Wednesday, August 10, 2016

नशे के कारोबार से सरकार को कमाई



राजेंद्र बोड़ा

धन-दौलत और पद का नशा सारी चारित्रिक और नैतिकताओं को भुला देता है। हमारे संविधान को बनाने वाले ऐसे नशे में नहीं थे। वे बहुसंख्यक गरीब और पीड़ित लोगोंके लिए एक ऐसा देश बनाना चाहते थे जहां जन कवि शैलेंद्र के शब्दों में ना भूखों की भीड़ होगी ना दुखों का राज होगा। इसीलिए उन्होंने संविधान में निर्देश दिया कि राज्य सबको बराबरी का दर्जा देगा उनकी अच्छी शिक्षा अच्छे स्वास्थ्य और अच्छे पोषण की व्यवस्था करेगा। इसी के तहत हमारा  संविधान राज्य को निर्देशित करता है कि वह नशे का प्रतिषेध करने का अपना कर्तव्य पूरा करने का प्रयास करेगा।  

संविधान के नीति निर्देश

भारतीय संविधान के प्रावधानों को दो भागों में देखा जा सकता हैं। एक वह भाग जिसमें वर्णित धाराओं की पालना कराने के लिए नागरिक अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं। याने कि यदि सरकार संविधान के अनुरूप काम नहीं करती तो आम जन अदलात के जरिये शासन को वैसा करने को बाध्य कर सकते है। संविधान की सर्वोच्च न्यायालय की व्याख्या देश का कानून होता है। इसी प्रावधान के जरिये अनेकों मौकों पर सरकारों को जन हित में कदम उठाने को बाध्य किया गया है। परंतु संविधान का एक भाग ऐसा भी है जो नीति निर्देशक तो है परंतु उन धाराओं को कब और कैसे लागू करना संविधान के निर्माताओं ने आने वाली सरकारों के विवेक पर छोड़ दिया। इन निर्देशों की पालना करवाने के लिए लोग अदालत में नहीं जा सकते। इस भाग में संविधान निर्माताओं के असली सपने हैं कि वे कैसा भारत बनाना चाहते थे। मगर उन्हें विश्वास था कि जनमत से चुनी भविष्य की सरकारों में आने वाले लोग इन सपनों को पूरा करने के लिए ही तो सार्वजनिक जीवन में होंगे और वैसा करने के लिए ही तो सरकारें बनाएंगे। उन्होंने कल्पना ही नहीं की थी कि आने वाले समय में जन प्रतिनिधि इस तरह बदल जाएंगे कि उन्हें बाध्य करने के लिए अदालतों के स्तक्षेप की जरूरत होगी। इसीलिए संविधान के नीति निर्देशक सिद्धांतों को अदालतों से लागू करने योग्य नहीं बनाया। क्योंकि संविधान के वे निर्देश हैं तो क्योंकर उन्हें नहीं माना जाएगा ऐसा संभवतः उनके जेहन में रहा होगा। इस तरह से देखें तो संविधान के नीति निर्देशक तत्व से ही देश के शासन की नीतियां प्रभावित होनी चाहिए थी। मगर नशाबंदी की कहानी कुछ और ही कहती है।

संविधान की धारा 47: 

पोषाहार और जीवन स्तर को ऊंचा करने तथा लोक स्वास्थ्य का सुधार करने का राज्य का कर्तव्य –

राज्य, अपने लोगों के पोषाहार स्तर को ऊंचा करने और लोक स्वास्थ्य के सुधार को अपने प्राथमिक कर्तव्यों में मानेगा और राज्य, विशिष्टतया, मादक पेयों और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक औषधियों के, औषधीय प्रयोजनों से भिन्न, उपयोग का प्रतिषेध करने का प्रयास करेगा।     
आम तौर पर कहा जाता है कि शराबबंदी से अपराध बढ़ते हैं। क्या सच में ऐसा है? नहीं। वास्तव में शराब के नशे में ही अधिकतर अपराध होते हैं। घरेलू हिंसा जिसमें पुरुष के हाथों महिलाएं पिटती हैं अधिकतर शराब के नशे में ही यह अपराध होता है। वास्तव में शराब और अपराध एक ही सिक्के के ही दो पहलू हैं।

दुर्भाग्य से शराब की लत से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले गरीब और कमजोर तबके के ही लोग होते हैं। मगर सत्ता तंत्र के राजस्व मोह और शराब के ठेकेदारों के वर्चस्व में हम इस प्रकार जकड़े हुए हैं कि शराबबंदी का तर्क या सामाजिक कल्याण की बातों के प्रति कोई संवेदनशीलता नज़र नहीं आती। सभी को - सरकार को अपने राजस्व की और ठेकेदारों को अपने मुनाफे की - चिंता रहती है।

हमारे यहां अब तक दो प्रकार के माफियाओं का वर्चस्व रहा है – एक भू माफिया और दूसरा शराब माफिया। मगर उन्हें समाज ने कभी प्रतिष्ठा नहीं दी। परंतु नई आर्थिक नीतियों के चलते इन दोनों को ही अब पूंजीवादी निज़ाम में प्रतिष्ठा दी जा रही है।  

नई आर्थिक नीतियों का असर

यह जानना महत्वपूर्ण है कि भारत में शराब की खपत बढती जा रही है। और ऐसा नई पूंजीवादी आर्थिक नीतियों के अपनाए जाने के बाद तेजी से हुआ है। नई आर्थिक नीतियां अपनाए जाने के वर्ष 19192 से 2012 के बीच भारत में मदिरा की खपत में 55 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई। ओर्गेनाइज़ेशन फॉर इकोनोमिक कोऑपरेशन एंड डवलपमेंट (ओईसीडी) के अनुसार यह वृद्धि विश्व में तीसरी इतनी बड़ी वृद्धि थी। ऐसा तब हुआ जब इस संगठन के 34 सदस्य देशों में मदिरा की औसत खपत इस दौरान 2.5 प्रतिशत घटी।

विश्व भर में जहां मदिरा की खपत लगभग स्थिर बनी हुई है वहीं भारत में इसकी खपत में 15 प्रतिशत सालाना दर से वृद्धि हो रही है। यह भी एक कारण है कि विश्व का मदिरा उद्योग नई आर्थिक नेतियों के चलते भारत में अपना बाज़ार का विस्तार खोज रहा है। आज 5,000 करोड़ रुपयों का मद्य उद्योग है।

हमारे देश में विदेशी शराब के 200 ब्रांड उपलब्ध है। इसके अलावा देशी शराब के भी 250 ब्रांड पीने वालों के लिए उपलब्ध हैं।

एक अनुमान के अनुसार भारत में मदिरा की प्रति व्यक्ति औसत खपत 1.50 लीटर प्रतिदिन है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि किस प्रकार मदिरा आम भारतीय के शरीर में घुलती जा रही है।

शराब और ग्लैमर की दुनिया का गठजोड़ से आम जन को लुभाया जा रहा है और नई पीढ़ी चारित्रिक पतन की अंधी गुफा में शौक से जा रहे हैं। कहने को शराब के विज्ञापनों पर प्रतिबंध है मगर अन्य प्रतीकों का उपयोग करते हुए धड़ल्ले से मीडिया में तथा राजमार्गों पर बड़े बड़े होर्डिंग्स मदिरा की ओर लोगों को ललचाते हैं। इन पर शासन की नज़र नहीं होती क्योंकि उसे तो पैसा प्यारा है।   

सरकार कमाई के चक्कर में

सरकार को अपने राजस्व के अलावा कुछ नहीं दिखता। उसका यह तर्क कि विकास के कामों के लिए पैसे की जरूरत होती है और उसे जुटाने के लिए आबकारी से होने वाले राजस्व को छोड़ा नहीं जा सकता। उसे छोडने की बजाय सरकार वह सब जतन करती है जिनसे उसके राजस्व में और बढ़ोतरी हो। यह एक प्रकार से नशा बेच कर कमाई करने का जतन है।

सरकार जब अपनी मदिरा नीति बनाती है वह वास्तव में शराब के ठेके देने की व्यवस्था होती है कि कैसे उससे सरकार को अधिक आमदनी हो मगर उसे नाम दिया जाता है मद्य-संयम नीति। यह एक छलावा होता है। सच में तो सामान मदिरा की खपत बढ़ाने का किया जाता है मगर उसे मद्य-संयम नीति नाम की चादर में छुपा दिया जाता है।

राजस्थान में कुल राजस्व का चार प्रतिशत हिस्सा आबकारी शुल्क से आता है। रुपयों में देखें तो इस कमाई में लगातार बढ़ोतरी होती जा रही है।  वर्ष 2014-15 में आबकारी शुल्क से राज्य सरकार ने कुल 558577.42 हजार रुपये कमाए। वर्ष 2015-16 के बजट में यह कमाई बढ़ कर 630000.00 हजार हो जाने का अनुमान लगाया गया था मगर यह वृद्धि इससे भी अधिक हुई। पुनर्निर्धारित बजट अनुमानों के अनुसार सरकार की यह कमाई बढ़ कर 635000.00 हजार हो गई। चालू वर्ष 2016-17 के बजट में इस कमाई के बढ़ कर 12325052.57 हजार रुपये हो जाने का अनुमान लगाया गया है। इससे स्पष्ट है कि नशे के व्यापार से सरकार अपना खजाना भर रही है।     
हमारे राजनैतिक कर्णधार भूल जाते हैं कि राजस्व कमाना ही सरकार का मुख्य उद्धेश्य नहीं है। उसके सामाजिक दायित्व और सरोकार होते हैं जो राजस्व कमाने के काम से कहीं ऊंचे होते हैं।    
मद्यपान को कई लोग अपना मूलभूत अधिकार मानते हैं। हम जानते हैं कि जाने-माने लेखक खुशवंत सिंह लज़ीज़ शराब के बहुत शौकीन थे और अपने इस शौक को उन्होंने कभी छिपाया भी नहीं। उन्होंने एक बार कहा कि मैं मदिरापान की स्वतन्त्रता को वैसा ही मूलभूत अधिकार मानता हूं जैसा कि अपनी इच्छानुसार देवताओं की पूजा अर्चना तथा अपने मन की बात कह सकने की स्वतन्त्रता

खुशवंत सिंह कोई नई बात नहीं कह रहे थे। वे प्रमुख ब्रितानवी अर्थशास्त्री हेरॉल्ड लस्की के उस कथन को ही दोहरा रहे थे जो उन्होंने अपनी किताब लिबर्टी इन द मॉडर्न स्टेट कही थी कि नशाबंदी व्यक्ति की स्वतन्त्रता के खिलाफ है।  

मगर खुशवंत सिंह ने साथ ही यह भी जोड़ दिया कि मैं फिर दोहराता हूं कि कोई भी व्यक्ति जो बहुत अधिक मदिरापान करता है या अपने परिवार को कंगाल बना देता है या समाज के लिए बुराई बन जाता है जैसे पी कर गाड़ी चलाना या हिंसक बन जाना तो उसे ऐसा करने से रोकना होगा और जरूरत हो तो उसे दंडित करना होगा

महात्मा गांधी शराब को शरीर और आत्मा दोनों के लिए बुरा मानते थी। वे कहते थे शराब शरीर और आत्मा दोनों का नाश करती हैइसीलिए उन्होंने यंग इंडियामें लिखा कि अगर मैं केवल एक घंटे के लिए भारत का सर्वशक्तिमान शासक बन जाऊं तो पहला काम यह करूंगा कि शराब की सभी दुकानें बिना कोई मुआवजा दिये तुरंत बंद करा दूँगा। गांधी ऐसा इसलिए मानते थे क्योंकि उनके लिए शराबबंदी में एक पवित्र भाव था। यह पवित्र भाव संविधान निर्माताओं में था हमारे निर्वाचित शासकों में कभी का तिरोहित हो गया। 
      
नशाबंदी न करने के पक्ष में जो तर्क दिये जाते हैं वे कोई नए नहीं हैं। संविधान के निर्माण के समय हुई बहसों में ये सारे तर्क आ चुके हैं और उनके माकूल और सर्वमान्य जवाब मिल चुके हैं। संविधान सभा के सदस्य जयपाल सिंह की लंबी बहस पढ़ लीजिये  और उसके जवाब में वी आई मुनिस्वामी और बी जी खेर की तक़रीरें पढ़ लीजिये आपको शराब बेचने औरर पीने की आज़ादी चाहने वालों को दिये जाने वाले सारे जवाब मिल जाएंगे।

मदिरा का शरीर और आत्मा का असर
      
महात्मा गांधी ने कहा कि शराब का प्रतिकूल असर शरीर और आत्मा दोनों पर पड़ता है। आत्मा पर पड़ने वाले असर सामाजिक और नैतिक व्यवहारों में झलकता है जिसको आंकड़ों में नहीं दिखाया जा सकता। मगर शरीर पर पड़ने वाली असर के भयावह आंकड़े हमारे सामने हैं।
चिकित्सा विज्ञान के विशेषज्ञ बताते हैं कि विश्व में मृत्यु का पांचवां सबसे बड़ा कारण मदिरा होती है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में मदिरा को सार्वजनिक स्वास्थ्य की प्रमुख समस्या माना जाता है। वह कम उम्र में मृत्यु दर बढ़ाती है।

मदिरा 60 प्रकार की बीमारियों की कारक होती है। इनमें प्रमुख हैं : कईं प्रकार के कैंसर, रक्तस्त्रावी स्ट्रोक, उच्च रक्तचाप वाली दिल की बीमारियां, हृदय की धमनियों की बीमारियां और लीवर सिरोसिस। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि 25 प्रतिशत सड़क दुर्घटनाएं चालक के मदिरा के नशे में होने के कारण होती हैं।

समाज शास्त्री बताते हैं नशे की लत से व्यक्ति के काम करने की क्षमता और इच्छाशक्ति दोनों घटती है जिससे उसके रोजगार पर असर पड़ता है। उसके काम में ख़लल पड़ता है। उसकी काम करने की क्षमता कम होने से वह मजदूरी का नुकसान उठाता है। ऐसे में वह मानसिक अवसाद में आता है और अधिक नशा करता है। शराब, पैसे की बरबादी, काम में कोताही, परिवार में कलह, अवसाद और फिर शराब। यह चक्र उसे असामाजिक बनाता है। वह अपना-पराया। अच्छा-बुरा, और सारी नैतिकताएं भूल जाता है। वह अपराध के रास्ते पर भी निकल पड़ता है। यह नशा परिवारों की सुख-शांति और उसकी अर्थ व्यवस्था के लिए भी खतरनाक होता है। वह गरीबी बढ़ाता है।

आंकड़े बताते हैं कि हमारे देश में पियक्कड़ी शुरू होने की आयु में कमी आ रही है। अर्थात अब पहले से कम उम्र से लोग शराब हलक में डालना शुरू कर देते है। 1980 के दशक में भारत में शराब पीने की लत व्यक्ति में 28 वर्ष की वय में शुरू होती थी मगर 2007 में शराब पीना शुरू करने की उम्र 17 वर्ष पर पहुंच गई। वर्तमान समय के आंकड़े उपलब्ध नहीं है परंतु पिछले आंकड़े जो संकेत देते हैं उसके अनुसार अब तो शुरुआती किशोरावस्था से ही शराब गटकाई जाने लगी है। यहां यह याद रखना आवश्यक है कि राजस्थान में मद्यपान की वैधानिक न्यूनतम आयु 21 वर्ष है।       
संविधान सभा में एक सदस्य ने नशाबंदी का निर्देश देने वाली धारा पर बोलते हुए एक ऐसा तर्क दिया जिसका जवाब आज भी सरकार या शराब के हिमायती नहीं दे सकते। उनका कहना था कि नशे के व्यापार से सरकार जितना राजस्व कमाती है पीने वालों की जेब से उसका चौगुना पैसा शराब की खरीद में जाता है। तब उन्होंने कहा था कि यदि सरकार 25 लाख रुपये का राजस्व अर्जित करती है तो नशाबंदी से उसे 25 लाख रुपयों की हानि ही होगी मगर लोगों की जेब में 100 करोड़ रुपये बचेंगे जिसे वे शराब पर खर्च करते। नशेड़ियों के जो 100 करोड़ रुपये बचेंगे वे उनके परिवारों के काम आएंगे।

एक अन्य सदस्य ने तो संविधान सभा में यहाँ तक कह दिया की अंग्रेज़ भारत में व्हिस्की की बोतल लेकर आए मगर गए तो हमें बर्बाद करने को अपनी बोतल यहीं छोड़ गए। 
शराब सिर्फ नशा नहीं है। वह परिवार की सुख शांति और उसकी अर्थव्यवस्था के लिए भी खतरनाक है। नशा करके मनुष्य खुद को, अपने परिवार को अपने समाज को भूल जाता है। नशेड़ी समाज से कटा रहता है।

शराब और शराबियों के कारण सबसे अधिक अपमान और पीड़ा स्त्रियॉं को ही झेलना पड़ता है। उन पर होने वाली घरेलू हिंसा का बड़ा सबब पुरुषों का नशा ही होता है। यही कारण है की शराब का सबसे प्रमुख विरोध हमें स्त्रियों की तरफ से मिलता है। एक तरफ सरकार शराब से अपना राजस्व बढ़ाने के उद्यम करती हैं तो दूसरी तरफ हमें महिला समूहों के आंदोलन और धरने भी देखने को मिलते हैं। धन्य हैं भारत की महिलाएं जो शराब बंदी के लिए अपना संधर्ष लगातार जारी रखे हुए है। उन्होंने शराब के खिलाफ लोहा लेना नहीं छोड़ा है।

राजस्थान में महिलाओं ने जितने आंदोलन शराब के ठेकों के खिलाफ किए हैं वह अपने आप में एक कीर्तिमान है। महिलाओं और कन्याओं के लिए जितने भी गैर-सरकारी संगठन काम करते हैं उनका भी यही अनुभव है कि ग्रामीण महिलाएं शराब की घोर विरोधी हैं क्योंकि वे ही इसके दंश को झेलती है।

सवाल पूछा जा सकता है कि देश की जब आधी आबादी शराबबंदी चाहती है तो यह कैसा लोकतन्त्र है जहां इस आबादी की राय को कोई अहमियत नहीं दी जाती।

मगर जहां मानवीय और नैतिक मूल्य एक छोटे वर्ग की पैसे की चमक दमक में छुपा दिये जाते हैं और सरकारें उसी छोटे वर्ग के लिए हो कर रह जाती है। ऐसे में बहुसंख्यक गरीब जन की बात कौन करे?

(यह आलेख प्रेसवाणी के जुलाई, 2016 अंक में छपा)