Saturday, September 4, 2010

मनोहारी सिंह के सेक्सोफोन का जादू कभी नहीं टूटेगा


राजेंद्र बोड़ा

सैकड़ों हिन्दी फिल्में हर साल बनती हैं। अब तक बनी हजारों फिल्मों में से कौन सी फिल्में लोगों को याद रहती हैं? ‘मुगले आज़म’ या ‘शोले’ जैसी फिल्मों को छोड़ दें तो अधिकतर फिल्में समय के अंधेरे गलियारों में खो जाती हैं। यदि कोई फिल्म याद रहती है तो वह उसके गानों से। हिंदुस्तानी फिल्म संगीत ने, खास कर गानों ने, पुरानी फिल्मों को लोगों की यादों में बचाए रखा है। यह भी होता है कि गाने याद रह जाते हैं और फिल्मों के नाम भी बिसरा दिये जाते हैं। हालांकि गानों का श्रेय गायकों, संगीतकारों और गीतकारों को मिलता है मगर गानों को सजाने संवारने में साजिन्दों का योगदान भी कम नहीं होता। आप किसी पुराने गाने को याद करते हैं तो कई बार उस गाने की शुरुआत में या उसके इंटरल्यूड में बजे किसी साज की धुन सबसे पहले आपके मन में गूँजती है। आज किसी जमाने की राजेंद्र कुमार, साधना की सुपर हिट फिल्म ‘आरजू’ की किसे याद है। याद है तो उसके गाने। उनमें भी एक गाना जो इतने बरसों के बाद आज भी लोगों के सिर पर चढ़ा हुआ है ‘बेदर्दी बालमा तुझको मेरा मन याद करता है’की याद आती है तो हमारे जेहन में उस वाद्य की आवाज गूँज उठती है जो पतझड़ के मौसम में सूनी वादियों के विस्तार में नायिका की तड़प साकार हो कर देती है। यह वाद्य है सेक्सोफोन जिसने ऐसे ही सैकड़ों गानों को अमर कर दिया। जैसे देवानन्द की क्लासिक फिल्म ‘गाईड’ का किशोर कुमार और लता मंगेशकर का गाया गाना ‘गाता रहे मेरा दिल’और उन्हीं की अभिनीत ‘माया’ का संगीतकार सलिल चौधरी के निर्देशन में बना लता का गाया गाना ‘जा रे जारे उड जा रे पंछी’ में सेक्सोफोन की बीच में उठी तान गाने को नयी उचाइयों पर ले जाती है।

इस वाद्य को बजाने वाले मनोहारी सिंह का इस मंगलवार को मुंबई में निधन हो गया। अस्सी वर्ष की उम्र के मनोहारी दा हिन्दुस्तानी फिल्म संगीत के “सुनहरी दौर” के कलाकार थे। साजिन्दे, सहायक और अरेंजर के रूप में उन्होंने सभी शीर्ष संगीतकारों के साथ काम किया था और उनकी धुनों में अपनी कला के खूबसूरत सितारे जड़े थे। शंकर जयकिशन, एस डी बर्मन, ओ पी नैयर, मदन मोहन, कल्याणजी आनंदजी, सलिल चौधरी और आर डी बर्मन के वे पसंदीदा साजिन्दे थे। आर डी बर्मन जिन्हें लोग प्यार से पंचम भी पुकारते हैं की तो संगीत मण्डली के वे प्रमुख सदस्य थे। वे उनके साजिन्दे भी रहे, अरेंजर भी रहे और सहायक निर्देशक भी रहे। पंचम की पहली फिल्म ‘छोटे नवाब’ से लेकर उनकी आखरी फिल्म ‘1942 –ए लव स्टोरी’तक दोनों का साथ रहा। पंचम के असामयिक निधन के बाद इस फिल्म के अधूरे रह गए पार्श्व संगीत को मनोहारी दा ने ही पूरा किया था।

मनोहारी दा जितने उम्दा सेक्सोफोन वादक थे उतने ही उम्दा इंसान भी थे। अभी एक महीने से भी कम समय पहले हिंदुस्तानी फिल्म संगीत के रसिकों ने उनका जयपुर बुलाकर सम्मान किया था। जयपुर के लोगों को हमेशा इस बात का गर्व रहेगा कि उन्होनें मनोहरी दा को सामने बैठ कर सुना। बढ़ी उम्र और हफ्ते में तीन बार डायलेसिस होते रहने के बावजूद जब सेक्सोफोन उनके मुँह से लगता तो सुरों का ऐसा झरना बह निकलता कि सुनने वाले दंग रह जाते। मनोहारी दा ने दो घंटों से अधिक समय तक गत 20 जून को जयपुर में अपने सम्मान समारोह में जो बजाया वह इतना अद्भुत था। दुर्भाग्य से जयपुर का यह कार्यक्रम उनका अंतिम सार्वजनिक पर्फार्मेंस बन गया।
कलकत्ता में जन्मे मनोहारी दा का परिवार संगीतकारों का परिवार था। उनके पिता और चाचा फिल्मों में और नाइट क्लबों मेन संगीत बजाया करते थे। शुरू में दादा ने इंग्लिश की-फ़्ल्यूट, क्लेरिनेट और मेंडोलिन पर हाथ साधा परंतु अंत में सेक्सोफोन को ही अपनाया। क्योंकि वे पारंगत इन सभी वाद्यों में थे इसलिए फिल्मी गानों की रेकार्डिंग के दौरान वे सेक्सोफोन के अलावा दूसरे वाद्य भी बाजा लेते थे। सलिल चौधरी के संगीत से सजी फिल्म ‘माया’के गाने जा रे जारे उड जा रे पंछी के मुखड़े से पहले प्रील्यूड में ‘पिकोलो’ (एक प्रकार की छोटी बाँसुरी) से गाने का अद्भुत वातावरण बनाते हैं और उसी गाने के इंटरल्यूड में सेक्सोफोन की धुन पर गाने को ऊँचाई पर थामे रहते हैं।

कलकत्ता में वे ग्रामोफोन रेकार्ड बनाने वाली एचएमवी कंपनी में नौकरी करके जीवन की शुरुआत की। कलकत्ता सिंफनी आर्केस्ट्रा में भी उन्होंने पिछली सदी के पचास के दशक में बजाया। संगीतकार सलिल चौधरी के कहने पर 1958 में वे किस्मत आजमाने बम्बई आ गए। सबसे पहले उन्होंने एस डी बर्मन के लिए फिल्म ‘सितारों से आगे’में बजाया। मगर दादा की पहचान बनी कल्याण जी आनंद जी की फिल्म ‘सट्टा बाज़ार’ से। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की जोड़ी के संगीतकार बनने से पहले ये जोड़ी दार साजिन्दों के रूप में काम करते थे। लक्ष्मीकांत ने दादा को एक दिन कहा कि एक गाने की कल रेकार्डिंग है वे अपना सेक्सोफोन लेकर स्टूडियो पंहुच जाएँ। गाने के इंटरल्यूड में सेक्सोफोन का सोलो पीस था। रिहर्सल में जिस शिद्दत से दादा ने वाद्य बजाया उसे सुन कर उसे फाइनल टेक में रखने का फैसला हुआ और वह रेकार्ड हुआ। ‘तुम्हें याद होगा कभी हम मिले थे’ गाने के इंटरल्यूड में मनोहरी दा के सेक्सोफोन का जादू कुछ ऐसा छाया कि पूरी फिल्म इंडस्ट्री में उनकी धाक जाम गई। और उसके बाद उन्होने कभी मूड के पीछे नहीं देखा। हेमंत कुमार का गाया वह गीत आज भी हम सुनते हैं तो उसकी गिरफ्त से आसानी से नहीं छूटते।

जयपुर में दादा से ‘सुरयात्रा’के सदस्यों ने लंबी बातचीत भी की। दादा मानते थे कि ओ पी नैयर की ‘कश्मीर की काली’ फिल्म का जबर्दस्त हिट गाना ‘ये दुनिया उसी की जमाना उसी का’वास्तव में उनके और महान गायक मोहम्मद रफी के बीच जुगलबंदी जैसा है। कभी फिर से सुनिए इस गाने को कि कैसे मनोहरी दा का सेक्सोफोन जहाँ छोडता है और कैसे रफी साहब उसे पकड़ लेते हैं। दोनों को सलाम करने को जी चाहता है।
सेक्सोफोन का सबसे श्रेष्ठ और भरपूर उपयोग किस गाने में हुआ सवाल का जवाब देने में दादा ने एक पलभी नहीं लगाया फिल्म ‘अमीर गरीब’में। बहुत कठिन कंपोजीशन थी मगर लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने धुन बनाने में कमाल कर दिया। दादा ने अपने सेक्सोफोन से गाने को अमर कर दिया। देवानन्द पर फिल्माया गाना आज भी लोगों को याद है ‘मैं आया हूँ लेकर साज हाथों में’।

मनोहारी दा ने अपने साथी बासुदेव चक्रवर्ती के साथ मिल कर जोड़ी बनाई और बासु-मनोहारी के नाम से कुछ फिल्मों में संगीत भी दिया जैसे महमूद की ‘सबसे बड़ा रुपैया’ (1976), ‘कन्हैया’ (1981) और ‘चटपटी'(1983)। ‘इंसान जाग उठा’ के साथ वे दादा बर्मन के अरेंजर बने और कुल 138 फिल्मों में संगीत अरेंज किया।

आज के दौर में भी वे सक्रिय थे मगर नया फिल्म संगीत उन्हें पसंद नहीं था। उन्होने बड़े मार्के की बात काही : आज का फिल्म संगीत एक्स्पायरी डेट के साथ आता है जबकि पुराना फिल्म संगीत कालजयी है।

फिल्मी गानों को सजाने संवारने वाले साजिन्दों के बारे में श्रोता कुछ नहीं जानते। न फिल्म के टाइटल में और न रेकार्ड, या सी डी पर उनके योगदान का कोई जिक्र ही होता है। अब स्टेज शो होने लगे हैं जिससे लोगों को यह पता लगने लगा है कि अमुक गाने में अमुक साज अमुक साजिन्दे ने बजाया। इसी से मनोहारी दा और उन जैसे हमेशा गुमनाम रहे साजिन्दों के नाम अब लोगो के सामने आने लगे हैं। वरना इतिहास ने तो उनके साथ नाइंसाफ़ी ही की है।

(यह आलेख जनसत्ता के रविवारी संस्करण में 10 जुलाई 2010 को प्रकाशित हुआ)