Sunday, July 24, 2016

फिर अशांत है कश्मीर



राजेंद्र बोड़ा 

कश्मीर एक बार फिर अशांत है। हिज़बुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी की अनंतनाग में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में हुई मौत के बाद घाटी में जैसे हालात बने हैं वे अच्छे संकेत नहीं है। जो स्थितियां कश्मीर घाटी में बनी है वे लंबे समय तक उन ताकतों को दाना-पानी देती रहेगी जो भारत को छिन्न-भिन्न करने को उतारू रहती है।
   
जब भी कश्मीर में तनाव होता है हम उसे सेना के दम पर दबाते हैं, वहाँ कर्फ़्यू लगाते हैं और जब माहौल थोड़ा बहुत शांत हो जाता है तो वहाँ की समस्या को भूल जाते हैं। इस प्रक्रिया में वहाँ की नई पीढ़ी को कट्टरपंथ की ओर धकेल देते हैं। हमें बाज़ार की मंदी, आर्थिक विकास की दर और विदेशी निवेश के झमेलों से ही इतनी फुर्सत नहीं मिलती कि देश के अंदरूनी मसलों पर गंभीरता से विचार कर सकें, सबके साथ बात कर सकें और कोई आम सहमति बना सकें उनके साथ भी जो हमारे मत से ना इत्तफ़ाक़ी रखते हों। शासन और आम नागरिक के बीच एक ऐसी खाई बनाने लगी है जिससे संवाद के सारे तार टूट रहे हैं। संवादहीनता की स्थिति में शासन ज़मीनी हकीकत से नावाक़िफ़ रह जाता है और गणशत्रुओं के हाथों में खेलने लगता है। भारतीय समाज में आपसी सौहार्द की सदियों पुरानी परंपरा रही है जिसका आधार एक दूसरे पर भरोसा एयहा है। भरोसे की यह ज़मीन दरक रही है।
       
यह स्वीकार करने में हमें परहेज़ होता है कि कश्मीर एक राजनीतिक समस्या है जिसे राजनीतिक तौर पर हल किए जाने की ज़रूरत है हर कोई कश्मीर को सुरक्षा और ज़्यादा से ज़्यादा आर्थिक समस्या मानता हैं 

कश्मीर से प्रकाशित होने वाले अखबारों को यदि हम वहां के आवाम की भावनाएं उजागर करने वाला माने तो देखिये वे क्या कहते हैं: अंग्रेज़ी अख़बार 'राइज़िंग कश्मीर' ने अपने संपादकीय में लिखा, “मृत लोगों और घायल हुए लोगों की संख्या परेशान करने वाली है... नागरिकों की हत्या अस्वीकार्य है और सेना और प्रशासन की ओर से ऐसी कार्रवाई का कोई औचित्य नहीं हो सकता अख़बार लिखता है, “ये आश्चर्य की बात है कि अगर इसी तरह के प्रदर्शन भारत के दूसरे हिस्सों में होते हैं तो उनसे पेशेवर तरीके से निपटा जाता है और किसी की मौत नहीं होती जैसी (कश्मीर) घाटी में होती है।

कश्मीर के लोगों के दिल की भावनाएं प्रस्तुत करती एक मुस्लिम महिला फ़ातिमा चांद की एक खुली चिट्ठी 'कश्मीर मॉनिटर' में छपी है। अपनी इस खुली चिट्ठी में फ़ातिमा चांद प्रदर्शनकारियों से पत्थरों को छोड़ वापस घर जाने को कहती हैंवो लिखती हैं, “आप अपने पत्थर फेंक दीजिएअपनी भावनाओं पर काबू रखिएहमारे और भाई मारे जा रहे हैंआपकी बहनों, माओं पर लाठियां बरसाई जा रही हैंउनकी आंखें नम हैंउनके आंसू निकल रहे हैं बच्चे यतीम हो रहे हैंप्यारे कश्मीरियों, अपने पत्थर फेंक दीजिए और अपने घरों को लौट जाइए वो लोगों से कहती हैं कि वे अपने कलम के सहारे अपनी बाते कहें न कि पत्थर फेंक करइस चिट्ठी की भावनाओं के साथ हम में से कितने खड़े हैं? 

हम कश्मीर को केवल सुरक्षा के चश्मे से देखते हैसेना का काम सामने वाले को खत्म करना होता है। एक सैनिक से ये अपेक्षा भी नहीं की जा सकती कि वह आम निहत्थे लोगों और चरमपंथियों में भेद करे।

समय-समय पर कश्मीरी लोगों तक पहुंचने और उनसे बातचीत करने की चर्चा जरूर सुनाई देती है। वार्ताकार नियुक्त किए जाते हैं, समितियां बनती हैं लेकिन फिर भी बात जस की तस रह जाती है। बस वार्ताकारों और समितियों के सदस्यों को पद मिल जाते हैं भत्ते मिल जाते हैं। इससे इस आरोप को मान्यता मिलती है कि सरकारें इस समस्या का हल नहीं ढूंढना चाहती या उन्हें यह भरोसा है कि समय के साथ सब कुछ ठीक हो जाएगा।  

क्या कश्मीर समस्या केवल यही है कि पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर को हमें हासिल करना है? वर्ष 1947 से लेकर अब तक कश्मीर में कितनी पीढ़ियां आ गई जिनके दिमागों में चरमपंथियों ने ऐसी घुट्टी डाल दी है जो धर्म के आधार वाली राजनैतिक सत्ता की है। सके लिए कैसे और क्या किया जाय इसका रास्ता कोई नहीं सुझाता। सभी बल के भरोसे जीतना चाहते हैं – इधर भी और उधर भी।

कश्मीर घाटी में भारत विरोधी भावनाएं जिस शिद्दत से हैं वह सरकार के लिए ही नहीं हम सब के लिए परेशानी का सबब होना चाहिए। लेकिन हम कश्मीर को अपना तो मानते हैं मगर वहां अमन चैन हो भाई चारा हो इसके लिए बल प्रयोग के अलावा हम और कोई रास्ता खोजने को तैयार नहीं लगते। यह समस्या अपने हल के लिए एक निर्भीक और साहसी राजनीतिक प्रतिष्ठान के पहल की जरूरत रखती है। इस संदेश का इंतज़ार है कि सरकार ऐसा करने को गंभीर है

हम देखते हैं कि कश्मीर में जिस तरह की कार्रवाई होती है उससे पत्थर फ़ेंकने वाले चरमपंथी बन जाते हैं। पाकिस्तान इसी ताक में बैठा है कि हालत फिर बिगड़े और वह सीमा पार से चरमपंथियों को भेजकर 90 के दशक की स्थिति फिर से पैदा कर दे

हम क्यों नहीं ऐसा कोई राजनैतिक या सामाजिक अभियान छेड़ें जिसमें कश्मीरी बच्चों और नौजवानों को जिनका ब्रेनवाश आतंकी विचारधारा करती है को समझा पाएँ कि उनकी कश्मीरियत की पहचान इस्लाम से नहीं बनी है। उनकी पहचान सूफी इस्लाम और भक्ति हिन्दू की संस्कृतियों के बेजोड़ मेल से बनती है और यह पहचान भारत जैसे बहु-संस्कृतियों वाले लोकतान्त्रिक देश में ही सुरक्शित रह सकती है। मगर यह समझाइश ज़ोर-जबर्दस्ती से नहीं हो सकती। स्वतंत्र कश्मीर या पाकिस्तान के साथ इसका विलय यह पहचान खत्म करने का आत्मघाती कदम ही हो सकता है। मगर यह बात गुमराह कश्मीरी नौजवानों को समझाने वाला कोई राजनेता आज नज़र नहीं आता। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी अपने नए निखरे कद का उपयोग इसके लिए करेंगे इस पर किसी को विश्वास नहीं हो रहा है क्योंकि वे जिस राजनैतिक और संगठनात्मक विचारधारा से आते हैं उसमें जंग की फुंफकार और ईंट का जवाब पत्थर से देने का और अपने पराये का नज़रिया ही स्वीकार्य है।

भरोसा तो फिर भी बनाए रखना है। भरोसे से ही देश को जोड़ने वाली डोर बनी रह सकती है।

(यह आलेख प्रेसवाणी के जुलाई 2016 अंक में प्रकाशित हुआ) 


Wednesday, July 13, 2016

मान न मान मैं तेरा महाराजा


राजेंद्र बोड़ा 

आज़ादी के वक़्त जब ब्रितानवी हकूमत ने भारतवासियों को सत्ता हस्तांतरित की तब अंग्रेजों की अधीनता में अपनी हुकूमतें चलाने वाले राजा महाराजाओं ने बड़ी कोशिशें की थी कि गोरे जब जाएं तब राज उनको ही सौप कर जायें क्योंकि संधियां करके उन्होंने अंग्रेजों की प्रभुता स्वीकार की थी तो अब वो जा रहे हैं तो सत्ता उन्हें वापस सौप कर जायें। मगर राजाशाही के एक न चली क्योंकि उनके पास सामान कुछ नहीं था – न नैतिक न भौतिक।

पुरानी रियासतों के कुछ मुखियाओं ने भारतीय संघ में शामिल होने से ना नुकुर भी किया मगर लौह पुरुष के रूप प्रतिष्ठित लोकतान्त्रिक राजनेता तत्कालीन गृह मंत्री वल्लभ भाई पटेल जो राज्यों के विलीनीकरण का काम भी देख रहे थे के सामने किसी की न चली। अटल बिहारी वाजपेयी के शब्दों में सिंह वाहिनी दुर्गा के विशेषण से विभूषित तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने बाद में संविधान संशोधन के जरिये पूर्व रियासतों के मुखियाओं के राजा-महाराजा पदनामों के अलंकरण तथा सुविधाएं समाप्त कर दी और उन्हें भी आम नागरिकों की श्रेणी में डाल दिया। अपने लिए दुखदायी इस फैसले के खिलाफ वे कानूनी लड़ाई भी नहीं जीत सके।

जिस प्रकार रियासत काल में रजवाड़े आपस में लड़ते भिड़ते रहते थे उसी परंपरा को निभाते हुए उनके वंशज उन सम्पत्तियों के लिए आपस में अदालतों में आज भी एक दूसरे से झगड़ रहे है।
मगर आर्थिक उदारवाद के इस ज़माने में बाज़ार की ताकतों द्वारा संचालित मीडिया उनके पुराने शाही आडंबर को फिर से उभार कर उन्हें महिमामंडित कर रहा है। इसका नवीनतम नमूना है आज़ादी के साथ ही समाप्त हो गई जयपुर रियासत पर राज करने वालों के वंशजों का अपने नया महाराजा की तख्तनशीनी करना। महाराजा की उपाधि समाप्त की जाने के वक़्त भवानी सिंह इसको धारण किए हुए थे। आज़ाद हिंदुस्तान में वे इस कागजी उपाधि को धारण किए हुए भी भारतीय सेना में नौकर थे और राष्ट्रपति के रस्मी अंगरक्षकों में भी रहे।

राज-पाट चले जाने के बाद भी बड़ी संपत्तियां कभी राजा महाराजा रहे लोगों के वंशजों के हिस्से में आ गई जिसके साथ ही इन सम्पत्तियों पर अपना हक़ जमाने के लिए शुरू हो गई पारिवारिक कलह जो आज भी अदालतों में अनेकों मुकदमों के रूप में सबके सामने हैं। इसी पारिवारिक झंझावातों में अपने भवानी सिंह ने अपनी सौतेली मां गायत्री देवी के पोते को पछाड़ते हुए अपनी बेटी दिया कुमारी के बेटे अर्थात अपने नाती पद्मनाभ सिंह को औपचारिक रूप से गोद ले लिया जिसे अब स्वर्गीय भवानी सिंह के परिवार ने अपना मुखिया मान लिया है। यह उनके परिवार का मामला है। इस परिवार को अपने इतिहास के काल्पनिक वैभव में जीने और व्यवहार करने का अधिकार है। यह भी कि वे आपस में एक दूसरे को क्या कह कर संबोधित करें। उन्हें अधिकार है कि वे अपने घर में ताज पहिनें और अपनी निजी चार दीवारी में अपना राज होने स्वांग करें। मगर आज का मीडिया उसे ऐसे प्रस्तुत कर रहा है मानो जयपुर को नया महाराजा मिल गया है और यहां की जनता खुशी से झूम रही हो। आज के सभी समाचार पत्रों का कवरेज यही दर्शाता है। एक अंग्रेजी अखबार ने तो यहां तक लिख दिया कि यह शाही खानदान आज़ादी के छह दशक बाद भी अपनी प्रजा से आदर पाता है।

जयपुर के लोग इस परिवार को कितना आदर देते है इसका प्रमाण तो 1989 का लोक सभा चुनाव में मिल गया जब रियासत के अंतिम महाराजा भवानी सिंह को गर के एक अदने से लोकनेता गिरधारीलाल भागव ने 84 हजार से अधिक वोटों से हरा कर धूल चटा दी थी

लगता है नया मीडिया उन स्मृतियों को मिटाने में लगा है जो बताती हैं कि राजस्थान में आज़ादी की लड़ाई अंग्रेजों से ही नहीं राजा महाराजाओं से भी लड़ी गई थी और कुर्बानियां दे कर जीती गई थी। यह इसलिए हो रहा है क्योंकि हम जानते हैं कि उदारवाद के नाम पर पनप रही पूंजीवादी व्यवस्था में अब खास लोगों की ही जरूरत है आम लोगों की नहीं।

लेकिन इतिहास इतना जल्दी और ऐसे भुलाया नहीं जा सकता।