Friday, July 31, 2009

From an outsider to being one of them


Rajendra Bora

Maharani Gayatri Devi of Jaipur, hailed as one of the most beautiful women in the world, added glamour to the Pink City when she arrived in the town in 1940 at the age of 21 as a third wife of Maharaja Man Singh, a veritable prince charming.

Unlike his two earlier marriages, arranged by elders, the Maharaja himself chose his third bride. It was a love marriage between Man Singh and Gayatri Devi. And like any love marriage in traditional Indian society this high profile wedding also faced several hurdles.

The first hurdle came from Gayatri Devi’s family in Cooch Behar. Even her mother, herself a great friend of the Jaipur Maharaja, was hesitant to give her daughter’s hand to a man already having two wives. However, Man Singh’s love for the beautiful princes triumphed and Cooch Behar family agreed for the wedding.

The biggest challenge to the proposed marriage came from Jaipur nobles and also from the then British Government of India.

Oppositon to the third marriage of the Maharaja with Cooch Behar princes was unanimous. Rajput chieftains objected to the marriage as they considered Cooch Behar as inferior in status to that of Jaipur. There was, however, nobody who could tell Man Singh this to his face. There were only two exceptions, his father, the Thakur of Isarda and Nobel Amar Singh, who could talk to the Maharaja. But their opposition too failed to change the Maharaja’s mind.

An entry into Aamar Singh’s diary states that in January 1940 Maharaja Sahib asked him whether he would be coming to his marriage and he replied “certainly not; if you marry in a good Rajput family I will with pleasure, but not when you marry into that family (of Cooch Behar)”.

Maharajas of Bikaner, Udaipur, Dungarpur and Jamnagar, who were all related to one or other of Man Singh’s earlier two wives even made representation to the Viceroy Lord Linlithgow against the Jaipur Maharaja’s adventurous step.

Interestingly Viceroy of India too issued an edict : “no officer of my government should attend, whether from Cooch Behar or from Jaipur, or anywhere else, and no congratulations or good wishes should be offered unless with the preface that the offerer stands in his private capacity only.”

Sir B.J. Glancy, political advisor, held that ‘though they (Cooch Behar) described themselves as Kshtriya, they would have great difficulty in establishing their claim to this distinction.”

But the adamant Maharaja sticked to his love. He himself went to Udaipur to bring its Maharana to his side and later wrote a letter asking him to attend his marriage. Udaipur Maharana, excusing himself on health ground, ultimately sent his two representatives to the wedding ceremony held in Cooch Behar. Maharaja Man Singh went there with a retinue of 40 nobles.

Maharani Gayatri Devi in her autobiography ‘A Princes remembers’ commented “I knew that my marriage was not popular with Jai’s (for her Man Singh was Jai and for Maharaja she was Ayesha) relatives and the Jaipur Nobilities. The other two Maharanis were related to most of the Rajput princely families, but I was a total stranger.”

However, when Gayatri Devi departed to heavenly abode at the age of 90 yesterday she was no ‘outsider” but Jaipur’s own ‘Maharani’, ‘Raj Mata’ and ‘Raj Dadi’ who was sent to the Lok Sabha by the people thrice with astounding margin of votes.

(The piece appeared in Hindustan Times supplement HT LIve on July 31, 2009)

Saturday, July 25, 2009

जोधपुर से जुडी हैं उस्ताद अली अकबर खां साहेब की यादें

राजेंद्र बोड़ा

सरोद के बेताज बादशाह उस्ताद अली अकबर खान साहेब का इंतकाल शास्त्रीय संगीत के एक युग पुरुष का हमारे बीच से उठ जाना है. उनके सरोद के तारों की धुन के दीवाने हिंदुस्तान में ही नहीं पूरी दुनिया में फैले हुए हैं. उनके निधन की खबर सुन कर खान साहेब की स्मृतियों में खो जाने वालों में राजस्थान के जोधपुर शहर के संगीत के रसिक भी हैं. बहुतों को नहीं मालूम होगा कि खान साहेब का तत्कालीन मारवाड़ की राजधानी जोधपुर से गहरा रिश्ता रहा. वास्तव में इस सरोदवादक को अपनी पहली असली कामयाबी इसी मरू भूमि पर मिली. वे जोधपुर दरबार में संगीतज्ञ के रूप में नियुक्त होकर आये और इस शहर में करीब सात बरस रहे. जोधपुर दरबार में ही उन्हें उस्ताद की उपाधि मिली. ये वो ज़माना था जब राज दरबारों में संगीतकारों की प्रतिभा को बुलंदियां मिलती थीं. जोधपुर में अपने जीवन की पहली असली उपलब्धि हासिल करने के बाद सरोद के तारों के इस जादूगर ने कभी पीछे मुड कर नहीं देखा. वे संगीत में सफलताओं के एक के बाद एक बड़े शिकार चढ़ते ही गए.

उस्ताद अली अकबर खान साहेब का जोधपुर प्रवास के दिलचस्प किस्से स्वर्गीय संगीतकार रामलाल माथुर सुनाया करते थे.

खान साहेब के जोधपुर प्रवास काल में रामलाल जी का अधिकांश समय उनके सानिध्य में गुजरा. खान साहेब से रामलालजी ने औपचारिक रूप से संगीत की तालीम ली थी. इसलिए उनके पास अपने उस्ताद के साथ बिताये दिनों की लम्बी खुशगवार यादें थीं. रामलाल जी के शब्दों में उस्ताद को मोटर कार चलने का बेहद शौक था. जब वे जोधपुर आये ही थे तब दरबार की और से उस्ताद के लिए हर समय एक बग्गी तैनात रहती थी. फिर उन्हें एक मोटर साईकिल और बाद में उन्हें एक कार भेंट की गयी. कार ख़राब हो जाने पर उसे स्वयं ठीक करना उस्ताद का पसंदीदा काम था.

उस्ताद को तेज रफ़्तार से गाडी चलाना अच्छा लगता था. कभी खान साहेब अपने नजदीकी लोगों जिनमें रामलालजी जरूर होते थे अपनी कार में बिठा कर पाली के पास जसवंत सागर बंधे तक चले जाते थे और वहां घंटों बैठे रहते . चलती कार में ही उस्ताद गाकर अपने शागिर्दों को रागों के भेद बताते थे. अधिकतर उनके साथ कार में रामलालजी और संगीतकार जयदेव हुआ करते थे. कभी कभी उस्ताद की पत्नी बऊदी भी साथ हो लेती थीं.

रामलालजी ने एक किस्सा सुनाया कि एक रात लगभग नौ बजे उस्ताद की पत्नी खाना लगाने की तैयारी कर रहीं थीं. उस्ताद ने उसी दिन सरोद पर नया चमडा लगाया था अतः वे चौक में खाट पर केवल यह देखने के लिए बैठ गए कि घुड़च और तार ठीक से जमे हैं या नहीं. साज को जांचते जांचते उनका मन बजाने में लग गया और वे घंटों बजाते रहे. उस्ताद को बीच में कौन टोके ? सभी चुपचाप सुनते रहे. रात एक बजे उन्हें सुधि आयी. उस रात उस्ताद ने तन्मयता से अपने लिए जो बजाय वह ता उम्र रामलाल जी के मानस पटल पर अंकित रहा.

उस्ताद अली अकबर खान साहेब के जोधपुर प्रवास काल में पंडित रविशंकर कईं बार वहां आये. उन दिनों साले - बहनोई में खूब पटती थी. दोनों ज़िन्दगी को उत्सव की तरह जीते थे. वे एक दूसरे से बच्चों की तरह हंसी मजाक करते और एक दूसरे को बनाते भी खूब थे. दोनों में गज़ब की आपसी सूझ बूझ थी जिसकी झलक उनकी जुगलबंदी में मिलती थी. एक बार जोधपुर के मेहरानगढ़ किले में हुई महफिल में दोनों ने मिल कर रात भर बजाया. तबले पर उनके साथ संगत की थी पंडित किशन महाराज ने.

सितार के एक अन्य प्रमुख घराने के उस्ताद विलायत खान भी खान साहेब के मेहमान बन कर जोधपुर रहे. उनके कार्यक्रम महाराजा के यहाँ तो होते ही थे उस्ताद के घर पर भी महफिल जुटती रहती थी. दोनों दिग्गज कलाकार बड़े प्रेम से एक साथ बजाते थे. रामलालजी ने बताया कि महाराजा हनुवंत सिंह ने इन दो दिग्गजों की जुगलबंदी की एक ग्रामोफोन रिकॉर्ड भी बनवाई थी जिसमें दोनों ने राग मेघ बजाया था.


महाराजा उम्मेद सिंह के ज्येष्ठ पुत्र हनुवंत सिंह को शास्त्रीय संगीत बहुत प्रिय था. कभी कभी तो वे घंटों उस्ताद का सरोद वादन सुनते. एक बार किले के शीश महल में उस्ताद का कार्यक्रम हुआ जिसमें उन्होंने राग पूर्वी बजाया. हनुवंत सिंह ने सुन कर कहा उस्ताद आज तो बिलकुल नया राग बजाया, बहुत मीठा था. अब कोई हमारा राग भी बजाइए. हनुवंत सिंह को पीलू, खमाज, तिलक, कामोद, बिहाग, देश एवं भैरवी राग बहुत भाते थे. उस्ताद ने तिलक कामोद बजाया. इस राग की अवतारणा कुछ ऐसी करवट से हुई कि सुनने वाले मंत्रमुग्ध हो गए. दाद देते हुए हनुवंत सिंह ने कहा "उस्ताद हम बाजी हार गए. आपसे आधा सरोद भी बजाना आता तो हम सब कुछ छोड़ कर हिमालय पर जा बसते."

हनुवंत सिंह ने उस्ताद अली अकबर खान साहेब के निर्देशन में एक वृन्दवादन दल भी बनाया. उस्ताद ने शास्त्रीय और लोक धुनों के वृन्दवादन (आर्केस्ट्रा) तैयार किये जो बहुत लोकप्रिय हुए.

हनुवंत सिंह जब गद्दी पर बैठे तब उन्होंने जोधपुर में पहला अखिल भारतीय संगीत सम्मलेन आयोजित करवाया. उस्ताद अली अकबर खान के प्रयासों से सम्मलेन में देश भर के सभी विख्यात संगीतकारों ने हिस्सा लिया. इस सम्मलेन की एक विशेषता यह भी थी कि इसमें उत्तर भारत के अलावा दक्षिणी भारत के सुविख्यात वीणा तथा मृदंगम के कलाकारों ने भीं प्रस्तुतियां दीं. साथ ही सुगम संगीत के गायकों संगीतकारों ने भी इसमें शिरकत की. इनमें सचिन देव बर्मन भी थे जिन्होंने बाद में हिंदी फिल्मों में बड़ा नाम कमाया. इस सम्मलेन में ध्रुवपद एवं कत्थक का भी समावेश था.

कोलकाता के एक सम्मलेन में रामलाल जी भी साथ गए थे. राय बोराल स्ट्रीट के उस सम्मलेन में देश के सभी चोटी के संगीतज्ञ भाग ले रहे थे. उस्ताद ने वहां राग मुल्तानी बजाया और सबको मानो सम्मोहित कर दिया. कार्यक्रम की समाप्ति पर 'आफ़ताब-ए-मौसिकी' उस्ताद फैयाज़ खान मंच पर आये और अली अकबर खान को गले लगा कर बोले "बेटा तूने हक अदा कर दिया. हम तेरे बाबा के ज़माने के हैं. उनका सुर तो बहुत सुना था पर तेरे ज़वे की चोट तेरी ही है. इल्म-ए-मौसिकी का चिराग रोशन रखना बेटे. खुदा की रहमत हो तुझ पर."


एक दिलचस्प घटना को सुनाये बिना हमारी बात अधूरी रहेगी. एक बार दिल्ली से लौट कर उस्ताद ने यह किस्सा रामलाल जी को सुनाया था. उस्ताद दिल्ली में रेडियो स्टेशन के स्टूडियो में सरोद के तार मिला रहे थे. तभी एक नयी अनाउंसर आयी और पूछा आप ही अली अकबर हैं ? आपको देशकार राग बजाना है. समझे ? उस्ताद अपने मूड में थे. उससे कहने लगे “इस वक्त तो मैं राग देसी ही बजाऊंगा”. वह बोली “आप देसी या परदेसी कुछ नहीं बजा सकते. आपको देशकार ही बजाना पड़ेगा”. उस्ताद ने मुस्करा कर कहा मैं तो देसी ही बजाऊंगा. वह बोली “तो यह कहिये कि आपकी देसकार बजाना नहीं आता. मैं अभी रिपोर्ट करती हूँ”. उस्ताद बोले “जरूर करिए. मगर अपने डाइरेक्टर को यह कहना न भूलियेगा कि अली अकबर को देसकार बजाना नहीं आता. और हाँ अगर आप पांच मिनट में नहीं लौटी तो मैं यहाँ से चला जाऊंगा”. तीन मिनट में ही डायरेक्टर दौड़ा दौड़ा आया और उस्ताद से माफ़ी मांगी और नई अनाउंसर को तमीज सिखाई.

Wednesday, July 1, 2009

Jodhpur is proud of its association with legendry Ali Akbar Khan


Rajendra Bora

Jodhpur. With the passing away of Ustad Ali Akbar Khan, who became a legend in his own life time, an era of Indian classical music has ended. The land of Marwar is proud of its association with the master of Sarod, a 25-stringed instrument, who brought the Indian classical music to the international stage.
Ali Akbar Khan Saheb began his professional musical career in Jodhpur serving as court musician in 1940s. People of Jodhpur have always been proud of the fact that the Ustad started his journey to great musical heights from the land of Marwar.. In fact his first true achievement came when he was appointed the court musician in the Jodhpur Royal Court.

It was also in the Jodhpur Royal Court that he was bestowed upon the title of ‘Ustad’ (master musician).

Veteran music connoisseurs in Jodhpur still have fond memories of Ustad who, they remember, was a jovial fellow and a good cook too. He was provided with an official car from the court in which he would go on long drives with local connoisseurs of music discussing intricacies and nuances of Indian classical ragas.

During his three years stay in the Sun City a hugely successful national music conference was organized that was attended by every musician worth the salt from all parts of the country.

The Ustad, virtually synonymous with Sarod had arrived in Jodhpur as a young man of 22, just out of his teens, after showing his virtuosity very early in life. He gave his first public performance in Allahabad when he was only 13. His first disc was cut by HMV when he was only 20.

Born on April 14, 1922 in East Bengal, now Bangla Desh, in a gifted family he was trained under the watchful and severe tutelage of his highly disciplinarian father Ustad Allaudin Khan. Exasperated by his father’s strictness the teenage boy fled to Bomaby to try his luck at All India Radio station. But he was forced back home by his father.

Tracing his ancestral roots to Mian Tansen, a 16th century musician in the court of Emperor Akbar, Khan Saheb began studying music at the age of three. Initially studying vocal music with his father, he studied drums with his uncle, Fakir Aftabuddin. Although he tried playing a wide variety of instruments, he felt most comfortable on the sarod.

In the Jodhpur Darbar he was accompanied by another musical genious Jaidev who later carved his own niche in bollywood giving soulful music to dozens of films, including Hum Dono, Mujhe Jeene Do and Ghaonda.

Although the Ustad exclusively devoted himself to classical music he too made contribution to film music and his musical scores for films are rare gem always cherished by Hindustani Film Music buffs. He scored music for Dev Anand starrer ‘Aandhiyan’ besides Ivory-Merchant’s Shashi Kapoor starrer ‘The Householder’ and Satyajit Roy’s Sharmila Tagore starrer ‘Devi’. He won best musician of the year award for his score for film ‘Kudita Pashan’. He scored music for Hollywood legend Bernardo Bertolucci’s ‘Little Buddha.’

A five-time Grammy nominee, he was called, by Yehudi Menuhin, "an absolute genius and the greatest musician in the world."

(The piece appeared on June 21,2009 in Jaipur Live supplement of The Hindustan Times)