Wednesday, December 28, 2011

झगड़े की जड़ 'फिट टू सेल'

राजेंद्र बोड़ा

पत्रकारों का मीडियाकर्मी बनने का सफर बहुत पुराना नहीं है। वैसे ही जैसे प्रेस का मीडिया में तब्दीली का सफर। इक्कीसवीं सदी की दहलीज़ से शुरू हुए इस सफर को बहुत देर नहीं हुई है। लेकिन छोटे से सफर में ही पत्रकारिता और पत्रकारों का बहुत कुछ बदल गया है।

जब तक पत्रकारिता थी तब तक प्रेस थी, तब तक अख़बार थे, तब तक छपे हुए शब्द थे। तब भले ही अख़बार छोटे होते थे परंतु उनके संपादक बहुत बड़े होते थे। अख़बार से 'प्रिन्ट मीडिया' बन गए समाचार पत्र अब बहुत बड़े होने का दावा करने लगे हैं। लाखों में अपनी प्रसार संख्या के बूते पर वे यह दावा दम ठोक कर करते हैं। इस सफर में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने भी धमाकेदार शुरुआत की जिसकी होड़ में प्रिन्ट मीडिया भी पढ़ने के साथ देखने वाला उत्पाद बन गया।

पत्रकारिता जब बाज़ार का उत्पाद बन जाये तब अख़बार और टीवी चैनलों के दर्शक सभी सिर्फ ग्राहक होते हैं जिनकी जरूरत उत्पादनकर्ताओं के लिये केवल मुनाफा कमाने के लिए होती है। मीडिया का संचालन बाज़ार की ताक़तें करने लगे तब अभिव्यक्ति की आज़ादी, लोकतान्त्रिक सिद्धांत, मानवीय अधिकारों की रक्षा और एक खुले और स्वतंत्र समाचार माध्यम की बातें करना बेमानी हो जाता है।

अखबार को कारोबार मानने से समस्या पैदा नहीं हुई बल्कि खबर को कारोबार की वस्तु बना देने से आज की स्थिति पैदा हुई है। पहले भी अखबार कारोबार था मगर उससे मुनाफा कमाना उन्हें निकालने वालों का पहला उद्धेश्य नहीं हुआ करता था। अखबार उनके लिए प्रतिष्ठा की चीज थी। तब केवल दौलत किसी की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ाती थी। मगर पूंजीवाद के आज के युग में ये जीवन मूल्य बादल गए है। आज पैसा ही एकमात्र प्रतिष्ठा की चीज बन गया है। आज की नयी धनाढ्य पीढी जिनके हाथों में अखबारों की नकेलें हैं वे बाजारवाद की उपज हैं जिनके लिए पैसा ही प्रतिष्ठा है, पैसा ही ताकत है. इसे पाने के लिए वे ख़बर का भी सौदा करने को तत्पर रहते हैं।

इन लोगों के लिए ‘न्यूज़’ या ‘समाचार’ भी एक उत्पाद है। इस उत्पाद को तैयार करने और उसके वितरण में उनके हिसाब से बाज़ार के वही सारे आर्थिक सिद्धांत काम करते हैं जो अन्य औद्योगिक माल के उत्पादन पर लागू होते हैं। अमरीका के फेडरल कम्युनिकेशन्स कमीशन के चेयरमैन थे मार्क फ्राद्लर। उनका कहना था "बाज़ार में लोगों की जैसी पसंद होती हैं उसी से मीडिया के कंटेंट निकलते हैं”। इसका अर्थ यह हुआ कि जिस प्रकार बाज़ार में ग्राहक की पसंद के हिसाब से उत्पाद आते हैं वैसे ही मीडिया का कंटेंट (विषय वस्तु) भी आएगा। वे यह भी कहते हैं कि “जनता की रुचियाँ ही जनहित को परिभाषित करेंगी”।

मगर हमें यहाँ यह नहीं भूल जाना चाहिए कि खुले बाज़ार में लुभावनें प्रचारों के जरिये जनता की रुचियाँ बनाई और बिगाडी जाने का खेल बड़े पैमाने पर चलता है।

ऐसी ही बाज़ार की शक्तियों के चलते आज अख़बारों में क्या हो रहा है ? अख़बारों के समाचार कक्षों में एक अच्छी 'कॉपी' (ख़बर) किसे मानते हैं? वह कॉपी जो लालच, बेवकूफी, और षडयंत्र की कहानी कहती हो। संपादकीय कक्षों में माना जाता है कि चटपटी ख़बरों से ही अख़बार को अधिक पाठक मिलेंगे।

कुछ समय पहले जेम्स टी. हेमिल्टन का अध्ययन पुस्तक के रूप में आया। यह अपने प्रकार का दुनिया में पहला अध्ययन है। इसका शीर्षक है 'हाउ द मार्केट ट्रांसफार्म्स इन्फोर्मेशन इन्टू न्यूज़'। हेमिल्टन कहता है: "खबरें बाज़ार की ताकतें बनती हैं और ख़बरों (जिसे बाज़ार की भाषा में इन्फोर्मेशन गुड्स कहते हैं) के स्वरुप का निर्धारण अर्थतंत्र करता है।"

आज तेजी से बढ़ते अखबार अपने संपादकों को सिखा रहे हैं कि वे अपने पाठक को पहचानें। अखबारों के नए नियंताओं की निगाहों में उन पाठकों का कोई मोल नहीं जिनकी जेब में बड़े बाजारों में – मॉल्स - में खर्च करने के लिए अतिरिक्त पैसा नहीं है। संपादकों को यह सिखाया जा रहा है कि आप उन पाठकों को लक्ष्य करें जो रंगीन टीवी, फ्रिज, कारें वगैरा खरीद रहें हों। यदि बाज़ार के ऐसे खरीददार और आपके पाठक एक होंगे तो ही अखबार को बड़े विज्ञापन मिलेंगे। हर साल जब पाठक सर्वे की रिपोर्ट आती है तो अख़बारों में सबसे पहले यही देखा जाता है कि किस अखबार में "हैसियत" वाले पाठकों की संख्या कितनी रही है।

आम चुनाव का मौसम आता है तब भी वह समय होता है जब कईं अखबार ख़बरों के कारोबार में उतर आते हैं। राजनैतिक पार्टियों और उम्मीदवारों से उनके विज्ञापनों का ही सीधा सौदा नहीं होता बल्कि ‘न्यूज़ कालम’ में छपने वाली विज्ञप्तियों को स्थान देने के लिए भी मोल तय किया जाता है। ऐसे सौदों में पार्टियों का हाथ मरोड़ने के लिए ‘ख़बरों’ को ही हथियार बनाया जाता है।
अभी तक आम लोगों का भरोसा अखबार में छपी ख़बरों पर बना हुआ है इसलिए वे उन पर भरोसा कर लेते हैं और उन्हें पता ही नहीं लगता कि चुनावी कवरेज के नाम पर जो छाप रहा है उससे वे ठगे जा रहे हैं।
पत्रकारिता जगत में एक पुरानी कहावत है जो कभी हर पत्रकार की ज़ुबान पर रहती थी: "फेक्ट्स आर सेक्रेड, इंटरप्रेटेशन इज माइन"- तथ्य पवित्र हैं मगर उनकी व्याख्या मेरी है। तब अखबारी दुनिया में कहा जाता था "न्यूज़ देट इज फिट टू प्रिंट"। मगर आज के अखबार शायद कहते हैं "न्यूज़ देट इज फिट तो सेल"।

यह "फिट टू सेल" सारे झगडे की जड़ है। अखबार पाठकों के लिए नहीं बाज़ार के लिए हो चले हैं। बार बार कहा जाता है कि बाज़ार के भी " मूल्य" होते हैं। मगर बाजारों के उतार-चढाव और घोटालों ने बार-बार यही चेताया है कि बाज़ार का कोई मानवीय चेहरा नहीं होता। दिलचस्प बात यह भी है कि मीडिया ने बड़ी-बड़ी चीजें उजागर कीं है मगर बाज़ार की तरफ अपनी खोजी निगाह कभी नहीं की। बाज़ार से उपकृत होते हुए वह कर भी कैसे सकता है।

इन दिनों अख़बारों के ‘कंटेंट’ (विषय वस्तु) संपादक नहीं ‘ब्रांड मेनेजर’ तय करते हैं। वे पत्रकारिता और मनोरंजन के बीच की सीमा रेखा को मिटा दे रहे हैं। ब्रांड मेनेजर अखबारों का कलेवर तय करते हुए बताते हैं कि सुबह-सुबह पाठक अखबार में क्या देखना चाहते हैं। वे संपादक से यह भी अपेक्षा करते हैं कि रोज अखबार में कम से कम एक ऐसी चटपटी खबर अवश्य हो जिसकी शहर में दिन भर चर्चा होती रहे। ख़बरों को चटपटा बनाने के लिए ऐसे मसाले डाले जाते हैं जिनका तथ्यों से कोई लेना-देना न हो। ख़बरों में ऐसी मिलावट की आदतें पत्रकारिता को जन सरोकारों से दूर ले जाती है। अख़बारों के नए नियंताओं ने यह भी साध लिया है कि किस प्रकार पाठकों को ऐसे चटपटे मुद्दों पर भटका कर रखा जाय कि वे असली मुद्दों को बिसरा दें।

पाठकों के बारे में किसी की टिपण्णी है "रीडर इज नॉट अ किंग। ही इज अ नाइस हिप्पोक्रेट (पाठक कोई शहंशाह नहीं है। वह एक अच्छा पाखंडी है)।" मुक्त बाज़ार जो दिशा देता है अखबार उसी पर चलते हुए जो सामग्री परोसता है वह कईं बार खूब रस लेकर पढ़ी जाती है। पाठक एक तरफ तो ऐसी सामग्री मजे लेकर पढता है और वही बाद में यह आलोचना भी करता है कि अखबार में गंभीरता नहीं रही या वह चलताऊ हो गया है।

इतना सब होते हुए भी सब कुछ ख़त्म नहीं हो गया है. अखबार के सामाजिक सरोकारों की पैरवी करने वालों और उन सरोकारों को अभिव्यक्ति देने वाले संपादकों की कमी नहीं है।

पाठकों की भागीदारी या दबाव अखबारों को सही रास्ते पर चलने पर मजबूर कर सकता है। मगर उसके लिए पाठक को भी अपनी भूमिका के बारे में सोचना होगा कि क्या वह एक अच्छे अखबार के लिए उसके वाजिब दाम देकर खरीदने को तैयार है ? यदि वह मुफ्त में या नाम मात्र के दाम पर अखबार चाहता है तो उसे वही मिलेगा जो बाज़ार चाहेगा क्योंकि लागत और बिक्री मूल्य के बीच का अंतर वही भर रहा है।

(यह आलेख प्रेसवाणी के दिसंबर 2011 के अंक में प्रकाशित हुआ)

Saturday, November 26, 2011

सात पीढ़ियों के लिए इंतजाम

राजेंद्र बोड़ा



सारा मीडिया जगत इस बात के इंतजाम करता है कि हम उसकी इस सूचना से इतराएँ कि भारतीय व्यापार और उद्योग की हस्तियां विश्व के सबसे अधिक अमीरों की सूची में स्थान पा रहीं हैं। ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि नई अर्थ व्यवस्था के चलते देश की संपन्नता में इजाफा हो रहा है जिसके लिए सभी को उत्सव मनाना चाहिए।

यह सच है कि दुनिया के अमीरों की सूची में शीर्ष स्थानों पर भारत के लोगों के नाम आने लगे हैं और सरकारी तंत्र से जुड़ा, खास कर शहरी इलाकों का, मध्यम वर्ग का एक तबका छठे वित्त आयोग की सिफ़ारिशों के हिसाब से वेतन पाने से वित्तीय संपन्नता से सरोबार हो रहा है और वह विलासिता की चीजों पर खर्च को बढ़ा कर बाज़ार की अपेक्षाओं को पूरा कर रहा है। गावों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना का पैसा पहुंचाया जा रहा है जिससे बाज़ार को मदद मिलती रहे।

बाज़ार को साध लेने वाला और उसी का होकर रह जाने वाला आज एक पुराने मुहावरे के अनुसार “सात पीढ़ियों का सामान” कर रहा है। आज जिस प्रकार से धन कमाने की लोलुपता बढ़ती जा रही है वह इस मुहावरे को अर्थहीन कर रही है। पहले एक व्यक्ति अपनी आने वाली सात पीढ़ियों के लिए सामान करता था वहीं आज बड़े कार्पोरेशन और बैंक व्यक्तियों के समूहों के लिए सात पीढ़ियों का सामान कर रहे हैं। और ऐसा वे आम जन की जेबें खाली करवा कर करते हैं। गोल्डमेन साक्स का उदाहरण हमारे सामने है। यह बहुराष्ट्रीय कंपनी अब ‘फूड कोमोडिटी’ के काम में लग गई है। जिस बड़े पैमाने पर यह कंपनी सट्टे बाज़ार में उतरी है और उसका खेल खेल रही है उसने दुनिया भर में खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ा दिये है जिसके नतीजे के फलस्वरूप दुनिया में भूख और गरीबी का दानव और विकराल हो गया है।

बाज़ार का खेल खेलने वाली कंपनियाँ पूंजीवादी व्यवस्था की हिस्सा होती है। इसीलिए उसी व्यवस्था के हिसाब से व्यवहार करती है। मुनाफे का अंबार लगाने के लिए लगे रहना इस व्यवस्था की फितरत होती है। पहले व्यक्ति शोषण करता था। अब पूंजीवादी व्यवस्था शोषण का संगठित औज़ार मुहैया करती है। पूंजीवादी व्यवस्था का सबसे बड़ा नियम होता है हर चीज उत्पाद होती है और हर उत्पादन मुनाफा कमाने के लिए होना चाहिए। उसके लिए हर चीज बिक्री के लिए होती है और क्या चीज बनाई जायेगी इसका निर्धारण समाज की आवश्यकता के अनुरूप नहीं होता। उसकी प्रेरणा मुनाफा होती है। इसीलिए मुनाफे की जरूरत के अनुरूप ही उत्पादन होता है। किसी उत्पाद की आवश्यकता उससे होने वाले मुनाफे से ही आंकी जाती है।

बाज़ार के आकर्षण ने समाज में कुछ ऐसा माहौल बना दिया है जिसमें हर एक को लगता है कि पैसे से ही काम होता है और अमीर होने के लिए सिर्फ पैसे की जरूरत होती है। यहां तक कि पूंजीवादी व्यवस्था में सामाजिक रिश्ते भी पैसे की तराजू पर तुलते हैं। बाज़ार यह याद नहीं आने देता कि धन से खुशियां नहीं खरीदी जा सकती। धन से सूचना मिल सकती है ज्ञान नहीं। धन किसी को मकसद नहीं देता, उसे पाना ही मकसद बन जाता है। बाज़ार निर्मित इसी भ्रम में मानवीय मूल्य तिरोहित हो जाते हैं। व्यक्ति स्वकेंद्रित हो जाता है। बाज़ार यह भ्रम भी देता है कि वह व्यक्ति को चुनने की स्वतन्त्रता देता है। इस प्रकार पूंजीवाद एक ऐसा मायाजाल रचता है जिसमें मानव को अपना उत्कर्ष लोभ, लालच और अधिक से अधिक धन संग्रह करने की प्रवत्ति में लगने लगता है।

दिलचस्प बात यह है कि पूंजीवाद को अपने पालन और विस्तार के लिए राज्य सत्ता की आवश्यकता होती है। यही कारण है पूंजीवादी वर्ग सत्ता पर येन केन प्रकरेण सत्ता पर अपना प्रभुत्व बनाए रखता है। विश्व में जब से एक ध्रुवीय व्यवस्था हो चली है पूंजीवाद का शिकंजा और अधिक मजबूत हो चला है। अब राज्य खुले रूप से ऐसी अर्थ व्यवस्था के पोषण और विस्तार के लिए काम करता है जो समूचे समाज को पूंजीवाद के रंग में रंग देना चाहती है।

राज्य की इस भूमिका को हम बहुत साफ देख सकते हैं। जब कभी यह अर्थ व्यवस्था गंभीर संकट में आती है राज्य उसे बचाने के लिए तुरंत उपाय करता है। उसे संकट से उबारने के लिए राज्य जो उपाय करता है उसकी कीमत समूची मानवता को चुकानी पड़ती है जिससे सबसे अधिक गरीब कुचला जाता है।

पूंजीवाद का प्रादुर्भाव औद्योगिक सभ्यता के साथ हुआ। जब उत्पादन संगठित क्षेत्र में होने लगा और अधिकतम मुनाफे के लिए श्रम का शोषण एक जरूरत बन गई। इसी के साथ आधुनिक अर्थशास्त्र स्वतंत्र विषय के रूप में स्थापित हुआ। इससे पहले अर्थशास्त्र दर्शन शास्त्र का ही हिस्सा हुआ करता था। तब अर्थ के साथ जीवन के नैतिक सबब की बात भी होती थी। जीवन का नैतिक सबब खुशी पाना होता है। हर एक के अपने जीवन मूल्य होते हैं जिन्हें पाना सच्ची खुशी होती है। पूंजी की व्यवस्था इस खुशी को बाज़ार के हित में परिभाषित करती है।

जीवन दर्शन से अर्थ को अलग करके पूंजीवाद के समर्थकों ने पश्चिम में उसे व्यक्तिवादी बना दिया। धर्म जो समाज में ‘सम’ की अवधारणा पुष्ट करता था उसे भी नए पूंजी समर्थित अर्थशास्त्र ने संकुचित कर मुनाफे के लिए व्यवसाय बना दिया। उसे प्रतिस्पर्धी बना दिया। यहां तक कि इस युग में खुद पूंजीवाद एक प्रकार का धर्म बन गया है।

पहले के धर्म कहते थे अपने लिए नहीं दूसरे के लिए जियो। दूसरे की मदद करो। जीवन का मकसद सच्ची खुशी वह होती है जो दूसरे के चेहरे पर मुस्कराहट लाने से मिलती है। मगर आज का पूंजीवाद का धर्म कहता है जो करो अपने के लिए करो। अपना हित साधना ही सर्वोच्च मूल्य है। इसमें धन को बढ़ाने की लालसा, लोभ, और लालच कोई बुरी बात नहीं है। पहले जो-जो जीवन मूल्य अवगुण माने जाते थे वे ही आज मानव के लिए श्रेष्ठ गुण बन गए हैं।

लोकतन्त्र में सरकारें भले ही उनके बहुमत से चुनी जाती हो जिनका पूंजी शोषण करती है मगर निर्वाचित प्रतिनिधि पूँजीपतियों की जेब में ही रहते हैं और उन्हीं के कार्य साधते हैं और सरकारें आम जन की होकर भी गणशत्रु के रूप में प्रस्तुत होने लगतीं हैं। उसकी सारी नीतियां और सारे कार्यक्रम “जनहित” के लिए होते हैं। बाज़ार को बढ़ावा भी जनहित के नाम पर ही दिया जाता है।

इतना पैसा कमाने के लिए कि सात पीढ़ी का जतन हो जाये लालच, लोभ और वैसी ही महत्वाकांक्षा की जरूरत होती है। नई अर्थ व्यवस्था की नीतियां इसके लिए नैतिक आधार देती है, भरमाती हैं। संचार के माध्यम व्यवसायजनित होकर मुनाफे के लिए होते हैं इसलिए वे सारा जतन यह करते हैं कि किस प्रकार व्यक्ति को इसके लिए लुभाया जाय। वे लोगों के इस भरोसे का फायदा उठाते हैं कि संचार के माध्यम व्यावसायिक होने पर भी उनकी बात करते हैं, उनकी आवाज होते हैं और उनके लिए लड़ते हैं। वास्तव में वे राज्य की भूमिका के बारे में कोई गंभीर और गहरे सवाल नहीं उठाते आयें और न ही ऐसी कोई बहस छेड़ने में रुचि दिखाते हैं। सतही मुद्दों पर जोरदार बहस प्रस्तुत कर अपने जनहितकारी होने का ढोंग वे जरूर रचते हैं।

पूंजी की शक्तियां आज विजेता है और गरीब की हालत बद से बदतर हो रही है। एक व्यक्ति राष्ट्रीय संपत्ति का जो हिस्सा अपनी अमीरी के इजाफे के लिए लेता है वह ऐसा किसी न किसी को गरीब करके ही करता है। गरीब का जब धीरज खत्म होता है तो वह अपराध की और प्रवत्त होता है। ऐसे में उस गरीब का शोषण कभी आतंकी राजनैतिक विचारधारा के पोषण के लिए तो कभी संकीर्ण धार्मिक प्रसार के लिए होने लगता है। ऐसे माहौल में खुशी पाने का जीवन का नैतिक सबब मृग मरीचिका बन जाता है क्योंकि जब चारों ओर दुख का वातावरण हो तब कोई अपनी अट्टालिका में बैठा खुशी कैसे पा सकता है।

पूंजी आज इस हद तक सफल है कि सारे ही राजनैतिक दल अपनी मूल विचारधाराओं से च्युत होकर सत्ता पाने की होड में लगे हैं ताकि उनके नायक अपनी सात पीढ़ियों के लिए धन संचय कर सकें। राजनीति में लोग जन सेवा के लिए नहीं अपनी और अपनों की सेवा के लिए आते हैं। लोकसेवा का तंत्र इन्हीं नायकों के लिए होकर रह गया है। संविधान का आमुख और उसके प्रावधान कागजों पर रह गए हैं। संविधान के नीति निर्देशक तत्वों को तो पूरी तरह भुला दिया गया है। आज के बच्चों से पूछें कि संविधान के दस्तावेज़ में नीति निर्देशक तत्व भी शामिल हैं, क्या वे जानते हैं? तो इसका जवाब उनकी आँखों के सवालिया निशान ही होगा।

(प्रेसवाणी के नवंबर 2011 के अंक में प्रकाशित आलेख)

Thursday, July 28, 2011

कराख रो तो जल भलो: मगर जल से रिश्ता फिर कैसे बने

राजेन्द्र बोड़ा

सदियों से राजस्थान के लोग पानी की कमी का सामना करते रहे हैं। एक तो यहां का गर्म जलवायु, दूसरी तरफ वर्षा की हमेशा कमी और तीसरे कोई बारहमासी नदी नहीं होना। साथ ही बड़ा भू भाग रेगिस्तानी या अर्द्धशुष्क। मगर प्रकृति से मिली ऐसी कठोर परिस्थितियों में भी यहां जो कला, संस्कृति, तथा जीवन शैली पल्लवित हुई और मानवीय मूल्यों का विकास हुआ वह अनोखा है। यहां के लोगों ने प्राकृतिक विपदा में भी अपने जीवन को उत्सव बनाया। अपने अनुभवों से उन्होंने प्रकृति से सहकार करना सीखा और पीढ़ी दर पीढ़ी अपने अनुभवों से नया ज्ञान पाने और उसे आगे बढाने की परंपरा डाली। जहां वर्षा के देवता इंद्र की मेहरबानी कम होती हो वहां संस्कृति, सामाजिक ढांचा और परंपरा कम पानी में गुजारा करना सिखाते हैं और वैसे ही मानवीय मूल्य प्रतिष्ठित करते हैं। राजस्थान के लोगों ने कभी पानी की कमी का रोना नहीं रोया। जितना प्रकृति ने दिया उसी को प्रसाद मान कर शिरोधार्य किया। हालांकि पानी की कमी से होने वाली मानवीय तकलीफें यहां के लोक गीतों और संगीत में गूंजी मगर वे दुःख के नहीं उत्सव के स्वर थे।

महाभारत युद्ध जब समाप्त सोने को होता है तब का एक प्रसंग लोक कथाओं में आता है। कहते हैं इस रेतीली धरती के लोगों को श्रीकृष्ण ने वरदान दिया कि उनके यहां कभी जल का अकाल नहीं रहेगा। यहां के लोगों ने अपने परिश्रम और बुद्धि से कृष्ण के उस वरदान को झूठा नहीं होने दिया। उन्होंने गांव-गांव, शहर-शहर वर्षा के जल को सहेज कर रखने के खोजे और उन्हें व्यावहारिक स्तर पर अपनी जीवन शैली का अंग बनाया। इसमें सबसे बड़ी खूबी यह थी कि मरू भू-भाग के भिन्न-भिन्न अंचलों में वहां की परिस्थितियों के अनुकूल जल संरक्षण की तकनीकें खोजी गईं और अपनाई गईं। आज जैसा नहीं हुआ कि कोई एक किताबी तकनीक सब जगह प्रचलित कर दी गई हो।

एक लोक कथा मारवाड़ में प्रचलित है जिसमें एक ज्ञानी और एक सरल ग्वाले के बीच संवाद है। ज्ञानी कहता है :

सूरज रो तो तप भलो/नदी रो तो जल भलो
भाई रो तो बल भलो/ गाय रो तो दूध भलो
चारूं बातों भले भाई/ चारूं बातों भले भाई

ज्ञानी रेगिस्तान में नदी की – किताबी ज्ञान – की बात करता है। रेगिस्तान में कभी नदी रही होगी यह किताबी ज्ञान है। उसका मरू प्रदेश के लोगों के जीवन में आज क्या महत्व। उसकी और बातें भी ऐसे ही किताबी है।

सीधा-सरल ग्वाला उत्तर देता है:

आंख रो तो तप भलो/कराख रो तो जल भलो
बाहु रो तो बल भलो/मां रो तो दूध भलो
चारूं बातों भले भाई/ चारूं बातों भले भाई

वह कहता है आंख रो तो तप भलो याने जीवन में अनुभव ही काम आता है। पानी कराख का मतलब कंधे पर लटकी सुराही का, बल अपनी भुजा का ही काम आता है। और दूध तो मां का ही श्रेष्ठ होता है।

मरुस्थल के सीधे सरल लोगों ने अपने अनुभव से जो सीखा उसे परंपराओं ने आगे बढ़ाया कि वर्षा के पानी की एक-एक बूंद कैसे सहेजी जाये और कैसे पानी के साथ खिलवाड़ नहीं किया जाये। एक छोटा सा उदाहरण इसे प्रमाण देता है। पहले जब जमीन पर बैठ कर भोजन करते थे तो पास में पड़े पानी के लोटे के ठोकर नहीं लग जाये इसकी सीख बार-बार बच्चों को दी जाती थी।

किताबी ज्ञान और अनुभव के तप में क्या फर्क है यह जानने के लिए मरुस्थल की जल संरक्षण की परंपराओं को देखना होगा। हमारा सारा आधुनिक किताबी ज्ञान हमें सबक देता है “बहता पानी निर्मला”। साफ और स्वस्छ पानी वही होता है जो बहता हुआ होता है। ठहरा हुआ पानी गंदा होता है।

मगर मरू समाज का परम्परागत जल संरक्षण का सैकड़ों वर्षों का इतिहास – अनुभव, या कहें आँख का तप, ठहरे पानी का गंदे होने का किताबी ज्ञान झुठला देता है। वर्षा के पानी को – जिसे मरू वासियों ने पालर पानी का नाम दिया – ठहरा कर कुई में, टांके में खडीन में, नाड़ी में सहेज कर अगली वर्षा होने तक अपना काम चलाया।

वैज्ञानिक कहते हैं कि मानव सभ्यता के ऐतिहासिक प्रमाणों की गणना के हजारों वर्ष पहले आज का जो मरू भूभाग है वहां कभी समंदर ठाटे मारता था। अनोखी बात यह है कि उस विशाल जल फैलाव “हाकड़ो” की स्मृति आज भी जन मानस में है। इसका जवाब वैज्ञानिकों के पास नहीं है कि हाकड़ो के सूख जाने के बाद यहां सभ्यता पनपी तो समंदर जन मानस की स्मृति में कैसे आया? डिंगल भाषा में समुद्र या सागर और उनके दर्जनों पर्यायवाची शब्द आते हैं।

सागर की अपनी इस स्मृति का जिक्र यहां की लोक कथाओं या लोक गीतों में विछोह के रूप में नहीं आता है। प्रकृति से शिकायत के तौर पर नहीं आता है। एक ऐसे सपने और विश्वास की तरह आता है कि फिर हाकड़ो का अस्तित्व बनेगा और संपन्नता आएगी :

हक कर बहसे हाकड़ो, बंद तुट से अरोड
सिंघड़ी सूखो जावसी, निर्धनियों रे धन होवसी
उजड़ा खेड़ा फिर बससी, भागियो रे भूत कमावसी
इक दिन ऐसा आवसी।

शोधकर्ता भले ही पिछले सौ बरसों से यह जानने की माथापच्ची करते रहें हों कि हाकड़ो समुद्र था या नदी थी। यदि नदी थी तो सिंधु नदी से या वैदिक सरस्वती नदी से उसका क्या संबंध बनाया जाय। मगर मरुस्थल के वासियों के मनों में हाकड़ो एक ऐसी याद है जिसके सहारे उन्होंने अपनी परिस्थितियों के अनुरूप पानी के संरक्षण की ऐसी जुगत की जो परंपराओं से निखरती गई।

मगर हमारा यह लोक-ज्ञान स्कूल कॉलेजों की किताबों में स्थान नहीं पा सका। देश के आज़ाद होने के बाद भी ‘लोक’ को हिकारत से पिछड़े की तरह देखा गया और नई पीढ़ियों को जो किताबों में पढ़ाया गया उसने हमारी इस लोक परंपरा की इबारत को पोंछ डाला। विकास की आधुनिक पाश्चात्य अवधारणा ने आज़ादी के बाद धीरे-धीरे उन सब परम्परागत जल संरक्षण की व्यवस्थाओं को नष्ट कर दिया और मरुस्थल को गरीब बना दिया। किफायत पर लालच हावी हो गया। यहां पर वे सब प्रयास किए गए जो यहां की माटी और प्रकृति के अनुरूप नहीं थे। प्रकृति पर विजय पा लेने के विचार का दंभ था।

वर्ष 1950-51 में पश्चिमी राजस्थान की करीब 78 लाख हेक्टेयर भूमि पर खेती होती थी। इसमें से 363 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में खेती सिंचाई से होती थी जो अधिकतर उसे उत्तरी भाग में नहरों से होती थी। शेष खेती वर्षा पर आधारित थी। खेती के लिए भूमिगत जल का उपयोग बहुत कम था जो क्यों कि तब बिजली या डीजल से चलने वाले पंप नहीं थे।
यह दृश्य पिछली सदी के सत्तर के दशक के शुरू में तब बादल गया जब सरकार ने ग्रामीण विद्युतिकरण को जबर्दस्त बढ़ावा देना शुरू किया। यह वह समय था जब पड़ोसी पंजाब में हरित क्रांति का परचम फैल रहा था। आधुनिक किताबी ज्ञान ने नीति निर्माताओं और निर्वाचित कर्णधारों ने मरू भूमि में भी ऐसी ही हरित क्रांति कर देने का सपना जगाया। वर्ष 1980 के आते राज्य का कृषि क्षेत्र बढ़ कर 10.09 मिलियन हेक्टेयर हो गया जिसमें से 1.39 मिलियन हेक्टेयर सिंचित क्षेत्र हो गया। वर्ष 2005 तक कुल कृषि क्षेत्र तो मामूली बढ़ कर 10.94 मिलियन हेक्टेयर हुआ मगर सिंचित क्षेत्र बढ़ कर 2.77 मिलियन हो गया। कह सकते हैं कि राजस्थान नहर जो आई। लेकिन राज्य के कुल सिंचित क्षेत्र का 43 प्रतिशत ही नहरी तंत्र से सिंचित होता है जबकि 57 प्रतिशत सिंचाई बिजली और डीजल से चलने वाले ट्यूबवैलों से पानी खींच कर भूगर्भ से होने लगी। इफ़रात की इस सिंचाई पद्धति में अच्छे प्रबंधन पर भी ध्यान देने की जरूरत नीति निर्माताओं ने नहीं समझी। आज राज्य में उपलब्ध पानी का 94 प्रतिशत उपयोग खेती के लिए होता है। पीने के पानी या घरेलू उपयोग के लोए पानी की खपत केवल चार प्रतिशत है।

प्रकृति ने इस धरती को कभी कृषि के लिए उपयोग में लाने की मंशा नहीं जताई। इसके बदले उसने यहां के लोगों के लिए चरागाहों, घनी झाड़ियों और बीच-बीच में ऐसे जंगलों की व्यवस्था की जहां विभिन्न प्रजाति के पेड़ों की सौगात दी जो रेत के धोरों को थामे रख सके। खेजड़ी, बबूल, कैर नीम, जाल, और बोरडी जैसे पेड़ों ने न केवल यहां प्राकृतिक दृश्यों की छटा बढाई बल्कि इंसान और जानवर दोनों के लिए उपयोगी भी बने। यहां प्रकृति ने जो बहुतायत में घास दी वह भरपूर पोषण करने वाली थी। मामूली पांच इंच वर्षा में वह पनप जाती है।

मगर सारे आगोर, चरागाह और घास की भूमि आधुनिक विकास की भेंट चढ़ गई। कृषि के अप्राकृतिक ज़ोर से भूमि के गर्भ के पानी का ऐसा दोहन शुरू हुआ कि आज पीने के पानी की त्राहि-त्राहि मची हुई है। जिस सीमा तक भूगर्भ का जल स्तर नीचे चला गया है। उसका सामान्य वर्षा से पुनर्भरण असंभव है।

आधुनिक विज्ञान के समझदार विशेषज्ञ अपने नए अध्ययनों में इस प्रकृति विरोधी विकास को रेखांकित करते रहे हैं। वे यहां घनी सिंचाई की व्यवस्था को रोकने, भूमि को कृषि से मुक्त करने, उसकी जगह फलों के बगीचे लगाने, पशुपालन को बढ़ावा देने, ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत काम में लेने, और राजस्थान नहर के तंत्र को पीने के पानी के लिए उपयोग में लेने का सुझाव देते हैं। इसी के चलते तत्कालीन राजस्थान नहर मंत्री नरेन्द्र सिंह भाटी ने राजस्थान नहर परियोजना के दूसरे चरण में क्रांतिकारी बदलाव लाने के प्रस्ताव का एक नोट तैयार करके सार्वजनिक तौर पर जारी किया था। भाटी मारवाड़ क्षेत्र के ओसियां से विधानसभा में निर्वाचित सदस्य थे। उनका यह नोट पर आधुनिक किताबी ज्ञान वालों ने तो असहमति का रुख रखा मगर सदन में हुई चर्चा के दौरान मारवाड़ से आए सभी प्रतिनिधियों ने शासन से कहा कि वह इस पर ध्यान दे क्योंकि यही समझदारी का रास्ता है।

जोधपुर में स्थित केन्द्र सरकार के संस्थान एरिड ज़ोन रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिक वर्षा के पानी को बड़े पैमाने पर सहेजने के उपाय सुझाते रहे हैं। मगर नीति निर्धारकों को उनकी राय को जानने और उस पर मनन करके काम करने की कभी फुर्सत नहीं मिली। उनके ये सुझाव इस धरती की परंपराओं को ही आगे बढ़ाने वाले है। परंपरा कभी ठहरती नहीं। नए अनुभव और ज्ञान की धाराएं उसमें मिलकर उसे समृद्ध बनाती है। धरती की कोख से जिस निर्ममता से हम पानी निकाल रहे हैं उसकी भरपाई के लिए वैज्ञानिक सुझाते हैं कि वर्षा में धरती पर बरसा पानी जो कैचमेंट एरिया से बह कर चला जाता है उसे सहेजने की जरूरत है। इसके लिए नई यंत्र तकनीकें भी वैज्ञानिकों ने विकसित की है। पता नहीं कब नीति निर्धारकों का ध्यान उधर जाएगा।

एक सच्चाई हमें समझनी होगी कि राजस्थान मूलतः शुष्क और अर्ध शुष्क मौसमी तंत्र का भाग है जहां वर्षा कम होती है और जहां कोई बारहमासी नदी नहीं बहती और थार रेगिस्तान में वर्षा का पानी ही पीने के पानी का प्राथमिक स्रोत है। यह समझ हमें हमारी परंपराओं से मिलती है। परंपराओं से कट कर विकास की अवधारणा ने हमारी बहुत सी समस्याओं को जन्म दिया है। जिस पंजाब को हमने रोल मॉडल माना वहां भी खेती आज संकट में है क्योंकि वहां भी लोग प्रकृति से अपनी रिश्तेदारी का लिहाज भूल गए।

विकास के जिस दौर से गुजर कर हम आज जहां पहुंच गए हैं वहां से कैसे लौटें और इस भूमि यहाँ के जलवायु की प्रकृति के अनुरूप कैसे अपना रास्ता बनायें यही यक्ष प्रश्न है।

('स्वर सरिता' के जुलाई 2011 अंक में प्रकाशित आलेख)

Tuesday, July 26, 2011

प्रवीणजी भाई साहब : आध्यात्मिक गहराई से लेखन करने वाले पत्रकार


राजेंद्र बोड़ा

राजस्थान के पत्रकार जगत में एक नाम अपनी अलग पहचान रखता है और विशिष्ठ स्थान भी रखता है। यह नाम है प्रवीण चंद छाबड़ा। अपने दोस्तों और सहयोगियों के बीच गहरे अपनत्व से प्रवीण जी भाई साहब के नाम से पुकारे जाने वाले प्रवीण चंद छाबड़ा उन पत्रकारों में से हैं जो देश की आज़ादी और वर्तमान राजस्थान के बनने से पहले से सामाजिक क्षेत्र और पत्रकारिता में सक्रिय हैं। यह हमारा सौभाग्य हैं कि पैसठ सालों की सक्रिय पत्रकारिता और सामाजिक क्षेत्र के कामों के अपने गहरे अनुभव रखने वाले प्रवीण जी भाई साहब का सानिध्य और आशीर्वाद आज उनके 82वें जन्म दिन पर हमें प्राप्त है।

प्रवीण जी भाई साहब ने राजस्थान का निर्माण होते हुए ही नहीं देखा है बल्कि उसके बनने की प्रक्रिया और उस के बाद से अब तक का समूचा राजनैतिक घटनाक्रम पत्रकार के रूप में बहुत नज़दीक से और बहुत गहराई से देखा है। इसीलिए आप नए राजस्थान बनने की राजनीतिक प्रक्रिया को समझने और उसे विश्लेषित करने की दृष्टि पाने में नयी पीढ़ी के पत्रकारों को रोशनी दिखाने में सक्षम हैं।

प्रवीण जी के लेखन में एक अद्भुत आध्यात्मिक गहराई है। इसलिए कई लोगों को लगता है जैसे वे अपनी बात सूत्रों में कह रहे हों। पत्रकारिता के लेखन से भी अधिक महत्वपूर्ण उनका भगवान महावीर और जैनत्व के विभिन्न आयामों पर उनका लेखन है जो उन्हें जैन दर्शन के अद्भुत मनीषी के रूप में उन्हें प्रतिष्ठित करता है। वास्तव में जैन धर्म और आद्यात्मिक विषयों पर अपने लेखन में वे जिस प्रकार और जितना गहरे उतरे हैं वह किसी सांसारिक व्यक्ति के लिए आसान नहीं है। मगर वे अपने लेखन में जितने गहरे और गंभीर होते हैं अपने सामान्य व्यवहार में उतने ही सरल, हर एक से दोस्ती कर लेने वाले होते है। उनके लिए कोई त्याज्य नहीं है। वे सबके साथ रहना चाहते हैं। मगर अपना अलग व्यक्तित्व भी चाहते है। वे उनमें नेतृत्व की अद्भुत क्षमता है और दूसरों के हित में हमेशा तत्पर रहते है। मगर समूह का नेतृत्व करते हुए भी बे सामान्य कार्यकर्ता के रूप में बने रहने का भी बड़ा आग्रह रखते है। यह अंतर्विरोध दूसरे नहीं समझ पाते। इसी अंतर्विरोध के कारण शायद उन्हें जो होना चाहिए वैसा नहीं हो पाते।


26 जुलाई 1930 को एक संभ्रांत जैन परिवार में जन्मे प्रवीण जी भाई साहब की साहित्य और राजनीति में शुरू से ही रुचि रही है। सन 1952 में आपने ‘जय भूमि’ अख़बार में उप संपादक के रूप में पत्रकारिता की यात्रा शुरू की जो अब तक अनवरत जारी है। 1953-54 में आपने साप्ताहिक ‘भारत’ का प्रकाशन और संपादन किया। 1954 में आप कलकत्ता चले गए जहाँ ‘दैनिक विश्वामित्र’ और दैनिक ‘लोकमान्य’ के सम्पादकीय विभागों में काम किया। 1956 में आप पुनः जयपुर आ गए और ‘लोकवाणी’ के उप संपादक और नगर संवाददाता रहे। 1974-75 में आप ‘समाचार भारती’ के जयपुर ब्यूरो प्रमुख बने और बाद में समाचार भारती के चंडीगढ़ और कलकत्ता के ब्यूरो प्रमुख रहे। आप राजस्थान पत्रिका के हरियाणा संस्करण 'हरियाणा पत्रिका' के संपादक भी रहे।

प्रवीण जी भाई साहब की रचनात्मक सामाजिक कार्यों में भी भरपूर रुचि रही है। आपके निश्छल और निष्पक्ष स्वभाव के कारण ही जैन समाज के प्रमुख मुनि देशभूषण जी ने आपको दिगंबर जैन समुदाय के अतिशय क्षेत्र चूलगिरी की व्यवस्थापन समिति का संरक्षक बनाया। ऐसी पुण्यवानी विरलों को ही मिलती है। आप जैन समाज की अन्य कई सामाजिक और शैक्षणिक संस्थाओं से जुड़े हैं। गांधी के दर्शन से सरोबार प्रवीण जी भाई साहब सर्वोदय साहित्य समाज जयपुर के संस्थापक सदस्य रहे है।

श्री छाबड़ा राजस्थान श्रमजीवी पत्रकार संघ के संस्थापक सदस्यों में से है और इसके महामंत्री रह चुके है। आपके नेतृत्व में पत्रकारों ने बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ लड़ी हैं। आप 1964 से 1969 तक भारतीय श्रमजीवी पत्रकार महासंघ की कार्यसमिति के सदस्य रहे तथा वर्तमान में आप महासंघ के सर्वसम्मति से निर्वाचित उपाध्यक्ष हैं। 1963 में विएना में आयोजित पत्रकारों के विश्व सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व किया तथा रूस सहित कईं भूमध्य सागरीय देशो की यात्रा की और वहाँ की पत्रकारिता का अध्ययन किया।

आप द्वारा भगवान महावीर और जैन धर्म दर्शन पर लिखी पुस्तकें जैन साहित्य में प्रमुख स्थान रखतीं हैं। आपने अहिंसा पर एक वृहद ग्रंथ का संपादन भी किया जो अपने अंदर एक अनूठा उपक्रम हैं।

श्री प्रवीण चंद छाबड़ा अपने जीवन के 81 वर्ष पूरे कर 82 वें वर्ष में प्रवेश कर रहें हैं. इस मंगल अवसर पर राजस्थान के पत्रकारिता जगत के सभी साथियों की तरफ से यही मंगलकामना है कि आप शतायु हों। आपकी चिर बालपन की सौम्य शैली बनी रहे और हम सभी आपका मार्गदर्शन हमेशा पाते रहें।

राजधानी के पत्रकारिता जगत को उन्हीं के सक्रिय प्रयासों से प्रेस क्लब का तोहफा मिला। इस क्लब को बनाने में आपने सबसे अहम् भूमिका निबाही। उन्हीं की सक्रियता ने इस क्लब के सपने को हकीकत में बदला। उन्ही की बदौलत वे सारी प्रशासनिक बाधाएं पार की जा सकी जिससे क्लब के लिए मौजूदा स्थान सरकार से मिल सका। क्लब को अस्तित्व में लाने के लिए भिन्न मतों वालो को एक साथ बिठाना, क्लब का संविधान बनाना, उसे पंजीकृत कराना और उसके पहले खातों का आडिट कराना यह सारा काम आपने अपने प्रयत्नों से किया और पत्रकारों को इस क्लब की सौगात दी जिसके लिए लिए समूचा पत्रकार जगत उनका सदैव ऋणी रहेगा।

आपके जन्म दिन पर आज पत्रकार जगत उनके शतायु होने की मंगलकामना करता है।

(दैनिक समाचार पत्र 'सीमा संदेश' के 25 जुलाई 2011 के अंक में प्रकाशित)

Sunday, June 26, 2011

संगीतकार दान सिंह : पुकारो मुझे नाम लेकर पुकारो


राजेंद्र बोड़ा

मुंबई की सिने मायावी नगरी में केवल प्रतिभा के बूते सफलता हासिल नहीं होती। यहां भोलेपन के लिए कोई जगह नहीं। क्षूद्र ईर्षाओं, समूहों के हितों और फरेबी लोगों की भीड़ के बीच अपना स्थान बनाने के लिए यदि किसी में व्यावहारिक ज्ञान और चालाकी नहीं है तो बॉलीवुड की दुनिया उसे झटके से दूर फेंक देती है। हीरे ठुकरा दिये जाते हैं। संगीत का ऐसा ही एक नायाब हीरा पिछले दिनों संसार से चला बसा। जबर्दस्त प्रतिभा के धनी संगीतकार दान सिंह की हिन्दी सिने जगत ने उपेक्षा करके अपना ही नुकसान किया। पिछली सदी के साठ के दशक में मुंबई सिने संगीत में स्थान बनाने की जद्दोजहद करने के बाद अपने घर जयपुर लौट आए। मगर मुंबई को अलविदा कहने से पहले उन्होंने अपनी काबिलियत की जो झलक दिखाई उस पर हिंदुस्तानी फिल्म संगीत हमेशा नाज़ करेगा।

याद कीजिये रिलीज न हो सकी फिल्म ‘भूल ना जाना’ का मुकेश का दर्दीले सुरों में गाया ‘गमे दिल किससे कहूं कोई गम ख़्वार नहीं’ या फिर जयपुर के ही हरिराम आचार्य का लिखा सोज़ में डूबा बड़ा ही खूबसूरत, गीता दत्त की सुरीली झंकार वाली आवाज़ में गाना ‘मेरे हमनशीं मेरे हमनवां मेरे पास आ मुझे थाम ले। गुलज़ार का लिखा यह गीत भी कौन सा कम पड़ता है ‘पुकारो मुझे नाम लेकर पुकारो मुझे तुमसे अपनी खबर मिल रही है’। पचास साल बाद आज भी दान सिंह के संगीत के इन मोतियों की चमक फीकी नहीं पड़ी है।

चमक तो बॉक्स ऑफिस पर असफल रही शशि कपूर, शर्मिला टैगोर अभिनीत फिल्म ‘माई लव’ (1970) के गानों की भी जरा भी फीकी नहीं पड़ी है। गज़ल शैली में आसावरी थाट के सुरों में पिरोया गाना ‘जिक्र होता है जब कयामत का तेरे जलवों की बात होती है’और गिटार के तारों की झंकार पर तैरता गीत ‘वो तेरे प्यार का गम एक बहाना था सनम अपनी किस्मत ही कुछ ऐसी थी के दिल टूट गया’।

मुंबई में इस भोले संगीत कार का दिल बहुतर टूटा मगर यह उनकी खूबी थी कि ता उम्र कभी किसी का गीला शिकवा नहीं किया। हमेशा यही कहते थे “मन चाहा किसी को मिलता भी नहीं है”। सिने नगरी में महफ़िलें जमती जहां दान सिंह अपनी नई-नई धुनें उत्साह से सुनाते। मगर वे बॉलीवुड की रीत नहीं जानते थे इसीलिए लुट गए।

संस्कृत और हिन्दी के बड़े हस्ताक्षर हरिराम आचार्य उनके बड़े करीबी रहे। वे बताते हैं कि ‘खानदान’ फिल्म के गीत ‘तुम्हीं मेरे मंदिर तुम्हीं मेरी पूजा तुम्हीं देवता हो’ की धुन वास्तव में दान सिंह जी की कंपोजीशन थी जिसे उन्होंने एक महफिल में सुनाया जूसमें बॉलीवुड के बड़े बड़े संगीतकार भी मौजूद थे। एक बड़े संगीतकार ने दूसरे दिन इस धुन को अपने गाने में ढाल दिया। चुराकर कॉपी किए गए संगीत को फिल्म फेयर अवार्ड भी मिला, पर क्रेडिट दान सिंह को नहीं मिला। इसी प्रकार भूल न जाना के लिए गीत चंदन सा बदन चंचल चितवन को दान सिंह ने कंपोज किया, लेकिन बाद में यह गीत सरस्वती चंद्र में शामिल कर लिया गया और क्रेडिट किसी और को गया। दान सिंह फिल्म लाइन में इसलिए नहीं ठहर सके क्योंकि वे वहां की धोखाधड़ी में स्वयं को ढाल नहीं पाए।

दान सिंह के जीतने भी फिल्मी गाने आज आज हमारी थाती हैं उनमें अधिकतर मुकेश के गाये हुए है। उन्होंने एक बार कहा “मुकेश में कलाम की समझ थी इसलिए उनके स्वरों में गाने का मर्म उभर आता था”। मगर ‘भूल न जाना’ के लिए उन्होंने देशभक्तिपूर्ण एक काल जयी गाना मन्नाड़े से क्या खूब गवाया ‘बही है जवां खून की एक धारा उठो हिन्द की सरजमीं ने पुकारा’।

दुर्भाग्य ने हमेशा उनका पीछा किया। फिल्म डिवीजन के भास्कर राव तथा निर्देशक शांताराम अठवाले ने उन्हें फिल्म ‘रेत की गंगा’में स्वतंत्र संगीतकार के रूप में पहली बार चांस दिया मगर फिल्म पर्दे पर नहीं आ सकी। ‘भूल न जाना’ क्योंकि चीनी आक्रमण पर बनी थी तो भारत सरकार ने अड़ंगा लगा दिया की चीन के साथ संबंध सुधारने के प्रयास चल रहे हैं इसलिए फिल्म रिलीज नहीं हो सकती। फिल्म ‘मतलबी’ के लिए दान सिंह ने दो गाने टेक कर लिए मगर फिल्म पूरी नहीं हो सकी। ‘बहादुरशाह ज़फर’ बननी शुरू हुई मगर पूरी नहीं हो सकी। केवल दो फिल्में ‘माई लव’ और ‘तूफान’ (1969) रिलीज़ हुई मगर चली नहीं। दारा सिंह अनीता अभिनीत ‘तूफान’ की तो किसी को कुछ भी याद नहीं बस दान सिंह का स्वरबद्ध किया तेज रिदम वाला मुकेश और आशा भोसले का गाया ‘हमने तो प्यार किया प्यार प्यार प्यार’की आज भी चर्चा हो जाती है।

हिन्दी फिल्मों के संगीतकारों पर बड़ा ग्रंथ ‘धुनों की यात्रा’ लिखने वाले पंकज राग की दान सिंह पर यह टिप्पणी सटीक है कि “प्रतिभा के साथ किस्मत का होना भी हमारे फिल्म जगत में बहुत ज़रूरी है, और एक ऐसा संगीतकार जिसके पास किसी का वरद हस्त न था, फिल्मी दुनिया के षड्यंत्रों और तिकड़मों के सामने टिक न पाया।

हिन्दी फिल्म वालों से वे भले ही उमेक्षित रहे हों मगर अपने संगीत की छाप उन्होंने आकाशवाणी के लिए काम करते हुए खूब छोड़ी। आकाशवाणी के लिए हिन्दी के ख्यातनाम कवियों की रचनाओं को संगीतबद्ध करने की शुरुआत दान सिंह से ही हुई। सबसे पहले सुमित्रानन्दन पंत के एक गीत को संगीतबद्ध करने की जिम्मेवारी उन्हें दिल्ली के आकाशवाणी केंद्र से मिली। पंत जी बड़े आशंकित थे कि एक नौजवान संगीतकार उनके गीत को कैसे प्रस्तुत करेगा। पंत जी की आशंका से आकाशवाणी केंद्र के निदेशक भी तनाव में थे। उन्होंने पंत जी को रेकार्डिंग के समय पंत जी को भी बुलवा लिया। पंत जी ने जब अपनी कविता की कंपोजीशन सुनी तो आगे बढ़ कर दान सिंह को गले लगा लिया। दान सिंह जी उस घटना हो याद कर उम्र के अंतिम पढ़ाव में भी भाव विभोर हो उठते थे कि पंत जी का उस दिन का आशीर्वाद आज भी मेरे साथ है।

वे विरले संगीतकार खेमचंद प्रकाश के शिष्य रहे। खेमचंद प्रकाश जिन्हें लोग 1949 की फिल्म ‘महल’ के लिए सबसे अधिक जानते हैं या फिर इस फिल्म के उस गाने के कंपोजीशन के लिए जानते हैं जिसने लता मंगेशकर को पहली बार बुलंदियों पर पंहुचाया “आएगा आएगा आने वाला”। अपने गुरु के लिए उनकी भारी श्रद्धा थी। “गुरुजी का कमाल देखिए एक ही राग यमन कल्याण में ही पूरी पिक्चर (महल) ख़त्म कर दी। इसका गाना आएगा आनेवाला पचास साल से सुन रहे हैं मगर सुनते सुनते अब भी तबीयत नहीं भरती”।

उन्होंने एचएमवी के लिए भी दर्जनों राजस्थानी गाने कम्पोज़ किए जिनके रिकार्डों की खूब धूम रही। दशकों बाद उन्हें फिर एक बार फिल्म में संगीत देने का मौका दिया जगमोहन मूंदड़ा ने। राजस्थान की महिला कार्यकर्ता भंवरी देवी के संघर्ष की कहानी पार्ट आधारित फिल्म ‘बवंडर’ के गानों में दान सिंह ने राजस्थानी लोक संगीत की खूबसूरत छटा बिखेरी। पर, पंकज राग के शब्दों में, जैसा अक्सर होता है यह “ऑफ बीट” फिल्म और इसका संगीत ठीक से रिलीज ही नहीं हुआ। फिल्म का बैकग्राउंड संगीत ग्रेमी पुरस्कार विजेता विश्व मोहन भट्ट ने रचा था इसलिए फिल्म की नामावली में सिंह और भट्ट दोनों का नाम आया।

अत्यंत नम्र, सहज और विनोदी प्रवत्ति के दान सिंह हमेशा संगीत में ही डूबे रहते थे। उनके मन में कभी कोई कलुषता नहीं रही। उनकी जीवन संगिनी डॉ. उमा याग्निक जो खुद आला दर्जे की गायिका है के साथ दान सिंह जी का ऐसा संगीत द्वय बना रहा जो अपने अंदर मिसाल है।

ठेट जयपुरी मिजाज वाले दान सिंह संगीत के अलावा अपने शौक के बारे में दूरदर्शन पर प्रसारित एक कार्यक्रम ‘जीवन के पहलू’ में बताया कि उन्हें बचपन से ही पतंफ उड़ाने का बड़ा शौक रहा। मकर संक्रांति के दिन समूचा जयपुर शहर पतंग डोर लिए छतों पर होता है। उस दिन दान सिंह भी बच्चों की तरह खुश होकर पतंग उड़ाते थे।

जयपुर की गालीबाजी के भी वे बड़े मुरीद थे। इस बारे में सवाल करने पर वे खुद झूम कर गा उठते थे ‘ सुन साथण म्हारी पिव बड़ो छै पाजी/ कई बर दीनो समझाये ने छोड़े न गाली बाजी’।

गैर फिल्मी संगीतकार के रूम में उन्होंने खूब नाम कमाया इज्जत पायी। वे अपने जीवन में सफल थे। मगर नम्र इतने थे कि यही कहते थे “इस सफलता के पीछे मैं एक ही बात आपसे कहूंगा कि कुछ लोगों की दुआएं काम आ गयी वरना मुझे तो अब तक काम ही नहीं आया। मैं खुद सोचता हूं कि हो कैसे गया’।

सिने जगत की अपनी असफलता का गिला उन्होंने कभी नहीं किया। वे कहते थे “मनचाहा किसी को मिलता भी नहीं है... ज़िंदगी के कितने ही ऐसे पहलू हैं जिन पर कभी आदमी उदास हो कर रह जाता है, कभी खुश हो कर रह जाता है। हाथ कुछ नहीं आता। और कलाकार के लिए अंत में एक ही चीज रह जाती है कि गत में उसने जो अच्छा काम किया है उससे उसे लोगों की सराहना मिलती रहे, लोगों का आशीर्वाद मिलता रहे। लोग खुश रहें। बस यही एक चीज है”। इसके साथ ही वे एक शेर कह देते थे “तकदीर के लिखे तो तदबीर क्या करे/तट पर डूबे नाव तो बंदा भी क्या करे”।

आज उन्हीं का सुनाया एक और शेर याद आता है ‘ये रोशनी है हकीकत में एक छल लोगों कि जैसे जल में झलकता हुआ महल लोगों/ दरख़्त हैं तो परिंदे नज़र नहीं आते, जो मुश्ताक हैं वही हक से बेदखल लोगों’।

(यह आलेख जनसत्ता के रविवारी संस्करण दिनांक 26 जून 2011 के अंक में छपा)

Monday, June 20, 2011

Daan Singh: He Left An Indelible Mark On Film Music


Rajendra Bora

In a rat race, many a times diamonds are frequently discarded and fakes reign supreme. Music Director Daan Singh who passed away in Jaipur on Saturday night (June 19, 2011) was one such gem who despite showing his worth did not get film offers.

He composed music for only three bollywood films of which one remained unreleased. But his compositions of the two films ‘My Love’ and ‘Bhool Na Jaana’ can never be erased from the memory of Hindustani Film Music (HFM) lovers and no history of Hindustani Film Music would be complete without mention of songs of the two films.

He was a pupil of legendry composer Khemchand Prakash who also hailed from Rajasthan. He was greatly appreciated in bollywood mehfils (sittings) attended by makers and breakers of the silver screen but never got any assignment. In fact big names in Hindi film music who listened his compositions in mehfils conveniently lifted his tunes to score songs in their films.

Ill luck apparently shadowed him in Mumbai. The very first assignment as a film music director film he got for ‘Ret Ki Ganga’ could not be completed. He got chance to score music for ‘Bhool Na Jaana’. ‘Bahadur Shah Zafar’ and ‘Matlabi’ but the films could not see the projection light in theaters. However, two songs recorded for ‘Bhool Na Jaana’, a film based on Indo-China war, were released by the music company and are now considered classic. ‘Pukaaro Mujhe Naam Lekar Pukaaro, Mujhe Tum Se Apni Khabar Mil Rahi Hai’ is one of the finest songs of Mukesh. Another song rendered by Geeta Datt ‘Mere Ham Nashin Mere Ham Navan Mere Paas Aa Mujhe Thaam Le’ is a soulful song written by Hariram Aacharya of Jaipur.

When given a chance to score for a big starrer film ‘My Love’ (Shashi Kapoor, Sharmila Taigore) did not let the film down. Melodious compositions of this film instantly became big hit like ‘Zikr Hota Hai Jab Kayaamat Ka Tere Zalwon Kee Baat Hoti Hai and ‘Who Tere Pyaar Kaa Gam Ek Bahaana Tha Sanam, Apni Kismat Hi Kuchh Aisi Thi Ke dil Toot Gaya’. However the film bombed at box office.

His another film ‘Toofaan’ too had an evergreen song ‘Hamne To Pyaas Kiya’ sung by Mukesh and Asha Bhonsle which too lost without trace.

Intrigues of Bollywood saw that offers elude him which was ultimately Hindi Film Music’s loss. However, Bollywood’s loss was All India Radio’s gain where he reigned supreme for several years composing poetries of several great names in Hindi literature. When he was assigned by Delhi station of AIR to compose a poem by Sumitranandan Pant in music, the poet was apprehensive as to how a yound boy will do justice to a literary piece. Pant personally came to the studio and after listening Daan Singh's composition gave him a big hug and blessed him.

He recorded a large number of songs in Rajasthani for HMV which are still popular.

After a lot many years when Daan Singh got a chance to score for Jagmohan Mundara’s film, based on Rajasthani woman activist Bhanwari devi, ‘ Bawandar’ he did a tremendous job but film’s music was not properly marketed.

Talking to Hindustan Times some time ago he summed up his life in an Urdu couplet: “Yeh Roshni Hai Haqeeqat Mein Ek Chaal Logon,Ke Jaise Jal Mein Jhalakta Hua Mahal Logon. Darakht Hain to Parinde Nazar Nahin Aate, Jo Mustaq Hain Wohi Haq Se Bedakhal Logon.

(The obit piece was published in Hindustan Times on June 20, 2011 on page 2)

Monday, May 30, 2011

आबादी किस पर भारी


राजेंद्र बोड़ा

देश की जनगणना के प्रारंभिक आंकड़े जारी हो गए हैं। जनगणना दशकवार होती है। यह आँकड़े 2001 से 2010 दशक के हालात बयान करते हैं। जनगणना मोटे तौर पर दशकीय आबादी वृद्धि दर का पता देती है। नई जनगणना बताती है कि 2001-2010 के दौरान राजस्थान में जनसंख्या वृद्धि दर में लंबे समय बाद बड़ी गिरावट आई है। वृद्धि दर में यह गिरावट 6.97 प्रतिशत की है। मगर जनसंख्या विशेषज्ञों को इससे संतुष्टि नहीं है। कहते हैं कि इस गिरावट के बावजूद इस मरुप्रदेश की आबादी की वृद्धि दर 1.96 प्रतिशत प्रति वर्ष है और पिछले दशक में यहाँ की आबादी में एक करोड़ 20 लाख से अधिक लोग और जुड़े। यह संख्या इसके पिछले 1991-2001 दशक में नए जुड़े लोगों की संख्या एक करोड़ 25 लाख से थोड़ी ही कम है।

जनसंख्या विशेषज्ञ डॉ. देवेन्द्र कोठारी कहते हैं कि पहली नज़र में जनगणना 2011 के आंकड़े जरूर उत्साहवर्धक नज़र आते हैं मगर राजस्थान के सामाजिक और आर्थिक विकास पर इन आंकड़ो के दीर्घकालीन प्रभाव परेशानी का सबब है। उनकी बातों का लब्बोलुबाब यह है कि बढ़ती आबादी हमारे संसाधनों पर भारी पड़ने वाली है। बढ़ी हुई आबादी के लिए भोजन, पानी, के साथ स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं को मुहैया करना कैसे संभव होगा यह यक्ष प्रश्न है।

आबादी के बढ़ने से विशेषज्ञ जिन चिंताओं को प्रकट करते हैं वे वास्तव में व्यवस्था की समस्याएं हैं। व्यवस्था की समस्या शासन – प्रशासन की होती है। लोकतान्त्रिक व्यवस्था में शासन जब सभी को स्वस्थ, आर्थिक रूप से सक्षम, और गौरवपूर्ण जीवन बिताने के साधन मुहैया करा पाने में बुरी तरह असफल रहता है तब वह दोष का ठीकरा आसानी से बढ़ती आबादी पर फोड़ देता है। उसका तर्क यह होता है कि जितनों के लिए वह व्यवस्था करता है उससे कहीं अधिक उपभोग करने वाले पैदा हो जाते हैं। तो बेहतरी का जो सपना दिखा कर जनता के नुमाइन्दे शासन में आते हैं उस सपने को साकार न कर सकने के लिए वे बढ़ती आबादी को एक अच्छा बहाना बना लेते हैं।

सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि अकादमिक लोग भी आबादी के तर्क से शासन की असफलताओं का बचाव करने लगते हैं। उदाहरण के लिए जनसंख्या विशेषज्ञों के इस तर्क को लें कि बढ़ी हुई आबादी शिक्षा और स्वास्थ्य के ‘डिलीवरी सिस्टम’ पर दबाव डालेगी। इसका सीधा सदा अर्थ हुआ कि शासन बढ़ी आबादी के लिए स्कूलों और अस्पतालों, शिक्षकों और चिकित्सकों की व्यवस्था कैसे कर पायेगा।
हमारा सवाल यह है कि क्या शासन की व्यवस्था का ढांचा ‘डिलीवर’ कर पा रहा है ? क्या यह ढांचा अपनी पूरी क्षमता से काम कर रहा है ? पहले शासन का यह ढांचा अपनी पूरी क्षमता से काम करना शुरू करे फिर उसे यह कहने का हक़ बनेगा कि उस पर उपभोग करने वालों की संख्या का दबाव बढ़ रहा है।

प्राकृतिक संसाधनों कि बात करें। शासन और विशेषज्ञ कहते नहीं थकते कि बढ़ी आबादी को पिलाने के लिए पानी कहां से लाएंगे और खिलाने को अनाज कहां से लाएंगे। खुद शासन के आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि राज्य में होने वाली पानी की कुल खपत का केवल चार प्रतिशत घरों में उपयोग में आता है। बाकी का 96 प्रतिशत हिस्सा कृषि, उधयोग और मनोरंजन व्यवसाय के उपयोग में आता है। इसमें भी करीब 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा कृषि के लिए काम में आता है। वहाँ पानी की जो बर्बादी होती है उसकी व्यवस्था शासन से नहीं होती मगर केवल चार प्रतिशत पानी का उपभोग करने वालों से शासन और अकादमिक वर्ग अपेक्षाएं करता है कि वह पानी की बचत करे।

आबादी का पेट भरने के लिए अनाज कहां से आएगा जैसा सवाल करने वालों से कोई यह नहीं पूछता कि हर साल कितना अनाज सरकारी गोदामों में सड़ जाता है ? अनाज का एक-एक दाना लोगों का पेट भरे उसकी व्यवस्था शासन से क्यों नहीं होती।

शासन और जनसंख्या विशेषज्ञों का सारा प्रयास आंकड़ों का मायाजाल रचने का होता है। और अब इन आंकड़ों में एक नया शब्द और जुड़ गया है वह है ‘अनवांटेड चिल्ड्रन’ (अनचाहे बच्चे)। याने गैर जरूरी बच्चे। आबादी के एक हिस्से पर इस तरह का ठप्पा लगा कर उसे उपेक्षित घोषित करना माँ-बाप और शासन दोनों के लिए क्या नैतिक है ? आप कहते हैं यह अनचाही आबादी हमारे ‘डिलीवरी सिस्टम’ पर हमारे पर्यावरण पर बोझ है।

यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि प्राकृतिक संसाधनों का समान बंटवारा नहीं हो रहा है। जो हैसियत वाले हैं प्राकृतिक संसाधनों पर उनका आधिपत्य है। वे नहीं चाहते कि वे जरूरत से ज्यादा प्रकृति से जो ले रहे हैं उसमें हिस्सेदारी लेने वाली नई आबादी खलल डाले। महात्मा गांधी की उस बात को कोई याद नहीं करता कि प्रकृति के पास मानव की जरूरतों को पूरा करने के लिए बहुत है मगर उसके लालच को पूरा करने के लिए उतना नहीं है।

आबादी के नियंत्रण के उपाय करके आप अपनी जरूरत के मुताबिक बच्चे चाहते हैं। इस तरह की चाहना आधुनिक औद्योगिक सोच का परिणाम है जिसने बच्चे को एक ‘उत्पाद’ मान लिया है। पूंजीवाद अब जब सारे विश्व में अपने पांव पसार चुका है तब दंपत्ति यह तय करने लगें हैं कि वे पहले बच्चा पैदा करें या अपने करियर को आगे बढ़ाएं या पहले बच्चा पैदा करें या अच्छा फ्लैट या बड़ी कार खरीदें। जिस तरह बाज़ार उपभोक्ता को ‘चोइस’ देता है वैसे ही बच्चे का पैदा किया जाना भी वैसी ही ‘चोइस’ बन रहा है जिसे अकादमिक लोग और शासन आज की जरूरत बता रहे हैं।

शासन और अकादमिक लोग आसान रास्ते खोजते हैं। मीडिया की तो फितरत ही ऐसी होती है की वह हर चीज का सरलीकरण करता है। आबादी इतनी सरल नहीं होती। आबादी को समस्या मान कर उस पर नियंत्रण की बात सरल बात है। मगर ऐसे विशेषज्ञ भी हैं जो आबादी को बोझ नहीं बल्कि ‘संपत्ति’ मानते हैं जिसका उपयोग करने के लिए वे निवेश, यंत्रतकनीक, उत्पादकता, वाणिज्य व्यवसाय और स्पर्धा की वकालत करते हैं। दुनिया की एक बड़ी पूंजीवाद की पोषक बहुराष्ट्रीय कंपनी गोल्डमैन साक्स अपने एक अध्ययन में भारत की बड़ी आबादी को महुत बड़ा बाज़ार मानती है। उसके लिए यह आबादी पूंजी है। यहां तक की गोल्डमैन साक्स के साथ साथ अमेरिका की सीआईए भी भारत की आबादी को ‘संपत्ति’ मानती है।

मगर आबादी तभी संपत्ति बनती है जब कोई भूखा नहीं रहे, किसी के साथ संसाधनों के बंटवारे में भेदभाव नहीं हो और हर एक को शिक्षा पाने और इलाज कराने की निर्बाध सुविधा हो। यहां शासन की भूमिका आती है। सैकड़ों बार कहा जा चुका है कि शिक्षा और स्वास्थ्य में राज्य की भूमिका तिरोहित नहीं होने दी जानी चाहिए। निर्वाचित शासन को समता आधारित प्रशासन का अपना वादा निभाना चाहिए। मगर जब शासन ऐसा कर पाने में असफल रहता है तो उसे ऐसे तर्कों की जरूरत होती है जिससे वह अपनी सुशासन देने में अपनी विफलता छुपा सके। अकादमिक लोग उसे यह तर्क मुहैया कराते हैं। आबादी का तर्क भी वैसा ही है।

प्रत्येक नागरिक को यह अधिकार है कि वह खुद तय करे कि उसे अपना परिवार कितना बड़ा हो या छोटा चाहिए। मगर यह फैसला वह अपने विवेक से करे न कि शासन और अकादमिक लोगों के तर्कों की मीडिया में बाढ़ में बह कर। आबादी के नाम पर शासन और प्रशासन की विफलताओं से ध्यान नहीं हटाया जा सकता।

जनसंख्या विशेषज्ञ आबादी में जुड़ने वाले बच्चे का मोल आर्थिक आधार पर करते हैं। यह निर्धारण उन लोगों की तरफ से आता है जिन्होंने बाज़ार के जरिये प्राकृतिक संसाधनों पर पहले से कब्जा कर रखा है। इन संसाधनों का समतामूलक बंटवारा लोकतान्त्रिक व्यवस्था में शासन का पहला फर्ज़ होना चाहिए। मगर जो ताक़तें बाज़ार पर कब्ज़ा रखती है वे ही शासन को अपने तरीके से चलाने की क्षमता भी रखती हैं। वे यह समझाती है कि उनके द्वारा निर्धारित सीमारेखा के बाहर की आबादी अनचाही है जिसकी शासन को और समाज को कोई जरूरत नहीं होनी चाहिए। यह फासीवादी सोच है।

लोकतान्त्रिक शासन में कोई भी नागरिक अनचाहा नहीं हो सकता। कोई नागरिक तभी बोझ होता है जब वह भूख और गरीबी में होता है, जब उसमें कौशल नहीं होता, जब वह निरक्षर होता है और जब वह अस्वस्थ होता है। उसे बोझ से संपत्ति में तब्दील करने की जिम्मेवारी शासन और समाज दोनों की होती है। वे आज अपने इस धर्म को निभाने में पूरी तरह विफल नज़र आते हैं। और अपनी विफलता के लिए दोष आबादी पर मंढते हैं जिसे कोई सभ्य समाज स्वीकार नहीं कर सकता।

शासन कहने को तो राजकोष का बड़ा पैसा ऐसे कार्यक्रमों पर खर्च करता है जिससे लोगों के हालत सुधरे। मगर यह केवल लक्षणों का इलाज है। बीमारी का सही इलाज तभी होता है जब उसके कारकों को समाप्त किया जाय। हमारी समस्या संसाधनों के गैर बराबरी बंटवारे का है। इसी के लिए आज़ादी की लंबी जंग लड़ी गई थी। मगर राज आम अवाम के हाथों में आने के 60 वर्ष से अधिक होने के बाद आज भी गैर बराबरी का दस्तूर कायम है। नई आर्थिक नीतियों ने इस दस्तूर को प्रतिस्पर्धा के नाम पर जायज ठहरा दिया है। इसीलिए पीछे आया बच्चा अनचाहा हो गया है।

(आलेख 'प्रेसवाणी' के मई 2011 के अंक में प्रकाशित)

Wednesday, March 30, 2011

Inauguration of Greater Rajasthan was all royal affairs

Rajendra Bora

When Greater Rajasthan was inaugurated by Sardar Vallabh Bhai Patel, the architect of integration of India, on March 30 in 1949 the ceremony to mark the occasion held at Darbar Hall in the City Palace of Jaipur was mostly all royal affairs as most of the senior Congressmen left the venue in a huff over the sitting arrangements.

On this day, 62 years ago, four major princely states – Jaipur, Jodhpur, Bikaner and Jaisalmer- merged with Samyukt Rajasthan which was earlier inaugurated by Jawahar Lal Nehru in Udaipur on April 18, the previous year.

At the ceremony Patel sworn in Maharaja Sawai Mansingh of Jaipur as Rajpramukh. Rajpramukh later administered the oath of office of the Premier of the newly emerged state to Hiralal Shastri, who was till then Chief Minister of Jaipur.

At the time of formation of Greater Rajasthan the Congress had four stalwarts – Jai Narayan Vyas from Marwar, Manikya Lal Verma from Mewar, Hiralal Shastri from Jaipur and Gokul Bhai Bhatt from Sirohi- leading the organisation.

“Local Congress house was divided,” recalled V. P. Menon, a civil servant who played a vital role in the process of integration of princely states into India, in his book ‘The story of the integration of the Indian States’.

Shastri, who was made the Premier of Grater Rajasthan was the choice of Patel but was not acceptable to leaders from Marwar and Mewar. Verma from Mewar was more vocal in his displeasure over the choice. According to his diary entries he “warned” Patel not to make Shastri head of the newly formed State because “Congress workers in Rajasthan would not accept him.”

In another entry in Verma’s diary states “I did not know (at that time) that Jaipur was being made the capital and Premiership was too going to Jaipur in the bargain of transferring Abu to Gujarat.”

It was probably culmination of the anger among majority Congressmen that exhibited at the inaugural ceremony with Verma leaving the venue after finding that all front rows were reserved for royals. He wrote in his diary that even “ministers of Samyukt Rajasthan and other states joining the Greater Rajasthan” were not provided respectful place in the ceremony.
Another civil servant V. Shankar in his book my ‘Reminiscences of Sardar Patel’ wrote: Maharaka of Jaipur insisted that we should all don Rajasthani dress… His Highness sent turbans for all of us- myself, V. P. Menon. M. K. Vellodi, and N.M, Buch.
The rift in the Congress rank and file was so deep that they refused to join the ministry formed by Shastri. Despite support from Patel and Gokul Bhai Bhatt, the then PCC chief, obeying the Patel’s decision, Shastri ministry could not last long as the Pradesh Congress Committee (PCC) in its emergency meeting on June 11, 1949 passed a vote of no- confidence against it. Hurt over the vote when Bhatt resigned, the PCC elected Vyas as its President. However, AICC turned down the PCC decision. But local sentiments finally reigned supreme and Shastri, a loner, ultimately resigned and a civil servant C S Venkatachari was made the Premier of the State on January 6, in 1951.

However unanimous choice of Rajasthan congressmen prevailed later and Jai Narayan Vyas was sworn is Chief Minister on April 26, 1951.

(The piece appeared on the front page of Hindustan Times on March 30, 2011)

Sunday, March 27, 2011

होली का रंग गेर के संग

राजेन्द्र बोड़ा

होली का उत्सव अन्य सभी उत्सवों से अलग है। हालांकि सभी उत्सव वे समय होते हैं जब थोड़ी देर के लिए हम अपने जीवन की मुश्किलों को भुला कर कुछ आनंद में डूब जाते हैं। इसीलिए हमारे जीवन में उत्सवों का बहुत महत्व है। वे हमें अपनी संस्कृति से भी जोड़े रखते है। संस्कृति समाज को जोड़े रखने में बड़ी भूमिका निभाती है। उत्सवों में विभिन्न कलाओं के माध्यम से समाज के लोगो की प्रतिभाएँ भी सामने आती हैं।

सूर्य नगरी के नाम से विख्यात जोधपुर शहर को उत्सवों का की नगरी कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जोधपुर के लोगों को तो बस कोई मौका चाहिए उत्सव मनाने का। इसीलिए यहाँ हर रोज ही कोई न कोई धार्मिक या सामाजिक उत्सव चलता ही रहता है। यही कारण है यहाँ के लोगों में जैसा प्रेम भाव नज़र आता है वैसा अन्य जगहों पर कम ही देखने को मिलता है। यहाँ के वाशिंदों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि उनमें आपसी मेल बहुत है। यहाँ की मारवाड़ी भाषा ने सबको बड़ी खूबसूरती से इस तरह जोड़ रखा है कि अलग अलग समुदायों के लोगों में फर्क करना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे में जब होली आए और जोधपुर के लोग एक दूसरे को रंगों में पूरी तरह सरोबार नहीं करें ऐसा हो ही नहीं सकता। इस दिन शहर की सदियों से चली आ रही परम्पराएं जीवंत हो उठती है।

होली की जोधपुर में बड़ी पुरानी परंपरा है ‘गेरों’ की। ‘गेर’ पुरुषों की टोलियाँ होती है जो चंग की थाप पर होली के गीत गाते हुए शहर में एक स्थान से दूसरे स्थान को घूमती फिरती हैं। गेरें जहाँ से भी गुजरती हैं उन्हें सुनने के लिए लोगों के हुजूम उमड़ पड़ते हैं। होली के कई दिन पहले से गेरें निकलनी शुरू हो जाती है। होली के जलने के दूसरे दिन, जिसे मारवाड़ी में छालोड़ी कहते हैं, जब गेर के लोग गाते और चंग बजाते शहर की गलियों से निकलते हैं तो लोग अपने मकानों और चबूतरों पर बैठे उनका इंतजार करते हैं। होली के गीतों का आनंद तो होता ही है साथ ही रंगीन पानी की बौछारें भी चलती रहती हैं।

पास के गावों से भी टोलियां आती हैं और शहर की मोहब्बत में भीग जाती हैं और शहर वालों को अपने गीतों से भिगो देतीं हैं।

मगर सबसे दिलचस्प होती हैं पुष्कर्णा ब्राह्मणों की गेरें। जमाना बादल गया। होली की मौज-मस्ती जो पहले बहुत लंबी चलती थी अब कुछ घण्टों में सिमट गई फिर भी गेरों की यहाँ अभी जीवित हैं। बीच-बीच में जब भी ऐसा समय आया कि लगने लगा यह परंपरा लोप हो रही है तो कोई न कोई बंदा इसे बचाने को कूद पड़ा और उसे समाज का समर्थन भी मिल गया।

फाल्गुन के यह फाग उत्सव की मौसम के मिज़ाज से मेल खाता है। इस परंपरा का करीब डेढ़ सौ सालों का इतिहास तो लोगों को जबानी याद है। यह परंपरा ऐसी है जिसमे आम जन तो फाग के रंगों में डूबते उतरते रहे ही हैं पुराने सामन्ती काल में तब के शासक भी उससे सरोबार होते रहे हैं।

जोधपुर के पुष्कर्णा ब्राह्मणों की फाग और महिलाओं द्वारा गायी जाने वाली गालियों की निराली परंपरा की ख्यात दिसावर भी पहुची हुई थी इसका एक दिलचस्प पुराना वर्णन लंबे समय तक एक प्रमुख गेर मंडली के प्रमुख रहे रामदेव व्यास ‘बाबूसा’ सुनते हैं। जोधपुर के तत्कालीन महाराजा मानसिंह स्वयं गुणी व्यक्ति थे। वे कविताएँ रचते थे और संगीत के भी ज्ञाता थे। इसीलिए उन्हें ‘रसीले राज’ भी कहा जाता था। जब उन्होंने अपनी कन्या का उदयपुर के राजकुमार के साथ संबंध पक्का किया तो उदयपुर के महाराणा चाहते थे कि लड़की वाले वहीं आ जाएँ और वहीं विवाह हो। मगर महाराजा मानसिंह ने उन्हें बारात लेकर जोधपुर आने का आग्रह के साथ निमंत्रण दिया। कहते हैं उदयपुर के महाराणा ने इस शर्त पर बारात लेकर जोधपुर आना स्वीकार किया कि पुष्कर्णा ब्राह्मणों में जिस विधि विधान से विवाह होता है वैसा ही विवाह होगा और पुष्करणों के विवाहों में जिस प्रकार समधिनों को संबोधित करते हुए ‘गाल’ गायी जाती है वैसी ही ‘गाल’ खुद महाराजा मानसिंह गाएँगे। लड़के वालों की दोनों बातें मानी गई। महाराजा मानसिंह कि गायी गाल “नाजकड़ी ब्यावण आवे/ नाजकड़ी ब्यावण क्यूँ शरमावे” आज भी प्रचलित है।

रंगों में भींजते हुए अपने समधियों के घरों के बाहर जाकर गालियाँ गाकर फाग का धमाल मचाने में भी अनोखा अदब रखा जाता रहा है। इसीलिए फाग कि गालियां, जिनमें अश्लील संकेतों वाली चुहलबाजियों का आनंद होता है, को सुनने स्त्रियाँ भी पुरुषों से पीछे नहीं रहतीं।

होली से बहुत पहले गैरों की टोलियाँ नए नए गीत बनाने की तैयारी शुरू कर देती हैं। गीत लिखे जाते हैं, उनकी धुनें बनती है और उन पर नृत्य की तैयारी भी होती है। पहले केवल चंग वाद्य ही गालियों को रिदम देने के लिए हुआ करता था। फिर उसमें चिमटा और हारमोनियम भी जुड़ गया। कालांतर में पूरा आर्केस्ट्रा ही साथ में बजने लगा जिसमें इलेक्ट्रॉनिक वाद्य भी जुड़ गए।

गेर परंपरा के सबसे पुरानी याद 140 वर्ष पहले मारवाड़ राज में दीवान रहे सूरज राज रामदेव की है जब वे अपने पाँच पुत्रों और मित्र मंडली के साथ ‘रामदेव रसाला’ गेर के नाम से मोहल्ले मोहल्ले जाकर अपनी ‘गालियों’ का रंग जमाते थे। उस मंडली की एक ‘गाल’ आँख रसीली ने अद्भुत मारी/ बस कियो ए भोलों भ्रह्मचारी” खूब लोकप्रिय हुई जो आज भी गाई जाती है।

‘गेरों’ में वाद्यवृंद –‘आर्केस्ट्राइजेशन’ – का प्रयोग शुरू करने का श्रेय आमतौर पर जालप मोहल्ले के लोगों को जाता है। जाने माने रंगकर्मी थे और ध्रुपद गायन में माहिर भानीरामजी होली के लिए ‘गालियाँ’ लिखते। जिन्हें संगीतबद्ध किया जाता और पूरे वाद्यवृंद के साथ वह ‘गेर’ निकली थी जिसका संचालन राजाराम पुरोहित करते थे। उस गेर की एक रचना अब भी लोगों की जुबान पर है “देखो नाचण पाटी पाडी/ पैरी फूल गुलाबी साड़ी/ आवो आवो जल्दी आवो कोई आस पुरावो”। इनकी शिष्य परंपरा में राजाराम, बदरिदास गुणिया, मोतीलाल कल्ला, नरजी उस्ताद, चतुर्भुक, चन्द्रशेखर कल्ला, गोविंद कल्ला, गिरधर कल्ला, मंशाराम पुरोहित ‘लुच्चा साहब’’, दाऊलाल रामदेव के साथ हिन्दी फिल्मों में संगीतकार बने बालकृष्ण कल्ला तथा राजस्थान संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष रहे राम कृष्ण कल्ला के नाम आज भी लोगों को याद है।

पिछली सदी के चालीस के दशक में आत्माराम रामदेव, जिन्हें सभी प्रेम से ‘आतूजी’ नाम से जानते और पुकारते थे की गेर सबसे मशहूर थी. , वे रेलवे में गार्ड थे। ‘आतूजी’ धोती, ऊपर बंद गले का कोट और सिर पर जोधपुरी साफा पहने, गले में बड़ा सा चन्द्रहार पहने गेर का नेतृत्व करते थे। पुष्ट देह और बुलंद और जबर्दस्त मीठी आवाज़ के धनी ‘आतूजी’ रंग से सरोबार हुए जब नौचोकिये से लेकर जालप मोहल्ले तक चंग पर होली के गीत गाते हुए निकलते थे तो राहों में उन्हें सुनने लोग उमड़ पड़ते थे। मोहल्लों के चौकों में जब रुक कर वे गाते थे तो वहाँ तिल रखने को जगह नहीं होती थी। मकानो की बालकनियों, खिड़कियों और छतों पर चढ़ कर लोग उनके गीतों का लुत्फ लेते थे। दिलचस्प बात यह है की होली के गीतों में बड़ी सफाई से अश्लील संकेत होते थे मगर पुरुषों के साथ महिलायें भी बड़ी संख्या में उनको सुनने उमड़ती थीं.

आजादी के आंदोलन में कूदे नेता सामाज सुधार के काम के जरिये राजनीति की सीढ़ियाँ चढ़ते थे। मूथा शिवदत्त जी महाराज व मारवाड़ में राजनीतिक और सामाजिक जागृति की अलख जमाने वाले जयनारायण व्यासने श्लील गेरें निकाली लेकिन अश्लील गेरों की लोकप्रियता कभी कम नहीं हुई.

बाद में राजस्थान के मुख्यमंत्री बने जयनारायण व्यास की ‘गेर’ सूर्य नगरी के इतिहास में एक अलग ही स्थान रखती है। उनकी ‘गेर’ में सरदारमल थानवी, मथुरादास, रामदत्त थानवी, मानमल, रण छोड़ दास गट्टाणी, जो बाद में हाईकोर्ट के जज रहे, आदि लोग होते थे। उनकी सीख भरी ‘गालियाँ’ होती थीं “मत दूध लजाईजे/ पाछो मत आइजे बेटा राड सूं”। उनकी ‘गालें’ जैसे “छोड़ो-छोड़ो ऐ सवागण काला ओढ़णा” समाज में नई चेतना खासकर स्त्रियों में जोश भरने में खूब कामयाब रहीं। “हाँ अगर जाति हित चावो तो बाल विवाह की रीत हटाओ” जैसी ‘गालियाँ” नया युग बोध देने का सशक्त माध्यम बनी। ऐसी ही कुछ ‘गालियों’ की बानगी देखिए “त्याग दे उत्तम रामजी वाली लक्ष्मी तूँ / खोटी रीतों ने जल्दी त्याग”, “जब तक पढ़ी लिखी नहीं नार / तब तक कठिन सुधार पियाजी”, “खोला छोड़ दो / मिलणी रो बढ्यो प्रचार/ रोको सरदारों”, “नासमझ रहेंगी जब तक ये घरवालियाँ “ जैसी गालियों का वर्षों तक प्रचार रहा।

यह जानना भी दिलचस्प होगा कि श्लील और अश्लील गेरों की धाराएं साथ चलती रहीं और दोनों किस्म की गेरों में कभी टकराव नहीं हुआ। होता तो यह था कि दोनों ही पख के लोग एक दूसरे के मंच पर आकार प्रस्तुतियाँ देते थे और दोनों को भरपूर दाद मिलती थीं।

जोधपुर में हालांकि ‘गेरों’ में बड़ा योगदान पुष्कर्णा ब्राह्मणों का रहता है मगर उनमें मुसलमानों समेत सभी समुदायों के लोगों की सक्रिय भागीदारी होती है।

गेरों की इस परंपरा को थानवी माईदास और सत्यनारायण ‘मुलसा’ जैसे लोग आज भी जीवित रखे हुए हैं। माईदास, जिन्हें ‘गेरों का अमिताभ बच्चन’ कहा जाता है की ‘गेर’ में नृत्य और संगीत का माहौल हावी रहता है जो दर्शकों को पूरी तरह बाँधे रहता है।

‘मुलसा’ की ‘गेर’ अपने गीत संगीत के लिए विख्यात है। कृपाकिशन ‘रिन्दी’ इनके लिए गीत लिखते हैं तो अमरदत्त ‘भा’सा’ संगीत निर्देशन रते हैं। ‘मुलसा’ की मशहूर ‘गालों’ में है “कागद बाँच ने भेगी आइजे”, “नाथूरामसा वाली लाडकी सुपने में रंग जावे रे/ झोंझरके तारो टूटेला”। उनकी ‘गेर’ 40 वर्षसे भी अधिक समय से निकल रही है।

उनके अलावा शहर में चार पाँच और टीमें भी हैं जो इस परंपरा का परचम थामे हुए है। इनमें दो भाई दिनेश और नरेश बोहरा अपनी अलग पहचान रखते हैं।

जोधपुर के ‘गेरों’ की बात हो और ‘फायसा गेर’ का जिक्र न हो तो बात अधूरी रह जाएगी। इसका प्रचलन अब तो नहीं है मगर गेर परंपरा में इसका भी स्थान रहा है। यह पूरी तरह अश्लील गीतों की गेर होती थी जो लोढ़ों की गली से निकलती थी। इसका समय निश्चित था। वह सवेरे-सवेरे निकलती थी। बिरदा उस्ताद और मीड़ा महाराज आदि इसके प्रमुख थे। ऐसा रिवाज था इस ‘गेर’ का प्रमुख गायक वही होता था जो अपने मोहल्ले की गली या अपने घर के बाहर अपने गेरियों के साथ परिवार की बहू बेटियों के बीच बच्चों के साथ सबसे पहले गा सके। दूसरी गेर निकालने वाले भी सुबह सुबह ‘फायसा गेर’ अलग से भी निकलते रहे हैं।

जोधपुर में होली का रंग और उल्हास कृष्ण मंदिरों में भी जम कर नज़र आता है। वैष्णव या वल्लभकुल संप्रदाय का यहाँ बड़ा प्रभाव रहा है और आज भी है। विशाल गंगश्याम मंदिर में फगोत्सव की छटा निरखते ही बनती है। आधी रात तक लोगों की भीड़ जमी रहती है और सारा माहौल गीत, संगीत और नृत्य की छटाओं से भीगा रहता है। मंदिर में यह फगोत्सव कई दिनों तक चलता है।

(यह लेख वीणा समूह की मासिक पत्रिका स्वर सरिता के मार्च 2011 अंक में छपा)

Thursday, March 3, 2011

'Fathji' wrote Ranthambhore’s success story


Rajendra Bora

Jaipur. Fateh Singh Rathore who lost battle with cancer in Jaipur on Monday fought untiring batlles for more than three decades against the establishment and poachers to save tigers in Ranthambhore. He wrote the success story of Ranthambhore Tiger reserve which could not be carried forward by his predesessors.

Born in a desert village in the then Royal state of Marwar, near Jodhpur, with little vegetation Rathore, fondly called Fathji by wild life enthusiasts, was nothing in his family background that could forecast that he would become a great protector of endangered wild animals.

In his schooldays he was not a studious boy and once aspired to become an actor. His grandfather pushed him into the Navy which could not hold him more than six months. He tried to become a lawyer and sold soft coal for a while.

Rathore joined the Forest department in 1960 as a Game Ranger in Sariska. That was the turning point in the life of Fathji. His fascination with forest and wild life remained with him till his last. Four years later he was posted at Mount Abu where he remained till 1971.

His tryst with Ranthambhorev came when he was asked by the government to organise a tiger shoot in 1961 for Queen Elizabeth II of Great Britain and her husband Duke of Edinburgh. It will be interesting to know that government issued permits for hunting until 1969.

The “Tiger Man” Kailash Shankhla, who launched ‘Project Tiger’ with the blessings and support of the then Prime Minister Indira Gandhi, handpicked Fathji and included him in the first group of foresters that was sent to Wild Life Institutte of India in Dehradun to get trained in forest management.

Fathji developed Ranthambhore with passion and with consummate skill bringing the wild life forest reserve on the global map. He was officially appointed as Field Director of Ranthambhore in 1978. During his tenure the forest area was declared as a National Park.

In 1970s prevalent opinion of experts was that it was no longer viable for tigers. But he did miracle. Fighting heavy odds he succeeded in freeing the wild area from human activities by relocating 20 villages from the core area to out of the sanctuary.

Althoug he wrote a fantastic success story of Project Tiger in Ranthambhore but he was always at loggerhead with the local administration and politicians. He suffered heavily and his career too was jolted as he was forced to face indignation of being suspended from service and later posted in Jaipur. The National Park later started deteriorating with abject apathy by the civil administration and interference from different lobbies.

After retirement he formed a NGO Tiger Watch and fought for survival of tigers and was a role model to wild life conservationists. His knowledge of the behaviour of big cat was legendry. He protected the tiger putting his own life in danger receiving physical assaults.

He was awarded International Valour Award in 1983 for breavery in the field. He was also presented with WWF Lifetime Conservatyion Award in recognition of his outstanding contribution in this field.

The wild life conservationists would miss him.

(The obit piece published in Hindustan Times on March 3, 2011)

Mehboob Ali : An Honest Intellectual in Politics


Rajendra Bora

Eighty year old Mehboob Ali, who passed away early Wednesday morning in Bikaner, was basically an intellectual rather than a run of a mill politician. Honesty and commitment was his hall mark. He was like an alien in the today’s breed of politicians.

In a political system which does not allow an honest, independent and impartial person to survive Mehboob Ali, fondly called Mehboob Saheb, was a shining example of a politician who could not be corrupted. He showed his mettle serving as minister for Public Health Engineering Department (PHED) in first ever non-Congress government in Rajasthan in 1977 when no tempting offer of money and political pressure could deter him from his crusade against corrupt officials.

He was like a Rishi (saint) having great insight into ills of society. An intellectual we should be proud of. He could call a spade a spade. But he was a misfit. Hindus would not accept him because he was a Muslim. And Muslims would not accept him because of his radical views. But people who knew him loved him and adore him.

People remember him as a minister who rode on bicycle. He used to go to his ministerial office in secretariat from his official residence peddling a bike. On bike he went to attend functions in the capital and frequented his friends’ places. There was no gimmick in it. He was like that only.

Mehboob Ali had a humble beginning and remained humble all his life. But on principles and idealism he could never compromise.

Born in 1931 in village Malkisar in Bikaner district he did his graduation from Bikaner and studied law in Jaipur. He started his career as a peon in Agriculture Department and later served as Maal Babu in Railways. His literary and political leanings shaped his life. He practiced law and edited noted weekly ‘Saptaahaant’ and ‘Gurudeep’.

He was a wanderer in politics because of his unconventional ideas and views. He could win only one assembly election from Bikaner during Janata wave in 1977. After the Janata Party split he remained with BJP and became its state vice-president. It was apparent that a radical like him had no space in a saffron party.Later he joined Congress but there too he was a misfit. He also dabbled with a non functioning Sarvodaya Party.

A noted Delhi weekly listed Mehboob Ali among half a dozen prominent persons in the country who had their distinct mark on society. Others include industrialist Ratan Tata, and activists like Vinayak Sen, and Badal Sirkar.

In the death of Mehboob Ali we have lost a true son of Rajasthan who set an example of a clean political leader of integrity. He was intellectually rich but financially died a pauper.

(The piece published in Hindustan Times on February 24, 2011)

महबूब अली : सार्वजनिक जीवन में सादगी और ईमानदारी की मिसाल


राजेंद्र बोड़ा

महबूब अली, जिनका 80 वर्ष की आयु में गुरूवार को बीकानेर में निधन हो गया, बच रहे उन इने गिने राजनेताओं में थे जो जीवन पर्यंत अपने विचारों के प्रति निष्ठावान रहे और उनसे कभी कोई समझौता नहीं किया और हमेशा जमीन से गहरे जुड़े रहे। ऐसा उन्होंने किसी मजबूरी में नहीं किया। उन्होंने सत्य और निष्ठा का कठोर जीवन खुद चुना. उसके लिए कभी पछताए भी नहीं।

तत्कालीन बीकानेर रियासत के मलकीसर गाँव में 1931 के दिसंबर माह के अंतिम दिन जन्मे महबूब अली, जिन्हें सभी प्यार से महबूब साहब कह कर पुकारते थे, जमीन से उठे ऐसे नेता थे जिन्हें काजल भरी सत्ता की कोठरी भी अपने रंग में नहीं रंग पाई। जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति के आह्वान के साथ देश में 1977 में आपातकाल के बाद जो सत्ता परिवर्तन हुआ उनमें यदि महबूब साहब जैसे नेता और होते तो देश का आज नक्शा अलग होता। वे भैरोंसिंह शेखावत के नेतृत्व में राजस्थान में बनी पहली गैर कांग्रेस सरकार में मंत्री बने. उन्हें आज भी लोग “साइकिल वाले मंत्री” ने नाम से जानते हैं। राजधानी में अपने सरकारी आवास से सचिवालय में अपने आफिस तक, अपने मिलने जुलने वालों के यहाँ और सार्वजनिक समारोहों में वे साइकिल पर ही जाते थे. सादगी का यह उनका आडम्बर नहीं था. वे खुद ऐसे ही थे। उनको अन्य विभागों के अलावा महत्वपूर्ण जलदाय विभाग का कार्यभार मिला। भारी प्रलोभनों और दबावों के सामने वे अपने कभी नहीं झुके इसीलिए संगठित राजनीति के लिए वे हमेशा त्याज्य बने रहे।

अपने जीवन यापन की शुरुआत कृषि विभाग में चपरासी के रूप में करने वाले महबूब अली राजनीति के अभिजात्य वर्ग में कभी शामिल नहीं हो सके। उन्हें अपने विचारों से कोई नहीं डिगा सका। विचारों से वे ‘रेडिकल’ थे। इसका कारण उन पर एम एन रॉय का प्रभाव था। बीकानेर में छगन मोहता के वैचारिक आभामंडल में पनपी राजनेताओं और साहित्यकारों की पीढ़ी के वे प्रतिनिधि थे। रॉय द्वारा राजनैतिक दल ‘रेडिकल हयूमिनिस्ट पार्टी’ को भंग कर दिये जाने के बाद वे प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े। उसमें दो फाड़ होने पर वे बीकानेर के एक अन्य समाजवादी नेता माणिकचंद सुराणा की तरह संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से जुड़ गए। बाद में जब दोनों पार्टियाँ मिली और समाजवादी पार्टी बनी तो वे उसे सदस्य रहे। आपातकाल के बाद बनी जनता पार्टी में जब समाजवादी पार्टी का विलय हो गया तो वे उसके सदस्य हो गए। जनता पार्टी के टुकड़े होने पर वे भैरोंसिंह शेखावत के कारण भाजपा में रह गए और उसके प्रदेश उपाध्यक्ष भी बने। मगर वहाँ ‘रेडिकल’ विचारों के कारण उनका गुजारा संभव नहीं था। भाजपा छोड़ कर वे कांग्रेस में शामिल हो गए। मगर वहाँ उन जैसे आज़ाद विचारों की वहाँ भी कहाँ जगह थी। बाद में कुछ अकादमिक लोगों ने मिल कर ‘सर्वोदय पार्टी’ बनाई तो वे उससे जुड़ गए। मगर वह पार्टी कागजों तक ही रह गई। इसीलिए अपने जीवन के अंतिम दशक में वे स्वतंत्र विचारक की तरह ही रहे।

उन्होंने पत्रकारिता भी की। वे बीकानेर से निकालने वाले कभी बड़े ताकतवर माने जाने वाले अख़बार ‘सप्ताहांत’ के बरसों संपादक रहे। बाद में बीकानेर के प्रमुख बुद्धिजीवियों के साझा प्रयास से शुरू हुए महत्वपूर्ण प्रकाशन ‘मरूदीप’ के भी संपादक रहे। जब वे मंत्री बन गए तब ‘मरुदीप’ के संपादन का जिम्मा प्रख्यात साहित्यकार नंदकिशोर आचार्य ने संभाला। अंत तक महबूब अली की कलम के रंग ‘बीकानेर एक्स्प्रेस’ में नज़र आते रहे।

अपने जीवन और व्यवहार में वे जितने सहज और सरल थे अपने विचारों में उतने ही कठोर थे। कोई प्रलोभन, कोई दबाव उन्हें अपने विचारों के अनुसार चलने से नहीं डिगा सकता था। जब वे मंत्री बने तो बहुतों ने उन्हें एक मुस्लिम राजनेता के रूप में खुद को प्रस्तुत कराने का जबर्दस्त प्रयास किया मगर उन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर ही एक सच्चा मुसलमान बने रहना पसंद किया और राजनीति में धर्म का भावनात्मक खेल नहीं खेला। ऐसा करना विरले राजनेताओं के बस में होता है। इसीलिए वे विरले राजनेता थे।

जलदाय विभाग के मंत्री के रूप में भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी मुहिम की कहानी आज कहें तो वह सपना सा लगती है। किस प्रकार उनकी मुहिम को रोकने के लिए धन का प्रलोभन और राजनैतिक दबाव आए और उन्होंने कोई समझौता नहीं किया उसकी मिसाल नहीं मिलती।

कई बार कोई व्यक्ति धन के प्रलोभन से नहीं, दबाव से नहीं मगर यारी-दोस्ती में अपने ऊसूलों से समझौता कर लेता है। मगर महबूब अली, जो बड़े मिलनसार और दोस्तों के दोस्त थे, अपने ऊसूलों के चलते दोस्तों की बात भी नहीं मानते थे।

महबूब अली जैसा मस्त मौला, फक्कड़ तबीयत का आदमी जो वैचारिक स्तर पर बड़ा गहरा हो उसे वर्तमान चलन की राजनीति में अजूबा ही माना जाता है। मगर ऐसे लोगों से राजनैतिक और सामाजिक मूल्य पूरी तरह तिरोहित होने से बचे रहते हैं। महबूब अली के चले जाने की पीड़ा इसलिए और घनी हो जाती है।

एक बार जलदाय विभाग की बजट मांगों पर विधान सभा में हुई बहस का जवाब देते हुए उन्होंने कहा था “ हम जब सड़क पर चलते हैं तो बीच-बीच में अपने पाँव से जमीन को खुरच कर देखते भी रहते हैं कि हम जमीन पर ही हैं ना। हवा में तो नहीं उड रहे है”। महबूब साहब कभी हवा में नहीं उड़े। हमेशा जमीन से जुड़े रहे। कष्ट सह कर भी अपने ऊसूलों से कभी समझौता नहीं किया। राजस्थानवासियों को अपने इस सपूत पर हमेशा गर्व रहेगा।

(यह आलेख जनसत्ता के दिनांक 25 फरवरी, 2011 के अंक में छपा)

Saturday, February 12, 2011

अशोक गहलोत रखते हैं फूँक-फूँक कर कदम, मगर कदम के निशां तक नहीं


राजेंद्र बोड़ा

राजस्थान पत्रिका ने आज (12 फरवरी, 2011) के अंक में अपने पूर्व संपादक विजय भण्डारी का एक लेख “फूँक-फूँक कर कदम” प्रकाशित किया है। भण्डारी कहते हैं कि राज्य में अब तक हुए कुल 11 मुख्य मंत्रियों (नौ कांग्रेस, दो भाजपा) में अशोक गहलोत “पहले ऐसे मुख्य मंत्री हैं, जो आम आदमी की बोली बोलने में गुरेज नहीं करते हैं”। इसके लिए वे गहलोत के उस सार्वजनिक वक्तव्य को आधार बनाते हैं जिसमें कहा गया है कि पुलिस के थानेदारों की जानकारी में है कि उनके क्षेत्र में कौन चोर है, मगर वे उन्हें पकड़ते नहीं। भण्डारी गहलोत के इस वक्तव्य से खुद “चकित” हैं। वे कहते हैं कि “थानेदारों को राज्य के पदासीन मुख्य मंत्री द्वारा इससे बड़ा काला प्रमाणपत्र क्या हो सकता है? मुख्य मंत्री ने उनका चेहरा काला पोत के रख दिया है, लेकिन उन्हें (थानेदारों को) शर्म नहीं आती है”।

भण्डारी बाद में यहाँ तक लिख बैठे कि “अशोक गहलोत ने अपने द्वितीय कार्यकाल के 26 महीनों में प्रशासन के अनेक लोगों के मुँह काले पोत दिये मगर उनके कान में जूँ नहीं रेंगी”।

ऐसे वक्तव्यों में वे अशोक गहलोत के बड़े सुकोमल रूप को देखते हैं। वे यह भी कहते हैं कि “हालांकि नए कार्यकाल में कोई विशेष परिवर्तन हो गया हो ...ऐसा तो नहीं है, लेकिन चेष्ठा दिखाई देती है”।

यह सवाल उठाते हुए कि “गहलोत को अपनी कमीज ही चमकाने की चिंता क्यों है? भण्डारी खुद ही जवाब देते हैं गहलोत समझ गए हैं कि “राजनेताओं से अधिक आमजन जागरूक है। उसके सामने आपकी चोरी छिपती नहीं”।

भण्डारी आमजन की जागरूकता की बात तो करते हैं मगर गहलोत की चमकती कमीज पर कोई छाया नहीं पडे इसका भी ध्यान रखते हैं। गहलोत के प्रति ऐसा मोह दिखाने वाले वे अकेले पत्रकार नहीं है।

राज्य के सारे अख़बारों, जिसमें राजस्थान पत्रिका भी शामिल हैं, के पन्ने रोजाना ऐसे समाचारों से भरे रहते हैं जिसमें कानून, व्यवस्था और प्रशासनिक व्यवस्थाएँ छिन्न भिन्न हुई साफ दीखती है। मगर भण्डारी उन पत्रकारों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिन्हें इन सारी प्रशासनिक असफलताओं से गहलोत का दामन बचाने का मोह है। वरना क्या कारण है कि जिन प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों की अपराधियों से मिलीभगत की ओर गहलोत अपने वक्तव्य में बात कर रहे हैं उसके लिए लिए उन्हें साधुवाद दिया जाता है।

मुख्यमंत्री की यह साफ़गोई नहीं है। वरना गहलोत अपने मातहत अफसरों का मुँह काला पोतने वाला सार्वजनिक वक्तव्य देने से पहले अपनी भूमिका पर ध्यान देते। लोकतंत्र में शासन में बैठे राजनेता जनता के नुमाइन्दे होते हैं। जनता उन्हें राज में इसलिए भेजती है कि वे उनकी आकांक्षाएं और अपेक्षाएं पूरी करेंगे। आमजन जो जानता है उसकी मुख्य मंत्री से ताईद की जनता को दरकार नहीं है। आमजन चाहते हैं कि जो गड़बड़ी मुख्यमंत्री की जानकारी में आ गई है वह तो कम से कम दूर हो। राज्य के शीर्ष पर बैठा कोई राजनेता अपनी इस जिम्मेदारी से सिर्फ इसलिए नहीं बच सकता कि वह तो खुद ही जनता की समस्या बता रहा है। जनता चाहती है मुख्यमंत्री जी समस्याएँ बताना छोड़ें उनके समाधान की बात करे और उसे करके बताएँ। जनता अपने प्रतिधियों को इसलिए नहीं चुनती है कि वह कुर्सी पर बैठ कर उन्हें उपदेश देने लगे या वह कुछ कर नहीं पा रहा है उसके लिए अपनी कमजोरी का ठीकरा दूसरों पर फोड़ता रहे और बहाने बनाता रहे।

गहलोत शासन के प्रमुख हैं इसलिए वे अपने प्रशासनिक अफसरों के बारे कुछ भी कह सकते हैं। मातहत उन्हें जवाब भी नहीं दे सकते। प्रशासन तंत्र में बैठे लोगों को संवैधानिक और सेवा नियमों की मर्यादाओं का पालन करना होता है। राजनेता के लिए सब छूट है। इसलिए गहलोत तो अपने प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों का “काला मुँह” कर सकते हैं पर खुद उनसे जवाब कौन माँगे। लोकतंत्र में जनता यह जवाब पाँच साल बाद माँगती है। मगर पाँच साल के कार्यकाल के दौरान निर्वाचित प्रतिनिधियों से सवाल करने का दायित्व अखबारों का होता है क्योंकि लोकतांत का ‘चौथा स्तंभ’ कहलाने वाले पत्रकार भी जनता के नुमाइन्दे होते है जिनका काम केवल सूचना देना नहीं होता बल्कि लोग जो बोल कर कह नहीं सकते उसे अभिव्यक्ति देना। अभिव्यक्ति की आज़ादी हमें अपने संविधान से मिलती है। किसी के रहम-ओ-करम से नहीं। मगर जब हम कहते हैं “मीडिया” तब सूचना के सभी स्रोत – अख़बार, रेडियो, टीवी समेत – व्यवसायगत हो जाते हैं। मीडिया बाज़ार की चाल चलता है और उसी के लिए हो रहता है। बाज़ार सिर्फ पूंजी के लिए होता है मगर वह यह भ्रम पैदा करने में सफल रहता है कि वह ग्राहक के लिए है। खुले बाज़ार के पैरोकार ग्राहक को चुनने की छूट देने का लोकतान्त्रिक ढोंग रचते हैं। उसी प्रकार आज के अख़बार, जो अब प्रिन्ट मीडिया कहलाने लगे हैं, यह भरम बनाए रखते हैं कि शासन-प्रशासन पर खोजी निगाह उनकी है और वे जनता की बात करते हैं। मगर वास्तव उनका सरोकार अपने मुनाफे से होता है जिसे वे उंन स्रोतों से भी पाते हैं जिसका उनके सूचना के व्यवसाय से कोई संबंध नहीं होता। अख़बार से मुनाफा पाने के साथ वे इसके प्रभाव का उपयोग अपने इतर व्यवसायों के हित साधने का बड़ी चालाकी से करते है। यह चालाकी हमें मौजूदा राजनैतिक दौर में साफ नज़र आती है। यदि यह चालाकी नहीं होती तो तो प्रशासनिक असफलता के लिए गहलोत से सवाल क्योंकर नहीं होता। आज के मीडिया में भण्डारी अकेले नहीं हैं जो यह तो कहते हैं कि आम आदमी तकलीफ में है, हर ओर भृष्टाचार का आलम है मंत्री नाकारा हैं और सबसे बढ़ कर राज का कोई रुतबा नहीं रह गया है मगर इसके लिए वे मासूमियत से गहलोत को सुरक्षा कवच भी देते हैं और कहते हैं कि गहलोत तो बड़े स्वछ हैं मगर उनकी टीम ठीक नहीं है। कोई यह नहीं कहता कि गहलोत कमजोर व्यक्ति या नेता हैं। सभी उनकी राजनैतिक ताकत को हिमालय जैसी मानते हैं। यदि वे ऐसे ताकतवर हैं तो उन्होने कमजोर और भृष्ट टीम क्यों चुनी। इसका जवाब उनकी पैरवी करने वाले मीडियाकर्मी यह कह देते हैं कि उनकी राजनैतिक मजबूरी है। मजबूरी वाला नेता ताकतवर हुआ या कमजोर हुआ? एक तरफ सभी गहलोत को एक ताकतवर नेता मानते हैं मगर उन्हें अपने मंत्रियों और प्रशासनिक अधिकारियों के सामने लाचार भी मानते हैं। यह अंतर्विरोध किसी को नहीं दिखता या देखना नहीं चाहते।

गहलोत का सत्ता व्याहमोह अनोखा है। उनका सच सिर्फ अपनी कुर्सी का सच है। उन्होंने अपने आभामंडल का एक सुरक्षा घेरा बना रखा है। मगर इस घेरे से बाहर वे खुद भी कुछ नहीं देख पा रहे है, यह कड़वा सच कोई उन्हें नहीं कहता। यह घेरा उन्हें दीवार पर लिखी लिखाई नहीं देखने देता। यह घेरा उनकी सफलताओं के कसीदों की इतनी तेज रोशनी करता है कि उसमें उनकी खुद की आँखे चौंधिया जाती है और उन्हें जमीनी हकीकत के मुकाबले इसी घेरे की दुनिया सच लगने लगती है।

गहलोत के पिछले कार्यकाल में भी ऐसा ही था। तब उनके अपने शिवचरण के अख़बार ‘लोक दशा’ के पहले पन्ने पर एक आलेख ने गहलोत को जगाने का प्रयास करते हुए लिखा था कि वे इस घेरे के बाहर देखें। मगर गहलोत ऐसा नहीं कर पाये और चुनाव परिणामों ने वास्तविक तस्वीर से उन्हें रूबरू करा दिया। उन्हें परास्त कर सत्ता में आई वसुंधरा राजे भी अपनी शाही घेरे की चकाचौंध से व्यामोहित रही और अपने घेरे के बाहर की दुनिया का पता उन्हें चुनाव परिणामों ने ही दिया।

फिर चुनाव जीत कर आए गहलोत से लोगों की जबर्दस्त अपेक्षा थी कि वे अपने पिछले कार्यकाल और काम काज के नतीजों से बहुत कुछ सीख कर आए होंगे और अपने दूसरे कार्यकाल में राजस्थान को मजबूत और कुशल नेतृत्व देंगे। मगर मजबूती की जगह एक ऐसा लाचार राजनेता हमारे सामने आता है जिसकी सारी कोशिशें कुर्सी के लिए होती है। जो अपने प्रशासन को कुशल नहीं बना सकता। वह समझौते करता है। जो आदर्शों की बातें करता है मगर जिसमे उन्हें व्यवहार में लाने की कोई गंभीरता नहीं। गहलोत ऐसे क्यों है इसके लिए वे राजनैतिक परिस्थितियां जिम्मेवार हैं जिसमें उन्होंने सत्ता की सीढ़िया चढ़ी। जब उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया तब राज में से नीतियाँ तिरोहित हो रही थीं और व्यक्तिवाद अपनी नींव पक्की कर रहा था। ऐसे में जोधपुर से अशोक गहलोत के रूप में जो राजनेता प्रदेश के परिदृश्य पर उभरा वह ‘सेल्फ मेड’ था। उसने कांग्रेस की आंतरिक राजनीति को पूरी तरह साध लिया। अब वे अपने ही बुने राजनीति के जाल में घोर अकेले हैं। उनका अकेलेपन का शोर उनके वक्तव्यों में फूट पड़ता है। वे मीडिया के जरिये अपनी छवि को सरल, सौम्य और मिस्टर क्लीन दिखाये रखने में सफल रहते हैं। मगर वे भूल जाते हैं कि मीडिया द्वारा बनाई गई छवि एक हद तक ही बनी रह सकती है। इसमें ख़तरा यह होता है कि मीडिया में बनवाई गई छवि को खुद वह व्यक्ति सच मानने लगता है। राजस्थान पत्रिका में छपा यह लेख गहलोत को ऐसे ही भुलावे में डालता है।

Wednesday, February 9, 2011

गीत-संगीत में ढल कर आम जन तक पंहुचे गांधी


राजेंद्र बोड़ा

महात्मा गांधी का संगीत से क्या वास्ता हो सकता है। सतही तौर पर देखने पर गांधीजी का जीवन बड़ा ही नीरस और उबाऊ लग सकता है। एक राजनेता और समाज सुधारक की महात्मा गांधी की छवि में आम तौर पर कला या संगीत के लिए कोई स्थान नहीं दिखता। संगीत और अन्य कलाओं के लिए उनके पास वक्त ही कहाँ था। देश की आजादी और विभिन्न समुदायों खास कर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच भाईचारे को मजबूत बनाने के लिए प्रयासों में ही उनका सारा जीवन बीत गया। खुद उनके जीवनकाल में लोगों को लगता था कि वे जिस प्रकार का जीवन व्यतीत करते हैं और जिस सादे जीवन की अपेक्षा वे लोगों से करते हैं उसमें संगीत जैसी कलाओं का कोई स्थान नहीं हो सकता। ख्यातनाम गायक दिलीप ने एक बार गांधीजी से संगीत की चर्चा छेड़ ही दी। दिलीप बंगाल के जाने माने नाट्यकार द्विजेंद्रलाल राय के बेटे थे और गायन के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति पा चुके थे। संगीत की बात छेडते हुए दिलीप ने कहा महात्मा जी मुझे लगता है हमारे स्कूलों और कालेजों में हमारे खूबसूरत संगीत की उपेक्षा होती है। जवाब में गांधी जी बोले “यह दुर्भाग्यजनक है। मैंने तो हमेशा ही यह कहा है”।

दिलीप ने जब महात्मा जी से कहा कि वे तो इस भ्रांति में थे कि आपके जीवन में कला का कोई स्थान नहीं है। मैं तो यह सोचता था कि आप जैसा संत तो संगीत का विरोधी होगा। गांधी जी चौंक कर बोले “संगीत के खिलाफ और मैं?” फिर बापू कहने लगे “मेरे बारे में लोग ऐसी ऐसी बातें फैला देते हैं कि मेरे लिए उनका प्रतिकार करना भी असंभव हो जाता है। नतीजा यह होता है कि जब मैं कहता हूँ कि मैं खुद एक कलाकार हूँ तो लोग मुस्करा देते हैं”। गांधी जी ने आगे और खुलासा किया कि “मैं तो मानता हूँ कि धर्म का विकास बिना संगीत के हो ही नहीं सकता था”।

हम जानते हैं कि गांधी की प्रार्थना सभाओं में सभी धर्मों के भजन गाये जाते थे। यह भजन गायन संगीत नहीं तो और क्या था। महान गायिका जुथिका राय ने कुछ दिनो पूर्व जयपुर में गांधीजी का एक प्रसंग सुनाया था। गांधी जी कलकत्ता आए तब वे पहली बार उनके “दर्शन करने” गई थी। तब अत्यंत व्यस्त होने के बावजूद गांधी जी ने जुथीका राय से भजन सुने थे। जब जुथीका रॉय पहुँची तब गांधीजी नहाने के लिए जा रहे थे। उन्होंने जुथीका से कहा मैं पास के कमरे में नहाता हूँ तुम यहाँ बैठ कर गाओ। और जब तक गांधी जी नहा कर बाहर नहीं आ गए किशोरी जुथीका एक के बाद एक भजन गाती रही। गांधी जी बहुत प्रसन्न हुए और गायिका को खूब आशीर्वाद दिया। फिर बोले तुम्हें शाम को प्रार्थना सभा में गाना है। जुथीका को को प्रार्थना स्थल तक ले जाने के लिए एक मोटर कार आई और कलकत्ता में हजारों लोगों के समक्ष जुथीका के भजन के साथ गांधी जी की सभा का समापन हुआ।

कहा जाता है कि एक बार नारद जी ने भगवान विष्णु से पूछा कि आप कहाँ निवास करते हैं ?
भगवान ने कहा :

नाहं वसामि वैकुंठे योगिनां हृदये न च,
मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद ।


अर्थात न मैं वैकुंठ में वास करता हूँ और न योगियों के हृदय में।
हे नारद जहाँ मेरे भक्तगण मेरा गान करते हैं मैं वहाँ वास करता हूँ।

गांधीजी की प्रार्थना सभाओं में सभी धर्मों के गीतों का गान होता था। इसीलिए वहाँ भगवान विष्णु का वास होता था। इसीलिए वहाँ से प्रेम और भाईचारे की गंगा प्रवाहित होती थी।

गांधीजी का भारतीय जन जीवन पर गहरे तक प्रभाव रहा। वे हर परिवार के बुजुर्ग या मुखिया की तरह हो गए। इसीलिए कवि ने कहा “चल पड़े जिधर दो डग मग में/ चल पड़े कोटि पग उसी ओर”।

गांधी की गूँज कवियों की कविताओं में और आम जन के लोक गीतों में जाम कर उभरी। गांधी ने सूट कातने का नारा दिया तो हर तरफ यह गीत गूँज उठा “कतली कातो मेरे भाई इसको गांधी ने अपनाई”।

अहिंसा के पुजारी के लिए देश के बच्चे बच्चे ने गया “दे दी हमें आजादी बिना खड़ग बिना ढाल/ साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल।“

अपनी मृत्यु तक गांधीजी के सचिवे रहे महादेव देसाई के बेटे नारायण देसाई तो देश के कोने कोने में गांधी कथा का वाचन करते फिरते हैं और हर जगह उनके गान को सुनने के लिए लोग लालायित रहते हैं।

गांधी के महाप्रयाण के बाद राजेंद्र क़ृष्ण की लिखी गांधी कथा जिसे हुस्नलाल भगतराम ने सुरों में बांधा था घर-घर गूँजी। “सुनो – सुनो ए दुनिया वालों बापू की ये अमर कहानी” को कौन भूल सकता है जिसे मोहम्मद रफी ने बड़े मनोयोग से गाया था।

जोधपुर में विवाह के मौके पर पुष्करकरणा ब्राह्मणों में महिलाएँ जो गीत गातीं हैं उन में गांधीजी का भी जिक्र आता है। एक गीत में महिलाएँ गातीं है चरखा कातो क्योंकि गांधी जी ने ऐसा कहा है। पुष्करणा ब्राह्मणों के विवाह गीतों में सामाजिक सुधार की यह भावनाएँ स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों और सामन्ती शासन से लोहा ले रहे सेनानियों पर गांधी जी के प्रभाव के कारण समाहित हुई। इन सेनानियों में एक प्रमुख नेता थे जयनारायण व्यास। वे न केवल राजनेता थे बल्कि गीत संगीत और नृत्य में स्वयं बड़े माहिर थे। उनके लिखे गीतों नें लोगों में आज़ादी की लड़ाई का जोश ही नहीं फूंका बल्कि सामाजिक कुरीतियों पर भी वार किया और समाज को सुधार की तरफ प्रेरित किया। जयनारायण व्यास जो बाद में राजस्थान के मुख्यमंत्री बने ने गांधीजी पर एक गीत लिखा और गाया भी। वह गीत उनकी ही आवाज में मारवाड़ी रिकार्ड कंपनी ने जारी किया जो आज हमारी ऐतिहासिक धरोहर है।

उस गीत को आज फिर याद करना बड़ा ही अनोखा अनुभव है। सीधे सरल शब्दों में मारवाड़ी में व्यास जी ने गाया “साथीड़ा रे, करमोजी रे घरे जायो रे/ मोहन जी नाम धरायो रे / भारत आज़ाद करायो रे / म्हारो बाबो गांधीजी।

आगे वे लोगों को सीख देते हुए गाते हैं “साथीड़ा गांधी दोय बात बताई रे / हिंसा तज राख सच्चाई रे / आ सीख घणी सुखदाई रे / म्हारो बाबो गांधी जी”।

व्यासजी अपने गीत में गांधी के हवाले से केवल अहिंसा और सच्चाई की ही बात नहीं करते बल्कि समाज में व्याप्त कुव्यसनों को छोडने और ईमानदारी पर भी ज़ोर देते हैं और गाते हैं “साथीड़ा रे पर नारी ने माता जाणो रे / पर धन पापोड़ो मानो रे / जन सेवा ने अपनाणो रे / म्हारो बाबो गांधी जी”।

गांधी के रास्ते को निराला बताते हुए शेरे राजस्थान कहलाने वाले जयनारायण व्यास आखिर में कहते हैं “साथीड़ा रे गांधी रो पंथ निरालो रे / सब कौमां हिल-मिल चालो रे/ थे छूआ-छूत मिटावो रे / म्हारों बाबो गांधी जी”।

उस जमाने की 78 आरपीएम रेकार्ड पर गीत के तीन अंतरे ही आते थे इस लिए व्यास जी के गीत का चौथा और अंतिम अंतरा उसमें नहीं है। उस अंतरे में वे उन्होंने कहा : “गांधी रे पथ पर चालो रे / सत न्याय मार्ग अपनालो रे / अड़कर अन्याय मिटलों रे / म्हारों बाबो गांधी जी।

नारी उत्थान और सामाजिक सुधार के लिए जयनारायण व्यास के गीतों अन्य गीतों में भी गांधी की सीख की झलक मिलती है। उनके एक अत्यंत लोकप्रिय गीत “सुनो सुलक्षणी नार” में वे कहते हैं : “सुनो सुलक्षणी नार बात तेरे हितकारी है, विनय हमारी है / ... बचा बचा तू बचा देश को, जो कुछ भी उपकारी है”। आज भी जब स्त्रियाँ यह गीत गाती हैं तो उसमें गांधी के बोल सुनाई पड़ते हैं : “कह निज पति को प्रेम भाव से, जो तो कृष्ण मुरारी है / देशी पहनूंगी यह बात मैंने विचारी है, विनय हमारी है / चरखा ला दो मैं कातूंगी, इसकी छवि कुछ न्यारी है... कते सूत से मुझे बनादो, वस्त्र सभी जो जारी है”

इस प्रकार गीत और संगीत में ढल कर महात्मा गांधी के विचार और उनका जीवन दर्शन आम जन तक पंहुचे और समूचे देश में एक ऐसी चेतना जगाई जिसने ‘हम भारत के लोग’ वास्तव में अपनी सामर्थ्य पहचान सके।

(स्वर सरिता के फरवरी 2011 के अंक में प्रकाशित आलेख)

Monday, February 7, 2011

जयपुर लिट्रेचर फेस्टीवल : कंचन के सहारे साहित्यिक गुणों को परिभाषित करने का प्रयास


राजेन्द्र बोड़ा

राजधानी में होने वाला जयपुर लिटरेचर फेस्टीवल, अंतर्जाल (इंटरनेट) के एक खबरिया मुकाम ‘डेली बीस्ट’ के मुताबिक, विश्व के अव्वल नंबर के समागमों में शुमार हो गया है। उसने इसे “धरती पर साहित्य का महानतम प्रदर्शन” बताया। आयोजक खुश थे कि उनके प्रयासों की सफलता का डंका सभी मानने लगे हैं। लिटरेचर फेस्टिवल का इस बार यह छठा सालाना संगम था। इस समारोह की कल्पना को जयपुर में पहली बार साकार ब्रितानवी मूल की महिला फेथ सिंह ने जयपुर विरासत फ़ाउंडेशन के झंडे तले किया था। छह सालों के सफर में इस आयोजन की सफलता इसी से आँकी जा सकती है कि इस बार उसके पास प्रायोजकों की भीड़ थी। प्रमुख प्रायोजक डीएससी कंपनी थी जो राजमार्ग और रेल पथ के साथ पन बिजली उत्पादन के क्षेत्र में बड़ी निवेशक है। समारोह पर बड़ा निवेश करने की एवज में इस बार उसके नाम से – “डीएससी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल” का आयोजन हुआ।

हर बार की तरह इस बार भी जलसे में अभिजात्य लोगों की खूब रौनक रही। यह सवाल अलहदा है कि क्या यह अभिजात्य वर्ग सचमुच साहित्य पढ़ता है या उसे तस्वीर की तरह देख कर अलग रख देता है या उसे अपने ड्राइंग रूम में सजा देता है।

अभिजात्य वर्ग के लोग कभी-कभी अवकाश चाहते है। उच्चतर किस्म का काम करके – बौद्धिक काम, आध्यात्मिक काम। कुछ समय के लिए फुर्सत की तलाश। मार्शल मैक्लूहन ऐसे लोगों को “ड्राप-आउट” की संज्ञा देते हैं। ऊबे हुए लोग, समाज विमुख लोग। दूसरे लोग उनसे जुड़ना चाहते हैं क्यों कि वे महत्व चाहते हैं। जैसे एक देह से निकल कर दूसरी देह में घुस जाने की चाह।


आलीशान मेले में शामिल लोगों को अपनी अहमियत मालूम थी। अहमियत रखने वालों मे शामिल होने की ललक हर प्रतिभागी में थी। सहभागियों में अपने बड़प्पन का छद्म था। बुद्धिवाद का नजारा चहुं ओर बिखरा पड़ा था। डिज़ाइनर चश्मे, डिज़ाइनर परिधान, डिज़ाइनर भौहें, डिजाइनर काजल। नई वर्ण व्यवस्था का नया डिजाइनर वर्ग। शास्त्र जीवी होने का अभिमान लिए अर्थ जीवियों का यह अद्भुत संगम था।

एक भिखारी द्वारा अपने बच्चे को लेकर वहाँ पहुँचने पर उसका भी वहाँ स्वागत का घोष करके आयोजकों ने उसे बराबरी का अधिकार देने का बड़प्पन दिखाया।

स्थानीय भागीदारों को लगा जैसे वे साहित्य के अभिजात्य वर्ग में शामिल हो रहे हैं मगर वास्तविकता में वे उनके अनुगामी बने। आयोजक आश्रयदाता थे। समृद्धवर्गीय स्वार्थ। आयोजन समृद्धि का एक उपकरण।

यह आयोजन बाज़ार जनित था। बाज़ार को आडंबर की जरूरत होती है। भारतीय संस्कृति और पश्चिम में यही फर्क है। भारत की बौद्धिक परंपरा पश्चिम की बौद्धिक परंपरा से भिन्न रही है। उनके लिए संस्कृति सिर्फ समारोह है या इतिहास है।

प्रोफ़ेशनल राइटर्स – जो धड़ाधड़ छपे और खूब पैसे कमाए। बाज़ार को ऐसे लेखकों की ही जरूरत होती है जो उसे भी कमाकर दे। ऐसे फेस्टीवल एक उपक्रम होते हैं।

बाज़ार को ऐसे लेखक चाहिए जो उसके लिए लिखे। वह अपना उत्पाद खपाने और उसके उपभोक्ता पैदा करने के लिए ऐसे फेस्टीवल करता है। यह रीत दुनिया भर में चल रही है।

तात्कालिक आवश्यकताओं कि पुस्तकें ही बाज़ार में सबसे अधिक दिखती हैं। नया दौर कहानीनुमा इतिहास लिखने का है।

जो छप रहा है वह खरा हो आवश्यक नहीं है। परंतु वही खरा है इसका भ्रम बनाने और उसके खरीददार पैदा करने में आज का विज्ञापन युग का बाज़ार पूरी तरह सक्षम है।

बाज़ार में क्या चलना चाहिए यह भी बाज़ार की ताक़तें ही तय करती हैं। इसे कुछ लोग साहित्यिक सद्प्रयास कहते हैं। बाज़ार की यह खूबी होती है कि वह यह भुलावा सफलता से दे देता है कि उसके यहाँ विरोधी के लिए भी जगह है। ऐसा करते हुए वह सर्वव्यापी हो जाता है जो उसका धर्म है। इसीलिए समारोह में चे गवेरा, जिसने पूरी उम्र पूंजी के आधिपत्य से लड़ते हुए गुजारी और अपना जीवन कुरबान कर दिया, की जीवनी पर चर्चा को पूंजीवाद की पोषक बहुराष्ट्रीय कंपनी गोल्डमैन साक्स प्रायोजित करती है तो क्या आश्चर्य। यह भी अभिजात्य वर्ग का मनोरंजन होता है। बाबा नागार्जुन की फकीरी की बातें सुन कर सहभागियों को आनंद हुआ और मामूली लोगों का मसीहा गैर मामूली लोगों के रंजन का साधन बना।

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ ने एक बार अखिल भारतीय रेडिकल ह्यूमेनिस्ट एसोसिएशन के द्विवार्षिक सम्मेलन में स्वागत भाषण देते हुए जो बात कही थी वह आज याद आती है। उन्होंने कहा था: “हमारा सार्वजनिक जीवन एक व्यापक दूषण से दूषित है जिसे अंग्रेजी अभिजात्यवाद कहा जा सकता है। मैंने कई बार सोचा है कि क्या यह बात सच नहीं है कि अंग्रेजी के प्रति इस मोह के और सत्ता की राजनीति के बीच एक घनिष्ठ संबंध है।... इसका यह अर्थ नहीं कि अंग्रेजी का परित्याग या बहिष्कार किया जाये, आशा यही है कि उसे उसके उचित पद पर बैठाया जाए और उसके साथ जुड़ी हुई उच्चता और अभिजात्य की भावना का परित्याग किया जाये। अंग्रेजी के साथ सत्ता के अधिकार का जो दावा जुड़ा रहता है उसका खंडन किया जाए”।

अंग्रेजी की आक्रामकता केवल शोषण के लिए रही है। अंग्रेज दूसरी दुनिया पश्चिम से आए, यहाँ बसने के लिए नहीं केवल मुनाफा कमाने के लिए - शोषण करके। हमारे पास इनका सीधा रचनात्मक और ध्वंसात्मक जवाब न तब था न आज है।

आज की राज व्यवस्था ने इस आयोजन को सांस्कृतिक समारोह माना। फिल्म अभिनेता सलमान खान को अपना प्रिय मानने वाली राजस्थान की कला और संस्कृति मंत्री बीना काक, जिन्हें अपने दो वर्ष के कार्यकाल में राज्य की कला संस्कृति, भाषा और साहित्य अकादमियों की एक बार भी सुध लेने की फुर्सत नहीं मिली, वे इस आयोजन पर इतनी मेहरबान हुई कि उसके लिए राज कोष से दस लाख रुपयों का अनुदान घोषित कर दिया।

हमारे राजनेताओं को यह दंभ रहता है कि वे संस्कृति और साहित्य पर अनुग्रह करते हैं। मगर वे ही बाज़ार के सामने मिमियाते हुए उसके लिए सार्वजनिक कोष की राशि उंडेलते नहीं अघाते। वैसे आज की सरकारों से सुबुद्धि की अपेक्षा करना व्यर्थ है। ऐसे समय हमें चिंतक लेखक विद्यानिवास मिश्र की वह टिप्पणी याद आती है जिसमें उन्होंने कहा था “शूद्र समाज तो वह है जहाँ कंचन के सहारे सारे गुण परिभाषित होते हों”।

ऐसे फेस्टीवल बाज़ार के हो रहे लेखकों की ख्याति बढ़ाने के विज्ञापनी जतन करता है। इसमें आज का मीडिया उसका भागीदार बनता है। कभी इसी फेस्टिवल में स्थानीय अस्मिता के सवाल पर फेस्टीवल की एक प्रमुख कर्ताधर्ता नमिता गोखले से तूँ-तूँ मैं-मैं की हद तक उतर जाने वाला ‘दैनिक भास्कर’ इस बार उसका प्रायोजक था। बाज़ार ने अखबारों की यह मजबूरी कर दी है कि उन्हें यदि उसका साथ चाहिए तो अपने ऐसे पाठक बढ़ाए जो बाज़ार के अन्य उत्पादों के उपभोक्ता भी हों। ऐसे ही उपभोक्ताओं की तलाश में ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’, ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ और ‘दैनिक भास्कर’ जैसे अपने को सबसे बड़ा कहने वाले अख़बार फेस्टीवल में खुले हाथों से मुफ्त बाँटे जा रहे थे।

फेस्टीवल का दामन पकड़ने में ‘दैनिक भास्कर’ से पीछे रह गए दूसरे प्रमुख अख़बार ‘राजस्थान पत्रिका’ की खीज उसके प्रथम पृष्ठ पर रामकुमार की एक प्रभावी टिप्पणी के रूप में सामने आई “... कौन ठगवा नगरिया लूटन हो”।

समारोह में साहित्यिक प्रेरणा को उकसाने का कोई श्रम हुआ हो हमें नहीं मालूम। एक अनुशासित समय ढांचे में सभी कुछ डिजाइन की हुई चीजें। जैसे सबसे पहले सूत्रधार का वक्तव्य फिर लेखक से कुछ सवाल जिसके जवाब उसी किताब की प्रस्तावना में जिस पर चर्चा की जा रही हो मौजूद होते है जिसे वह फिर दोहरा देता है। इसके बाद लेखक द्वारा किताब के कुछ अंशों का वाचन और अंत में सामने जुटे लोगों को लेखक से सवाल करने की इजाजत। मगर उनमें सवाल कम अपना ज्ञान बघारने की मत्वाकांक्षा अधिक झलकती है।

इसीलिए आम आदमी आयोजकों की दिखावटी नेकनीयता के बावजूद समारोह से दूर रहा। कोई रोक टोक नहीं थी। सभी के लिए एंट्री फ्री। मगर जो अंदर थे वे जलसे का डिज़ाइनर तमगा गले में लटकाए रखने की अजीब तहज़ीब से बंधे थे।

यह हमारे समय और समाज की विडंबना है कि हमारी सामाजिक चेतना को झंझोड़ने वाले सभी साधन ऐसे लोगों के हाथों में है जो तेजी से केंद्रित होते जा रहे हैं और हमारी बुद्धि को कंडीशंड कर रहे हैं। बुद्धि को कुंठित और निष्प्राण किए बिना कोई भी निकृष्ट स्वार्थपरकता संभव नहीं है।

ऐसे आयोजनों में शामिल होने वाले अपनी आत्मिक पराजय को शायद स्वीकार नहीं करें मगर बाज़ार की जीत को तो सभी को स्वीकार करना ही पड़ेगा।

ऐसे जलसे एक पाखंड रचते हैं। कहा गया है कि लेखन या तो लेखक के लिए होता है या मनोरंजन के लिए। दोनों रास्ते विनाश के है। फेस्टीवल से यही रास्ता निकलता है।