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कुहरे में सना आया नया साल

राजेंद्र बोड़ा इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक का एक और साल गुजर गया। सर्द कोहरे से ढकी सुबह ने वर्ष 2012 का स्वागत किया। राजधानी जयपुर में साल का पहला दिन धूप की गरमाहट से महरूम रहा। नया दिन सिर्फ नया कलेन्डर लेकर आया। मशहूर कवि दुष्यंत कुमार, जो हिन्दी में गजलें कहते थे, का नए साल के आगाज़ पर एक मुक्तक है “ न दुआ न सलाम दीवार से कलेन्डर उतार ले गई शाम”। बीता साल देश और प्रदेश दोनों के लिए बहुत झमेलों का रहा। नई सुबह ऐसा कोई सकून भरा भरोसा लेकर नहीं आई कि नया साल कुछ राहत देगा। नए जमाने ने हमारे जीवन को जितना उलझन भरा बना दिया है और जिन परेशानियों से हम आज बाबस्ता हैं उससे राहत की कोई किरण नए साल की भोर लेकर नहीं आई। जिस तरह नए साल का पहला सवेरा धुंध से भरा निकला वैसे ही हमारी परेशानियों से छुटकारे की राह भी कुहरे में खोई रही। हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में शासन और जनता के बीच भी पहली जनवरी की सुबह की तरह ही घना कोहरा छाया हुआ है जो दोनों के बीच दूरी बना दे रहा है। एक ऐसे सूरज का इंतज़ार है जो अपनी गरमाहट से इस कोहरे को मिटा दे। सैकड़ों वर्षों तक सामन्ती व्यवस्था में आम जन शासक क