Friday, April 23, 2010

दास्तान 'गर्म हवा' की




राजेंद्र बोड़ा

'गर्म हवा' उर्दू की जानी-मानी लेखिका इस्मत चुगतई की एक अप्रकाशित लघु कहानी पर आधारित फिल्म है जिसका फ़िल्मी तर्जुमा मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी ने शमा जैदी के साथ मिल कर किया. कैफ़ी आज़मी ने फिल्म के संवाद भी लिखे. यह मैसूर श्रीनिवास सथ्यू - एम. एस. सथ्यू - की पहली फीचर फिल्म थी जो 1973 में रिलीज हुई.

इस्मत चुगतई की मूल कहानी का नायक एक स्टेशन मास्टर है जो देश के बंटवारे के चक्र में फंस गया है. फिल्म की स्क्रिप्ट में नायक को चमड़े के जूते बनाने वाली फेक्ट्री के मालिक के रूप में चित्रित किया है.

छः जुलाई 1930 में मैसूर में जन्मे सथ्यू बीएससी की पढाई बीच में छोड़ कर अपनी किस्मत सिने जगत में आजमाने के लिए बम्बई आ गए. बम्बई में 1952-53 में फ्रीलांस एनिमेटर के रूप में काम किया. मगर बाद में चार बरस तक बेरोजगारी में गुजारे. उन्हें सबसे पहला तनख्वाह वाला काम फिल्मकार चेतन आनंद के सहायक के रूप में मिला. फिल्म 'किनारे किनारे' में वे चेतन आनंद के सहायक नेर्देशक बने. बाद में स्वतंत्र रूप से कला निर्देशन करने का काम भी उन्हें चेतन आनंद ने ही दिया. फिल्म थी 'हकीकत', भारत चीन युद्ध पर बनी एक सच्ची फिल्म. सथ्यू को इस फिल्म के श्रेष्ठ कला निर्देशन के लिए वर्ष 1964 का 'फिल्मफेयर पुरस्कार' मिला.


सथ्यू ने हिन्दुस्तान थियेटर, ओखला, हबीब तनवीर, कन्नड़ भारती तथा दिल्ली के अन्य थियेटर समूहों के लिए डिजाइनर तथा निर्देशक के रूप में भी काम किया. फिल्मों में उन्होंने कला निर्देशन के अलावा केमरामेन, स्क्रीन राइटर, निर्माता, और निर्देशक के रूप में अपनी प्रतिभा दिखाई. मगर उनका सर्वश्रेष्ठ काम आज भी 'गर्म हवा' ही माना जाता है.

'गर्म हवा' आज क्लासिक फिल्म मानी जाती है, जिस पर 'भारतीय सिनेमा' को गर्व है. 'इंडिया टाइम्स' वेब पोर्टल ने देश की 25 सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में इस फिल्म की गणना की है. फिल्म देश के बंटवारे के बाद उत्तरी भारत के एक माध्यम वर्ग के मुस्लिम परिवार की कहानी है जिसका नायक अपने सभी रिश्तेदारों के पाकिस्तान चले जाने के बावजूद इसी देश में रहने का फैसला करता है. फिल्म एक ऐसे मुस्लिम परिवार की परीक्षा और पीड़ा प्रकट करती है जिसे देश की बहुसंख्य हिन्दू आबादी संदेह की नज़र से देखती है, उसके साथ साम्प्रदायिक द्वेष रखती है, उसका आर्थिक बहिष्कार करती है.

'गर्म हवा' पिछली शताब्दी के सातवें दशक 'मुख्यधारा सिनेमा' का विकल्प प्रस्तुत करते हुए शुरू हुए 'न्यू-वेव' सिनेमा की शुरूआती फिल्मों में से एक है. 'न्यू-वेव' सिनेमा की फिल्मों ने 'मुख्यधारा' की फिल्मों के उस दुष्चक्र को तोड़ने का प्रयास किया जिसमें परंपरागत प्रेम कहानी होती थी, भोंडी कामेडी होती थी और निरर्थक हिंसा होती है.

देश के मुस्लिम नागरिकों के सरोकारों और उनकी पीड़ा को दर्शाने वाली यह पहली सच्ची - आनेस्ट - फिल्म थी. श्याम बेनेगल ने ऐसे ही मुस्लिम सरोकारों वाली सच्ची फिल्म 'मम्मो' बहुत बाद में बनाई. यह फिल्म तत्कालीन राजनैतिक और सामाजिक स्थितियों से दर्शकों को रूबरू कराती है. भारतीय सिनेमा में ऐसा पहली बार हुआ था जिसने दर्शकों की संवेदना को झकझोरा और मुस्लिमों की तकलीफों को मानवीय नजरिये से देखा.

अपनी फिल्म के बारे में सथ्यू कहते हैं : “What I really wanted to expose in 'Garm Hawa' was the games these politicians play...How many of us in India really wanted the partition. Look at the suffering it caused”.

सन 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध के दो वर्ष बाद रिलीज हुई यह फिल्म अपने कथ्य में ताकत पुरजोर तरीके से उन आदर्शों को पुनर्स्थापित करती है कि इस देश पर मुसलमानों का भी उतना ही हक है जितना हिन्दुओं का.

फिल्म का विषय ही ऐसा था कि वह हमेशा ही विवादों से घिरी रही. हम भारत के लोग वैसे तो अपनी सहिष्णुता के डंके बजाने में कभी पीछे नहीं रहते मगर जब भी ऐसा कोई मौका आता है जम हमें अपनी इस महानता का परिचय देना होता है हम असफल रहते हैं.

बावजूद इसके कि फिल्म सभी वर्गों द्वारा एक क्लास्सिक मानी गयी और समीक्षकों की उसे खूब सराहना मिली वह बड़े पैमाने पर सिनेमाघरों में नहीं पहुँच सकी.

सथ्यू ने जब 'गर्म हवा' बनाई तब वे इस क्लासिक को बनाने के लिए पूरी तरह तैयार थे. वे चेतन आनंद जैसे सिने काव्य रचने वाले फिल्मकार के सहायक के रूप में काम कर चुके थे. मैसूर में छः जुलाई 1930 को जन्मे मैसोर श्रीनिवास सथ्यू - एम. एस. सथ्यू - ने 1952 में कालेज में बीएससी की पढाई बीच में छोड़ कर बम्बई की अनजान फ़िल्मी दुनिया में कुछ कर दिखाने को पहुच गए. बम्बई की फ़िल्मी मायानगरी में उन्होंने फ्रीलांसर के रूप में 1952-53 में रेखाचित्र बनाने के काम से शुरुआत की. मगर इसके बाद चार साल तक उन्हें बेरोजगारी का सामना करना पड़ा. उन्हें पहला नियमित पगार वाला काम चेतनआनंद के सहायक के रूप में मिला. स्वतंत्र कला निर्देशक के रूप में उन्हें पहला मौक़ा चेतनआनंद ने अपनी फिल्म 'हकीकत' में दिया. और 'हकीकत' के कला निर्देशन के लिए सथ्यू को वर्ष 1964 का 'फिल्मफेयर पुरस्कार' मिला.

'गर्म हवा' उन फिल्मों में से है जो आज क्लासिक मानी जाती है मगर बनने पर जो ठीक ढंग से रिलीज भी नहीं हो पायी. फिल्म देश के विभाजन के बाद एक भले मुसलमान परिवार की त्रासदी की कहानी ही नहीं कहती है बल्कि देश के सामजिक और राजनीतिक माहौल की भी सच्ची दास्तान कहती है अपने इस विषय के कारण 'गर्म हवा' को लेकर हमेशा विवाद उठाये जाते रहे. 1971 में जब सथ्यू खुद की पहली फीचर फिल्म बनाने के इरादे से राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (National Film Development Corporation) से वित्तीय मदद मांगने गए तब 'गर्म हवा' की स्क्रिप्ट लेकर नहीं गए थे बल्कि कोई और कहानी लेकर गए थे. वहां वह प्रस्ताव अस्वीकार हो गया और उनसे कहा गया कि वे कोई और कहानी लायें. उनके पास 'गर्म हवा' की स्क्रिप्ट भी तैयार थी मगर उन्हें भरोसा नहीं था कि सरकारी संस्थान ऐसे विवादस्पद विषय की स्वीकार करेगा. मगर जब निगम ने उन्हें दूसरी कहानी लाने का कहा तो उन्होंने 'गर्म हवा' की स्क्रिप्ट वहां पेश कर दी. आश्चर्यजनक रूप से 'गर्म हवा' फिल्म बनाने के लिए वित्तीय मदद देना मंजूर कर लिया.

जब साम्प्रदायिक मानसिकता रखने वालों को फिल्म के थीम का पता चला तो फिल्म की शूटिंग के दौरान खूब झमेले और हंगामे किये गए. यहाँ तक कि उपद्रवकारियों से बचने के लिए एक नकली कैमरा टीम बनाई गई जो खाली कैमरा चला कर सीन की शूटिंग का ढोंग करती और उपद्रवकारियों को अपनी तरफ उलझाए रखती ताकि फिल्म की वास्तविक शूटिग दूसरी जगह पूरी हो सके.

फिल्म बन कर पूरी हुयी तो सेंसर का झंझट हो गया. फिल्म से साम्प्रदायिक भावनाएं फैलने का अंदेशा जताते हुए सेंसर बोर्ड ने उसे सर्टिफिकेट देने से इनकार कर दिया. सथ्यू अपनी फिल्म का प्रिंट लेकर हर महत्वपूर्ण मंत्री और अधिकारी दिखाते फिरते रहे और फिल्म को सेंसर की अनुमति दिलाने की गुहार लगाते रहे. नौ महीनों की जद्दोजहद के बाद आखिर फिल्म को सेंसर बोर्ड का सर्टिफिकेट मिला.

फिल्म शुरू होने और बन कर पूरी होने में थीं साल का वक्त लगा. फिल्म रिलीज हुई तो उसे खरीददार मिलने मुश्किल हो गए. हर कोई इस विवादास्पद थीम वाली फिल्म से दूर ही भागता रहा. यह सच है कि जिन लोगों ने इस फिल्म को देखा है उनमें से बहुत कम ऐसे होंगे जिन्होंने उसे सिनेमा हाल के परदे पर देखा हो. अधिकतर ने उसे 'दूरदर्शन' पर ही देखा है.

फिल्म रिलीज हुई तब किसी को यह आशा नहीं थी कि फिल्म को हर तरफ से सराहना मिलेगी. मगर ज्यों ज्यों समय गुजरता गया फिल्म के प्रति लोगों का लगाव बढ़ता गया. फिल्म कान्स फिल्म समारोह में सर्वश्रेष्ठ फिल्म को मिलने वाले 'गोल्डन पाम' के लिए नामांकित हुई. ‘गर्म हवा’ अकेडमी के ‘आस्कर’ पुरस्कार के लिए भारतीय एंट्री थी. इधर अपने देश में फिल्म को राष्ट्रीय एकता का राष्ट्रपति पुरस्कार दिया गया. 'गर्म हवा' को 'फिल्मफेयर' के तीन पुरस्कार मिले - कैफ़ी आज़मी को सर्वश्रेष्ठ संवाद लेखन के लिए, कैफ़ी आज़मी और शमा जैदी को संयुक्त रूप से फिल्म की स्क्रिप्ट के लिए और इस्मत चुगताई को फिल्म की कहानी के लिए.

लोगों को जान कर आश्चर्य होगा कि 'गर्म हवा' फिल्म कुल आठ लाख रुपयों में बनी. हमारे देश में मुफलिसी और परेशानिया झेलते हुए बनी फ़िल्में ही क्लास्सिक वर्ग में अधिकतर शामिल हुई है. सथ्यू वामपंथी बुद्धिजीवी फिल्मकार के रूप में जाने जाते हैं. इसलिए स्वाभाविक ही है कि फिल्म में अधिकतर इंडियन पीपल्स थियेटर -इप्टा- से जुड़े थियेटर कर्मियों ने काम किया. पूरी फिल्म बलराज साहनी के कन्धों पर चलती है. उन्होंने बिमल राय की 'दो बीघा जमीन' को अपने अभिनय से कालजयी बना दिया था. सथ्यू की 'गर्म हवा' में वे फिर अभिनय के ऐसे ऊंचे शिखर पर हैं जिसे पाना नामचीन कलाकारों के बस का नहीं है.


कईं लोग 'गर्म हवा' में बलराज साहनी के अभिनय को उनके जीवन का सर्वश्रेष्ठ काम मानते हैं. यह उनकी आखरी फिल्म थी. फिल्म के रिलीज होने के पहले ही 13 अप्रेल 1973 को उनका निधन हो गया. फिल्म की डबिंग पूरी करने के दूसरे ही दिन वे इस दुनिया से चल बसे. फिल्म के लिए उन्होंने जो आखरी डायलाग रिकार्ड किया वह था "कोई इंसान कितने समय अकेला जी सकता है".

फिल्म की एक बड़ी खूबी यह भी है कि ऐसा नहीं हुआ कि बलराज साहनी का किरदार इतना हावी हो गया हो कि अन्य कलाकारों के लिए कुछ करने को ही नहीं हो. फिल्म के हर कलाकार ने चाहे उसकी भूमिका कितनी ही छोटी क्यों न हो पूरी शिद्दत से निभाया है. यहाँ तक कि उस वृद्धा ने जिसका अभिनय से अपने जीवन में कभी वास्ता नहीं पड़ा और जो सथ्यू को आगरा की उस हवेली में ही रहती मिली जहाँ उन्होंने फिल्म को शूट करने का तय किया. उस वृद्धा को बलराज साहनी की माँ के किरदार में लिया गया.

भले ही देश भर के अधिकाँश दर्शकों ने 'गर्म हवा' टेलीविजन पर ही देखी हो और व्यावसायिक सिनेमाघरों को यह फिल्म अपने यहाँ प्रदर्शित करने लायक नहीं लगी हो मगर आज इस फिल्म पर भारतीय सिनेमा को गर्व है. लोकप्रिय वेब साईट 'इंडिया टाइम्स' ने 'गर्म हवा' को अब तक की 25 जरूर देखी जाने वाली फिल्मों की सूची में शामिल किया है.

फिल्मफेयर के समीक्षक ने लिखा था: I do not have the language to describe the beautiful sensitivity or the visuals and the sounds of Gram Hava. And though it is painful, it has a raw strength too. If Ghalib was the singer of political gloom after 1857, this film is the chronicle of robust hope after 1947.

टाइम्स आफ इंडिया ने लिखा: In many ways Garm Hava is the most important film made since independence. Never before has the cinema tackled one of the most sensitive issues of our time - the communal situation - with such courage and incissiveness.

हिन्दुस्तान टाइम्स में छपा : Garm Hava is the most courageous piece of political cinema to be seen here for a long time.

सन्डे स्टैण्डर्ड ने कहा : Garm Hava is one of the most important films made in recent months in this country - in fact one of the most significant movies ever made. It is a film with no false notes no melodramas no overplaying and no gimmicks, but a film which is narrated in an off-the-cuff style.

इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा : It is a film which sets you thinking and this can be said of very few films made in this country. Garm Hava is the most important films of our times . It is not an intellectual film. There is nothing esoteric about it. But it is a filmic experience of great power.

फिल्म वर्ल्ड का मानना था : sathyu achieves world class with this film. Every actor and actress has been cast in the right role and there is nothing that is out of place. Balraj has left this film as a memorial to us and no sensitive person will fail to realise the effort that has gone in making of this film. It is beautiful. Go see it to believe that India can make such films.

मशहूर चरित्र अभिनेता ए के हंगल के शब्दों में :


"गर्म हवा हिन्दुस्तानी भाषा में उनफिल्मों में से एक है जिनमें अधिकृत रूप से संवेदनशीलता के साथ साथ भारतीय जीवन के यथार्थ को भी चित्रित किया गया है. इस फिल्म का विषय भारत-पाक विभाजन के बाद अनुलंबित भारतीय समाज का गंभीर संकट है. जब जब मैं इस फिल्म के बारे में सोचता हूँ तो सबसे पहले मेरे मस्तिष्क में जो बात आती है वह है बलराज साहनी द्वारा मध्यमवर्गीय मुस्लिम व्यक्ति का आगरे में भयावह परिस्थितियों से जूझते एक देदीप्यमान चित्रांकन. फिल्म वस्तुतः इस मुस्लिम व्यक्ति को सच्ची श्रद्धांजलि है जिसने साहस और लम्बे समय तक एक दृढ़ संकल्प के साथ आम नागरिकों की भांति अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया, जबकि उसके और सभी रिश्तेदार पाकिस्तान चले गए पर उसने अपने बल बूते पर ही भारत में रहने का निर्णय लिया.
मेरे ख्याल से यह फिल्म इसलिए बन सकी क्योंकि अनेक धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति एक साथ इसमें काम करने को तैयार हुए और इसके निर्माण में उनहोंने मदद की, उनमें से अधिकाँश इप्टा से सम्बद्ध थे. एम एस सथ्यू ने निर्देशन किया, कैफ़ी आज़मी और शमा जैदी ने इस्मत चुगताई की कहानी पर फ़िल्मी पटकथा लिखी, बलराज साहनी ने मुख्य नायक की भूमिका अदा की, फिल्म की सिनेमेटोग्राफी ईशान आर्य ने किया. ये सब इप्टा के गौरवशाली कलाकार थे. मैंने भी एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की. एन सिन्धी व्यापारी जो कि कराची से आया एक शरणार्थी है फिर भी वह समय के विरुद्ध गतिमान है और बिना सांप्रदायिक पक्षपात के वह मुसलमानों से सहानुभूति रखता है और उसके साथ व्यापार जारी रखना चाहता है.

इस फिल्म से सम्बंधित एक त्रासद घटना भी है जो मुझे आज भी याद है. बलराज साहनी ने इस फिल्म में अपनी अविस्मर्णीय भूमिकाओं में एक भूमिका अदा की और जिस दिन इसे प्रदर्शित किया गया उस दिन बलराज साहनी वहां नहीं थे. फिल्म पर अपना काम ख़त्म करने के बाद उनके तो प्राण पखेरू ही उड़ गए. हमने उनकी मृत्यु का समाचार तब सुना जबकि हम सब कलाकार तेजपाल में एक नाट्य प्रदर्शन के लिए मंच पर जाने ही वाले थे. एक बार फिर प्रदर्शनकारी कलाकारों की अनंतकालीन मान्यता ने कि "शो मस्ट गो आन" हमें मंच पर भेज दिया. और "शो" जारी रहा".

(पिंक सिटी प्रेस क्लब और फिल्म फैन्स सोसायटी की तरफ से 10 अप्रेल 2010 को गर्म हवा फिल्म के प्रदर्शन के अवसर पर दिया गया वक्तव्य)

Sunday, April 4, 2010

हमारे भाग्य विधाता

राजेंद्र बोड़ा

हर बार की तरह इस बार भी हुआ. विधान सभा के बजट सत्र का शुक्रवार आखरी दिन था. सत्र के अनिश्चित काल के लिए स्थगित होने के थोड़ी देर पहले विधानसभा अध्यक्ष, मुख्यमंत्री, मंत्रियों और विधायकों के वेतन - भत्तों में यकायक बड़ी बढ़ोतरी करने का विधेयक और वह तुरत - फुरत में पास हो गया. सबके वेतन पांच - पांच हजार रुपये माहवार बढ़ गए. विधायकों के निर्वाचन भत्ते में दस हजार रुपये माहवार अलग से बढ़ गए. उन्हें एक कर्मचारी रखने की सुविधा थी जिसकी जगह विधायकगण अब बीस हजार रुपये माहवार नकद ले सकेंगे. इन निर्वाचित जनसेवकों - विधानसभा अध्यक्ष, मुख्यमंत्री, मंत्री और राज्य मंत्री उपाध्यक्ष मुख्य सचेतक उप मुख्य सचेतक तथा प्रतिपक्ष के नेता - द्वारा अपने मेहमानों का आतिथ्य करने के लिए मिलने वाले भत्ते में भी पांच से छः हजार रुपये माहवार बढ़ा दिए गए. घरों को सजाने और बिजली के बढे हुए बिल भरने की भी व्यवस्था कर दी गई और रेल में यात्रा करने के लिए साल भर में एक लाख रुपये खर्च नहीं हो सकेंगे तो वह राशि लेप्स नहीं होगी उसका उपयोग अगले वर्ष में भी किया जा सकने का इंतजाम करदिया गया. भूतपूर्व विधायकों की पेंशन बढ़ा कर दुगनी कर दी गई.

ऐसा उस प्रदेश में हुआ जहाँ की लगभग आधी आबादी गरीबी की सीमा रेखा से नीचे जीवन निर्वाह करती है. जनता के नुमाइंदों के वेतन भत्तों में हुई बढ़ोतरी की राशि इस प्रदेश के लोगों की ‘प्रति व्यक्ति आय’ से दुगने से अधिक है. यह उस समय हुआ है जब अकाल सिर पर है और पीने के पानी की त्राहि-त्राहि गर्मियों के शुरू में ही होने लगी है.

ऐसे में यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या जनता के नुमाइंदों को उस समय अपने वेतन भत्ते बढाने का कोई नैतिक अधिकार है जब प्रदेश का आमजन को दो जून रोटी का जुगाड़ करने में मुश्किलें आ रही हैं. क्या जनता के लिए काम करने का दम भरने वाले निर्वाचित विधान सभा सदस्यों को वे सभी सुविधाएं पाने का हक बनता है जो आमजन को मुहैया नहीं है? मुख्य मंत्री अशोक गहलोत, जिन्होंने ये वेतन भत्ते बढाने का प्रस्ताव पास कराया. ने पिछले दिनों एक सार्वजनिक सभा में अपने मन की पीड़ा व्यक्त की थी. उनका कहना था कि विवाह समारोहों में इन दिनों जितना खर्चा होता है उसे देखकर उन्हें 'लज्जा' आती है. आज यही सवाल उनसे ही पूछा जा सकता है कि गरीब प्रदेश जो आकंठ उधारी में डूबा है और जो उधार लेकर सरकारी अमले की तनख्वाओं, भत्तों तथा पेंशन की व्यवस्था करता है क्या उसके लिए क्या ऐसा प्रस्ताव लेकर आना लज्जाजनक नहीं लगा?

गहलोत मन से गांधी को अपना आदर्श मानते हैं. आज जब कांग्रेस में महात्मा गांधी के नामलेवा चंद लोग ही बचे हों तब गहलोत जैसे प्रमुख नेता का गांधी के आदर्शों की बात करना आशा की किरण नज़र आता है. इसीलिए इस प्रदेश के लोग उन्हें राजस्थान का गाँधी कह कर गर्व करते हैं. गांधी के आदर्शों की बात करना और उन पर व्यवहार करना दो अलग चीजें हैं. किसी के व्यवहार से ही इतिहास उसे तोलता है न कि उसने क्या कहा इससे. गहलोत गाँधी जी की वह उक्ति बार बार दोहराते हैं जिसमें बापू ने कहा था कि वे एक तिलस्म देते हैं. जब कभी तुम अनिर्णय की स्थिति में हो तो इस देश के गरीब की शक्ल अपने ध्यान में लाना और सोचना कि उसके लिए क्या ठीक रहेगा. विधानसभा में यह प्रस्ताव लाते हुए उन्होंने किन्हीं मौन क्षणों में अपने आप से पूछा कि क्या मंत्रियों - विधायको के वेतन भत्ते बढ़ा देने से राजस्थान के गरीब की हालत सुधर सकेगी?

ऐसी स्थिति में गाँधी क्या करते इसका उदाहरण हमारे सामने मौजूद है. जयपुर शहर में तीस के दशक में जब पहला खादी भण्डार खुला तब उसके प्रबंधक थे कर्पुर चंद पाटनी. गर्मियों में खादी भण्डार में एक टेबल पंखा खरीद कर लगा लिया गया. जब भण्डार का लेखा ब्यौरा केंद्रीय संगठन को भेजा गया जिसके अध्यक्ष खुद गाँधी जी थे तब बापू के हाथ की लिखी चिट्ठी आयी जो पाटनी परिवार के पास आज भी सुरक्षित होगी. उस पत्र में गांधी जी ने कहा कि खादी के काम में लगे हम लोग गरीब की मदद के लिए समर्पित हैं. क्या उन सभी गरीब लोगों के घरों में बिजली का पंखा आ गया है जिनके लिए हम काम कर रहे हैं? ऐसा जब हो जाए तब हमें यह सुविधा लेने के बारे में सोचना चाहिए उससे पहले नहीं. पता नहीं गहलोत गांधीजी के इस आदर्श को कितनी अहमियत देते हैं.

एक तकनीकी सवाल और है. कानून और न्यायविदों के पास इसका जवाब नहीं होगा क्योंकि वे किताबों में लिखे पर ही चलते हैं. वैधानिक व्यवस्थाओं की किताबों के अनुसार विधायक गण विधि निर्माता हैं. वे कानून बनाते हैं. अतः वे अपने वेतन भत्ते बढाने का कानून भी बना सकते हैं और बनाते हैं. कानून बनाने की शक्ति उन्हें "हम भारत के लोग", जिनमें हमारा संविधान सार्वभौम सत्ता निहित्त करता है, अपना प्रतिनिधि बनाकर देते हैं. हम भारत के लोग" मतदाता के रूप में अपने प्रतिनिधियों का भविष्य निर्धारित करते हैं. फिर किस तरह हमारे ये प्रतिनिधि अपने वेतन - भत्तों के बारे में अपना भविष्य खुद निर्धारित कर लेते हैं यह सवाल है जो विधि से अधिक नैतिकता से जुडा हुआ है. क्या यह उचित न होता कि मंत्रियों विधायकों के वेतन-भत्तों के बारे में फैसला जनता करती. विधायिका में इसकी व्यवस्था है कि किसी विधेयक को जनमत जानने के लिए परिचालित किया जा सकता है. कई विधेयकों पर ऐसा होता भी है. फिर विधायको के वेतन भत्तों का विधेयक जनमत जानने के लिए कभी क्यों नहीं भेजा जाता.

इस विधेयक के जरिये भूतपूर्व विधायको की पेंशन में बढ़ोतरी का प्रबंध किया गया है. जो भूतपूर्व विधायक हैं उनमें से अधिकतर वे हैं जिन्हें मतदाता अस्वीकार कर चुका है. मतदाता द्वारा अस्वीकृत नुमाइंदे को किस प्रकार राजकोष से पैसा दिया जा सकता है यह विधि और नैतिकता दोनों का सवाल है.

(जनसत्ता के अप्रेल 5, 2010 के अंक में संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित)

Friday, April 2, 2010

ख़बरों का कारोबार करने वालों पर पाठक कब तक भरोसा करेंगे ?

राजेंद्र बोड़ा

ऐसे कौन से कामकाज हैं जिन पर लोग सबसे कम भरोसा करते हैं ? इस प्रकार की जानकारी पाने के लिए पश्चिमी देशों में लगातार सर्वे होते रहते हैं. पत्रकारिता की साख लोगों में कितनी है यह जानने के लिए यदि हम इन सर्वे के परिणामों पर नज़र डालें तो पाते हैं कि राजनेता और पत्रकार अपनी साख के मामले में लोगों की राय में सबसे निचली पायदानों पर आते हैं. इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि पत्रकारों के काम पर लोगों का सबसे कम भरोसा है. परन्तु यह सोच पश्चिम का है. यह सच है कि हमारे देश में भी राजनेताओं की साख बहुत बुरी तरह गिरी लगती है, मगर पश्चिम के लोगों की पत्रकारों के प्रति सोच भारत के लोगों की सोच से मेल नहीं खाती. हमारे देश में आज भी लोग अख़बारों के लिखे पर भरोसा करते हैं. जब भी किसी को अपनी बात पर दूसरे को भरोसा दिलाना होता है तो वह यही जुमला आम तौर अपनाता है "अखबार में छपा है." अखबार में छपी बात को अटल सत्य की तरह हमारे लोग स्वीकार करते हैं. पाठकों का यही भरोसा है जिसे बनाए रखना अखबारों में काम करने वाले पत्रकारों के लिए आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती है. आज जब राजनेताओं पर से लोगों का भरोसा उठता जा रहा है तब लोग स्वाभाविक रूप से अखबारों और पत्रकारों की ही तरफ़ देखते हैं कि वहां उनके सरोकारों की बात होगी. लोगों के सरोकारों के लिए पैरवी करने करने वाली संस्था के रूप में ही पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मानी गयी है. लोकतंत्र के सरोकार पत्रकारिता में खुल कर नज़र आए इसके लिए जरूरी है पत्रकारों में अपने समय के इतिहास, राजनीति, और अर्थ जगत की गहरी समझ हो और उनमें अपने पेशे की साख बनाए रखने की ईमानदारी हो.

कोई भी व्यक्ति कागज और स्याही के लिए अखबार नही खरीदता. अखबार खरीदा जाता है उसमें क्या छप रहा है उसके लिए. तो अखबार का असली कच्चा माल होती है सूचना - इन्फोर्मेशन- जो समाचारों के रूप में हो सकती है, चित्रों के रूप में हो सकती है या विचारों के रूप में हो सकती है. ये सारी चीजें पाठक की समझ बढ़ाने में मददगार होती है. इसी कारण अपने सारे उद्यमी और कारोबारी स्वरुप और बाजार का होते हुए भी अखबार बाजार से ऊपर होता है.

कभी यह भी पूछा जाने लगा कि क्या अख़बार लोगों की मूलभूत जरूरत है ? क्या रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मूल जरूरत वह होता है ? यह भी कहा जाता रहा है कि आम आदमी की मूलभूत जरूरतों के पूरी होने के बाद अखबार का नंबर आता है. मगर पत्रकारिता के समर्थकों का यह जवाब होता रहा है कि क्योंकि लोकतंत्र में आम नागरिक की मूलभूत आवश्यकताएं पूरी हों उसके लिए जरूरी है कि विधायिका में अच्छे और काबिल लोग चुन कर जाएँ. अखबार नागरिकों को सही जानकारी देकर तथा लोकतंत्र के सभी अंगों की ख़बर रख कर उन्हें सही प्रतिनिधि चुनने में मदद करते हैं. सही निर्वाचन से ही सुशासन आता है जो लोगों की मूलभूत जरूरतों को पूरी करने में ईमानदारी से काम करता है. इसलिए अखबार लोकतंत्र में मूलभूत आवश्यकताओं से भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं क्योंकि वे इन जरूरतों को पूरी कराने में भागीदार बनते हैं.

आज़ादी के चार-पांच दशक तक, कारोबारी होते हुए भी, अखबारों ने सीमित साधनों में भी अपनी यह भूमिका बखूबी निभाई. आज खुले बाज़ार के दौर में अखबारों के साधन खूब बढ़ गए हैं और उनके पाठकों की संख्या में भी बड़ा इजाफा हुआ है. मगर अब ऐसा लगने लगा हैं कि अख़बारों के सामाजिक सरोकार कहीं खोते जा रहे हैं.

इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत में अखबार अपने जन्म से ही कारोबारी रहा है. भारत में छपने वाले पहले अखबार का नाम ही Calcutta Journal Advertiser था जिसे एक अंग्रेज जेम्स ऑगस्ट हिक्की ने निकाला था. इस पहले ही अखबार का उद्येश्य था विज्ञापन से कमाना. लेकिन इसी अखबार ने ईस्ट इंडिया कम्पनी के भ्रष्टाचारों को उजागर करने की मुहिम छेडी और अपने सामाजिक सरोकारों का परिचय दिया. इसके बाद भी हम देखते हैं कि सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचारों, कमजोरियों, खामियों और जन-हित से जुड़े मुद्दों पर भारतीय अख़बारों ने अपना सरोकार लगातार बनाये रखा. अपनी इसी भूमिका के कारण अख़बार समाज की आँख और कान बन गए. आम जन अखबार की निगाह से ही दुनिया को देखते हैं उसे समझने की कोशिश करते हैं और अपने विचारों को पुष्ट करते हैं. अखबार विचार नहीं बनाते. दुनिया भर में इस बात को जांचने के लिए बार-बार हुए सर्वे के नतीजों में यही बात सामने आयी है कि अखबार पाठकों के विचार नहीं बदल सकते , खासकर राजनैतिक विचार. हाँ यह जरूर होता है कि अपने विचारों के नज़दीक वाला अखबार विशिष्ट समूह की पसंद बन जाता है.

अखबार को अधिक से अधिक पाठक चाहिए होते हैं इसलिए उसका किसी एक विचारधारा से जुड़ना उसके हित में नहीं होता. ऐसा जुडाव उसकी प्रसार संख्या सीमित करेगा. इसलिए सभी अखबारों का यही प्रयास होता है कि वे अपना चेहरा निष्पक्ष बनाये रखें जिससे वे सभी के लिए ग्राह्य हो सकें.

अखबार का निष्पक्ष होना पाठकों के बाज़ार में अपनी पहुँच को विस्तार देने के लिए जरूरी होता है. जिस प्रकार अखबारी दुनिया का विकास हुआ उसमे निष्पक्षता अख़बार की पहली शर्त मान ली गयी. इसी विकास के दौर में अख़बार आम-जन का प्रतिनिधि बन गया जो लोकतंत्र के तीन प्रमुख पायों पर निगाह ही नहीं रखने लगा बल्कि जन भावनाओं का प्रकटीकरण भी करने लगा. इससे अखबार का सामाजिक सरोकारों का मूल्य और बढ़ गया. अख़बार को इसीलिए लोकतंत्र का चौथा खंबा कहा जाने लगा.

इन सरोकारों की बात करते हुए बाज़ार की बात करना समीचीन होगा. आज के बाज़ार के झंडाबरदार मानते हैं कि बाज़ार तो बाज़ार है. किसी कार, फ्रिज या किसी टोस्टर की बिक्री को बाज़ार की जो शक्तियां या सिद्धांत प्रभावित करते हैं वे हीं अख़बारों की बिक्री को भी संचालित करते हैं.

अखबार को कारोबार मानने से समस्या पैदा नहीं हुई बल्कि खबर को कारोबार की वास्तु बना देने से आज की स्थिति पैदा हुई है. पहले भी अखबार कारोबार था मगर उससे मुनाफा कमाना उन्हें निकालने वालों का पहला उद्धेश्य नहीं हुआ करता था. अखबार उनके लिए प्रतिष्ठा की चीज थी. आज की नयी धनाड्य पीढी जिनके हाथों में अखबारों की नकेलें हैं वे बाजारवाद की उपज हैं जिनके लिए पैसा ही प्रतिष्ठा है, पैसा ही ताकत है. इसे पाने के लिए वे ख़बर का भी सौदा करने को तत्पर रहते हैं.

इन लोगों के लिए न्यूज़ या समाचार भी एक उत्पाद है . इस उत्पाद को तैयार करने और उसके वितरण में उनके हिसाब से बाज़ार के वही सारे आर्थिक सिद्धांत काम करते हैं जो अन्य औधोगिक माल के उत्पादन पर लागू होते हैं. अमरीका के फेडरल कोम्युनिकेशन्स कमीशन के चेयरमैन थे मार्क फ्राद्लर. उनका कहना था "बाज़ार में लोगों की जैसी पसंद होती हैं उसी से मीडिया के कंटेंट निकलते हैं”. इसका अर्थ यह हुआ कि जिस प्रकार बाज़ार में ग्राहक की पसंद के हिसाब से उत्पाद आते हैं वैसे ही मीडिया में कंटेंट भी आएगा. वे यह भी कहते हैं कि “जनता की रुचियाँ ही जनहित को परिभाषित करेंगी”. मगर हमें यहाँ यह नहीं भूल जाना चाहिए कि खुले बाज़ार में लुभावनें प्रचारों के जरिये जनता की रुचियाँ बनाई और बिगाडी जाने का खेल बड़े पैमाने पर चलता है.

ऐसी ही बाज़ार की शक्तियों के चलते आज अख़बारों में क्या हो रहा है ? अख़बारों के समाचार कक्षों में एक अच्छी कॉपी (ख़बर) किसे मानते हैं? वह कॉपी जो लालच, बेवकूफी, और षडयंत्र की कहानी कहती हो. ऐसा माना जाता है ऐसी चटपटी ख़बरों से अख़बार को अधिक पाठक मिलेंगे.

अभी हाल ही में जेम्स टी. हेमिल्टन का अध्ययन पुस्तक के रूप में आया है . यह अपने प्रकार का दुनिया में पहला अध्ययन है. इसका शीर्षक है 'हाउ द मार्केट ट्रांसफार्म्स इन्फोर्मेशन इन्टू न्यूज़'. हेमिल्टन कहता है "खबरें बाज़ार की ताकतें बनती हैं और ख़बरों (जिसे बाज़ार की भाषा में इन्फोर्मेशन गुड्स कहते हैं) के स्वरुप का निर्धारण अर्थतंत्र करता है.

मौजूदा समय की खुले बाज़ार की सबसे बड़ी हिमायती ब्रिटेन की पूर्व प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर आयरन लेडी के रूप में जानी जाती है. उनका एक कथन अत्यन्त महत्वपूर्ण है. उनका यह कथन बाज़ार की आवाज है . उनहोंने कहा "देयर इज नो सच थिंग एज सोसाइटी" याने समाज जैसी कोई चीज नहीं होती. उनका मतलब था कि समाज को एक एब्सट्रेक्ट या सांस्कृतिक मेटाफर के रूप में ही देखा जा सकता है. मुक्त बाज़ार की अर्थव्यवस्था के समर्थकों ने समाज और सामाजिक सरोकार को हमेशा हिकारत की निगाह से देखा है. ऐसे समर्थक हमारे यहाँ अब अखबारों के नियंता हैं.


आज के अख़बारों के नियंताओं के लिए कोई चीज गैर वाजिब नहीं है. वे अब संपादक नहीं एक प्रमुख कार्यकारी अधिकारी चाहते हैं और ऐसा बनने के लिए तैयार बैठे पत्रकारों की फेहरिस्त लम्बी है. आज तेजी से बढ़ते अखबार अपने संपादकों को सिखा रहे हैं कि वे अपने पाठक को पहचाने. अखबारों के नए नियंता की निगाहों में उन पाठकों का कोई मोल नहीं जिनकी जेब में बड़े बाजारों में - माल्स - में खर्च करने को अतिरिक्त पैसा है. संपादकों को यह सिखाया जा रहा है कि आप उन पाठकों को लक्ष्य करें जो रंगीन टीवी, फ्रिज, कारें वगैरा खरीद रहें हों. यदि यह खरीददार और आपके पाठक एक होंगे तो ही अखबार को बड़े विज्ञापन मिलेंगे. हर साल जब पाठक सर्वे की रिपोर्ट आती है तो अख़बारों में सबसे पहले यही देखा जाता है कि किस अखबार में "हैसियत" वाले पाठकों की संख्या कितनी है.

इस समय चुनाव का मौसम चल रहा है. यह वो समय है जब कईं अखबार ख़बरों के कारोबार में उतर आते हैं. राजनैतिक पार्टियों और उम्मीदवारों से उनके विज्ञापनों का ही सीधा सौदा नहीं होता बल्कि न्यूज़ कालम में छपने वाली विज्ञप्तियों को स्थान देने के लिए भी मोल तय किया जाने लगा है. ऐसे सौदों में पार्टियों का हाथ मरोड़ने के लिए ख़बरों को ही हथियार बनाया जाता है. क्योंकि अभी तक आम लोगों का भरोसा अकबार में छपी ख़बरों पर बना हुआ है इसलिए वे उन पर भरोसा कर लेते हैं और उन्हें पता ही नहीं लगता कि वे ठगे जा रहे हैं.
पत्रकारिता जगत में एक पुरानी कहावत है जो कभी हर पत्रकार की जुबां पर पर रहती थी "फेक्ट्स आर सेक्रेड, इंटरप्रेटेशन इज माइन". तब अखबारी दुनिया में कहा जाता था "न्यूज़ देट इज फिट टू प्रिंट". मगर आज के अखबार शायद कहते हैं "न्यूज़ देट इज फिट तो सेल".

यह "फिट टू सेल" सारे झगडे की जड़ है. अखबार पाठकों के लिए नहीं बाज़ार के लिए हो चले हैं. बार बार कहा जाता है कि बाज़ार के भी " मूल्य" होते हैं. मगर बाजारों के उतार चढाव और घोटालों ने बार बार यही बताया है कि बाज़ार मानवीय चेहरा नहीं होता. दिलचस्प बात यह भी है कि मीडिया ने बड़ी बड़ी चीजें उजागर कीं है मगर बाज़ार की तरफ अपनी खोजी निगाह कभी नहीं की. बाज़ार से उपकृत होते हुए ऐसा हो भी कैसे सकता है.

इन दिनों अख़बारों के कंटेंट संपादक नहीं ब्रांड मेनेजर तय करते हैं. वे पत्रकारिता और मनोरंजन के बीच की सीमा रेखा को मिटा दे रहे हैं. ब्रांड मेनेजर अखबारों का कलेवर तय करते हुए बताते हैं कि सुबह सुबह पाठक अखबार में क्या देखना चाहते हैं. वे संपादक से यह भी अपेक्षा करते हैं कि रोज अखबार में कम से कम एक ऐसी चटपटी खबर अवश्य हो जिसकी शहर में दिन भर चर्चा होती रहे. ख़बरों को चटपटा बनाने के लिए ऐसे मसाले डाले जाते हैं जिनका तथ्यों से कोई लेना देना न हो. ख़बरों में ऐसी मिलावट की आदतें पत्रकारिता को जन सरोकारों से दूर ले जाती है. अख़बारों के नए नियंताओं ने यह भी साध लिया है कि किस प्रकार पाठकों को ऐसे चटपटे मुद्दों पर भटका दिया जाय कि वे असली मुद्दों को बिसरा दें.


पाठकों के बारे में किसी की टिपण्णी है "रीडर इज नॉट अ किंग. ही इज अ नाइस हिप्पोक्रेट (पाठक कोई शहंशाह नहीं है. वह एक अच्छा पाखंडी है). मुक्त बाज़ार जो दिशा देता है अखबार उसी पर चलते हुए जो सामग्री परोसता है वह कईं बार खूब रस लेकर पढ़ी काटी है. पाठन एक तरफ तो ऐसी सामग्री मजे लेकर पढता है और वही बाद में यह आलोचना भी करता है कि अखबार में गंभीरता नहीं रही या वह चलताऊ हो गया है.

इतना सब होते हुए भी सब कुछ ख़त्म नहीं हो गया है. अखबार के सामाजिक सरोकारों की पैरवी करने वालों और उन सरोकारों को अभिव्यक्ति देने वाले संपादकों की कमी नहीं है.

पाठकों की भागीदारी या दबाव अखबारों को सही रास्ते पर चलने पर मजबूर कर सकता है. मगर उसके लिए पाठक को अपनी भूमिका के बारे में सोचना होगा कि क्या वह एक अच्छे अखबार के लिए उसके वाजिब दाम देकर खरीदने को तैयार है ? यदि वह मुफ्त में या नाम मात्र के दाम पर अखबार चाहता है तो उसे वही मिलेगा जो बाज़ार चाहेगा क्योंकि लागत और बिक्री मूल्य के बीच का अंतर वही भर रहा है.


(बीकानेर में आयोजित अजित फाऊंडेशन की सालाना लेक्चर श्रंखला में दिया गया अभिभाषण)