Saturday, September 19, 2020

कांग्रेस में अंतर्विरोध और अंतर्कलह, मगर संभाले कौन!

 -         राजेंद्र बोड़ा

डेढ़ सदी से अधिक पुरानी कांग्रेस पार्टी में इस समय कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। लगातार दो बार संसदीय चुनाव की हार और चंद राज्यों में उसकी सरकारों के सिमट जाने के बाद अब इस पार्टी में जो अंतर्कलह उभर कर सामने आ रही है वह लक्षण है उसमें आ रहे नेतृत्व के क्षरण का। बीते दो दशकों से अधिक समय से पार्टी की अध्यक्षता नेहरू-गांधी परिवार के ही पास रही है  जिसकी वजह से यह माना जाने लगा है कि अब पार्टी परिवार के ही इर्द-गिर्द घूमती है और परिवार के बिना शायद ही उसका कोई वजूद रहेआज कांग्रेस अन्य राजनैतिक दलों से ऊंची पायदान पर नहीं है। वह भी अन्य राजनैतिक दलों की भांति एक सामान्य पार्टी हो कर रह गयी है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि अब उसमें नेहरू परिवार के नेतृत्व की पुरानी राजनीतिक समझ बदल गई है। नई पीढ़ी का नेतृत्व अपनी विरासत, अपनी परंपरा से कटा हुआ है। सोनिया गांधी, राहुल गांधी या प्रियंका वाड्रा के पास पुश्तैनी संबंधों की धरोहर तो है मगर हिंदुस्तान की राजनीति की समझ, लोकतान्त्रिक सोच तथा वैचारिक अनुभव की विरासत नहीं है। परिस्थितियों ने उन्हें राजनीति में वैसे ही धकेल दिया है जिस प्रकार अनिच्छुक राजीव गांधी को स्थापित किया गया। इनमें वैसी क्षमता नहीं है जो खांटी के राजनेता में होती है। वे ऐसे नेता भी नहीं है जो हमेशा लोगों और कार्यकर्ताओं के बीच रहने का आनंद ले सकें उनके साथ भावनात्मक रूप से जुड़ सकें। लोगों के बीच जाकर घुल मिल जाना उनके लिए सहज नहीं है। वे अपना निजी जीवन भी चाहते हैं और सार्वजनिक जीवन भी। हिंदुस्तान की राजनीति में ऐसा संभव नहीं है। मगर हम देखते हैं कि सोनिया गांधी या राहुल गांधी अपना निजी जीवन भी चाहते हैं। वे हर वक़्त पार्टी के लोगों से मिलने को तैयार नहीं है। कांग्रेस के बड़े नेताओं को भी उनसे मिलने के लिए समय मांगना पड़ता है और उनके बुलावे का लंबा इंतज़ार करना पड़ता है। जब शीर्ष नेतृत्व से सहज संपर्क ही संभव न हो और दूसरी तरफ समस्याएं मुंह बाये खड़ी हों तब पार्टी दिशाहीन ही नहीं हो जाती बल्कि उसमें लोग घुटन भी महसूस करने लगते हैं। पुराने और नये लोग पार्टी छोड़ जाते हैं। कुछ अपनी बात कहने के लिए अंदर फुसफुसाने की कोशिश करते हैं तो पार्टी विरोधी करार दे दिये जाते हैं। हाल ही में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक जिस माहौल में हुई वह इसका प्रमाण है। पार्टी के 23 नेताओं की चिट्ठी अंदर की इसी कश्मकश को उजागर करती है। पार्टी के भविष्य को लेकर कार्यकर्ताओं और नेताओं में जो सर्वत्र चिंता यह चिट्ठी दर्शाती है उस पर राहुल गांधी की प्रतिक्रिया दुर्भाग्यजनक है। लंबे इतिहास वाली कांग्रेस की परंपरा से निकला कोई नेता होता तो वह कार्यसमिति की बैठक में उन मुद्दों पर बात करता और करवाता जो चिट्ठी में उठाए गए थे। वह यह समझने की कोशिश भी करता कि समस्या कहां है, क्या है और क्यों है? यह जग जाहिर है कि पार्टी में अंतर्कलह है। अंतर्विरोध और अंतर्कलह में फर्क होता है। इस पार्टी में जब तक बहुलता की स्वीकार्यता रही तब तक वह अंतर्विरोध को थामे रख सकी। इसी बहुलता के कारण इस पार्टी ने हर क्षेत्र में एक से एक आला नेता दिये। लेकिन अंतर्विरोध और बहुलता को साधना आसान नहीं होता। जब नेतृत्व उसे नहीं साधने में असफल रहता है तब पार्टी की आंतरिक गतिशीलता शिथिल होने लगती है और वह अवसान की ओर बढने लगती है। ऐसा ही आज कांग्रेस में हो रहा है। 

महात्मा गांधी ने कांग्रेस को एक राजनैतिक दल से एक अभियान में तब्दील कर दिया था। एक ऐसा अभियान जिसमें प्रत्येक के लिए जगह थी और जिसमें पार्टी के सिद्धांतों को न छोडते हुए भी सबकी स्वीकार्यता थी। अपने इसी लोकतान्त्रिक स्वरूप और व्यवहार के कारण वह देश के हर कोने में बिना किसी भेद के लोगों को अपने से जोड़ सकी। महात्मा गांधी का यह अभियान सत्ता के लिए नहीं था। धर्म, जाति, क्षेत्र और भाषा से ऊपर उठ कर गरीबों का, मज़लूमों का जीवन बेहतर बनाने के पवित्र उद्देश्य के लिए था। सत्ता पाना उस पवित्र उद्देश्य को हासिल करने का जरिया भर था। व्यक्तियों की महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए सत्ता नहीं थी। इसीलिए शायद इस आधी लंगोटी के फकीर ने आजादी की संध्या पर सुझाया था कि कांग्रेस राज-काज छोड़े और जमीनी स्तर पर काम करके अपने को फिर से अंकुरित करे। मगर आज़ादी के बाद शासन के जरिये कुछ कर गुजरने के उत्साही जज़्बे से लबरेज़ कांग्रेस के तत्कालीन नेताओं ने कोई ध्यान नहीं दिया। फिर शनैः शनैः कांग्रेस यथास्थितिवादी पार्टी बनती चली गई। ऐसे में नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को पर लगने लगे और पार्टी में वैचारिक बहस की जगह अंतर्विरोध और फिर अंतर्कलह उभरने लगे। इसका हल एक मजबूत केंद्रीय नेतृत्व के रूप में उभरा और पार्टी के अंदर की सत्ता का पूरा केन्द्रीकरण हो गया। केंद्रीय नेतृत्व पार्टी में ऊपर से नीचे तक के नेतृत्व का नियंता बन गया। इसका परिणाम यह हुआ कि सभी एक परिवार में सीमित केंद्रीय नेतृत्व के लिए हो कर रह गए। ऐसे में नेतृत्व की विविधता समाप्त हो गई क्योंकि अन्यों के लिए कोई जगह नहीं रह गई और चापलूसी की नई संस्कृति पार्टी में घर कर गई और नेतृत्व आम जन से दूर होता चला गया। कभी कांग्रेस पार्टी एक ऐसा समुद्र थी जिसमें सभी विचारधाराओं, मतों, और हितों की धाराएं आकर मिलती थी। सभी के लिए उसमें जगह थी। यह व्यवस्था हिंदुस्तान जैसे विविधता वाले देश के लिए अनुकूल ही थी। भारतीय जनता पार्टी को भी उसके अकेले का बहुमत होते हुए भी इसीलिए एनडीए को बनाए रखना पड रहा है क्योंकि हिंदुस्तान मुल्क एक रंग का नहीं है। कांग्रेस में जब आंतरिक विविधता खत्म हो गई तो उसे भी यूपीए को अपनाना पड़ा।

साल 2019 की हार के बाद कांग्रेस के हर नेता को ये लग रहा था कि इतनी बड़ी हार के बाद पार्टी में गंभीर चिंतन और मंथन होगा ताकि भविष्य की दिशा तय की जा सके। मगर पार्टी के भीतर कुछ नहीं हुआ। लंबे समय से ऐसी बातें चल रही थी कि कि सोनिया गांधी से इस बारे में बात की जानी चाहिए। लेकिन डर यह भी था कि जो भी आगे बढ़कर बोलेगा उसे विद्रोही माना जाएगा। मगर यह चिट्ठी लिखी गई ताकि नेतृत्व समेत पार्टी के तमाम मुद्दों पर चर्चा हो सके। अभी पार्टी दो धड़ों में बंटी नज़र आती है लेकिन ये गुटबाजी नहीं है। अपनी तमाम असफलताओं बुराइयों और कमजोरियों के बावजूद कांग्रेस इस देश की आवश्यकता है। उसे फिर से आम जन में अपने प्रति भरोसा जगाना है। मगर यह भरोसा धरातल पर लोगों के बीच काम करके ही हासिल किया जा सकता है। राजनीति का जो नया स्वरूप देश में बना है उससे सबको और यहां तक कि निचले स्तर के कार्यकर्ताओं को भी लगने लगा है कि उन्हें जमीनी स्तर पर लोगों के बीच काम नहीं करना है बल्कि ऊपर नेताओं को खुश रखना है और सत्ता में किसी न किसी प्रकार छोटी-मोटी भागीदारी हासिल करनी है। नीचे से ऊपर तक पार्टी के लोगों को लगने लगा कि विचारधारा के आदर्शों के आधार पर लोगों का जीवन बदलने की बजाय राज में बैठ कर वैसा करना अधिक सुविधाजनक है। मगर यह भुला दिया जाता है कि राज मे जाकर नेता जनता को छोड़ कर अपना और अपनों का हो कर रह जाता है। यह तोहमत अब पूरी तरह कांग्रेस पर लग गई है कि वह एक परिवार की पार्टी है। कांग्रेस में नई जान फूंकने की बात तो दूर अभी तो हालात ये है कि इस पार्टी को बचाना ही मुश्किल दिख रहा है। लोगों को यह बात समझ में नहीं रही कि नेहरू गांधी परिवार के प्रति जो श्रद्धा उसकी शक्ति होती थी वही उसकी क़ामयाबी की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है क्यों बन गया है। अब ये सवाल भी पूछा जाने लगा है कि क्या कांग्रेस में गांधी युग का अंत आने वाला है? क्या पार्टी को फिर से खड़ी करने के लिए गांधी परिवार की राजनीति को ख़त्म कर दिया जाना चाहिए? मगर यह आसान नहीं है। उन लोगों की बात में भी दम है कि यह परिवार ही पार्टी को जोड़े रख सकता है। मगर जोड़े रखने के लिए नेतृत्व में जो तत्व होने चाहिए वे दिखने चाहिए। नेतृत्व के ऐसे तत्व जो पार्टी का बुरी तरह कमजोर हो गये ढांचे को फिर से खड़ा कर सके। कांग्रेस के लिए आम लोगों में सहानुभूति की कोई कमी नहीं है। कमी है तो इस बात की कि कोई ज़मीन पर आकार काम नहीं करना चाहता। सभी शासन के गलियारों में बैठना चाहते हैं। कांग्रेस के आज के लोग अपनी पार्टी के जिस गौरवशाली अतीत पर गर्व कर सकते हैं दुर्भाग्य से वे उसे नहीं जानते। कांग्रेस में अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं के लिए वैचारिक शिविर भी लगते रहते थे इसकी जानकारी भी आज के नेताओं को कहां है। पार्टी का संगठन अपनी सरकार का ताबेदार हो कर रह गया है। राहुल गांधी, पार्टी के लोग जिन्हें बार-बार पकड़ कर अध्यक्ष की कुर्सी पर बिठाना चाहते हैं, अन्यमनस्क हैं। वे पार्टी में भूमिका तो निभाना चाहते हैं मगर ज़िम्मेवारी संभालने से कतराते हैं। यह नहीं हो सकता।

(यह आलेख प्रेसवाणी के अगस्त 2020 अंक में प्रकाशित हुआ)

                                    

Saturday, September 5, 2020

भारत के अमीर विश्व सूची में, मगर गरीबी नहीं मिट रही

राजेंद्र बोड़ा 

सारा मीडिया जगत इस बात के इंतजाम करता है कि हम उसकी इस सूचना से इतराएं कि भारतीय व्यापार और उद्योग की हस्तियां विश्व के सबसे अधिक अमीरों की सूची में स्थान पा रहीं हैं। फॉरचून की अमीरों की नई सूची में 40 वर्ष से कम वय वाले तीन भारतीय युवाओं के नाम शामिल हैं। हालांकि उन्हें यह अमीरी पारिवारिक विरासत से मिली है। ऐसा माहौल बनाया जाता रहा है कि नई अर्थ व्यवस्था के चलते देश की संपन्नता में इजाफा हो रहा है जिसके लिए सभी को उत्सव मनाना चाहिए। यह सच है कि दुनिया के अमीरों की सूची में शीर्ष स्थानों पर भारत के लोगों के नाम आने लगे हैं और सरकारी तंत्र से जुड़ा, खास कर शहरी इलाकों का, मध्यम वर्ग का सरकारी नौकरियां करता और अवकाशप्राप्त तबका और उनके साथ निजी सेवा क्षेत्र में लगे उत्साही युवा सुरक्षित वित्तीय संपन्नता की सीढ़ियां चढ़ हे हैं और वह विलासिता की चीजों पर खर्च को बढ़ा कर बाज़ार की अपेक्षाओं को पूरा कर रहा है। गावों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना का पैसा पहुंचाया जा रहा है जिससे बाज़ार को मदद मिलती रहे। मगर कोरोना महामारी तथा उससे निबटने के लिए हुए लॉकडाउन से अचानक सब गड़बड़ा गया है। बाज़ार को साध लेने वाला और उसी का होकर रह आगे बढ़ता आधुनिक समाज आज नई परिस्थिति में अपने को असहज पा रहा है। नए वित्त वर्ष की पहली तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद में करीब 24 प्रतिशत की गिरावट ने सबको सहमा दिया है। सरकारी कर्मियों में नई संपन्नता किस प्रकार आ रही है इसकी मिसालें मिलती हैं उनके यहां भ्रष्टाचार निरोधक विभाग तथा अन्य आर्थिक अपराधों पर नियंत्रण और जांच के अन्य विभागों द्वारा पड़ने वाले छापों और उनके यहां बेशुमार धन और संपत्ति पकड़े जाने की आ रही नियमित खबरों से। आज जिस प्रकार से लोगों में धन कमाने की लोलुपता बढ़ती जा रही है उसके चलते हर कहीं छल, कपट और चोरी से पैसा कमाने की होड लगी है। दूसरी तरफ बड़े कार्पोरेशन, बैंक व अन्य समूह आम जन को लुभा कर उनकी जेबें खाली करवाने में जुटे रहते हैं। बाज़ार का खेल खेलने वाली कंपनियां पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की हिस्सा होती हैंइसीलिए उसी व्यवस्था के हिसाब से व्यवहार भी करती है। मुनाफे का अंबार लगाने में लगे रहना इस व्यवस्था की फितरत होती है। पहले एक व्यक्ति शोषण करता था। अब नई अर्थव्यवस्था शोषण का संगठित औज़ार मुहैया कराती है। इस व्यवस्था का सबसे बड़ा नियम होता है कि हर चीज उत्पाद है और हर उत्पाद मुनाफा कमाने के लिए होना चाहिए क्या चीज बनाई जायेगी इसका निर्धारण समाज की आवश्यकता के अनुरूप नहीं होता। उसकी प्रेरणा मुनाफा होती है। प्रचार के जरिये गैर जरूरी चीजें भी जरूरी बना दी जाती हैं। बाज़ार के आकर्षण ने समाज में कुछ ऐसा माहौल बना दिया है जिसमें हर एक को लगता है कि पैसे से ही काम होता है और अमीर होने के लिए सिर्फ पैसे की जरूरत होती है। यहां तक कि नई अर्थव्यवस्था में सामाजिक रिश्ते भी पैसे की तराजू पर तुलते हैं। बाज़ार यह याद नहीं आने देता कि धन से खुशियां नहीं खरीदी जा सकती। धन से सूचना मिल सकती है ज्ञान नहीं। धन किसी को मकसद नहीं देता, उसे पाना ही मकसद बन जाता है। बाज़ार निर्मित इसी भ्रम में मानवीय मूल्य तिरोहित हो जाते हैं। व्यक्ति स्वकेंद्रित हो जाता है। बाज़ार यह भ्रम भी देता है कि वह व्यक्ति को चुनने की स्वतन्त्रता देता है। इस प्रकार वह एक ऐसा मायाजाल रचता है जिसमें मानव को अपना उत्कर्ष लोभ, लालच और अधिक से अधिक धन संग्रह करने की प्रवत्ति में लगने लगता है। इस व्यवस्था को अपने पालन और विस्तार के लिए राज्य सत्ता की आवश्यकता होती है। यही कारण है बाज़ार की ताक़तें येन केन प्रकरेण सत्ता पर अपना प्रभुत्व बनाए रखती हैं। विश्व में जब से एक ध्रुवीय व्यवस्था हो चली है यह शिकंजा और अधिक मजबूत हो चला है। अब राज्य खुले रूप से ऐसी अर्थ व्यवस्था के पोषण और विस्तार के लिए काम करता है जो समूचे समाज को बाज़ार के रंग में रंग दे। राज्य की इस भूमिका को हम बहुत साफ देख सकते हैं। जब कभी यह अर्थ व्यवस्था गंभीर संकट में आती है राज्य उसे बचाने के लिए तुरंत उपाय करता है। उसे संकट से उबारने के लिए राज्य जो उपाय करता है उसकी कीमत समूचे समाज को चुकानी पड़ती है जिसमें सबसे अधिक गरीब तबका ही कुचला जाता है। कोरोना महामारी के कारण बाज़ार पर आई आफत को निपटने के जो भी लाखों करोडों के इंतजाम सरकार ने किए हैं वे सब उसे ही उठाने के लिए हैं।      

 

बाज़ार आधारित अर्थ व्यवस्था का प्रादुर्भाव औद्योगिक सभ्यता के साथ हुआ। जब उत्पादन संगठित क्षेत्र में होने लगा और अधिकतम मुनाफे के लिए श्रम का शोषण एक जरूरत बन गई। इसी के साथ आधुनिक अर्थशास्त्र भी स्वतंत्र विषय के रूप में स्थापित हुआ। इससे पहले अर्थशास्त्र दर्शन शास्त्र का हिस्सा हुआ करता था। तब अर्थ के साथ जीवन के नैतिक सबब की बात भी होती थी। जीवन का नैतिक सबब खुशी पाना होता है। हर एक के अपने जीवन मूल्य होते हैं जिन्हें पाना सच्ची खुशी होती है। पूंजी की व्यवस्था इस खुशी को बाज़ार के हिमें परिभाषित करती है। जीवन दर्शन से अर्थ को अलग करके बाज़ार के समर्थकों ने पश्चिम में उसे व्यक्तिवादी बना दिया। धर्म, जो समाज में सम की अवधारणा पुष्ट करता था उसे भी नए पूंजी समर्थित अर्थशास्त्र ने संकुचित कर मुनाफे के लिए व्यवसाय बना दिया। धर्म को भी प्रतिस्पर्धी बना दिया। यहां तक कि इस युग में खुद पूंजीवाद एक प्रकार का धर्म बन गया। पहले के धर्म कहते थे अपने लिए नहीं दूसरे के लिए जियो। दूसरे की मदद करो। जीवन का मकसद सच्ची खुशी पाना है जो दूसरे के चेहरे पर मुस्कराहट लाने से मिलती है। मगर आज का बाज़ार संचालित धर्म कहता है जो करो अपने के लिए करो। अपना हिसाधना ही सर्वोच्च मूल्य है। इसमें धन को बढ़ाने की लालसा, लोभ, और लालच कोई बुरी बात नहीं है। पहले जो जीवन मूल्य अवगुण माने जाते थे वे ही आज मानव के लिए श्रेष्ठ गुण बन गए हैं। लोकतन्त्र में सरकारें भले ही उनके बहुमत से चुनी जाती हो जिनका बाज़ार शोषण करता है मगर निर्वाचित प्रतिनिधि बाज़ार के ही हुए रहते हैं और उन्हीं के कार्य साधते हैं। सरकारें आम जन की होकर भी गणशत्रु के रूप में व्यवहार करने लगतीं हैं। कहने को उसकी सारी नीतियां और सारे कार्यक्रम जनहित के लिए होते हैं। बाज़ार को प्रोत्साहन जनहित के नाम पर ही दिया जाता है। अकूत मुनाफा कमाने का के लिए लालच, लोभ और वैसी ही महत्वाकांक्षा की जरूरत होती है। नई अर्थ व्यवस्था इसके लिए नैतिक आधार देती है। संचार के माध्यम व्यवसायजनित होकर मुनाफे के लिए होते हैं इसलिए वे भी सारा जतन यह करते हैं कि किस प्रकार व्यक्ति को इसके लिए लुभाया जाय। वे लोगों के इस भरोसे का फायदा उठाते हैं कि वे उनकी बात करते हैं, उनकी आवाज हैं और उनके लिए लड़ते हैं। वे राज्य की भूमिका के बारे में कोई गंभीर और गहरे सवाल नहीं उठाते और न ही ऐसी कोई बहस छेड़ने में रुचि दिखाते हैं। सतही मुद्दों पर चिल्ला कर बहस प्रस्तुत कर अपने जनहितकारी होने का ढोंग वे जरूर कर लेते हैं। बाज़ार की शक्तियां आज विजेता है और गरीब की हालत बद से बदतर हो रही है। एक व्यक्ति राष्ट्रीय संपत्ति का जो हिस्सा अपनी अमीरी के इजाफे के लिए लेता है वह ऐसा किसी न किसी को गरीब करके ही करता है। मजरूह सुल्तानपुरी ने अपने एक गीत में खूब लिखा था “गरीब है वो इस लिये के तुम अमीर हो गये/ के एक बादशाह हुआ तो सौ फ़कीर हो गये”। गरीब का जब धीरज टूटता है तो वह अपराध की और प्रवत्त होता है। ऐसे में उस गरीब का शोषण आतंकी राजनैतिक विचारधारा के पोषण के लिए तो कभी संकीर्ण धार्मिक प्रसार के लिए होने लगता है। ऐसे माहौल में खुशी पाने का जीवन का नैतिक सबब मृग मरीचिका बन जाता है।  पूंजी आज इस हद तक सफल है कि सारे ही राजनैतिक दल अपनी मूल विचारधाराओं से च्युत होकर सत्ता पाने की होड में लगे रहते हैं ताकि उनके नायक अपना और अपनों का हित साध सकें। राजनीति में लोग जन सेवा के लिए नहीं अपनी और अपनों की सेवा के लिए आते हैं। लोकसेवा का तंत्र इन्हीं नायकों के लिए होकर रह गया है। संविधान का आमुख और उसके प्रावधान कागजों पर रह गए हैं। संविधान के नीति निर्देशक तत्वों को तो पूरी तरह भुला दिया गया है। आज के बच्चों से पूछें कि क्या वे जानते हैं कि संविधान के दस्तावेज़ में नीति निर्देशक तत्व भी शामिल हैं तो इसका जवाब उनकी आंखों का सवालिया निशान ही होगा। इसीलिए ज़मीनी स्तर पर बदलाव की संगठनात्मक राजनीति तिरोहित हो चुकी है और बाज़ार नियंत्रित सत्ता प्रबंधन शैली ने सबको मोह लिया है। नतीजन राज्य सत्ता का रुतबा खत्म हो रहा है और संवैधानिक मर्यादाओं, लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं और कानून के शासन को बार-बार आघात लग रहे हैं।   

(राष्ट्रदूत के 05 सितंबर, 2020 अंक में अतिथि संपादकीय)