जिक्र होता है जब कयामत का तेरे जलवों की बात होती है’और गिटार के तारों की झंकार पर तैरता गीत ‘वो तेरे प्यार का गम एक बहाना था सनम अपनी किस्मत ही कुछ ऐसी थी के दिल टूट गया’। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुंबई में इस भोले संगीत कार का दिल बहुतर टूटा मगर यह उनकी खूबी थी कि ता उम्र कभी किसी का गीला शिकवा नहीं किया। हमेशा यही कहते थे “मन चाहा किसी को मिलता भी नहीं है”। सिने नगरी में महफ़िलें जमती जहां दान सिंह अपनी नई-नई धुनें उत्साह से सुनाते। मगर वे बॉलीवुड की रीत नहीं जानते थे इसीलिए लुट गए।   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संस्कृत और हिन्दी के बड़े हस्ताक्षर हरिराम आचार्य उनके बड़े करीबी रहे। वे बताते हैं कि ‘खानदान’ फिल्म के गीत ‘तुम्हीं मेरे मंदिर तुम्हीं मेरी पूजा तुम्हीं देवता हो’ की धुन वास्तव में दान सिंह जी की कंपोजीशन थी जिसे उन्होंने एक महफिल में सुनाया जूसमें बॉलीवुड के बड़े बड़े संगीतकार भी मौजूद थे। एक बड़े संगीतकार ने दूसरे दिन इस धुन को अपने गाने में ढाल दिया। चुराकर कॉपी किए गए संगीत को फिल्म फेयर अवार्ड भी मिला, पर क्रेडिट दान सिंह को नहीं मिला। इसी प्रकार भूल न जाना के लिए गीत चंदन सा बदन चंचल चितवन को दान सिंह ने कंपोज किया, लेकिन बाद में यह गीत सरस्वती चंद्र में शामिल कर लिया गया और क्रेडिट किसी और को गया। दान सिंह फिल्म लाइन में इसलिए नहीं ठहर सके क्योंकि वे वहां की धोखाधड़ी में स्वयं को ढाल नहीं पाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दान सिंह के जीतने भी फिल्मी गाने आज आज हमारी थाती हैं उनमें अधिकतर मुकेश के गाये हुए है। उन्होंने एक बार कहा “मुकेश में कलाम की समझ थी इसलिए उनके स्वरों में गाने का मर्म उभर आता था”। मगर ‘भूल न जाना’ के लिए उन्होंने देशभक्तिपूर्ण एक काल जयी गाना मन्नाड़े से क्या खूब गवाया ‘बही है जवां खून की एक धारा उठो हिन्द की सरजमीं ने पुकारा’। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुर्भाग्य ने हमेशा उनका पीछा किया। फिल्म डिवीजन के भास्कर राव तथा निर्देशक शांताराम अठवाले ने उन्हें फिल्म ‘रेत की गंगा’में स्वतंत्र संगीतकार के रूप में पहली बार चांस दिया मगर फिल्म पर्दे पर नहीं आ सकी। ‘भूल न जाना’ क्योंकि चीनी आक्रमण पर बनी थी तो भारत सरकार ने अड़ंगा लगा दिया की चीन के साथ संबंध सुधारने के प्रयास चल रहे हैं इसलिए फिल्म रिलीज नहीं हो सकती। फिल्म ‘मतलबी’ के लिए दान सिंह ने दो गाने टेक कर लिए मगर फिल्म पूरी नहीं हो सकी। ‘बहादुरशाह ज़फर’ बननी शुरू हुई मगर पूरी नहीं हो सकी। केवल दो फिल्में ‘माई लव’ और ‘तूफान’ (1969) रिलीज़ हुई मगर चली नहीं।  दारा सिंह अनीता अभिनीत ‘तूफान’ की तो किसी को कुछ भी याद नहीं बस दान सिंह का स्वरबद्ध किया तेज रिदम वाला मुकेश और आशा भोसले का गाया ‘हमने तो प्यार किया प्यार प्यार प्यार’की आज भी चर्चा हो जाती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिन्दी फिल्मों के संगीतकारों पर बड़ा ग्रंथ ‘धुनों की यात्रा’ लिखने वाले पंकज राग की दान सिंह पर यह टिप्पणी सटीक है कि “प्रतिभा के साथ किस्मत का होना भी हमारे फिल्म जगत में बहुत ज़रूरी है, और एक ऐसा संगीतकार जिसके पास किसी का वरद हस्त न था, फिल्मी दुनिया के षड्यंत्रों और तिकड़मों के सामने टिक न पाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिन्दी फिल्म वालों से वे भले ही उमेक्षित रहे हों मगर अपने संगीत की छाप उन्होंने आकाशवाणी के लिए काम करते हुए खूब छोड़ी। आकाशवाणी के लिए हिन्दी के ख्यातनाम कवियों की रचनाओं को संगीतबद्ध करने की शुरुआत दान सिंह से ही हुई। सबसे पहले  सुमित्रानन्दन पंत के एक गीत को संगीतबद्ध करने की जिम्मेवारी उन्हें दिल्ली के आकाशवाणी केंद्र से मिली। पंत जी बड़े आशंकित थे कि एक नौजवान संगीतकार उनके गीत को कैसे प्रस्तुत करेगा। पंत जी की आशंका से आकाशवाणी केंद्र के निदेशक भी तनाव में थे। उन्होंने पंत जी को रेकार्डिंग के समय पंत जी को भी बुलवा लिया। पंत जी ने जब अपनी कविता की कंपोजीशन सुनी तो आगे बढ़ कर दान सिंह को गले लगा लिया। दान सिंह जी उस घटना हो याद कर उम्र के अंतिम पढ़ाव में भी भाव विभोर हो उठते थे कि पंत जी का उस दिन का आशीर्वाद आज भी मेरे साथ है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;वे विरले संगीतकार खेमचंद प्रकाश के शिष्य रहे। खेमचंद प्रकाश जिन्हें लोग 1949 की फिल्म ‘महल’ के लिए सबसे अधिक जानते हैं या फिर इस फिल्म के उस गाने के कंपोजीशन के लिए जानते हैं जिसने लता मंगेशकर को पहली बार बुलंदियों पर पंहुचाया “आएगा आएगा आने वाला”। अपने गुरु के लिए उनकी भारी श्रद्धा थी। “गुरुजी का कमाल देखिए एक ही राग यमन कल्याण में ही पूरी पिक्चर (महल) ख़त्म कर दी। इसका गाना आएगा आनेवाला पचास साल से सुन रहे हैं मगर सुनते सुनते अब भी तबीयत नहीं भरती”।  &lt;br /&gt;           &lt;br /&gt;उन्होंने एचएमवी के लिए भी दर्जनों राजस्थानी गाने कम्पोज़ किए जिनके रिकार्डों की खूब धूम रही। दशकों बाद उन्हें फिर एक बार फिल्म में संगीत देने का मौका दिया जगमोहन मूंदड़ा ने। राजस्थान की महिला कार्यकर्ता भंवरी देवी के संघर्ष की कहानी पार्ट आधारित फिल्म ‘बवंडर’ के गानों में दान सिंह ने राजस्थानी लोक संगीत की खूबसूरत छटा बिखेरी। पर, पंकज राग के शब्दों में, जैसा अक्सर होता है यह “ऑफ बीट” फिल्म और इसका संगीत ठीक से रिलीज ही नहीं हुआ। फिल्म का बैकग्राउंड संगीत ग्रेमी पुरस्कार विजेता विश्व मोहन भट्ट ने रचा था इसलिए फिल्म की नामावली में सिंह और भट्ट दोनों का नाम आया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अत्यंत नम्र, सहज और विनोदी प्रवत्ति के दान सिंह हमेशा संगीत में ही डूबे रहते थे। उनके मन में कभी कोई कलुषता नहीं रही। उनकी जीवन संगिनी डॉ. उमा याग्निक जो खुद आला दर्जे की गायिका है के साथ दान सिंह जी का ऐसा संगीत द्वय बना रहा जो अपने अंदर मिसाल है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठेट जयपुरी मिजाज वाले दान सिंह संगीत के अलावा अपने शौक के बारे में दूरदर्शन पर प्रसारित एक कार्यक्रम ‘जीवन के पहलू’ में बताया कि उन्हें बचपन से ही पतंफ उड़ाने का बड़ा शौक रहा। मकर संक्रांति के दिन समूचा जयपुर शहर पतंग डोर लिए छतों पर होता है। उस दिन दान सिंह भी बच्चों की तरह खुश होकर पतंग उड़ाते थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जयपुर की गालीबाजी के भी वे बड़े मुरीद थे। इस बारे में सवाल करने पर वे खुद झूम कर गा उठते थे ‘ सुन साथण म्हारी पिव बड़ो छै पाजी/ कई बर दीनो समझाये ने छोड़े न गाली बाजी’। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गैर फिल्मी संगीतकार के रूम में उन्होंने खूब नाम कमाया इज्जत पायी। वे अपने जीवन में सफल थे। मगर नम्र इतने थे कि यही कहते थे “इस सफलता के पीछे मैं एक ही बात आपसे कहूंगा कि कुछ लोगों की दुआएं काम आ गयी वरना मुझे तो अब तक काम ही नहीं आया। मैं खुद सोचता हूं कि हो कैसे गया’।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिने जगत की अपनी असफलता का गिला उन्होंने कभी नहीं किया। वे कहते थे “मनचाहा किसी को मिलता भी नहीं है... ज़िंदगी के कितने ही ऐसे पहलू हैं जिन पर कभी आदमी उदास हो कर रह जाता है, कभी खुश हो कर रह जाता है। हाथ कुछ नहीं आता। और कलाकार के लिए अंत में एक ही चीज रह जाती है कि गत में उसने जो अच्छा काम किया है उससे उसे लोगों की सराहना मिलती रहे, लोगों का आशीर्वाद मिलता रहे। लोग खुश रहें। बस यही एक चीज है”। इसके साथ ही वे एक शेर कह देते थे “तकदीर के लिखे तो तदबीर क्या करे/तट पर डूबे नाव तो बंदा भी क्या करे”।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज उन्हीं का सुनाया एक और शेर याद आता है ‘ये रोशनी है हकीकत में एक छल लोगों कि जैसे जल में झलकता हुआ महल लोगों/ दरख़्त हैं तो परिंदे नज़र नहीं आते, जो मुश्ताक हैं वही हक से बेदखल लोगों’। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(यह आलेख जनसत्ता के रविवारी संस्करण दिनांक 26 जून 2011 के अंक में छपा)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5185840046950412717-4839452833132651038?l=itslokayat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itslokayat.blogspot.com/feeds/4839452833132651038/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5185840046950412717&amp;postID=4839452833132651038' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/4839452833132651038'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/4839452833132651038'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itslokayat.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='संगीतकार दान सिंह : पुकारो मुझे नाम लेकर पुकारो'/><author><name>Rajendra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S-Gx1DliFGI/AAAAAAAAArU/4OCr_2fmGn8/S220/photo.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-0xaqQyYfb_o/TgfUclOQGDI/AAAAAAAAAvo/Vfb3swY1lsg/s72-c/Daan%2BSingh.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5185840046950412717.post-6627733781399281436</id><published>2011-06-20T09:36:00.000-07:00</published><updated>2011-06-20T09:49:57.720-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hasrat jaipur'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Daan Singh'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='HFM'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Bollywood'/><title type='text'>Daan Singh: He Left An Indelible Mark On Film Music</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-YQB9Tl3Equc/Tf93v_XenkI/AAAAAAAAAvc/CIQgKPLtKNs/s1600/Daan%2BSingh.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 229px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-YQB9Tl3Equc/Tf93v_XenkI/AAAAAAAAAvc/CIQgKPLtKNs/s320/Daan%2BSingh.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5620342526329134658" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Rajendra Bora&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;In a rat race, many a times diamonds are frequently discarded and fakes reign supreme. Music Director Daan Singh who passed away in Jaipur on Saturday night (June 19, 2011) was one such gem who despite showing his worth did not get film offers.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;He composed music for only three bollywood films of which one remained unreleased. But his compositions of the two films ‘My Love’ and ‘Bhool Na Jaana’ can never be erased from the memory of Hindustani Film Music (HFM) lovers and no history of Hindustani Film Music would be complete without mention of songs of the two films.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;He was a pupil of legendry composer Khemchand Prakash who also hailed from Rajasthan. He was greatly appreciated in bollywood mehfils (sittings) attended by makers and breakers of the silver screen but never got any assignment. In fact big names in Hindi film music who listened his compositions in mehfils conveniently lifted his tunes to score songs in their films.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;Ill luck apparently shadowed him in Mumbai. The very first assignment as a film music director film he got for ‘Ret Ki Ganga’ could not be completed. He got chance to score music for ‘Bhool Na Jaana’. ‘Bahadur Shah Zafar’ and ‘Matlabi’ but the films could not see the projection light in theaters. However, two songs recorded for ‘Bhool Na Jaana’, a film based on Indo-China war, were released by the music company and are now considered classic. ‘Pukaaro Mujhe Naam Lekar Pukaaro, Mujhe Tum Se Apni Khabar Mil Rahi Hai’ is one of the finest songs of Mukesh. Another song rendered by Geeta Datt ‘Mere Ham Nashin Mere Ham Navan Mere Paas Aa Mujhe Thaam Le’ is a soulful song written by Hariram Aacharya of Jaipur.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;When given a chance to score for a big starrer film ‘My Love’ (Shashi Kapoor, Sharmila Taigore) did not let the film down. Melodious compositions of this film instantly became big hit like ‘Zikr Hota Hai Jab Kayaamat Ka Tere Zalwon Kee Baat Hoti Hai and ‘Who Tere Pyaar Kaa Gam Ek Bahaana Tha Sanam, Apni Kismat Hi Kuchh Aisi Thi Ke dil Toot Gaya’. However the film bombed at box office.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;His another film ‘Toofaan’ too had an evergreen song ‘Hamne To Pyaas Kiya’ sung by Mukesh and Asha Bhonsle which too lost without trace.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Intrigues of Bollywood saw that offers elude him which was ultimately Hindi Film Music’s loss. However, Bollywood’s loss was All India Radio’s gain where he reigned supreme for several years composing poetries of several great names in Hindi literature. When he was assigned by Delhi station of AIR to compose a poem by Sumitranandan Pant in music, the poet was apprehensive as to how a yound boy will do justice to a literary piece. Pant personally came to the studio and after listening Daan Singh's composition gave him a big hug and blessed him.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;He recorded a large number of songs in Rajasthani for HMV which are still popular.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;After a lot many years when Daan Singh got a chance to score for Jagmohan Mundara’s film, based on Rajasthani woman activist Bhanwari devi, ‘ Bawandar’ he did a tremendous job but film’s music was not properly marketed.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Talking to Hindustan Times some time ago he summed up his life in an Urdu couplet: “Yeh Roshni Hai Haqeeqat Mein Ek Chaal Logon,Ke Jaise Jal Mein Jhalakta Hua Mahal Logon. Darakht Hain to Parinde Nazar Nahin Aate, Jo Mustaq Hain Wohi Haq Se Bedakhal Logon. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(The obit piece was published in Hindustan Times on June 20, 2011 on page 2)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5185840046950412717-6627733781399281436?l=itslokayat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itslokayat.blogspot.com/feeds/6627733781399281436/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5185840046950412717&amp;postID=6627733781399281436' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/6627733781399281436'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/6627733781399281436'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itslokayat.blogspot.com/2011/06/daan-singh-he-left-indelible-mark-on.html' title='Daan Singh: He Left An Indelible Mark On Film Music'/><author><name>Rajendra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S-Gx1DliFGI/AAAAAAAAArU/4OCr_2fmGn8/S220/photo.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-YQB9Tl3Equc/Tf93v_XenkI/AAAAAAAAAvc/CIQgKPLtKNs/s72-c/Daan%2BSingh.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5185840046950412717.post-9158634391778399605</id><published>2011-05-30T04:16:00.000-07:00</published><updated>2011-05-30T04:22:41.532-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Census'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='India'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Population'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='rajasthan'/><title type='text'>आबादी किस पर भारी</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/--oCO8s_W2iE/TeN92UX1IbI/AAAAAAAAAvA/WSzJ20k6fCI/s1600/population.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 223px;" src="http://4.bp.blogspot.com/--oCO8s_W2iE/TeN92UX1IbI/AAAAAAAAAvA/WSzJ20k6fCI/s320/population.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5612467932768838066" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;राजेंद्र बोड़ा &lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;देश की जनगणना के प्रारंभिक आंकड़े जारी हो गए हैं। जनगणना दशकवार होती है। यह आँकड़े 2001 से 2010 दशक के हालात बयान करते हैं। जनगणना मोटे तौर पर दशकीय आबादी वृद्धि दर का पता देती है। नई जनगणना बताती है कि 2001-2010 के दौरान राजस्थान में जनसंख्या वृद्धि दर में लंबे समय बाद बड़ी गिरावट आई है। वृद्धि दर में यह गिरावट 6.97 प्रतिशत की है। मगर जनसंख्या विशेषज्ञों को इससे संतुष्टि नहीं है।  कहते हैं कि इस गिरावट के बावजूद इस मरुप्रदेश की आबादी की वृद्धि दर 1.96 प्रतिशत प्रति वर्ष है और पिछले दशक में यहाँ की आबादी में एक करोड़ 20 लाख से अधिक लोग और जुड़े। यह संख्या इसके पिछले 1991-2001 दशक में नए जुड़े लोगों की संख्या एक करोड़ 25 लाख से थोड़ी ही कम है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जनसंख्या विशेषज्ञ डॉ. देवेन्द्र कोठारी कहते हैं कि पहली नज़र में जनगणना 2011 के आंकड़े जरूर उत्साहवर्धक नज़र आते हैं मगर राजस्थान के सामाजिक और आर्थिक विकास पर इन आंकड़ो के दीर्घकालीन प्रभाव परेशानी का सबब है। उनकी बातों का लब्बोलुबाब यह है कि बढ़ती आबादी हमारे संसाधनों पर भारी पड़ने वाली है। बढ़ी हुई आबादी के लिए भोजन, पानी, के साथ स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं को मुहैया करना कैसे संभव होगा यह यक्ष प्रश्न है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आबादी के बढ़ने से विशेषज्ञ जिन चिंताओं को प्रकट करते हैं वे वास्तव में व्यवस्था की समस्याएं हैं। व्यवस्था की समस्या शासन – प्रशासन की होती है। लोकतान्त्रिक व्यवस्था में शासन जब सभी को स्वस्थ, आर्थिक रूप से सक्षम, और गौरवपूर्ण जीवन बिताने के साधन मुहैया करा पाने में बुरी तरह असफल रहता है तब वह दोष का ठीकरा आसानी से बढ़ती आबादी पर फोड़ देता है। उसका तर्क यह होता है कि जितनों के लिए वह व्यवस्था करता है उससे कहीं अधिक उपभोग करने वाले पैदा हो जाते हैं। तो बेहतरी का जो सपना दिखा कर जनता के नुमाइन्दे शासन में आते हैं उस सपने को साकार न कर सकने के लिए वे बढ़ती आबादी को एक अच्छा बहाना बना लेते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि अकादमिक लोग भी आबादी के तर्क से शासन की असफलताओं का बचाव करने लगते हैं। उदाहरण के लिए जनसंख्या विशेषज्ञों के इस तर्क को लें कि बढ़ी हुई आबादी शिक्षा और स्वास्थ्य के ‘डिलीवरी सिस्टम’ पर दबाव डालेगी। इसका सीधा सदा अर्थ हुआ कि शासन बढ़ी आबादी के लिए स्कूलों और अस्पतालों, शिक्षकों और चिकित्सकों की व्यवस्था कैसे कर पायेगा। &lt;br /&gt;हमारा सवाल यह है कि क्या शासन की व्यवस्था का ढांचा ‘डिलीवर’ कर पा रहा है ? क्या यह ढांचा अपनी पूरी क्षमता से काम कर रहा है ? पहले शासन का यह ढांचा अपनी पूरी क्षमता से काम करना शुरू करे फिर उसे यह कहने का हक़ बनेगा कि उस पर उपभोग करने वालों की संख्या का दबाव बढ़ रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्राकृतिक संसाधनों कि बात करें। शासन और विशेषज्ञ कहते नहीं थकते कि बढ़ी आबादी को पिलाने के लिए पानी कहां से लाएंगे और खिलाने को अनाज कहां से लाएंगे। खुद शासन के आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि राज्य में होने वाली पानी की कुल खपत का केवल चार प्रतिशत घरों में उपयोग में आता है। बाकी का 96 प्रतिशत हिस्सा कृषि, उधयोग और मनोरंजन व्यवसाय के उपयोग में आता है। इसमें भी करीब 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा कृषि के लिए काम में आता है। वहाँ पानी की जो बर्बादी होती है उसकी व्यवस्था शासन से नहीं होती मगर केवल चार प्रतिशत पानी का उपभोग करने वालों से शासन और अकादमिक वर्ग अपेक्षाएं करता है कि वह पानी की बचत करे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आबादी का पेट भरने के लिए अनाज कहां से आएगा जैसा सवाल करने वालों से कोई यह नहीं पूछता कि हर साल कितना अनाज सरकारी गोदामों में सड़ जाता है ? अनाज का एक-एक दाना लोगों का पेट भरे उसकी व्यवस्था शासन से क्यों नहीं होती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शासन और जनसंख्या विशेषज्ञों का सारा प्रयास आंकड़ों का मायाजाल रचने का होता है। और अब इन आंकड़ों में एक नया शब्द और जुड़ गया है वह है ‘अनवांटेड चिल्ड्रन’ (अनचाहे बच्चे)। याने गैर जरूरी बच्चे। आबादी के एक हिस्से पर इस तरह का ठप्पा लगा कर उसे उपेक्षित घोषित करना माँ-बाप और शासन दोनों के लिए क्या नैतिक है ? आप कहते हैं यह अनचाही आबादी हमारे ‘डिलीवरी सिस्टम’ पर हमारे पर्यावरण पर बोझ है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि प्राकृतिक संसाधनों का समान बंटवारा नहीं हो रहा है। जो हैसियत वाले हैं प्राकृतिक संसाधनों पर उनका आधिपत्य है। वे नहीं चाहते कि वे जरूरत से ज्यादा प्रकृति से जो ले रहे हैं उसमें हिस्सेदारी लेने वाली नई आबादी खलल डाले। महात्मा गांधी की उस बात को कोई याद नहीं करता कि प्रकृति के पास मानव की जरूरतों को पूरा करने के लिए बहुत है मगर उसके लालच को पूरा करने के लिए उतना नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आबादी के नियंत्रण के उपाय करके आप अपनी जरूरत के मुताबिक बच्चे चाहते हैं। इस तरह की चाहना आधुनिक औद्योगिक सोच का परिणाम है जिसने बच्चे को एक ‘उत्पाद’ मान लिया है। पूंजीवाद अब जब सारे विश्व में अपने पांव पसार चुका है तब दंपत्ति यह तय करने लगें हैं कि वे पहले बच्चा पैदा करें या अपने करियर को आगे बढ़ाएं या पहले बच्चा पैदा करें या अच्छा फ्लैट या बड़ी कार खरीदें। जिस तरह बाज़ार उपभोक्ता को ‘चोइस’ देता है वैसे ही बच्चे का पैदा किया जाना भी वैसी ही ‘चोइस’ बन रहा है जिसे अकादमिक लोग और शासन आज की जरूरत बता रहे हैं।     &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शासन और अकादमिक लोग आसान रास्ते खोजते हैं। मीडिया की तो फितरत ही ऐसी होती है की वह हर चीज का सरलीकरण करता है। आबादी इतनी सरल नहीं होती। आबादी को समस्या मान कर उस पर नियंत्रण की बात सरल बात है। मगर ऐसे विशेषज्ञ भी हैं जो आबादी को बोझ नहीं बल्कि ‘संपत्ति’ मानते हैं जिसका उपयोग करने के लिए वे निवेश, यंत्रतकनीक, उत्पादकता, वाणिज्य व्यवसाय और स्पर्धा की वकालत करते हैं। दुनिया की एक बड़ी पूंजीवाद की पोषक बहुराष्ट्रीय कंपनी गोल्डमैन साक्स अपने एक अध्ययन में भारत की बड़ी आबादी को महुत बड़ा बाज़ार मानती है। उसके लिए यह आबादी पूंजी है। यहां तक की गोल्डमैन साक्स के साथ साथ अमेरिका की सीआईए भी भारत की आबादी को ‘संपत्ति’ मानती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर आबादी तभी संपत्ति बनती है जब कोई भूखा नहीं रहे, किसी के साथ संसाधनों के बंटवारे में भेदभाव नहीं हो और  हर एक को शिक्षा पाने और इलाज कराने की निर्बाध सुविधा हो। यहां शासन की भूमिका आती है। सैकड़ों बार कहा जा चुका है कि शिक्षा और स्वास्थ्य में राज्य की भूमिका तिरोहित नहीं होने दी जानी चाहिए। निर्वाचित शासन को समता आधारित प्रशासन का अपना वादा निभाना चाहिए। मगर जब शासन ऐसा कर पाने में असफल रहता है तो उसे ऐसे तर्कों की जरूरत होती है जिससे वह अपनी सुशासन देने में अपनी विफलता छुपा सके। अकादमिक लोग उसे यह तर्क मुहैया कराते हैं। आबादी का तर्क भी वैसा ही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रत्येक नागरिक को यह अधिकार है कि वह खुद तय करे कि उसे अपना परिवार कितना बड़ा हो या छोटा चाहिए। मगर यह फैसला वह अपने विवेक से करे न कि शासन और अकादमिक लोगों के तर्कों की मीडिया में बाढ़ में बह कर। आबादी के नाम पर शासन और प्रशासन की विफलताओं से ध्यान नहीं हटाया जा सकता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जनसंख्या विशेषज्ञ आबादी में जुड़ने वाले बच्चे का मोल आर्थिक आधार पर करते हैं। यह निर्धारण उन लोगों की तरफ से आता है जिन्होंने बाज़ार के जरिये प्राकृतिक संसाधनों पर पहले से कब्जा कर रखा है। इन संसाधनों का समतामूलक बंटवारा लोकतान्त्रिक व्यवस्था में शासन का पहला फर्ज़ होना चाहिए। मगर जो ताक़तें बाज़ार पर कब्ज़ा रखती है वे ही शासन को अपने तरीके से चलाने की क्षमता भी रखती हैं। वे यह समझाती है कि उनके द्वारा निर्धारित सीमारेखा के बाहर की आबादी अनचाही है जिसकी शासन को और समाज को कोई जरूरत नहीं होनी चाहिए। यह फासीवादी सोच है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोकतान्त्रिक शासन में कोई भी नागरिक अनचाहा नहीं हो सकता। कोई नागरिक तभी बोझ होता है जब वह भूख और गरीबी में होता है, जब उसमें कौशल नहीं होता, जब वह निरक्षर होता है और जब वह अस्वस्थ होता है। उसे बोझ से संपत्ति में तब्दील करने की जिम्मेवारी शासन और समाज दोनों की होती है। वे आज अपने इस धर्म को निभाने में पूरी तरह विफल नज़र आते हैं। और अपनी विफलता के लिए दोष आबादी पर मंढते हैं जिसे कोई सभ्य समाज स्वीकार नहीं कर सकता।    &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शासन कहने को तो राजकोष का बड़ा पैसा ऐसे कार्यक्रमों पर खर्च करता है जिससे लोगों के हालत सुधरे। मगर यह केवल लक्षणों का इलाज है। बीमारी का सही इलाज तभी होता है जब उसके कारकों को समाप्त किया जाय। हमारी समस्या संसाधनों के गैर बराबरी बंटवारे का है। इसी के लिए आज़ादी की लंबी जंग लड़ी गई थी। मगर राज आम अवाम के हाथों में आने के 60 वर्ष से अधिक होने के बाद आज भी गैर बराबरी का दस्तूर कायम है। नई आर्थिक नीतियों ने इस दस्तूर को प्रतिस्पर्धा के नाम पर जायज ठहरा दिया है। इसीलिए पीछे आया बच्चा अनचाहा हो गया है।  &lt;br /&gt;             &lt;br /&gt;(आलेख 'प्रेसवाणी' के मई 2011  के अंक में प्रकाशित)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5185840046950412717-9158634391778399605?l=itslokayat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itslokayat.blogspot.com/feeds/9158634391778399605/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5185840046950412717&amp;postID=9158634391778399605' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/9158634391778399605'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/9158634391778399605'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itslokayat.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='आबादी किस पर भारी'/><author><name>Rajendra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S-Gx1DliFGI/AAAAAAAAArU/4OCr_2fmGn8/S220/photo.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/--oCO8s_W2iE/TeN92UX1IbI/AAAAAAAAAvA/WSzJ20k6fCI/s72-c/population.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5185840046950412717.post-6830941836965506392</id><published>2011-03-30T11:39:00.000-07:00</published><updated>2011-03-30T11:44:40.406-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Sardar Patel'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='V. Shankar'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Jainarayan Vyas'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='V P Menon'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='rajasthan'/><title type='text'>Inauguration of Greater Rajasthan was all royal affairs</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Rajendra Bora&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;When Greater Rajasthan was inaugurated by Sardar Vallabh Bhai Patel, the architect of integration of India, on March 30 in 1949 the ceremony to mark the occasion held at Darbar Hall in the City Palace of Jaipur was mostly all royal affairs as most of the senior Congressmen left the venue in a huff over the sitting arrangements.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;On this day, 62 years ago, four major princely states – Jaipur, Jodhpur, Bikaner and Jaisalmer- merged with Samyukt Rajasthan which was earlier inaugurated by Jawahar Lal Nehru in Udaipur on April 18, the previous year.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;At the ceremony Patel sworn in Maharaja Sawai Mansingh of Jaipur as Rajpramukh. Rajpramukh later administered the oath of office of the Premier of the newly emerged state to Hiralal Shastri, who was till then Chief Minister of Jaipur.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;At the time of formation of Greater Rajasthan the Congress had four stalwarts – Jai Narayan Vyas from Marwar, Manikya Lal Verma from Mewar, Hiralal Shastri from Jaipur and Gokul Bhai Bhatt from Sirohi- leading the organisation.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“Local Congress house was divided,” recalled V. P. Menon, a civil servant who played a vital role in the process of integration of princely states into India, in his book ‘The story of the integration of the Indian States’. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Shastri, who was made the Premier of Grater Rajasthan was the choice of Patel but was not acceptable to leaders from Marwar and Mewar. Verma from Mewar was more vocal in his displeasure over the choice. According to his diary entries he “warned”  Patel not to make Shastri head of the newly formed State because “Congress workers in Rajasthan would not accept him.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;In another entry in Verma’s diary states “I did not know (at that time) that Jaipur was being made the capital and Premiership was too going to Jaipur in the bargain of transferring Abu to Gujarat.”  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;It was probably culmination of the anger among majority Congressmen that exhibited at the inaugural ceremony with Verma leaving the venue after finding that all front rows were reserved for royals. He wrote in his diary that even “ministers of Samyukt Rajasthan and other states joining the Greater Rajasthan” were not provided respectful place in the ceremony.&lt;br /&gt;Another civil servant V. Shankar in his book my ‘Reminiscences of Sardar Patel’ wrote: Maharaka of Jaipur insisted that we should all don Rajasthani dress… His Highness sent turbans for all of us- myself, V. P. Menon. M. K. Vellodi, and N.M, Buch. &lt;br /&gt;The rift in the Congress rank and file was so deep that they refused to join the ministry formed by Shastri. Despite support from Patel and Gokul Bhai Bhatt, the then PCC chief, obeying the Patel’s decision, Shastri ministry could not last long as the Pradesh Congress Committee (PCC) in its emergency meeting on June 11, 1949 passed a vote of no- confidence against it. Hurt over the vote when Bhatt resigned, the PCC elected Vyas as its President. However, AICC turned down the PCC decision. But local sentiments finally reigned supreme and Shastri, a loner, ultimately resigned and a civil servant C S Venkatachari was made the Premier of the State on January 6, in 1951.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;However unanimous choice of Rajasthan congressmen prevailed later and Jai Narayan Vyas was sworn is Chief Minister on April 26, 1951. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(The piece appeared on the front page of Hindustan Times on March 30, 2011)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5185840046950412717-6830941836965506392?l=itslokayat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itslokayat.blogspot.com/feeds/6830941836965506392/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5185840046950412717&amp;postID=6830941836965506392' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/6830941836965506392'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/6830941836965506392'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itslokayat.blogspot.com/2011/03/inauguration-of-greater-rajasthan-was.html' title='Inauguration of Greater Rajasthan was all royal affairs'/><author><name>Rajendra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S-Gx1DliFGI/AAAAAAAAArU/4OCr_2fmGn8/S220/photo.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5185840046950412717.post-5467206978379531785</id><published>2011-03-27T10:53:00.000-07:00</published><updated>2011-03-27T10:57:02.385-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Pushkarna History'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Holi'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='jodhpur'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Ger'/><title type='text'>होली का रंग गेर के संग</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;राजेन्द्र बोड़ा &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;होली का उत्सव अन्य सभी उत्सवों से अलग है। हालांकि सभी उत्सव वे समय होते हैं जब थोड़ी देर के लिए हम अपने जीवन की मुश्किलों को भुला कर कुछ आनंद में डूब जाते हैं। इसीलिए हमारे जीवन में उत्सवों का बहुत महत्व है। वे हमें अपनी संस्कृति से भी जोड़े रखते है। संस्कृति समाज को जोड़े रखने में बड़ी भूमिका निभाती है। उत्सवों में विभिन्न कलाओं के माध्यम से समाज के लोगो की प्रतिभाएँ भी सामने आती हैं।   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सूर्य नगरी के नाम से विख्यात जोधपुर शहर को उत्सवों का की नगरी कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जोधपुर के लोगों को तो बस कोई मौका चाहिए उत्सव मनाने का। इसीलिए यहाँ हर रोज ही कोई न कोई धार्मिक या सामाजिक उत्सव चलता ही रहता है। यही कारण है यहाँ के लोगों में जैसा प्रेम भाव नज़र आता है वैसा अन्य जगहों पर कम ही देखने को मिलता है। यहाँ के वाशिंदों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि उनमें आपसी मेल बहुत है। यहाँ की मारवाड़ी भाषा ने सबको बड़ी खूबसूरती से इस तरह जोड़ रखा है कि अलग अलग समुदायों के लोगों में फर्क करना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे में जब होली आए और जोधपुर के लोग एक दूसरे को रंगों में पूरी तरह सरोबार नहीं करें ऐसा हो ही नहीं सकता। इस दिन शहर की सदियों से चली आ रही परम्पराएं जीवंत हो उठती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;होली की जोधपुर में बड़ी पुरानी परंपरा है ‘गेरों’ की। ‘गेर’ पुरुषों की टोलियाँ होती है जो चंग की थाप पर होली के गीत गाते हुए शहर में एक स्थान से दूसरे स्थान को घूमती फिरती हैं। गेरें जहाँ से भी गुजरती हैं उन्हें सुनने के लिए लोगों के हुजूम उमड़ पड़ते हैं। होली के कई दिन पहले से गेरें निकलनी शुरू हो जाती है। होली के जलने के दूसरे दिन,  जिसे मारवाड़ी में छालोड़ी कहते हैं,  जब गेर के लोग गाते और चंग बजाते शहर की गलियों से निकलते हैं तो लोग अपने मकानों और चबूतरों पर बैठे उनका इंतजार करते हैं। होली के गीतों का आनंद तो होता ही है साथ ही रंगीन पानी की बौछारें भी चलती रहती हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पास के गावों से भी टोलियां आती हैं और शहर की मोहब्बत में भीग जाती हैं और शहर वालों को अपने गीतों से भिगो देतीं हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर सबसे दिलचस्प होती हैं पुष्कर्णा ब्राह्मणों की गेरें। जमाना बादल गया। होली की मौज-मस्ती जो पहले बहुत लंबी चलती थी अब कुछ घण्टों में सिमट गई फिर भी गेरों की  यहाँ अभी जीवित हैं। बीच-बीच में जब भी ऐसा समय आया कि लगने लगा यह परंपरा लोप हो रही है तो कोई न कोई बंदा इसे बचाने को कूद पड़ा और उसे समाज का समर्थन भी मिल गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फाल्गुन के यह फाग उत्सव की मौसम के मिज़ाज से मेल खाता है। इस परंपरा का करीब डेढ़ सौ सालों का इतिहास तो लोगों को जबानी याद है। यह परंपरा ऐसी है जिसमे आम जन तो फाग के रंगों में डूबते उतरते रहे ही हैं पुराने सामन्ती काल में तब के शासक भी उससे सरोबार होते रहे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जोधपुर के पुष्कर्णा ब्राह्मणों की फाग और महिलाओं द्वारा गायी जाने वाली गालियों की निराली परंपरा की ख्यात दिसावर भी पहुची हुई थी इसका एक दिलचस्प पुराना वर्णन लंबे समय तक एक प्रमुख गेर मंडली के प्रमुख रहे रामदेव व्यास ‘बाबूसा’ सुनते हैं। जोधपुर के तत्कालीन महाराजा मानसिंह स्वयं गुणी व्यक्ति थे। वे कविताएँ रचते थे और संगीत के भी ज्ञाता थे। इसीलिए उन्हें ‘रसीले राज’ भी कहा जाता था। जब उन्होंने अपनी कन्या का उदयपुर के राजकुमार के साथ संबंध पक्का किया तो उदयपुर के महाराणा चाहते थे कि लड़की वाले वहीं आ जाएँ और वहीं विवाह हो। मगर महाराजा मानसिंह ने उन्हें बारात लेकर जोधपुर आने का आग्रह के साथ  निमंत्रण दिया। कहते हैं उदयपुर के महाराणा ने इस शर्त पर बारात लेकर जोधपुर आना स्वीकार किया कि पुष्कर्णा ब्राह्मणों में जिस विधि विधान से विवाह होता है वैसा ही विवाह होगा और पुष्करणों के विवाहों में जिस प्रकार समधिनों को संबोधित करते हुए ‘गाल’ गायी जाती है वैसी ही ‘गाल’ खुद महाराजा मानसिंह गाएँगे। लड़के वालों की दोनों बातें मानी गई। महाराजा मानसिंह कि गायी गाल “नाजकड़ी ब्यावण आवे/ नाजकड़ी ब्यावण क्यूँ शरमावे” आज भी प्रचलित है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रंगों में भींजते हुए अपने समधियों के घरों के बाहर जाकर गालियाँ गाकर फाग का धमाल मचाने में भी अनोखा अदब रखा जाता रहा है। इसीलिए फाग कि गालियां, जिनमें अश्लील संकेतों वाली चुहलबाजियों का आनंद होता है, को सुनने स्त्रियाँ भी पुरुषों से पीछे नहीं रहतीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;होली से बहुत पहले गैरों की टोलियाँ नए नए गीत बनाने की तैयारी शुरू कर देती हैं। गीत लिखे जाते हैं, उनकी धुनें बनती है और उन पर नृत्य की तैयारी भी होती है। पहले केवल चंग वाद्य ही गालियों को रिदम देने के लिए हुआ करता था। फिर उसमें चिमटा और हारमोनियम भी जुड़ गया। कालांतर में पूरा आर्केस्ट्रा ही साथ में बजने लगा जिसमें इलेक्ट्रॉनिक वाद्य भी जुड़ गए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गेर परंपरा के सबसे पुरानी याद 140 वर्ष पहले मारवाड़ राज में दीवान रहे सूरज राज रामदेव की है जब वे अपने पाँच पुत्रों और मित्र मंडली के साथ ‘रामदेव रसाला’ गेर के नाम से मोहल्ले मोहल्ले जाकर अपनी ‘गालियों’ का रंग जमाते थे। उस मंडली की एक ‘गाल’ आँख रसीली ने अद्भुत मारी/ बस कियो ए भोलों भ्रह्मचारी” खूब लोकप्रिय हुई जो आज भी गाई जाती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘गेरों’ में वाद्यवृंद –‘आर्केस्ट्राइजेशन’ – का प्रयोग शुरू करने का श्रेय आमतौर पर जालप मोहल्ले के लोगों को जाता है। जाने माने रंगकर्मी थे और ध्रुपद गायन में माहिर  भानीरामजी होली के लिए ‘गालियाँ’ लिखते। जिन्हें संगीतबद्ध किया जाता और पूरे वाद्यवृंद के साथ वह ‘गेर’ निकली थी जिसका संचालन राजाराम पुरोहित करते थे। उस गेर की एक रचना अब भी लोगों की जुबान पर है “देखो नाचण पाटी पाडी/ पैरी फूल गुलाबी साड़ी/ आवो आवो जल्दी आवो कोई आस पुरावो”। इनकी शिष्य परंपरा में राजाराम, बदरिदास गुणिया, मोतीलाल कल्ला, नरजी उस्ताद, चतुर्भुक, चन्द्रशेखर कल्ला, गोविंद कल्ला, गिरधर कल्ला, मंशाराम पुरोहित ‘लुच्चा साहब’’, दाऊलाल रामदेव के साथ हिन्दी फिल्मों में संगीतकार बने बालकृष्ण कल्ला तथा राजस्थान संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष रहे राम कृष्ण कल्ला के नाम आज भी लोगों को याद है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछली सदी के चालीस के दशक में आत्माराम रामदेव, जिन्हें सभी प्रेम से ‘आतूजी’ नाम से जानते और पुकारते थे की गेर सबसे मशहूर थी. , वे रेलवे में गार्ड थे। ‘आतूजी’ धोती, ऊपर बंद गले का कोट और सिर पर जोधपुरी साफा पहने, गले में बड़ा सा चन्द्रहार पहने गेर का नेतृत्व करते थे। पुष्ट देह और बुलंद और जबर्दस्त मीठी आवाज़ के धनी ‘आतूजी’ रंग से सरोबार हुए जब नौचोकिये से लेकर जालप मोहल्ले तक चंग पर होली के गीत गाते हुए निकलते थे तो राहों में उन्हें सुनने लोग उमड़ पड़ते थे। मोहल्लों के चौकों में जब रुक कर वे गाते थे तो वहाँ तिल रखने को जगह नहीं होती थी। मकानो की बालकनियों, खिड़कियों और छतों पर चढ़ कर लोग उनके गीतों का लुत्फ लेते थे। दिलचस्प बात यह है की होली के गीतों में बड़ी सफाई से अश्लील संकेत होते थे मगर पुरुषों के साथ महिलायें भी बड़ी संख्या में उनको सुनने उमड़ती थीं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजादी के आंदोलन में कूदे नेता सामाज सुधार के काम के जरिये राजनीति की सीढ़ियाँ चढ़ते थे। मूथा  शिवदत्त जी महाराज व मारवाड़ में राजनीतिक और सामाजिक जागृति की अलख जमाने वाले जयनारायण व्यासने श्लील गेरें निकाली लेकिन अश्लील गेरों की लोकप्रियता कभी कम नहीं हुई.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाद में राजस्थान के मुख्यमंत्री बने जयनारायण व्यास की ‘गेर’ सूर्य नगरी के इतिहास में एक अलग ही स्थान रखती है। उनकी ‘गेर’ में सरदारमल थानवी, मथुरादास, रामदत्त थानवी, मानमल, रण छोड़ दास गट्टाणी, जो बाद में हाईकोर्ट के जज रहे, आदि लोग होते थे। उनकी सीख भरी ‘गालियाँ’ होती थीं “मत दूध लजाईजे/ पाछो मत आइजे बेटा राड सूं”। उनकी ‘गालें’ जैसे  “छोड़ो-छोड़ो ऐ सवागण काला ओढ़णा” समाज में नई चेतना खासकर स्त्रियों में जोश भरने में खूब कामयाब रहीं। “हाँ अगर जाति हित चावो तो बाल विवाह की रीत हटाओ” जैसी ‘गालियाँ” नया युग बोध देने का सशक्त माध्यम बनी। ऐसी ही कुछ ‘गालियों’ की बानगी देखिए “त्याग दे उत्तम रामजी वाली लक्ष्मी तूँ / खोटी रीतों ने जल्दी त्याग”, “जब तक पढ़ी लिखी नहीं नार / तब तक कठिन सुधार पियाजी”, “खोला छोड़ दो / मिलणी रो बढ्यो प्रचार/ रोको सरदारों”, “नासमझ रहेंगी जब तक ये घरवालियाँ “ जैसी गालियों का वर्षों तक प्रचार रहा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह जानना भी दिलचस्प होगा कि श्लील और अश्लील गेरों की धाराएं साथ चलती रहीं और दोनों किस्म की गेरों में कभी टकराव नहीं हुआ। होता तो यह था कि दोनों ही पख के लोग एक दूसरे के मंच पर आकार प्रस्तुतियाँ देते थे और दोनों को भरपूर दाद मिलती थीं।     &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जोधपुर में हालांकि ‘गेरों’ में बड़ा योगदान पुष्कर्णा ब्राह्मणों का रहता है मगर उनमें मुसलमानों समेत सभी समुदायों के लोगों की सक्रिय भागीदारी होती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गेरों की इस परंपरा को थानवी माईदास और सत्यनारायण ‘मुलसा’ जैसे लोग आज भी जीवित रखे हुए हैं। माईदास, जिन्हें ‘गेरों का अमिताभ बच्चन’ कहा जाता है की ‘गेर’ में नृत्य और संगीत का माहौल हावी रहता है जो दर्शकों को पूरी तरह बाँधे रहता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘मुलसा’ की ‘गेर’ अपने गीत संगीत के लिए विख्यात है। कृपाकिशन ‘रिन्दी’ इनके लिए गीत लिखते हैं तो अमरदत्त ‘भा’सा’ संगीत निर्देशन रते हैं। ‘मुलसा’ की मशहूर ‘गालों’ में है “कागद बाँच ने भेगी आइजे”, “नाथूरामसा वाली लाडकी सुपने में रंग जावे रे/ झोंझरके तारो टूटेला”। उनकी ‘गेर’ 40 वर्षसे भी अधिक समय से निकल रही है।    &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके अलावा शहर में चार पाँच और टीमें भी हैं जो इस परंपरा का परचम थामे हुए है। इनमें दो भाई दिनेश और नरेश बोहरा अपनी अलग पहचान रखते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जोधपुर के ‘गेरों’ की बात हो और ‘फायसा गेर’ का जिक्र न हो तो बात अधूरी रह जाएगी। इसका प्रचलन अब तो नहीं है मगर गेर परंपरा में इसका भी स्थान रहा है। यह पूरी तरह अश्लील गीतों की गेर होती थी जो लोढ़ों की गली से निकलती थी। इसका समय निश्चित था। वह सवेरे-सवेरे निकलती थी। बिरदा उस्ताद और मीड़ा महाराज आदि इसके प्रमुख थे। ऐसा रिवाज था इस ‘गेर’ का प्रमुख गायक वही होता था जो अपने मोहल्ले की गली या अपने घर के बाहर अपने गेरियों के साथ परिवार की बहू बेटियों के बीच बच्चों के साथ सबसे पहले गा सके। दूसरी गेर निकालने वाले भी सुबह सुबह ‘फायसा गेर’ अलग से भी निकलते रहे हैं।   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जोधपुर में होली का रंग और उल्हास कृष्ण मंदिरों में भी जम कर नज़र आता है। वैष्णव या वल्लभकुल संप्रदाय का यहाँ बड़ा प्रभाव रहा है और आज भी है। विशाल गंगश्याम मंदिर में फगोत्सव की छटा निरखते ही बनती है। आधी रात तक लोगों की भीड़ जमी रहती है और सारा माहौल गीत, संगीत और नृत्य की छटाओं से भीगा रहता है। मंदिर में यह फगोत्सव कई दिनों तक चलता है। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;(यह लेख वीणा समूह की मासिक पत्रिका स्वर सरिता के मार्च 2011 अंक में छपा)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5185840046950412717-5467206978379531785?l=itslokayat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itslokayat.blogspot.com/feeds/5467206978379531785/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5185840046950412717&amp;postID=5467206978379531785' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/5467206978379531785'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/5467206978379531785'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itslokayat.blogspot.com/2011/03/blog-post_27.html' title='होली का रंग गेर के संग'/><author><name>Rajendra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S-Gx1DliFGI/AAAAAAAAArU/4OCr_2fmGn8/S220/photo.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5185840046950412717.post-6254724449112919248</id><published>2011-03-03T11:36:00.000-08:00</published><updated>2011-03-03T20:26:26.119-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Project Tiger'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Ranthambhore'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Fateh Singh Rathore'/><title type='text'>'Fathji' wrote Ranthambhore’s success story</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-lH_-Zm1UUUQ/TW_vI9Ft1kI/AAAAAAAAAu4/hLsAtGS_tEw/s1600/Fateh%2BSingh%2BRathore.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 254px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-lH_-Zm1UUUQ/TW_vI9Ft1kI/AAAAAAAAAu4/hLsAtGS_tEw/s320/Fateh%2BSingh%2BRathore.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5579941400451864130" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Rajendra Bora&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Jaipur. Fateh Singh Rathore who lost battle with cancer in Jaipur on Monday fought untiring batlles for more than three decades against the establishment and poachers to save tigers in Ranthambhore. He wrote the success story of Ranthambhore Tiger reserve which could not be carried forward by his predesessors.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Born in a desert village in the then Royal state of Marwar, near Jodhpur, with little vegetation Rathore, fondly called Fathji by wild life enthusiasts, was nothing in his family background that could forecast that he would become a great protector of endangered wild animals. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;In his schooldays he was not a studious boy and once aspired to become an actor. His grandfather pushed him into the Navy which could not hold him more than six months. He tried to become a lawyer and sold soft coal for a while. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Rathore joined the Forest department in 1960 as a Game Ranger in Sariska. That was the turning point in the life of Fathji. His fascination with forest and wild life remained with him till his last. Four years later he was posted at Mount Abu where he remained till 1971.      &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;His tryst with Ranthambhorev came when he was asked by the government to organise a tiger shoot in 1961 for Queen Elizabeth II of Great Britain and her husband Duke of Edinburgh. It will be interesting to know that government issued permits for hunting until 1969. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;The “Tiger Man” Kailash Shankhla, who launched ‘Project Tiger’ with the blessings and support of the then Prime Minister Indira Gandhi, handpicked Fathji and included him in the first group of foresters that was sent to Wild Life Institutte of India in Dehradun  to get trained in forest management.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Fathji developed Ranthambhore  with passion and with consummate skill bringing the wild life forest reserve on the global map. He was officially appointed as Field Director of Ranthambhore in 1978. During his tenure the forest area was declared as a National Park.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;In 1970s prevalent opinion of experts was that it was no longer viable for tigers. But he did miracle. Fighting heavy odds he succeeded in freeing the wild area from human activities by relocating 20 villages from the core area to out of the sanctuary.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Althoug he wrote a fantastic success story of Project Tiger in Ranthambhore but he was always at loggerhead with the local administration and politicians. He suffered heavily and his career too was jolted as he was forced to face indignation of being suspended from service and later posted in Jaipur. The National Park later started deteriorating with abject apathy by the civil administration and interference from different lobbies.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;After retirement he formed a NGO Tiger Watch and fought for survival of tigers and was a role model to wild life conservationists. His knowledge of the behaviour of big cat was legendry. He protected the tiger putting his own life in danger receiving physical assaults.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;He was awarded International Valour Award in 1983 for breavery in the field. He was also presented with WWF Lifetime Conservatyion Award in recognition  of his outstanding contribution in this field.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;The wild life conservationists would miss him.   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;(The obit piece published in Hindustan Times on March 3, 2011) &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5185840046950412717-6254724449112919248?l=itslokayat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itslokayat.blogspot.com/feeds/6254724449112919248/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5185840046950412717&amp;postID=6254724449112919248' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/6254724449112919248'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/6254724449112919248'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itslokayat.blogspot.com/2011/03/fathji-wrote-ranthambhores-success.html' title='&apos;Fathji&apos; wrote Ranthambhore’s success story'/><author><name>Rajendra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S-Gx1DliFGI/AAAAAAAAArU/4OCr_2fmGn8/S220/photo.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-lH_-Zm1UUUQ/TW_vI9Ft1kI/AAAAAAAAAu4/hLsAtGS_tEw/s72-c/Fateh%2BSingh%2BRathore.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5185840046950412717.post-8570902420925377797</id><published>2011-03-03T11:30:00.000-08:00</published><updated>2011-03-03T11:47:41.524-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='bjp'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Janata Party'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Mehboob Ali'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='rajasthan'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Ministers'/><title type='text'>Mehboob Ali : An Honest Intellectual in Politics</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-9R9JPyjM1y4/TW_tktyeATI/AAAAAAAAAuw/-XPfe3yvFNw/s1600/P2059_04-06-10.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 240px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-9R9JPyjM1y4/TW_tktyeATI/AAAAAAAAAuw/-XPfe3yvFNw/s320/P2059_04-06-10.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5579939678357684530" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Rajendra Bora&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Eighty year old Mehboob Ali, who passed away early Wednesday morning in Bikaner, was basically an intellectual rather than a run of a mill politician. Honesty and commitment was his hall mark. He was like an alien in the today’s breed of politicians.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;In a political system which does not allow an honest, independent and impartial person to survive Mehboob Ali, fondly called Mehboob Saheb, was a shining example of a politician who could not be corrupted. He showed his mettle serving as minister for Public Health Engineering Department (PHED) in first ever non-Congress government in Rajasthan in 1977  when no tempting offer of money and political pressure could deter him from his crusade against corrupt officials.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;He was like a Rishi (saint) having great insight into ills of society. An intellectual we should be proud of. He could call a spade a spade. But he was a misfit. Hindus would not accept him because he was a Muslim. And Muslims would not accept him because of his radical views. But people who knew him loved him and adore him.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;People remember him as a minister who rode on bicycle. He used to go to his ministerial office in secretariat from his official residence peddling a bike. On bike he went to attend functions in the capital and frequented his friends’ places. There was no gimmick in it. He was like that only. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Mehboob Ali had a humble beginning and remained humble all his life. But on principles and idealism he could never compromise. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Born in 1931 in village Malkisar in Bikaner district he did his graduation from Bikaner and studied law in Jaipur. He started his career as a peon in Agriculture Department and later served as Maal Babu in Railways. His literary and political leanings shaped his life. He practiced law and edited noted weekly ‘Saptaahaant’ and ‘Gurudeep’. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;He was a wanderer in politics because of his unconventional ideas and views. He could win only one assembly election from Bikaner during Janata wave in 1977. After the Janata Party split he remained with BJP and became its state vice-president. It was apparent that a radical like him had no space in a saffron party.Later he joined Congress but there too he was a misfit. He also dabbled with a non functioning Sarvodaya Party.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;A noted Delhi weekly listed Mehboob Ali among half a dozen prominent persons in the country who had their distinct mark on society. Others include industrialist Ratan Tata, and activists like Vinayak Sen, and Badal Sirkar.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;In the death of Mehboob Ali we have lost a true son of Rajasthan who set an example of a clean political leader of integrity. He was intellectually rich but financially died a pauper.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;(The piece published in Hindustan Times on February 24, 2011&lt;/span&gt;)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5185840046950412717-8570902420925377797?l=itslokayat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itslokayat.blogspot.com/feeds/8570902420925377797/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5185840046950412717&amp;postID=8570902420925377797' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/8570902420925377797'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/8570902420925377797'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itslokayat.blogspot.com/2011/03/mehboob-ali-honest-intellectual-in.html' title='Mehboob Ali : An Honest Intellectual in Politics'/><author><name>Rajendra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S-Gx1DliFGI/AAAAAAAAArU/4OCr_2fmGn8/S220/photo.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-9R9JPyjM1y4/TW_tktyeATI/AAAAAAAAAuw/-XPfe3yvFNw/s72-c/P2059_04-06-10.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5185840046950412717.post-4862724195920339295</id><published>2011-03-03T11:24:00.000-08:00</published><updated>2011-03-03T11:48:43.665-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Shekhawat'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Mehboob Ali'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='rajasthan'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Ministers'/><title type='text'>महबूब अली : सार्वजनिक जीवन में सादगी और ईमानदारी की मिसाल</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-suMRbPsCfcw/TW_rt0Ln1DI/AAAAAAAAAuo/ihRSFFp9EGY/s1600/P2051_04-06-10.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-suMRbPsCfcw/TW_rt0Ln1DI/AAAAAAAAAuo/ihRSFFp9EGY/s320/P2051_04-06-10.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5579937635669365810" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;राजेंद्र बोड़ा&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महबूब अली, जिनका 80 वर्ष की आयु  में गुरूवार को बीकानेर में निधन हो गया, बच रहे उन इने गिने राजनेताओं में थे जो जीवन पर्यंत  अपने  विचारों के प्रति निष्ठावान रहे और उनसे कभी कोई समझौता नहीं किया और हमेशा जमीन से गहरे जुड़े रहे। ऐसा उन्होंने किसी मजबूरी में नहीं किया। उन्होंने सत्य और निष्ठा का कठोर जीवन खुद चुना. उसके लिए कभी पछताए भी नहीं।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तत्कालीन बीकानेर रियासत के मलकीसर गाँव में 1931 के दिसंबर माह के अंतिम दिन जन्मे महबूब अली, जिन्हें सभी प्यार से महबूब साहब कह कर पुकारते थे, जमीन से उठे ऐसे नेता थे जिन्हें काजल भरी सत्ता की कोठरी भी अपने रंग में नहीं रंग पाई। जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति के आह्वान के साथ देश में 1977 में आपातकाल के बाद जो सत्ता परिवर्तन हुआ उनमें यदि महबूब साहब जैसे नेता और होते तो देश का आज नक्शा अलग होता। वे भैरोंसिंह शेखावत के नेतृत्व में राजस्थान में बनी पहली गैर कांग्रेस सरकार में मंत्री बने. उन्हें आज भी लोग “साइकिल वाले मंत्री” ने नाम से जानते हैं। राजधानी में अपने सरकारी आवास से सचिवालय में अपने आफिस तक, अपने मिलने  जुलने वालों के यहाँ और सार्वजनिक समारोहों में वे साइकिल पर ही जाते थे. सादगी का यह उनका आडम्बर नहीं था. वे खुद ऐसे ही थे। उनको अन्य विभागों के अलावा महत्वपूर्ण जलदाय विभाग का कार्यभार मिला। भारी प्रलोभनों और दबावों के सामने वे अपने कभी नहीं झुके इसीलिए संगठित राजनीति के लिए वे हमेशा त्याज्य बने रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने जीवन यापन की शुरुआत कृषि विभाग में चपरासी के रूप में करने वाले महबूब अली राजनीति के अभिजात्य वर्ग में कभी शामिल नहीं हो सके। उन्हें अपने विचारों से कोई नहीं डिगा सका। विचारों से वे ‘रेडिकल’ थे। इसका कारण उन पर एम एन रॉय का प्रभाव था। बीकानेर में छगन मोहता के वैचारिक आभामंडल में पनपी राजनेताओं और साहित्यकारों की पीढ़ी के वे प्रतिनिधि थे। रॉय द्वारा राजनैतिक दल ‘रेडिकल हयूमिनिस्ट पार्टी’ को भंग कर दिये जाने के बाद वे प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े। उसमें दो फाड़ होने पर वे बीकानेर के एक अन्य समाजवादी नेता माणिकचंद सुराणा की तरह संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से जुड़ गए। बाद में जब दोनों पार्टियाँ मिली और समाजवादी पार्टी बनी तो वे उसे सदस्य रहे। आपातकाल के बाद बनी जनता पार्टी में जब समाजवादी पार्टी का विलय हो गया तो वे उसके सदस्य हो गए। जनता पार्टी के टुकड़े होने पर वे भैरोंसिंह शेखावत के कारण भाजपा में रह गए और उसके प्रदेश उपाध्यक्ष भी बने। मगर वहाँ ‘रेडिकल’ विचारों के कारण उनका गुजारा संभव नहीं था। भाजपा छोड़ कर वे कांग्रेस में शामिल हो गए। मगर वहाँ उन जैसे आज़ाद विचारों की वहाँ भी कहाँ जगह थी। बाद में कुछ अकादमिक लोगों ने मिल कर ‘सर्वोदय पार्टी’ बनाई तो वे उससे जुड़ गए। मगर वह पार्टी कागजों तक ही रह गई। इसीलिए अपने जीवन के अंतिम दशक में वे स्वतंत्र विचारक की तरह ही रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने पत्रकारिता भी की। वे बीकानेर से निकालने वाले कभी बड़े ताकतवर माने जाने वाले अख़बार ‘सप्ताहांत’ के बरसों संपादक रहे। बाद में बीकानेर के प्रमुख बुद्धिजीवियों के साझा प्रयास से शुरू हुए महत्वपूर्ण प्रकाशन ‘मरूदीप’ के भी संपादक रहे। जब वे मंत्री बन गए तब ‘मरुदीप’ के संपादन का जिम्मा प्रख्यात साहित्यकार नंदकिशोर आचार्य ने संभाला। अंत तक महबूब अली की कलम के रंग ‘बीकानेर एक्स्प्रेस’ में नज़र आते रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने जीवन और व्यवहार में वे जितने सहज और सरल थे अपने विचारों में उतने ही कठोर थे। कोई प्रलोभन, कोई दबाव उन्हें अपने विचारों के अनुसार चलने से नहीं डिगा सकता था। जब वे मंत्री बने तो बहुतों ने उन्हें एक मुस्लिम राजनेता के रूप में खुद को प्रस्तुत कराने का जबर्दस्त प्रयास किया मगर उन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर ही एक सच्चा मुसलमान बने रहना पसंद किया और राजनीति में धर्म का भावनात्मक खेल नहीं खेला। ऐसा करना विरले राजनेताओं के बस में होता है। इसीलिए वे विरले राजनेता थे।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जलदाय विभाग के मंत्री के रूप में भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी मुहिम की कहानी आज कहें तो वह सपना सा लगती है। किस प्रकार उनकी मुहिम को रोकने के लिए धन का प्रलोभन और राजनैतिक दबाव आए और उन्होंने कोई समझौता नहीं किया उसकी मिसाल नहीं मिलती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई बार कोई व्यक्ति धन के प्रलोभन से नहीं, दबाव से नहीं मगर यारी-दोस्ती में अपने ऊसूलों से समझौता कर लेता है। मगर महबूब अली, जो बड़े मिलनसार और दोस्तों के दोस्त थे, अपने ऊसूलों के चलते दोस्तों की बात भी नहीं मानते थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महबूब अली जैसा मस्त मौला, फक्कड़ तबीयत का आदमी जो वैचारिक स्तर पर बड़ा गहरा हो उसे वर्तमान चलन की राजनीति में अजूबा ही माना जाता है। मगर ऐसे लोगों से राजनैतिक और सामाजिक मूल्य पूरी तरह तिरोहित होने से बचे रहते हैं। महबूब अली के चले जाने की पीड़ा इसलिए और घनी हो जाती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बार जलदाय विभाग की बजट मांगों पर विधान सभा में हुई बहस का जवाब देते हुए उन्होंने कहा था “ हम जब सड़क पर चलते हैं तो बीच-बीच में अपने पाँव से जमीन को खुरच कर देखते भी रहते हैं कि हम जमीन पर ही हैं ना। हवा में तो नहीं उड रहे है”। महबूब साहब कभी हवा में नहीं उड़े। हमेशा जमीन से जुड़े रहे। कष्ट सह कर भी अपने ऊसूलों से कभी समझौता नहीं किया। राजस्थानवासियों को अपने इस सपूत पर हमेशा गर्व रहेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(यह आलेख जनसत्ता के दिनांक 25 फरवरी, 2011 के अंक में छपा)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5185840046950412717-4862724195920339295?l=itslokayat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itslokayat.blogspot.com/feeds/4862724195920339295/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5185840046950412717&amp;postID=4862724195920339295' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/4862724195920339295'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/4862724195920339295'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itslokayat.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='महबूब अली : सार्वजनिक जीवन में सादगी और ईमानदारी की मिसाल'/><author><name>Rajendra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S-Gx1DliFGI/AAAAAAAAArU/4OCr_2fmGn8/S220/photo.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-suMRbPsCfcw/TW_rt0Ln1DI/AAAAAAAAAuo/ihRSFFp9EGY/s72-c/P2051_04-06-10.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5185840046950412717.post-5399030926992680201</id><published>2011-02-12T09:23:00.000-08:00</published><updated>2011-02-12T09:29:07.490-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Rajasthan Patrika'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Vijay Bhandari'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Ashok Gehlot'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Rrajasthan'/><title type='text'>अशोक गहलोत रखते हैं फूँक-फूँक कर कदम, मगर कदम के निशां तक नहीं</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-MD8VSxHx5uE/TVbClWM1NCI/AAAAAAAAAuM/uzXTBS_bO-g/s1600/Gahlot.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 251px; height: 201px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-MD8VSxHx5uE/TVbClWM1NCI/AAAAAAAAAuM/uzXTBS_bO-g/s320/Gahlot.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5572855535787914274" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;राजेंद्र बोड़ा &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजस्थान पत्रिका ने आज (12 फरवरी, 2011) के अंक में अपने पूर्व संपादक विजय भण्डारी का एक लेख “फूँक-फूँक कर कदम” प्रकाशित किया है। भण्डारी कहते हैं कि राज्य में अब तक हुए कुल 11 मुख्य मंत्रियों (नौ कांग्रेस, दो भाजपा) में अशोक गहलोत “पहले ऐसे मुख्य मंत्री हैं, जो आम आदमी की बोली बोलने में गुरेज नहीं करते हैं”। इसके लिए वे गहलोत के उस सार्वजनिक वक्तव्य को आधार बनाते हैं जिसमें कहा गया है कि पुलिस के थानेदारों की जानकारी में है कि उनके क्षेत्र में कौन चोर है, मगर वे उन्हें पकड़ते नहीं। भण्डारी गहलोत के इस वक्तव्य से खुद “चकित” हैं। वे कहते हैं कि “थानेदारों को राज्य के पदासीन मुख्य मंत्री द्वारा इससे बड़ा काला प्रमाणपत्र क्या हो सकता है? मुख्य मंत्री ने उनका चेहरा काला पोत के रख दिया है, लेकिन उन्हें (थानेदारों को) शर्म नहीं आती है”। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भण्डारी बाद में यहाँ तक लिख बैठे कि “अशोक गहलोत ने अपने द्वितीय कार्यकाल के 26 महीनों में प्रशासन के अनेक लोगों के मुँह काले पोत दिये मगर उनके कान में जूँ नहीं रेंगी”। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे वक्तव्यों में वे अशोक गहलोत के बड़े सुकोमल रूप को देखते हैं। वे यह भी कहते हैं कि “हालांकि नए कार्यकाल में कोई विशेष परिवर्तन हो गया हो ...ऐसा तो नहीं है, लेकिन चेष्ठा दिखाई देती है”। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सवाल उठाते हुए कि “गहलोत को अपनी कमीज ही चमकाने की चिंता क्यों है? भण्डारी खुद ही जवाब देते हैं गहलोत समझ गए हैं कि “राजनेताओं से अधिक आमजन जागरूक है। उसके सामने आपकी चोरी छिपती नहीं”। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भण्डारी आमजन की जागरूकता की बात तो करते हैं मगर गहलोत की चमकती कमीज पर कोई छाया नहीं पडे इसका भी ध्यान रखते हैं। गहलोत के प्रति ऐसा मोह दिखाने वाले वे अकेले पत्रकार नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राज्य के सारे अख़बारों, जिसमें राजस्थान पत्रिका भी शामिल हैं, के पन्ने रोजाना ऐसे समाचारों से भरे रहते हैं जिसमें कानून, व्यवस्था और प्रशासनिक व्यवस्थाएँ छिन्न भिन्न हुई साफ दीखती है। मगर भण्डारी उन पत्रकारों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिन्हें इन सारी प्रशासनिक असफलताओं से गहलोत का दामन बचाने का मोह है। वरना क्या कारण है कि जिन प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों की अपराधियों से मिलीभगत की ओर गहलोत अपने वक्तव्य में बात कर रहे हैं उसके लिए लिए उन्हें साधुवाद दिया जाता  है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुख्यमंत्री की यह साफ़गोई नहीं है। वरना गहलोत अपने मातहत अफसरों का मुँह काला पोतने वाला सार्वजनिक वक्तव्य देने से पहले अपनी भूमिका पर ध्यान देते। लोकतंत्र में शासन में बैठे राजनेता जनता के नुमाइन्दे होते हैं। जनता उन्हें राज में इसलिए भेजती है कि वे उनकी आकांक्षाएं और अपेक्षाएं पूरी करेंगे। आमजन जो जानता है उसकी मुख्य मंत्री से ताईद की जनता को दरकार नहीं है। आमजन चाहते हैं कि जो गड़बड़ी मुख्यमंत्री की जानकारी में आ गई है वह तो कम से कम दूर हो। राज्य के शीर्ष पर बैठा कोई राजनेता अपनी इस जिम्मेदारी से सिर्फ इसलिए नहीं बच सकता कि वह तो खुद ही जनता की समस्या बता रहा है। जनता चाहती है मुख्यमंत्री जी समस्याएँ बताना छोड़ें उनके समाधान की बात करे और उसे करके बताएँ। जनता अपने प्रतिधियों को इसलिए नहीं चुनती है कि वह कुर्सी पर बैठ कर उन्हें उपदेश देने लगे या वह कुछ कर नहीं पा रहा है उसके लिए अपनी कमजोरी का ठीकरा दूसरों पर फोड़ता रहे और बहाने बनाता रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गहलोत शासन के प्रमुख हैं इसलिए वे अपने प्रशासनिक अफसरों के बारे कुछ भी कह सकते हैं। मातहत उन्हें जवाब भी नहीं दे सकते। प्रशासन तंत्र में बैठे लोगों को संवैधानिक और सेवा नियमों की मर्यादाओं  का पालन करना होता है। राजनेता के लिए सब छूट है। इसलिए गहलोत तो अपने प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों का “काला मुँह” कर सकते हैं पर खुद उनसे जवाब कौन माँगे। लोकतंत्र में जनता यह जवाब पाँच साल बाद माँगती है। मगर पाँच साल के कार्यकाल के दौरान निर्वाचित प्रतिनिधियों से सवाल करने का दायित्व अखबारों का होता है क्योंकि लोकतांत का ‘चौथा स्तंभ’ कहलाने वाले पत्रकार भी जनता के नुमाइन्दे होते है जिनका काम केवल सूचना देना नहीं होता बल्कि लोग जो बोल कर कह नहीं सकते उसे अभिव्यक्ति देना। अभिव्यक्ति की आज़ादी हमें अपने संविधान से मिलती है। किसी के रहम-ओ-करम से नहीं। मगर जब हम कहते हैं “मीडिया” तब सूचना के सभी स्रोत – अख़बार, रेडियो, टीवी समेत – व्यवसायगत हो जाते हैं। मीडिया बाज़ार की चाल चलता है और उसी के लिए हो रहता है। बाज़ार सिर्फ पूंजी के लिए होता है मगर वह यह भ्रम पैदा करने में सफल रहता है कि वह ग्राहक के लिए है। खुले बाज़ार के पैरोकार ग्राहक को चुनने की छूट देने का लोकतान्त्रिक ढोंग रचते हैं। उसी प्रकार आज के अख़बार, जो अब प्रिन्ट मीडिया कहलाने लगे हैं, यह भरम बनाए रखते हैं कि शासन-प्रशासन पर खोजी निगाह उनकी है और वे जनता की बात करते हैं।  मगर वास्तव उनका सरोकार अपने मुनाफे से होता है जिसे वे उंन स्रोतों से भी पाते हैं जिसका उनके सूचना के व्यवसाय से कोई संबंध नहीं होता। अख़बार से मुनाफा पाने के साथ वे इसके प्रभाव का उपयोग अपने इतर व्यवसायों के हित साधने का बड़ी चालाकी से करते है। यह चालाकी हमें मौजूदा राजनैतिक दौर में साफ नज़र आती है। यदि यह चालाकी नहीं होती तो तो प्रशासनिक असफलता के लिए गहलोत से सवाल क्योंकर नहीं होता। आज के मीडिया में भण्डारी अकेले नहीं हैं जो यह तो कहते हैं कि आम आदमी तकलीफ में है, हर ओर भृष्टाचार का आलम है मंत्री नाकारा हैं और सबसे बढ़ कर राज का कोई रुतबा नहीं रह गया है मगर इसके लिए वे मासूमियत से गहलोत को सुरक्षा कवच भी देते हैं और कहते हैं कि गहलोत तो बड़े स्वछ हैं मगर उनकी टीम ठीक नहीं है। कोई यह नहीं कहता कि गहलोत कमजोर व्यक्ति या नेता हैं। सभी उनकी राजनैतिक ताकत को हिमालय जैसी मानते हैं। यदि वे ऐसे ताकतवर हैं तो उन्होने कमजोर और भृष्ट टीम क्यों चुनी। इसका जवाब उनकी पैरवी करने वाले मीडियाकर्मी यह कह देते हैं कि उनकी राजनैतिक मजबूरी है। मजबूरी वाला नेता ताकतवर हुआ या कमजोर हुआ? एक तरफ सभी गहलोत को एक ताकतवर नेता मानते हैं मगर उन्हें अपने मंत्रियों और प्रशासनिक अधिकारियों के सामने लाचार भी मानते हैं। यह अंतर्विरोध किसी को नहीं दिखता या देखना नहीं चाहते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गहलोत का सत्ता व्याहमोह अनोखा है। उनका सच सिर्फ अपनी कुर्सी का सच है। उन्होंने अपने आभामंडल का एक सुरक्षा घेरा बना रखा है। मगर इस घेरे से बाहर वे खुद भी कुछ नहीं देख पा रहे है, यह कड़वा सच कोई उन्हें नहीं कहता। यह घेरा उन्हें दीवार पर लिखी लिखाई नहीं देखने देता। यह घेरा उनकी सफलताओं के कसीदों की इतनी तेज रोशनी करता है कि उसमें उनकी खुद की आँखे चौंधिया जाती है और उन्हें जमीनी हकीकत के मुकाबले इसी घेरे की दुनिया सच लगने लगती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गहलोत के पिछले कार्यकाल में भी ऐसा ही था। तब उनके अपने शिवचरण के अख़बार ‘लोक दशा’ के पहले पन्ने पर एक आलेख ने गहलोत को जगाने का प्रयास करते हुए लिखा था कि वे इस घेरे के बाहर देखें। मगर गहलोत ऐसा नहीं कर पाये और चुनाव परिणामों ने वास्तविक तस्वीर से उन्हें रूबरू करा दिया। उन्हें परास्त कर सत्ता में आई वसुंधरा राजे भी अपनी शाही घेरे की चकाचौंध से व्यामोहित रही और अपने घेरे के बाहर की दुनिया का पता उन्हें चुनाव परिणामों ने ही दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर चुनाव जीत कर आए गहलोत से लोगों की जबर्दस्त अपेक्षा थी कि वे अपने पिछले कार्यकाल और काम काज के नतीजों से बहुत कुछ सीख कर आए होंगे और अपने दूसरे कार्यकाल में राजस्थान को मजबूत और कुशल नेतृत्व देंगे। मगर मजबूती की जगह एक ऐसा लाचार राजनेता हमारे सामने आता है जिसकी सारी कोशिशें कुर्सी के लिए होती है। जो अपने प्रशासन को कुशल नहीं बना सकता। वह समझौते करता है। जो आदर्शों की बातें करता है मगर जिसमे उन्हें व्यवहार में लाने की कोई गंभीरता नहीं। गहलोत ऐसे क्यों है इसके लिए वे राजनैतिक परिस्थितियां जिम्मेवार हैं जिसमें उन्होंने सत्ता की सीढ़िया चढ़ी। जब उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया तब राज में से नीतियाँ तिरोहित हो रही थीं और व्यक्तिवाद अपनी नींव पक्की कर रहा था। ऐसे में जोधपुर से अशोक गहलोत के रूप में जो राजनेता प्रदेश के परिदृश्य पर उभरा वह ‘सेल्फ मेड’ था। उसने कांग्रेस की आंतरिक राजनीति को पूरी तरह साध लिया। अब वे अपने ही बुने राजनीति के जाल में घोर अकेले हैं। उनका अकेलेपन का शोर उनके वक्तव्यों में फूट पड़ता है। वे मीडिया के जरिये अपनी छवि को सरल, सौम्य और मिस्टर क्लीन दिखाये रखने में सफल रहते हैं। मगर वे भूल जाते हैं कि मीडिया द्वारा बनाई गई छवि एक हद तक ही बनी रह सकती है। इसमें ख़तरा यह होता है कि मीडिया में बनवाई गई छवि को खुद वह व्यक्ति सच मानने लगता है। राजस्थान पत्रिका में छपा यह लेख गहलोत को ऐसे ही भुलावे में डालता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5185840046950412717-5399030926992680201?l=itslokayat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itslokayat.blogspot.com/feeds/5399030926992680201/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5185840046950412717&amp;postID=5399030926992680201' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/5399030926992680201'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/5399030926992680201'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itslokayat.blogspot.com/2011/02/blog-post_12.html' title='अशोक गहलोत रखते हैं फूँक-फूँक कर कदम, मगर कदम के निशां तक नहीं'/><author><name>Rajendra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S-Gx1DliFGI/AAAAAAAAArU/4OCr_2fmGn8/S220/photo.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-MD8VSxHx5uE/TVbClWM1NCI/AAAAAAAAAuM/uzXTBS_bO-g/s72-c/Gahlot.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5185840046950412717.post-4150363441143057102</id><published>2011-02-09T20:05:00.000-08:00</published><updated>2011-02-09T20:14:57.456-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Music'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='jodhpur'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Gandhi'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='rajasthan'/><title type='text'>गीत-संगीत में ढल कर आम जन तक पंहुचे गांधी</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/TVNk3BUxe5I/AAAAAAAAAuE/ZV-6w-CrIaE/s1600/Gandhi_image.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 228px; height: 221px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/TVNk3BUxe5I/AAAAAAAAAuE/ZV-6w-CrIaE/s320/Gandhi_image.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5571908060398582674" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;राजेंद्र बोड़ा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महात्मा गांधी का संगीत से क्या वास्ता हो सकता है। सतही तौर पर देखने पर गांधीजी का जीवन बड़ा ही नीरस और उबाऊ लग सकता है। एक राजनेता और समाज सुधारक की महात्मा गांधी की छवि में आम तौर पर कला या संगीत के लिए कोई स्थान नहीं दिखता। संगीत और अन्य कलाओं के लिए उनके पास वक्त ही कहाँ था। देश की आजादी और विभिन्न समुदायों खास कर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच भाईचारे को मजबूत बनाने के लिए प्रयासों में ही उनका सारा जीवन बीत गया। खुद उनके जीवनकाल में लोगों को लगता था कि वे जिस प्रकार का जीवन व्यतीत करते हैं और जिस सादे जीवन की अपेक्षा वे लोगों से करते हैं उसमें संगीत जैसी कलाओं का कोई स्थान नहीं हो सकता। ख्यातनाम गायक दिलीप ने एक बार गांधीजी से संगीत की चर्चा छेड़ ही दी। दिलीप बंगाल के जाने माने नाट्यकार द्विजेंद्रलाल राय के बेटे थे और गायन के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति पा चुके थे। संगीत की बात छेडते हुए दिलीप ने कहा महात्मा जी मुझे लगता है हमारे स्कूलों और कालेजों में हमारे खूबसूरत संगीत की उपेक्षा होती है। जवाब में गांधी जी बोले “यह दुर्भाग्यजनक है। मैंने तो हमेशा ही यह कहा है”। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिलीप ने जब महात्मा जी से कहा कि वे तो इस भ्रांति में थे कि आपके जीवन में कला  का कोई स्थान नहीं है। मैं तो यह सोचता था कि आप जैसा संत तो संगीत का विरोधी होगा। गांधी जी चौंक कर बोले “संगीत के खिलाफ और मैं?” फिर बापू कहने लगे “मेरे बारे में लोग ऐसी ऐसी बातें फैला देते हैं कि मेरे लिए उनका प्रतिकार करना भी असंभव हो जाता है। नतीजा यह होता है कि जब मैं कहता हूँ कि मैं खुद एक कलाकार हूँ तो लोग मुस्करा देते हैं”।  गांधी जी ने आगे और खुलासा किया कि “मैं तो मानता हूँ कि धर्म का विकास बिना संगीत के हो ही नहीं सकता था”।   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम जानते हैं कि गांधी की प्रार्थना सभाओं में सभी धर्मों के भजन गाये जाते थे। यह भजन गायन संगीत नहीं तो और क्या था। महान गायिका जुथिका राय ने कुछ दिनो पूर्व जयपुर में गांधीजी का एक प्रसंग सुनाया था। गांधी जी कलकत्ता आए तब वे पहली बार उनके “दर्शन करने” गई थी। तब अत्यंत व्यस्त होने के बावजूद गांधी जी ने जुथीका राय से भजन सुने थे। जब जुथीका रॉय पहुँची तब गांधीजी नहाने के लिए जा रहे थे। उन्होंने जुथीका से कहा मैं पास के कमरे में नहाता हूँ तुम यहाँ बैठ कर गाओ। और जब तक गांधी जी नहा कर बाहर नहीं आ गए किशोरी जुथीका एक के बाद एक भजन गाती रही। गांधी जी बहुत प्रसन्न हुए और गायिका को खूब आशीर्वाद दिया। फिर बोले तुम्हें शाम को प्रार्थना सभा में गाना है। जुथीका को को प्रार्थना स्थल तक ले जाने के लिए एक मोटर कार आई और कलकत्ता में हजारों लोगों के समक्ष जुथीका के भजन के साथ गांधी जी की सभा का समापन हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहा जाता है कि एक बार नारद जी ने भगवान विष्णु से पूछा कि आप कहाँ निवास करते हैं ? &lt;br /&gt;भगवान ने कहा : &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;नाहं वसामि वैकुंठे योगिनां हृदये न च, &lt;br /&gt;मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद । &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात न मैं वैकुंठ में वास करता हूँ और न योगियों के हृदय में।&lt;br /&gt;हे नारद जहाँ मेरे भक्तगण मेरा गान करते हैं मैं वहाँ वास करता हूँ। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांधीजी की प्रार्थना सभाओं में सभी धर्मों के गीतों का गान होता था। इसीलिए वहाँ भगवान विष्णु का वास होता था। इसीलिए वहाँ से प्रेम और भाईचारे की गंगा प्रवाहित  होती थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांधीजी का भारतीय जन जीवन पर गहरे तक प्रभाव रहा। वे हर परिवार के बुजुर्ग या मुखिया की तरह हो गए।  इसीलिए कवि ने कहा “चल पड़े जिधर दो डग मग में/ चल पड़े कोटि पग उसी ओर”। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांधी की गूँज कवियों की कविताओं में और आम जन के लोक गीतों में जाम कर उभरी। गांधी ने सूट कातने का नारा दिया तो हर तरफ यह गीत गूँज उठा “कतली कातो मेरे भाई इसको गांधी ने अपनाई”। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अहिंसा के पुजारी के लिए देश के बच्चे बच्चे ने गया “दे दी हमें आजादी बिना खड़ग बिना ढाल/ साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल।“ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी मृत्यु तक गांधीजी के सचिवे रहे महादेव देसाई के बेटे नारायण देसाई तो देश के कोने कोने में गांधी कथा का वाचन करते फिरते हैं और हर जगह उनके गान को सुनने के लिए लोग लालायित रहते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांधी के महाप्रयाण के बाद राजेंद्र क़ृष्ण की लिखी गांधी कथा जिसे हुस्नलाल भगतराम ने सुरों में बांधा था घर-घर गूँजी। “सुनो – सुनो ए दुनिया वालों बापू की ये अमर कहानी” को कौन भूल सकता है जिसे मोहम्मद रफी ने बड़े मनोयोग से गाया था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जोधपुर में विवाह के मौके पर पुष्करकरणा ब्राह्मणों में महिलाएँ जो गीत गातीं हैं उन में गांधीजी का भी जिक्र आता है। एक गीत में महिलाएँ गातीं है चरखा कातो क्योंकि गांधी जी ने ऐसा कहा है। पुष्करणा ब्राह्मणों के विवाह गीतों में सामाजिक सुधार की यह भावनाएँ स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों और सामन्ती शासन से लोहा ले रहे सेनानियों पर गांधी जी के प्रभाव के कारण समाहित हुई। इन सेनानियों में एक प्रमुख नेता थे जयनारायण व्यास। वे न केवल राजनेता थे बल्कि गीत संगीत और नृत्य में स्वयं बड़े माहिर थे। उनके लिखे गीतों नें लोगों में आज़ादी की लड़ाई का जोश ही नहीं फूंका बल्कि सामाजिक कुरीतियों पर भी वार किया और समाज को सुधार की तरफ प्रेरित किया। जयनारायण व्यास जो बाद में राजस्थान के मुख्यमंत्री बने ने गांधीजी पर एक गीत लिखा और गाया भी। वह गीत उनकी ही आवाज में मारवाड़ी रिकार्ड कंपनी ने जारी किया जो आज हमारी ऐतिहासिक धरोहर है।   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस गीत को आज फिर याद करना बड़ा ही अनोखा अनुभव है। सीधे सरल शब्दों में मारवाड़ी में व्यास जी ने गाया &lt;span style="font-style:italic;"&gt;“साथीड़ा रे, करमोजी रे घरे जायो रे/ मोहन जी नाम धरायो रे / भारत आज़ाद करायो रे / म्हारो बाबो गांधीजी। &lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;आगे वे लोगों को सीख देते हुए गाते हैं “साथीड़ा गांधी दोय बात बताई रे / हिंसा तज राख सच्चाई रे / आ सीख घणी सुखदाई रे / म्हारो बाबो गांधी जी”। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;व्यासजी अपने गीत में गांधी के हवाले से केवल अहिंसा और सच्चाई की ही बात नहीं करते बल्कि समाज में व्याप्त कुव्यसनों को छोडने और ईमानदारी पर भी ज़ोर देते हैं और गाते हैं &lt;span style="font-style:italic;"&gt;“साथीड़ा रे पर नारी ने माता जाणो रे / पर धन पापोड़ो मानो रे / जन सेवा ने अपनाणो रे / म्हारो बाबो गांधी जी”। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांधी के रास्ते को निराला बताते हुए शेरे राजस्थान कहलाने वाले जयनारायण व्यास आखिर में कहते हैं “साथीड़ा रे गांधी रो पंथ निरालो रे / सब कौमां हिल-मिल चालो रे/ थे छूआ-छूत मिटावो  रे / म्हारों बाबो गांधी जी”। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस जमाने की 78 आरपीएम रेकार्ड पर गीत के तीन अंतरे ही आते थे इस लिए व्यास जी के गीत का चौथा और अंतिम अंतरा उसमें नहीं है। उस अंतरे में वे उन्होंने कहा : &lt;span style="font-style:italic;"&gt;“गांधी रे पथ पर चालो रे / सत न्याय मार्ग अपनालो रे / अड़कर अन्याय मिटलों रे / म्हारों बाबो गांधी जी।  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नारी उत्थान और सामाजिक सुधार के लिए जयनारायण व्यास के गीतों अन्य गीतों में भी गांधी की सीख की झलक मिलती है। उनके एक अत्यंत लोकप्रिय गीत “सुनो सुलक्षणी नार” में वे कहते हैं : &lt;span style="font-style:italic;"&gt;“सुनो सुलक्षणी नार बात तेरे हितकारी है, विनय हमारी है / ... बचा बचा तू बचा देश को, जो कुछ भी उपकारी है”&lt;/span&gt;।  आज भी जब स्त्रियाँ यह गीत गाती हैं तो उसमें गांधी के बोल सुनाई पड़ते हैं : &lt;span style="font-style:italic;"&gt;“कह निज पति को प्रेम भाव से, जो तो कृष्ण मुरारी है / देशी पहनूंगी यह बात मैंने विचारी है, विनय हमारी है / चरखा ला दो मैं कातूंगी, इसकी छवि कुछ न्यारी है... कते सूत से मुझे बनादो, वस्त्र सभी जो जारी है”&lt;/span&gt;।      &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार गीत और संगीत में ढल कर महात्मा गांधी के विचार और उनका जीवन दर्शन आम जन तक पंहुचे और समूचे देश में एक ऐसी चेतना जगाई जिसने ‘हम भारत के लोग’ वास्तव में अपनी सामर्थ्य पहचान सके। &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;(स्वर सरिता के फरवरी 2011 के अंक में प्रकाशित आलेख) &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5185840046950412717-4150363441143057102?l=itslokayat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itslokayat.blogspot.com/feeds/4150363441143057102/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5185840046950412717&amp;postID=4150363441143057102' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/4150363441143057102'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/4150363441143057102'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itslokayat.blogspot.com/2011/02/blog-post_09.html' title='गीत-संगीत में ढल कर आम जन तक पंहुचे गांधी'/><author><name>Rajendra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S-Gx1DliFGI/AAAAAAAAArU/4OCr_2fmGn8/S220/photo.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/TVNk3BUxe5I/AAAAAAAAAuE/ZV-6w-CrIaE/s72-c/Gandhi_image.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5185840046950412717.post-9003032843458412414</id><published>2011-02-07T11:22:00.000-08:00</published><updated>2011-02-07T11:29:07.404-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='jaipur literature festival'/><title type='text'>जयपुर लिट्रेचर फेस्टीवल : कंचन के सहारे साहित्यिक गुणों को परिभाषित करने का प्रयास</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/TVBHS_dYmeI/AAAAAAAAAt8/OmO9MQKVfMA/s1600/jaipur-literature-festival-3.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/TVBHS_dYmeI/AAAAAAAAAt8/OmO9MQKVfMA/s320/jaipur-literature-festival-3.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5571031130655201762" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;राजेन्द्र बोड़ा&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजधानी में होने वाला जयपुर लिटरेचर फेस्टीवल, अंतर्जाल (इंटरनेट) के एक खबरिया मुकाम ‘डेली बीस्ट’ के मुताबिक, विश्व के अव्वल नंबर के समागमों में शुमार हो गया है। उसने इसे “धरती पर साहित्य का महानतम प्रदर्शन” बताया। आयोजक खुश थे कि उनके प्रयासों की सफलता का डंका सभी मानने लगे हैं। लिटरेचर फेस्टिवल का इस बार यह छठा सालाना संगम था। इस समारोह की कल्पना को जयपुर में पहली बार साकार ब्रितानवी मूल की महिला फेथ सिंह ने जयपुर विरासत फ़ाउंडेशन के झंडे तले किया था। छह सालों के सफर में इस आयोजन की सफलता इसी से आँकी जा सकती है कि इस बार उसके पास प्रायोजकों की भीड़ थी। प्रमुख प्रायोजक डीएससी कंपनी थी जो राजमार्ग और रेल पथ के साथ पन बिजली उत्पादन के क्षेत्र में बड़ी निवेशक है। समारोह पर बड़ा निवेश करने की एवज में इस बार उसके नाम से – “डीएससी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल” का आयोजन हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर बार की तरह इस बार भी जलसे में अभिजात्य लोगों की खूब रौनक रही। यह सवाल अलहदा है कि क्या यह अभिजात्य वर्ग सचमुच साहित्य पढ़ता है या उसे तस्वीर की तरह देख कर अलग रख देता है या उसे अपने ड्राइंग रूम में सजा देता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभिजात्य वर्ग के लोग कभी-कभी अवकाश चाहते है। उच्चतर किस्म का काम करके – बौद्धिक काम, आध्यात्मिक काम। कुछ समय के लिए फुर्सत की तलाश। मार्शल मैक्लूहन ऐसे लोगों को “ड्राप-आउट” की संज्ञा देते हैं। ऊबे हुए लोग, समाज विमुख लोग। दूसरे लोग उनसे जुड़ना चाहते हैं क्यों कि वे महत्व चाहते हैं। जैसे एक देह से निकल कर दूसरी देह में घुस जाने की चाह। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आलीशान मेले में शामिल लोगों को अपनी अहमियत मालूम थी। अहमियत रखने वालों मे शामिल होने की ललक हर प्रतिभागी में थी। सहभागियों में अपने बड़प्पन का छद्म था। बुद्धिवाद का नजारा चहुं ओर बिखरा पड़ा था। डिज़ाइनर चश्मे, डिज़ाइनर परिधान, डिज़ाइनर भौहें, डिजाइनर काजल। नई वर्ण व्यवस्था का नया डिजाइनर वर्ग। शास्त्र जीवी होने का अभिमान लिए अर्थ जीवियों का यह अद्भुत संगम था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक भिखारी द्वारा अपने बच्चे को लेकर वहाँ पहुँचने पर उसका भी वहाँ स्वागत का घोष करके आयोजकों ने उसे बराबरी का अधिकार देने का बड़प्पन दिखाया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्थानीय भागीदारों को लगा जैसे वे साहित्य के अभिजात्य वर्ग में शामिल हो रहे हैं मगर वास्तविकता में वे उनके अनुगामी बने। आयोजक आश्रयदाता थे। समृद्धवर्गीय स्वार्थ। आयोजन समृद्धि का एक उपकरण।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह आयोजन बाज़ार जनित था। बाज़ार को आडंबर की जरूरत होती है। भारतीय संस्कृति और पश्चिम में यही फर्क है। भारत की बौद्धिक परंपरा पश्चिम की बौद्धिक परंपरा से भिन्न रही है। उनके लिए संस्कृति सिर्फ समारोह है या इतिहास है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रोफ़ेशनल राइटर्स – जो धड़ाधड़ छपे और खूब पैसे कमाए। बाज़ार को ऐसे लेखकों की ही जरूरत होती है जो उसे भी कमाकर दे। ऐसे फेस्टीवल एक उपक्रम होते हैं।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाज़ार को ऐसे लेखक चाहिए जो उसके लिए लिखे। वह अपना उत्पाद खपाने और उसके उपभोक्ता पैदा करने के लिए ऐसे फेस्टीवल करता है। यह रीत दुनिया भर में चल रही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तात्कालिक आवश्यकताओं कि पुस्तकें ही बाज़ार में सबसे अधिक दिखती हैं। नया दौर कहानीनुमा इतिहास लिखने का है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो छप रहा है वह खरा हो आवश्यक नहीं है। परंतु वही खरा है इसका भ्रम बनाने और उसके खरीददार पैदा करने में आज का विज्ञापन युग का बाज़ार पूरी तरह सक्षम है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाज़ार में क्या चलना चाहिए यह भी बाज़ार की ताक़तें ही तय करती हैं। इसे कुछ लोग साहित्यिक सद्प्रयास कहते हैं। बाज़ार की यह खूबी होती है कि वह यह भुलावा सफलता से दे देता है कि उसके यहाँ विरोधी के लिए भी जगह है। ऐसा करते हुए वह सर्वव्यापी हो जाता है जो उसका धर्म है। इसीलिए समारोह में चे गवेरा, जिसने पूरी उम्र पूंजी के आधिपत्य से लड़ते हुए गुजारी और अपना जीवन कुरबान कर दिया, की जीवनी पर चर्चा को पूंजीवाद की पोषक बहुराष्ट्रीय कंपनी गोल्डमैन साक्स प्रायोजित करती है तो क्या आश्चर्य। यह भी अभिजात्य वर्ग का मनोरंजन होता है। बाबा नागार्जुन की फकीरी की बातें सुन कर सहभागियों को आनंद हुआ और मामूली लोगों का मसीहा गैर मामूली लोगों के रंजन का साधन बना। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ ने एक बार अखिल भारतीय रेडिकल ह्यूमेनिस्ट एसोसिएशन के द्विवार्षिक सम्मेलन में स्वागत भाषण देते हुए जो बात कही थी वह आज याद आती है। उन्होंने कहा था: “हमारा सार्वजनिक जीवन एक व्यापक दूषण से दूषित है जिसे अंग्रेजी अभिजात्यवाद कहा जा सकता है। मैंने कई बार सोचा है कि क्या यह बात सच नहीं है कि अंग्रेजी के प्रति इस मोह के और सत्ता की राजनीति के बीच एक घनिष्ठ संबंध है।... इसका  यह अर्थ नहीं कि अंग्रेजी का परित्याग या बहिष्कार किया जाये, आशा यही है कि उसे उसके उचित पद पर बैठाया जाए और उसके साथ जुड़ी हुई उच्चता और अभिजात्य की भावना का परित्याग किया जाये। अंग्रेजी के साथ सत्ता के अधिकार का जो दावा जुड़ा रहता है उसका खंडन किया जाए”। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंग्रेजी की आक्रामकता केवल शोषण के लिए रही है। अंग्रेज दूसरी दुनिया पश्चिम से आए, यहाँ बसने के लिए नहीं केवल मुनाफा कमाने के लिए - शोषण करके। हमारे पास इनका सीधा रचनात्मक और ध्वंसात्मक जवाब न तब था न आज है।   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज की राज व्यवस्था ने इस आयोजन को सांस्कृतिक समारोह माना। फिल्म अभिनेता सलमान खान को अपना प्रिय मानने वाली राजस्थान की कला और संस्कृति मंत्री बीना काक, जिन्हें अपने दो वर्ष के कार्यकाल में राज्य की कला संस्कृति, भाषा और साहित्य अकादमियों की एक बार भी सुध लेने की फुर्सत नहीं मिली, वे इस आयोजन पर इतनी मेहरबान हुई कि उसके लिए राज कोष से दस लाख रुपयों का अनुदान घोषित कर दिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे राजनेताओं को यह दंभ रहता है कि वे संस्कृति और साहित्य पर अनुग्रह करते हैं। मगर वे ही बाज़ार के सामने मिमियाते हुए उसके लिए सार्वजनिक कोष की राशि उंडेलते नहीं अघाते। वैसे आज की सरकारों से सुबुद्धि की अपेक्षा करना व्यर्थ है। ऐसे समय हमें चिंतक लेखक विद्यानिवास मिश्र की वह टिप्पणी याद आती है जिसमें उन्होंने कहा था “शूद्र समाज तो वह है जहाँ कंचन के सहारे सारे गुण परिभाषित होते हों”।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे फेस्टीवल बाज़ार के हो रहे लेखकों की ख्याति बढ़ाने के विज्ञापनी जतन करता है। इसमें आज का मीडिया उसका भागीदार बनता है। कभी इसी फेस्टिवल में स्थानीय अस्मिता के सवाल पर फेस्टीवल की एक प्रमुख कर्ताधर्ता नमिता गोखले से तूँ-तूँ मैं-मैं की हद तक उतर जाने वाला ‘दैनिक भास्कर’ इस बार उसका प्रायोजक था। बाज़ार ने अखबारों की यह मजबूरी कर दी है कि उन्हें यदि उसका साथ चाहिए तो अपने ऐसे पाठक बढ़ाए जो बाज़ार के अन्य उत्पादों के उपभोक्ता भी हों। ऐसे ही उपभोक्ताओं की तलाश में ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’, ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ और ‘दैनिक भास्कर’ जैसे अपने को सबसे बड़ा कहने वाले अख़बार फेस्टीवल में खुले हाथों से मुफ्त बाँटे जा रहे थे।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फेस्टीवल का दामन पकड़ने में ‘दैनिक भास्कर’ से पीछे रह गए दूसरे प्रमुख अख़बार ‘राजस्थान पत्रिका’ की खीज उसके प्रथम पृष्ठ पर रामकुमार की एक प्रभावी  टिप्पणी के रूप में सामने आई “... कौन ठगवा नगरिया लूटन हो”। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समारोह में साहित्यिक प्रेरणा को उकसाने का कोई श्रम हुआ हो हमें नहीं मालूम। एक अनुशासित समय ढांचे में सभी कुछ डिजाइन की हुई चीजें। जैसे सबसे पहले सूत्रधार का वक्तव्य फिर लेखक से कुछ सवाल जिसके जवाब उसी किताब की प्रस्तावना में जिस पर चर्चा की जा रही हो मौजूद होते है जिसे वह फिर दोहरा देता है। इसके बाद लेखक द्वारा किताब के कुछ अंशों का वाचन और अंत में सामने जुटे लोगों को लेखक से सवाल करने की इजाजत। मगर उनमें सवाल कम अपना ज्ञान बघारने की मत्वाकांक्षा अधिक झलकती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसीलिए आम आदमी आयोजकों की दिखावटी नेकनीयता के बावजूद समारोह से दूर रहा। कोई रोक टोक नहीं थी। सभी के लिए एंट्री फ्री। मगर जो अंदर थे वे जलसे का डिज़ाइनर तमगा गले में लटकाए रखने की अजीब तहज़ीब से बंधे थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह हमारे समय और समाज की विडंबना है कि हमारी सामाजिक चेतना को झंझोड़ने वाले सभी साधन ऐसे लोगों के हाथों में है जो तेजी से केंद्रित होते जा रहे हैं और हमारी बुद्धि को कंडीशंड कर रहे हैं।  बुद्धि को कुंठित और निष्प्राण किए बिना कोई भी निकृष्ट स्वार्थपरकता संभव नहीं है।    &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे आयोजनों में शामिल होने वाले अपनी आत्मिक पराजय को शायद स्वीकार नहीं करें मगर बाज़ार की जीत को तो सभी को स्वीकार करना ही पड़ेगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे जलसे एक पाखंड रचते हैं। कहा गया है कि लेखन या तो लेखक के लिए होता है या मनोरंजन के लिए। दोनों रास्ते विनाश के है। फेस्टीवल से यही रास्ता निकलता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5185840046950412717-9003032843458412414?l=itslokayat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itslokayat.blogspot.com/feeds/9003032843458412414/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5185840046950412717&amp;postID=9003032843458412414' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/9003032843458412414'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/9003032843458412414'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itslokayat.blogspot.com/2011/02/blog-post.html' title='जयपुर लिट्रेचर फेस्टीवल : कंचन के सहारे साहित्यिक गुणों को परिभाषित करने का प्रयास'/><author><name>Rajendra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S-Gx1DliFGI/AAAAAAAAArU/4OCr_2fmGn8/S220/photo.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/TVBHS_dYmeI/AAAAAAAAAt8/OmO9MQKVfMA/s72-c/jaipur-literature-festival-3.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5185840046950412717.post-96583219366689146</id><published>2010-12-26T09:52:00.000-08:00</published><updated>2010-12-26T09:53:44.324-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Academy'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Art'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='rajasthan'/><title type='text'>अकादमियाँ बदहाल : कैसे बचाएँ कला और संस्कृति की पहचान</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;राजेन्द्र बोड़ा&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कला और संस्कृति की पहचान बनाए रखना भी मानव अधिकारों में आता है। मानव अधिकारों की गारंटी देने की जिम्मेवारी राज्य की होती है। राजस्थान अपनी कला और संस्कृति के लिए दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। यह पहचान बनाई रखने में इसीलिए राज्य की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। देश की आज़ादी के बाद अपनाई गई संवैधानिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब लोक की प्रतिनिधि सरकारें बनीं तब अन्य बातों के अलावा लोक कला और संस्कृति के संरक्षण की जिम्मेवारी स्वतः ही उन पर आ गई। राजस्थान में राज्य’ने स्थानीय कला और संस्कृति को बचाए रखने का अपना दायित्व निभाते हुए विभिन्न अकादमियाँ स्थापित कीं। इनकी स्थापना के पीछे सोच यह था कि इनको राज्य की वित्तीय मदद मिले मगर उनका संचालन लोकतान्त्रिक हो। राजस्थान में स्थापित कीं गईं अकादमियों के संविधान इसी के अनुरूप बनाए गए। माना गया कि अपने-अपने क्षेत्र के कुशल लोग, जानकार लोग और कला-संस्कृति से सरोकार रखने वाले लोग इनमें आएँगे जिससे न केवल प्रदेश की कला और संस्कृति का संरक्षण हो सकेगा बल्कि उन्हें बढ़ावा भी मिलेगा। कला और संस्कृति के संरक्षण में राज्याश्रय की अवधारणा हमारे यहाँ बहुत पुरानी है। मगर पुरानी राजाशाही में एक राजा की पसंद या नापसंद और उसकी सनक पर सब कुछ चलता था। इसीलिए पुराने सामन्ती युग में कला और संकृति के उजले और अंधेरे दौर हमें इतिहास के पन्नों में देखने को मिलते हैं। आज़ादी के बाद जब भारत के संविधान में लोक के शासन की व्यवस्था की गई तब यह सपना देखा गया कि अब क्योंकि ‘लोक’अपने भाग्य का विधाता खुद है इसलिए ऐसी लोकतान्त्रिक संस्थायें बनेंगी जिन्हें राज्याश्रय प्राप्त होगा मगर वे किसी की पसंद, ना पसंद या सनक से काम नहीं करेंगी। वे सरकारी विभाग नहीं होंगी और उन पर नौकरशाही का कोई दबाव नहीं होगा। वे स्वतंत्र रूप से काम करेंगी और सरकार का मुँह नहीं ताकेंगी। ऐसे ही जज़्बों के साथ राजस्थान साहित्य अकादमी, राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, और राजस्थानी भाषा एवं संस्कृति अकादमी जैसी संस्थायें स्थापित हुईं। बाद में इसी तरह अन्य अकादमियाँ बनाईं गईं जैसे उर्दू अकादमी, बृज भाषा अकादमी और नवीनतम पंजाबी अकादमी। लेकिन पिछले साठ वर्षों से अधिक का आज़ादी के बाद का अनुभव हमें बताता है कि हम लोकतान्त्रिक संस्थाओं को पल्लवित नहीं कर सके। ऐसी संस्थाएं बनाई जरूर हमने पर उन्हें संवारना तो दूर रहा हम उन्हें सँभाल कर भी नहीं रख सके। बड़ी अपेक्षाओं के साथ बनीं सभी अकादमियाँ आज मृतप्राय: हैं।&lt;br /&gt;स्वतंत्र रूप से काम करने के लिए अकादमियों की स्थापना का श्रेय कॉंग्रेस को जाता है जिसने आज़ादी के बाद लंबे समय तक प्रदेश में लगातार सरकार चलाई। सन 1977 के बाद बीच-बीच में यदा-कदा विपक्ष के लोग सरकारें चलाते रहे मगर वर्चस्व कॉंग्रेस का ही बना रहा है। अब प्रदेश में फिर कॉंग्रेस का शासन है और उसका नेतृत्व अशोक गहलोत कर रहें हैं जो पहले भी पाँच वर्ष का कार्यकाल मुख्यमंत्री के रूप में बिता चुके हैं। इसीलिए उनसे राजस्थान के लोग स्वाभाविक रूप से यह अपेक्षा रखते हैं कि वे अपने पिछले कार्यकाल के अनुभवों की सीख से शासन की बागडोर और अधिक बेहतर तरीके से थाम कर चलेंगे। लोग उनमें गांधी का सोच देखते हैं इसीलिए उनके लिए “राजस्थान का गांधी” का नारा तक लगाते रहते हैं। जमीन से जुड़े हुए इने गिने राजनेताओं में उनका शुमार होता है। प्रदेश की लोक संस्कृति और कलाओं से वे अपना सरोकार का सार्वजनिक रूप से वे इज़हार करते रहते हैं। उन्हीं के नेतृत्व वाली सरकार ने पिछली बार राज्य विधान सभा में राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में रखने का प्रस्ताव पारित करवा कर केंद्र सरकार को भिजवाया था। मगर इसे क्या कहें कि उन्हीं के मौजूदा कार्यकाल में कला, संस्कृति और भाषा अकादमियाँ ठप पड़ीं हैं। &lt;br /&gt;अकादमियों का यह हश्र एक दम या रातों-रात नहीं हुआ है। पहले इनमें राजनीति घुसी। सत्ता के निकट रहने या सत्ता का मुँह ताकने वालों को इन संस्थाओं में पदों पर बिठाने का खेल बहुत पहले शुरू हो गया था। इससे अकादमियों के पद मात्र श्रंगारिक बन कर रह गए। इनके पदों पर रुतबे वाले लोग नहीं बल्कि पद से रुतबे की चाह रखने वाले लोग आसीन होते गए। ये संस्थाएं स्वतंत्र हैसियत वाली बनने की बजाय आत्म समर्पण वाली संस्थाएं बन कर रह गईं। जब उनकी हैसियत ही नहीं रही तब नौकरशाही कब उन्हें बक्षने वाली थीं। आज इन अकादमियों का कोई रुतबा नहीं है, कोई स्वतंत्र वजूद नहीं है। रही-सही कसर सरकार के उस उदासीन रवैये ने पूरी कर दी जिसके तहत नए शासन के डेढ़ वर्ष का कार्यकाल पूरा हो चुकने के बाद भी किसी को यह सुध नहीं है कि वैधानिक व्यवस्थाओं के अनुरूप उनका गठन भी किया जाना है। अकादमियाँ सरकार की प्राथमिकताओं में कहीं कोई स्थान रखती है इसका प्रमाण नहीं मिलता। कला और संस्कृति के सरोकारों से विमुख होकर कोई लोकतान्त्रिक सरकार किस तरह अपने को लोक हित वाली सरकार होने का दम भर सकती है? मगर शासन में बैठे लोग पिछली चुनावी जीत के जश्न से उठे गुबार में इस तरह घिरे रहते हैं कि दीवार पर उकरी इबारत उन्हें पढ़ने में नहीं आती। वरना क्या कारण हो सकता है कि जब बाज़ार सभी क्षेत्रों में अपनी घुसपैठ कर चुका हो और कला और संस्कृति को उत्पाद बना देने पर आमादा हो तब भी उनके संरक्षण की तरफ सरकार का ध्यान नहीं जाता। सरकार चलाने की अपनी लोकतान्त्रिक मजबूरियां हो सकती है। परंतु अकादमियों को पंगु बनाए रखने का खेल इन मजबूरीयों का हिस्सा नहीं हो सकता। यदि ऐसा है तो और भी बुरा है।  &lt;br /&gt;मुद्दा यह नहीं है कि इन अकादमियों का पुनर्गठन करके उनमें अध्यक्षों की कुर्सियों पर बैठा कर किन्हीं लोगों की शोभा बढ़ाई जाय या किन्हीं लोगों के राजनैतिक हित सँवारे जाय। मुद्दा यह है कि इन अकादमियों को जीवंत, लोकतान्त्रिक और स्वतंत्र संस्थाओं के रूप में विकसित होने दिया जाय। यह तभी संभव है जब उन्हें नौकरशाही के चंगुल से आज़ाद किया जाय और उन्हें वित्तीय रूप से सक्षम बनाया जाय। इन संस्थाओं की कमान जिन किन्हीं के हाथों में सौंपी जाय उन पर भरोसा किया जाय और सरकार का काम सिर्फ निगरानी का हो हस्तक्षेप का नहीं। आज की परिस्थितियों में ऐसा तभी हो सकता है जब मुख्यमंत्री सीधे इस काम को देखे। सरकार की असली दखलंदाजी अकादमियों को दी जाने वाली वित्तीय मदद से होती है। कुछ ऐसी व्यवस्था करनी होगी जिसमे अकादमियों को भरपूर वित्तीय मदद मिले और एक बार उन्हें बजट दे देने के बाद उनके काम में टाँग नहीं अड़ाई जाय। जिन लोगों को इनकी कमान सौपी जाय उन्हें काम की आज़ादी तभी मिल सकेगी। यदि ऐसा हो जाय और अच्छे लोग इन अकादमियों को संभालने आ जाएँ तभी संभव है कि प्रदेश की कलाओं और संस्कृति के दिन फिरें। मगर यह दिवास्वप्न जैसा लगता है। जिस बुरी हालत में आज प्रदेश की विभिन्न अकादमियाँ पड़ी हुईं है और जिनकी तरफ ध्यान देने की फुर्सत शासन में नहीं है उसके चलते कोई बड़ा उपाय होता नहीं दीखता। कहा जा सकता है कि कला और संस्कृति के संरक्षण के लिए सरकार पर ही क्यों आश्रित रहा जाय। गैर सरकारी प्रयास भी तो हो सकते हैं। हमारे जीवन के हर क्षेत्र में राज्य’की दखलंदाजी भरपूर है। उसका सारा कारोबार जनता के पैसों से ही चलता है। इसलिए यदि उससे इमदाद मांगी जाती है तो यह माँगना हमारा हक है। अपनी कलाओं और संस्कृति को बचाए रखने का हक हमारा मानव अधिकार है। और इस अधिकार की रक्षा करना राज्य’ का दायित्व है। शासन को उसका दायित्व याद दिलाना हमारा फर्ज़ भी है और अधिकार भी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5185840046950412717-96583219366689146?l=itslokayat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itslokayat.blogspot.com/feeds/96583219366689146/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5185840046950412717&amp;postID=96583219366689146' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/96583219366689146'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/96583219366689146'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itslokayat.blogspot.com/2010/12/blog-post_26.html' title='अकादमियाँ बदहाल : कैसे बचाएँ कला और संस्कृति की पहचान'/><author><name>Rajendra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S-Gx1DliFGI/AAAAAAAAArU/4OCr_2fmGn8/S220/photo.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5185840046950412717.post-7972816969678407508</id><published>2010-12-22T10:54:00.000-08:00</published><updated>2010-12-22T11:01:26.206-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Cairn'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Revenue'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Royalty'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='rajasthan'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Oil'/><title type='text'>तेल ने राजस्थान के लिए खजाना खोला : क्या शासन तैयार है इस पैसे के सदुपयोग के लिए ?</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/TRJKP-Qnn1I/AAAAAAAAAtU/S4kOF6fkeyE/s1600/Oil.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 221px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/TRJKP-Qnn1I/AAAAAAAAAtU/S4kOF6fkeyE/s320/Oil.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5553582928772439890" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;राजेंद्र बोड़ा&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजस्थान की धरती ने इस प्रदेश के पिछड़ेपन की कालिख को पोंछ कर इसे आधुनिक, खूबसूरत और सम्पन्न राज्य बनाने के लिए अपने गर्भ का खजाना खोल दिया है। पश्चिमी इलाक़े मारवाड़ के बाड़मेर जिले में मिले तेल से होने वाली राजस्व आय राजस्थान की सारी मुश्किलें आसान कर देने के लिए काफी है। एक मोटे अनुमान के अनुसार इस तेल की रॉयल्टी के रूप में राज्य सरकार को प्रति वर्ष करीब 200 करोड़ रुपयों का राजस्व मिलेगा जो हमें प्रकृति से मिला अनुदान है। राज्य सरकार को होने वाली यह अंतिरिक्त आय उसके अपने बजटीय प्रयासों का फल नहीं है। लेकिन जिस प्रकार की संवैधानिक वित्तीय व्यवस्था हमारे यहाँ है उसमें यह अतिरिक्त आय भी उस समेकित निधि में जाएगी जिसमें सभी प्रकार के कर राजस्व तथा अन्य स्रोतों से होने वाली आमद जाती है। इसी समेकित निधि से सरकार अपने सारे खर्चे चलाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर क्या इस नई आय को अन्य राजस्व की तरह मान कर सामान्य तौर पर खर्च कर देना उचित होगा? या फिर राजस्थान की तक़दीर बदलने के लिए इस आय को खर्च करने की अलग से कोई योजना बनाना मुनासिब होगा जिससे यह पता चलता रहे कि तेल से मिलने वाली विशाल राशि किन मदों पर और किस तरह खर्च की जा रही है? इन सवालों को आज गंभीर चर्चा की दरकार है। अफसोस है कि विधानसभा में हमने जिन्हें चुन कर भेज रखा है उनमें ऐसा कोई सरोकार नज़र नहीं आता।    &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोकतंत्र में आम जन सरकार चलने के लिए अपनी पसंद के प्रतिनिधि चुनते हैं. मगर निर्वाचित प्रतिनिधि चुने जाकर मालिक नहीं हो जाते. वे आम जन या कहें मतदाताओं के प्रतिनिधि की हैसियत से राज में बैठते हैं और शासन का संचालन करते हैं. इसलिए जरूरी है कि जनता के नुमाइंदे सरकार का काम-काज चलाते हुए बीच-बीच में आम जन से संवाद करें  और प्रमुख मुद्दों पर उनकी राय जानें और उसी अनुरूप काम करें. किसी भी सरकार का प्रमुख काम होता है प्रशासनिक  व्यवस्थाओं को चलाना और विकास के कामों को अंजाम देना. सरकार के सारे कामों  के लिए खजाने में जो भी धन आता है वह आम जन की मिल्कियत होती है. शासन में बैठे लोग – राजनेता और नौकरशाह - उसके प्रबंधक भर होते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अचानक से हुई इस नई आय को कैसे खर्च किया जाय इस पर राज्य में आम सहमति बनानी होगी। इसके लिए जरूरी है इस बात पर बहस हो कि इस पैसे को खर्च करके ऐसी क्या अलग चीज की जा सकती है जो राजस्थान की प्रगति को नया आयाम दे और यहाँ के आम लोगों के जीवन को सुखी बना सके। खर्च की मौजूदा व्यवस्था में हम जानते हैं और जिसकी ताईद हर साल प्रस्तुत होने वाली सीएजी की रिपोर्टें करती हैं कि विकास के नाम पर होने वाले खर्च का अधिकतर पैसा निरर्थक चला जाता है और समूचा प्रशासन इस खेल में भृष्ट तंत्र में तब्दील हो चुका है। यदि तेल से होने वाली आय भी उसी तरह उड़ा दी गई और वह भ्रष्टाचार को समर्पित कर दी गई तो राजस्थान के लोगों के सपनें साकार करने का एक बड़ा अवसर हम खो देंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए प्रशासनिक पारदर्शिता की आज बेहद जरूरत है। जिस प्रशासनिक तंत्र के कारण राजस्थान का विकास और इसकी उन्नति गति नहीं पकड़ पा रही है उसी के भरोसे तेल की रॉयल्टी की आय नहीं छोड़ी जा सकती। इसके लिए लोक भागीदारी से फैसले लेने की जरूरत है। निर्वाचित प्रतिनिधियों के जरिये लोगों की भागीदारी की लोकतांत्रिक व्यवस्था &lt;br /&gt;के बावजूद आज लोगों की सीधी भागीदारी की भी महत्ती जरूरत है क्योंकि चुने हुए प्रतिनिधियों के सरोकार हम सबके सामने हैं।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेल की रॉयल्टी के मामले में लोगों की सीधी भागीदारी इसलिए भी जरूरी है क्योंकि राज्य के बड़े हिट भी दांव पर है। हम जानते हैं कि केंद्र सरकार के सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठान ओएनजीसी बाड़मेर से निकालने वाले तेल की रॉयल्टी के भुगतान को लेकर समस्या में है। ओएनजीसी और केयर्न एनर्जी के बीच करार के अनुसार केयर्न जितना भी तेल का दोहन करके उसे बेचेगी राज्य को उसकी रॉयल्टी का भुगतान केंद्र के सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठान को करना है। इस प्रतिष्ठान को अब लगता है कि केयर्न के साथ हुआ करार उसके माथे पड़ गया है और वह उससे राहत चाहता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी बात यह है कि राजस्थान के भूखंड से निकालने वाले तेल की रॉयल्टी तेल के बिक्री दाम की 20 प्रतिशन होती है। बाद के तेल की खोज और दोहन के जो ठेके दिये गए उनके लिए रॉयल्टी की दर 12.50 प्रतिशत ही है। ओ एन जी सी केंद्र को यह समझाने में लगा है कि दरों में यह असमानता दूर की जानी चाहिए। ओ एन जी सी को राजस्थान से निकालने वाले तेल की रॉयल्टी का भुगतान करने में परेशानी है। उसे लगता है कि बड़ी कमाई तो केयर्न कंपनी कर रही है रॉयल्टी भुगतान में जिसकी कोई भागीदारी नहीं है। जब कोई नहीं जानता था कि राजस्थान की भूमि से व्यावसायिक स्तर पर तेल निकलेगा तब केंद्र सरकार ने विदेशी खोजकर्ताओं को आमंत्रित करने के लिए यह आकर्षक नीति बनाई थी कि यदि तेल का व्यावसायिक स्तर पर उत्पादन होता है तो उसकी रॉयल्टी का भुगतान ओ एन जी सी करेगी जिसके पास राजस्थान में तेल की खोज का लाइसेंस था मगर कुछ कर नहीं पा रही थी। मगर अब जब तेल मिल गया और केयर्न कंपनी के इसके बूते पर वारे न्यारे हो गए तब ओंजी सी को लगता है कि केयर्न के साथ करार घाटे का सौदा हो गया है। वह इससे निकालना चाहती है। उसका कहना है कि या तो केंद्र रॉयल्टी की दर घटा कर 12.50 प्रतिशत करे या उतना हिस्सा खुद वहाँ करे। भले ही यह ओ एन जी सी और केंद्र के बीच का मसला है मगर राजस्थान के वित्तीय हिट इससे जुड़े है। ऐसी परिस्थितियों में आवश्यक है कि राज्य केंद्र में कोई ऐसा खेल न होने दे जिससे उसकी आय पर असर पड़े। हम जानते हैं कि राजस्थान की केंद्र में बहुत अधिक नहीं चलती। ऐसा आज नहीं हमेशा से होता आया है।  इसलिए जनता का दबाव बना रहना बहुत जरूरी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसीलिए समय की माँग है की राज्य प्रशासन तेल से होने वाली आमद के बारे में पूरी तरह पारदर्शिता बरते और उसके बारे में फैसले केवल सचिवालय के बंद कमरों में ही नहीं ले बल्कि फैसलों से पहले सार्वजनिक बहस के अवसर दे। न केवल नई आमदनी की मात्रा को बचाए रखना है बल्कि पैसे का सदुपयोग भी करना है। वह तभी संभव है जब आम जन को नियमित रूप से लगातार यह जानकारी मिलती रहे कि सरकार क्या करने जा रही है। तभी ऐसे फैसलों पर अंकुश रखा का सकेगा जो राजस्थान के हित में नहीं हैं। केवल प्रशासनिक अधिकारियों के भरोसे सब कुछ नहीं छोड़ा जा सकता। यह अवसर है कि पारदर्शिता और जवाबदेही का दम भरने वाली निर्वाचित सरकार के प्रमुख नई लोकतान्त्रिक पहल करके दिखाये। वर्तमान में चल रही राजनैतिक प्रक्रिया की शून्यता के हालत में कैसे शासन को इसके लिए तैयार किया जाय यह सबके लिए सोचने की बात है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5185840046950412717-7972816969678407508?l=itslokayat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itslokayat.blogspot.com/feeds/7972816969678407508/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5185840046950412717&amp;postID=7972816969678407508' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/7972816969678407508'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/7972816969678407508'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itslokayat.blogspot.com/2010/12/blog-post_22.html' title='तेल ने राजस्थान के लिए खजाना खोला : क्या शासन तैयार है इस पैसे के सदुपयोग के लिए ?'/><author><name>Rajendra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S-Gx1DliFGI/AAAAAAAAArU/4OCr_2fmGn8/S220/photo.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/TRJKP-Qnn1I/AAAAAAAAAtU/S4kOF6fkeyE/s72-c/Oil.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5185840046950412717.post-2640342147457381677</id><published>2010-12-15T04:20:00.000-08:00</published><updated>2010-12-15T04:35:58.082-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Jaipur Pink City World City'/><title type='text'>बर्बाद गुलाबी गुलशन, बनाने चले वर्ल्ड सिटी</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/TQi0AjJcsbI/AAAAAAAAAtM/3zv47Oazl9M/s1600/Jaipur-City-from-Nahargarh-Fort.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 133px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/TQi0AjJcsbI/AAAAAAAAAtM/3zv47Oazl9M/s320/Jaipur-City-from-Nahargarh-Fort.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5550884462262006194" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;             &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;राजेंद्र बोड़ा&lt;/span&gt;      &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जयपुर को वर्ल्ड सिटी बनाने की घोषणा के साथ कांग्रेस ने दो दशक बाद राजधानी की लोकसभा सीट जीती थी। इस शहर को “वर्ल्ड सिटी” बनाने का सपना राजीव और सोनिया गांधी के बेटे राहुल गांधी ने अपनी चुनावी सभा में लोगों के सामने रखा था। राहुल गांधी की बात को पकड़ते हुए ऊपर से नीचे तक के कांग्रेसजन इस झुंझुने को पकड़ कर बैठ गए। प्रदेश की कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार के मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के प्रमुख सदस्य भी यह जताने में पीछे नहीं रहे कि बस अब उनकी सरकार इस शहर को “वर्ल्ड सिटी” बना कर दिखाने ही वाली है। जिस शहर का ‘गुलाबी नगरी’ का दर्जा भी जो प्रशासन बचा के नहीं रख सका वह उसे ‘विश्व नगरी’ का दर्जा कैसे दिला पाएगा यह किसी ने नहीं पूछा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी ने यह भी नहीं पूछा कि “वर्ल्ड सिटी” बनाने कि घोषणा करने वालों का इससे आशय क्या है। जयपुर को विश्व पर्यटन के मानचित्र पर लाना ही क्या उसे “वर्ल्ड सिटी” बना देना होगा? पर्यटकों के लिए कुछ सुविधाएँ जुटा देना और उन्हें अपना कुछ माल बेच देने की जुगत कर लेना ही क्या जयपुर को ‘विश्व नगरी’ बना देना होगा? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जयपुर को “वर्ल्ड सिटी” बनाने के दावे करने वालों ने कभी यह नहीं बताया कि ‘विश्व नगरी’ के रूप विकसित करने के लिए इस शहर की उनकी कल्पना क्या है। जिस शहर की बसावट के लिए बने ‘मास्टर प्लान’  की रोज धज्जियाँ उड़ती हों, जहाँ की गलियां और सड़कें पूरी तरह साफ नहीं हो पाती हों, जहाँ के ट्रेफिक की समस्या दिन ब दिन बद से बदतर होती जा रही हो जहाँ पीने का पानी दिन में एक बार एक घंटे के लिए सप्लाई होता हो, जहाँ के सरकारी अस्पताल जानवरों के बाड़ों की तरह हों उस शहर को “वर्ल्ड सिटी” बनाने का सपना दिखाने वाले राजनेताओं की हिम्मत की दाद देनी होगी कि वे किस सफाई से ऐसा फरेब लोगों को दे सकते हैं।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जयपुर पुरातन राजस्थान का सबसे नया शहर है। इसे बसाने वाले सवाई जयसिंह और इसे बनाने वाले विद्याधर ने बड़े विधि विधान से इस नगरी की रचना की थी। बाद के रियासती शासकों ने भी इसमें कुछ न कुछ जोड़ा। दो सदी से अधिक समय तक इस शहर की खूबसूरती ने इसे विश्व में इसके नाम का परचम फहराया। लोक गीतों में इसके गुणगान किए गए। यहाँ की हस्त कलाओं तथा जवाहरात के कारीगरों ने इसकी खूबसूरती में चार चाँद लगाए। कभी यह शहर “हिंदुस्तान का पेरिस” भी कहलाया। दुनिया के कोने- कोने से आए पर्यटकों ने इसकी शान में लेख लिखे, किताबें लिखीं। एक माने में यह आधुनिक शहर होने के खिताब का हकदार बना।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जयपुर नगरी की ख्याति चहुँ ओर फैली वह बेसबब नहीं थी। यहाँ का नगर नियोजन, यहाँ की सार्वजनिक सुविधाएँ,  यहाँ का वाणिज्य व्यवसाय और यहाँ की कला और संस्कृति ने इस शहर को पहचान दी। गुलाबी नगरी का पुराना वैभव देवयोग से नहीं था। वह था यहाँ के लोगों के इस शहर से प्यार के कारण। बरसों तक ‘राजस्थान पत्रिका’ में ‘नगर परिक्रमा’ कालम में इस नगर के इतिहास का मनोयोग से लेखा जोखा प्रस्तुत करने वाले नंदकिशोर पारीक ने एक किस्सा सुनाया था। सवाई रामसिंह के जमाने की बात है। महाराजा सवाई रामसिंह के काल में ही जयपुर में आधुनिक सुविधाएँ आयीं। शहर में पक्की सड़कें बनीं, सार्वजनिक रोशनी का प्रबंध हुआ, रामनिवास बाग जैसे सार्वजनिक स्थान और रामबाग जैसी तामीरें हुई और शहर गुलाबी रंग में रंगा। रामसिंह एक शाम घोड़े पर सवार होकर शहर का मुलाहजा कर रहे थे। साथ में घोड़े पर उनके वजीर चल रहे थे। वे जिस सड़क पर चल रहे थे वह सफ़ेद पत्थरों की बनी थी। एक जगह महाराजा ने देखा कि सड़क पर पान की पीक थूकी हुई है। सफ़ेद पत्थरों पर पीक का लाल रंग अधिक ही उभर कर दिख रहा था। महाराजा ने साथ चल रहे वजीर की तरफ मुँह करके कहा देखो सड़क कैसी गंदी हो गई है। वजीर ने जवाब दिया हुजूर ये तो आम सड़क है। यहाँ तो ऐसा ही होता है। इस पर सवाई रामसिंह ने जो जवाब दिया वह बताता है कि इस शहर का वह वैभव क्यों था। महाराजा ने कहा “आम सड़क व्हेगी थ्हांकी। म्हाको तो यो घर छै”।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह शहर विश्व नगरी तब बन सकती है जब इसे संभालने वाले इसे अपना घर समझें। मगर अब कौन इसे अपना घर समझता है। न शहर को संभालने वाले और न शहर के अधिकतर वाशिंदे। सभी को अपने हित लाभ की फिक्र है। बाज़ार आधारित आर्थिक नीतियों ने सभी को चूहा दौड़ का धावक बना दिया है। सभी आँख मूँदे दौड़े चले जा रहे है। कुछ भौतिक साधन पा लेने की जुगाड़ में ही पूरा जीवन गुजर जाता है। दशकों से जयपुर में रहने वालों से यदि पूछा जाये कि रोज हवामहल के सामने से गुजरते हुए उन्होंने कभी दो मिनट ठहर कर इस इमारत को नज़र भर के देखा भी है। क्या जयपुर के अधिकतर वाशिंदों को जानकारी है कि शहर में बालानन्द जी के मठ नाम का कोई ऐतिहासिक स्थान भी है। कितने लोगों को मालूम है की फिल्म गीतकार हसरत जयपुरी जिनके गानों ने आज भी दुनिया भर में हिन्दी फिल्म संगीत के चाहने वालों को दीवाना बना रखा है की हवेली चार दरवाजे के पास मौजूद है। कितने लोगों के दिल में उस समय कोई पीड़ा उठी जब उनकी नज़रों के सामने ताल कटोरे का पानी सूख गया और कंक्रीट का जंगल उस पर उगा दिया गया।   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई भी शहर विश्व नगर बनने से पहले वहाँ के वाशिंदों का आशियाना बनता है। उसकी पहली शर्त होती है वह रहने लायक हो। जहाँ हर एक की जरूरतों को पूरा करने का सामान हो। सब के लिए खुला आसमान हो। साँस लेने के लिए खुली हवा हो। बच्चों के खेलने के लिए उद्यान हों। अंग्रेजी में एक शब्द है ‘सस्टेनेबल’। शहर ‘सस्टेनेबल’ हो। याने वह इस प्रकार से व्यवस्थित हो जो अपने श्रेष्ठ स्तर को थामे रख सके। विश्व नगरी गुणवत्ता वाली होती है, चलताऊ नहीं। वह ऐसी नगरी होती है जहाँ लोग अपने आप को सहज महसूस कर सकें। विश्व स्तर के शहर की सबसे बड़ी पहचान उसकी फुटपाथें होतीं हैं। वे पैदल चलने वालों को कितनी जगह देतीं हैं उससे शहर का वैभव झलकता है और लोगों के प्रति सरोकार प्रदर्शित होता है। शहर सिर्फ कारों और अन्य वाहनों के लिए नहीं होता। वह जीवित लोगों के लिए होता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई शहर ‘वर्ल्ड सिटी’ के रूप में कई अर्थों में मशहूर होता है। कला और संस्कृति के लिहाज से जैसे पेरिस, मनोरंजन उद्योग के लिहाज से जैसे लास एंजिल्स, मोटर वाहनों के निर्माण के लिए जैसे डेट्रोइट। इसलिए पहले हमें यह तय करना होगा कि जयपुर को हम किस लिहाज से ‘वर्ल्ड सिटी’ बनाना चाहते हैं। राजनेताओं और सरकार में बैठे प्रशासकों की मोटी बुद्धि में एक ही बात आती है पर्यटन की। चलें पर्यटन की दृष्टि से ही जयपुर को वर्ल्ड सिटी बनानी है तो यह तय करना पड़ेगा कि दुनिया भर से यहाँ आने वाले पर्यटकों को हम कैसा शहर दिखाना चाहते हैं? क्या एक ऐसा शहर जहाँ पैदल चलने के लिए सड़क पर कोई जगह नहीं है। क्या ऐसा शहर जिस पर हर तरफ पैबंद ही पैबंद लगे नज़र आते हों। जहाँ की सीवेज लाइनें जगह जगह उबल रही हो। पर्यटक चैन से इस शहर को देखने के लिए कहाँ जाये? जयपुर शहर की सफाई की पुराने जमाने की बानगी देखनी हो तो 1932 में इस शहर पर बनी एक डाकुमेंट्री फिल्म देखे जो अभी इंटरनेट पर यूट्यूब पर उपलब्ध है। उसमें एक दृश्य है त्रिपोलिया बाज़ार में मुख्य सड़क पर एक हाथी निकाल रहा है। चलते-चलते यह विशालकाय जानवर लीद कर देता है। वह नो-चार कदम ही आगे निकला होगा कि एक जामदार हाथ में झाड़ू और टोकरा लिए आता है और साक पर से लीद साफ कर देता है। सत्तर के दशक तक जयपुर नगर परिषद का प्रशासक मुँह अंधेरे दौरे पर निकलता था और शहर की गलियों और सड़कों की धुलवाई पर नज़र रखता था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन प्रशासकों और लोगों के मन में इस शहर के प्रति कहीं कोई लगाव नज़र नहीं आता। सभी लोग इस शहर को छीनने-झपटने और इसके वस्त्र तार-तार करने में लगे हैं। हर कोई, जिसकी जितनी भी चलती है, शहर की जमीन को अपनी मिल्कियत बना लेने के उपाय करने में लगा है। अपने घर दुकान का कचरा बाहर खुले में बिखराने की लगता है होड़ लगी है। कचरा उठाने की जिम्मेवारी जिनकी है उन्हें अपने काम के बिलों को पास करवाने से फुर्सत नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जयपुर को वर्ल्ड सिटी बनाने से पहले उसे ‘नेशनल सिटी’ और उससे भी पहले ‘स्टेट सिटी’ बनाने के तो उपाय कर लें। फिर वर्ल्ड सिटी की बात करना। जयपुर शहर का आज महत्व सिर्फ इतना है कि वह राजस्थान की राजधानी है। प्रशासनिक तकलीफ़ों से ग्रस्त लोगों का यहाँ मुख्यालय पर आना मजबूरी है। भले ही यहाँ उनकी तकलीफ़ों का निबटारा अधिकतर नहीं होता हो। शहर किसी को सुकून नहीं देता क्यों कि शहर को खुद को सुकून नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्ल्ड सिटी बजट के आँकड़ों से नहीं बनता। वह लुभावने नारों से भी नहीं बनता। वह किसी देवयोग से खुद-ब-खुद भी नहीं बन जाता। उसके लिए सबको मिल के कुछ करना होता है। उन सब को जो इस शहर से प्रेम करते हैं। राहुल गांधी से चली बात एक अच्छा सपना भी नहीं है क्योंकि वह इतनी धुंध से भरा है कि उसमे भविष्य की कोई तस्वीर देखना बेमानी होगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(आलेख &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;प्रेसवाणी&lt;/span&gt; पत्रिका के नवम्बर 2010 अंक में प्रकाशित)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5185840046950412717-2640342147457381677?l=itslokayat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itslokayat.blogspot.com/feeds/2640342147457381677/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5185840046950412717&amp;postID=2640342147457381677' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/2640342147457381677'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/2640342147457381677'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itslokayat.blogspot.com/2010/12/blog-post.html' title='बर्बाद गुलाबी गुलशन, बनाने चले वर्ल्ड सिटी'/><author><name>Rajendra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S-Gx1DliFGI/AAAAAAAAArU/4OCr_2fmGn8/S220/photo.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/TQi0AjJcsbI/AAAAAAAAAtM/3zv47Oazl9M/s72-c/Jaipur-City-from-Nahargarh-Fort.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5185840046950412717.post-1753818402714400970</id><published>2010-09-04T09:40:00.000-07:00</published><updated>2010-09-05T05:44:57.441-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='SD Burman'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Manohari Singh'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='RD Burman'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Saxophone'/><title type='text'>मनोहारी सिंह के सेक्सोफोन का जादू कभी नहीं टूटेगा</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/TIJ4NxDomyI/AAAAAAAAAsk/SjtERnN_fkM/s1600/Manohari.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 240px; height: 320px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/TIJ4NxDomyI/AAAAAAAAAsk/SjtERnN_fkM/s320/Manohari.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5513101071757122338" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;राजेंद्र बोड़ा &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सैकड़ों हिन्दी फिल्में हर साल बनती हैं। अब तक बनी हजारों फिल्मों में से कौन सी फिल्में लोगों को याद रहती हैं? ‘मुगले आज़म’ या ‘शोले’ जैसी फिल्मों को छोड़ दें तो अधिकतर फिल्में समय के अंधेरे गलियारों में खो जाती हैं। यदि कोई फिल्म याद रहती है तो वह उसके गानों से। हिंदुस्तानी फिल्म संगीत ने, खास कर गानों ने, पुरानी फिल्मों को लोगों की यादों में बचाए रखा है। यह भी होता है कि गाने याद रह जाते हैं और फिल्मों के नाम भी बिसरा दिये जाते हैं। हालांकि गानों का श्रेय गायकों, संगीतकारों और गीतकारों को मिलता है मगर गानों को सजाने संवारने में साजिन्दों का योगदान भी  कम नहीं होता। आप किसी पुराने गाने को याद करते हैं तो कई बार उस गाने की शुरुआत में या उसके इंटरल्यूड में बजे किसी साज की धुन सबसे पहले आपके मन में गूँजती है। आज किसी जमाने की राजेंद्र कुमार, साधना की सुपर हिट फिल्म ‘आरजू’ की किसे याद है। याद है तो उसके गाने। उनमें भी एक गाना जो इतने बरसों के बाद आज भी लोगों के सिर पर चढ़ा हुआ है ‘बेदर्दी बालमा तुझको मेरा मन याद करता है’की याद आती है तो हमारे जेहन में उस वाद्य की आवाज गूँज उठती है जो पतझड़ के मौसम में सूनी वादियों के विस्तार में नायिका की तड़प साकार हो कर देती है। यह वाद्य है सेक्सोफोन जिसने ऐसे ही सैकड़ों गानों को अमर कर दिया। जैसे देवानन्द की क्लासिक फिल्म ‘गाईड’ का किशोर कुमार और लता मंगेशकर का गाया गाना ‘गाता रहे मेरा दिल’और उन्हीं की अभिनीत ‘माया’ का संगीतकार सलिल चौधरी के निर्देशन में बना लता का गाया गाना ‘जा रे जारे उड जा रे पंछी’ में सेक्सोफोन की बीच में उठी तान गाने को नयी उचाइयों पर ले जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस वाद्य को बजाने वाले मनोहारी सिंह का इस मंगलवार को मुंबई में निधन हो गया। अस्सी वर्ष की उम्र के मनोहारी दा हिन्दुस्तानी फिल्म संगीत के “सुनहरी दौर” के कलाकार थे। साजिन्दे, सहायक और अरेंजर के रूप में उन्होंने सभी शीर्ष संगीतकारों के साथ काम किया था और उनकी धुनों में अपनी कला के खूबसूरत सितारे जड़े थे। शंकर जयकिशन, एस डी बर्मन, ओ पी नैयर, मदन मोहन, कल्याणजी आनंदजी, सलिल चौधरी और आर डी बर्मन के वे पसंदीदा साजिन्दे थे।  आर डी बर्मन जिन्हें लोग प्यार से पंचम भी पुकारते हैं की तो संगीत मण्डली के वे प्रमुख सदस्य थे। वे उनके साजिन्दे भी रहे, अरेंजर भी रहे और सहायक निर्देशक भी रहे। पंचम की पहली फिल्म ‘छोटे नवाब’ से लेकर उनकी आखरी फिल्म ‘1942 –ए लव स्टोरी’तक दोनों का साथ रहा। पंचम के असामयिक निधन के बाद इस फिल्म के अधूरे रह गए पार्श्व संगीत को मनोहारी दा ने ही पूरा किया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनोहारी दा जितने उम्दा सेक्सोफोन वादक थे उतने ही उम्दा इंसान भी थे। अभी एक महीने से भी कम समय पहले हिंदुस्तानी फिल्म संगीत के रसिकों ने उनका जयपुर बुलाकर सम्मान किया था। जयपुर के लोगों को हमेशा इस बात का गर्व रहेगा कि उन्होनें मनोहरी दा को सामने बैठ कर सुना। बढ़ी उम्र और हफ्ते में तीन बार डायलेसिस होते रहने के बावजूद जब सेक्सोफोन उनके मुँह से लगता तो सुरों का ऐसा झरना बह निकलता कि सुनने वाले दंग रह जाते। मनोहारी दा ने दो घंटों से अधिक समय तक गत 20 जून को जयपुर में अपने सम्मान समारोह में जो बजाया वह इतना अद्भुत था। दुर्भाग्य से जयपुर का यह कार्यक्रम उनका अंतिम सार्वजनिक पर्फार्मेंस बन गया। &lt;br /&gt;कलकत्ता में जन्मे मनोहारी दा का परिवार संगीतकारों का परिवार था। उनके पिता और चाचा फिल्मों में और नाइट क्लबों मेन संगीत बजाया करते थे। शुरू में दादा ने इंग्लिश की-फ़्ल्यूट, क्लेरिनेट और मेंडोलिन पर हाथ साधा परंतु अंत में सेक्सोफोन को ही अपनाया। क्योंकि वे पारंगत इन सभी वाद्यों में थे इसलिए फिल्मी गानों की रेकार्डिंग के दौरान वे सेक्सोफोन के अलावा दूसरे वाद्य भी बाजा लेते थे। सलिल चौधरी के संगीत से सजी फिल्म ‘माया’के गाने जा रे जारे उड जा रे पंछी के मुखड़े से पहले प्रील्यूड में ‘पिकोलो’ (एक प्रकार की छोटी बाँसुरी) से गाने का अद्भुत वातावरण बनाते हैं और उसी गाने के इंटरल्यूड में सेक्सोफोन की धुन पर गाने को ऊँचाई पर थामे रहते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कलकत्ता में वे ग्रामोफोन रेकार्ड बनाने वाली एचएमवी कंपनी में नौकरी करके जीवन की शुरुआत की। कलकत्ता सिंफनी आर्केस्ट्रा में भी उन्होंने पिछली सदी के पचास के दशक में बजाया। संगीतकार सलिल चौधरी के कहने पर 1958 में वे किस्मत आजमाने बम्बई आ गए। सबसे पहले उन्होंने एस डी बर्मन के लिए फिल्म ‘सितारों से आगे’में बजाया। मगर दादा की पहचान बनी कल्याण जी आनंद जी की फिल्म ‘सट्टा बाज़ार’ से। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की जोड़ी के संगीतकार बनने से पहले ये जोड़ी दार साजिन्दों के रूप में काम करते थे। लक्ष्मीकांत ने दादा को एक दिन कहा कि एक गाने की कल रेकार्डिंग है वे अपना सेक्सोफोन लेकर स्टूडियो पंहुच जाएँ। गाने के इंटरल्यूड में सेक्सोफोन का सोलो पीस था। रिहर्सल में जिस शिद्दत से दादा ने वाद्य बजाया उसे सुन कर उसे फाइनल टेक में रखने का फैसला हुआ और वह रेकार्ड हुआ। ‘तुम्हें याद होगा कभी हम मिले थे’ गाने के इंटरल्यूड में मनोहरी दा के सेक्सोफोन का जादू कुछ ऐसा छाया कि पूरी फिल्म इंडस्ट्री में उनकी धाक जाम गई। और उसके बाद उन्होने कभी मूड के पीछे नहीं देखा। हेमंत कुमार का गाया वह गीत आज भी हम सुनते हैं तो उसकी गिरफ्त से आसानी से नहीं छूटते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जयपुर में दादा से ‘सुरयात्रा’के सदस्यों ने लंबी बातचीत भी की। दादा मानते थे कि ओ पी नैयर की ‘कश्मीर की काली’ फिल्म का जबर्दस्त हिट गाना ‘ये दुनिया उसी की जमाना उसी का’वास्तव में उनके और महान गायक मोहम्मद रफी के बीच जुगलबंदी जैसा है। कभी फिर से सुनिए इस गाने को कि कैसे मनोहरी दा का सेक्सोफोन जहाँ छोडता है और कैसे रफी साहब उसे पकड़ लेते हैं। दोनों को सलाम करने को जी चाहता है। &lt;br /&gt;सेक्सोफोन का सबसे श्रेष्ठ और भरपूर उपयोग किस गाने में हुआ सवाल का जवाब देने में दादा ने एक पलभी नहीं लगाया फिल्म ‘अमीर गरीब’में। बहुत कठिन कंपोजीशन थी मगर लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने धुन बनाने में कमाल कर दिया। दादा ने अपने सेक्सोफोन से गाने को अमर कर दिया। देवानन्द पर फिल्माया गाना आज भी लोगों को याद है ‘मैं आया हूँ लेकर साज हाथों में’। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनोहारी दा ने अपने साथी बासुदेव चक्रवर्ती के साथ मिल कर जोड़ी बनाई और बासु-मनोहारी के नाम से कुछ फिल्मों में संगीत भी दिया जैसे महमूद की ‘सबसे बड़ा रुपैया’ (1976), ‘कन्हैया’ (1981) और ‘चटपटी'(1983)। ‘इंसान जाग उठा’ के साथ वे दादा बर्मन के अरेंजर बने और कुल 138 फिल्मों में संगीत अरेंज किया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज के दौर में भी वे सक्रिय थे मगर नया फिल्म संगीत उन्हें पसंद नहीं था। उन्होने बड़े मार्के की बात काही : आज का फिल्म संगीत एक्स्पायरी डेट के साथ आता है जबकि पुराना फिल्म संगीत कालजयी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्मी गानों को सजाने संवारने वाले साजिन्दों के बारे में श्रोता कुछ नहीं जानते। न फिल्म के टाइटल में और न रेकार्ड, या सी डी पर उनके योगदान का कोई जिक्र ही होता है। अब स्टेज शो होने लगे हैं जिससे लोगों को यह पता लगने लगा है कि अमुक गाने में अमुक साज अमुक साजिन्दे ने बजाया। इसी से मनोहारी दा और उन जैसे हमेशा गुमनाम रहे साजिन्दों के नाम अब लोगो के सामने आने लगे हैं। वरना इतिहास ने तो उनके साथ नाइंसाफ़ी ही की है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;(यह आलेख जनसत्ता के रविवारी संस्करण में 10 जुलाई 2010 को प्रकाशित हुआ)&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5185840046950412717-1753818402714400970?l=itslokayat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itslokayat.blogspot.com/feeds/1753818402714400970/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5185840046950412717&amp;postID=1753818402714400970' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/1753818402714400970'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/1753818402714400970'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itslokayat.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='मनोहारी सिंह के सेक्सोफोन का जादू कभी नहीं टूटेगा'/><author><name>Rajendra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S-Gx1DliFGI/AAAAAAAAArU/4OCr_2fmGn8/S220/photo.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/TIJ4NxDomyI/AAAAAAAAAsk/SjtERnN_fkM/s72-c/Manohari.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5185840046950412717.post-25024428290733635</id><published>2010-06-29T04:39:00.000-07:00</published><updated>2010-06-29T04:43:40.065-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संविधान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साक्षर भारत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शिक्षा'/><title type='text'>साक्षर भारत : टूटते सपनों की कहानी</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;राजेंद्र बोड़ा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्ष 2012 तक देश की समूची आबादी को साक्षर बना देने की केंद्र सरकार की महत्वकांक्षी योजना "साक्षर भारत" के क्रियान्वयन में अभी विभिन्न एजेंसियां जुटी है. देश में कोई भी अशिक्षित नहीं रहे इसके लिए विगत में सरकारों द्वारा कईं बार तिथियाँ निश्चित की गयीं कि अमुक समय तक सबको पढ़ा लिखा बनाने का सपना पूरा हो जाएगा. आज़ादी को साठ साल होने को आये हैं. मगर बावजूद सारे प्रयासों के देश में आज भी करोड़ों लोग ऐसे हैं जो अक्षर नहीं पढ़ पाते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज़ादी के इतने सालों बाद प्रौढ़ साक्षरता के प्रयासों की कोई जरूरत नहीं रह जानी चाहिए थी यदि प्रारंभिक शिक्षा हम सभी तक पंहुचा पाते. क्योंकि प्रारम्भिक शिक्षा से उन सभी नए जन्मे बालक - बालिकाओं को, जिन्होंने आज़ाद भारत में आँख खोली, नहीं जोड़ा जा सका इसीलिए नयी पीढियां आती गयीं और पुरानी पीढी के प्रौढ़ों को साक्षर बनाने का काम कम होने की बजाय बढ़ता ही गया और वह आज़ादी के बाद के छठे दशक में आज भी जारी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज़ादी का संग्राम जिन सपनों को सच बनाने के लिए लड़ा गया इन पिछले दशकों में हमने उन सपनों को टूटते हुए ही देखा है. आज़ादी की लड़ाई में जो लोग कूदे और अन्य जिन्होंने उनको जज्बाती समर्थन दिया उन सबकी एक बड़ी आकांक्षा यह थी कि आज़ाद भारत में एक समता मूलक ऐसा समाज रचा जाय जिसमें वर्ण, जाति, धर्म, और धन से लोगों में विभेद न हो. व्यक्ति, व्यक्ति का शोषण नहीं करे और विकास की अवधारणा में मानव केंद्र में हो. इसके लिए जरूरी था कि हम हजारों वर्षों के सामंती युग के संस्कारों का बोझ अपने सिर से उतार फैंकें और आज़ादी के नवप्रभात में कोरी स्लेट पर नयी इबारत लिखें.  इस सपने को पूरा करने के लिए सर्वमान्य रास्ता था शिक्षा का. सोचा था ज्यों-ज्यों शिक्षा का प्रसार होगा त्यों-त्यों मानव मुक्त होता चला जाएगा और अपने भाग्य का नियंता खुद बन जाएगा. इसीलिए आज़ाद भारत का संविधान बनाने वालों ने उसकी शुरुआत ही "हम भारत के लोग"  उदघोषणा  से की. माना गया कि हम भारत के लोग जब शिक्षित हो जायेंगे तो अपनी चुनौतियों से खुद निबट लेंगे और एक ऐसा खूबसूरत समाज बनायेंगे जहाँ भूख और गरीबी के लिए कोई जगह नहीं होगी और जहाँ हर इंसान के लिए इज्जत से रहने की जगह होगी. इसके लिए 'राज्य' की भूमिका महत्वपूर्ण थी. नयी लोकतांत्रिक व्यवस्था में 'राज्य' की बागडोर जनता के प्रतिनिधियों के हाथों में सौपी गयी. कहा गया जनता की, जनता के लिए, जनता द्वारा चुनी हुई सरकार जन सरोकारों के प्रति संवेदनशील होगी और आज़ादी के संग्राम के दौर में देखे गए सपनों को साकार करने में अधिक देर नहीं लगेगी. लेकिन जैसा कि हमने पहले कहा आज़ाद भारत का इतिहास सपनों के टूटने का इतिहास बन कर रह गया है. इक्कीसवीं सदी के आते -आते हमारा रास्ता कब बदल गया हमें पता ही नहीं चला और हमें कहाँ जाना था और हम कहाँ पंहुच गए इसके लिए आज सोचने की भी फुर्सत किसी के पास नहीं है. देश के हर व्यक्ति को साक्षर करके ऐसी शिक्षा देना था जो लोगों के मन के कषायों को दूर करती एक को दूसरे के नज़दीक लाती. एक तरफ हम न तो सभी को साक्षर या शिक्षित कर सके और न वह समाज बना सके जिसे शिक्षा के जरिये रचना था. शिक्षा को डिग्रियों के पुलिंदों में डुबो दिया गया जिससे आपसी होड़ की संस्कृति पैदा हुई जिसने प्रतिस्पर्धा वाली नयी आर्थिक नीतियों का रास्ता सरल कर दिया और नए आर्थिक भेद को स्थापित कर दिया. &lt;br /&gt;    &lt;br /&gt;आज़ादी के बाद के समय में शिक्षा के महत्व को समझदार लोगों ने बार - बार दोहराया स्वयंसेवी संस्थाएं बना कर उनसे जो बन पड़ा मन से किया. मगर जनता के मत से शासन के नियंता बने लोगों ने ऐसी संस्थाओं को गैर सरकारी संस्थाओं में तब्दील करने का अनोखा खेल खेला जिसने सरकारी विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार को इन संस्थाओं में भी धकेल दिया. आज सारा खेल पैसे का हो कर रह गया है.  सरकार जब 'साक्षर भारत' की नयी महत्वकांक्षी योजना लेकर आती है तो उसे लेकर सभी केवल बजट की बात करते हैं. कितने लोग इस योजना से मिलने वाले पैसे से अपनी कच्ची नौकरी पक्की कर सकते हैं यही सबका सरोकार है. एक बड़ी व्यवस्था करनी है. उसके लिए ढांचा तैयार करना है. उसके लिए अमुक वितीय प्रावधान है इसी पर सबका ध्यान है. इससे आगे जाकर कोई नहीं सोचता. राज्य सरकारें इस फ़िराक में है कि नयी योजना में कैसे केंद्र से आने वाले पैसे से काम चल जाए और उसे खुद कम से कम खर्च करना पड़े. नयी व्यवस्था और ढाँचे में कितनों को रोजगार के अवसर मिल सकते हैं यही खोज प्रौढ़ शिक्षा के काम में अपने को पुराने अनुभवी बताने वाले अभी कर रहे है. सबको व्यवस्था बनाने की फ़िक्र है क्या शिक्षा देनी है कैसी शिक्षा देनी और वैसी शिक्षा क्यों देनी है इस पर चिन्तन-मनन का काम सरकारी अहलकारो का नहीं है.    &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘साक्षर भारत’ को शुरू हुए डेढ़ वर्ष होने को आये हैं मगर अभी उसकी तैयारियों के दौर ही चल रहे हैं. उसमें अंततः क्या होना है उसकी ‘फाइन ट्यूनिंग’ अभी तक चल रही है जबकि यह योजना 2012 तक के लिए ही है.  दिल्ली में बड़े सरकारी आफिसों में कागजों पर जबरदस्त कसरत चलती है जिसके पसीनों से शिक्षा की खेती लहराने का उद्यम किया जाता है. इस उद्यम में लगे लोगों को यह भी लगता है की चल रही जनगणना की रिपोर्ट में साक्षरता दर फिर वैसी ही बड़ी छलांग लगाती नज़र आएगी जैसी पिछले दशक मंह आई थी इसलिए राजकोष का पैसा कैसे भी उड़ाया जाय हर्ज़ नहीं क्यों कि बढ़ी साक्षरता दर से शासन में बैठे लोगों को अपनी पीठ ठोकने का सबब मिल ही जाएगा.    &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;इक्कीसवीं सदी में हम पाते हैं कि शिक्षा आदमी को मुक्त नहीं कर रही है. उसे संकुचित कर रही है. उसे आत्म केन्द्रित कर रही है. उसे अनचाही होड़ में धकेल रही है. वह एक ऐसा समाज रच रही है जो भेद करता है. तनाव और हिंसा हमारे जीवन के जरूरी हिस्से बन गए हैं. लेकिन जिस रास्ते पर हम चल रहे हैं वह उन सपनों को साकार करने की तरफ नहीं ले जाता जो साठ साल पहले हमने देखे थे. कोई नेतृत्व नहीं है जो चेता सके, रोक सके और रास्ता दिखा सके. धार्मिक, सामजिक, व्यावसायिक और राजनैतिक नेतृत्व सब बाज़ार के लिए हो कर रह गए हैं. बाज़ार निर्मम होता है. मगर उसमें मानव मन को लुभाने की जबरदस्त क्षमता होती है. इसीलिए वह भुलावे का संसार रचता है. शिक्षा इस धुंधलके को हटा सके और ऐसा प्रकाश ला सके जिसमें सब साफ़-साफ़ दिखाई दे  सके उस सुबह का इंतज़ार है. मशहूर शायर साहिर ने कहा था 'वो सुबहा कभी तो आएगी'.  शिक्षा के असली यज्ञ में लगे लोगों को शायर के इस कथन पर भरोसा है.    &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;(यह आलेख समकालीन शिक्षा-चिंतन की पत्रिका ‘अनौपचारिका’ के मई-जून, 2010 के अंक में प्रकाशित हुआ)&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5185840046950412717-25024428290733635?l=itslokayat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itslokayat.blogspot.com/feeds/25024428290733635/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5185840046950412717&amp;postID=25024428290733635' title='16 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/25024428290733635'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/25024428290733635'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itslokayat.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='साक्षर भारत : टूटते सपनों की कहानी'/><author><name>Rajendra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S-Gx1DliFGI/AAAAAAAAArU/4OCr_2fmGn8/S220/photo.JPG'/></author><thr:total>16</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5185840046950412717.post-9200777460337346083</id><published>2010-05-10T02:35:00.000-07:00</published><updated>2010-05-10T02:42:48.340-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='policy'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='government'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='water'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='rajasthan'/><title type='text'>कम जल उपयोग वाले विकास की जरूरत</title><content type='html'>&lt;strong&gt;राजेन्द्र बोड़ा&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजस्थान के लोगों ने सदियों पहले प्रकृति से सहकार करना सीख लिया. उन्होंने प्रकृति से जो सीखा उसे अपनी  बुद्धि और कौशल से कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में जीने की राह आसान करने के जतन किये.  बुद्धि और कौशल का उपयोग राज करने वालों ने नहीं किया बल्कि सामान्य जन ने अपने अनुभवों से किया. राजस्थान में पानी इंसानी याददास्त में कभी इफरात में नहीं रहा. बरसात के बादल जो बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से उठते हैं वे इस प्रदेश तक पहुचते-पहुचते शिथिल पड़ जाते है. इसीलिए सूखा राजस्थान के लिए कोई नई बात नहीं है. बरसों बाद कभी-कभी ज़माना अच्छा होता है. इसीलिए पानी की अहमियत को यहाँ के लोगों नें सबसे अधिक जाना. जीवन की पहली शर्त पानी ही होती है. विकट  रेगिस्तानी इलाकों में जहां प्रकृति ने पानी की भयंकर किल्लत की स्थिति बनाए रखी वहां लोगों नें प्रकृति से समझौता किया और अपनी बुद्धि और कौशल से पानी के संरक्षण के अनोखे उपाय किये. पीढ़ी-दर-पीढ़ी पानी के संरक्षण और उसके किफायती उपयोग की सीख लगातार जारी रही. यह सब सामान्य जन ने किया. इसीलिए राजस्थान में पानी के पुराने सार्वजनिक स्रोत - कुए, बावड़ी, तालाब - किसी राजा-महाराजा के नाम से नहीं मिलते. वे अधिकतर दूसरों के बनवाये हुए मिलेंगे. पानी के लिए राज पर यहाँ के लोग कभी निर्भर नहीं रहे. अपने पानी के स्रोतों को संजो कर रखना उन्हें खूब आता था. निजी तौर पर भी लोग बरसात के पानी को आगे के महीनों के लिए संजो कर रखने के लिए संरचनाए बनाना सीखे हुए थे. मगर ज़माना बदल गया. लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में जब राज में आम जन की भागीदारी संवैधानिक व्यवस्था के जरिये निश्चित की गयी तब होना तो यह चाहिए था कि पानी को संजो कर रखने और उसके किफायती उपयोग की परंपरा और मजबूत होती. नए किताबी ज्ञान और परंपरागत कौशल के बीच नया रिश्ता बनता और लोगों का जीवन कुछ अघिक सुखद बन पाता. लेकिन आधुनिक युग में विज्ञान के चमत्कारों की चकाचौंध में पानी से हमारा मानवीय रिश्ता ही बदल गया. सारा समाज जो स्वावलंबी था वह पानी के लिए पूरी तरह सरकार पर आश्रित हो गया.  लोक के पास जो बुद्धि और ज्ञान  का भण्डार था उसे लोकतान्त्रिक व्यवस्था में आम आदमी की अपनी सरकार ने बिसरा दिए. जीवन के लिए महत्वपूर्ण पानी जैसे मुद्दों को प्रशासनिक और वित्तीय आधार पर सुलझा लेने की कोशिशें  होने लगी. ऐसी कोशिशें आज भी जारी है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकार में बैठे लोगों का सारा सोच पैसे से पानी के किल्लत की समस्या सुलझानें का हो गया है. पानी प्रकृति की दें है. वह पैसा देकर पैदा नहीं किया जा सकता. पैसे खर्च करने की योजनायें बनाने में शासन में बैठे लोगों ने विशेष योग्यता हासिल कर ली. इससे कईं लोगों की पौ बारह होती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कहते हैं कि राजस्थान में पानी की कमी उनकी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है. यह चुनौती क्या एक दिन में पैदा हुई है. राजस्थमें कोई बारहमासी नदी नहीं है यह कोई नई जानकारी नहीं है. यहाँ मानसूनी बरसात कम होती है और यहाँ सूखा पड़ना भी कोई अनोखी बात नहीं है. लेकिन पानी की समस्या ने जो विकराल रूप ले लिया है वह नीति निर्माताओं और प्रशासन में बैठे लोगों की बुद्धिहीनता और लापरवाही का नतीजा है. पानी का अंधाधुन्द उपयोग को बढ़ावा देने की नीतियाँ ही आज़ादी के बाद सरकारों ने अपनाई. रेगिस्तान को उसकी प्रकृति के विरुद्ध जाकर हरा-भरा बनाने की जुगत करते हुए शासन में बैठे लोगों ने पानी के संरक्षण की जगह उसकी तबाही के इंतजाम ही किये. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजस्थान का भूभाग देश के कुल क्षेत्रफल का 10.40 प्रतिशत है जहाँ देश की 5.40 प्रतिशत आबादी रहती है. परन्तु यहाँ देश के कुल सतही पानी का 1.16 प्रतिशत और भूगर्भ जल का केवल 1.70  प्रतिशत हिस्सा इस प्रदेश में उपलब्ध है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रदेश में मानसूनी वर्षा दो-तीन महीने ही होती है. यहाँ पानी के लिए मुख्यतः कमजोर बरसात पर ही निर्भर रहना पड़ता है. प्रदेश का एक तिहाई हिस्सा रेगिस्तान है जबकि 30 प्रतिशत अन्य हिस्सा अर्द्ध शुष्क है. इसका अर्थ यह हुआ कि प्रदेश का करीब दो तिहाई हिस्सा अधिकतर सूखा ही रहता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज हालत ये है कि पानी की मांग और आपूर्ति में अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है जबकि उसकी उपलब्धता हमेशा अनिश्चित बनी रहती है. भूजल के स्टार के लगातार नीचे गिरते जाने से पानी की गुणवत्ता खराब होती जा रही है और वह पीने योग्य नहीं रह पा रहा है. ऐसी हालत में पानी का बंटवारा भी गैर बराबरी का हो गया है. शहरी हैसियत वाले वर्ग पानी का बड़ा हिस्सा उड़ा ले जाता है जबकि गावों और निम्न वर्ग के लोगों को पानी की सबसे अधिक मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी परंपरागत जल संरक्षण की विरासत को भुला देने का नतीजा यह हुआ है कि हमारे सभी पारंपरिक जल स्रोत नष्ट हो गए. उन्हें बचाने के हाल ही में हुए सभी प्रयास इसलिए कारगर नहीं हो सके क्योंकि हमने पारंपरिक ज्ञान और बुद्धि से जो सीखा उसे नई नीतियों में शामिल नहीं किया. अभी तक हम पानी के प्रति अपना सोच स्पष्ट नहीं कर पाए हैं इसिलिए सरकारें ऐसे उद्यम ही करती रहती हैं जिनमें पानी का भारी उपयोग होता हो – चाहे वह कृषि का क्षेत्र हो, औद्योगिक क्षेत्र हो या पर्यटन मनोरंजन का क्षेत्र हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वास्तव में हम पानी की और नतीजन खुद अपनी तबाही करने को उतारू लगते हैं. राजस्थान की पहली जरूरत पीने का पानी है. मगर उसके लिए 2015 में एक बिलियन क्युबिक मीटर (बीसीएम) पानी की ही जरूरत होगी जबकि कृषि के लिए कुल 40 बीसीएम पानी की जरूरत होगी. क्या रेगिस्तानी राजस्थान के नीतिकारों के लिए यह समझदारी की बात है कि वे फिर भी कृषि को बढ़ावा देते रहें और यहाँ की प्रकृति के विरुद्ध जाते रहें या समझदारी की बात यह है कि वे ऐसी नीतियां बनावें जो इस भूभाग की परिस्थितियों के अनुरूप हों. यह समझदारी किताबों से नहीं आती. हमारे विश्वविद्यालय भी ये समझदारी नहीं सिखाते. राजनैतिक प्रक्रिया के अभाव में और एकाधिकार वाले राजनीतिक दलों के प्रभुत्व के कारण धरती से जुड़े लोग सरकारी व्यवस्था से दूर धकेल दिए जाते हैं.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;व्यवहारिक ज्ञान सिखाता है कि हम यह बात नहीं भूल जाएँ कि पिछले पचास-साठ वर्षों के इतिहास में  राज्य में केवल पांच-छः वर्ष ही ऐसे गुजरे हैं जब उसका कोई भूभाग सूखे से प्रभावित न रहा हो. यह भी हमारा अनुभव है कि हमें सतही जल के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भर रहना पड़ता है और सारे आपसी समझौतों के बावजूद वे हमारे हक का पानी नहीं देते. उनकी अपनी राजनैतिक मजबूरियां हैं. हमें यह भी जानकारी होनी चाहिए कि जिस प्रकार से शहरों का अनंत फैलाव हो रहा है और औद्योगीकरण के लिए हम उतावले हो रहे हैं उससे पानी की उपलब्धता और आपूर्ति के बीच खाई बढती ही नहीं जा रही है बल्कि पानी उपयोग कर्ताओं तक पहुंचाने का खर्च तेजी से बढ़ता जा रहा है.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;नीतियाँ बनाते हुए हमारे नीति निर्माताओं की बुद्धि यह सब क्यों नहीं देखती. उनके सामने सारे आंकड़े मौजूद है. वे जानते हैं कि सतही पानी के अभाव में हमारी निर्भरता भूजल पर लगातार बढती जा रही है. भूजल जितना रीचार्ज होता है उससे अधिक पानी का दोहन हो रहा है यह बात भी सरकारी अमला खुद बताता रहता है. फिर उस तरह के उपाय क्यों नहीं होते जिनसे पानी की उपलब्धता के साथ सामंजस्य बिठाया जा सके? क्यों पानी की मांग बढाने वाले अपने उपक्रमों पर कोई अंकुश लगता है?&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;विकास के नाम पर जो कुछ आज हो रहा है वह हमारे विनाश का कारण बनता जा रहा है. हम बड़ी-बड़ी टाउनशिप बना लेंगे, बड़े-बड़े औद्योगिक क्षेत्र बना लेगे, मनोरंजन के नाम पर वाटर पार्क बना देंगे, और किसानों के नाम पर खेती का विस्तार करते जायेंगे मगर इन सब के लिए पानी कहाँ से लायेंगे? पानी फेक्टरियों में पैदा नहीं होता. उसके लिए तो प्रकृति पर ही निर्भर रहना पड़ेगा. जब राज में बैठे लोग प्रकृति को समझेंगे और जमीनी हकीकतों से रूबरू होंगे तभी विनाश की तरफ बढ़ते हमारे कदम रुक सकेंगे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(यह आलेख मासिक पत्रिका 'प्रेस वाणी' के अप्रेल 2010 के अंक में छपा)&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5185840046950412717-9200777460337346083?l=itslokayat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itslokayat.blogspot.com/feeds/9200777460337346083/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5185840046950412717&amp;postID=9200777460337346083' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/9200777460337346083'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/9200777460337346083'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itslokayat.blogspot.com/2010/05/blog-post_10.html' title='कम जल उपयोग वाले विकास की जरूरत'/><author><name>Rajendra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S-Gx1DliFGI/AAAAAAAAArU/4OCr_2fmGn8/S220/photo.JPG'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5185840046950412717.post-4847938813409790652</id><published>2010-05-03T07:54:00.000-07:00</published><updated>2010-05-03T08:09:17.491-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Juthika Roy'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Suryatra'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Gandhi'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Nehru'/><title type='text'>बेमिसाल गायन - जीवन</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S97mDq69FpI/AAAAAAAAArA/SRdd8uUozCo/s1600/CIMG1079.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S97mDq69FpI/AAAAAAAAArA/SRdd8uUozCo/s320/CIMG1079.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5467059948409919122" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;-राजेंद्र बोड़ा&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जुथिका  रॉय उन महान कलाकारों में से हैं  जो न केवल अपनी कला की बुलंदियों पर पहुंचे बल्कि अपने जीवन को भी ऐसे जिया जिससे प्रेरणा ली जा सके. अपनी मीठी आवाज के साथ सरल और सौम्य व्यक्तित्व वाली गायिका जुथिका रॉय ने 20 अप्रेल को अपने जीवन के 90 बसंत पूरे कर 91 वें वर्ष में प्रवेश किया. उन्होंने अपना जन्म दिन जयपुर में सुधि संगीत रसिकों के बीच मनाया. जयपुर के एक अनौपचारिक समूह 'सुरयात्रा'  ने उन्हें विशेष तौर पर जयपुर आमंत्रित किया था. बीते युग के बहुत कम संगीत सितारे आज हमारे बीच हैं. मगर  नई विज्ञापनी चकाचौंध में वे बिसराए हुए ही रहते है. 'सुरयात्रा' समूह  बीते युग के ऐसे कलाकारों को याद करता है, उन्हें बुलाता है और स्नेह से भावभीना सम्मान करता है. भावना यही रहती है कि उस कलाकार को अपने जीवन की सांध्य बेला में लगे कि वे भुला नहीं दिए गए हैं. आज भी उनके चाहने वाले उन्हें इज्जत बख्शने वाले मौजूद हैं. कलाकार को मिली यह ख़ुशी ही सुरयात्रा के हमराहियों की थाती होती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जुथिका रॉय तीन दिन जयपुर में रही. रविवार की शाम उनका भव्य सम्मान समारोह हुआ. बीते युग की इस गायिका की यात्रा और उनके सम्मान समारोह के लिए 'सुरयात्रा' ने किसी प्रायोजक की मदद नहीं ली थी. 20 तारीख को सुरयात्रियों ने उनका जन्म दिन मना कर उन्हें कोलकाता के लिए विदाई दी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे जब सात बरस की थीं तभी से उन्होंने गाना शुरू कर दिया था और मात्र 13 बरस की उम्र में उन्हें आकाशवाणी के कोलकोता केंद्र से गाने का मौका मिला. 1933 में क़ाज़ी नजरुल इस्लाम के निर्देशन में उनकी दो गीतों की रिकार्ड बनीं, परन्तु वह टेस्ट रिकार्ड से आगे नहीं बढ़ पायी. 1934 में ग्रामोफोन कंपनी में ट्रेनर के पद पर आये कमल दासगुप्ता ने रिजेक्ट की हुई टेस्ट रिकार्ड सुनी और नए सिरे से उन्हें रिकार्ड करवाया और जुथिका रॉय पहली बार रिकार्ड के जरिये लोगों के सामने आयीं. जुथिका रॉय ने सुरयात्रा की बैठक और सम्मान समारोह में अपने गायन जीवन के कई आत्मीय प्रसंगों को याद किया. जुथिका जी ने अधिकतर भजन ही गाये. उनके गाये मीरा के भजन पुरानी पीढ़ी के लोग आज भी घंटो सुनते हैं. महात्मा गांधी, पंडित जवाहर लाल नेहरु, सरोजिनी नायडू  और मोरारजी देसाई जैसे नेता भी उन लाखों लोगों में शामिल थे जो जुथिका रॉय को सुनना पसंद करते थे. एक बार वे जब हैदराबाद में एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने गयी हुई थी कि सुबह सुबह उन्हें बताया गया कि सरोजिनी नायडू उन्हें सुनना चाहती हैं और वे उस गेस्ट हाउस में आ रहीं है जहां वे ठहरी हुई हैं. छोटी उम्र की जुथिका के लिए यह यादगार क्षण था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नायडू ने जुथिका से भजन सुने और खूब आशीर्वाद दिया. उन्होंने बताया की बापू भी जुथिका के गायन को बहुत पसंद करते हैं और पूना जेल में जब वे थे तब वहां उसके भजनों के ग्रामोफोन रिकार्ड रोज सुनते थे. नायडू ने जुथिका से पूछा की क्या वह गाँधी जी से मिली है? फिर कहने लगी तुम गाँधी जी से जरूर मिलना. मगर जुथिका जी से गांधी जी से मिलना बहुत बाद में हुआ जब वे कलकत्ते में सांप्रदायिक सदभाव स्थापित करने आये और बेलियाघाटा में ठहरे थे. जुथिका, उनके पिता, माँ और चाचा गांधी के दर्शन करने सुबह सुबह वहां पहुंचे जहाँ गांधीजी ठहरे हुए थे. उन्होंने अखबार में पढ़ा की गांधी जी बहुत व्यस्त है और किसी से नहीं मिलेंगे. सुबह छः बजे बापू टहलने जाते है. जुथिका के परिवार ने सोचा सुबह जब बापू टहलने निकलेंगे तब उनके दर्शन कर लेंगे. मगर वे जब वहां पहुंचे तो पता चला की गांधी जी सैर करके वापस लौट भी चुके है. बाहर गांधी के दर्शनों के लिए बड़ी भीड़ थी और बारिश हो रही थी. जब उन्होंने चौकीदार  से कहा कि उन्हें गांधी जी से मिलना है तो उसने यह कह कर उन्हें अन्दर नहीं जाने दिया कि उसे आदेश हैं कि किसी को भी अन्दर नहीं जाने दूं.  जब चौकीदार  टस से मस नहीं हुआ तो जुथिका के चाचा जो थोड़े तेज तर्रार किस्म के इंसान थे चौकीदार से अधिकारपूर्ण बोले : “गांधी जी से जाकर बोलो कि जुथिका आयी है”. चौकीदार भभकी में आ गया और अन्दर चला गया. थोड़ी देर में वे क्या देखते हैं कि आभा और मनु तथा कुछ और लोग छाते लिए हुए बाहर आ रहे है. वे आये और जुथिका के परिवार को अन्दर ले गए. अन्दर उन्हें तौलिया दिया गया कि वे भीगे हुए शरीर को पोंछ लें. गांधी जी  दूसरे कमरे में थे. उनका उस दिन मौन व्रत था. किसी ने आ कर कहा कि जुथिका और उनकी माँ अन्दर जाकर गांधी जी से मिल सकते है. लगभग 64 साल पुरानी यह घटना जुथिका जी के स्मृति पटल पर आज भी ताजा है. "मैंने अन्दर प्रवेश किया तो देखा कि बापू केवल धोती पहने नंगे बदन बैठे हैं और एक कागज़ पर कुछ लिख रहे है. कागज उनके घुटने पर रखा है जिसके नीचे आधार के लिए कुछ नहीं है. बापू ने सर उठा कर मुस्कराते हुए हमारी और देखा. उनके चेहरे पर जो आत्मीयता थी आभा थी वह आज भी मुझे याद है. मुझे नहीं लगा कि में उनसे पहली बार मिल रही हूँ. मुझे लगा जैसे वे तो मेरे ही कोई अपने हैं. मैंने उन्हें जाकर प्रणाम किया और उन्होंने मेरे सिर पर हाथ हाथ रख कर आशीर्वाद दिया. उन्होंने कागज़ पर लिख कर मेरे बारे में पूछा. मनु उनके लिखे को पढ़ कर सुनाती थी. मनु ने कहा गांधी जी साथ के कमरे में अब स्नान करने जा रहे है. आप यहीं बैठे कुछ भजन गाईये. गाँधी जी नहाते रहे और में बिना किसी संगतकार के मीरा के भजन गाती रही. नेने कोई पांच छः भजन उस समय गाये होंगे. बाद में गांधी जी ने फिर लिख कर दिया कि उनकी प्रार्थना सभा में मैं चालू और वहां भजन गाऊँ. बाद में गांधी जी के साथ की कार में मैं बापू के प्रार्थना स्थल गयी जहां गाँधी जी की सांप्रदायिक सदभाव बनाए रखने की अपील के बाद मेरा गान हुआ और उसके साथ ही सभा समाप्त हुई."&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु भी जुथिका के गायन को पसंद करते थे. उन्होंने एक बार जुथिका रॉय को अपने सरकारी आवास पर बुलाया और उनसे भजन और गीत सुने. " नेहरूजी चप्पल खोल कर जमीन पर बैठे. उन्होंने अपनी टोपी उतार के रख दी और दो घंटे तक मेरा गान सुनते रहे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सन 1920  में हावड़ा जिले के आमता गाँव में जन्मी  जुथिका रॉय ने 356 से अधिक गीत गाये. इनमें से 214 हिंदी में, जिनमें अधिकतर भजन थे, 133 गीत बांग्ला में और दो तमिल में गाये. हिंदी के भक्ति गीतों में कुछ इस्लामिक नातें भी हैं तो कुछ होली और वर्षा गीत हैं.  उन्होंने दो हिंदी फिल्मों – ‘रत्नदीप’ और ‘ललकार’ - में चार गीत गाये. जुथिका रॉय ने बावजूद बड़े आफर के फिल्मों में गीत नहीं गाये. ये दो अपवाद इसलिए हुए कि 'रत्नदीप' के लिए वे जाने माने निर्देशक देवकी बोस को ना नहीं कर सकी जिन्होंने कहा कि उन पर कोइन बंदिश नहीं होगी और वे अपनी पसंद से गायेंगी. दूसरी फिल्म 'ललकार' के निर्माता गीतकार पंडित मधुर थे. जुथिका रॉय ने मीरां  के के अलावा जो गीत गाये वे अधिकतर पंडित मधुर के ही लिखे हुए थे इसलिए वह उन्हें भी इनकार नहीं कर सकी.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;जुथिका रॉय का परिवार रामकृष्ण मिशन से जुड़ा हुआ था. जुथिका और उनकी दो अन्य बहनों ने 12 बरस का ब्रह्मचर्य का व्रत लिया. बहनों ने 12 वर्ष व्रत निभा कर बाद में शादी कर ली मगर जुथिका रॉय ने यह व्रत आजीवन के लिए अपना लिया. उनके गानों को संगीतबद्ध अधिकतर बंगाल के प्रमुख संगीतकार कमल दासगुप्ता ने किया. वे जुथिका जी से विवाह करना चाहते थे मगर इसी व्रत के कारण यह विवाह नहीं हो सका. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सन 1939 में उनके गाये मीरां और कबीर के भजनों ने जो जबरदस्त लोकप्रियता हासिल की वह आज भी बरकरार है.  इसी साल उन्होंने पहली बार सार्वजनिक प्रदर्शन मुंबई में दिया और तब से उन्होंने कभी पीछे मुड कर नहीं देखा. 1972 में उन्हें पद्मश्री का अलंकरण दिया गया. सन 2002 में जुथिका रॉय की बांग्ला में आत्मकथा "आज ओ मोने पड़े" का प्रकाशन हुआ. इसी का गुजराती संस्करण "चुपके चुपके बोल मैना' का प्रकाशन 2008 में हुआ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(&lt;strong&gt;यह आलेख जनसत्ता के 2 मई के रविवारी परिशिष्ट में छपा&lt;/strong&gt;) &lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5185840046950412717-4847938813409790652?l=itslokayat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itslokayat.blogspot.com/feeds/4847938813409790652/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5185840046950412717&amp;postID=4847938813409790652' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/4847938813409790652'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/4847938813409790652'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itslokayat.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='बेमिसाल गायन - जीवन'/><author><name>Rajendra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S-Gx1DliFGI/AAAAAAAAArU/4OCr_2fmGn8/S220/photo.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S97mDq69FpI/AAAAAAAAArA/SRdd8uUozCo/s72-c/CIMG1079.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5185840046950412717.post-1240022811704365720</id><published>2010-04-23T22:56:00.000-07:00</published><updated>2010-04-24T10:53:50.853-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='M.S.Sathyu'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Nehru'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Kaifi Azmi'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Ismat Chugtai'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Garm Hava'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Balraj Sahni'/><title type='text'>दास्तान 'गर्म हवा' की</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S9KLTAWL0EI/AAAAAAAAAqg/PkTtyeJFwIw/s1600/Garm+Hawa.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 106px; height: 115px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S9KLTAWL0EI/AAAAAAAAAqg/PkTtyeJFwIw/s320/Garm+Hawa.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5463582456580657218" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;राजेंद्र बोड़ा&lt;/span&gt; &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;'गर्म हवा' उर्दू की जानी-मानी लेखिका इस्मत चुगतई की एक अप्रकाशित लघु कहानी पर आधारित फिल्म है जिसका फ़िल्मी तर्जुमा मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी ने शमा जैदी के साथ मिल कर किया. कैफ़ी आज़मी ने फिल्म के संवाद भी लिखे. यह मैसूर श्रीनिवास सथ्यू - एम. एस. सथ्यू - की पहली फीचर फिल्म थी जो 1973 में रिलीज हुई.   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस्मत चुगतई की मूल कहानी का नायक एक स्टेशन मास्टर है जो देश के बंटवारे के चक्र में फंस गया है. फिल्म की स्क्रिप्ट में नायक को चमड़े के जूते बनाने वाली फेक्ट्री के मालिक के रूप में चित्रित किया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छः जुलाई 1930  में मैसूर में जन्मे सथ्यू बीएससी की पढाई बीच में छोड़ कर अपनी किस्मत सिने जगत में आजमाने के लिए बम्बई आ गए. बम्बई में 1952-53 में फ्रीलांस एनिमेटर के रूप में काम किया. मगर बाद में चार बरस तक बेरोजगारी में गुजारे. उन्हें सबसे पहला तनख्वाह वाला काम फिल्मकार चेतन आनंद के सहायक के रूप में मिला. फिल्म 'किनारे किनारे' में वे चेतन आनंद के सहायक नेर्देशक बने. बाद में स्वतंत्र रूप से कला निर्देशन करने का काम भी उन्हें चेतन आनंद ने ही दिया. फिल्म थी 'हकीकत', भारत चीन युद्ध पर बनी एक सच्ची फिल्म. सथ्यू को इस फिल्म के श्रेष्ठ कला निर्देशन के लिए वर्ष 1964  का 'फिल्मफेयर पुरस्कार' मिला.&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S9KJ1Qg9BrI/AAAAAAAAAp4/2fho8G6daRU/s1600/MS+Sathyu.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 120px; height: 90px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S9KJ1Qg9BrI/AAAAAAAAAp4/2fho8G6daRU/s320/MS+Sathyu.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5463580846013089458" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;सथ्यू ने हिन्दुस्तान थियेटर, ओखला, हबीब तनवीर, कन्नड़ भारती तथा दिल्ली के अन्य थियेटर समूहों के लिए डिजाइनर तथा निर्देशक के रूप में भी काम किया. फिल्मों में उन्होंने कला निर्देशन के अलावा केमरामेन, स्क्रीन राइटर, निर्माता, और निर्देशक के रूप में अपनी प्रतिभा दिखाई. मगर उनका सर्वश्रेष्ठ काम आज भी 'गर्म हवा' ही माना जाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'गर्म हवा' आज क्लासिक फिल्म मानी जाती है, जिस पर 'भारतीय सिनेमा' को गर्व है. 'इंडिया टाइम्स'  वेब पोर्टल ने देश की 25 सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में इस फिल्म की गणना की है. फिल्म देश के बंटवारे के बाद उत्तरी भारत के एक माध्यम वर्ग के मुस्लिम परिवार की कहानी है जिसका नायक अपने सभी रिश्तेदारों के पाकिस्तान चले जाने के बावजूद इसी देश में रहने का फैसला करता है.  फिल्म एक ऐसे मुस्लिम परिवार की परीक्षा और पीड़ा प्रकट करती है जिसे देश की बहुसंख्य हिन्दू आबादी संदेह की नज़र से देखती है, उसके साथ साम्प्रदायिक द्वेष रखती है, उसका आर्थिक बहिष्कार करती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'गर्म हवा' पिछली शताब्दी के सातवें दशक 'मुख्यधारा सिनेमा' का विकल्प प्रस्तुत करते हुए शुरू हुए 'न्यू-वेव' सिनेमा की शुरूआती फिल्मों में से एक है. 'न्यू-वेव' सिनेमा की फिल्मों ने 'मुख्यधारा' की फिल्मों के उस दुष्चक्र को तोड़ने का प्रयास किया जिसमें परंपरागत प्रेम कहानी होती थी, भोंडी कामेडी होती थी और निरर्थक हिंसा होती है.    &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;देश के मुस्लिम नागरिकों के सरोकारों और उनकी पीड़ा को दर्शाने वाली यह पहली सच्ची - आनेस्ट -  फिल्म थी. श्याम बेनेगल ने ऐसे ही मुस्लिम सरोकारों वाली सच्ची फिल्म 'मम्मो' बहुत बाद में बनाई. यह फिल्म तत्कालीन राजनैतिक और सामाजिक स्थितियों से दर्शकों को रूबरू कराती है. भारतीय सिनेमा में ऐसा पहली बार हुआ था जिसने दर्शकों की संवेदना को झकझोरा और मुस्लिमों की तकलीफों को मानवीय नजरिये से देखा. &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;अपनी फिल्म के बारे में सथ्यू कहते हैं : “What I really wanted to expose in 'Garm Hawa' was the games these politicians play...How many of us in India really wanted the partition. Look at the  suffering it caused”.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सन 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध के दो वर्ष बाद रिलीज हुई यह फिल्म अपने कथ्य में ताकत पुरजोर तरीके से उन आदर्शों को पुनर्स्थापित करती है कि इस देश पर मुसलमानों का भी उतना ही हक है जितना हिन्दुओं का. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्म का विषय ही ऐसा था कि वह हमेशा ही विवादों से घिरी रही. हम भारत के लोग वैसे तो अपनी सहिष्णुता के डंके बजाने में कभी पीछे नहीं रहते मगर जब भी ऐसा कोई मौका आता है जम हमें अपनी इस महानता का परिचय देना होता है हम असफल रहते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बावजूद इसके कि फिल्म सभी वर्गों द्वारा एक क्लास्सिक मानी गयी और समीक्षकों की उसे खूब सराहना मिली वह बड़े पैमाने पर सिनेमाघरों में नहीं पहुँच सकी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सथ्यू ने जब 'गर्म हवा' बनाई तब वे इस क्लासिक को बनाने के लिए पूरी तरह तैयार थे. वे चेतन आनंद जैसे  सिने काव्य रचने वाले फिल्मकार के सहायक के रूप में काम कर चुके थे.  मैसूर में छः जुलाई 1930 को जन्मे  मैसोर श्रीनिवास सथ्यू - एम. एस. सथ्यू - ने 1952 में कालेज में बीएससी की पढाई बीच में छोड़ कर बम्बई की अनजान फ़िल्मी दुनिया में कुछ कर दिखाने को पहुच गए.  बम्बई की फ़िल्मी मायानगरी में उन्होंने फ्रीलांसर के रूप में 1952-53 में रेखाचित्र बनाने के काम से शुरुआत की.  मगर इसके बाद चार साल तक उन्हें बेरोजगारी का सामना करना पड़ा. उन्हें पहला नियमित पगार वाला काम चेतनआनंद के सहायक के रूप में मिला. स्वतंत्र कला निर्देशक के रूप में उन्हें पहला मौक़ा चेतनआनंद ने अपनी फिल्म 'हकीकत' में दिया. और 'हकीकत' के कला निर्देशन के लिए सथ्यू को वर्ष 1964 का 'फिल्मफेयर पुरस्कार' मिला.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'गर्म हवा' उन फिल्मों में से है जो आज क्लासिक मानी जाती है मगर बनने पर जो ठीक ढंग से रिलीज भी नहीं हो पायी. फिल्म देश के विभाजन के बाद एक भले मुसलमान परिवार  की त्रासदी की कहानी ही नहीं कहती है बल्कि देश के सामजिक और राजनीतिक माहौल की भी सच्ची दास्तान कहती है  अपने इस विषय के कारण 'गर्म हवा' को लेकर हमेशा विवाद उठाये जाते रहे. 1971 में जब सथ्यू खुद की पहली फीचर फिल्म बनाने के इरादे से राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (National Film Development Corporation) से वित्तीय मदद मांगने गए तब 'गर्म हवा' की स्क्रिप्ट लेकर नहीं गए थे बल्कि कोई और कहानी लेकर गए थे. वहां वह प्रस्ताव अस्वीकार हो गया और उनसे कहा गया कि वे कोई और कहानी लायें. उनके पास 'गर्म हवा' की स्क्रिप्ट भी तैयार थी मगर उन्हें भरोसा नहीं था कि सरकारी संस्थान ऐसे विवादस्पद विषय की स्वीकार करेगा. मगर जब निगम ने उन्हें दूसरी कहानी लाने का कहा तो उन्होंने 'गर्म हवा' की स्क्रिप्ट वहां पेश कर दी. आश्चर्यजनक रूप से 'गर्म हवा' फिल्म बनाने के लिए वित्तीय मदद देना मंजूर कर लिया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब साम्प्रदायिक मानसिकता रखने वालों को फिल्म के थीम का पता चला तो फिल्म की शूटिंग के दौरान खूब झमेले और हंगामे किये गए. यहाँ तक कि उपद्रवकारियों से बचने के लिए एक नकली कैमरा टीम बनाई गई जो खाली कैमरा चला कर सीन की शूटिंग का ढोंग करती और उपद्रवकारियों को अपनी तरफ उलझाए रखती ताकि फिल्म की वास्तविक शूटिग दूसरी जगह पूरी हो सके.  &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;फिल्म बन कर पूरी हुयी तो सेंसर का झंझट हो गया. फिल्म से साम्प्रदायिक भावनाएं फैलने का अंदेशा जताते हुए सेंसर बोर्ड ने उसे सर्टिफिकेट देने से इनकार कर दिया. सथ्यू अपनी फिल्म का प्रिंट लेकर हर महत्वपूर्ण मंत्री और अधिकारी दिखाते फिरते रहे और फिल्म को सेंसर की अनुमति दिलाने की गुहार लगाते रहे. नौ महीनों की जद्दोजहद के बाद आखिर फिल्म को सेंसर बोर्ड का सर्टिफिकेट मिला. &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;फिल्म शुरू होने और बन कर पूरी होने में थीं साल का वक्त लगा. फिल्म रिलीज हुई तो उसे खरीददार मिलने मुश्किल हो गए. हर कोई इस विवादास्पद थीम वाली फिल्म से दूर ही भागता रहा. यह सच है कि जिन लोगों ने इस फिल्म को देखा है उनमें से बहुत कम ऐसे होंगे जिन्होंने उसे सिनेमा हाल के परदे पर देखा हो. अधिकतर ने उसे 'दूरदर्शन' पर ही देखा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्म रिलीज हुई तब किसी को यह आशा नहीं थी कि फिल्म को हर तरफ से सराहना मिलेगी. मगर ज्यों ज्यों समय गुजरता गया फिल्म के प्रति लोगों का लगाव बढ़ता गया. फिल्म कान्स फिल्म समारोह में सर्वश्रेष्ठ फिल्म को मिलने वाले 'गोल्डन पाम' के लिए नामांकित हुई.  ‘गर्म हवा’ अकेडमी के ‘आस्कर’ पुरस्कार के लिए भारतीय एंट्री थी.  इधर अपने देश में फिल्म को राष्ट्रीय एकता का राष्ट्रपति पुरस्कार दिया गया. 'गर्म हवा' को 'फिल्मफेयर' के तीन पुरस्कार मिले - कैफ़ी आज़मी को सर्वश्रेष्ठ संवाद लेखन के लिए, कैफ़ी आज़मी और शमा जैदी को संयुक्त रूप से फिल्म की स्क्रिप्ट के लिए और इस्मत चुगताई को फिल्म की कहानी के लिए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोगों को जान कर आश्चर्य होगा कि 'गर्म हवा'  फिल्म कुल आठ लाख रुपयों में बनी. हमारे देश में मुफलिसी और परेशानिया झेलते हुए बनी फ़िल्में ही क्लास्सिक वर्ग में अधिकतर शामिल हुई है. सथ्यू वामपंथी बुद्धिजीवी फिल्मकार के रूप में जाने जाते हैं. इसलिए स्वाभाविक ही है कि फिल्म में अधिकतर इंडियन पीपल्स थियेटर -इप्टा- से जुड़े थियेटर कर्मियों ने काम किया. पूरी फिल्म बलराज साहनी के कन्धों पर चलती है. उन्होंने बिमल राय की 'दो बीघा जमीन' को अपने अभिनय से कालजयी बना दिया था. सथ्यू की 'गर्म हवा' में वे फिर अभिनय के ऐसे ऊंचे शिखर पर हैं जिसे पाना नामचीन कलाकारों के बस का नहीं है.&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S9KKuI3NMNI/AAAAAAAAAqQ/DSX1qDQOwcs/s1600/Balraj.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 124px; height: 92px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S9KKuI3NMNI/AAAAAAAAAqQ/DSX1qDQOwcs/s320/Balraj.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5463581823211483346" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कईं लोग 'गर्म हवा'  में बलराज साहनी के अभिनय को उनके जीवन का सर्वश्रेष्ठ काम मानते हैं. यह उनकी आखरी फिल्म थी. फिल्म के रिलीज होने के पहले ही 13 अप्रेल 1973 को उनका निधन हो गया. फिल्म की डबिंग पूरी करने के दूसरे ही दिन वे इस दुनिया से चल बसे.  फिल्म के लिए उन्होंने जो आखरी डायलाग रिकार्ड किया वह था "कोई इंसान कितने समय अकेला जी सकता है". &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्म की एक बड़ी खूबी यह भी है कि ऐसा नहीं हुआ कि बलराज साहनी का किरदार इतना हावी हो गया हो कि अन्य कलाकारों के लिए कुछ करने को ही नहीं हो. फिल्म के हर कलाकार ने चाहे उसकी भूमिका कितनी ही छोटी क्यों न हो पूरी शिद्दत से निभाया है. यहाँ तक कि उस वृद्धा ने जिसका अभिनय से अपने जीवन में कभी वास्ता नहीं पड़ा और जो सथ्यू को आगरा की उस हवेली में ही रहती मिली जहाँ उन्होंने फिल्म को शूट करने का तय किया. उस वृद्धा को बलराज साहनी की माँ के किरदार में लिया गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भले ही देश भर के अधिकाँश दर्शकों ने 'गर्म हवा' टेलीविजन पर ही देखी हो और व्यावसायिक सिनेमाघरों को यह फिल्म अपने यहाँ प्रदर्शित करने लायक नहीं लगी हो मगर आज इस फिल्म पर भारतीय सिनेमा को गर्व है. लोकप्रिय वेब साईट 'इंडिया टाइम्स' ने 'गर्म हवा' को अब तक की 25 जरूर देखी जाने वाली फिल्मों की सूची में शामिल किया है. &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;फिल्मफेयर के समीक्षक ने लिखा था: I do not have the language to describe the beautiful sensitivity or the visuals and the sounds of Gram Hava. And though it is painful, it has a raw strength too. If Ghalib was the singer of political gloom after 1857, this film is the chronicle of robust hope after 1947.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टाइम्स आफ इंडिया ने लिखा: In many ways Garm Hava is the most important film made since independence. Never before has the cinema tackled one of the most sensitive issues of our time - the communal situation -  with such courage and incissiveness. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिन्दुस्तान टाइम्स में छपा : Garm Hava is the most courageous piece of political cinema to be seen here for a long time.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सन्डे स्टैण्डर्ड ने कहा : Garm Hava is one of the most important films made in recent months in this country - in fact one of the most significant movies ever made. It is a film with no false notes no melodramas no overplaying and no gimmicks, but a film which is narrated in an off-the-cuff style.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा :  It is a film which sets you thinking and this can be said of very few films made in this country. Garm Hava is the most important films of our times . It is not an intellectual film. There is nothing esoteric about it. But it is a filmic experience of great power.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्म वर्ल्ड का मानना था : sathyu achieves world class with this film. Every actor and actress has been cast in the right role and there is nothing that is out of place. Balraj has left this film as a memorial to us and no sensitive person will fail to realise the effort that has gone in making of this film. It is beautiful. Go see it to believe that India can make such films. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मशहूर चरित्र अभिनेता   ए के हंगल के शब्दों में : &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"गर्म हवा हिन्दुस्तानी भाषा में उनफिल्मों में से एक है जिनमें अधिकृत रूप से संवेदनशीलता के साथ साथ भारतीय जीवन के यथार्थ को भी चित्रित किया गया है. इस फिल्म का विषय भारत-पाक विभाजन के बाद अनुलंबित भारतीय समाज का गंभीर संकट है. जब जब मैं इस फिल्म के बारे में सोचता हूँ तो सबसे पहले मेरे मस्तिष्क में जो बात आती है वह है बलराज साहनी द्वारा मध्यमवर्गीय मुस्लिम व्यक्ति का आगरे में भयावह परिस्थितियों से जूझते एक देदीप्यमान चित्रांकन. फिल्म वस्तुतः इस मुस्लिम व्यक्ति को सच्ची श्रद्धांजलि है जिसने साहस और लम्बे समय तक एक दृढ़ संकल्प के साथ आम नागरिकों की भांति अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया, जबकि उसके और सभी रिश्तेदार पाकिस्तान चले गए पर उसने अपने बल बूते पर ही भारत में रहने का निर्णय लिया. &lt;br /&gt;मेरे ख्याल से यह फिल्म इसलिए बन सकी क्योंकि अनेक धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति एक साथ इसमें काम करने को तैयार हुए और इसके निर्माण में उनहोंने मदद की, उनमें से अधिकाँश इप्टा से सम्बद्ध थे. एम एस सथ्यू ने निर्देशन किया, कैफ़ी आज़मी और शमा जैदी  ने इस्मत चुगताई की कहानी पर फ़िल्मी पटकथा लिखी, बलराज साहनी ने मुख्य नायक की भूमिका अदा की, फिल्म की सिनेमेटोग्राफी ईशान आर्य ने किया. ये सब इप्टा के गौरवशाली कलाकार थे. मैंने भी एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की. एन सिन्धी व्यापारी जो कि कराची से आया एक शरणार्थी है फिर भी वह समय के विरुद्ध गतिमान है और बिना सांप्रदायिक पक्षपात के वह मुसलमानों से सहानुभूति रखता है और उसके साथ व्यापार जारी रखना चाहता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस फिल्म से सम्बंधित एक त्रासद घटना भी है जो मुझे आज भी याद है. बलराज साहनी ने इस फिल्म में अपनी अविस्मर्णीय भूमिकाओं में एक भूमिका अदा की और जिस दिन इसे प्रदर्शित किया गया उस दिन बलराज साहनी वहां नहीं थे. फिल्म पर अपना काम ख़त्म करने के बाद उनके तो प्राण पखेरू ही उड़ गए. हमने उनकी मृत्यु का समाचार तब सुना जबकि हम सब कलाकार तेजपाल में एक नाट्य प्रदर्शन के लिए मंच पर जाने ही वाले थे. एक बार फिर प्रदर्शनकारी कलाकारों की अनंतकालीन मान्यता ने कि "शो मस्ट गो आन" हमें मंच पर भेज दिया. और "शो" जारी रहा". &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;(पिंक सिटी प्रेस क्लब और फिल्म फैन्स सोसायटी की तरफ से 10 अप्रेल 2010  को गर्म हवा फिल्म के प्रदर्शन के अवसर पर दिया गया वक्तव्य)&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5185840046950412717-1240022811704365720?l=itslokayat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itslokayat.blogspot.com/feeds/1240022811704365720/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5185840046950412717&amp;postID=1240022811704365720' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/1240022811704365720'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/1240022811704365720'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itslokayat.blogspot.com/2010/04/blog-post_23.html' title='दास्तान &apos;गर्म हवा&apos; की'/><author><name>Rajendra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S-Gx1DliFGI/AAAAAAAAArU/4OCr_2fmGn8/S220/photo.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S9KLTAWL0EI/AAAAAAAAAqg/PkTtyeJFwIw/s72-c/Garm+Hawa.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5185840046950412717.post-5902273327119472309</id><published>2010-04-04T05:28:00.000-07:00</published><updated>2010-04-04T20:56:01.430-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Legislators'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Emoluments'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='rajasthan'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Ministers'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='assembly'/><title type='text'>हमारे भाग्य विधाता</title><content type='html'>&lt;strong&gt;राजेंद्र बोड़ा&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर बार की तरह इस बार भी हुआ. विधान सभा के बजट सत्र का शुक्रवार आखरी दिन था. सत्र के अनिश्चित काल के लिए स्थगित होने के थोड़ी  देर पहले विधानसभा अध्यक्ष, मुख्यमंत्री, मंत्रियों और विधायकों के वेतन - भत्तों में यकायक बड़ी बढ़ोतरी करने का विधेयक और वह तुरत - फुरत में पास हो गया. सबके वेतन पांच - पांच हजार रुपये माहवार बढ़ गए. विधायकों के निर्वाचन भत्ते में दस हजार रुपये माहवार अलग से बढ़ गए. उन्हें एक कर्मचारी रखने की सुविधा थी जिसकी जगह विधायकगण अब बीस हजार रुपये माहवार नकद ले सकेंगे. इन निर्वाचित जनसेवकों - विधानसभा अध्यक्ष, मुख्यमंत्री,  मंत्री और राज्य मंत्री उपाध्यक्ष मुख्य सचेतक उप मुख्य सचेतक तथा प्रतिपक्ष के नेता - द्वारा अपने मेहमानों का आतिथ्य करने के लिए मिलने वाले भत्ते में भी पांच से छः हजार रुपये माहवार बढ़ा दिए गए. घरों को सजाने और बिजली के बढे हुए बिल भरने की भी व्यवस्था कर दी गई और रेल में यात्रा करने के लिए साल भर में एक लाख रुपये खर्च नहीं हो सकेंगे तो वह राशि लेप्स नहीं होगी उसका उपयोग अगले वर्ष में भी किया जा सकने का इंतजाम करदिया गया. भूतपूर्व विधायकों की पेंशन बढ़ा कर दुगनी कर दी गई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा उस प्रदेश में हुआ जहाँ की लगभग आधी आबादी गरीबी की सीमा रेखा से नीचे जीवन निर्वाह  करती है.  जनता के नुमाइंदों के वेतन भत्तों में हुई बढ़ोतरी की राशि इस प्रदेश के लोगों की ‘प्रति व्यक्ति आय’ से दुगने से अधिक है. यह उस समय  हुआ है जब अकाल सिर पर  है और पीने के पानी की त्राहि-त्राहि गर्मियों के शुरू में ही होने लगी है. &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;ऐसे में यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या जनता के नुमाइंदों को उस समय अपने वेतन भत्ते बढाने का कोई नैतिक अधिकार है जब प्रदेश का आमजन को दो जून रोटी का जुगाड़ करने में मुश्किलें आ रही हैं. क्या जनता के लिए काम करने का दम भरने वाले निर्वाचित विधान सभा सदस्यों को वे सभी सुविधाएं पाने का हक बनता है जो आमजन को मुहैया नहीं है? मुख्य मंत्री अशोक गहलोत, जिन्होंने ये वेतन भत्ते बढाने का प्रस्ताव पास कराया. ने पिछले दिनों एक सार्वजनिक सभा में अपने मन की पीड़ा व्यक्त की थी. उनका कहना था कि विवाह समारोहों में इन दिनों जितना खर्चा होता है उसे देखकर उन्हें 'लज्जा' आती है.  आज यही सवाल उनसे ही पूछा जा सकता है कि गरीब प्रदेश जो आकंठ उधारी में डूबा है और जो उधार लेकर सरकारी अमले की तनख्वाओं, भत्तों तथा पेंशन की व्यवस्था करता है क्या उसके लिए क्या ऐसा प्रस्ताव लेकर आना लज्जाजनक नहीं लगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गहलोत  मन से गांधी को अपना आदर्श मानते हैं. आज जब कांग्रेस में महात्मा गांधी के नामलेवा चंद लोग ही बचे हों तब गहलोत जैसे प्रमुख नेता का गांधी के आदर्शों की बात करना आशा की किरण   नज़र आता है. इसीलिए इस प्रदेश के लोग उन्हें राजस्थान का गाँधी कह कर गर्व करते हैं. गांधी के आदर्शों की बात करना और उन पर व्यवहार करना दो अलग चीजें हैं. किसी के व्यवहार से ही इतिहास उसे तोलता है न कि उसने क्या कहा इससे. गहलोत गाँधी जी की वह उक्ति बार बार दोहराते हैं जिसमें बापू ने कहा था कि वे एक तिलस्म देते हैं. जब कभी तुम अनिर्णय की स्थिति में हो तो इस देश के गरीब की शक्ल अपने ध्यान में लाना और सोचना कि उसके लिए क्या ठीक रहेगा. विधानसभा में यह प्रस्ताव लाते हुए उन्होंने किन्हीं मौन क्षणों में अपने आप से पूछा कि क्या मंत्रियों - विधायको के वेतन भत्ते बढ़ा देने से राजस्थान के गरीब की हालत सुधर सकेगी?  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसी स्थिति में गाँधी क्या करते इसका उदाहरण हमारे सामने मौजूद है. जयपुर शहर में तीस के दशक में जब पहला खादी भण्डार खुला तब उसके प्रबंधक थे कर्पुर चंद पाटनी. गर्मियों में खादी भण्डार में एक टेबल पंखा खरीद कर लगा लिया गया. जब भण्डार का लेखा ब्यौरा केंद्रीय संगठन को भेजा गया जिसके अध्यक्ष खुद गाँधी जी थे तब बापू के हाथ की लिखी चिट्ठी आयी जो पाटनी परिवार के पास आज भी सुरक्षित होगी. उस पत्र में गांधी जी ने कहा कि खादी के काम में लगे हम लोग गरीब की मदद के लिए समर्पित हैं. क्या उन सभी गरीब लोगों के घरों में बिजली का पंखा आ गया है जिनके लिए हम काम कर रहे हैं? ऐसा जब हो जाए तब हमें यह सुविधा लेने के बारे में सोचना चाहिए उससे पहले नहीं. पता नहीं गहलोत गांधीजी के इस आदर्श को कितनी अहमियत देते हैं.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;एक तकनीकी सवाल और है. कानून और न्यायविदों के पास इसका जवाब नहीं होगा क्योंकि वे किताबों में लिखे पर ही चलते हैं. वैधानिक व्यवस्थाओं की किताबों के अनुसार विधायक गण विधि निर्माता हैं. वे कानून बनाते हैं. अतः वे अपने वेतन भत्ते बढाने का कानून भी बना सकते हैं और बनाते हैं. कानून बनाने की शक्ति उन्हें "हम भारत के लोग", जिनमें हमारा संविधान सार्वभौम सत्ता निहित्त करता है, अपना प्रतिनिधि बनाकर देते हैं. हम भारत के लोग" मतदाता के रूप में अपने प्रतिनिधियों का भविष्य निर्धारित करते हैं. फिर किस तरह हमारे ये प्रतिनिधि अपने वेतन - भत्तों के बारे में अपना भविष्य खुद निर्धारित कर लेते हैं यह सवाल है जो विधि से अधिक नैतिकता से जुडा हुआ है. क्या यह उचित न होता कि मंत्रियों विधायकों के वेतन-भत्तों के बारे में फैसला जनता करती. विधायिका में इसकी व्यवस्था है कि किसी विधेयक को जनमत जानने के लिए परिचालित किया जा सकता है. कई विधेयकों पर ऐसा होता भी है. फिर विधायको के वेतन भत्तों का विधेयक जनमत जानने के लिए कभी क्यों नहीं भेजा जाता. &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;इस विधेयक के जरिये भूतपूर्व विधायको की पेंशन में बढ़ोतरी का प्रबंध किया गया है. जो भूतपूर्व विधायक हैं उनमें से अधिकतर वे हैं जिन्हें मतदाता अस्वीकार कर चुका है. मतदाता द्वारा अस्वीकृत नुमाइंदे को किस प्रकार राजकोष से पैसा दिया जा सकता है यह विधि और नैतिकता दोनों का सवाल है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(जनसत्ता के अप्रेल 5, 2010 के अंक में संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित)&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5185840046950412717-5902273327119472309?l=itslokayat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itslokayat.blogspot.com/feeds/5902273327119472309/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5185840046950412717&amp;postID=5902273327119472309' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/5902273327119472309'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/5902273327119472309'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itslokayat.blogspot.com/2010/04/blog-post_04.html' title='हमारे भाग्य विधाता'/><author><name>Rajendra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S-Gx1DliFGI/AAAAAAAAArU/4OCr_2fmGn8/S220/photo.JPG'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5185840046950412717.post-7463948050986755510</id><published>2010-04-02T11:26:00.000-07:00</published><updated>2010-04-02T11:29:34.794-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='newspapers'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='media'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='advertisement'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='prices'/><title type='text'>ख़बरों का कारोबार करने वालों पर पाठक कब तक भरोसा करेंगे ?</title><content type='html'>&lt;strong&gt;राजेंद्र बोड़ा&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे कौन से कामकाज हैं जिन पर लोग सबसे कम भरोसा करते हैं ? इस प्रकार की जानकारी पाने के लिए पश्चिमी देशों में लगातार सर्वे होते रहते हैं. पत्रकारिता की साख लोगों में कितनी है यह जानने के लिए यदि हम इन सर्वे के परिणामों पर नज़र डालें तो पाते हैं कि राजनेता और पत्रकार अपनी साख के मामले में लोगों की राय में सबसे निचली पायदानों पर आते हैं. इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि पत्रकारों के काम पर लोगों का सबसे कम भरोसा है. परन्तु यह सोच पश्चिम का है. यह सच है कि हमारे देश में भी राजनेताओं की साख बहुत बुरी तरह गिरी लगती है, मगर पश्चिम के लोगों की पत्रकारों के प्रति सोच भारत के लोगों की सोच से मेल नहीं खाती. हमारे देश में आज भी लोग अख़बारों के लिखे पर भरोसा करते हैं. जब भी किसी को अपनी बात पर दूसरे को भरोसा दिलाना होता है तो वह यही जुमला आम तौर अपनाता है "अखबार में छपा है." अखबार में छपी बात को अटल सत्य की तरह हमारे लोग स्वीकार करते हैं. पाठकों का यही भरोसा है जिसे बनाए रखना अखबारों में काम करने वाले पत्रकारों के लिए आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती है. आज जब राजनेताओं पर से लोगों का भरोसा उठता जा रहा है तब लोग स्वाभाविक रूप से अखबारों और पत्रकारों की ही तरफ़ देखते हैं कि वहां उनके सरोकारों की बात होगी. लोगों के सरोकारों के लिए पैरवी करने करने वाली संस्था के रूप में ही पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मानी गयी है. लोकतंत्र के सरोकार पत्रकारिता में खुल कर नज़र आए इसके लिए जरूरी है पत्रकारों में अपने समय के इतिहास, राजनीति, और अर्थ जगत की गहरी समझ हो और उनमें अपने पेशे की साख बनाए रखने की ईमानदारी हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई भी व्यक्ति कागज और स्याही के लिए अखबार नही खरीदता. अखबार खरीदा जाता है उसमें क्या छप रहा है उसके लिए.  तो अखबार का असली कच्चा माल होती है सूचना - इन्फोर्मेशन- जो समाचारों के रूप में हो सकती है, चित्रों के रूप में हो सकती है या विचारों के रूप में हो सकती है. ये सारी चीजें पाठक की समझ बढ़ाने में मददगार होती है.  इसी कारण अपने सारे उद्यमी और कारोबारी स्वरुप और बाजार का होते हुए भी अखबार बाजार से ऊपर होता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी यह भी पूछा जाने लगा कि क्या अख़बार लोगों की मूलभूत जरूरत है ?  क्या रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मूल जरूरत वह होता है ? यह भी कहा जाता रहा है कि आम आदमी की मूलभूत जरूरतों के पूरी होने के बाद अखबार का नंबर आता है. मगर पत्रकारिता के समर्थकों का यह जवाब होता रहा है कि क्योंकि लोकतंत्र में आम नागरिक की मूलभूत आवश्यकताएं पूरी हों उसके लिए जरूरी है कि विधायिका में अच्छे और काबिल लोग चुन कर जाएँ. अखबार नागरिकों को सही जानकारी देकर तथा लोकतंत्र के सभी अंगों की ख़बर रख कर उन्हें सही प्रतिनिधि चुनने में मदद करते हैं. सही निर्वाचन से ही सुशासन आता है जो लोगों की मूलभूत जरूरतों को पूरी करने में ईमानदारी से काम करता है. इसलिए अखबार लोकतंत्र में मूलभूत आवश्यकताओं से भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं क्योंकि वे इन जरूरतों को पूरी कराने में भागीदार बनते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज़ादी के चार-पांच दशक तक, कारोबारी होते हुए भी, अखबारों ने सीमित साधनों में भी अपनी यह भूमिका बखूबी निभाई. आज खुले बाज़ार के दौर में अखबारों के साधन खूब बढ़ गए हैं और उनके पाठकों की संख्या में भी बड़ा इजाफा हुआ है. मगर अब ऐसा लगने लगा हैं कि अख़बारों के सामाजिक सरोकार कहीं खोते जा रहे हैं.         &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत में अखबार अपने जन्म से ही कारोबारी रहा है.  भारत में छपने वाले पहले अखबार का नाम ही Calcutta Journal Advertiser था जिसे एक अंग्रेज जेम्स ऑगस्ट हिक्की ने निकाला था. इस पहले ही अखबार का उद्येश्य था विज्ञापन से कमाना. लेकिन इसी अखबार ने ईस्ट इंडिया कम्पनी के भ्रष्टाचारों को उजागर करने की मुहिम छेडी और अपने सामाजिक सरोकारों का परिचय दिया.  इसके बाद भी हम देखते हैं कि सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचारों, कमजोरियों, खामियों और जन-हित से जुड़े मुद्दों पर भारतीय अख़बारों ने  अपना सरोकार लगातार बनाये रखा. अपनी इसी भूमिका के कारण अख़बार समाज की आँख और कान बन गए. आम जन अखबार की निगाह से ही दुनिया को देखते हैं उसे समझने की कोशिश करते हैं और अपने विचारों को पुष्ट करते हैं. अखबार विचार नहीं बनाते. दुनिया भर में इस बात को जांचने के लिए बार-बार हुए सर्वे के नतीजों में यही बात सामने आयी है कि अखबार पाठकों के विचार नहीं बदल सकते , खासकर राजनैतिक विचार. हाँ यह जरूर होता है कि अपने विचारों के नज़दीक वाला अखबार विशिष्ट समूह की पसंद बन जाता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अखबार को अधिक से अधिक पाठक चाहिए होते हैं इसलिए उसका किसी एक विचारधारा से जुड़ना उसके हित में नहीं होता. ऐसा जुडाव उसकी प्रसार संख्या सीमित करेगा. इसलिए सभी अखबारों का यही प्रयास होता है कि वे अपना चेहरा निष्पक्ष बनाये रखें जिससे वे सभी के लिए ग्राह्य हो सकें.       &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अखबार का निष्पक्ष होना पाठकों के बाज़ार में अपनी पहुँच को विस्तार देने के लिए जरूरी होता है. जिस प्रकार अखबारी दुनिया का विकास हुआ उसमे निष्पक्षता अख़बार की पहली शर्त मान ली गयी.  इसी विकास के दौर में अख़बार आम-जन का प्रतिनिधि बन गया जो लोकतंत्र के तीन प्रमुख पायों पर निगाह ही नहीं रखने लगा बल्कि जन भावनाओं का प्रकटीकरण भी करने लगा.  इससे अखबार का सामाजिक सरोकारों का मूल्य और बढ़ गया.  अख़बार को इसीलिए लोकतंत्र का चौथा खंबा कहा जाने लगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सरोकारों की बात करते हुए बाज़ार की बात करना समीचीन होगा. आज के बाज़ार के झंडाबरदार मानते हैं कि बाज़ार तो बाज़ार है. किसी कार, फ्रिज या किसी टोस्टर की बिक्री को बाज़ार की जो शक्तियां या सिद्धांत प्रभावित करते हैं वे हीं अख़बारों की बिक्री को भी संचालित करते हैं.     &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अखबार को कारोबार मानने से समस्या पैदा नहीं हुई बल्कि खबर को कारोबार की वास्तु बना देने से आज की स्थिति पैदा हुई है. पहले भी अखबार कारोबार था मगर उससे मुनाफा कमाना उन्हें निकालने वालों का पहला उद्धेश्य नहीं हुआ करता था. अखबार उनके लिए प्रतिष्ठा की चीज थी. आज की नयी धनाड्य पीढी जिनके हाथों में अखबारों की नकेलें हैं वे बाजारवाद की उपज हैं जिनके लिए पैसा ही प्रतिष्ठा है, पैसा ही ताकत है. इसे पाने के लिए वे ख़बर का भी सौदा करने को तत्पर रहते हैं.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन लोगों के लिए न्यूज़ या समाचार भी एक उत्पाद है . इस उत्पाद को तैयार करने और उसके वितरण में उनके हिसाब से बाज़ार के वही सारे आर्थिक सिद्धांत काम करते हैं जो अन्य औधोगिक माल के उत्पादन पर लागू होते हैं. अमरीका के फेडरल कोम्युनिकेशन्स कमीशन के चेयरमैन थे मार्क फ्राद्लर. उनका कहना था  "बाज़ार में लोगों की जैसी पसंद होती हैं उसी से मीडिया के कंटेंट निकलते हैं”. इसका अर्थ यह हुआ कि जिस प्रकार बाज़ार में ग्राहक की पसंद के हिसाब से उत्पाद आते हैं वैसे ही मीडिया में कंटेंट भी आएगा. वे यह भी कहते हैं कि “जनता की रुचियाँ ही जनहित को परिभाषित करेंगी”. मगर हमें यहाँ यह नहीं भूल जाना चाहिए कि खुले बाज़ार में लुभावनें प्रचारों के जरिये जनता की रुचियाँ बनाई और बिगाडी जाने का खेल बड़े पैमाने पर चलता है.     &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसी ही बाज़ार की शक्तियों के चलते आज अख़बारों में क्या हो रहा है ? अख़बारों के समाचार कक्षों में एक अच्छी कॉपी (ख़बर) किसे मानते हैं? वह कॉपी जो  लालच, बेवकूफी, और  षडयंत्र की कहानी कहती हो. ऐसा माना जाता है ऐसी चटपटी ख़बरों से अख़बार को अधिक पाठक मिलेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी हाल ही में जेम्स टी. हेमिल्टन का अध्ययन पुस्तक के रूप में आया है . यह अपने प्रकार का दुनिया में पहला अध्ययन है. इसका शीर्षक है 'हाउ द मार्केट ट्रांसफार्म्स इन्फोर्मेशन इन्टू न्यूज़'. हेमिल्टन कहता है "खबरें बाज़ार की ताकतें बनती हैं और ख़बरों (जिसे बाज़ार की भाषा में इन्फोर्मेशन गुड्स कहते हैं) के स्वरुप का निर्धारण अर्थतंत्र करता है.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मौजूदा समय की खुले बाज़ार की सबसे बड़ी हिमायती ब्रिटेन की पूर्व प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर आयरन लेडी के रूप में जानी जाती है. उनका एक कथन अत्यन्त महत्वपूर्ण है. उनका यह कथन बाज़ार की आवाज है . उनहोंने कहा "देयर इज नो सच थिंग एज सोसाइटी" याने समाज जैसी कोई चीज नहीं होती. उनका मतलब था कि समाज को एक एब्सट्रेक्ट या सांस्कृतिक मेटाफर के रूप में ही देखा जा सकता है. मुक्त बाज़ार की अर्थव्यवस्था के समर्थकों ने समाज और सामाजिक सरोकार को हमेशा हिकारत की निगाह से देखा है. ऐसे समर्थक हमारे यहाँ अब अखबारों के नियंता हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज के अख़बारों के नियंताओं के लिए कोई चीज गैर वाजिब नहीं है. वे अब संपादक नहीं एक प्रमुख कार्यकारी अधिकारी चाहते हैं और ऐसा बनने के लिए तैयार बैठे पत्रकारों की फेहरिस्त लम्बी है. आज तेजी से बढ़ते अखबार अपने संपादकों को सिखा रहे हैं कि वे अपने पाठक को पहचाने. अखबारों के नए नियंता की निगाहों में उन पाठकों का कोई मोल नहीं जिनकी जेब में बड़े बाजारों में - माल्स - में खर्च करने को अतिरिक्त पैसा है. संपादकों को यह सिखाया जा रहा है कि आप उन पाठकों को लक्ष्य करें जो रंगीन टीवी, फ्रिज, कारें वगैरा खरीद रहें हों. यदि यह खरीददार और आपके पाठक एक होंगे तो ही अखबार को बड़े विज्ञापन मिलेंगे. हर साल जब पाठक सर्वे की रिपोर्ट आती है तो अख़बारों में सबसे पहले यही देखा जाता है कि किस अखबार में "हैसियत" वाले पाठकों की संख्या कितनी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस समय चुनाव का मौसम चल रहा है. यह वो समय है जब कईं अखबार ख़बरों के कारोबार में उतर आते हैं. राजनैतिक पार्टियों और उम्मीदवारों से उनके विज्ञापनों का ही सीधा सौदा नहीं होता बल्कि न्यूज़ कालम में छपने वाली विज्ञप्तियों को स्थान देने के लिए भी मोल तय किया जाने लगा है. ऐसे सौदों में पार्टियों का हाथ मरोड़ने के लिए ख़बरों को ही हथियार बनाया जाता है. क्योंकि अभी तक आम लोगों का भरोसा अकबार में छपी ख़बरों पर बना हुआ है इसलिए वे उन पर भरोसा कर लेते हैं और  उन्हें पता ही नहीं लगता कि वे ठगे जा रहे हैं.&lt;br /&gt;पत्रकारिता जगत में एक पुरानी कहावत है जो कभी हर पत्रकार की जुबां पर पर रहती थी "फेक्ट्स आर सेक्रेड, इंटरप्रेटेशन इज माइन". तब अखबारी दुनिया में कहा जाता था "न्यूज़ देट इज फिट टू प्रिंट". मगर आज के अखबार शायद कहते हैं "न्यूज़ देट इज फिट तो सेल".&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह "फिट टू सेल" सारे झगडे की जड़ है. अखबार पाठकों के लिए नहीं बाज़ार के लिए हो चले हैं. बार बार कहा जाता है कि बाज़ार के भी " मूल्य" होते हैं. मगर बाजारों के उतार चढाव और घोटालों ने बार बार यही बताया है कि बाज़ार मानवीय चेहरा नहीं होता. दिलचस्प बात यह भी है कि मीडिया ने बड़ी बड़ी चीजें उजागर कीं है मगर बाज़ार की तरफ अपनी खोजी निगाह कभी नहीं की. बाज़ार से उपकृत होते हुए ऐसा हो भी कैसे सकता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन दिनों अख़बारों के कंटेंट संपादक नहीं ब्रांड मेनेजर तय करते हैं. वे पत्रकारिता और मनोरंजन के बीच की सीमा रेखा को मिटा दे रहे हैं. ब्रांड मेनेजर अखबारों का कलेवर तय करते हुए बताते हैं कि सुबह सुबह पाठक अखबार में क्या देखना चाहते हैं. वे संपादक से यह भी अपेक्षा करते हैं कि रोज अखबार में कम से कम एक ऐसी चटपटी खबर अवश्य हो जिसकी शहर में दिन भर चर्चा होती रहे. ख़बरों को चटपटा बनाने के लिए ऐसे मसाले डाले जाते हैं जिनका तथ्यों से कोई लेना देना न हो. ख़बरों में ऐसी मिलावट की आदतें पत्रकारिता को जन सरोकारों से दूर ले जाती है. अख़बारों के नए नियंताओं ने यह भी साध लिया है कि किस प्रकार पाठकों को ऐसे चटपटे मुद्दों पर भटका दिया जाय कि वे असली मुद्दों को बिसरा दें. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाठकों के बारे में किसी की टिपण्णी है "रीडर इज नॉट अ किंग. ही इज अ नाइस हिप्पोक्रेट (पाठक कोई शहंशाह नहीं है. वह एक अच्छा पाखंडी है). मुक्त बाज़ार जो दिशा देता है अखबार उसी पर चलते हुए जो सामग्री परोसता है  वह कईं बार खूब रस लेकर पढ़ी काटी है. पाठन एक तरफ तो ऐसी सामग्री मजे लेकर पढता है और वही बाद में यह आलोचना भी करता है कि अखबार में गंभीरता नहीं रही या वह चलताऊ हो गया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतना सब होते हुए भी सब कुछ ख़त्म नहीं हो गया है. अखबार के सामाजिक सरोकारों की पैरवी करने वालों और उन सरोकारों को अभिव्यक्ति देने वाले संपादकों की कमी नहीं है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाठकों की भागीदारी या दबाव अखबारों को सही रास्ते पर चलने पर मजबूर कर सकता है. मगर उसके लिए पाठक को अपनी भूमिका के बारे में सोचना होगा कि क्या वह एक अच्छे अखबार के लिए उसके वाजिब दाम देकर खरीदने को तैयार है ? यदि वह मुफ्त में या नाम मात्र के दाम पर अखबार चाहता है तो उसे वही मिलेगा जो बाज़ार चाहेगा क्योंकि लागत और बिक्री मूल्य के बीच का अंतर वही भर रहा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                                  &lt;br /&gt;&lt;em&gt;(बीकानेर में आयोजित अजित फाऊंडेशन की  सालाना लेक्चर श्रंखला में दिया गया अभिभाषण)&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5185840046950412717-7463948050986755510?l=itslokayat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itslokayat.blogspot.com/feeds/7463948050986755510/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5185840046950412717&amp;postID=7463948050986755510' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/7463948050986755510'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/7463948050986755510'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itslokayat.blogspot.com/2010/04/blog-post_02.html' title='ख़बरों का कारोबार करने वालों पर पाठक कब तक भरोसा करेंगे ?'/><author><name>Rajendra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S-Gx1DliFGI/AAAAAAAAArU/4OCr_2fmGn8/S220/photo.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5185840046950412717.post-3194355828432282602</id><published>2010-03-20T00:59:00.000-07:00</published><updated>2010-03-20T01:10:41.055-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='award'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Nehru'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='neecha nagar'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='film'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='kans'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='chetan anand'/><title type='text'>दास्तान ‘नीचा नगर’ की</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S6SCRkpxXNI/AAAAAAAAApE/mPd7jTU_hXU/s1600-h/Neecha_Nagar,_1946.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 150px; height: 187px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S6SCRkpxXNI/AAAAAAAAApE/mPd7jTU_hXU/s320/Neecha_Nagar,_1946.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5450624687433407698" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राजेंद्र बोड़ा&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'नीचा नगर' फिल्म हमेशा ही गुमनामी के अँधेरे में रही. वास्तव में वह दर्शकों तक कभी पहुच ही नहीं सकी. इतने बड़े देश में जहाँ सबसे अधिक संख्या में फ़िल्में बनती है और हर तरह की ऊल-जलूल फ़िल्में सिनेमाघरों के पर्दों पर उतरती हैं  वहां इस फिल्म को रिलीज करने वाला कोई नहीं मिला.  ऐसा उस फिल्म के साथ हुआ है जिसको अंतर्राष्ट्रीय 'कान्स फिल्म समारोह' का लब्धप्रतिष्ठ 'ग्रां प्री' का खिताब अर्जित करने का गौरव प्राप्त है. फिल्म 1946 में बन कर तैयार हुई और उसी साल शुरू हुए अंतर्राष्ट्रीय 'कान्स फिल्म समारोह' में उसने अपना परचम फहराया. जब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु को पता चला कि एक भारतीय फिल्म ने अंतर्राष्ट्रीय खिताब जीता है तो उन्होंने यह फिल्म देखने की ख्वाइश जाहिर की . दिल्ली के तब 'वाइसरीगल लॉज', जो अब राष्ट्रपति भवन कहलाता है, में 'नीचा नगर' का एक शो रखा गया. शो में नेहरु जी के अलावा माउन्टबेटन  दंपत्ति भी मौजूद थे. फिल्म के शो के बाद नेहरु ने फिल्म की खूब तारीफ़ की और माउन्टबेटन ने सलाह दी कि फिल्म के अंग्रेजी में सब-टाइटल तैयार किये जाय और उनके साथ यह फिल्म देश विदेश में प्रदर्शित के जाय. उन्होंने  चेतन आनंद से कहा कि वे उस जमाने के बहुत बड़े फिल्मकार अलेक्जेंडर कोरडा के नाम एक चिट्ठी लिख देगे जो फिल्म के अंग्रेजी सब-टाइटल बनवाने में मदद करेंगे. मगर देश के विभाजन के हंगामें में इस फिल्म की किसी को याद नहीं रही.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;मगर आज़ादी के बाद जेहरू जी को यह फिल्म जरूर याद रही. सन 1950 में जब दिल्ली में पहली एशियाई कांफ्रेंस हुई तब उसमें भाग लेने वाले प्रतिनिधियों को उन्होंने राष्ट्रपति भवन में ‘नीचा नगर’ विशेष तौर पर दिखाई. गणमान्य दर्शकों में मिश्र के राष्ट्रपति अब्दुल नासर, युगोस्लाविया के मार्शल टीटो, बर्मा के यू थांट जो बाद में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बने और श्रीलंका की राष्ट्रपति एस भंडारनायके के अलावा कांग्रेस के सभी बड़े नेता, स्वतंत्रता सेनानी, फिल्म और व्यवसाय जगत की प्रमुख हस्तियाँ मौजूद थीं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बावजूद नेहरु और सरकारी दिलचस्पी के और कान्स के पुरस्कार के 'नीचा नगर' के निर्माता राशिद अनवर वितरकों को फिल्म बेचने और उसे सिनेमाघरों में प्रदर्शित कराने में सफल नहीं हो सके. फिल्म के निर्माण के लिए राशिद अनवर ने एक सेठ से कुछ पैसे उधार लिए थे. मूल रकम पर ब्याज की राशि बढती जा रही थी. रकम उधार देने वाला सेठ जो कपास का व्यवसायी था धमकी दे रहा था कि उसके पैसे नहीं चुकाए गए तो वह फिल्म की नीलामी करा देगा. उसने न केवल ऐसी धमकी दी बल्कि वह फिल्म का निगेटिव भी लेबोरेट्री से उठा ले गया और उनके डिब्बे अपने रूई की गांठों के गोदाम में ला पटके.  यह फाइनेंसर अपने  पैसों के अलावा अन्य  कोई बात सुनने को तैयार नहीं था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हताशा की हालत में चेतन आनंद दौड़ कर दिल्ली गए और जनरल थिमैया से मिले जिन्हें वे पहले से जानते थे. थिमैया ने 'नीचा नगर' देखी थी. चेतन को आशा थी कि वे कुछ ऐसे पैसे वालों को जानते होंगे जो उनकी मदद कर सके. जनरल थिमैया ने चेतन आनंद की सरदार वल्लभ भाई पटेल से मुलाकात तय करा दी. पटेल राज्यों के विलीनीकरण के काम में बहुत अधिक व्यस्त थे मगर क्योंकि थिमैया की सिफारिश थी उन्होंने कहा कि दिन में तो समय नहीं मिलेगा. मैं  तडके सैर करने जाता हूँ. चेतन तभी आ जाएँ और बात कर लें. पटेल ने सैर पर चलते-चलते  चेतन से सारा किस्सा बड़े धैर्य से सुना और कहा कि फिल्म को रहन से छुड़ाना सबसे महत्वपूर्ण बात है. जब चेतन ने उनसे कहा कि यदि वे बिडला जी या अन्य किसी बड़े उद्योगपति से कह दें तो काम बन सकता है तो पटेल ने कहा कि वे जिस पद पर हैं उसे देखते हुए  उनके लिए ऐसा करना  उचित नहीं होगा.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;'नीचा नगर' मुश्किलों में घिरी है इसकी खबर नेहरु जी तक भी पहुची और उनकी दिल्ली के हयातुल्ला अंसारी साहब से लम्बी खतो-किताबत भी हुई. वे भी इस बात से उदास हुए कि अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाली पहली भारतीय फिल्म शायद थियेटर में कभी रिलीज न हो सकेगी और आम जनता उसे कभी नहीं देख सकेगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाद में जब बम्बई में फाइनेंसर पर सब तरफ से दबाव पड़ा तो वह फिल्म की नीलामी स्थगित करने को राजी हो गया. उसने अपने एक अन्य परिचित फिल्म निर्माता से राय ली. उसने उसे सलाह दी कि क्योंकि वितरक फिल्म उठाने को तैयार नहीं हैं इसलिए बॉक्स आफिस अपील के लिए फिल्म में एक गाना और एक नृत्य का आइटम  डाल ले और वह खुद ही फिल्म को सिनेमाघरों में रिलीज कर दे और अपना पैसा वसूल ले. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चेतन आनंद चाहते थे कि फिल्म वैसी ही रिलीज हो कैसी कान्स में प्रस्तुत की गयी थी लेकिन फिल्म को सिनेमाघरों के परदे पर लाने के लिए उन्होंने ऐसा समझौता करना स्वीकार कर लिया. इससे फाइनेंसर जो फिल्म के निगेटिव की नीलामी पर आमादा था थोडा नरम पड़ा और रिलीज प्रिंट बनाने के लिए निगेटिव के डिब्बे लेबोरेट्री को भेज दिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और इस तरह एक संकट टला.  लेकिन बाद में लेबोरेट्री में आग लग गयी और 'नीचा नगर' फिल्म की निगेटिव उसमें जल कर पूरी तरह ख़ाक हो गयी. लेकिन उससे पहले फिल्म के कुछ प्रिंट बना लिए गए और प्रदर्शन के लिए वहां से बाहर आ गए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; सन 1950 में राष्ट्रपति भवन में फिल्म के शो के बाद फिल्म के निर्माता ने 'नीचा नगर' को  अपने स्तर पर रिलीज करने की कोशिश की तो उसे बम्बई में कोई ढंग का सिनेमा हाल ही नहीं मिला और उसे बम्बई के एक उपनगर के मामूली सिनेमाघर में फिल्म प्रदर्शित करनी पड़ी. फिल्म की तकदीर देखिये स्थानीय दर्शकों ने इस प्रयोगवादी सिनेमा के प्रति घोर अरुचि दिखाई. उनके लिए फिल्म में गाने नहीं थे, डांस नहीं थे, कोई लटके-झटके  नहीं थे. दर्शकों ने पहले ही शो में सिनेमाघर की सीटें फाड़ डाली और अपने टिकट के पैसे वापस मांगने लगे. रशीद अनवर की हिम्मत फिर और किसी जगह यह फिल्म लगाने की नहीं हुई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाग्य का खेल देखिये. फिल्म का एक प्रिंट कलकत्ता पंहुचा होगा. वहां फिल्म देख कर एक बंगाली नौजवान ने चेतन आनंद को चिट्ठी लिखी कि वह फिल्म से बड़ा प्रभावित हुआ है और उसे इससे प्रेरणा मिली है कि वह भी ऐसी फिल्म बनाए. जब यह चिट्ठी आनंद परिवार में पहुंची तो उसे भेजने वाले को कोई नहीं जानता था. चिट्ठी लिखने वाला नौजवान था सत्यजित राय.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह भी अजब संयोग रहा की 'नीचा नगर' अगर आज हमारे लिए उपलब्ध है उसके लिए भी सत्यजित रॉय के केमरामैन का योगदान नहीं भुलाया जा सकता. कई बरसों बाद एक दिन ये केमरामैन कलकत्ता के चोर बाज़ार में घूम रहे थे. उन्होंने देखा कि एक कबाड़ी के यहाँ किसी फिल्म के डिब्बे पड़े हैं. जिज्ञासावस वे एक रोल उठा कर देखने लगे. उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ. वे मुड़े और अपने साथ चल रहे मित्र से कहा अरे देखो तो ये तो 'नीचा नगर' है. उन्होंने फिल्म के सारे डिब्बे महज दस रुपयों में कबाड़ी से खरीद लिए. वो प्रिंट आज पुणे की फिल्म इंस्टिट्यूट के अभिलेखागार में राष्ट्रीय धरोहर के रूप में संरक्षित है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'नीचा नगर' को 1946 में कान्स का ग्रां प्री खिताब ही नहीं मिला बल्कि फिल्म क्रिटिक्स जूरी ने भी अपनी मेरिट सूची में उसे सर्वोच्च स्थान पर रखा. सन 1995 में कान्स के स्वर्ण जयंती समारोह में 'नीचा नगर' विशेष तौर पर प्रदर्शित की गयी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'नीचा नगर' ने आज 64 साल बाद भी अपनी अहमियत नहीं खोई है. फिल्म की कहानी अमीर और गरीब के बीच की लड़ाई है. फिल्म का सबसे पावरफुल किरदार निभाया रफ़ी पीर ने जो जर्मन राइनहार्ट स्कूल आफ थियेटर से प्रशिक्षण पाए हुए थे. जिस प्रकार से उन्होंने किरदार को प्रस्तुत किया उसकी कोई सानी नहीं. फिल्म के टाइटल में यह लिखा हुआ आता है क्रियेशन बाय चेतन आनंद. वास्तव में फिल्म चेतन की ही रचना है. चेतन का फिल्म क्षेत्र में प्रशिक्षण विश्व सिनेमा की तब की बेहतरीन फिल्मों को देखने और उन पर मनन करने के अलावां कुछ नहीं था. लेकिन उन्होंने कैमरे से जो स्वन्सार रचा वह अद्बुत था. रफ़ी पीर ने एक अमीर आदमी का किरदार निभाया जो नगर पालिका का अध्यक्ष चुन लिया जाता है और कम दामों पर जमीने खरीद लेता है जिस पर ऊंची इमारतें बनवाना चाहता है. उसकी जमीन दलदल वाली है क्यों कि उस पर से होकर एक नाला गुजरता है. साम, दाम, दंड, भेद से वह नाले का बहाव गरीबों की बस्ती नीचा नगर की तरफ मुडवा देता है. इससे नीचा नगर में बीमारियाँ फैलने लगती है. उसके कारकून बस्ती का पानी का कनेक्शन भी काट देते है. फिर गरीबों का हितैषी का रूप धर कर वह बीमार मरीजों के लिए नीचा नगर में अस्पताल खोल देता है. यहाँ नीचा नगर के लोग अहिंसक आन्दोलन पर उतर आते है. वे घोषणा करते हैं कि वे मरना मंजूर करेंगे मगर अमीर के अस्पताल में इलाज नहीं करवाएंगे. इन दृश्यों पर गांधी के असहयोग आन्दोलन की पूरी छाप है.  चेतन का कैमरावर्क दृश्यों को शानदार तरीके से उभारता है. अमीर के किरदार का नाम दिया गया है सरकार साहब. सरकार साहब के किरदार में रफ़ी पीर का स्टाइलिश अभिनय तो फिल्म की विशेषता है ही उसे उभारने में कैमरे के शाट्स देखने लायक है. सरकार साहब और बस्ती के लोग जब आमने सामने होते हैं तब सरकार साहब के शाट्स लो एंगल से लिए गए है जिससे किरदार सभी पर हावी नज़र आता है. दूसरी तरफ बस्ती के लोगों के प्रतिनिधिमंडल के शाट्स हाई एंगल से लिए गए हैं जिनमें जिनमें वे दबे हुए दिखते है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्म का अंतिम दृश्य अत्यंत ही प्रभावशाली बन पड़ा है. नायिका गंदे नाले से फैली बीमारी की चपेट में आ जाती है मगर सरकार साहब के अस्पताल में अपना इलाज कराने से इनकार कर देती है और उसकी शहादत हो जाती है. उसकी चिता की लपटों को फ्रेम में लेता हुआ कैमरा लोगों द्वारा थाम ली गयी मशालों पर चला जाता है. बहुत ही खूबसूरत प्रतीकात्मक दृश्य है. लोगों के हाथों में मशालें हैं और उनके चेहरे दीप्तिमान है. मशालें ले कर लोगों का हूजूम सरकार साहब के घर की तरफ निकल पड़ता है. मशालों की लौ से झिलमिलाती रोशनी की लंबी पंक्ति के दृश्य विश्व के किसी भी बड़े निर्देशक के काम से कमतर नहीं है. सबसे दिल्चास्क बात यह है की चेतन आनंद ने ये दृश्य धुंधले हो गए फिल्म के खराब रा स्टाक पर शूट किये. उनके पास दूसरा रा स्टाक खरीदने के पैसे नहीं थे. फिल्म की राशनिंग का ज़माना था. मगर चेतन ने खराब रा स्टाक का उपयोग शाम के धुंधलके में मशालों का दृश्य फिल्माने के लिए किया और एक अद्भुत रचना कर डाली. आज के निर्देशक ऐसे प्रभाव उत्पन्न करने के लिए जान बूझ कर फिल्म को धुंधला करते है. &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;फिल्म इप्टा के कलाकारों का मिला जुला प्रयास था. बस्ती के लोगो ले लम्बे जूलूस में शामिल प्रत्येक कलाकार इप्टा के थियेटर जत्थे का सदस्य था. फिल्म की गैर परंपरागत  नायिका का किरदार निभाने के लिए चेतन ने एक नए चेहरे को चुना जिसने बड़ी खूबसूरती से यह भूमिका अदा की. यह अदाकारा थीं उमा कश्यप. वह लाहोर के गवर्नमेंट कालेज के प्रोफ़ेसर कश्यप की बेटी थी. कश्यप परिवार से चेतन की पुरानी पहचान थी. क्योंकि  चेतन कश्यप परिवार के पारिवारिक मित्र थे इसलिए उषा की मां ने इस फिल्म में काम करने के लिए अपनी बेटी को इजाजत दे दी.  फिल्म के लिए उषा का नामकरण किया गया कामिनी कौशल जो बाद में बहुत बड़ी अभितेत्री बनी. &lt;br /&gt;सरकार साहब की भूमिका निभाने वाले रफ़ी पीर बाद में पकिस्तान चले गए. उनके बच्चों ने बाद में पाकिस्तान में थियेटर में बड़ा नाम कमाया. वे पीरजादा कहलाते हैं और भारत आते रहते हैं.   भारत पाक सांस्कृतिक आदान प्रदान समारोह में पाकिस्तान में भारत के हाई कमिश्नर शिव शंकर मेनन ने पीरजादा परिवार को 'नीचा नगर' फिल्म की एक प्रति भेंट की. पीरजादा बच्चों ने तब पहली बार अपने पिता को फिल्म में अभिनय करते देखा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त अभिनेत्री जोहरा सैगल इस फिल्म में पहली बार परदे पर नज़र आयी. कामिनी कौशल से साथ फिल्म में नायक की भूमिका निभाने वाले मोहन सहगल की भी यह पहली फिल्म थी. उन्होंने फिल्म में चेतन के सहायक निर्देशक के रूप में भी काम किया. मोहन सहगल ने बाद में बहुत सी सामजिक फ़िल्में बनाई. सुपर हिट फिल्म 'सावन भादों' में उन्होंने अभिनेत्री रेखा को पहली बार मौका दिया. सरकार साहब की बेटी की भूमिका के लिए कोई अनुकूल कलाकार नहीं मिला तो वह भूमिका चेतन की पत्नी उमा आनंद ने बड़ी खूबी से निबाही. &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;चेतन को स्वयं को संगीत में बहुत रूचि थी. इसीलिए उनकी फिल्मों में संगीत को बहुत अहमियत मिली. 'नीचा नगर' के संगीत के लिए चेतन ने चुना पंडित रवि शंकर को. उस समय वे उस्ताद बाबा अल्लाउदीन खान के प्रमुख शिष्यों के रूप में उभर रहे थे. रवि शंकर ने पहली बार किसी फिल्म के लिए संगीत देते हुए जिस प्रकार दृश्यों को संगीत का सहारा दिया उसे संगीत के रसिक आज भी आनंदित होते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज भी 'नीचा नगर' का कोई प्रमोटर नहीं है. एक विडियो कंपनी ने बहुत ही बुरे तरीके से 'नीचा नगर' की वीसीडी जारी की जिसे दस दस रुपयों में भी कोई खरीददार नहीं मिला. अपनी धरोहर को ठीक से प्रस्तुत करना ही हमें नहीं आता. फिल्म डिजिटली री-मास्टर की जाय उसका साउंड ट्रेक ठीक किया जाय और उसकी बेहतरीन डीवीडी जारी करने की किसी को सुध नहीं है. विदेशों में ऐसा होता है. फिल्म के शानदार प्रिंट की डीवीडी बनती है. साथ में फिल्म से जुड़े लोगों की विशेष भेंट वार्ताएं होती है. समीक्षकों की भेंट वार्ताएं होती हैं कि क्यों यह फिल्म महान है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'नीचा नगर' भारतीय सिनेमा की ऐसी धरोहर है जिस पर आने वाली पीढियां गर्व कर सकेंगी. उन्हें यह जान कर आश्चर्य होगा की सत्यजित रॉय की 'पाथेर पांचाली' के निर्माण  से दस बरस पहले ऐसी फिल्म बन चुकी थी जिसने भारतीय सिनेमा को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दी. कान्स अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में 1946 में नीचा नगर को जब श्रेष्ठ फिल्मों की सूची में सबसे ऊपर स्थान  दिया गया तब  उसके साथ की फ़िल्में थीं : डेविड लीन की 'ब्रीफ एनकाउन्टर' और इंगमार बर्गमेन की 'फ्रेंज़ी'.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(पिंक सिटी प्रेस क्लब और फिल्म फैन्स सोसाइटी की और से जयपुर के प्रेस क्लब में 13 मार्च 2010 को 'नीचा नगर' के प्रदर्शन के अवसर पर दिया गया वक्तव्य.)  &lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5185840046950412717-3194355828432282602?l=itslokayat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itslokayat.blogspot.com/feeds/3194355828432282602/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5185840046950412717&amp;postID=3194355828432282602' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/3194355828432282602'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/3194355828432282602'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itslokayat.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='दास्तान ‘नीचा नगर’ की'/><author><name>Rajendra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S-Gx1DliFGI/AAAAAAAAArU/4OCr_2fmGn8/S220/photo.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S6SCRkpxXNI/AAAAAAAAApE/mPd7jTU_hXU/s72-c/Neecha_Nagar,_1946.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5185840046950412717.post-877984749618670756</id><published>2010-02-26T05:30:00.000-08:00</published><updated>2010-11-30T06:53:20.357-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='human sights'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Police State Authority Democracy Force'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='police'/><title type='text'>Human Rights and Media</title><content type='html'>&lt;span styl="font-weight:bold;"&gt;Rajendra Bora&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Although the concept of ‘Human Rights’ came into existence way back in 1948 with the United Nations’ Universal Declaration but the National Human Rights Commission came into existence in India forty-five years later, in 1993, when ‘The Protection of Human Rights Act’ was enacted by Parliament. The State Human Rights Commissions came into existence much later. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;One might wonder why the enactment of law by Parliament was delayed for 45 years? It is because no such necessity was felt. Many of the Articles of the Universal Declaration of Human Rights had already found place in the Fundamental Rights in the Indian Constitution. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;The Indian Constitution is one of the classical documents of its kind and has been drafted in such a systematic and simplified manner that is easy to understand, even for a layman. Than why Human Rights are being flouted so rampantly? Has the Constitution failed? No. They are the mortal being – We the People - have failed.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;What is the role of media in protect the Human Rights? Media is supposed to be surrogate of the people and it is duty of media to make constitutional agencies to play their roles effectively and to make the people aware about safeguarding Human Rights which only could ensure success of democracy.   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Civil societies always complain that when it comes to the reporting of the human rights-related incidents, the newspapers devote very little space to them, unless the incidents are very newsworthy and has wider importance in the judgment of editors. Newspapers seldom make a serious effort to follow up such stories, which they report with a greater zeal in the beginning. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;The printed media has played a significant role in the past in reporting the violation of human rights. However, of late the printed media has been receiving stiff competition from television with the advent of news channels which, many feel, trivializing the incidents for their TRP ratings. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;This competition between print and electronic media has compelled them to carve out a new kind of readership and viewership in other areas such as entertainment, cinema, fashion, cuisine, health care, real estate, environment, sports etc. While defending the latest trends, the media mogul are saying that they cater to the demands of readers and viewers. And this assertion by media owners is the real concern for those who want media to remain watchdog of human rights.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;The fear that in the entire modernization and revolution process of the Indian media, human rights might take a back seat is not unfounded. This fear is further compounded due to the constant changes in the global economic pattern, which began with the introduction of the WTO.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;While discussing role of media It may be questioned if media are a part of Civil Society or as something entirely outside it ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;There is, of course, no simple answer. As we all know media came in many shapes and sizes. The term Fourth Estate was, I suppose, devised because of the very fact that the media are so difficult to characterize.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Generally outside Civil Society are those media that have been established in pursuit of political power or profit and market share. But the boundaries are fuzzy. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Civil societies want media to be free from government interference and also from commercial pressure. It is expected that media go beyond political dogma and entertainment and inform the people objectively. The civil society wants the media to help create a knowledgeable, entrepreneurial and confident society which could protect human rights and which is able to address contemporary concerns of the masses.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;In early eighties, a revelation made by Sunday magazine published by Anand Bazar Patrika group from Kolkata with a front page story of the blinding of prisoners in Bhagalpur Jail had virtually rocked the entire nation. This was the first major case of human rights violations ever to have been reported in Indian media, and which brought to light the alarming state of affairs in the jails. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Thereafter in mid eighties, Sheela Barse’s investigative story on the condition of exploitation and abuse of female inmates of Arthur Road Jail in Mumbai, also in Sunday, resulted in an enquiry into the condition of prisons all over Maharashtra.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;That is why the media have a critical role to play. There is important job to be done by media in raising awareness about Human Rights and ensure their protection.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;There is a direct link between Human Rights, democracy and development. Therefore, there is an urgent need for independent journalism and free media which provide a bedrock for democratic exchange and respect for Human Rights.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;By exposing human rights, media can improve the climate of democratic debate and reduce corruption in public life.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Media sensitive to the importance of Human Rights provide reliable source of information through which citizens, human rights groups, private organizations, and public authorities can work together to promote development and eliminate arbitrary abuse of power.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;For protection of Human Rights we need independent minded journalists who will play a central role. That can be ensured by bringing professionalism among journalists, editors and publishers. Since quality of sources of information are vital to the defense of human rights for all a professional media sensitive to the contemporary concerns are need of the hour.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Journalists need to work in professional and social conditions where they are free to resolve ethical dilemmas and where they can make professional decisions on editorial content. This type of editorial independence, free from governmental interference and market forces, should exist both in publicly owned and privately owned media irrespective of ownership.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;This can be done by unifying the profession, by creating systems of media accountability, by imparting  training to working journalists, by creating media resources by promoting respect for international standards of press freedom, and by strengthening media professional organizations.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;In today’s scenario somewhere in the avalanche of information available in media we need to find a place for human rights stories.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;In the first decade of new millennium we are witnessing huge concentration of economic power known as corporations. We are witnessing professionalisation and institutionalization of propaganda especially as a means for safeguarding corporate interests against democracy.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Unfortunately most members of the public rely upon the corporate media. The prime motive of the media managers is always profit maximization. If owners have multiple business lines their other interests too affect media content.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Traditionally news stories answer five questions, the five Ws : who, what, where, when and why. But corporate economic models have their own definitions. What information becomes news depends on a different set of five Ws, those asked in the market :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1. Who cares about a particular piece of information?&lt;br /&gt;2. What are they willing to pay to find it, or what are others willing to pay to reach them?&lt;br /&gt;3. Where can media outlets or advertisers reach these people?&lt;br /&gt;4. When is it profitable to provide the information?&lt;br /&gt;5. Why is this profitable.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;A journalist will not explicitly consider each of these economic questions while doing a story. But the stories, reporters, firms and media that survive in the market place, however, will depend on the answers to these questions, which means media content can be modeled as if the five economic Ws are driving news decisions. This I am quoting from a recent  study in United States on how the market transforms information into news.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;The media has changed from being a stalwart defending public’s rights into a timid vacillating entity that all intents and purposes censors itself. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;It has reduced from what it once was. The news media has morphed into something unrecognizable from what it once was.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;This is not to say that the journalists within corporate media are suffering from amnesia.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;The media can play a pivotal role by way of building up public opinion, and also by impressing on the government the need to incorporate the subject of human rights, both in schools and also in police training academies, and also in the training institutes for municipal councils, corporations and other revenue departments. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;But the tendency of news media to follow guidelines set down by free market capitalists is a stark reality and there is blurring demarcation between journalism and entertainment from the pressure of brand managers.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Can journalists fight these odds and emerge victorious against market forces? That will decide if the media become watchdog of human rights.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;(Text of the address made at a workshop on Human Rights at International College of Girls)&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5185840046950412717-877984749618670756?l=itslokayat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://itslokayat.blogspot.com/feeds/877984749618670756/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5185840046950412717&amp;postID=877984749618670756' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/877984749618670756'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5185840046950412717/posts/default/877984749618670756'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://itslokayat.blogspot.com/2010/02/human-rights-and-media.html' title='Human Rights and Media'/><author><name>Rajendra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_Dg9bR7YOHYQ/S-Gx1DliFGI/AAAAAAAAArU/4OCr_2fmGn8/S220/photo.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5185840046950412717.post-6447815696259828711</id><published>2010-02-26T05:06:00.000-08:00</published><updated>2010-02-26T05:12:07.602-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Police State Authority Democracy Force'/><title type='text'>Misuse of Power by Police and Misuse of Police by Persons in Authority</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Rajendra Bora&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;I would like to begin by quoting management guru Arindam Chaudhury whose recent book has taken the Indian business world by storm. In his best selling book “Count Your Chikens Before They Hatch” Arindam tells an interesting observation about Japanese people in the chapter titled “Pegging Cultural Holes”. In Japan “when a man runs short of money in the market place and goes to borrow some from the policeman round the corner, he meets with a pleasant experience. The policeman might not even ask for his address, for, trust levels are too high and policeman knows that a Japanese would rarely cheat his country. When this is how a citizen is treated. In turn he also acts responsibly and reacts by picking up a wastepaper lying by the road and taking it home to throw in his dust bin”.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;It may sound a fairy tale to us Indians because the Police force is just not considered as a friend here despite all efforts made in the past to make it so. The overwhelming perception of the common people about the Police is that it is a “force of monsters”. The man in uniform does not come out with flying colours in the hour of
