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Showing posts from 2011

झगड़े की जड़ 'फिट टू सेल'

राजेंद्र बोड़ा पत्रकारों का मीडियाकर्मी बनने का सफर बहुत पुराना नहीं है। वैसे ही जैसे प्रेस का मीडिया में तब्दीली का सफर। इक्कीसवीं सदी की दहलीज़ से शुरू हुए इस सफर को बहुत देर नहीं हुई है। लेकिन छोटे से सफर में ही पत्रकारिता और पत्रकारों का बहुत कुछ बदल गया है। जब तक पत्रकारिता थी तब तक प्रेस थी, तब तक अख़बार थे, तब तक छपे हुए शब्द थे। तब भले ही अख़बार छोटे होते थे परंतु उनके संपादक बहुत बड़े होते थे। अख़बार से 'प्रिन्ट मीडिया' बन गए समाचार पत्र अब बहुत बड़े होने का दावा करने लगे हैं। लाखों में अपनी प्रसार संख्या के बूते पर वे यह दावा दम ठोक कर करते हैं। इस सफर में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने भी धमाकेदार शुरुआत की जिसकी होड़ में प्रिन्ट मीडिया भी पढ़ने के साथ देखने वाला उत्पाद बन गया। पत्रकारिता जब बाज़ार का उत्पाद बन जाये तब अख़बार और टीवी चैनलों के दर्शक सभी सिर्फ ग्राहक होते हैं जिनकी जरूरत उत्पादनकर्ताओं के लिये केवल मुनाफा कमाने के लिए होती है। मीडिया का संचालन बाज़ार की ताक़तें करने लगे तब अभिव्यक्ति की आज़ादी, लोकतान्त्रिक सिद्धांत, मानवीय अधिकारों की रक्षा और एक खुले

सात पीढ़ियों के लिए इंतजाम

राजेंद्र बोड़ा सारा मीडिया जगत इस बात के इंतजाम करता है कि हम उसकी इस सूचना से इतराएँ कि भारतीय व्यापार और उद्योग की हस्तियां विश्व के सबसे अधिक अमीरों की सूची में स्थान पा रहीं हैं। ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि नई अर्थ व्यवस्था के चलते देश की संपन्नता में इजाफा हो रहा है जिसके लिए सभी को उत्सव मनाना चाहिए। यह सच है कि दुनिया के अमीरों की सूची में शीर्ष स्थानों पर भारत के लोगों के नाम आने लगे हैं और सरकारी तंत्र से जुड़ा, खास कर शहरी इलाकों का, मध्यम वर्ग का एक तबका छठे वित्त आयोग की सिफ़ारिशों के हिसाब से वेतन पाने से वित्तीय संपन्नता से सरोबार हो रहा है और वह विलासिता की चीजों पर खर्च को बढ़ा कर बाज़ार की अपेक्षाओं को पूरा कर रहा है। गावों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना का पैसा पहुंचाया जा रहा है जिससे बाज़ार को मदद मिलती रहे। बाज़ार को साध लेने वाला और उसी का होकर रह जाने वाला आज एक पुराने मुहावरे के अनुसार “सात पीढ़ियों का सामान” कर रहा है। आज जिस प्रकार से धन कमाने की लोलुपता बढ़ती जा रही है वह इस मुहावरे को अर्थहीन कर रही है। पहले एक व्यक्ति अपनी आने वाली

कराख रो तो जल भलो: मगर जल से रिश्ता फिर कैसे बने

राजेन्द्र बोड़ा सदियों से राजस्थान के लोग पानी की कमी का सामना करते रहे हैं। एक तो यहां का गर्म जलवायु, दूसरी तरफ वर्षा की हमेशा कमी और तीसरे कोई बारहमासी नदी नहीं होना। साथ ही बड़ा भू भाग रेगिस्तानी या अर्द्धशुष्क। मगर प्रकृति से मिली ऐसी कठोर परिस्थितियों में भी यहां जो कला, संस्कृति, तथा जीवन शैली पल्लवित हुई और मानवीय मूल्यों का विकास हुआ वह अनोखा है। यहां के लोगों ने प्राकृतिक विपदा में भी अपने जीवन को उत्सव बनाया। अपने अनुभवों से उन्होंने प्रकृति से सहकार करना सीखा और पीढ़ी दर पीढ़ी अपने अनुभवों से नया ज्ञान पाने और उसे आगे बढाने की परंपरा डाली। जहां वर्षा के देवता इंद्र की मेहरबानी कम होती हो वहां संस्कृति, सामाजिक ढांचा और परंपरा कम पानी में गुजारा करना सिखाते हैं और वैसे ही मानवीय मूल्य प्रतिष्ठित करते हैं। राजस्थान के लोगों ने कभी पानी की कमी का रोना नहीं रोया। जितना प्रकृति ने दिया उसी को प्रसाद मान कर शिरोधार्य किया। हालांकि पानी की कमी से होने वाली मानवीय तकलीफें यहां के लोक गीतों और संगीत में गूंजी मगर वे दुःख के नहीं उत्सव के स्वर थे। महाभारत युद्ध जब समाप्त सोने

प्रवीणजी भाई साहब : आध्यात्मिक गहराई से लेखन करने वाले पत्रकार

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राजेंद्र बोड़ा राजस्थान के पत्रकार जगत में एक नाम अपनी अलग पहचान रखता है और विशिष्ठ स्थान भी रखता है। यह नाम है प्रवीण चंद छाबड़ा। अपने दोस्तों और सहयोगियों के बीच गहरे अपनत्व से प्रवीण जी भाई साहब के नाम से पुकारे जाने वाले प्रवीण चंद छाबड़ा उन पत्रकारों में से हैं जो देश की आज़ादी और वर्तमान राजस्थान के बनने से पहले से सामाजिक क्षेत्र और पत्रकारिता में सक्रिय हैं। यह हमारा सौभाग्य हैं कि पैसठ सालों की सक्रिय पत्रकारिता और सामाजिक क्षेत्र के कामों के अपने गहरे अनुभव रखने वाले प्रवीण जी भाई साहब का सानिध्य और आशीर्वाद आज उनके 82वें जन्म दिन पर हमें प्राप्त है। प्रवीण जी भाई साहब ने राजस्थान का निर्माण होते हुए ही नहीं देखा है बल्कि उसके बनने की प्रक्रिया और उस के बाद से अब तक का समूचा राजनैतिक घटनाक्रम पत्रकार के रूप में बहुत नज़दीक से और बहुत गहराई से देखा है। इसीलिए आप नए राजस्थान बनने की राजनीतिक प्रक्रिया को समझने और उसे विश्लेषित करने की दृष्टि पाने में नयी पीढ़ी के पत्रकारों को रोशनी दिखाने में सक्षम हैं। प्रवीण जी के लेखन में एक अद्भुत आध्यात्मिक गहराई है। इसलिए कई

संगीतकार दान सिंह : पुकारो मुझे नाम लेकर पुकारो

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राजेंद्र बोड़ा मुंबई की सिने मायावी नगरी में केवल प्रतिभा के बूते सफलता हासिल नहीं होती। यहां भोलेपन के लिए कोई जगह नहीं। क्षूद्र ईर्षाओं, समूहों के हितों और फरेबी लोगों की भीड़ के बीच अपना स्थान बनाने के लिए यदि किसी में व्यावहारिक ज्ञान और चालाकी नहीं है तो बॉलीवुड की दुनिया उसे झटके से दूर फेंक देती है। हीरे ठुकरा दिये जाते हैं। संगीत का ऐसा ही एक नायाब हीरा पिछले दिनों संसार से चला बसा। जबर्दस्त प्रतिभा के धनी संगीतकार दान सिंह की हिन्दी सिने जगत ने उपेक्षा करके अपना ही नुकसान किया। पिछली सदी के साठ के दशक में मुंबई सिने संगीत में स्थान बनाने की जद्दोजहद करने के बाद अपने घर जयपुर लौट आए। मगर मुंबई को अलविदा कहने से पहले उन्होंने अपनी काबिलियत की जो झलक दिखाई उस पर हिंदुस्तानी फिल्म संगीत हमेशा नाज़ करेगा। याद कीजिये रिलीज न हो सकी फिल्म ‘भूल ना जाना’ का मुकेश का दर्दीले सुरों में गाया ‘गमे दिल किससे कहूं कोई गम ख़्वार नहीं’ या फिर जयपुर के ही हरिराम आचार्य का लिखा सोज़ में डूबा बड़ा ही खूबसूरत, गीता दत्त की सुरीली झंकार वाली आवाज़ में गाना ‘मेरे हमनशीं मेरे हमनवां मेरे पास आ

Daan Singh: He Left An Indelible Mark On Film Music

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Rajendra Bora In a rat race, many a times diamonds are frequently discarded and fakes reign supreme. Music Director Daan Singh who passed away in Jaipur on Saturday night (June 19, 2011) was one such gem who despite showing his worth did not get film offers. He composed music for only three bollywood films of which one remained unreleased. But his compositions of the two films ‘My Love’ and ‘Bhool Na Jaana’ can never be erased from the memory of Hindustani Film Music (HFM) lovers and no history of Hindustani Film Music would be complete without mention of songs of the two films. He was a pupil of legendry composer Khemchand Prakash who also hailed from Rajasthan. He was greatly appreciated in bollywood mehfils (sittings) attended by makers and breakers of the silver screen but never got any assignment. In fact big names in Hindi film music who listened his compositions in mehfils conveniently lifted his tunes to score songs in their films. Ill luck apparently shadowed him in Mum

आबादी किस पर भारी

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राजेंद्र बोड़ा देश की जनगणना के प्रारंभिक आंकड़े जारी हो गए हैं। जनगणना दशकवार होती है। यह आँकड़े 2001 से 2010 दशक के हालात बयान करते हैं। जनगणना मोटे तौर पर दशकीय आबादी वृद्धि दर का पता देती है। नई जनगणना बताती है कि 2001-2010 के दौरान राजस्थान में जनसंख्या वृद्धि दर में लंबे समय बाद बड़ी गिरावट आई है। वृद्धि दर में यह गिरावट 6.97 प्रतिशत की है। मगर जनसंख्या विशेषज्ञों को इससे संतुष्टि नहीं है। कहते हैं कि इस गिरावट के बावजूद इस मरुप्रदेश की आबादी की वृद्धि दर 1.96 प्रतिशत प्रति वर्ष है और पिछले दशक में यहाँ की आबादी में एक करोड़ 20 लाख से अधिक लोग और जुड़े। यह संख्या इसके पिछले 1991-2001 दशक में नए जुड़े लोगों की संख्या एक करोड़ 25 लाख से थोड़ी ही कम है। जनसंख्या विशेषज्ञ डॉ. देवेन्द्र कोठारी कहते हैं कि पहली नज़र में जनगणना 2011 के आंकड़े जरूर उत्साहवर्धक नज़र आते हैं मगर राजस्थान के सामाजिक और आर्थिक विकास पर इन आंकड़ो के दीर्घकालीन प्रभाव परेशानी का सबब है। उनकी बातों का लब्बोलुबाब यह है कि बढ़ती आबादी हमारे संसाधनों पर भारी पड़ने वाली है। बढ़ी हुई आबादी के लिए भोजन, पानी, क

Inauguration of Greater Rajasthan was all royal affairs

Rajendra Bora When Greater Rajasthan was inaugurated by Sardar Vallabh Bhai Patel, the architect of integration of India, on March 30 in 1949 the ceremony to mark the occasion held at Darbar Hall in the City Palace of Jaipur was mostly all royal affairs as most of the senior Congressmen left the venue in a huff over the sitting arrangements. On this day, 62 years ago, four major princely states – Jaipur, Jodhpur, Bikaner and Jaisalmer- merged with Samyukt Rajasthan which was earlier inaugurated by Jawahar Lal Nehru in Udaipur on April 18, the previous year. At the ceremony Patel sworn in Maharaja Sawai Mansingh of Jaipur as Rajpramukh. Rajpramukh later administered the oath of office of the Premier of the newly emerged state to Hiralal Shastri, who was till then Chief Minister of Jaipur. At the time of formation of Greater Rajasthan the Congress had four stalwarts – Jai Narayan Vyas from Marwar, Manikya Lal Verma from Mewar, Hiralal Shastri from Jaipur and Gokul Bhai Bhatt from Si

होली का रंग गेर के संग

राजेन्द्र बोड़ा होली का उत्सव अन्य सभी उत्सवों से अलग है। हालांकि सभी उत्सव वे समय होते हैं जब थोड़ी देर के लिए हम अपने जीवन की मुश्किलों को भुला कर कुछ आनंद में डूब जाते हैं। इसीलिए हमारे जीवन में उत्सवों का बहुत महत्व है। वे हमें अपनी संस्कृति से भी जोड़े रखते है। संस्कृति समाज को जोड़े रखने में बड़ी भूमिका निभाती है। उत्सवों में विभिन्न कलाओं के माध्यम से समाज के लोगो की प्रतिभाएँ भी सामने आती हैं। सूर्य नगरी के नाम से विख्यात जोधपुर शहर को उत्सवों का की नगरी कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जोधपुर के लोगों को तो बस कोई मौका चाहिए उत्सव मनाने का। इसीलिए यहाँ हर रोज ही कोई न कोई धार्मिक या सामाजिक उत्सव चलता ही रहता है। यही कारण है यहाँ के लोगों में जैसा प्रेम भाव नज़र आता है वैसा अन्य जगहों पर कम ही देखने को मिलता है। यहाँ के वाशिंदों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि उनमें आपसी मेल बहुत है। यहाँ की मारवाड़ी भाषा ने सबको बड़ी खूबसूरती से इस तरह जोड़ रखा है कि अलग अलग समुदायों के लोगों में फर्क करना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे में जब होली आए और जोधपुर के लोग एक दूसरे को रंगों में प

'Fathji' wrote Ranthambhore’s success story

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Rajendra Bora Jaipur. Fateh Singh Rathore who lost battle with cancer in Jaipur on Monday fought untiring batlles for more than three decades against the establishment and poachers to save tigers in Ranthambhore. He wrote the success story of Ranthambhore Tiger reserve which could not be carried forward by his predesessors. Born in a desert village in the then Royal state of Marwar, near Jodhpur, with little vegetation Rathore, fondly called Fathji by wild life enthusiasts, was nothing in his family background that could forecast that he would become a great protector of endangered wild animals. In his schooldays he was not a studious boy and once aspired to become an actor. His grandfather pushed him into the Navy which could not hold him more than six months. He tried to become a lawyer and sold soft coal for a while. Rathore joined the Forest department in 1960 as a Game Ranger in Sariska. That was the turning point in the life of Fathji. His fascination with forest and wi

Mehboob Ali : An Honest Intellectual in Politics

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Rajendra Bora Eighty year old Mehboob Ali, who passed away early Wednesday morning in Bikaner, was basically an intellectual rather than a run of a mill politician. Honesty and commitment was his hall mark. He was like an alien in the today’s breed of politicians. In a political system which does not allow an honest, independent and impartial person to survive Mehboob Ali, fondly called Mehboob Saheb, was a shining example of a politician who could not be corrupted. He showed his mettle serving as minister for Public Health Engineering Department (PHED) in first ever non-Congress government in Rajasthan in 1977 when no tempting offer of money and political pressure could deter him from his crusade against corrupt officials. He was like a Rishi (saint) having great insight into ills of society. An intellectual we should be proud of. He could call a spade a spade. But he was a misfit. Hindus would not accept him because he was a Muslim. And Muslims would not accept him because of h

महबूब अली : सार्वजनिक जीवन में सादगी और ईमानदारी की मिसाल

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राजेंद्र बोड़ा महबूब अली, जिनका 80 वर्ष की आयु में गुरूवार को बीकानेर में निधन हो गया, बच रहे उन इने गिने राजनेताओं में थे जो जीवन पर्यंत अपने विचारों के प्रति निष्ठावान रहे और उनसे कभी कोई समझौता नहीं किया और हमेशा जमीन से गहरे जुड़े रहे। ऐसा उन्होंने किसी मजबूरी में नहीं किया। उन्होंने सत्य और निष्ठा का कठोर जीवन खुद चुना. उसके लिए कभी पछताए भी नहीं। तत्कालीन बीकानेर रियासत के मलकीसर गाँव में 1931 के दिसंबर माह के अंतिम दिन जन्मे महबूब अली, जिन्हें सभी प्यार से महबूब साहब कह कर पुकारते थे, जमीन से उठे ऐसे नेता थे जिन्हें काजल भरी सत्ता की कोठरी भी अपने रंग में नहीं रंग पाई। जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति के आह्वान के साथ देश में 1977 में आपातकाल के बाद जो सत्ता परिवर्तन हुआ उनमें यदि महबूब साहब जैसे नेता और होते तो देश का आज नक्शा अलग होता। वे भैरोंसिंह शेखावत के नेतृत्व में राजस्थान में बनी पहली गैर कांग्रेस सरकार में मंत्री बने. उन्हें आज भी लोग “साइकिल वाले मंत्री” ने नाम से जानते हैं। राजधानी में अपने सरकारी आवास से सचिवालय में अपने आफिस तक, अपने मिलने जुलने वालों

अशोक गहलोत रखते हैं फूँक-फूँक कर कदम, मगर कदम के निशां तक नहीं

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राजेंद्र बोड़ा राजस्थान पत्रिका ने आज (12 फरवरी, 2011) के अंक में अपने पूर्व संपादक विजय भण्डारी का एक लेख “फूँक-फूँक कर कदम” प्रकाशित किया है। भण्डारी कहते हैं कि राज्य में अब तक हुए कुल 11 मुख्य मंत्रियों (नौ कांग्रेस, दो भाजपा) में अशोक गहलोत “पहले ऐसे मुख्य मंत्री हैं, जो आम आदमी की बोली बोलने में गुरेज नहीं करते हैं”। इसके लिए वे गहलोत के उस सार्वजनिक वक्तव्य को आधार बनाते हैं जिसमें कहा गया है कि पुलिस के थानेदारों की जानकारी में है कि उनके क्षेत्र में कौन चोर है, मगर वे उन्हें पकड़ते नहीं। भण्डारी गहलोत के इस वक्तव्य से खुद “चकित” हैं। वे कहते हैं कि “थानेदारों को राज्य के पदासीन मुख्य मंत्री द्वारा इससे बड़ा काला प्रमाणपत्र क्या हो सकता है? मुख्य मंत्री ने उनका चेहरा काला पोत के रख दिया है, लेकिन उन्हें (थानेदारों को) शर्म नहीं आती है”। भण्डारी बाद में यहाँ तक लिख बैठे कि “अशोक गहलोत ने अपने द्वितीय कार्यकाल के 26 महीनों में प्रशासन के अनेक लोगों के मुँह काले पोत दिये मगर उनके कान में जूँ नहीं रेंगी”। ऐसे वक्तव्यों में वे अशोक गहलोत के बड़े सुकोमल रूप को देखते हैं। वे यह

गीत-संगीत में ढल कर आम जन तक पंहुचे गांधी

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राजेंद्र बोड़ा महात्मा गांधी का संगीत से क्या वास्ता हो सकता है। सतही तौर पर देखने पर गांधीजी का जीवन बड़ा ही नीरस और उबाऊ लग सकता है। एक राजनेता और समाज सुधारक की महात्मा गांधी की छवि में आम तौर पर कला या संगीत के लिए कोई स्थान नहीं दिखता। संगीत और अन्य कलाओं के लिए उनके पास वक्त ही कहाँ था। देश की आजादी और विभिन्न समुदायों खास कर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच भाईचारे को मजबूत बनाने के लिए प्रयासों में ही उनका सारा जीवन बीत गया। खुद उनके जीवनकाल में लोगों को लगता था कि वे जिस प्रकार का जीवन व्यतीत करते हैं और जिस सादे जीवन की अपेक्षा वे लोगों से करते हैं उसमें संगीत जैसी कलाओं का कोई स्थान नहीं हो सकता। ख्यातनाम गायक दिलीप ने एक बार गांधीजी से संगीत की चर्चा छेड़ ही दी। दिलीप बंगाल के जाने माने नाट्यकार द्विजेंद्रलाल राय के बेटे थे और गायन के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति पा चुके थे। संगीत की बात छेडते हुए दिलीप ने कहा महात्मा जी मुझे लगता है हमारे स्कूलों और कालेजों में हमारे खूबसूरत संगीत की उपेक्षा होती है। जवाब में गांधी जी बोले “यह दुर्भाग्यजनक है। मैंने तो हमेशा ही यह कहा ह

जयपुर लिट्रेचर फेस्टीवल : कंचन के सहारे साहित्यिक गुणों को परिभाषित करने का प्रयास

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राजेन्द्र बोड़ा राजधानी में होने वाला जयपुर लिटरेचर फेस्टीवल, अंतर्जाल (इंटरनेट) के एक खबरिया मुकाम ‘डेली बीस्ट’ के मुताबिक, विश्व के अव्वल नंबर के समागमों में शुमार हो गया है। उसने इसे “धरती पर साहित्य का महानतम प्रदर्शन” बताया। आयोजक खुश थे कि उनके प्रयासों की सफलता का डंका सभी मानने लगे हैं। लिटरेचर फेस्टिवल का इस बार यह छठा सालाना संगम था। इस समारोह की कल्पना को जयपुर में पहली बार साकार ब्रितानवी मूल की महिला फेथ सिंह ने जयपुर विरासत फ़ाउंडेशन के झंडे तले किया था। छह सालों के सफर में इस आयोजन की सफलता इसी से आँकी जा सकती है कि इस बार उसके पास प्रायोजकों की भीड़ थी। प्रमुख प्रायोजक डीएससी कंपनी थी जो राजमार्ग और रेल पथ के साथ पन बिजली उत्पादन के क्षेत्र में बड़ी निवेशक है। समारोह पर बड़ा निवेश करने की एवज में इस बार उसके नाम से – “डीएससी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल” का आयोजन हुआ। हर बार की तरह इस बार भी जलसे में अभिजात्य लोगों की खूब रौनक रही। यह सवाल अलहदा है कि क्या यह अभिजात्य वर्ग सचमुच साहित्य पढ़ता है या उसे तस्वीर की तरह देख कर अलग रख देता है या उसे अपने ड्राइंग रूम में सजा द