Friday, September 9, 2016

क्या गुल खिलाएगा जीएसटी अगले चुनावों में





राजेंद्र बोड़ा

जीएसटी विधेयक को क़ानून बनाने के लिए एक दशक से बात हो रही थी लेकिन राजनीतिक रस्साकशी के कारण अब जा कर यह क़ानून बन पा रहा है। यह भी सच है कि हाल के वर्षों में इस कानून के बनाने पर पर जितनी राजनीति हुई है, उतना किसी और पर नहीं हुई

जीएसटी पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के बड़े आर्थिक सुधार का कार्यक्रम था। इसका गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ने विरोध किया था। लेकिन आम चुनाव के बाद प्रधान मंत्री के रूप में मोदी ने अपना स्टैंड बदल लिया।  

क्योंकि यह कानून संविधान में संशोधन करके ही लागू हो सकता है इसलिए अभी इस कानून को लागू करने की कुछ प्रक्रियाएं बाकी है, जैसे राज्यों की कुल संख्या में से आधी संख्या में विधानसभाओं से इस कानून को स्वीकृति मिलना, फिर राष्ट्रपति की मंजूरी और उसके दो माह के भीतर जीएसटी कौंसिल का गठन। इसके साथ साथ ही पुख्ता डिजिटल व्यवस्था जिससे पूरा देश जुड़ा हो। जीएसटी लागू करने के लिए संविधान संशोधन के बाद जीएसटी कौंसिल फिर आम सहमति से जीएसटी विधेयक का प्रारूप बनाएगी जिसे केंद्र और राज्य सरकारों को अपने अपने सदनों में पास करना है और फिर उसके नियम बनाने हैं जिससे यह कानून धरातल पर लागू हो जाये।

जीएसटी की नई कर व्यवस्था से केंद्र और राज्य सरकारों के वस्तुओं और सेवाओं पर लगाए जाने वाले सभी अप्रत्यक्ष करों की जगह एक समान कर वजूद में आ जाएगाइसके तहत देश में उत्पादन और खपत की कड़ी में अंतिम छोर पर कर लगाया जाएगा
सरकार और उससे सहमत आर्थशास्त्री इसे आज़ादी के बाद का भारत का सबसे बड़ा कर सुधार मान रहे हैंउन्हें उम्मीद है कि जीएसटी देश की जटिल और उलझी कर व्यवस्था को सहज करेगा और लाल फीताशाही को कम करेगा

हालांकि शराब, क्रूड ऑयल, हाई स्पीड डीज़ल, पेट्रोल, प्राकृतिक गैस और विमान ईंधन को जीएसटी से बाहर रखा गया है मगर इस पर फ़ैसला इस कानून के तहत बनने वाली जीएसटी काउंसिल को करना हैतंबाकू को जीएसटी के दायरे में लाया गया है जिससे  केंद्र सरकार इस पर उत्पाद शुल्क लगा सके। ये टेक्स, सामान के शहर में प्रवेश पर लगने वाले कर, एक्साइज़ ड्यूटी, सर्विस टैक्स और अन्य राज्य स्तरीय करों की जगह ले लेगा

जीएसटी ऊपर से भले एक हो लेकिन इसके दो हिस्से होंगे एक, केंद्रीय जीएसटी जो केंद्र सरकार के खाते में जाएगादूसरा हिस्सा होगा राज्य जीएसटी जो राज्य सरकारों के खाते में जाएगा। हालांकि इनकी दरों पर अंतिम फैसला जीएसटी परिषद लेगी

यह पूरा तंत्र इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म पर तैयार किया जा रहा है जिसमें हर भुगतान का एक डिज़िटल निशान होगा, जिसे तलाशना आसान होगाये अपने आप में सबसे बड़ा प्रयास है जिसके मार्फत टैक्स संबंधित 75 लाख मामलों को ऑनलाइन लाया जा सकेगा।

लेकिन एक चीज़ जिसकी ओर अधिकांश लोग इशारा कर रहे हैं वो है, कि उद्योगों को जीएसटी के दायरे से अलग रखा गया है, जो राजस्व का एक बड़ा हिस्सा हैराज्य सरकारों के राजस्व के लिए अहम माने जाने वाले ईंधन, रीयल इस्टेट और आबकारी भी इससे अलग हैं

मगर सामाजिक सरोकार रखने वालों का कहना है कि यह नया कर गरीब आदमी को छोड़ कर अन्य सभी का ध्यान रखेगा। 

यह सब को पता है कि पूरी दुनिया में जब भी किसी क्षेत्र में समान बिक्री कर लागू किया गया वहां थोड़े समय के लिए महंगाई बढ़ी। हर कोई इस बात से सहमत है कि भारत में भी इससे महंगाई बढ़ेगीअसल सवाल यह है कि जिसे थोड़े समय का असर बताया जा रहा है, वह थोड़ा समय कितना होगा?

वास्तव में जब महंगाई की दर स्थिर हो जाती है, उसके बाद ही जीएसटी के फ़ायदे महसूस होने लगते हैं। विशेषज्ञों का दावा है कि यह आर्थिक दक्षता को बढ़ाता है और असल में महंगाई को बेहतर तरीक़े से संभालने में मदद करता है
सरकार की सबसे बड़ी चुनौती इस दौरान आने वाले झटकों को कम करने और इस अंतराल को सीमित करने की होगीमगर दुर्भाग्य से, आर्थिक असर के मामले में अनुमान अक्सर धरे रह जाते हैं।  

जीएसटी की दरों को 27 फ़ीसद रखने तक पर चर्चा हो चुकी है, हालांकि वित्त मंत्री ने टैक्स की इतनी ऊंची दर की संभावना से इनकार किया हैमुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने 18 फ़ीसद की टैक्स दर का सुझाव दिया हैये ऐसी दर है जिस पर सरकार को वर्तमान राजस्व में न तो घाटा होगा न मुनाफ़ाहालांकि उन राज्यों के घाटे की भरपाई करनी होगी, जिन्हें राजस्व में नुकसान होगा और इसके लिए जीएसटी दर को 18 फ़ीसद से अधिक करना पड़ सकता है।

मान लें कि जीएसटी अगले साल के मध्य में पूरी तरह लागू हो जाये और इसके कारण महंगाई बहुत बढ़ जाए, तो इसका राजनीतिक असर 2018 में दस राज्यों में होने वाले चुनावों पर पड़ सकता है। सातवें वेतन आयोग और निवेश में बढ़ोत्तरी के साथ, ऊंची महंगाई दर मोदी सरकार को 2019 के आम चुनाव से ठीक पहले मुश्किल में डाल सकती है

साल 2018 में गुजरात, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, मेघालय, मिज़ोरम, नागालैंड और त्रिपुरा के चुनाव होंगेइसके अगले साल आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा, ओडिशा, तेलंगाना, सिक्किम, राजस्थान, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में चुनाव होने हैं

कुछ लोगों का कहना है कि यही वो गणित है जिसे कांग्रेस अपने दिमाग में रखकर राज्यसभा में जीएसटी बिल के पास होने में देर कर रही थी

आर्थिक टिप्पणीकार कहते हैं कि "पूरी दुनिया में कोई भी सरकार ऐसी नहीं है जो जीएसटी को लागू करने के बाद दोबारा सत्ता में आई हो। जीएसटी से होने वाले फायदे को हमेशा अगली सरकार ने ही भुनाया है" उन्होंने पिछले साल अनुमान लगाया था कि कांग्रेस 2017 तक जीएसटी को लागू करने की इजाज़त दे देगीऔर ऐसा ही होता लग भी रहा है।
                         
अन्य देशों में क्या हुआ?

वर्ष 2015 में मलेशिया ने जीएसटी को वास्तविक रूप से लागू करने के लिए ख़ुद को डेढ़ साल का समय दियाउसने इस दौरान दाम नियंत्रित करने का क़ानून इस्तेमाल किया और सभी ज़रूरी सामान को जीएसटी से अलग रखा, फिर भी एक साल के लिए महंगाई में तेज़ वृद्धि से बच नहीं पायाफ़रवरी 2016 में महंगाई सात साल के उच्च स्तर पर पहुंच गई, लेकिन उसके बाद से इसमें कमी आई हैदेश में छोटे और मध्यम व्यवसाय के मालिक इसके ख़िलाफ़ सड़क पर भी उतरे थे
ऑस्ट्रेलिया में तो 1993 से ही जीएसटी एक तीखा राजनीतिक मुद्दा रहा हैआख़िरकार इसे 2000 में ही लागू किया जा सकाइससे वहां महंगाई में तीन से छह फ़ीसद तक का इजाफ़ा हुआ, लेकिन केवल एक साल के लिए

सरकार को टैक्स के असर और इससे बढ़ी महंगाई को कम करने के लिए मजबूर होना पड़ा उसने उद्योगों को छूट देने और व्यक्तिगत इनकम टैक्स में कमी लाकर स्थिति नियंत्रित करने की कोशिश की

साल 1994 में जब सिंगापुर ने जीएसटी लागू किया तो उसने भी इसी तरह की छूट दी


(यह आलेख प्रेसवाणी के अगस्त 2016 अंक में प्रकाशित हुआ)
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