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मन की बीन मतवारी बाजे: फिल्म संगीत में बसंत
राजेंद्र बोड़ा
भारतीय शास्त्रीय संगीत में हर एक
राग का अपना स्वरूप और अपना अंदाज़ होता है। रागों में लगने वाले स्वर और लय
मिल कर एक ऐसी जादूई सृष्टि का निर्माण करते हैं जिसमें श्रोता आनंद की लहरों में
डूब जाते हैं। हिंदुस्तानी फिल्म संगीत की जड़ें भी भारतीय शास्त्रीय संगीत और लोक
संगीत में गहरे से पैठी हुई है। मौसम के वातावरण को सजीव करता संगीत जब बड़े पर्दे पर उतरता है तो सिने संगीत रसिक धन्य हो उठाते
हैं।
हम यहां बसंत ऋतु के ऐसे गीतों की चर्चा
करेंगे जो पर्दे पर पर ही नहीं
सिनेमा घरों से बाहर भी कालजयी हो गए। बसंत को व्यक्त
करते गानों का सिलसिला फिल्म संगीत में बहुत पुराना है। उतना ही जितना सवाक
फिल्मों का इतिहास। ऐसे सैकड़ों गानों में से उन चुनींदा गानों पर ही यहां चर्चा होगी जो आज भी लोगों की ज़ुबान पर हैं। इनमें भी वे ही गीत हैं जिनमें बसंत या बहार शब्द बोलों में आए हैं और वो भी
इस ऋतु के संदर्भ में। व्यक्तियों के संदर्भ में आए बसंत या बहार के बोलों वाले
गीतों का ज़िक्र यहां नहीं करेंगे क्योंकि वे ऋतु से संबन्धित नहीं हैं। वैसे
फिल्मी गानों के बोलों में बसंत से अधिक बहार शब्द का उपयोग हुआ है।
फिल्म संगीत में बसंत और बहार की चर्चा
हो तो जिन तीन फिल्मों के नाम उभरते हैं वे हैं शबाब (1954), बसंत बहार (1956) और स्त्री (1961)। फिल्म संगीत में राग बसंत की बात करें तो
सबसे पहले नौशाद का फिल्म शबाब
(1954) के लिए रचा गीत मन की बीन मतवाली बाजे हमारी यादों में उभरता है जो मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर
की आवाज़ में ढल कर कानों में मिश्री घोल देता है। गीतकार शकील बदायुनी ने इस गीत
में शब्दों से जो चित्र बनाया वह ठेट देशज है – मन की बीन मतवारी बाजे/आशा झूमे जीवन
नाचे... पवन के संग संग डोले जियरा/ झूलत आया पावन प्यारा। नौशाद ने जो
स्वरूप उभारा है वह बहुत कसा हुआ है और इस मदमस्त ऋतु की प्रांजलता और उमंग को महसूस कराता है।
इसी के मुक़ाबले का और उसी शिखर पर उसकी बराबरी कर्टा बसंत राग पर
गाना रचा संगीतकार शंकर जयकिशन ने बसंत बहार (1956) फिल्म के लिए केतकी
गुलाब जूही चम्पक बन फूले। महान फिल्म निर्माता निर्देशक अभिनेता राज कपूर गीतकार शैलेन्द्र को कविराज क्यों कहते थे ये इस गीत के बोलों से स्पष्ट जाहिर होता है :
केतकी गुलाब जूही चम्पक बन फूले
ऋतु बसंत अपनो कन्त गोदी गरवा लगाये
गल-गल कुंज-कुंज गुण-गुण भंवरों की गूंज
राग रंग अंग-अंग छेड़त रसिया अनंग
कूयल की पंचम सुन दुनिया दुख भूले
इस पुरुष दोगाने को ऊंचाई मिली शास्त्रीय गायक के शिखर पुरुष
भीमसेन जोशी की आवाज़ से। इस गाने में भीनसेन जोशी का साथ दिया उतने ही उम्दा फिल्मी गायक मन्ना डे ने। शंकर जयकिशन जिन्हें
पश्चिमी आर्केस्ट्रा की भव्यता का फिल्मी गानों में उपयोग के लिए जाना जाता है
ने शास्त्रीय संगीत में अपना हुनर का इस फिल्म में बखूबी परिचय दिया।
बसंत ऋतु पर सबसे अधिक गाने संभवतः व्ही शांताराम की फिल्म स्त्री
(1961) में थे जिसके रचियता थी कमाल के संगीतकार सी रामचन्द्र। हालांकि
इस फिल्म के काल में यह संगीतकार अपने शिखर से डिग चुका था। लता मंगेशकर और सी रामचन्द्र के मेल से फिल्मों में कालजयी
गानों की रचनाएँ हुईं मगर दोनों के विलग हो जाने से यह संगीतकार फिर कोई करिश्मा
नहीं कर पाया। इस फिल्म में शांताराम के प्रयासों से लता मंगेशकर इस संगीतकार की
धुन पर अंतिम बार फिर गाने के लिए आई। लता और महेंद्र कपूर का गाया भारत व्यास का
लिखा आज मधुमास डोले, मधुरिमा से प्राण भर लो इस संगीतकार के रचना कौशल को रेखांकित करता है। मगर असली
बसंत का गाना आशा भोसले के हिस्से आया बसंत है आया रंगीला।
फिल्म संगीत के स्वर्णकाल में अनेकों मीठे सुरों वाले बसंत गीत आए जो आज भी हमारे कानों
में रस घोल देते हैं। गीत-संगीत और पर्दे पर उसका प्रस्तुतीकरण सभी कुछ बसंत ऋतु
का झोंका देने गाना आया फिल्म एक ही रास्ता (1956) में। मजरूह सुल्तानपुरी
के सहज सरल शब्दों के भावों को आकार देते हुए हेमंत कुमार ने उतनी ही सरल रिदम का गाना बनाया सांवले सलोने आये दिन बहार के/ झूमते नज़ारे झूमे रंग उगार के/ नदी किनारे कोयल पुकारे/ आया ज़माना गाओ गीतप्यार
के।
संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के संगीत से सजी एक फिल्म का नाम ही था आए दिन
बहाए के (1966) जिसके लिए आनंद बक्शी ने इस ऋतु के लिए लिखा सुनो सजना पपीहे
ने कहा सबसे पुकार के/ संभाल जाओ चमन वालों के आए दिन बहार के। लता की मीठी आवाज़ में फिल्म का यह शीर्षक गीत हिमालय की वादियों के
दृश्यों के साथ शुरू होता है और बीच में नकली फूलों के दृश्यों के बावजूद दर्शकों
और श्रोताओं को बांध लेता है।
कामदेव को समर्पित यह ऋतु में रोमांस तो होगा ही और हिन्दी फिल्मों के
केंद्र में रोमांस हे तो होता है। तो साहित लुधियानवी ने बी. आर. चोपडा की फिल्म वक़्त
(1965) के लिए लिखा दिन है बहार के तेरे मेरे इक़रार के/ दिल के सहारे आजा प्यार
करें। हालांकि आशा भोसले
और महेंद्र कपूर के गाये इस गीत को जिस तरह फिल्माया गया उसमें बसंत ऋतु का कोई
लेना देना नहीं है मगर संगीतकार रवि का संगीत इस कमी को पूरी कर देता है।
संगीतकार सलिल चौधरी के बनाए दो गाने अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं। फिल्म
छाया (1961) का राजेंद्र कृष्ण का लिखा गीत छम छम नाचत आई बहार/ पात पात ने ली अंगड़ाई/ झूम
रही है डार डार लता मंगेशकर की आवाज़ में बसंत का माहौल रचता है। शास्त्रीय संगीत
किस प्रकार फिल्म संगीत में उभरता है इसका यह नायाब उदाहरण है। ऐसा ही करिश्मा
सलिल चौधरी फिर से फिल्म परख (1960) में दिखाया जब उन्होंने शैलेंद्र के
शब्दों को धुन में बांधा ओ सजना बरखा बहार आई/ रस की फुहार आई अँखियों में प्यार लायी। हालांकि इस गीत में बहार का उपयोग बरखा के साथ हुआ है तो
इसे बरखा गीत भी कह सकते हैं।
शशि कपूर की कलात्मक फिल्म उत्सव
(1985) की कहानी कामशास्त्र के लेखक वात्स्यायन के काल की है इसमें कामदेव को समर्पित मदनोत्सव के लिए लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने इस ऋतु के अनुरूप यह संगीत रचा जिसे
शब्द दिये वसंत देव ने। अनुराधा पौढ़वाल, सुरेश वाडकर और आरती मुखर्जी का
गाये इस गीत की खूबसूरती इसमें भारतीय वाद्यों की उपयोग है। शुद्ध भारतीय वाद्यों
वाला यह प्रतिनिधि गीत है मेरे मन बाजा मिरदंग मजीरा खनके रे अंग अंग/ अज़ब मद छाया रे मदन रंग
लाया रे।
मनोज कुमार ने भी अपनी फिल्म उपकार (1967) में पंजाब की धरती के वसंतोत्सव को फिल्माया। प्रेम
धवन ने लिखा आयी झूम के बसंत झूमो संग संग में/ आज रंग लो दिलों को इक
रंग में जिसे कल्याणजी
आनंदजी ने वैसे ही मस्त अंदाज़ में धुन में बांधा।
बसंत पर अधिकृत गाने सुनने हों तो हमें फिल्म संगीत के इतिहास में पीछे
जाना पड़ेगा। बॉम्बे टाकीज़ की फिल्म बसंत (1942) का यह बसंत गीत पुराने
जमाने के संगीत रसिकों को खूब याद है आया बसंत सखी विरहा का अंत सखी/ वन वन में छाई बहार जिसे लिखा था प्यारेलाल संतोषी ने जो गीतकार के अलावा फिल्म
निर्माता निर्देशक और लेखक भी थे जिनके बेटे राजकुमार संतोषी ने भी फिल्म निर्देशन में भरपूर नाम
कमाया है। यह गीत गाया था बंगाल की मशहूर गायिका पारुल घोष और अरुण कुमार ने।
पारुल घोष संगीतकार अनिल बिस्वास की बहन तथा चोटी के बांसुरिवादक पन्नालाल घोष की पत्नि थी।
हालांकि इस फिल्म के संगीतकार के रूप में नाम पन्नालाल घोष का ही गया मगर घोष ने
आर्केस्ट्रेशन और पार्श्व संगीत का ही काम किया था और सभी गानों की धुने अनिल
बिस्वास ने बनाई थी। यह जानकारी खुद अनिल बिस्वास ने हिन्दी फिल्म गीत कोश के
निर्माता हरमंदिर सिंह हमराज़ को दी थी।
उसी काल में 1942 में आयी फिल्म सौगंध में आसीत बरन का
गाया गीत अब आयी बसंत बहार/ उजड़े से इक जीवन में सखी छाया निराला निखार। पंडित नटवर के लिखे बोलों को सुरों में ढाला था राय चंद बोराल ने। दिलचस्प बात यह
है कि फिल्म में यह गीत प्रकृति का चित्रण नहीं है। नायक इसे प्यानो पर बैठा गा
रहा है।
एक अनोखे थीम वाली फिल्म बम्बई बाबू का (1960) के इस गीत के बोलों में
भले सावन शब्द भी आता है परंतु यह फिल्म में यह बसंत ऋतु का प्रस्तुतीकरण
करता है दीवाना मस्ताना हुआ दिल जाने कहां होके बहार आई। शास्त्रीय और लोक आधार पर खड़ा संगीतकार सचिन देब बर्मन की पूरी छाप लिए मज़रूह सुल्तानपुरी का लिखा
यह कमाल का गाना मोहम्मद रफी और आशा भोसले ने उतनी ही खूबसूरती से गाया इसलिए वह आज भी ज़िंदा है।
बसंत की बहार के गाने सुनने बैठें तो दिन पूरा हो जाये मगर उनकी
फहरिश्त समाप्त नहीं होगी। जैसे झूले में पावन के आई बहार (बैजू बावरा/1952), देखो जी बहार आए (आज़ाद/1955), देखो मौसम क्या बहार है सारा आलम बेक़रार है (ऑपेरा हाउस/1962)।
आजा आई बहार (राजकुमार/1964), पुकारता चला हूँ में गली गली
बहार की (मेरे सनम/1965), बागों में बहार है
(आराधना/1969), बागों में बहार आई (मोम की
गुड़िया/1972), बहारों फूल बरसाओ मेरे
महबूब आया है (सूरज/1966)। और कहां तक गिनाएं!
(वीणा समूह की कला संगीत
और संस्कृति की मासिक पत्रिका‘स्वर सरिता’ के फरवरी, 2017
अंक में यह लेख प्रकाशित हुआ)
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