Saturday, January 24, 2009

गाँधी और नेहरू : कितने दूर कितने पास


राजेंद्र बोड़ा

भारतीय राजनीति के आधुनिक इतिहास पर सबसे अधिक छाया जिन दो व्यक्तित्वों की रही वे थे महात्मा गाँधी और जवाहर लाल नेहरू. बीसवीं सदी में देश के राजनीतिक भविष्य की दिशा तय करने में इन दो व्यक्तित्वों की जो भूमिका रही वह अनूठी है. महात्मा गाँधी का नेहरू के प्रति जैसा लाड और आत्मीय प्रेम था उसकी मिसाल कहीं नहीं मिलेगी. गाँधी ने जो आखरी ख़त नेहरू को लिखा उसमे उनका वात्सल्य भाव उमड़ पड़ता है. 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे की गोली का शिकार होकर चिर निद्रा में लीन होने से ठीक 12 दिन पहले 18 जनवरी 1948 लिखे इस पत्र की अन्तिम पंक्तियाँ हैं : "बहुत वर्ष जीयो और हिंद के जवाहर बने रहो. बापू का आशीर्वाद." और गाँधी के महाप्रयाण की सूचना आकाशवाणी प्रसारण पर सारे देश को देते हुए रुंधे गले से नेहरू ने कहा : "हमारे जीवन से रोशनी चली गयी है."

मगर यह भी सच है कि देश की आज़ादी की जंग के इन दो योद्धाओं में जितनी अधिक आत्मीय निकटता थी उतनी ही उनके विचारों में जबरदस्त दूरियां भी थीं. देखा जाए तो इन दो महान व्यक्तियों के बीच सम्बन्ध हमेशां अजीब से विरोधाभास लिए हुए रहे

एक तरह से देखें तो गाँधी के प्रति नेहरू का पूर्ण समर्थन पग-पग पर झलकता है. सम्पूर्ण सार्वजनिक जीवन में गाँधी के नेतृत्व के प्रति नेहरू की अटूट निष्ठा बनी रही. हर मौके पर नेहरू गाँधी के पीछे चलते हुए नज़र आते हैं. परन्तु इन दो व्यक्तित्वों के बीच वैचारिक संबंधों की गहराई से पड़ताल करें तो हमें कोई समानता नहीं मिलती. ख़ुद नेहरू अपनी पुस्तक 'डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया' में गाँधी के बारे में कहते हैं "...वे अधिकतर जो बातें करते थे हम उन्हें आंशिक रूप से ही स्वीकार करते थे या कभी-कभी तो बिल्कुल ही स्वीकार नहीं करते थे."

गाँधी और नेहरू के बीच की वैचारिक दूरी नापने से पहले हमें यह तय कर लेना पड़ेगा कि गाँधी कहाँ खड़े थे और उनका दर्शन क्या था. वह कौन सी चीजें थी जिसने मोहनदास करमचंद गाँधी को महात्मा गाँधी बनाया?

यदि सत्य, अहिंसा और ग्राम स्वराज को गाँधी के दर्शन से अलग कर दिया जाय तो फिर गाँधी में क्या बचता है ? यही तीन चीजें हैं जिनके लिए गाँधी जिए और मरे. सामान्य तौर पर यह यकीन करना बड़ा कठिन होगा कि नेहरू के इन्हीं आधारभूत मुद्दों पर गाँधी से हमेशा मतभेद रहे. गाँधी और नेहरू के बीच हुए पत्र व्यवहार इसका दस्तावेजी सबूत प्रस्तुत करते हैं.

कई विश्लेषक भी यह मानते हैं कि सांस्कृतिक रूप से गाँधी और नेहरू में कोई समानता नहीं थी. गाँधी जहाँ ठेठ भारतीय आदर्शों और नैतिक परम्पराओं के प्रतिनिधि थे वहीं नेहरू पर पश्चिमी आधुनिकता का रंग चढा हुआ था और उनके लिए गाँधी के विचार पुरातन थे जिन्हें नेहरू के सपनों के नए भारत में लागू नही किया जा सकता था. इसलिए आजाद भारत में नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस ने जो नीतियां अपनाई उनसे गाँधी के दर्शन को परखने का मौका ही हमेशा के लिए खो गया.

उनकी बात नहीं सुनी जाती है इसका मलाल गाँधी को आज़ादी के सवेरे पर था. फ़िर भी सत्य, अहिंसा और ग्राम स्वराज के अपने विचारों से गाँधी डिगे नहीं. गाँधी शताब्दी वर्ष में एच एम वी ने आकाशवाणी के अभिलेखागार में संग्रहित प्रार्थना सभाओं में दिए गए गाँधी के कुछ प्रवचनों के अंश एक लांग प्ले रिकॉर्ड में जारी किए थे. इनमें एक जगह गाँधी कहते हैं "...आज ज़माना बदल गया है.. आज मेरी बात कोई नहीं सुनता. पहले लोग सुनते थे, अब नहीं सुनते. पर मैं तो नहीं बदला हूँ. मैं आज भी वही बात कहता हूँ जो पहले कहता था..." गाँधी का यह दुःख उस समय सामने आता है जब आजाद भारत में नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस की हुकूमत होती है.

गाँधी की यह निराशा कि उनका 'सत्य' किसी की समझ में नहीं आ रहा है, नई नही थी. ऐसा नहीं था कि देश के आजाद होते ही नेहरू बदल गए या कांग्रेस बदल गयी. बहुत पहले 25 अप्रेल 1938 को गाँधी नेहरू को लिखते हैं : "मैं बता नहीं सकता कि यह जानकर मुझे कितना घोर अकेलापन महसूस होता है कि आजकल मैं तुम्हें अपने विचार का नहीं बना सकता... तुम्हारी बगावत के कारण तुम्हारे प्रति मेरा आदर और गहरा है. परन्तु इससे अकेलेपन का दुःख और भी तीव्र हो जाता है."

एक समय ऐसा भी आता है जब सभी तरफ़ से वैचारिक रूप से दर्शन के स्तर पर अस्वीकार हो जाने पर गाँधी का आत्मविश्वास भी डगमगा जाता है. 30 अप्रेल 1945 को वे नेहरू को लिखते हैं : "...इससे भी गंभीर बाधा वह भीतरी निराशा है जो मुझ पर छा गई है. मैं काम चला रहा हूँ, परन्तु यह सोच कर आत्मग्लानि होती है कि मेरा वह आत्मविश्वास जाता रहा." गाँधी का आत्मविश्वास तब डगमगाता है जब नेहरू एक झटके से कांग्रेस को गाँधी के दर्शन से अलग कर देते हैं : "...कांग्रेस के लिए कहाँ तक ठीक है कि वह उन बुनियादी सवालों पर गौर करे जिनका जीवन के विभिन्न दर्शनों से सम्बन्ध आता है ? मेरा ख्याल है कि कांग्रेस जैसी संस्था को ऐसे मामलों के तर्क-वितर्क में अपने को नहीं उलझाना चाहिए." 9 अक्टूबर 1945 को गाँधी को लिखे अपने लंबे पत्र में नेहरू कहते हैं :"...संक्षेप में मेरा ख्याल है कि हमारे सामने सवाल सत्य बनाम असत्य या अहिंसा बनाम हिंसा का नहीं है." इसी पत्र में नेहरू गाँधी के ग्राम स्वराज, जिसकी कल्पना गाँधी ने 'हिंद स्वराज' में की थी, के बारे में लिखते हैं : "कांग्रेस ने इस तस्वीर पर कभी गौर नहीं किया, उसे मंजूर करने की तो बात ही अलग है."

इसी वैचारिक भिन्नता के कारण इन दो व्यक्तित्वों को आपस में विचार विमर्श करने में भी कठिनाई आने लगी. 28 अप्रेल 1945 को नेहरू ने गाँधी को लिखा : "मुझे आपके साथ विस्तार से किसी भी मामले की चर्चा करने में कठिनाई मालूम हुई ... और मुझे यह भी अनुभव हुआ कि ऐसी चर्चाओं में कोई ख़ास नतीजे नहीं निकलते."

नेहरू और गाँधी के बीच हुए पत्र व्यवहार को पलटें तो स्पस्ट हो जाता है कि शुरू से ही गाँधी को यह लगने लगता है कि नेहरू कांग्रेस के नेतृत्व में उनके उत्तराधिकारी भले ही हों वैचारिक दृष्टि से वे उनसे बहुत दूर हैं.

गाँधी 4 जनवरी 1926 को साबरमती आश्रम से नेहरू को लिखते हैं : "मुझे तुम्हारे इन कामों की इतनी परवाह नहीं, जितनी तुम्हारे शरारतियों और हुल्लड़बाजों को प्रोत्साहन देने की है. पता नहीं तुम अब भी विशुद्ध अहिंसा में विश्वास रखते हो या नहीं.

इससे पहले गाँधी के लेखों की नेहरू आलोचना करते हैं तो गाँधी 17 जनवरी १९२८ को उन्हें पत्र में लिखते हैं : "मुझे तुम्हारे - मेरे बीच दृष्टि भेद कुछ-कुछ दिखाई देने लगा था, फ़िर भी मुझे तनिक भी कल्पना नहीं थी कि ये मतभेद इतने भयंकर हो जायेंगे. " ख़ुद गाँधी स्वीकार करते हैं : "तुम्हारे और मेरे बीच मतभेद इतने विशाल और मौलिक है कि हमारे लिए मिलन की जगह दिखाई नहीं देती."

फ़िर 26 अक्टूबर 1939 को गाँधी नेहरू को पत्र में कहते हैं : "मैंने देख लिया है कि यद्यपि मेरे प्रति तुम्हारा स्नेह और आदर कायम है, फ़िर भी हमारे बीच दृष्टिकोण का अन्तर दिन-दिन तीव्र होता जा रहा है. शायद हमारे इतिहास में यह सबसे नाजुक काल है. जिन अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रश्नों पर हमारा ध्यान लगा हुआ है उन पर मेरे बहुत प्रबल विचार हैं. मैं जानता हूँ कि उन पर तुम्हारे भी प्रबल विचार हैं, परन्तु वे मुझसे भिन्न हैं."

गाँधी को हम एक ऐसे वृद्ध के रूप में पाते हैं जिसकी हर बात नई पीढी को खटकती है. सेवाग्राम, वर्धा, से 5 अप्रेल 1937 को गाँधी का नेहरू का पत्र देखिये : "किसी भी तरह सही. मैं जो भी कहता था शायद करता भी हूँ, वही तुम्हें खटकता है."

सन् 1942 के आते तो दोनों के विचारों का भेद अमल में भी आने लगा. "मैं देखता हूँ कि हमारे विचारों में भेद तो था ही, लेकिन अब अमल में हो रहा है. इस हालत में वल्लभ भाई क्या करें."

गाँधी सोच के स्तर पर नेहरू के साथ भेद को सहज रूप से स्वीकार कर लेते हैं और अपने विचारों को नेहरू पर थोपने का आग्रह करते कहीं नज़र नहीं आते. 13 नवम्बर 1945 को वह नेहरू को लिखते हैं : "मैं चाहता हूँ कि हम एक दूसरे को समझें, ऐसे ही लोग भी हमको समझ लें. अंत में ऐसा हो सकता है कि हमारा मार्ग ही अलग अलग है, तो अलग सही."

गाँधी ने सत्य, अहिंसा और ग्राम स्वराज के अपने विचारों पर किसी से अंत तक समझौता नहीं किया और अपने ही विश्वासों पर अटल रहे. उन्होंने कोशिश की कि कांग्रेस संगठन इन आधारभूत सिद्धांतों की जमीन पर नए भारत की नींव रखे. परन्तु नेहरू के शब्दों में : "गाँधी आमतौर पर दूसरों की इच्छाओं का आदर करते हुए अपनी स्थिति में नरम पड़ जाते थे. कई मामलों में तो वे अपने विचारों से विपरीत फ़ैसला भी स्वीकार कर लेते थे." यह गाँधी की महानता थी. वे एक ऐसे लोकतांत्रिक नेता थे जो दूसरे की राय को भी उतना ही आदर देते थे. लेकिन ऐसा करते हुए उन्होंने अपनी प्रतिबद्धताओं से कभी कोई समझौता नहीं किया. गाँधी के विचारों को उनकी प्रतिबद्धता कहना भी उन्हें छोटा बनाना होगा. वे विचार सहज रूप से उनकी अपनी जीवन शैली थी जो हजारों सालों की भारतीय परम्परा से आई थी. जिस 'सत्य' का उन्होंने साक्षात्कार अपने अनुभवों से किया उसको दूसरों तक पहुचाने के लिए गाँधी हत्यारे की गोली का शिकार होने तक मन से लगे रहे, बिना इसकी परवाह किए कि लोग उनके साथ आ रहे हैं या नहीं.

क्योंकि गाँधी का 'सच' भारतीय आदर्शों और मूल्यों का सच था इसलिए उसने इस देश के कोटि-कोटि जन के मन को छुआ और हमें गाँधी के पीछे समूचा देश खड़ा नज़र आया. मगर भारतीय मन होते हुए भी नेहरू का मस्तिष्क पाश्चात्य सोच से जबरदस्त प्रभावित था. इसलिए नेहरू का मन से तो गाँधी से रिश्ता रहा मगर दिमाग से नहीं. सोच के स्तर पर नेहरू गाँधी को "मूलतः एक धार्मिक व्यक्ति, अपने अंतरतम तक एक हिंदू" मानते थे. नेहरू का यह भी मानना था कि गाँधी का "आमतौर पर जीवन के प्रति दृष्टिकोण तथा जिसे आधुनिक दृष्टिकोण कहते हैं, के बीच नजरिया मूल रूप से भिन्न था."

यह जानना दिलचस्प होगा कि गाँधी के कांग्रेस से अलग हो जाने के पीछे भी उनके अहिंसा का आग्रह तथा कांग्रेस द्वारा अहिंसा की गाँधी की अवधारणा को अस्वीकार करना भी था. कांग्रेस के किसी भी प्रस्ताव में अहिंसा का जिक्र नहीं आया. कांग्रेस के दूसरे लोग अपने प्रस्तावों में 'अहिंसा' की बजाय 'शान्ति' का ही उपयोग करते रहे. अहिंसा और शान्ति के बीच गहरा फर्क है. शान्ति के लिए आप लड़ सकते हैं. शान्ति के लिए आप बल प्रयोग कर सकते हैं, हथियारबंद शान्ति सेना का उपयोग कर सकते हैं. परन्तु अहिंसा में तो बल की गुंजाइश ही नहीं होती. उसमें तो सिर्फ़ आत्मबल की बात होती है.

नेहरू अपनी पुस्तक में कहते हैं : "कांग्रेस संगठन युद्ध की स्थिति में गाँधी के अहिंसा के सिद्धांत को लागू करने को स्वीकार नहीं कर सका." अहिंसा के बारे में नेहरू के सोच पर एक अंग्रेज लेखक एडवर्ड टॉमसन ने बड़ी ही सटीक टिपण्णी की है : "उन (विश्व इतिहास की झलक) पृष्ठों को देखने से वास्तव में ऐसा लगता है की आप सफल हिंसा के प्रशंशक हैं.

कई लोगों को अब लगता है कि नेहरू और कांग्रेस ने गाँधी का उपयोग किया. उन्होंने गाँधी का नेतृत्व केवल संघर्ष के दौर में ही स्वीकार किया क्योंकि गाँधी ही वह व्यक्ति था जिसके पीछे भारत के सभी लोग खड़े हो सकते थे - धर्म, जाति, भाषा या वर्ग की दीवारें तोड़कर भी. लेकिन जब भी सक्रिय संघर्ष की स्थितियां नहीं होती थीं तो वे गाँधी की बात नहीं मानते थे.

नेहरू के लिए गाँधी सत्य के एक ऐसे प्रतीक के रूप में थे जो समझौते से परे था. 'डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया' में नेहरू कहते हैं : "हमें सावधान करने तथा सत्य के लिए शर्मसार करने के लिए गाँधी एक गैर समझौतावादी सत्य के प्रतीक के रूप में हमेशा हमारे सामने रहते थे." मगर आजाद भारत की पहले पहल बागडोर सँभालने वाला यह व्यक्ति आगे यह भी कहता है : "सत्य क्या है मुझे स्पष्ट रूप से नहीं मालूम. और शायद हमारे लिए सत्य सापेक्ष होते हैं तथा सम्पूर्ण सत्य तो हमारी क्षमता के बहार ही होता है. अलग-अलग लोग सत्य के प्रति भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण रख सकते हैं तथा हरेक व्यक्ति अपनी खुद की पृष्ठभूमि, प्रशिक्षण तथा अन्तःप्रेरणा से प्रभावित रहता है और गाँधी भी ऐसे रहे." स्पष्ट है गाँधी और नेहरू के सत्य भिन्न-भिन्न थे.

गाँधी के सत्य में अहिंसा, मानवीय श्रम, और सहकर सर्वोपरि था. ग्राम स्वराज के लिए गाँव की उनकी काल्पनिक इकाई व्यक्ति से व्यक्ति से शोषण का प्रतिकार करने वाली थी. वे ग्रामीण व्यक्ति को "गंवार तथा जाहिल" मानकर नही चलते थे जैसा नेहरू के सोच में था.

गाँधी का मानवतावादी सत्य उन्हें महावीर और बुद्ध की परम्परा में खड़ा करती है जिसके लिए प्रख्यात वैज्ञानिक आइंस्टाइन ने कहा था कि आने वाली पीढियां यकीन नहीं करेंगी कि गाँधी कोई हाड मांस का बना हमारी तरह कोई इंसान था. गाँधी का यही 'सच' नेहरू चूक गए. कांग्रेस चूक गयी. और आज़ादी के बाद भारत के विकास की धारा जिस रास्ते पर बढ़ गई वह गाँधी का रास्ता नही था.

(जनसत्ता के दिनांक 25 जनवरी 2009 के अंक में प्रकाशित)

गाँधी और नेहरू के मतभेद उजागर करता एक ख़त


(आजाद भारत का नक्शा कैसा होगा इस पर गाँधी और नेहरू के बीच गहरे मतभेद को गाँधी का 5 अक्टूबर 1945 को लिखा पत्र स्पष्ट रूप से इंगित करता है. गाँधी इस पत्र में अपने 'हिंद स्वराज' के विचारों का खुलासा करते हैं. ख़त का प्रमुख अंश यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है जो आज भी उतना ही मौजूं है.)

चि. जवाहर लाल,

तुमको लिखने का तो कई दिनों से इरादा था, लेकिन आज ही उसका अमल कर सकता हूँ. अंग्रेजी में लिखूं या हिन्दुस्तानी में, वह भी मेरे सामने सवाल था. आखर में मैंने हिन्दुस्तानी में ही लिखने का पसंद किया.

पहली बात तो हमारे बीच में जो बड़ा मतभेद हुआ है, उसकी है. अगर ये भेद सचमुच है तो लोगों को भी जानना चाहिए, क्योंकि उनको अंधेरे में रखने से हमारा स्वराज का काम रुकता है. मैंने कहा कि 'हिंद स्वराज' में मैंने लिखा है, उस राज्य-पद्धति पर मैं बिल्कुल कायम हूँ. यह सिर्फ़ कहने की बात नही है. लेकिन जो चीज मैंने 1908 के साल में लिखी है उसी चीज का सत्य मैंने अनुभव से आज तक पाया है. आख़िर में मैं एक ही उसे मानने वाला रह जाऊं, उसका मुझको जरा भी दुःख नहीं होगा, क्योंकि मैं जैसा सत्य पाता हूँ, उसका मैं साक्षी बन सकता हूँ. 'हिंद स्वराज' मेरे सामने नहीं है. अच्छा है कि मैं उसी चित्र को आज अपनी भाषा में खींचू. पीछे वह चित्र सन् 1908 जैसा है या नहीं, उसकी मुझे दरकार न रहेगी, न तुम्हें रहनी चाहिए. आखर में तो मैंने पहले क्या कहा था, उसे सिद्ध करना नहीं है. आज मैं क्या कहता हूँ, वही जानना आवश्यक है. मैं यह जानता हूँ कि अगर हिंदुस्तान को सच्ची आज़ादी पानी है तो हिन्दोस्तान के मारफत दुनिया को भी, आज नहीं तो कल देहातों में ही रहना होगा , झोंपडियों में, महलों में नहीं. कई अरब आदमी शहरों में और महलों में सुख से और शान्ति से कभी रह नहीं सकते, न एक दूसरों का खून करके, मायने हिंसा, न झूठ से - यानि असत्य से. सिवाय इस जोड़ी के (याने सत्य और अहिंसा) मनुष्य जाति का नाश ही है, उसमें मुझे जरा भी शक नहीं है. उस सत्य और अहिंसा का दर्शन हम देहातों की सादगी में ही कर सकते हैं. वह सादगी चरखा में और चरखा में जो चीज भरी है उसी पर निर्भर है. मुझे कोई डर नहीं है कि दुनिया उलटी ओर ही जा रही दिखती है. यों तो पतंगा जब अपने नाश की ओर जाता है तब सबसे ज्यादा चक्कर खाता है और चक्कर खाते-खाते जल जाता है. हो सकता है कि हिन्दोस्तान इस पतंगे के चक्कर में से न बच सके. मेरा फ़र्ज़ है कि आखिर दम तक उसमें से उसे और उसके मारफत जगत को बचाने की कोशिश करूं. मेरे कहने का निचोड़ यह है के मनुष्य जीवन के लिए जितनी जरूरत की चीज है, उस पर निजी काबू रहना ही चाहिए - अगर न रहे तो व्यक्ति बच ही नहीं सकता है. आखिर में तो जगत व्यक्तियों से ही बना है. बिन्दु नही है तो समुद्र नहीं है. यह तो मैंने मोटी बात ही कही - कोई नई बात नहीं कही.

लेकिन हिंद स्वराज में भी मैंने यह बात नहीं की है. आधुनिक शास्त्र की कदर करते हुए पुरानी बात को मैं आधुनिक शास्त्र की निगाह से देखता हूँ तो पुरानी बात इस नए लिबास में मुझे बहुत मीठी लगती है. अगर ऐसा समझोगे कि मैं आज की देहातों की बात करता हूँ तो मेरी बात नहीं समझोगे. मेरा देहात आज मेरी कल्पना में ही है. आखर में तो हरेक मनुष्य अपनी कल्पना की दुनिया में ही रहता है. इस काल्पनिक देहात में देहाती जड़ नहीं होगा - शुद्ध चैतन्य होगा. वह गंदगी में, अंधेरे कमरे में जानवर की जिंदगी बसर नहीं करेगा, मरद और औरत दोनों आज़ादी से रहेंगे और सरे जगत के साथ मुकाबला करने को तैयार रहेंगे. वहां न तो हैजा होगा, न मरकी होगी, न चेचक होगी. कोई आलस्य में रह नहीं सकता है, न कोई ऐश-आराम में रहेगा. सबको शारीरिक मेहनत करनी होगी. इतनी चीज होते हुए मैं ऐसी-ऐसी बहुत सी चीज का ख्याल कर सकता हूँ जो बड़े पैमाने पर बनेगी. शायद रेलवे भी होगी, डाकघर भी होंगे. क्या होगा, क्या नहीं उसका मुझे पता नहीं. न मुझको उसकी फिकर है. असली बात को मैं कायम कर सकूं तो बाकी आने की और रहने की खूबी रहेगी. और असली बात छोड़ दें तो सब छोड़ देता हूँ.

उस रोज हम आखर के दिन वर्किंग कमेटी में बैठे थे तो ऐसा कुछ फ़ैसला हुआ था कि इसी चीज को साफ़ करने के लिए वर्किंग कमेटी 2-3 दिन के लिए बैठेगी. बैठेगी तो मुझे अच्छा लगेगा. लेकिन न बैठे तब भी मैं चाहता हूँ कि हम दोनों एक दूसरे को अच्छी तरह समझ लें. उसके दो सबब हैं. हमारा सम्बन्ध सिर्फ़ राजकारण का ही नहीं है. उससे कई दर्जे गहरा है. उस गहरे का मेरे पास कोई नाम नहीं है. वह सम्बन्ध टूट भी नहीं सकता. इसलिए मैं चाहूँगा हम एक दूसरे को राजकारण में भी भली-भांति समझें. दूसरा कारण यह है कि हम दोनों में से एक भी अपने को निकम्मा नहीं समझते हैं. हम दोनों हिन्दोस्तान की आज़ादी के लिए ही जिंदा रहते हैं और उसी आज़ादी के लिए हमको मरना भी अच्छा लगेगा. हमें किसी की तारीफ की दरकार नहीं है. तारीफ हो या गालियां - एक ही चीज है. खिदमत में उसे कोई डिगा ही नहीं सकता. अगरचे मैं 125 वर्ष तक सेवा करते करते जिंदा रहने की इच्छा करता हूँ तब भी मैं आखर में बूढा हूँ और तुम मुकाबले में जवान हो. इसी कारण मैंने कहा है कि मेरे वारस तुम हो. कम से कम उस वारस को मैं समझ तो लूँ. और मैं क्या हूँ, वह भी वारस समझ ले तो अच्छा ही है और मुझे चैन रहेगा...

बापू के आशीर्वाद

(प्रस्तुति : राजेंद्र बोड़ा)

(जनसत्ता के दिनांक 25 जनवरी 2009 के अंक में प्रकाशित)