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दो गहलोतों का अंतर : होनी का खेल

राजेंद्र बोड़ा साहिर लुधियानवी ने लिखा है “कदम कदम पर होनी बैठी अपना जाल बिछाए/ इस जीवन की राह में जाने कौन कहां रह जाये”। इसे होनी नहीं तो और क्या कहेंगे कि मुख्यमंत्री के रूप में तीसरी बार राजस्थान की सरकार चला रहे अशोक गहलोत जिनके इशारे के बिना कांग्रेस हिल नहीं सकती को राजनीति में पहली बार कोई पद दिलाने वाला नेता गुमनामी के गर्त में खो जाता है। यह नेता है जनार्दन सिंह गहलोत जिसकी 1970 के दशक में कांग्रेस के संजय गांधी युग में तूती बोलती थी। मगर होनी को कुछ और मंजूर रहा। दिग्गज नेता भैरोंसिंह शेखावत को चुनाव में पराजय का कड़वा स्वाद चखा कर विधान सभा में पहुंचने का करिश्मा दिखाने वाला यह नेता राजनीति में कोई बड़ी कामयाबी नहीं हासिलकर सका। अलबत्ता राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय खेलों की राजनीति में रम कर उसने अपनी हैसियत जरूर बनाए रखी।  संस्मरणों के रूप में जनार्दन सिंह गहलोत ने अपना जीवन वृतांत ‘ संघर्ष से शिखर तक ’ पुस्तक में बहुत ही सीधी और सरल भाषा में प्रस्तुत किया है जो अत्यंत दिलचस्प बन पड़ा है। करीब पौने दो सौ पेजों के इस वृतांत में कांग्रेस के बीत गये स्वर्णिम युग का खट्टा-मीठा...

कौन लौटाएगा कांग्रेस का खोया वैभव

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राजेंद्र बोड़ा अशोक गहलोत और सचिन पायलट सचिन पायलट पर डोरे डाल रहे हैं कि वे पाला बदल कर अपने गले में भगवा दुपट्टा डाल लें। इसके लिए उनके लिए केंद्र में नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल में एक कुर्सी लगाई जा सकती है। ऐसी खबर राजस्थान के एक पुराने प्रतिष्ठित समाचार पत्र ‘ राष्ट्रदूत ’ में शनिवार 15 अप्रेल , 2017 को छपी जिसके बाद , जैसा कि होताया है , अटकलों का दौर चल पड़ा। यह खबर चंडूखाने की गप्प है या सचिन को राजनैतिक रूप से परेशान करने और उन्हें अस्थिर करने के लिए ‘ प्लांट ’ की गई है हम नहीं कह सकते। अशोक गहलोत के नेतृत्व में पांच साल सरकार चलने के बाद कांग्रेस की जो दुर्गति विधान सभा चुनावों में हुई उसके बाद जो हालात बने उसमें पायल ट को प्रदेश का खेवैया बनाया गया और आशा की गई कि पार्टी की सूख गई खेती फिर से हरी हो पाएगी। मगर यह आशा पूरी नहीं हो सकी है। इसका उदाहरण है विधानसभा की धौलपुर सीट के लिए हुआ उप चुनाव जिसमें भाजपा ने चौकाने वाले बहुमत से जीत हासिल की और कांग्रेस की कोई नई कोंपल नहीं फूट सकी । ऐसी खबरें भी उड़ती रहती हैं कि राजस्थान में पायलट को असफल साबित करन...

अशोक गहलोत रखते हैं फूँक-फूँक कर कदम, मगर कदम के निशां तक नहीं

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राजेंद्र बोड़ा राजस्थान पत्रिका ने आज (12 फरवरी, 2011) के अंक में अपने पूर्व संपादक विजय भण्डारी का एक लेख “फूँक-फूँक कर कदम” प्रकाशित किया है। भण्डारी कहते हैं कि राज्य में अब तक हुए कुल 11 मुख्य मंत्रियों (नौ कांग्रेस, दो भाजपा) में अशोक गहलोत “पहले ऐसे मुख्य मंत्री हैं, जो आम आदमी की बोली बोलने में गुरेज नहीं करते हैं”। इसके लिए वे गहलोत के उस सार्वजनिक वक्तव्य को आधार बनाते हैं जिसमें कहा गया है कि पुलिस के थानेदारों की जानकारी में है कि उनके क्षेत्र में कौन चोर है, मगर वे उन्हें पकड़ते नहीं। भण्डारी गहलोत के इस वक्तव्य से खुद “चकित” हैं। वे कहते हैं कि “थानेदारों को राज्य के पदासीन मुख्य मंत्री द्वारा इससे बड़ा काला प्रमाणपत्र क्या हो सकता है? मुख्य मंत्री ने उनका चेहरा काला पोत के रख दिया है, लेकिन उन्हें (थानेदारों को) शर्म नहीं आती है”। भण्डारी बाद में यहाँ तक लिख बैठे कि “अशोक गहलोत ने अपने द्वितीय कार्यकाल के 26 महीनों में प्रशासन के अनेक लोगों के मुँह काले पोत दिये मगर उनके कान में जूँ नहीं रेंगी”। ऐसे वक्तव्यों में वे अशोक गहलोत के बड़े सुकोमल रूप को देखते हैं। वे यह भी कहत...