Saturday, November 29, 2008

राजस्थान : चुनाव 2008

राजेंद्र बोड़ा

इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में राजस्थान के लोग एक बार फिर शासन की बागडोर सौपने के लिए अपने नए प्रतिनिधियों का चुनाव चार दिसम्बर को करने जा रहे हैं. नई सदी में हुए विधानसभा के पहले चुनावों में राज्य के मतदाताओं ने दो तिहाई बहुमत के बल पर अशोक गहलोत के नेतृत्व में शासन कर रही कांग्रेस को बुरी तरह नकारते हुए दिल्ली से राजस्थान भेजी गई भारतीय जनता पार्टी की वसुंधरा राजे के सर पर जीत का सेहरा बाँधा था. मरू प्रदेश में यह पहली बार हुआ जब भारतीय जनता पार्टी यहाँ अपने बूते पर पूर्ण बहुमत पाने में सफल रही. इससे पहले दो बार यह पार्टी भैरोंसिंह शेखावत
के नेतृत्व में सत्ता में रही मगर तब उसे पूर्ण बहुमत नहीं था और उसे अन्य पार्टियों तथा निर्दलियों के समर्थन से राज चलाना पड़ा.

पाँच वर्ष बाद भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस सत्ता में आने के लिए जनता का मत हासिल करने के वास्ते फ़िर आमने सामने हैं. सन् 2008 के विधानसभा चुनावों की सन् 2003 के चुनावों से अनोखी समानता है. पिछली बार अशोक गहलोत अपने "शानदार" और "सफल" कार्यकाल का झंडा लिए दम ख़म के साथ मैदान में थे और उन्हें जीत का हिमालय जितना बड़ा विश्वास था. यदि कोई उनसे मतदाताओं में फैली नारजगी का जरा भी संकेत देता तो वे उसे पत्रकारों की सनक कह
कर खारिज कर देते थे. इस बार वसुंधरा राजे उसी तर्ज पर अपने पाँच सालों के "शानदार" और "सफल" कार्यकाल की दुदुम्भी बजा रहीं हैं. पिछली बार चुनाव आचार संहिता लागू होने तक गहलोत सरकार के "जनहित के कामों का ब्यौरा देते हुए सरकारी विज्ञापनों से अखबारों के पन्ने भरे रहते थे तो इस बार वसुंधरा सरकार की उपलब्धियों को गिनाते हुए सरकारी विज्ञापनों से अखबारों के पन्ने रंगे रहे हैं.

आज कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों दलों में एक समानता और है. दोनों प्रमुख प्रतिस्पर्धी पार्टियों में ऐसा एकछत्र नेतृत्व है जो सर्वमान्य तो कत्तई नहीं है पर इन दोनों दलों में इन नेताओं का कोई विकल्प भी नहीं है. अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे दोनों का अपनी अपनी पार्टी में ऐसा वर्चस्व बना हुआ है कि वहां दूसरे नम्बर से लगा कर दस नम्बर तक का नेता ढूंढे नहीं मिलता. भारतीय जनता पार्टी की राज्य में हालत यह है कि यहाँ पार्टी संगठन का मुखिया कौन होता है वह वसुंधरा राजे के रुख पर निर्भर करता है. इसी प्रकार कांग्रेस में भी अशोक गहलोत को भले ही उनके विरोधी, खास कर प्रभावी जाट लॉबी, सर्वमान्य नेता नहीं मानते हों मगर राज्य स्तर पर उनकी काट का कोई नेता लंबे इतिहास वाली इस पार्टी में नहीं बचा है और कांग्रेस के आंतरिक ढांचे और दिल्ली के नेताओं पर उनका कुछ ऐसा जादू चला हुआ है कि राज्य में संगठन का मुखिया उनकी मर्जी से ही बनता है.

पिछले पाँच सालों में राज्य में दोनों पार्टियों में उनके संगठन के मुखिया बार-बार बदले गए है और साफ़ तौर से गहलोत और राजे की मर्जी ही सम्बंधित दलों में चली है. दोनों अपने यहाँ अपने आप को धुरंधर समझने वालों को कोने में बिठाने में सफल रहे है. ऐसी परिस्थिति में विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं. ऐसे में स्वाभाविक तौर पर चुनावी प्रचार की डोर इन दो नेताओं के हाथ में ही है जो युवा अवस्था से अधेड़ अवस्था की देहलीज में दाखिल हो चुके हैं.

इन चुनावों में कई नई चीजें भी हो रही है. गहलोत सरकार में शिक्षा मंत्री रहे शैलेन्द्र जोशी जैसे घोर कांग्रेस में रमे लोग भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर उम्मीदवार बने हुए हैं तो भगवा गमछा गले में डाले प्रताप सिंह खाचारियावास जैसे लोग जो कभी भाजपा के दफ्तर में कांग्रेस को कोसते नहीं अघाते थे वे पंजे के निशान को थामे कांग्रेस के लिए चुनाव लड़ रहे हैं.
बीजेपी में परिवार सहित सत्ता सुख भोगने वाले विश्वेन्द्र सिंह जैसे लोग भी कांग्रेस परचम के नीचे चुनावी जंग में मौजूद हैं. दो विपरीत विचारधाराओं वाली पार्टियों में सत्ता में आने के प्रयासों का यह खेल अनोखा है. पिछली सदी के नब्बे का दशक आते हालत ऐसे बदले कि दुनिया एक ध्रुवीय हो गई और पूंजीवाद का कोई विकल्प नही रहा तब भारत में भी विचारधाराएँ अपना अर्थ खोने लगीं. अब जब सभी राजनैतिक पार्टियाँ सिर्फ़ सत्ता में आने और उससे लाभ उठाने वालों का जमावडा बन कर रह गई हैं विचारधाराएं तिरोहित हो गयीं है तब कौन कहाँ जा रहा है यह कोई मायने नहीं रखता.

अब जब मतदान के चंद दिन ही रह गएँ हैं यदि हम चुनावी परिदृश्य पर नज़र डालें तो पाते हैं कि प्रचार में आम आदमी के सरोकारों की गूँज किसी भी तरफ़ नहीं है. कांग्रेस अति उत्साह में है कि पाँच साल पहले मतदाताओं ने जैसा सलूक उसके साथ किया था वैसा ही सलूक इस बार वे भाजपा के साथ करेंगे. उधर भारतीय जनता पार्टी पूरी तरह मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के करिश्माई व्यक्तित्व के बल बूते पर चुनावी वैतरणी पार करना चाहती है. कांग्रेस के चुनाव संचालकों ने यह तो शुरू से ही समझ लिया था कि वसुंधरा राजे के करिश्मे की चमक बरक़रार है. भले ही राजे के मंत्रिपरिषद के सदस्यों की साख धूल में मिली हुई है मगर राजे का जनता पर अपना जादू बरक़रार है. उन्होंने यह भी जान लिया कि विकास के कामों पर राजे का कार्यकाल गहलोत के शासन पर बहुत अधिक भारी पड़ेगा इसीलिए चुनाव प्रचार के पहले दिन से ही कांग्रेस भ्रष्टाचार के आरोपों का हथियार बना कर राजे की छवि को तोड़ने का प्रयास करने लगी. इसका जवाब भाजपा के पास स्वाभाविक तौर पर यही था कि वह मतदाताओं को गहलोत सरकार के वे दिन याद दिलाये जिसमे सरकारी नौकरियों पर उसके पूरे कार्यकाल तक पाबंदी रही, राज्य कर्मचारियों के भत्ते और सुविधाएँ रोक दीं गयीं और किसानों को बिजली का जबरदस्त अभाव रहा. गहलोत द्वारा अपने मुख्यमंत्री काल में हर समय पैसे की कमी होने की शिकायत करते रहने को भी भाजपा ने कांग्रेस के खिलाफ हथियार बनाया. इसके साथ ही भाजपा के चुनाव संचालकों ने केन्द्र की कांग्रेस सरकार को भी निशाना बनाया खासकर मौजूदा आर्थिक मंदी और आतंकवाद से निबटने में उसकी असफलता को.

इसे दैवयोग कहें या क्या कहें कि गहलोत सरकार के कार्यकाल में मरुप्रदेश को बहुत बुरे अकालों का सामना करना पड़ा मगर राजे सरकार के पिछले पाँच साल के दौरान मानसून अमूमन बेहतर रहा जिससे गावों में सामान्य तौर पर खुशहाली रही. सड़क, पानी और बिजली के मामले में अच्छा काम हुआ और केन्द्र की रोज़गार गारंटी योजना का राजे सरकार ने भरपूर फायदा उठाया और लोगों को काम दिया. यह भी सच है कि इस योजना के क्रियान्वयन में बहुत बड़ी गडबडी की शिकायत कहीं से नही मिली. मगर राजे मंत्रिपरिषद के सदस्य हमेशा ही भ्रस्टाचार के आरोपों से घिरे रहे. इस पूरे कार्यकाल में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं और मंत्रियों तथा राजे के बीच हमेशा कशमकश चलती रही मगर कोई भी राजे को खुल कर चुनौती नहीं दे सका. लेकिन इससे लोगों की नज़र में सरकार की छवि गिरती गई. उधर कांग्रेस की चुनावी हार के बाद अशोक गहलोत चतुराई से विपक्ष के नेता की भूमिका से दूर रहे. न तो उन्होंने विधान सभा में विपक्ष का नेतृत्व करना पसंद किया और न संगठन को सँभालने का. नए चुनाव आने तक वे ख़ुद दूर दूर रहे और दूर से ही संगठन और विधायक दल के नेता चुनने की गणित बिठाते रहे और जब नई चुनावी जंग शुरू होने का अवसर पास आने आने लगा तो वे कूद कर आगे आ गए.
जिस प्रकार गहलोत ने अपने आप को कांग्रेस के लिए अपरिहार्य बना लिया है वैसे ही वसुंधरा राजे भी भाजपा के लिए अपरिहार्य है.

राजस्थान आज जिस तरह की जाति आधारित चुनावी राजनीति में उलझ गया है वह इस प्रदेश के लिए एक नया अनुभव है. जातियों का यह खेल पिछले चुनावों के दौरान जाटों को अन्य पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में लाकर भाजपा ने शुरू किया. यह एक ऐसा जिन्न साबित हुआ जिसने हर जाति को आरक्षण के लिए राजनैतिक दबाव बनाने के लिए लामबंद होने की हूक जगा दी. इसका हिंसात्मक रूप विराट गुर्जर आन्दोलन के रूप में सामने आया. हांलाकि गुर्जर आन्दोलन का नेतृत्व बाद में
छिन्न-भिन्न हो गया मगर उसने जातियों के बीच वैमनस्य जरूर पैदा कर दिया जिसके दुष्परिणाम दूर तक भुगतने पड़ सकते हैं.

ऐसी स्थिति में हो रहे चुनावों में कोई भी पार्टी राज्य के लोगों के सरोकारों को मुद्दा बनाने से कतरा रही है. चुनाव प्रचार जब शुरू हुआ तो लगता था कही कोई मुद्दा ही नही है. फ़िर कांग्रेस भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर वसुंधरा राजे को घेरने लगी तो भाजपा नेता आतंकवाद और आर्थिक मंदी से निपटने में केन्द्र अर्कार की असफलता का मुद्दा बनाने की चेष्टा करने लगे. 28 नवम्बर को मुंबई में हुए अबतक के सबसे बड़े आतंकी हमले ने भाजपा के चुनाव संचालकों में मानो जान फूंक दी. उनके चेहरे खिल गए. अब वे आतंक के खिलाफ लोगों के गुस्से को कांग्रेस के खिलाफ और अपने पक्ष में करने में जुट गए है. आतंकवाद के खिलाफ नर्म रुख अपनाने के कांग्रेस के खिलाफ उनके आरोप को नै धार मिल गई है. बिना कोई वक्त गवांये भाजपा ने राज्य के 200 विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों में आतंकवाद के खिलाफ 28 नवम्बर को प्रदर्शन किए. हालाँकि मुंबई में आतंकी हमलों के बाद अपनी पहली प्रतिक्रिया में भाजपा के शीर्ष नेताओं ने वक्तव्य दिए कि चुनौती की इस घड़ी में वे सरकार के साथ हैं और इस पर कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए. मगर 48 घंटों में ही कांग्रेस को पीटने के लिए वे आतंकवाद को छड़ी
बना ले गए क्यों कि यह चुनाव जीतने और हारने का सवाल है. भाजपा के नेता इस बात पर भी खुश हैं कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लोग और ख़ुद उनके कार्यकर्ता जो चुनावी अभियान से बेरुखे मन से ही जुड़ रहे थे आतंकवाद का भावनात्मक मुद्दा आ जाने से उनमे उत्साह की लहर आ जायेगी.

भारतीय जनता पार्टी ने अपना घोषणापत्र मतदान के ठीक पाँच दिन पहले जारी किया है जिसमें अति गरीबों को दो रुपये किलो और अन्य गरीबों को पांच रुपये किलो गेहूं देने, किसानों का लगन माफ़ करने और उन्हें सस्ती बिजली देने और बालिका के जन्म पर उसके खाते में इतनी एकमुश्त रकम जमा कराने जिससे कि जब वह बीस बरस की हो तब उसे 50 हजार रुपये मिल जाय जैसी लोक लुभावनी बातें की गयी हैं. ऐसे वादों का घोषणापत्र मतदान के एक हफ्ते से भी कम समय पहले जारी करने के पीछे भाजपा की यही रणनीति रही है की लोग जब वोट देने जाएँ तब तक ये घोषणाएं उनके मस्तिष्क में दर्ज रहे.

राजनीति के समीक्षक शुरू से कह रहे हैं कि चार दिसम्बर को होने वाले चुनाव में सारा दारोमदार इस बात पर रहेगा कि कांग्रेस की झोली कितनी बड़ी है. अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस मतदाताओं में कितना भरोसा पैदा कर सकती है. मगर कांग्रेस के आला नेता यह भी जानते हैं कि जाटों में गहलोत के प्रति नफरत कम नहीं हुई है. गहलोत ने वरिष्ठ नेता परसराम मदेरणा को लाँघ कर मुख्य मंत्री पद हासिल कर लिया था उसके लिए वे अब भी उन्हें माफ़ करने को तैयार नहीं है.
इसीलिए कांग्रेस गहलोत को नेता के रूप में प्रतिष्ठित कर चुनाव प्रचार में नही उतरी है. मगर गहलोत के आलावा अन्य किसी को नेता के रूप में प्रोजेक्ट करके गहलोत को दरकिनार करने की हालत में भी कांग्रेस नहीं है. ऐसे दिलचस्प हालत में राजस्थान के मतदाता का रुख क्या रहेगा इसका जवाब आज किसी के पास नहीं है. दोनों प्रमुख प्रतिद्वंद्वी दलों ने अमूमन जातियों के समीकरण सामने रख कर ही अपने अपने प्रत्याशियों का चयन किया है. चुनाव में सीधी और बड़ी जीत मिल जायेगी इसके प्रति कोई दल आश्वस्त नहीं है. कांग्रेस को सत्ता विरोधी रुझान का आसरा है तो भाजपा को राजे के करिश्माई
व्यक्तित्व पर भरोसा है जो ख़ास कर महिलाओं को आकर्षित करता है. अशोक गहलोत की राजनैतिक चतुराई और राजे की दबंगता के बीच भी मुकाबला है. दोनों चुनाव प्रचार के लिए राज्य के कोने कोने में जा रहे हैं. किसका परचम आठ दिसम्बर को वोटिंग मशीनों से निकलता है यह देखना दिलचस्प होगा. इसमे चार दिसम्बर को मतदान के दिन का पार्टी प्रबंधन किसी के लिए भी निर्णायक सिद्ध हो सकता है.
(जनसत्ता में दिनांक 1.12.2008 को मुख पृष्ठ पर प्रकाशित)