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मनोहारी सिंह के सेक्सोफोन का जादू कभी नहीं टूटेगा

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राजेंद्र बोड़ा सैकड़ों हिन्दी फिल्में हर साल बनती हैं। अब तक बनी हजारों फिल्मों में से कौन सी फिल्में लोगों को याद रहती हैं? ‘मुगले आज़म’ या ‘शोले’ जैसी फिल्मों को छोड़ दें तो अधिकतर फिल्में समय के अंधेरे गलियारों में खो जाती हैं। यदि कोई फिल्म याद रहती है तो वह उसके गानों से। हिंदुस्तानी फिल्म संगीत ने, खास कर गानों ने, पुरानी फिल्मों को लोगों की यादों में बचाए रखा है। यह भी होता है कि गाने याद रह जाते हैं और फिल्मों के नाम भी बिसरा दिये जाते हैं। हालांकि गानों का श्रेय गायकों, संगीतकारों और गीतकारों को मिलता है मगर गानों को सजाने संवारने में साजिन्दों का योगदान भी कम नहीं होता। आप किसी पुराने गाने को याद करते हैं तो कई बार उस गाने की शुरुआत में या उसके इंटरल्यूड में बजे किसी साज की धुन सबसे पहले आपके मन में गूँजती है। आज किसी जमाने की राजेंद्र कुमार, साधना की सुपर हिट फिल्म ‘आरजू’ की किसे याद है। याद है तो उसके गाने। उनमें भी एक गाना जो इतने बरसों के बाद आज भी लोगों के सिर पर चढ़ा हुआ है ‘बेदर्दी बालमा तुझको मेरा मन याद करता है’की याद आती है तो हमारे जेहन में उस वाद्य की आवाज गूँज उ...

साक्षर भारत : टूटते सपनों की कहानी

राजेंद्र बोड़ा वर्ष 2012 तक देश की समूची आबादी को साक्षर बना देने की केंद्र सरकार की महत्वकांक्षी योजना "साक्षर भारत" के क्रियान्वयन में अभी विभिन्न एजेंसियां जुटी है. देश में कोई भी अशिक्षित नहीं रहे इसके लिए विगत में सरकारों द्वारा कईं बार तिथियाँ निश्चित की गयीं कि अमुक समय तक सबको पढ़ा लिखा बनाने का सपना पूरा हो जाएगा. आज़ादी को साठ साल होने को आये हैं. मगर बावजूद सारे प्रयासों के देश में आज भी करोड़ों लोग ऐसे हैं जो अक्षर नहीं पढ़ पाते. आज़ादी के इतने सालों बाद प्रौढ़ साक्षरता के प्रयासों की कोई जरूरत नहीं रह जानी चाहिए थी यदि प्रारंभिक शिक्षा हम सभी तक पंहुचा पाते. क्योंकि प्रारम्भिक शिक्षा से उन सभी नए जन्मे बालक - बालिकाओं को, जिन्होंने आज़ाद भारत में आँख खोली, नहीं जोड़ा जा सका इसीलिए नयी पीढियां आती गयीं और पुरानी पीढी के प्रौढ़ों को साक्षर बनाने का काम कम होने की बजाय बढ़ता ही गया और वह आज़ादी के बाद के छठे दशक में आज भी जारी है. आज़ादी का संग्राम जिन सपनों को सच बनाने के लिए लड़ा गया इन पिछले दशकों में हमने उन सपनों को टूटते हुए ही देखा है. आज़ादी की लड़ाई में जो ...

कम जल उपयोग वाले विकास की जरूरत

राजेन्द्र बोड़ा राजस्थान के लोगों ने सदियों पहले प्रकृति से सहकार करना सीख लिया. उन्होंने प्रकृति से जो सीखा उसे अपनी बुद्धि और कौशल से कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में जीने की राह आसान करने के जतन किये. बुद्धि और कौशल का उपयोग राज करने वालों ने नहीं किया बल्कि सामान्य जन ने अपने अनुभवों से किया. राजस्थान में पानी इंसानी याददास्त में कभी इफरात में नहीं रहा. बरसात के बादल जो बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से उठते हैं वे इस प्रदेश तक पहुचते-पहुचते शिथिल पड़ जाते है. इसीलिए सूखा राजस्थान के लिए कोई नई बात नहीं है. बरसों बाद कभी-कभी ज़माना अच्छा होता है. इसीलिए पानी की अहमियत को यहाँ के लोगों नें सबसे अधिक जाना. जीवन की पहली शर्त पानी ही होती है. विकट रेगिस्तानी इलाकों में जहां प्रकृति ने पानी की भयंकर किल्लत की स्थिति बनाए रखी वहां लोगों नें प्रकृति से समझौता किया और अपनी बुद्धि और कौशल से पानी के संरक्षण के अनोखे उपाय किये. पीढ़ी-दर-पीढ़ी पानी के संरक्षण और उसके किफायती उपयोग की सीख लगातार जारी रही. यह सब सामान्य जन ने किया. इसीलिए राजस्थान में पानी के पुराने सार्वजनिक स्रोत - कुए, बावड़ी, तालाब -...

बेमिसाल गायन - जीवन

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-राजेंद्र बोड़ा जुथिका रॉय उन महान कलाकारों में से हैं जो न केवल अपनी कला की बुलंदियों पर पहुंचे बल्कि अपने जीवन को भी ऐसे जिया जिससे प्रेरणा ली जा सके. अपनी मीठी आवाज के साथ सरल और सौम्य व्यक्तित्व वाली गायिका जुथिका रॉय ने 20 अप्रेल को अपने जीवन के 90 बसंत पूरे कर 91 वें वर्ष में प्रवेश किया. उन्होंने अपना जन्म दिन जयपुर में सुधि संगीत रसिकों के बीच मनाया. जयपुर के एक अनौपचारिक समूह 'सुरयात्रा' ने उन्हें विशेष तौर पर जयपुर आमंत्रित किया था. बीते युग के बहुत कम संगीत सितारे आज हमारे बीच हैं. मगर नई विज्ञापनी चकाचौंध में वे बिसराए हुए ही रहते है. 'सुरयात्रा' समूह बीते युग के ऐसे कलाकारों को याद करता है, उन्हें बुलाता है और स्नेह से भावभीना सम्मान करता है. भावना यही रहती है कि उस कलाकार को अपने जीवन की सांध्य बेला में लगे कि वे भुला नहीं दिए गए हैं. आज भी उनके चाहने वाले उन्हें इज्जत बख्शने वाले मौजूद हैं. कलाकार को मिली यह ख़ुशी ही सुरयात्रा के हमराहियों की थाती होती है. जुथिका रॉय तीन दिन जयपुर में रही. रविवार की शाम उनका भव्य सम्मान समारोह हुआ. बीते युग की इस गाय...

दास्तान 'गर्म हवा' की

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राजेंद्र बोड़ा 'गर्म हवा' उर्दू की जानी-मानी लेखिका इस्मत चुगतई की एक अप्रकाशित लघु कहानी पर आधारित फिल्म है जिसका फ़िल्मी तर्जुमा मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी ने शमा जैदी के साथ मिल कर किया. कैफ़ी आज़मी ने फिल्म के संवाद भी लिखे. यह मैसूर श्रीनिवास सथ्यू - एम. एस. सथ्यू - की पहली फीचर फिल्म थी जो 1973 में रिलीज हुई. इस्मत चुगतई की मूल कहानी का नायक एक स्टेशन मास्टर है जो देश के बंटवारे के चक्र में फंस गया है. फिल्म की स्क्रिप्ट में नायक को चमड़े के जूते बनाने वाली फेक्ट्री के मालिक के रूप में चित्रित किया है. छः जुलाई 1930 में मैसूर में जन्मे सथ्यू बीएससी की पढाई बीच में छोड़ कर अपनी किस्मत सिने जगत में आजमाने के लिए बम्बई आ गए. बम्बई में 1952-53 में फ्रीलांस एनिमेटर के रूप में काम किया. मगर बाद में चार बरस तक बेरोजगारी में गुजारे. उन्हें सबसे पहला तनख्वाह वाला काम फिल्मकार चेतन आनंद के सहायक के रूप में मिला. फिल्म 'किनारे किनारे' में वे चेतन आनंद के सहायक नेर्देशक बने. बाद में स्वतंत्र रूप से कला निर्देशन करने का काम भी उन्हें चेतन आनंद ने ही दिया. फिल्म थी 'हकीकत...

हमारे भाग्य विधाता

राजेंद्र बोड़ा हर बार की तरह इस बार भी हुआ. विधान सभा के बजट सत्र का शुक्रवार आखरी दिन था. सत्र के अनिश्चित काल के लिए स्थगित होने के थोड़ी देर पहले विधानसभा अध्यक्ष, मुख्यमंत्री, मंत्रियों और विधायकों के वेतन - भत्तों में यकायक बड़ी बढ़ोतरी करने का विधेयक और वह तुरत - फुरत में पास हो गया. सबके वेतन पांच - पांच हजार रुपये माहवार बढ़ गए. विधायकों के निर्वाचन भत्ते में दस हजार रुपये माहवार अलग से बढ़ गए. उन्हें एक कर्मचारी रखने की सुविधा थी जिसकी जगह विधायकगण अब बीस हजार रुपये माहवार नकद ले सकेंगे. इन निर्वाचित जनसेवकों - विधानसभा अध्यक्ष, मुख्यमंत्री, मंत्री और राज्य मंत्री उपाध्यक्ष मुख्य सचेतक उप मुख्य सचेतक तथा प्रतिपक्ष के नेता - द्वारा अपने मेहमानों का आतिथ्य करने के लिए मिलने वाले भत्ते में भी पांच से छः हजार रुपये माहवार बढ़ा दिए गए. घरों को सजाने और बिजली के बढे हुए बिल भरने की भी व्यवस्था कर दी गई और रेल में यात्रा करने के लिए साल भर में एक लाख रुपये खर्च नहीं हो सकेंगे तो वह राशि लेप्स नहीं होगी उसका उपयोग अगले वर्ष में भी किया जा सकने का इंतजाम करदिया गया. भूतपूर्व विधायकों की ...

ख़बरों का कारोबार करने वालों पर पाठक कब तक भरोसा करेंगे ?

राजेंद्र बोड़ा ऐसे कौन से कामकाज हैं जिन पर लोग सबसे कम भरोसा करते हैं ? इस प्रकार की जानकारी पाने के लिए पश्चिमी देशों में लगातार सर्वे होते रहते हैं. पत्रकारिता की साख लोगों में कितनी है यह जानने के लिए यदि हम इन सर्वे के परिणामों पर नज़र डालें तो पाते हैं कि राजनेता और पत्रकार अपनी साख के मामले में लोगों की राय में सबसे निचली पायदानों पर आते हैं. इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि पत्रकारों के काम पर लोगों का सबसे कम भरोसा है. परन्तु यह सोच पश्चिम का है. यह सच है कि हमारे देश में भी राजनेताओं की साख बहुत बुरी तरह गिरी लगती है, मगर पश्चिम के लोगों की पत्रकारों के प्रति सोच भारत के लोगों की सोच से मेल नहीं खाती. हमारे देश में आज भी लोग अख़बारों के लिखे पर भरोसा करते हैं. जब भी किसी को अपनी बात पर दूसरे को भरोसा दिलाना होता है तो वह यही जुमला आम तौर अपनाता है "अखबार में छपा है." अखबार में छपी बात को अटल सत्य की तरह हमारे लोग स्वीकार करते हैं. पाठकों का यही भरोसा है जिसे बनाए रखना अखबारों में काम करने वाले पत्रकारों के लिए आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती है. आज जब राजनेताओं पर से लोगों का भर...