Friday, July 14, 2017

सैलेश कुमार : अभिनेता जो फिल्मी दुनिया के लिए बेगाना ही रहा


राजेंद्र बोड़ा 

मुंबई का सिने जगत हमेशा ही सपनों के नगर के रूप में विख्यात रहा है। रुपहले परदे का ग्लेमर और सितारा चमक युवक-युवतियों को लुभाती रही है। इसीलिए वे आंखों में बड़े सपने लिए इस मायानगरी में पहुंचते रहे हैं। उनमें से चंद ही परदे पर पहुंच पाते हैं। जो परदे पर पहुंचने में सफल होते हैं उनमें से भी थोड़े से लोग अपनी पहचान बना पाते हैं। और जो थोड़े से लोग अपनी पहचान बना पाते हैं उनमें से भी इक्का-दुक्का सितारा हैसियत बना पाते हैं। इस मायाजाल को सब जानते हैं। फिर भी अपने को साबित करने के लिए यहां पहुंचने वालों का रेला लगा रहता है।

आंखों में ऐसा ही सपना लिए एक पढ़ा लिखा खूबसूरत बांका नौजवान शम्भूनाथ पुरोहित फिल्मी दुनिया में अपने पर फैला कर बहुत ऊंची उड़ान भरने की उमंग लिए पिछली सदी के पचास के दशक के उत्तरार्ध में राजस्थान के जोधपुर शहर से चल कर मुंबई पहुंचा था। ऊंचे, पूरे कद, गठीले ज़िस्म और घने बालों वाले इस नौजवान में वह सब कुछ था जो मुंबई की मुख्यधारा की फिल्मों में नायक की भूमिका पाने के लिए जरूरी होता है। फिल्मी दुनिया का हिस्सा बनने के लिए संघर्ष की भी उसकी तैयारी थी।

जोधपुर, मारवाड़, के एक अति संपन्न, परोपकारी और समाज सेवी पुष्करणा ब्राह्मण परिवार में जन्मा यह नौजवान शम्भूनाथ जब सैलेश कुमार का फिल्मी नाम रख कर कुछ कर दिखाने के संघर्ष में कूद पड़ा। फिल्म निर्माता सदाशिव राव जे. कवि ने उसे अपनी फिल्मभाभी की चूड़ियांमें बलराज साहनी और मीना कुमारी के साथ एक प्रमुख भूमिका में ले लिया। फिल्म में उनके साथ रोमेंटिक लीड में थी सीमा देव। 1961 में रिलीज़ हुई यह फिल्म बलराज साहनी के कारण नहीं बल्कि मीना कुमारी जैसी भाव प्रवीण अभिनेत्री और पहली बार परदे पर उतरे सैलेश कुमार के उम्दा अभिनय के कारण आज भी याद की जाती है। फिल्म में सैलेश ने अपनी अभिनय क्षमता का बखूबी प्रदर्शन किया। भावपूर्ण दृश्य हों या युवा उमंग के दर्शकों को रिझाने वाले रोमेंटिक दृश्य सभी में उसने अपना सिक्का मनवाया। यह चलचित्र फिल्म संगीत के इतिहास में भी एक मील का पत्थर है। हिन्दी के प्रकांड कवि पंडित नरेंद्र शर्मा के गीतों का सुधि मराठा संगीतकार सुधीर फडके ने स्वर संयोजन किया था। लता का गाया इस फिल्म का एक गीतज्योति कलश छलकेतो कालजयी बनकर इस फिल्म को अमृत्व प्रदान कर गया। इस फिल्म के दो अन्य गीतों में सैलेश कुमार की बहुमुखी अभिनय क्षमता का परिचय मिलता है। तुमसे ही घर घर कहलाया(मुकेश) में सैलेश ने करुण रस में दर्शकों को भिगोया तो कहां उड़ चले हैं मन प्राण मेरे(मुकेश-आशा भोसले) में इस अभिनेता ने दर्शकों को गुदगुदाया भी।

फिल्म भाभी की चूड़ियां बहुत ही सफल फिल्म रही। इसे बॉक्स ऑफिस पर तो सफलता मिली ही साथ ही समीक्षकों का आदर भी मिला। फिर क्या था। सैलेश को लगा कि बस अब आकाश छूना है। इस फिल्म के बाद वे कुछ फिल्मों के लिए तुरंत अनुबंधित भी हो गए।

यह सिलसिला आगे बढ़ता और यह अभिनेता अपने को साबित करता इसी बीच उसकी दूसरी फिल्म रिलीज़ हुईबेगाना(1963) जिसमें वे उन्हीं के साथ संघर्ष कर रहे धर्मेंद्र के समांतर नायक की भूमिका में था। इस फिल्म के निर्माता भी सदाशिव राव जे. कवि थे। इस फिल्म में सैलेश अपने साथी कलाकार धर्मेंद्र पर भारी पड़ते हैं। गीतकार शैलेंद्र के लिखे और फिल्मों में पहली बार स्वतंत्र रूप से संगीत दे रही संगीतकारों की जोड़ी सपन-जगमोहन (सपन सेनगुप्ता और जगमोहन बक्शी) के जिन दो गानों से यह फिल्म आज भी लोगों की याद में बसी है वे दोनों सैलेश पर ही फिल्माए गए थे। ये गीत थेना जाने कहां खो गया वो ज़माना/यहीं था चमन में मेरा आशियाना(मुकेश) और फिर वो भूली सी याद आई है/ ग़म-ए-दिल तेरी दुहाई है(मोहम्मद रफी)। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर धराशायी हो गई। इसके साथ ही फिल्म नगरी की रिवायत के अनुसार सैलेश कुमार फिल्म निर्माताओं के लिए बेगाना हो गया। मायानगरी का यह सबक फिर दोहराया गया कि कला और बॉक्स ऑफिस में बहुत बड़ा फर्क होता है। खुले आकाश में उड़ने के लिए उसने अपने पर फड़फड़ाए ही थे कि उसे नेगाना की असफलता के रूप में अपने करियर का पहला झटका लगा जो इतना करारा था कि यह अभिनेता उससे उबर नहीं पाया।

फिल्मी दुनिया में किसी कलाकार को उसकी क्षमता और मेहनत से नहीं बल्कि उसकी फिल्म की बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी से आंका जाता है। इस अभिनेता के पास क्षमता और मेहनत अपने समकालीन राजेंद्र कुमार, मनोज कुमार और धर्मेंद्र आदि अभिनेताओं से कहीं कम नहीं थी। मगर उसके साथ शायद वह किस्मत नहीं थी जिसके हाथ में सफलता की कुंजी होती है। मगर सैलेश समर्पण करके भाग खड़े नहीं हुए। उसने पूरी मेहनत की। छोटी फिल्मों में नायक की भूमिकाएं स्वीकार की तो बड़ी फिल्मों में छोटी भूमिकाएं भी की जैसे फिल्मकाजल (1965) में मीना कुमारी के भाई की जिसमें धर्मेंद्र और राजकुमार जैसे स्थापित हो चले अभिनेता बड़ी भूमिकाओं में थे। थोड़े समय के लिए सैलेश ने लोकप्रियता का स्वाद जरूर चखा सहनायक या खलनायक की भूमिकाओं में जैसे आधी रात के बाद(1965), औरये रात फिर ना आएगी(1966) या रहस्य फिल्मों जैसेउस रात के बाद(1969),तेरी तलाश में (1969) और कौन हो तुम(1970) में।

जाने माने निर्माता निर्देशक केदार शर्मा की फिल्ममैखाना (1967) भी सैलेश की कोई मदद नहीं कर सकी क्योंकि नए संगीतकार भूषण के बड़े ही खूबसूरत संगीत से सजी फिल्म नहीं चली। हालांकि इस फिल्म के दो गाने कालजयी बन गएबैठे बैठे दिल-ए-नादान ये खयाल आया है/ हम नहीं आए आए यहां कोई हमें लाया है (मोहम्मद रफी) और एक शब के मुसाफिर हैं हम तो ये दुनिया मुसाफिरखाना है(महेश कुमार)।

साल 1967 के आखरी महीने दिसंबर के दूसरे पक्ष के अपने अंक में मशहूर फिल्म पत्रिकामाधुरी (29 दिसंबर 1967) ने सैलेश को अपने मुखपृष्ठ पर ही जगह नहीं दी उस पर तीन पेज का चित्रमय फीचर भी छापा जिसमें यही सवाल उठाया गया था कि प्रतिभा के होते हुए भी आठ साल के जद्दोजहद के बाद भी यह अभिनेता की पहचान क्यों नहीं बन रही है।माधुरीके फीचर की सवाल पूछती ये पंक्तियां बहुत कुछ कहती है: सैलेश, आठ साल के अपने फिल्मी जीवन को पीछे मूड कर देख सकते हो तुम? अगर देख सको तो बताओ क्या सोच कर तुम अभिनेता बने थे और क्या पाया इस अरसे में तुम ने?सैलेश का जवाब कभी पूरा नहीं हुआ, अधूरा ही रह गया। और समय गुज़र जाने के बाद यह सवाल और सघन होता चला गया। करीब बीस साल तक बड़ी कामयाबी की अमृत बूंद पाने की आस फलीभूत हो सकी और वफिर अपने घर जोधपुर लौट याअपने बीस वर्ष के फिल्मी जीवन में इस अभिनेता ने 29 फिल्मों में काम किया। 

यह अभिनेता परास्त सिपाही की निराशा के साथ फिल्मी नगरी से भाग कर अपनी जन्मभूमि पर नहीं लौटा ऐसा दावा है उसकी दोहिती आसका बोहरा का, जिसने सोशल मीडिया पर एक टिप्पणी में लिखा मेरे दादा ने इसलिए फिल्म उद्योग नहीं छोड़ा कि वे अपनी पहचान नहीं बना सके। उन्हें इसलिए फिल्में छोडनी पड़ी क्योंकि उन्हें बहुत युवा अवस्था में थाईरॉइड की बीमारी हो गई थी और उन्हें उस समय कईं ऑपरेशन कराने पड़े और रेडिएशन (थेरेपी) भी लेनी पड़ी। स्वास्थ्य संबंधी विभिन्न कारणों से इस अभिनेता को बुलंदियों के मुकाम पर पहुंचने के पहले ही जोधपुर लौटना पड़ा और अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देना पड़ा।

लेकिन यह भी सच है कि फिल्मी दुनिया छोड़ कर जोधपुर लौटने के बाद शैलेश कुमार ने उसे फिर मुड़ कर नहीं देखा। यहां तक कि फिल्मी जीवन के अपने काल को उन्होंने जैसे काट कर अलग करके अरब सागर के जल में विसर्जन कर दिया हो। उनके काम की या उनके दौर की फिल्मों के बारे में यदि कोई उनसे बात करने की चेष्टा भी करता तो वे यह कह कर बात समाप्त कर देते कि उस जमाने की उनके पास कोई याद नहीं है। मैं उस वक़्त में नहीं लौटना चाहता। यह उनका तंज़ था या उनकी स्थितप्रज्ञता कहना मुश्किल है। उनकी अभिनीत अंतिम रिलीज़ फिल्म यादगार (1984) रही। 

अपने मन की ज़िंदगी जीने वाले इस अभिनेता का 21 अप्रेल (शुक्रवार) को जोधपुर में निधन हो गया। वह 76 वर्ष का था।

फिल्मों में वे अपनी मौज के लिए, शौक के लिए गए थे, कमाई से घर भरने की लालसा से नहीं क्योंकि वे जिस परिवार से आते थे वहां किसी बात की कमी नहीं थी। उनके पिता अमरनाथ पुरोहित राज के जमाने में हाकिम थे। उनके दादा लाडजी पुरोहित महाराज सर प्रताप के एडीसी थे जिन्होंने अपने समाज की शिक्षा के उत्थान के लिए जो काम किए वही उन्हें अमर कर देने के लिए काफी है। जोधपुर की पुष्टीकर स्कूल उन्हीं की देन हैं। पानी को हमेशा तरसने वाले शहर में उनका बनवाया सार्वजनिक लाडजी का बेरा (कुआ) आज भी नगर की शान है।
पिता अमरनाथ और माता भंवरी देवी के चार संताने – तीन बेटे और एक बेटी – हुई। दो बड़े बेटों रमानाथ और कैलाशनाथ के बाद तीसरे बेटे थे शंभु नाथ जिन्हें हम अभिनेता शैलेश कुमार के रूप में जानते हैं।

सैलेश के दो संतानें हैं - एक बेटा और एक बेटी। बेटी ब्याह के बाद अभी मुंबई में है जबकि बेटा जोधपुर में ही एक भव्य रेस्तरां चलाता है।

(यह आलेख संगीत, कला, संस्कृति और पर्यटन को समर्पित पत्रिका स्वर सरिता के मई, 2017 के अंक में छपा)                            

Wednesday, April 19, 2017

पुस्तक समीक्षा : समाज का आज : किसका सच

राजेंद्र बोड़ा 





कोई मुझसे पूछे कि भाई तुम्हारे हाथ में यह किताब है – वह काहे की किताब है तो मुझे कोई जवाब नहीं सूझेगा। किस श्रेणी में इस किताब को रखा जा? यह आलोचना नहीं है। यह यात्रा वृतांत नहीं है। यह व्यंग्य भी नहीं है। उपन्यास या कहानी भी नहीं है। तो यह किताब क्या है? लोग खांचों में समझने की अपेक्षा करते हैं। हम कह सकते हैं कि यह वृतांत है। लेकिन इसमें एक नहीं अनेकों वृतांत हैं। तो यूं समझ लें कि यह किताब वृतांतों का संकलन है।  

पुस्तक के परिचय में पाठक से यह साझा नहीं किया गया है कि ये वृतांत किसी दैनिक अखबार में साप्ताहिक कॉलम के रूपमें छप चुके हैं। लेकिन इन आलेखों को देख कर समझा जा सकता है कि वे किसी पत्र के लिए नियमित रूप से लिखे गए होंगे क्योंकि वे एक बंधे हुए फॉर्मेट में हैं और उनका विस्तार सीमित है। सभी आलेख आम तौर पर हज़ार शब्दों के आस-पास है। इसे हम समझ सकते हैं कि लेखक को शब्दों की एक सीमा में अपनी बात कहनी है और बात रंजक तरीके से भी कहनी है। प्रत्येक आलेख में लेखक अपनी टिप्पणी किसी प्रसंग से उठाता है। वह सामान्यतः सूचना माध्यमों में आई बातों के ज़िक्र से पाठक से बतलस करता है जिसे वह अपने किसी पुराने प्रसंग से जोड़ देता है। आज के संचार माध्यमों की भाषा में कहें तो लेखक विगत प्रसंगों का तड़का लगाता है।

इस पुस्तक के सभी लेख उन पाठकों के लिए हैं जो मध्यम वर्ग खासकर उच्च मध्यम वर्ग - से आते हैं। ऐसे पाठक जो नई यंत्र तकनीकों का सामान्य ज्ञान रखते हैं, भले ही उनमें वे बहुत पारंगत न हों। मगर वे नए जमाने की खबरों से बाबस्ता रहते हैं, जैसे वे सनी लियोन को जानते है और अपने परिवार के साथ मनोरंजन के लिए मल्टीप्लेक्स में जाते हैं और पॉप कॉर्न खाते हुए दंगल औरबाहुबलीजैसी फिल्में देखते है। यही पाठक वर्ग वर्तमान समाज का आज भी है और सच भी है।

किताब पर ही कह दिया गया है कि यहां निर्णय नहीं है। पुस्तक के परिचय में कहा गया है कि जिस वर्तमान को हम ओढ़ते-बिछाते हैं, अपने गंभीर विचार विमर्श में हम उसी से परहेज करते हैंफिर आगे कहा गया है कि यह किताब अलग है – यह अपने आसपास को उलट-पलट कर देखती-परखती है। यहां निर्णय नहीं हैतो क्या हम यह मानें कि किताब के आलेख अनिर्णय वाला विमर्श है।

जैसा कि हमने कहा किताब में संकलित लेख फुटकर लेख है जिनमें फुटकर प्रसंग हैं। शैली किस्सागो की है। सभी आलेखों में रंजक एकरसता है।

यह किताब ऐसी नहीं है कि जिसे अनिवार्य तौर पर पहले आलेख से पढ़ना शुरू किया जाय और पाठों को क्रम वार पढ़ते हुए अंत तक पहुंचा जाय। पूरी किताब एक बार में भी पढ़ी जा सकती है और टुकड़ों में भी। इसमें कोई कथाक्रम नहीं है। किताब को किसी भी सिरे से, कहीं से भी, किसी भी पाठ से पढ़ना शुरू किया जा सकता है। एक बैठक में न भी पढ़ें तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा। जब मर्जी आए और आपके पास समय हो किताब को कहीं से भी खोल लीजिये और जो पाठ सामने आए वही से पढ़ लीजिये हां लेखक की मीठी शैली की एक अविरल धारा है जो शुरू से अंत तक पाठक को बांधे रखती है।इसे पढ़ना आनंददायक होगा। क्योंकि लेखक की शैली रस पूर्ण है रंजक है, सरल है।

आलेखों में पुरानी यादें उभरती हैं जो गुदगुदाती है और पाठक के मुंह पर हल्की मुस्कान लाती है। चुने गए प्रसंग रोचक हैं जिनमें लेखक अपने सरकारी मुलाज़मत और शिक्षक के रूप में हुए खट्टे-मीठे अनुभवों का सहज रूमानियत के साथ साझा करता है किक्या ज़माना था वो भीइसीलिए कवि दिनकर से हुई मुलाक़ात की जो याद रह गई वह है न कल बहुत अच्छा था न आज बहुत बुरा है

ये किताब लेखक का सम्पूर्ण आत्मकथ्य भी नहीं है। अपनी यादों की वही चीजें लेखक साझा करता है जो सुखद है। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि अधिकतर हमारा मस्तिष्क वही चीजें याद रखता है जो सुखद होती हैं। पीड़ादायक चीजों की यादों को यकायक उभरने नहीं देता। हालांकि इन आलेखों में अनेकों असहज घटनाओं का भी ज़िक्र है मगर लेखक ने उन्हीं बातों का साझा किया है जिन्हें वह आज हल्की मुस्कान के साथ याद करतावैसे भी भारतीय काव्य शास्त्र और नाट्य शास्त्र में ट्रैजेडी को कला रूप की मान्यता नहीं दी गई है।
        
लेखक बड़ी सतर्कता से कोई स्टैंड लेते हुए भी नहीं लेता हुआ नज़र आता है। जैसेबुरा समय आ गया हैलेख में वह कहता है: मुझे लगता है कि बुरे वक़्त कि बात करना हमारी आदत का हिस्सा बन चुका है, अन्यथा वक़्त इतना भी बुरा नहीं हैआगे लेखक कहता है – मैं नहीं कह रहा कि समय बदला नहीं है। शायद कुछ चीजें बदतर भी हुई हैं (यहां लेखक शायद कह रहा है) लेकिन उनकी चर्चा और शिकायत करते हुए जो बेहतर हुई हैं उनकी अनदेखी करना अपने ही प्रति अन्याय है – इसे भी समझना होगा।  लेखक इस झमेले में नही पड़ता कि यह इतना भी बुरा समय कितना होता है और किसके लिए होता है

लेखक इन आलेखों में बार-बार अपनी सफाई भी देता चलता है। जैसे एक जगह वह कहता है यह भी याद रखिए कि ज़िंदगी हमेशा स्याह सफ़ेद ही नहीं होती। उसके और भी अनेक रंग होते हैं। तब आप अपने विवेक से ही चुनाव करते हैंकह सकते हैं कि यही तो सच्चा लोकतन्त्र है – चुनने की आज़ादी। बाज़ार भी चुनने की आज़ादी की दलील देता है। लेखक अपना विवेक नहीं थोपता – उसे रखता जरूर है मगर फैसला पाठक पर छोडता है। लेखक इस बहस के पचड़े में भी नहीं पड़ता की क्या बाज़ार ऐसा विवेक हम में रहने देता है? मगर सभी आलेखों में लेखक मानवीय पक्ष के साथ खड़ा है और उसे भविष्य की बेहतर दुनिया पर शंकाग्रस्त भरोसा है।
पुस्तक शुरू से आखिर तक एक बंधी हुई शैली में है जो पाठक को मोनोटोनी या ऊब दे सकती है। अखबार में जब ये आलेख पे तब दो आलेखों के बीच कम से कम एक सप्ताह का अंतराल रहा होगा। इससे उनमें शैली की नवीनता बनी रहती है। लेकिन यदि इन्हें एक साथ पढ़ने बैठें तो कुछ अध्यायों के बाद आप लेखक का रुझान समझने लगते हैं और आपके लिए आगे वह जो कुछ कह रहा है वह सब ओब्वियस हो जाता है।

लेखक की कलम में अद्भुत सौम्यता और सरलता झलकती है। मगर इस सौम्यता और सरलता के नीचे उनका आत्मविश्वास और उनके स्वाभिमानी व्यक्तित्व की भी स्पष्ट छाप नज़र आती है। लेखक बड़े प्रेम भाव से और सौम्यता से अपनी बात कहते हुए इस बात की भी सतर्कता बरतता हैं कि उसका इरादा किसी को ठेस पहुंचाने का नहीं है। उसके आलेखों में आशावाद की सुखद छांव भी है जिसके तले विशुद्ध पूंजी के बाज़ार से पोषित और संचालित जयपुर लिट्रेचर फेस्टिवल को भी सहज रूप से स्वीकार कर लिया गया हैं।

पुस्तक के सभी लेखों में आज की बातें हैं। मगर साथ ही विगत की गुदगुदाहट भी है। जब लेखक आज के नज़रिये से बीते कल को देखता है तो तटस्थ भाव रखता है मगर दूसरी अनुकूलता में इस तटस्थता को त्याज्य भी बताता है। फिर वह यह संकेत जरूर देता चलता है कि वह कैसा भविष्य चाहता है। इस तरह वह निरपेक्ष भी नहीं है।

किताब के परिचय में कहा गया है कि इसमें निर्णय नहीं है। शायद इसीलिए 270 आलेखों के संकलन में अनेकों आलेख क्या शब्द और सवालिया निशान के साथ खत्म होते हैं।

बंधे हुए फॉर्मेट -नियमित स्तम्भ - की शब्द सीमा में लेखक सतही तौर पर ही चीजों को देख सकता है। उनके संकलन की इस पुस्तक को गल्प भी कह सकते हैंकिताब पर ही कहा भी गया है कि इस किताब का गद्य आपसे बतियाता गपियाता हुआ है

नए जमाने के बदलावों से लेखक आतंकित नहीं है। लेकिन पाठक के मन में यह सवाल जरूर उठता है कि लेखक किसका प्रतिनिधित्व कर रहा है? यहां यह सवाल थोड़ा सा अनुचित लग सकता है कि इस पुस्तक का लेखक किसका प्रतिनिधित्व करता है? वह इतना निरपेक्ष दीखता हुआ भी इतना संलग्न क्यों है। जिस लोक की निजता में वह जाता है और जिस लोक की रंजक दैनंदिन उठापटक से वह पाठक को सरोबार करता है और वह जिस लोक से बाबस्ता है वह उस वर्ग का लोक है जिसके पास दैनिक जरूरतों को पूरा कर लेने के बाद गैर जरूरी चीजों पर खर्च करने के लिए अतिरिक्त पैसा है। इन आलेखों में जिनका ज़िक्र आया है या जिनको संबोधित करते हुए बात कही गई है वे तंगहाली, बदहाली  या मुफ़लिसी में गुजर बसर करने वाले मजलूम वर्ग के लोग नहीं हैं। जिस संसार का इन आलेखों में प्रस्तुतीकरण है वह संसार साघन सम्पन्न लोगों का हैं। इस वर्ग का संसार पूरा समाज नहीं है। समाज में वे अल्पसंख्यक हैं। मगर उनके पास पैसे की हैसियत है इसलिए वे समाज की नैतिकता के प्रतिमान घड़ते है। सदा से ऐसा होता आया है। इसीलिए पुस्तक में किसी भी पीड़ा की सघन अभिव्यक्ति नहीं है। पीड़ा की सूचना भर है। यही इन्फोटेनमेंट आज के अखबार का धर्म भी है और मर्म भी।

इन आलेखों में करारा व्यंग नहीं है, कटाक्ष भी नहीं है। हां लेखक जिस लोक से संवाद करता है उससे मसखरी जरूर करता चलता है। और मसखरी अपनों से ही होती है। किताब में जिस लोक की कहानियां हैं उससे लेखक का अपनत्व सघन है। यहां इस लोक की सामाजिक नैतिकता पर कोई सवाल नहीं है। जैसा कि देश की सर्वोच्च अदालत के एक महत्वपूर्ण निर्णय में कह चुकी है कि समाज की टोलरेंस लिमिट स्थायी नहीं होती। वह समय के साथ बढ़ती जाती है। और समाज के आज की टोलरेंस लिमिट लेखक को सहज रूप से मंजूर है।
             

किसी आलेख में लेखक तटस्थता की बात करते हुए इसका अर्थ तट पर स्थित रहना बताता है। सागर में हो रही उथल पुथल से दूर। वह सिर्फ देखता भर है। वह निरपेक्ष है। समाज का यही आज है और यही आज के समाज का सच भी है। जो आज है वही तो सच होता हैयही इस पुस्तक का सच है।