Monday, May 10, 2010

कम जल उपयोग वाले विकास की जरूरत

राजेन्द्र बोड़ा


राजस्थान के लोगों ने सदियों पहले प्रकृति से सहकार करना सीख लिया. उन्होंने प्रकृति से जो सीखा उसे अपनी बुद्धि और कौशल से कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में जीने की राह आसान करने के जतन किये. बुद्धि और कौशल का उपयोग राज करने वालों ने नहीं किया बल्कि सामान्य जन ने अपने अनुभवों से किया. राजस्थान में पानी इंसानी याददास्त में कभी इफरात में नहीं रहा. बरसात के बादल जो बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से उठते हैं वे इस प्रदेश तक पहुचते-पहुचते शिथिल पड़ जाते है. इसीलिए सूखा राजस्थान के लिए कोई नई बात नहीं है. बरसों बाद कभी-कभी ज़माना अच्छा होता है. इसीलिए पानी की अहमियत को यहाँ के लोगों नें सबसे अधिक जाना. जीवन की पहली शर्त पानी ही होती है. विकट रेगिस्तानी इलाकों में जहां प्रकृति ने पानी की भयंकर किल्लत की स्थिति बनाए रखी वहां लोगों नें प्रकृति से समझौता किया और अपनी बुद्धि और कौशल से पानी के संरक्षण के अनोखे उपाय किये. पीढ़ी-दर-पीढ़ी पानी के संरक्षण और उसके किफायती उपयोग की सीख लगातार जारी रही. यह सब सामान्य जन ने किया. इसीलिए राजस्थान में पानी के पुराने सार्वजनिक स्रोत - कुए, बावड़ी, तालाब - किसी राजा-महाराजा के नाम से नहीं मिलते. वे अधिकतर दूसरों के बनवाये हुए मिलेंगे. पानी के लिए राज पर यहाँ के लोग कभी निर्भर नहीं रहे. अपने पानी के स्रोतों को संजो कर रखना उन्हें खूब आता था. निजी तौर पर भी लोग बरसात के पानी को आगे के महीनों के लिए संजो कर रखने के लिए संरचनाए बनाना सीखे हुए थे. मगर ज़माना बदल गया. लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में जब राज में आम जन की भागीदारी संवैधानिक व्यवस्था के जरिये निश्चित की गयी तब होना तो यह चाहिए था कि पानी को संजो कर रखने और उसके किफायती उपयोग की परंपरा और मजबूत होती. नए किताबी ज्ञान और परंपरागत कौशल के बीच नया रिश्ता बनता और लोगों का जीवन कुछ अघिक सुखद बन पाता. लेकिन आधुनिक युग में विज्ञान के चमत्कारों की चकाचौंध में पानी से हमारा मानवीय रिश्ता ही बदल गया. सारा समाज जो स्वावलंबी था वह पानी के लिए पूरी तरह सरकार पर आश्रित हो गया. लोक के पास जो बुद्धि और ज्ञान का भण्डार था उसे लोकतान्त्रिक व्यवस्था में आम आदमी की अपनी सरकार ने बिसरा दिए. जीवन के लिए महत्वपूर्ण पानी जैसे मुद्दों को प्रशासनिक और वित्तीय आधार पर सुलझा लेने की कोशिशें होने लगी. ऐसी कोशिशें आज भी जारी है.

सरकार में बैठे लोगों का सारा सोच पैसे से पानी के किल्लत की समस्या सुलझानें का हो गया है. पानी प्रकृति की दें है. वह पैसा देकर पैदा नहीं किया जा सकता. पैसे खर्च करने की योजनायें बनाने में शासन में बैठे लोगों ने विशेष योग्यता हासिल कर ली. इससे कईं लोगों की पौ बारह होती है.

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कहते हैं कि राजस्थान में पानी की कमी उनकी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है. यह चुनौती क्या एक दिन में पैदा हुई है. राजस्थमें कोई बारहमासी नदी नहीं है यह कोई नई जानकारी नहीं है. यहाँ मानसूनी बरसात कम होती है और यहाँ सूखा पड़ना भी कोई अनोखी बात नहीं है. लेकिन पानी की समस्या ने जो विकराल रूप ले लिया है वह नीति निर्माताओं और प्रशासन में बैठे लोगों की बुद्धिहीनता और लापरवाही का नतीजा है. पानी का अंधाधुन्द उपयोग को बढ़ावा देने की नीतियाँ ही आज़ादी के बाद सरकारों ने अपनाई. रेगिस्तान को उसकी प्रकृति के विरुद्ध जाकर हरा-भरा बनाने की जुगत करते हुए शासन में बैठे लोगों ने पानी के संरक्षण की जगह उसकी तबाही के इंतजाम ही किये.

राजस्थान का भूभाग देश के कुल क्षेत्रफल का 10.40 प्रतिशत है जहाँ देश की 5.40 प्रतिशत आबादी रहती है. परन्तु यहाँ देश के कुल सतही पानी का 1.16 प्रतिशत और भूगर्भ जल का केवल 1.70 प्रतिशत हिस्सा इस प्रदेश में उपलब्ध है.

प्रदेश में मानसूनी वर्षा दो-तीन महीने ही होती है. यहाँ पानी के लिए मुख्यतः कमजोर बरसात पर ही निर्भर रहना पड़ता है. प्रदेश का एक तिहाई हिस्सा रेगिस्तान है जबकि 30 प्रतिशत अन्य हिस्सा अर्द्ध शुष्क है. इसका अर्थ यह हुआ कि प्रदेश का करीब दो तिहाई हिस्सा अधिकतर सूखा ही रहता है.

आज हालत ये है कि पानी की मांग और आपूर्ति में अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है जबकि उसकी उपलब्धता हमेशा अनिश्चित बनी रहती है. भूजल के स्टार के लगातार नीचे गिरते जाने से पानी की गुणवत्ता खराब होती जा रही है और वह पीने योग्य नहीं रह पा रहा है. ऐसी हालत में पानी का बंटवारा भी गैर बराबरी का हो गया है. शहरी हैसियत वाले वर्ग पानी का बड़ा हिस्सा उड़ा ले जाता है जबकि गावों और निम्न वर्ग के लोगों को पानी की सबसे अधिक मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.

अपनी परंपरागत जल संरक्षण की विरासत को भुला देने का नतीजा यह हुआ है कि हमारे सभी पारंपरिक जल स्रोत नष्ट हो गए. उन्हें बचाने के हाल ही में हुए सभी प्रयास इसलिए कारगर नहीं हो सके क्योंकि हमने पारंपरिक ज्ञान और बुद्धि से जो सीखा उसे नई नीतियों में शामिल नहीं किया. अभी तक हम पानी के प्रति अपना सोच स्पष्ट नहीं कर पाए हैं इसिलिए सरकारें ऐसे उद्यम ही करती रहती हैं जिनमें पानी का भारी उपयोग होता हो – चाहे वह कृषि का क्षेत्र हो, औद्योगिक क्षेत्र हो या पर्यटन मनोरंजन का क्षेत्र हो.

वास्तव में हम पानी की और नतीजन खुद अपनी तबाही करने को उतारू लगते हैं. राजस्थान की पहली जरूरत पीने का पानी है. मगर उसके लिए 2015 में एक बिलियन क्युबिक मीटर (बीसीएम) पानी की ही जरूरत होगी जबकि कृषि के लिए कुल 40 बीसीएम पानी की जरूरत होगी. क्या रेगिस्तानी राजस्थान के नीतिकारों के लिए यह समझदारी की बात है कि वे फिर भी कृषि को बढ़ावा देते रहें और यहाँ की प्रकृति के विरुद्ध जाते रहें या समझदारी की बात यह है कि वे ऐसी नीतियां बनावें जो इस भूभाग की परिस्थितियों के अनुरूप हों. यह समझदारी किताबों से नहीं आती. हमारे विश्वविद्यालय भी ये समझदारी नहीं सिखाते. राजनैतिक प्रक्रिया के अभाव में और एकाधिकार वाले राजनीतिक दलों के प्रभुत्व के कारण धरती से जुड़े लोग सरकारी व्यवस्था से दूर धकेल दिए जाते हैं.

व्यवहारिक ज्ञान सिखाता है कि हम यह बात नहीं भूल जाएँ कि पिछले पचास-साठ वर्षों के इतिहास में राज्य में केवल पांच-छः वर्ष ही ऐसे गुजरे हैं जब उसका कोई भूभाग सूखे से प्रभावित न रहा हो. यह भी हमारा अनुभव है कि हमें सतही जल के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भर रहना पड़ता है और सारे आपसी समझौतों के बावजूद वे हमारे हक का पानी नहीं देते. उनकी अपनी राजनैतिक मजबूरियां हैं. हमें यह भी जानकारी होनी चाहिए कि जिस प्रकार से शहरों का अनंत फैलाव हो रहा है और औद्योगीकरण के लिए हम उतावले हो रहे हैं उससे पानी की उपलब्धता और आपूर्ति के बीच खाई बढती ही नहीं जा रही है बल्कि पानी उपयोग कर्ताओं तक पहुंचाने का खर्च तेजी से बढ़ता जा रहा है.

नीतियाँ बनाते हुए हमारे नीति निर्माताओं की बुद्धि यह सब क्यों नहीं देखती. उनके सामने सारे आंकड़े मौजूद है. वे जानते हैं कि सतही पानी के अभाव में हमारी निर्भरता भूजल पर लगातार बढती जा रही है. भूजल जितना रीचार्ज होता है उससे अधिक पानी का दोहन हो रहा है यह बात भी सरकारी अमला खुद बताता रहता है. फिर उस तरह के उपाय क्यों नहीं होते जिनसे पानी की उपलब्धता के साथ सामंजस्य बिठाया जा सके? क्यों पानी की मांग बढाने वाले अपने उपक्रमों पर कोई अंकुश लगता है?

विकास के नाम पर जो कुछ आज हो रहा है वह हमारे विनाश का कारण बनता जा रहा है. हम बड़ी-बड़ी टाउनशिप बना लेंगे, बड़े-बड़े औद्योगिक क्षेत्र बना लेगे, मनोरंजन के नाम पर वाटर पार्क बना देंगे, और किसानों के नाम पर खेती का विस्तार करते जायेंगे मगर इन सब के लिए पानी कहाँ से लायेंगे? पानी फेक्टरियों में पैदा नहीं होता. उसके लिए तो प्रकृति पर ही निर्भर रहना पड़ेगा. जब राज में बैठे लोग प्रकृति को समझेंगे और जमीनी हकीकतों से रूबरू होंगे तभी विनाश की तरफ बढ़ते हमारे कदम रुक सकेंगे.

(यह आलेख मासिक पत्रिका 'प्रेस वाणी' के अप्रेल 2010 के अंक में छपा)

Monday, May 3, 2010

बेमिसाल गायन - जीवन











-राजेंद्र बोड़ा

जुथिका रॉय उन महान कलाकारों में से हैं जो न केवल अपनी कला की बुलंदियों पर पहुंचे बल्कि अपने जीवन को भी ऐसे जिया जिससे प्रेरणा ली जा सके. अपनी मीठी आवाज के साथ सरल और सौम्य व्यक्तित्व वाली गायिका जुथिका रॉय ने 20 अप्रेल को अपने जीवन के 90 बसंत पूरे कर 91 वें वर्ष में प्रवेश किया. उन्होंने अपना जन्म दिन जयपुर में सुधि संगीत रसिकों के बीच मनाया. जयपुर के एक अनौपचारिक समूह 'सुरयात्रा' ने उन्हें विशेष तौर पर जयपुर आमंत्रित किया था. बीते युग के बहुत कम संगीत सितारे आज हमारे बीच हैं. मगर नई विज्ञापनी चकाचौंध में वे बिसराए हुए ही रहते है. 'सुरयात्रा' समूह बीते युग के ऐसे कलाकारों को याद करता है, उन्हें बुलाता है और स्नेह से भावभीना सम्मान करता है. भावना यही रहती है कि उस कलाकार को अपने जीवन की सांध्य बेला में लगे कि वे भुला नहीं दिए गए हैं. आज भी उनके चाहने वाले उन्हें इज्जत बख्शने वाले मौजूद हैं. कलाकार को मिली यह ख़ुशी ही सुरयात्रा के हमराहियों की थाती होती है.

जुथिका रॉय तीन दिन जयपुर में रही. रविवार की शाम उनका भव्य सम्मान समारोह हुआ. बीते युग की इस गायिका की यात्रा और उनके सम्मान समारोह के लिए 'सुरयात्रा' ने किसी प्रायोजक की मदद नहीं ली थी. 20 तारीख को सुरयात्रियों ने उनका जन्म दिन मना कर उन्हें कोलकाता के लिए विदाई दी.

वे जब सात बरस की थीं तभी से उन्होंने गाना शुरू कर दिया था और मात्र 13 बरस की उम्र में उन्हें आकाशवाणी के कोलकोता केंद्र से गाने का मौका मिला. 1933 में क़ाज़ी नजरुल इस्लाम के निर्देशन में उनकी दो गीतों की रिकार्ड बनीं, परन्तु वह टेस्ट रिकार्ड से आगे नहीं बढ़ पायी. 1934 में ग्रामोफोन कंपनी में ट्रेनर के पद पर आये कमल दासगुप्ता ने रिजेक्ट की हुई टेस्ट रिकार्ड सुनी और नए सिरे से उन्हें रिकार्ड करवाया और जुथिका रॉय पहली बार रिकार्ड के जरिये लोगों के सामने आयीं. जुथिका रॉय ने सुरयात्रा की बैठक और सम्मान समारोह में अपने गायन जीवन के कई आत्मीय प्रसंगों को याद किया. जुथिका जी ने अधिकतर भजन ही गाये. उनके गाये मीरा के भजन पुरानी पीढ़ी के लोग आज भी घंटो सुनते हैं. महात्मा गांधी, पंडित जवाहर लाल नेहरु, सरोजिनी नायडू और मोरारजी देसाई जैसे नेता भी उन लाखों लोगों में शामिल थे जो जुथिका रॉय को सुनना पसंद करते थे. एक बार वे जब हैदराबाद में एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने गयी हुई थी कि सुबह सुबह उन्हें बताया गया कि सरोजिनी नायडू उन्हें सुनना चाहती हैं और वे उस गेस्ट हाउस में आ रहीं है जहां वे ठहरी हुई हैं. छोटी उम्र की जुथिका के लिए यह यादगार क्षण था.

नायडू ने जुथिका से भजन सुने और खूब आशीर्वाद दिया. उन्होंने बताया की बापू भी जुथिका के गायन को बहुत पसंद करते हैं और पूना जेल में जब वे थे तब वहां उसके भजनों के ग्रामोफोन रिकार्ड रोज सुनते थे. नायडू ने जुथिका से पूछा की क्या वह गाँधी जी से मिली है? फिर कहने लगी तुम गाँधी जी से जरूर मिलना. मगर जुथिका जी से गांधी जी से मिलना बहुत बाद में हुआ जब वे कलकत्ते में सांप्रदायिक सदभाव स्थापित करने आये और बेलियाघाटा में ठहरे थे. जुथिका, उनके पिता, माँ और चाचा गांधी के दर्शन करने सुबह सुबह वहां पहुंचे जहाँ गांधीजी ठहरे हुए थे. उन्होंने अखबार में पढ़ा की गांधी जी बहुत व्यस्त है और किसी से नहीं मिलेंगे. सुबह छः बजे बापू टहलने जाते है. जुथिका के परिवार ने सोचा सुबह जब बापू टहलने निकलेंगे तब उनके दर्शन कर लेंगे. मगर वे जब वहां पहुंचे तो पता चला की गांधी जी सैर करके वापस लौट भी चुके है. बाहर गांधी के दर्शनों के लिए बड़ी भीड़ थी और बारिश हो रही थी. जब उन्होंने चौकीदार से कहा कि उन्हें गांधी जी से मिलना है तो उसने यह कह कर उन्हें अन्दर नहीं जाने दिया कि उसे आदेश हैं कि किसी को भी अन्दर नहीं जाने दूं. जब चौकीदार टस से मस नहीं हुआ तो जुथिका के चाचा जो थोड़े तेज तर्रार किस्म के इंसान थे चौकीदार से अधिकारपूर्ण बोले : “गांधी जी से जाकर बोलो कि जुथिका आयी है”. चौकीदार भभकी में आ गया और अन्दर चला गया. थोड़ी देर में वे क्या देखते हैं कि आभा और मनु तथा कुछ और लोग छाते लिए हुए बाहर आ रहे है. वे आये और जुथिका के परिवार को अन्दर ले गए. अन्दर उन्हें तौलिया दिया गया कि वे भीगे हुए शरीर को पोंछ लें. गांधी जी दूसरे कमरे में थे. उनका उस दिन मौन व्रत था. किसी ने आ कर कहा कि जुथिका और उनकी माँ अन्दर जाकर गांधी जी से मिल सकते है. लगभग 64 साल पुरानी यह घटना जुथिका जी के स्मृति पटल पर आज भी ताजा है. "मैंने अन्दर प्रवेश किया तो देखा कि बापू केवल धोती पहने नंगे बदन बैठे हैं और एक कागज़ पर कुछ लिख रहे है. कागज उनके घुटने पर रखा है जिसके नीचे आधार के लिए कुछ नहीं है. बापू ने सर उठा कर मुस्कराते हुए हमारी और देखा. उनके चेहरे पर जो आत्मीयता थी आभा थी वह आज भी मुझे याद है. मुझे नहीं लगा कि में उनसे पहली बार मिल रही हूँ. मुझे लगा जैसे वे तो मेरे ही कोई अपने हैं. मैंने उन्हें जाकर प्रणाम किया और उन्होंने मेरे सिर पर हाथ हाथ रख कर आशीर्वाद दिया. उन्होंने कागज़ पर लिख कर मेरे बारे में पूछा. मनु उनके लिखे को पढ़ कर सुनाती थी. मनु ने कहा गांधी जी साथ के कमरे में अब स्नान करने जा रहे है. आप यहीं बैठे कुछ भजन गाईये. गाँधी जी नहाते रहे और में बिना किसी संगतकार के मीरा के भजन गाती रही. नेने कोई पांच छः भजन उस समय गाये होंगे. बाद में गांधी जी ने फिर लिख कर दिया कि उनकी प्रार्थना सभा में मैं चालू और वहां भजन गाऊँ. बाद में गांधी जी के साथ की कार में मैं बापू के प्रार्थना स्थल गयी जहां गाँधी जी की सांप्रदायिक सदभाव बनाए रखने की अपील के बाद मेरा गान हुआ और उसके साथ ही सभा समाप्त हुई."

प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु भी जुथिका के गायन को पसंद करते थे. उन्होंने एक बार जुथिका रॉय को अपने सरकारी आवास पर बुलाया और उनसे भजन और गीत सुने. " नेहरूजी चप्पल खोल कर जमीन पर बैठे. उन्होंने अपनी टोपी उतार के रख दी और दो घंटे तक मेरा गान सुनते रहे.

सन 1920 में हावड़ा जिले के आमता गाँव में जन्मी जुथिका रॉय ने 356 से अधिक गीत गाये. इनमें से 214 हिंदी में, जिनमें अधिकतर भजन थे, 133 गीत बांग्ला में और दो तमिल में गाये. हिंदी के भक्ति गीतों में कुछ इस्लामिक नातें भी हैं तो कुछ होली और वर्षा गीत हैं. उन्होंने दो हिंदी फिल्मों – ‘रत्नदीप’ और ‘ललकार’ - में चार गीत गाये. जुथिका रॉय ने बावजूद बड़े आफर के फिल्मों में गीत नहीं गाये. ये दो अपवाद इसलिए हुए कि 'रत्नदीप' के लिए वे जाने माने निर्देशक देवकी बोस को ना नहीं कर सकी जिन्होंने कहा कि उन पर कोइन बंदिश नहीं होगी और वे अपनी पसंद से गायेंगी. दूसरी फिल्म 'ललकार' के निर्माता गीतकार पंडित मधुर थे. जुथिका रॉय ने मीरां के के अलावा जो गीत गाये वे अधिकतर पंडित मधुर के ही लिखे हुए थे इसलिए वह उन्हें भी इनकार नहीं कर सकी.

जुथिका रॉय का परिवार रामकृष्ण मिशन से जुड़ा हुआ था. जुथिका और उनकी दो अन्य बहनों ने 12 बरस का ब्रह्मचर्य का व्रत लिया. बहनों ने 12 वर्ष व्रत निभा कर बाद में शादी कर ली मगर जुथिका रॉय ने यह व्रत आजीवन के लिए अपना लिया. उनके गानों को संगीतबद्ध अधिकतर बंगाल के प्रमुख संगीतकार कमल दासगुप्ता ने किया. वे जुथिका जी से विवाह करना चाहते थे मगर इसी व्रत के कारण यह विवाह नहीं हो सका.

सन 1939 में उनके गाये मीरां और कबीर के भजनों ने जो जबरदस्त लोकप्रियता हासिल की वह आज भी बरकरार है. इसी साल उन्होंने पहली बार सार्वजनिक प्रदर्शन मुंबई में दिया और तब से उन्होंने कभी पीछे मुड कर नहीं देखा. 1972 में उन्हें पद्मश्री का अलंकरण दिया गया. सन 2002 में जुथिका रॉय की बांग्ला में आत्मकथा "आज ओ मोने पड़े" का प्रकाशन हुआ. इसी का गुजराती संस्करण "चुपके चुपके बोल मैना' का प्रकाशन 2008 में हुआ.

(यह आलेख जनसत्ता के 2 मई के रविवारी परिशिष्ट में छपा)