Monday, April 23, 2018

शिवरतन थानवी: एक संवादप्रिय शिक्षाविद् का चले जाना

राजेंद्र बोड़ा

शिक्षाविद् शिवरतन थानवी के निधन के साथ ही एक युग का अवसान हो गया। एक ऐसे युग का जिसमें संबंधों की ऊष्मा बनाये रखते हुए गहरी बहस की गुंजाइश बनी रहती थी। वे कहते थे "संवाद-प्रियता नहीं हो तो सही शिक्षा और आजीवन शिक्षा संभव ही नहीं है। संवादप्रिय बनना सीखना भी शिक्षा का और आत्म-शिक्षण का एक अत्यंत महत्वपूर्ण चरण है। संवाद करना एक कसरत है और कला भी है"। संवाद की यह कला दो पीढ़ियों को उनसे मिली। उन्होंने हमें जीवन के सरोकारों को समझने के लिए लगातार शिक्षित किया।

शिक्षा की दीक्षा-प्रशिक्षा की रूढ़ि पर शिवरतन थानवी हमेशा सवाल खड़े करते रहे हैं। उन्हें हमने हमेशा एक ऐसे शिक्षक की भूमिका में पाया जो दुर्गम रास्तों में हमें भटकने से बचाने के लिए हमारा मार्गदर्शन करते रहे। उन्होंने हमें शिक्षा के प्रति एक समग्र समझ दी। उनका मानना था कि मौजूदा शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या यह है कि “अब तक न हम सहिष्णु हुए, न उदार हुए, और न ही हम समझदार हुए”। शिक्षा जरिये वे पूरे समाज को जागरूक रखना चाहते थे जिनमें “नागरिक भी शामिल हों और शासक भी”।

वे राजस्थान में शैक्षिक पत्रकारिता के पुरोधा थे। शिक्षा व्यवस्था जगत में एक बड़ा नाम अनिल बोर्दिया के नवोन्मेषों को शासकीय तंत्र में लागू  करने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निबाही।  वे मूलत: अंग्रेज़ी के शिक्षक रहे मगर सरकारी शैक्षिक पत्रिकाओं – शिविरा’, नया शिक्षक और टीचर टुडे के सम्पादन का जैसा विलक्षण काम उन्होंने किया वह इतिहास के सुनहरे हर्फों में लिखा जाएगा। 

पढ़ने लिखने के साथ विभिन्न कलाओं – संगीत और फिल्मों के साथ साथ वनस्पतियों में उनकी गहरी गहरी रुचि थी उनके अंत समय तक बनी रही। वे एक ऐसे  स्वाभिमानी व्यक्ति थे जो दूसरों पर अपनी बात थोपते नहीं थे। अपनी शर्तों पर उन्होंने अपना सादा और आडम्बर रहित जीवन जीया।    

वे एक विराट बौद्धिक पुरुष थे। उनके जाने से वैचारिक जगत में एक सूनापन आ गया है जिसे भरा जाना संभव नहीं लगता। उनसे प्रेरणा पाने वाले हम सब सदमे मैं हैं। असंख्य लोग जो उनके संपर्क में आये, भले ही थोड़े समय के लिए, वे शिवरतन जी का चले जाना अपनी निजी क्षति मानेंगे।    

Monday, April 2, 2018

भारत बंद का सबक

राजेंद्र बोड़ा 

पिछड़ी जातियों पर होने वाले अत्याचारों को रोकने वाले कानून पर आये सुप्रीम कोर्ट के निर्देश से आहत विभिन्न दलित संगठनों के आह्वान पर आज काभारत बंदइस देश से प्रेम रखने वालों सभी लोगों के लिए चिंता का विषय है। आज के हंगामे के बीच केंद्र सरकार ने सर्वोच्च अदालत में याचिका दायर करके आग्रह किया है कि वह अपने उस आदेश पर फिर से विचार करे जिसके तहत अनुसूचित जातियों और जन जातियों पर अत्याचार रोकने वाले कानून में उसने बदलाव किए हैं।

अदालत ने मुख्यतः कहा था कि इस कानून के तहत किसी भी जन सेवक (सरकारी मुलाजिम) पर उसके नियुक्ति अधिकारी के अनुमोदन के बिना मुकदमा न दायर किया जाय और अन्य नागरिक भी कानूनी जांच के बाद ही गिरफ्तार किया जाय।  
मगर चिंता इस बात की है कि देश में जैसा माहौल आज है वह सामाजिक समरसता वाले रिश्तों को मजबूत बनाने के संविधान की भावना को ठेस पहुंचाता है।
कुछ चीजें साफ-साफ समझनी होगी। आज देश के हर वर्ग में बेचैनी है। आज के बंद के आह्वान के पीछे भी यही आम बेचैनी है भले ही वह एक वर्ग विशेष की अपनी सुरक्षा के लिए प्रतिरोध के रूप में सामने आई हो।

आज के बंद के जुलूसों में जो चेहरे नज़र आए वे युवा थे। इन युवाओं की बेचैनी अन्य स्वर्ण युवाओं की बेचैनी से अलग नहीं है। हमारे सामने चिंताजनक स्थिति इस बात की है कि देश में बढ़ रही आर्थिक संपन्नता गरीबों तक नहीं पहुंच रही है और यह बढ़ती असमानता ही युवाओं की बेचैनी विभिन्न अलग-अलग रूपों में उभारती है।

जब से राज्य का रुतबा कमजोर हुआ है तब से सामाजि, आर्थिक और राजनैतिक मसलों का हल प्रशासनिक और विधिक तरीकों से खोजने पर निर्भरता बढ़ी है। समाज में संवाद का दायरा संकुचित होने लगा है। शासन में बैठे राजनेता इस अभिमान में जीते हैं कि उनका सोच ही सही है और बाकी सब उनके विरोधी हैं। वे भूल जाते हैं कि विवेक सम्मत प्रतिरोध और संतुलित बहस एक स्वस्थ लोकतान्त्रिक समाज के लिए बहुत जरूरी है।

आज के भारत बंद को यदि असहमति के प्रदर्शन के रूप में देखें तो किसी आम सहमति तक पहुंचने का रास्ता खुल सकता है। यदि यह सोच लिया गया कि गेंद को फिर सुप्रीम कोर्ट में डाल देने से फिलहाल शांति हो जाएगी तो अपने को भ्रम में रखना होगा क्योंकि दलित युजन का यह प्रतिरोध एक बड़ी बेचैनी का संकेत देता है। देश की आधी आबादी जो गरीब है और जिसमें सवर्ण और दलित सभी शामिल हैं, उनके पास देश में आई नई आर्थिक संपन्नता का सिर्फ एक प्रतिशत फायदा पहुंच पा रहा है। उसका युवा हिस्सेदारी मांग रहा है। उसे अच्छी शिक्षा दिलाना, उसके अच्छे स्वास्थ्य की व्यवस्था कराना और उसे ऐसा हुनरमंद बनाना जो देश की अर्थ व्यवस्था में सकारात्मक भाग ले सके यह राज्य की ज़िम्मेदारी है। ऐसा न कर पाने वाला राज्य कमजोर होगा, खोये हुए रुतबे वाला होगा, जहां आज के बंद जैसी प्रतिक्रियाएं रोकी नहीं जा सकेंगी जो भले ही अन्यों को विवेक सम्मत न लगे।