पुस्तक समीक्षा

 बवालिस्तान: ज़िंदगी के रिपोर्ताज़


- राजेन्द्र बोड़ा

तसनीम खान पत्रकारिता से शुरुआत करके अब साहित्य जगत में अपना मुक़ाम बना रही हैं। हालांकि पत्रकारिता और साहित्य के बीच एक महीन संबंध जरूर है, किन्तु पत्रकारिता को साहित्य नहीं माना जाता, भले ही साहित्यिक पत्रिकाएं होती हैं। पत्रकारिता के लिये कहा जाता है कि वह वर्तमान का तुरंत लिखा इतिहास होता है। पत्रकार को पहली सीख यह होती है कि उसकी भाषा सीधी, सरल और सहज हो, जो साक्षरता के सभी स्तरों वाले पाठकों के लिये बोधगम्य हो। साहित्यकार के लिये ऐसी कोई मजबूरी नहीं होती। साहित्य में तो भाषा की प्रांजलता और शब्दों के साथ खेलने वाले की अभिव्यक्ति ऊंची मानी जाती है। पत्रकारिता में इससे बचा जाता है और सरल भाषा उसका कौशल होता है। पत्रकार जब साहित्यकार बनने को उन्मुख होता है तब उसके पास पत्रकारिता वाली भाषा का कौशल ही होता है। मगर कल्पना की उड़ान उसे कहानियां घड़ने और कहने के लिये तैयार करती है। तसनीम की कहानियां खबरों जैसी हैं, जिनमें ज़िंदगी के तजुर्बे हैं। यह तजुर्बे उनके अपने अनुभव भी हैं और दूसरों से सुने अनुभव भी है। पत्रकार की खबरें भी ऐसे ही बनती हैं और लिखी जाती हैं। फरक केवल यह होता है कि पत्रकारिता में वर्तमान घटनाओं की तथ्यपरक कहानियां होती, और साहित्यकार ऐसी घटनाओं में अपनी कल्पना का पुट डाल कर कहानियां बुनता है। तसनीम ने पत्रकारिता की निगाह से जो असली ज़िंदगी में देखा है; सुना है; समझा है उसे अपनी कहानियों में उतारा है। उनकी कहानियों में एक बेहतर दुनिया का सपना है। 

तसनीम शुरू में ‘अपनी बात’ में कहती है “कहानियां निकलेंगी दस्तावेज बन कर।” खबर भी दस्तावेज होती है। इसीलिए अंग्रेजी में उसे स्टोरी कहते हैं। खबर बाद में जाकर इतिहास का स्रोत बनती है। कहानियां वैसा इतिहास होती है जैसा लेखक चाहता है। खबर बताती है क्या हुआ, मगर साहित्यकार बताता है कि क्या होना चाहिए था। 
पत्रकार और साहित्यकार के बीच एक बड़ी दूरी भी होती है। बवालिस्तान पढ़ते हुए लगता है कि तस्नीम यह दूरी धीरे-धीरे तय करते हुए साहित्यकार के रूप में अपने को स्थापित कर रही है। पत्रकार का कौशल कम शब्दों में बात कहना मगर साहित्यकार के पास विस्तार से कहने का खुला मैदान होता है। जहां पत्रकार की पहचान उसकी शब्दों की सीमा में रहने से होती है वहीं साहित्यकार पर ऐसा कोई बंधन नहीं होता, हालांकि वह भी कम शब्दों में बड़ी बात कह जाने की क्षमता रखता है। बवालिस्तान में तसनीम के ये दोनों पक्ष शायद इसलिए उभरते हैं कि वे अभी पत्रकारिता के रंग को अपने पर से छुड़ा नहीं पाई है, और साहित्य के बरगद की घनी छांव में पहुंचने की उनकी यात्रा जारी है।

पत्रकार आज में रहता है। उसका पेशा आज की बात करना होता है। कल की बात बासी खबर होती है। वह आज की बात में भी अपना कोई तड़का नहीं लगा सकता। उसके लेखन को जल्दी में लिखा इतिहास माना जाता रहा है। साहित्यकार विगत सुनाता है जिसमें उसका अतीत से लगाव - नोस्टेलजिया – भी होता है। रूमानियत से भरी कहानियां साहित्य के पाठकों को खूब भाती है। तसनीम की कहानियों में भरपूर नोस्टेल्जिया है। अतीत का अनुराग है।

इस संकलन की लगभग सभी कहानिया सांप्रदायिकता के इर्द गिर्द घड़ी गई हैं और उनमें इस समस्या को अलग अलग पहलुओं से प्रस्तुत किया गया है। उनकी कहनियों में यह बात बार-बार आती है कि दो समुदायों के रिश्तों का पिछला ज़माना अच्छा था। यह तकलीफ भी व्यक्त होती है कि अब वैसा नहीं रहा। ये कहानियां इस बदलाव को केवल रिपोर्ट करती हैं। इस समस्या की गहराई में उतरने की युवा लेखिका की तैयारी नहीं है। इसलिए वैसी पड़ताल भी नहीं है। इस कारण कहानियां पत्रकारिता की खबरों जैसी सपाट बयानी करती हो जाती है। यह भाव जरूर झलकता है कि दो समुदायों  को राजनीति लड़ाती है। यह मुद्दे का पत्रकारिता वाला सरलीकरण है। इस मुद्दे पर देश के विभाजन के बाद एक से एक बेहतरीन किताबें और लेख अकादमिक और साहित्य जगत में लिखे जा चुके हैं। मगर बावलिस्तान की कहानियां देश के विभाजन को इंसानी जुनून का सरसरी तौर पर सबब मानते हुए वैचारिक दृष्टि से कोई पड़ताल नहीं करती।

पुस्तक के परिचय में उसके अंतिम आवरण पृष्ठ पर घोषित किया गया है कि “कहानियों मेंस्पष्ट राजनैतिक समझ है।” बवालिस्तान को पढ़ना शुरू किया तो पहली ही कहानी ‘अब्दुल की मौत’  पढ़ते हुए कृशन चन्दर याद आये, जिनके अंदाज़ की हल्की सी झलक इस कहानी में मिलती है। हालांकि अन्य कहानियों में यह अंदाज़ नहीं है, जो आश्वस्त करता है कि वे अपनी राह बना रही हैं। तसनीम की भाषा सरल, प्रवाहमयी और स्थानीय पुट लिए हुए है, जो पाठक को बांधे रखने में सफल है, किन्तु उन्हें अभी अपना शिल्प घड़ना है।

 


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