Sunday, January 8, 2012

कुहरे में सना आया नया साल

राजेंद्र बोड़ा

इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक का एक और साल गुजर गया। सर्द कोहरे से ढकी सुबह ने वर्ष 2012 का स्वागत किया। राजधानी जयपुर में साल का पहला दिन धूप की गरमाहट से महरूम रहा। नया दिन सिर्फ नया कलेन्डर लेकर आया। मशहूर कवि दुष्यंत कुमार, जो हिन्दी में गजलें कहते थे, का नए साल के आगाज़ पर एक मुक्तक है “ न दुआ न सलाम दीवार से कलेन्डर उतार ले गई शाम”।

बीता साल देश और प्रदेश दोनों के लिए बहुत झमेलों का रहा। नई सुबह ऐसा कोई सकून भरा भरोसा लेकर नहीं आई कि नया साल कुछ राहत देगा। नए जमाने ने हमारे जीवन को जितना उलझन भरा बना दिया है और जिन परेशानियों से हम आज बाबस्ता हैं उससे राहत की कोई किरण नए साल की भोर लेकर नहीं आई।
जिस तरह नए साल का पहला सवेरा धुंध से भरा निकला वैसे ही हमारी परेशानियों से छुटकारे की राह भी कुहरे में खोई रही।

हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में शासन और जनता के बीच भी पहली जनवरी की सुबह की तरह ही घना कोहरा छाया हुआ है जो दोनों के बीच दूरी बना दे रहा है। एक ऐसे सूरज का इंतज़ार है जो अपनी गरमाहट से इस कोहरे को मिटा दे।
सैकड़ों वर्षों तक सामन्ती व्यवस्था में आम जन शासक के लिए होते रहे। जनता को शासन के हित में अपना सब कुछ न्यौछावर करने के लिए हमेशा तत्पर रहने के अलावा कोई चारा न था। आजादी की लड़ाई सामन्ती शासकों ने नहीं आम जन ने लड़ी इस उम्मीद के साथ आज़ादी की भोर ऐसा शासन लाएगी जो जन के लिए होगा। भारत के संविधान ने आमजन को सार्वभौम बनाया और उनके चुने हुए नुमाइन्दों के हाथ में शासन इस भरोसे के साथ सौपा कि वह जनता के प्रति उत्तरदायी होगा और वह जनता के लिए होगा। इसीलिए बच्चों को पढ़ाया जाता था कि लोकतान्त्रिक सरकार जनता की होती है “जनता द्वारा, जनता के लिए”।

आज़ादी के पहले दशक में इस कुहरे के छंटने का बड़ा भरोसा था। शाइर साहिर लुधियानवी ने गाया “जिस सुबहा की खातिर युग-युग से हम सब मर-मर कर जीते हैं/वो सुबह कभी तो आएगी”। जाँ निसार अख्तर ने लिखा “गम की अंधेरी रात में दिल को ना बेकरार कर सुबह जरूर आएगी सुबह का इंतज़ार कर”। वहीं कवि शैलेन्द्र ने ऐसी सुबह की आशा में गाया “ना भूखों की भीड़ होगी ना दुखों का राज होगा/बदलेगा जमाना ये सितारों पे लिखा है”।

लेकिन आज़ादी को मिले 65 साल होने को आए कुहरा छँटने का नाम नहीं ले रहा बल्कि और घना होता जा रहा है। नई भोर के इंतज़ार में उत्साही एक पूरी पीढ़ी गुजर गई और निराशा अपनी छाया फैलाने लगी। आम जन की निराशा में डूबा साल गुजर गया। देश और प्रदेश ने आंकड़ों में भारी तरक्की के कीर्तिमान बनाए। आमजन को बताया गया नया कि देश दुनिया के मुल्कों में कितना आगे बढ़ गया है। मगर आमजन तो अपने को वहीं का वहीं खड़ा पाता है। भारत के लोग शाश्वत आशावादी हैं। नये साल में शायद कुछ करिश्मा हो जाये।

आम जन क्या चाहते हैं? वे उससे अधिक कुछ नहीं चाहते हैं जो हमारे संविधान के आमुख में लिखा है और जिसके नाम पर जनता के सभी नुमाइंदे शपथ लेकर हम पर राज करते हैं। संविधान हमें सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचारों की आजादी हैसियत और अवसर की समानता और आत्मसम्मान से जीने का हक़ देता है। मगर जैसी व्यवस्था हो चली है उसकें चलते यह सब कुछ ताकतवर लोगों के लिए मुहैया है। यह ताकत सत्ता की हो सकती है, पैसे की हो सकती है, बाहुबल की हो सकती है। इन्हीं ताकतों के समूह अपने लिए और अपनों के लिए सरकार से उपकृत होते रहते हैं। जनता के नुमाइंदे भी उन्हीं के होकर रह जाते हैं। इन सभी को भ्रष्टाचार पर टिकी व्यवस्था माफिक आती है। इसीलिए सड़कों पर जब भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई मुहिम छिडती है तो विधायिका उससे विमुख हो कर खड़ी हो जाती है। एक तरफ राज में बैठे लोग शासन में आमजन की भागीदारी की दुहाई देते नहीं थकते मगर वे जनता की आवाज़, उसकी अपेक्षाओं उसकी आकांक्षाओं पर उनके कान पर जूं भी नहीं रेंगती। आर्थिक नीतियां बड़े घरानों के लिए बनती है। गरीब आमजन के लिए एक सामान्य सा स्कूल जहां पूरे शिक्षक हों जो पूरी पढ़ाई कराते हों, इलाज के लिए एक सामान्य सा अस्पताल हो जहां डॉक्टर समय पर मिलते हों और इलाज तथा दवा में जेब नहीं काटते हों हरेक के लिए सामान्य रोजी रोटी की व्यवस्था हो इससे अधिक की चाह भी नहीं है। ये छोटी जरूरतें पूरी नहीं होती मगर बड़े पाँच सितारा पब्लिक स्कूल, निजी अस्पताल और बड़े-बड़े मॉल के लिए सरकार तत्पर रहती है। अपनी झोपड़ी का सपना ही रह जाता है क्योकि बड़े बिल्डर हमारे नुमाइंदों को अपने जेब में रखने का दावा करते हैं। ऐसे में नया साल कोई नई सौगात लेकर आ भी कैसे सकता है।

(यह आलेख 'प्रेसवाणी' के जनवरी 2012 अंक में छपा)