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कांग्रेस में अंतर्विरोध और अंतर्कलह, मगर संभाले कौन!

  -           राजेंद्र बोड़ा डेढ़ सदी से अधिक पुरानी कांग्रेस पार्टी में इस समय कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है । लगातार दो बार संसदीय चुनाव की हार और चंद राज्यों में उसकी सरकारों के सिमट जाने के बाद अब इस पार्टी में जो अंतर्कलह उभर कर सामने आ रही है वह लक्षण है उसमें आ रहे नेतृत्व के क्षरण का। बीते दो दशकों से अधिक समय से पार्टी की अध्यक्षता नेहरू-गांधी परिवार के ही पास रही है   जिसकी वजह से यह माना जाने लगा है कि अब पार्टी परिवार के ही इर्द-गिर्द घूमती है और परिवार के बिना शायद ही उसका कोई वजूद रहे । आज कांग्रेस अन्य राजनैतिक दलों से ऊंची पायदान पर नहीं है। वह भी अन्य राजनैतिक दलों की भांति एक सामान्य पार्टी हो कर रह गयी है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि अब उसमें नेहरू परिवार के नेतृत्व की पुरानी राजनीतिक समझ बदल गई है। नई पीढ़ी का नेतृत्व अपनी विरासत , अपनी परंपरा से कटा हुआ है। सोनिया गांधी , राहुल गांधी या प्रियंका वाड्रा के पास पुश्तैनी संबंधों की धरोहर तो है मगर हिंदुस्तान की राजनीति की समझ , लोकतान्त्रिक सोच तथा वैचारिक अनुभव की विरासत नहीं है। परिस्थितिय...

गाँधी और नेहरू : कितने दूर कितने पास

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राजेंद्र बोड़ा भारतीय राजनीति के आधुनिक इतिहास पर सबसे अधिक छाया जिन दो व्यक्तित्वों की रही वे थे महात्मा गाँधी और जवाहर लाल नेहरू. बीसवीं सदी में देश के राजनीतिक भविष्य की दिशा तय करने में इन दो व्यक्तित्वों की जो भूमिका रही वह अनूठी है. महात्मा गाँधी का नेहरू के प्रति जैसा लाड और आत्मीय प्रेम था उसकी मिसाल कहीं नहीं मिलेगी. गाँधी ने जो आखरी ख़त नेहरू को लिखा उसमे उनका वात्सल्य भाव उमड़ पड़ता है. 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे की गोली का शिकार होकर चिर निद्रा में लीन होने से ठीक 12 दिन पहले 18 जनवरी 1948 लिखे इस पत्र की अन्तिम पंक्तियाँ हैं : "बहुत वर्ष जीयो और हिंद के जवाहर बने रहो. बापू का आशीर्वाद." और गाँधी के महाप्रयाण की सूचना आकाशवाणी प्रसारण पर सारे देश को देते हुए रुंधे गले से नेहरू ने कहा : "हमारे जीवन से रोशनी चली गयी है." मगर यह भी सच है कि देश की आज़ादी की जंग के इन दो योद्धाओं में जितनी अधिक आत्मीय निकटता थी उतनी ही उनके विचारों में जबरदस्त दूरियां भी थीं. देखा जाए तो इन दो महान व्यक्तियों के बीच सम्बन्ध हमेशां अजीब से विरोधाभास लिए हुए रहे एक तरह ...

गाँधी और नेहरू के मतभेद उजागर करता एक ख़त

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(आजाद भारत का नक्शा कैसा होगा इस पर गाँधी और नेहरू के बीच गहरे मतभेद को गाँधी का 5 अक्टूबर 1945 को लिखा पत्र स्पष्ट रूप से इंगित करता है. गाँधी इस पत्र में अपने 'हिंद स्वराज' के विचारों का खुलासा करते हैं. ख़त का प्रमुख अंश यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है जो आज भी उतना ही मौजूं है.) चि. जवाहर लाल, तुमको लिखने का तो कई दिनों से इरादा था, लेकिन आज ही उसका अमल कर सकता हूँ. अंग्रेजी में लिखूं या हिन्दुस्तानी में, वह भी मेरे सामने सवाल था. आखर में मैंने हिन्दुस्तानी में ही लिखने का पसंद किया. पहली बात तो हमारे बीच में जो बड़ा मतभेद हुआ है, उसकी है. अगर ये भेद सचमुच है तो लोगों को भी जानना चाहिए, क्योंकि उनको अंधेरे में रखने से हमारा स्वराज का काम रुकता है. मैंने कहा कि 'हिंद स्वराज' में मैंने लिखा है, उस राज्य-पद्धति पर मैं बिल्कुल कायम हूँ. यह सिर्फ़ कहने की बात नही है. लेकिन जो चीज मैंने 1908 के साल में लिखी है उसी चीज का सत्य मैंने अनुभव से आज तक पाया है. आख़िर में मैं एक ही उसे मानने वाला रह जाऊं, उसका मुझको जरा भी दुःख नहीं होगा, क्योंकि मैं जैसा सत्य पाता हूँ, उसका मैं ...

राजस्थान : चुनाव 2008

राजेंद्र बोड़ा इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में राजस्थान के लोग एक बार फिर शासन की बागडोर सौपने के लिए अपने नए प्रतिनिधियों का चुनाव चार दिसम्बर को करने जा रहे हैं. नई सदी में हुए विधानसभा के पहले चुनावों में राज्य के मतदाताओं ने दो तिहाई बहुमत के बल पर अशोक गहलोत के नेतृत्व में शासन कर रही कांग्रेस को बुरी तरह नकारते हुए दिल्ली से राजस्थान भेजी गई भारतीय जनता पार्टी की वसुंधरा राजे के सर पर जीत का सेहरा बाँधा था. मरू प्रदेश में यह पहली बार हुआ जब भारतीय जनता पार्टी यहाँ अपने बूते पर पूर्ण बहुमत पाने में सफल रही. इससे पहले दो बार यह पार्टी भैरोंसिंह शेखावत के नेतृत्व में सत्ता में रही मगर तब उसे पूर्ण बहुमत नहीं था और उसे अन्य पार्टियों तथा निर्दलियों के समर्थन से राज चलाना पड़ा. पाँच वर्ष बाद भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस सत्ता में आने के लिए जनता का मत हासिल करने के वास्ते फ़िर आमने सामने हैं. सन् 2008 के विधानसभा चुनावों की सन् 2003 के चुनावों से अनोखी समानता है. पिछली बार अशोक गहलोत अपने "शानदार" और "सफल" कार्यकाल का झंडा लिए दम ख़म के साथ मैदान में थे और उन्हें जीत ...