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Showing posts from 2018

गजेंद्र नारायण सिंह: संगीत को तिजारत से दूर रखने का अलख जगाने वाला नहीं रहा

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                              -- राजेंद्र बोड़ा पर्फ़ोर्मिंग आर्टिस्ट समीक्षक नहीं होते और समीक्षक पर्फ़ोर्मिंग आर्टिस्ट नहीं होते। मगर गजेंद्र नारायण सिंह विलक्षण रूप से ये दोनों थे। वे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के कलाविद् होने के साथ-साथ भारतीय शास्त्रीय संगीत के समीक्षक और इतिहासकार भी थे। उनका यह बहुआयामी व्यक्तित्व उन्हें भीड़ से अलग करता था। ऐसे गुणवंत कलाकार , पारखी समीक्षक और भारतीय संगीत को बढ़ावा देने में हमेशा जुटे रहने वाले गजेंद्र नारायण सिंह के सोमवार को पटना में निधन से भारतीय संगीत प्रेमियों में शोक है।       10 दिसंबर 1939 को एक संभ्रांत बिहारी परिवार में जन्मे सिंह को बचपन से ही संगीत का जुनून रहा और उन्होंने 18 वर्षों तक गुरु- शिष्य परंपरा में संगीत का कडा प्रशिक्षण ग्वालियर घराने के सुविख्यात गायक चूड़ा मणि और पद्मविभूषण पंडित विनायक बुआ पटवर्धन से जैसों से पाया। कथकली के जाने माने विद्वान केलू नाय र इनके नृत्य गुरु रहे। उन्हों ने पंडित नारायण राव व्यास , पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर , उस्ताद फ़हीमुद्दीन डागर , उस्ताद विलायत खां , जैसे संगीतज्ञों से

शिवरतन थानवी: एक संवादप्रिय शिक्षाविद् का चले जाना

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राजेंद्र बोड़ा शिक्षाविद् शिवरतन थानवी के निधन के साथ ही एक युग का अवसान हो गया। एक ऐसे युग का जिसमें संबंधों की ऊष्मा बनाये रखते हुए गहरी बहस की गुंजाइश बनी रहती थी। वे कहते थे "संवाद-प्रियता नहीं हो तो सही शिक्षा और आजीवन शिक्षा संभव ही नहीं है। संवादप्रिय बनना सीखना भी शिक्षा का और आत्म-शिक्षण का एक अत्यंत महत्वपूर्ण चरण है। संवाद करना एक कसरत है और कला भी है"। संवाद की यह कला दो पीढ़ियों को उनसे मिली। उन्होंने हमें जीवन के सरोकारों को समझने के लिए लगातार शिक्षित किया। शिक्षा की दीक्षा-प्रशिक्षा की रूढ़ि पर शिवरतन   थानवी   हमेशा सवाल   खड़े करते रहे हैं। उन्हें हमने हमेशा एक ऐसे शिक्षक की भूमिका में पाया जो दुर्गम रास्तों में हमें भटकने से बचाने के लिए हमारा मार्गदर्शन करते रहे। उन्होंने हमें शिक्षा के प्रति एक समग्र समझ दी। उनका मानना था कि मौजूदा शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या यह है कि “अब तक न हम सहिष्णु हुए , न उदार हुए , और न ही हम समझदार हुए”। शिक्षा जरिये वे पूरे समाज को जागरूक रखना चाहते थे जिनमें “नागरिक भी शामिल हों और शासक भी”। वे राजस्थान

भारत बंद का सबक

राजेंद्र बोड़ा  पिछड़ी जातियों पर होने वाले अत्याचारों को रोकने वाले कानून पर आये सुप्रीम कोर्ट के निर्देश से आहत विभिन्न दलित संगठनों के आह्वान पर आज का ‘ भारत बंद ’ इस देश से प्रेम रखने वालों सभी लोगों के लिए चिंता का विषय है। आज के हंगामे के बीच केंद्र सरकार ने सर्वोच्च अदालत में याचिका दायर कर के आग्रह किया है कि वह अपने उस आदेश पर फिर से विचार करे जिसके तहत अनुसूचित जातियों और जन जातियों पर अत्याचार रोकने वाले कानून में उसने बदलाव किए हैं। अदालत ने मुख्यतः कहा था कि इस कानून के तहत किसी भी जन सेवक (सरकारी मुलाजिम) पर उसके नियुक्ति अधिकारी के अनुमोदन के बिना मुकदमा न दायर किया जाय और अन्य नागरिक भी कानूनी जांच के बाद ही गिरफ्तार किया जाय।   मगर चिंता इस बात की है कि देश में जैसा माहौल आज है वह सामाजि क समरसता वाले रिश्तों को मजबूत बनाने के संविधान की भावना को ठेस पहुंचाता है। कुछ चीजें साफ-साफ समझनी होगी। आज देश के हर वर्ग में बेचैनी है। आज के बंद के आह्वान के पीछे भी यही आम बेचैनी है भले ही वह एक वर्ग विशेष की अपनी सुरक्षा के लिए प्रतिरोध के रूप में सामने आई हो। आ
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स्टीफ़न हॉकिंग : अद्भुत दिमाग वाला व्यक्ति जिसने ब्रह्मांड के रहस्य खोले   राजेंद्र बोड़ा स्टीफ़न हॉकिंग अपनी पीढ़ी के सबसे विलक्षण भौतिक विज्ञानी थे। ब्रह्मांड की उत्पत्ति के रहस्य की खोज में उनका योगदान अतुलनीय है। वे एक अद्भुत दिमाग और बौद्धिक क्षमता रखते थे। भौतिक विज्ञान की जटिलताओं को सरलता से सामान्य जन को समझा देने की वे अतिरिक्त योग्यता रखते थे। उनकी अकादमिक विराटता इतनी थी के वे आइन्स्टाइन के सापेक्षतावाद के सिद्धांत और क्वांटम फिजिक्स को समाहित करते हुए ब्रह्मांड के निर्माण के उस क्षण तक पहुंचे थे जब एक धमाके के साथ सृष्टि बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई और समय प्रारंभ हुआ।   हॉकिंग ने विज्ञान के क्षेत्र में अपने काम से दुनियाभर में करोड़ों युवाओं को विज्ञान पढ़ने के लिए प्रेरित किया । अन्तरिक्ष , ब्रह्मांड और भौतिक विज्ञान के रहस्यों को समझाती उनकी सहज-सरल भाषा में लिखी किताबें ‘ द हिस्ट्री ऑफ टाईम ’ तथा ‘ ग्रांड डिज़ाइन ’ सबसे अधिक बिकने वाली किताबों में शुमार हैं। उनका लेखन सिखाता है कि कैसे जटिल विषय सरल भाषा में संप्रेषित किए जा सकते हैं।  हॉकिंग बड़े मन