Friday, August 7, 2015

गुणवत्ता वाली शिक्षा

राजेंद्र बोड़ा

सबसे पहला सवाल तो यही कि गुणवत्ता से हमारा क्या आशय है? एक तो आशय यही कि गुणवत्ता वह जो हमारी बेहतरी करे। जैसे गुणवत्ता वाला भोजन हमें पोषण देता है। गुणवत्ता वाली दवा हमारी बीमारी दूर करती है और हमें फिर से स्वस्थ करती है। दूसरा आशय यह होता है कि जब हम कहें गुणवत्ता वाला तो उसका अर्थ हो वह जो नुकसान पहुंचाने वाला न हो। इन्हीं दृष्टियों से हम शिक्षा की भी चर्चा कर सकते हैं। ऐसी शिक्षा जो हमें और हमारे ज्ञान को आगे बढ़ाए और जो हमारा नुकसान न करे।

शिक्षा की बाबस्ता दो बातें हो सकती हैं। एक इंसान को बेहतर बनाने की शिक्षा और दूसरी उसके हुनर और कौशल को बढ़ाने वाली तथा उसके अर्थोपार्जन की बेहतरी की शिक्षा।

हालांकि शिक्षा शब्द में ये दोनों आशय शामिल हैं। इसलिए हम कह सकते हैं कि गुणवत्ता वाली शिक्षा वह है जो हुनर, कौशल और अर्थोपार्जन की सफलता के लिए शिक्षार्थी को तैयार करती है तो साथ ही उसे एक अच्छा इंसान बनना भी सिखाती है।

अच्छाई से सफलता पाना और बुराई से सफलता पाना  में भेद कर सकना भी हम शिक्षा से ही सीखते हैं। बहुत बार एक अच्छा इंसान सांसारिक मानदंडों पर हमेशा सफल होता नज़र नहीं आता। अच्छा होने की शिक्षा उसे सिखाती है कि वह किसी को रोंद कर आगे न जाये। मगर जब सांसारिक जीवन में सारी प्रतिस्पर्धा दूसरे को पछाड़ कर आगे बढने की हो तब अच्छी शिक्षा से दीक्षित व्यक्ति क्या करे? क्या वह प्रतिस्पर्धा से हट जाए? मगर हमारा समाज और राज्य व्यवस्था दोनों प्रतिस्पर्धा से हट कर अपना जीवन जीने की चाहना रखने वाले को कोई सुरक्षा प्रदान नहीं करते। समाज और राज्य की सुरक्षा पाने के लिए भी प्रतिस्पर्धा होती है जिसमें सफल होने की सिखाई स्वतः ही आ जाती है। 

शिक्षाविद अनिल सदगोपाल पूछते हैं कि क्या केवल वैश्विक बाज़ार और पूंजी के लिए पैदल सिपाहियों की फौज खड़ी करना ही शिक्षा का उद्धेश्य है? अब जब खेती पर आधारित रोज़गार खत्म हो रहे हैं या किए जा रहे हैं तब ग्रामीण आबादी लाचार होकर शहर में आती है। उनके बच्चों का क्या होगा? वे कैसी भी घटिया डिग्री क्यों न हो लेने की कोशिश करेंगे, भले ही उनकी शिक्षा के साथ कौशल का कोई वास्ता न हो।

शिक्षा का मतलब किताबी ज्ञान मान लिया गया है। पाठ्य पुस्तक के अलावा अन्य पुस्तक पढने को समय की बरबादी माना जाता है। जीवन के लिए शिक्षा का कथन मुहावरे के तौर पर जरूर इस्तेमाल किया जाता है मगर वह कितना जीवन में उतारा जाता है वह दीगर बात है।

शिक्षा की गुणवत्ता की बात करते हुए हमारे सामने सवाल होना चाहिए कि हम कैसासमयचाहते हैं? दि हम चाहते हैं कि नागरिक रचनात्मक एवं वैज्ञानिक सोच से लैस हों, जहां चीजों का वितरण सम्यक व न्यायपूर्ण हो तथा सभी को अच्छी शिक्षा, स्वस्थ्य और भोजन की गारंटी हो तो शिक्षा प्रणाली भी ऐसी होनी चाहिए जो रचनात्मकता और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा दे। वह लोकव्यापी और समतामूलक हो।

जब हम शिक्षा की गुणवत्ता की बात करते हैं तब उसके दो पक्षों पर ध्यान जाता है – एक व्यावहारिक पक्ष और दूसरा सैद्धान्तिक पक्ष। इन दोनों को लेकर शिक्षा का दार्शनिक पक्ष सामने आता है जिससे हम उसकी गुणवत्ता को समझने की कोशिश करते हैं।

फिर सवाल उठता है कि जब हम शिक्षा की गुणवत्ता की चर्चा करते हैं तब क्या हम शिक्षा में बदलाव चाहते हैं या बदलाव के लिए शिक्षा चाहते है?

शिक्षा को आमतौर पर नौकरी-चाकरी कर सकने की योग्यता से जोड़ कर ही देखा जाता है। छात्र का भावी कॅरियर उसके केंद्र में होता है। ऊंची से ऊंची नौकरी दिला सकने वाली शिक्षा को ही अच्छी शिक्षा माना जाता है। संवेदनशील, स्वतंत्र और पूर्ण मानव की जगह अर्थ-मानव बनाने पर सारा जोर आज नज़र आता है। ऐसा अर्थ-मानव राज्य के लिए एक ऐसा संसाधन भर होता है जो बाज़ार के लिए काम करे।

नए दौर में आज का राज्य उत्पादकता, प्रतिस्पर्धी और उपभोक्तावादी मानसिकता वाले नागरिकों को रजीह देता है। मानव को संसाधन मान कर उसे उपभोग की वस्तु बना देता है। इंसान का वजूद अब बाज़ार में उसकी उपयोगिता पर निर्भर हो चला है।

इसलिए गुणवत्ता वाली शिक्षा पर विमर्श का एक आशय यह भी है कि हमारी कुछ चिंताएं हैं जिसमें एक है बाज़ार भाव की चिंता। यह चिंता इसलिए कि आज शिक्षा का बाज़ार बन रहा है और तेजी से बढ़ रहा है। शिक्षा के बाज़ार में ग्राहक को अपने दाम का उचित मोल मिल रहा है या नहीं? बाज़ार में लाभ का मापदंड ग्राहक की संतुष्टि होता है। वह शिक्षा बेहतर हो चली है जो अपने ग्राहकों को अधिक संतुष्ट कर सके। आज सरकारी शिक्षा व्यवस्था से असंतुष्ट होकर लोग निजी क्षेत्र को मोटी-मोटी रक़में देने को तैयार हैं। मगर शिक्षा में गुणवत्ता का मापदंड ग्राहक की संतुष्टि को मानना हमें तकलीफ देता है। इस बाज़ार में ग्राहक कौन है? बच्चा, अभिभावक या राज्य जो अपने नागरिकों को किसी खास किस्म की शिक्षा दिलाना चाहता है।  

हम शिक्षा के परिणाम अंकों और ग्रेड से तय करते हैं। इसी के चलते शिक्षा का निजी कोचिंग उद्योग आज देश में सबसे तेजी से बढ़ रहा सेवा क्षेत्र का उद्योग बन गया है। पिछले छह सालों में इस उद्योग ने 35 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की है। आज यह उद्योग 23. 7 बिलियन रुपये का हो चला है। उद्योग परिसंघों के सर्वे बताते हैं माध्यम वर्ग का परिवार अपनी आमदनी का एक तिहाई हिस्सा अपने बच्चों की पढ़ाई और निजी कोचिंग पर खर्च करता है। इसमें स्कूली छात्र तथा बाद में प्रतिस्पर्धा परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवा शामिल हैं। 
     
कला और साहित्य से सरोकार रखने वाले अशोक बाजपेयी कहते हैं कि हमारी उच्च शिक्षा भटक चली राजनीति का प्रतिरोध या उसका विकल्प बनने का ज्ञान और ऊर्जा देश की युवा शक्ति को नहीं देती। विश्वविद्यालयों से निकलने वाले अधिकतर छात्र न तो अच्छे नागरिक हैं और न उनमें किसी तरह की वैचारिक साक्षरता का ही कोई प्रमाण दीख पड़ता है। इसमें यदि कोई अपवाद नज़र आते हैं तो वे नियम को ही सिद्ध करते हैं। उनको इस बात का दुख है कि हमारी शिक्षण संस्थाओं का अपने समय के जीवंत-सृजन से कोई संवाद नहीं है।

तो यहां दार्शनिक सवाल आ जाता है शिक्षा क्या चीज है? शिक्षा में शिक्षार्थी, शिक्षक और शिक्षण की अंतर्वस्तु तीनों शामिल हैं। विद्यार्थी सीखता है, शिक्षक सीखने में मदद करता है और अंतर्वस्तु वह सब है जो शिक्षार्थी सीखता है। सीखना कुशल और बेहतर मानव बनाने की प्रक्रिया है। सीखने की उत्कृष्टता वाली शिक्षा ही गुणवत्ता वाली शिक्षा हो सकती है।

यह भी याद रखना होगा कि शिक्षा का सामाजिक संदर्भ भी होता है। शिक्षार्थी और शिक्षक दोनों ही किसी समाज के हिस्सा होते हैं। शिक्षा की अंतर्वस्तु के रूप में जो ज्ञान, क्षमताएं और मूल्य चुने जाते हैं वे उस समाज में उपलब्ध बड़े सामूहिक ज्ञानाधार में से लिए जाते हैं जिनका आधार समाज की अपेक्षाएं और आकांक्षाएं भी होती है। 

Wednesday, July 29, 2015

दिलीप कुमार : सच्चाई और परछाई





राजेंद्र बोड़ा 

दिलीप कुमार राज कपूर और देव आनंद तीन ऐसे कलाकार हुए हैं जो उस काल में शीर्ष पर थे जिसे हिन्दुस्तानी फिल्मों का स्वर्ण युग के रूप में याद किया जाता है। तीनों समकालीन थे और तीनों ही के अपने - अपने शिखर थे। तीनों की सिने पर्दे पर अपनी छवि थी और अपना अंदाज़ था। तीनों ऐसे कलाकार रहे हैं जिनके नाम आज भी लोगों में उत्सुकता जगाते हैं। तीनों के बारे में इतना कुछ लिखा जा चुका है कि लगता है अब उनके बारे में जानने को और क्या बचा हो सकता है। मगर फिर भी उनके बारे में कोई लेख या किताब आती है तो लोग बड़ी उत्सुकता से उसे पढ़ते हैं। लोगों की यह अतीत की ललक भी हो सकती है।

दिलीप कुमार पर, उनके अभिनय पर उनके जीवन पर पहले भी किताबें लिखी जा चुकी हैं। मगर इस अभिनेता की आत्मकथा Dilip Kumar : The Substance and The Shadow’ की प्रतीक्षा इसलिए थी कि यह दिलीप साहब पहली बार अपनी आत्मकथा लिखवा हे थे

भले ही किताब को आत्मकथा के रूप में स्थापित किया जा रहा है मगर वह दिलीप साहब की लेखनी से नहीं निकली है। यह किताब है As narrated to Udaytara Nayar (जैसा कि उन्होंने उदयतारा नायर को बताया)।  यह वैसे ही है जैसे किसी अखबार का रिपोर्टर किसी कुछ जानकारी लेकर आए और उसे उसी के नाम से first person में छाप दे। उसमें विचार तो उसके होते हैं जिससे भेंट वार्ता की गई है मगर लेखनी रिपोर्टर की होती है। हां रिपोर्टर यह कोशिश जरूर करता है कि जिसने बोल कर बात कही है उसे उसी के अंदाज़ में प्रस्तुत करे।

किताब में दिलीप कुमार नदारद है। यहां तक कि दिलीप कुमार का लहजा भी नहीं है। दिलीप कुमार का बोलने का, बात करने का अपना अंदाज़ है मगर वह इस किताब में सिरे से नदारद है। अगर अपने कद्रदानों से बात करने के लिए वे खुद कलम उठाते तो जो कागज पर उतरता वह एक अनुभव होता। मगर उदय तारा नायर की लेखनी में हम उस अनुभव से महरूम रह जाते हैं। 

किताब में दिलीप साहब की आत्मकथा लिपिबद्ध करने वाली उदयतारा नायर की सफलता सिर्फ इस बात में है कि दिलीप साहब, जिन्होंने अपने निजी जीवन के बारे में कभी सार्वजनिक रूप से मुंह नहीं खोला, को राजी कर लिया कि वे अपने जीवन को लिपिबद्ध करवायेंगे। ऐसा उदयतारा नायर सायरा बानो के जरिये ही शायद कर सकी। इसलिए कह सकते हैं कि इस किताब को अस्तित्व में लाने में सायरा बानो की भूमिका प्रमुख रही है।

जैसा कि यह अभिनेता किताब में खुद मानता है कि उसके दो व्यक्तित्व हैं : एक है युसुफ खान जो एक खुद्दार पठान है और जो एक सम्पन्न फलों के व्यापारी घराने से आता है। दूसरा है दिलीप कुमार जो फिल्म अभिनेता है और जिसका वजूद कैमरे के सामने और सिनेमा के पर्दे पर है जहां दिलीप कुमार उस चरित्र में ढल जाता है जिसकी भूमिका में वह होता है। 

ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि तो फिर इस किताब में कही गई आत्मकथा को कहने वाला कौन है? पेशावर के फलों के व्यापारी आगा जी का बेटा युसुफ खान या देविका रानी निर्मित अभिनेता दिलीप कुमार?

इस किताब के आमुख में सायरा बानो अपने पति को अभिनय सम्राट बतातीं हैं मगर इसमें आत्मकथा कहने वाला अभिनेता दिलीप कुमार नहीं हैइसमें युसुफ खान अपनी कहानी सुना रहा है। किताब की सबसे बड़ी समस्या यही है कि लोगों की अपेक्षा दिलीप कुमार को सुनने की है और उसकी नज़र से हिन्दुस्तानी फिल्मों के स्वर्ण युग को देखने-परखने की है और इसी अपेक्षा के साथ हम इस जीवनी के पन्ने पलटते हैं। मगर वहां अभिनेता दिलीप कुमार नहीं एक ऐसा व्यावसायिक पठान बोल रहा है जिसे अपने पर घमंड है और जो इस बात का मुतमइन है कि वह अन्यों से अलग है और जिसने अपने से यह तय किया है कि अभिनेता दिलीप कुमार कैसा हो। अपने विशेष होने का युसुफ खान को पूरी शिद्दत से एहसास है। इसीलिए युसुफ खान दिलीप कुमार का विधाता है।

वह विशेष है, निराला है यह बात युसुफ खान जब बहुत ही छोटा बालक था तभी से उसके ज़ेहन में बैठ गई। उसकी आत्मकथा के अनुसार संयुक्त परिवार में पलने वाला वह बालक बहुत बड़ा आदमी बनेगा इसकी भविष्यवाणी एक फकीर ने की थी। एक दिन एक फकीर ने उनके घर के बाहर आवाज़ लगाई। युसुफ की दादी फकीर को देने के लिए कुछ लेने अंदर गई। फकीर की निगाह युसुफ पर पड़ी तो वहीं जम कर रह गई। दादी सीधा लेकर बाहर आई तो फकीर बोला यह बच्चा बहुत बड़ा आदमी बनेगा, दुनिया में नाम कमाएगा। इसे संभाल के रखना और दुनिया की बुरी नज़र से बचाए रखनादादी और युसुफ की मां के मन में यह बात पूरे यकीन के साथ बैठ गई और तभी से बालक युसुफ विशेष हो गया। किसी ने जब यह कहा कि फकीर की बातों में क्या धरा है तो दादी का जवाब होता था घर में इतने बच्चे उसके सामने थे। फकीर ने युसुफ के लिए ही ऐसा क्यों कहा? आत्मकथा में लगता है कि विशेष होने का हसास खुद बालक युसुफ में भी अंदर तक घर कर गया जो वक़्त के साथ गहराता ही चला गया। नज़र उतारने के लिए तब उनकी दादी और मां टोटके करती रहती थीं और अब उनकी पत्नी सायरा बानो करती हैं। जब भी कोई अनजान लोग, दिलीप कुमार के प्रशंसक, उनके घर आ जाते हैं या कोई उनकी तंदरुस्ती की तारीफ कर देता है तो उनके जाने के बाद सायरा अपने साहब की नज़र उतारती है।

तब के समाज में व्याप्त बुरी नज़र, प्रेत बाधाओं और बलाओं की मान्यताओं का युसुफ खान पर भरपूर असर रहा जो इस आत्मकथा में साफ उभर कर आता है। उनके फलों के बागान के रखवाले को पूनम की रातों कोभावआते थे और वह भेड़िये की आवाज़ में चिल्लाने लगता था। ऐसी हालत में उसे बांध कर कमरे में बंद करके रखा जाता था। दिन निकलने पर वह सामान्य हो जाता था। युसुफ के बचपन की यादों में यह एक प्रमुख याद है। उन्हीं के शब्दों में : कहते हैं कोई बला उसके सिर पर आती थी। एक दिन वह रखवाला मर जाता है कमरे में बंधी हुई अवस्था में। बाद में यह मशहूर हो जाता है कि पूनम की रातों में वह रखवाला लोगों को नज़र आता है। युसुफ की यह याद भी गहरी है कि उसकी खाला मरियम को भूनी आती थी। जब ऐसा होता तो वह अपने बाल नोचने लगती। मगर उस हालत में भी वह युसुफ को अपने पास आने देती और कोई रोकता तो उसे मना करती कि उसे रोके नहीं।

युवा युसुफ खान केदिलीप कुमारबन जाने के बाद की एक घटना भी यही ताईद करती है कि परा शक्तियों का भरोसा उसके मन से कभी निकला नहीं। आत्मकथा में एक घटना का जिक्र है कि वे निर्देशक एस यू सन्नी और अन्य के साथ फिल्म के लोकेशन को देखने जाते है। सन्नी की पत्नी जो हमेशा टोना-टोटका करती रहती है साथ चलना चाहती है मगर सन्नी कोई बहाना बना कर उसे साथ नहीं लाते। रास्ते में शाम हो जाती है और तेज बारिश होने लगती है। वे कार रोक कर निर्जन स्थान पर रास्ते के किनारे झोपड़ेनुमा एक पुराने ढांचे में रुक जाते हैं। अंधेरा घिर चुका है और रह-रह कर बिजलियां चमक उठती हैं। ऐसी ही एक चमक में वे क्या देखते हैं कि सन्नी की पत्नी साक्षात सामने खड़ी है। सबके पसीने छूट जाते हैं। वापस लौटते हैं तो सन्नी की पत्नी घर पर ही मिलती है।

कहने का सबब यह है कि जिन मान्यताओं में युसुफ पला बड़ा हुआ उसमें फकीर की भविष्यवाणी युसुफ के लिए ईश्वरीय वचन हो गई और उसके व्यक्तित्व में अपने विशेष होने का यकीन समा गया। इसीलिए युसुफ खान की आत्मकथा में हम पाते हैं कि वह हमेशा इस बाबत चयनशील रहा कि वह जो भी चुने - फिल्म हो, कहानी हो, निर्माता या निर्देशक हो – वह उसकी विशिष्टता बनाए रखे। दिलीप कुमार बनने के शुरुआती जमाने से ही उसमें यह फर्क करने की दार्शनिकता गई कि पर्दे पर दिखने वाला कोई और है और असली ज़िंदगी वाला कोई और। शायद इसीलिए आत्मकथा में असली ज़िंदगी युसुफ की है और दिलीप कुमार की छाया भर है
  
किताब में युसुफ खान दिलीप कुमार की छाया से उतना ही आपका परिचय कराता है जितना उसके अपने वजूद के लिए जरूरी है। इसीलिए इस बात को तो युसुफ खान गर्व से बताता है कि जब उसे देविका रानी ने बॉम्बे टाकीज़ में एक्टर की बतौर जॉब देने का प्रस्ताव किया और उसने उसे मान लिया तब उसके मन में कोई रोमांच की भावना नहीं थी। उसने इससे पहले एक डॉक्यूमेंटरी को छोड़ कर कोई फिल्म भी नहीं देखी थी। उसने पहली ही फिल्म से फिल्म निर्माण कला की बारीकियाँ सीख ली।

दिलचस्प बात यह है कि युसुफ खान अपनी आत्म कथा कहते हुए यह तय नहीं कर पाया है कि वह किसे अपना गुरु बताए क्योंकि दिलीप कुमार की जो छवि वह किताब के पन्नों पर उतार रहा है वह एक self-made व्यक्ति की है जिसे किसी ने नहीं तराशा है। अपना निर्माता वह खुद है। इसलिए शुरू में वह कहता है शशधर मुखर्जी से उसने अभिनय की बारीकियां सीखी मगर बाद में नितिन बोस और देविका रानी को भी वह अपना गुरु बताता हैं।

आत्मकथा नें उनकी अपनी फिल्मगंगा जमनाके अलावाराम और श्याम, जो अभिनेता दिलीप कुमार की हीरो के रूप में अंतिम सफल फिल्म थी। फलों व्यवसायी का बेटा है तो तोल-मोल में माहिर होगा ही। गुरुदत्त की प्यासा  वह इसलिए अस्वीकार कर देता है क्योंकि तब वह बिमल रॉय की देवदास कर रहा होता है और वह नहीं चाहता कि लगभग समान थीम की उसकी दो फिल्में साथ-साथ रिलीज़ हो।

किताब में बार-बार ज़ाहिर किया गया है कि अपनी फिल्मों के दृश्य, सीन और कहानी को बेहतर बनाने के लिए वह कितना योगदान देता है। वह ऐसा करने को इसलिए अपने को काबिल मानता है क्योंकि वह पंडित नरेंद्र शर्मा, राजेंद्र सिंह बेदी जैसे लेखकों के साथ बैठकों में अपने शुरुआती दौर में वह शिरकत कर चुका है।

अपनी आत्मकथा कहने वाला सिर्फ एक जगह वह अपने को कमजोर पाता है जब वह सायरा की एक सौत ले आता है। इसे वे अपने जीवन के एक हादसे के रूप में जिक्र करते हैं। इस घटनाक्रम के बारे में वे कहते हैं मेरे जीवन का एक ऐसा हादसा है जिसे मैं भूल जाना चाहूंगा। मैने और सायरा (बानो) ने इसे हमेशा के लिए भुला दिया है। 
  
आप जानना चाहेंगे वहादसा क्या हैदिलीप साहब सायरा बानो से विवाह कर चुके थे और उसके साथ दाम्पत्य जीवन बिता रहे थे कि अचानक खबर आई दिलीप कुमार ने आस्मां रहमान से दूसरा निकाह कर लिया है। अपनी आत्म कथा में वे इसे अपनी गंभीर भूल मानते हैं जिसके बारे में वे कहते हैं कि दबाव में आकर मैंने यह गंभीर गलती की

वे कहते हैं मैंने यह बड़ी भूल (सायरा बनो से) कबूल की और उससे कहा कि मुझसे जो गलती हो गई है उसे समुचित कानूनी कार्यवाही से सुधारने और अपने 16 वर्षों के दाम्पत्य जीवन की पवित्रता को पुनः स्थापित करने के लिए कुछ समय दे

यह आत्मकथा इस घटना के बारे में इससे अधिक कुछ नहीं कहती। मगर हम इस कहानी का हिन्दी फिल्मों की तरह सुखांत अंत ही हुआ मान लेते हैं।
हां दिलीप साहब यह जरूर बता देते हैं कि आस्मां पहले से विवाहित स्त्री थी और उसके बच्चे भी थे।   

उदयतारा नायर का शुमार शानदार फिल्म पत्रकार के रूप में कभी नहीं हुआ।स्क्रीन की संपादक के रूप में उनको कोई याद नहीं करतादिलीप कुमार के लिए उनकी आत्मकथा लिख कर उन्होंने नाम कमाने का सोचा होगा तो वह भी नहीं हुआ है। 

दिलीप कुमार के जीवन पर इससे बेहतर किताबें पहले ही लिखी जा चुकी हैं। बनी रूबेन की इस अभिनेता पर किताब नायर की किताब से हज़ार गुना बेहतर है।  

Friday, July 3, 2015

बीते युग की अंतिम आवाज़ भी चुप हो गई

 राजेंद्र बोड़ा

संगीत के बीते सुनहरे दौर के गायक विद्यानाथ सेठ नहीं रहे।  शतायु में चल रहे सेठ के निधन के बाद उस दौर के गायकों में से अब हमारे बीच कोई भी नहीं रहा है।  बीते दिनों दिल्ली में बिना किसी को कोई तकलीफ दिए या खुद तकलीफ पाये उन्हों ने यकायक जीवन से विदा ले ली।  

लाहौर में जन्मे और बड़े हुए विद्यानाथ सेठ का नाम आज की पीढ़ी के लिए शायद अजनबी हो मगर पिछली सदी के छठे दशक तक उनकी आवाज़ रेडियो और ग्रामोफोन रिकार्डों के जरिये घर-घर में गूंजती थी।  खासकर उनके गाये भजन तो पुरानी पीढ़ी के लोगों की जुबान पर आज भी हैं। "मन फूला फूला फिरे जगत में कैसा नाता रे", "सुन लीजो प्रभु मोरी" , "मैं गिरधर के गुण गाऊं"  या चदरिया झीनी रे झीनीजैसे भजन उनकी आवाज़ में जब कभी सुनने में आते हैं तो उस पीढ़ी के लोग साथ में गुनगुनाते हुए यादों के गलियारों में खो जाते हैं।  

रेडियो और ग्रामोफोन रिकार्डों के उस सुनहरी दौर के इस  सहज और सरल गायक ने अपने गायन को कभी व्यावसाय नहीं बनाया भले ही वे रेडियो पर गाते रहे, एचएमवी के लिए गाते रहे और संगीत सभाओं में गाने के लिए भी जाते रहे। फिल्मों में गाने के लिए भी उनको खूब बुलावे आये मगर परिवार को छोड़ कर मुम्बई या कोलकाता जाने का कभी मन नहीं हुआ।  तब के प्रमुख संगीतकार पंडित गोबिन्द राम ने खुद उन्हें बुलावे भेजे मगर वे बंबई नहीं गए। सिर्फ एक फिल्म 'रूप रेखा' (1948) में उन्होंने पांच गाने गाये। फिल्म के संगीतकार उनके साथी रवि रॉय चौधरी थे जिनका आग्रह वे नहीं टाल सके। वास्तवमें इस फिल्म के लिए अपने गाने उन्होंने खुद ही कंपोज़ किये और गाये थे। उनके पांच में से तीन एकल गाने थे, एक में उनकी सह गायिका थी मुनव्वर सुल्ताना और एक अन्य में उनके साथ मुनव्वर सुल्ताना और सुरिंदर कौर ने आवाज़ दी।  

गैर फ़िल्मी गानों में वे ज्येष्ठ और श्रेष्ठ बने रहे।  उनके गायन में एक विशेष प्रकार की सरलता थी अपने गायन में उन्होंने कभी कोई तिकड़म या उस्तादी दिखा कर चौकाने की कोशिश नहीं की। जब वे 98वें वर्ष में चल रहे थे  तब जयपुर के संगीत रसिकों के एक समूह  'सुर यात्रा' के हमराहियों के साथ हम उनका इस्तेकबाल करने उनके घर दिल्ली गए थे जहां हमने उनकी ऐसी सरलता, सादगी और प्रफुल्लता देखी जो उनकी उम्र के लोगों आम तौर पर नहीं मिलती। उन्होंने लोकप्रियता की बुलंदियां छुई मगर अहंकार को अपने पास फटकने नहीं दिया।  पूरी ज़िन्दगी वे बालक की तरह सरल बने रहे। सरल, सादे और प्रफुल्लित जीवन से सरोबार विद्यानाथ सेठ एक नेक इंसान थे। इसीलिये उनकी गायकी सुनने वालों को सच्ची लगती थी। गायकी  में भावों  की अभिव्यक्ति पर उनका  खास ज़ोर रहता था जिससे उनके  गीत, ग़ज़ल भजन  सुनने वालों के दिलों में सीधे उतर जाते थे।

गैर फिल्मी गानों के लिए उनकी लोकप्रियता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि एचएमवी कंपनी ने अपने श्रेष्ठ गायकों के पोस्टरों की शृंखला में विद्यानाथ सेठ को भी शामिल किया था। पुराने एचएमवी डीलरों के व्यवसायिक प्रतिष्ठानों की दीवारों पर उनके पोस्टर फ्रेम में जड़े हुए लटके आज भी दिख जाते हैं।   

प्रसिद्ध भजन गायक स्वर्गीय हरिओम शरण ने एक इंटरव्यू में स्वतंत्र पत्रकार संजय पटेल को बताया था कि उनके मन में जिस आवाज़ को सुन कर भजन गाने की प्रीति लगी वह विद्यानाथ सेठ की आवाज़ थी।  

सेठ को बचपन से ही गाने का शौक था।  स्कूल में वे प्रार्थना का नेतृत्व करते थे।  कॉलेज पूर्व की अंतिम स्कूली क्लास के दौरान स्कूल के हैंड मास्टर साहब ने उन्हें सुझाया कि वे लाहौर में चल रहे गन्धर्व महाविद्यालय में भी भर्ती हो  जाएं।  वहां संगीत की अकादमिक समझ हुई मगर किसी उस्ताद से कभी दीक्षित नहीं हुए। बक़ौल सेठ : जो कुछ सीखा बड़े उस्तादों को सुन कर और उनकी सोहबत से ही सीखा जिन उस्तादों को बार-बार सुन कर सीखा उनमें पंडित ओंकार नाथ ठाकुर और फ़ैयाज़ खान प्रमुख थेठाकुर ग्वालियर घराने के विष्णु दिगंबर पलुस्कर के शिष्य थे और लाहौर गंधर्व महाविद्यालय के प्रिंसिपल रहे जिन्होंने बाद में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में संगीत विभाग की स्थापना की। बड़ौदा के महाराजा सायाजी राव गायकवाड के दरबार के गायक फ़ैयाज़ खान जिन्हेंज्ञान रत्नकी उपाधि प्राप्त थी महफिल के बादशाह कहलाते थे।  शास्त्रीय संगीत के ये दो दिग्गज गाते हुए बोलों को जिस तरह काटते थे वह मुझे बहुत भाती थी।  मैंने  भी उनकी  इस शैली का उपयोग अपने गानों में  किया

प्रसिद्ध संगीतकार फिरोज़ निज़ामी जो तब लाहौर रेडियो स्टेशन में काम करते थे ने उन्हें कुछ सभाओं में सुना तो उनसे बोले रेडियो पर क्यों नहीं गाते?वे बोले रेडियो पर तो मैं किसी को नहीं जानता। निज़ामी कहले लगे मैं जो हूं। इस प्रकार 1938 में सेठ का रेडियो पर पदार्पण हुआ। पहली बार रेडियो पर गाने पर जो थ्रिल उन्हें हुआ होगा वह तब भी बरकरार था जब हम उनसे मिले। उस जमाने में रेडियो पर एक गाने के पांच से सात रुपये मिलते थे। मुझे निज़ामी साहब ने 15 रुपये दिलाये। उन दिनों यह बहुत बड़ी रकम होती थी। अमूमन हर हफ्ते एक गाना रेडियो पर गा लेता था। इस प्रकार महीने में चार गाने हो जाते और मेरी जेब में 60 रुपये आ जाते। अपनी तो रईसी हो गई

लाहौर रेडियो स्टेशन पर उनकी ऐसी ख्याति हुई कि अन्य रेडियो स्टेशनों से उन्हें बुलावे आने लगे। तब टेप रिकॉर्डिंग का युग नहीं आया था। दिल्ली, कलकत्ता, बंबई, लखनऊ और जोधपुर जैसे स्टेशनों की तरंगों पर सवार हो कर उनकी आवाज़ दूर दूर तक पहुंची।  इसी बीच उनके एक परिचित ने उन्हें बुलाया और इंश्योरेंस कंपनी में नौकरी दे दी। बिना कोई एप्लीकेशन दिये मुझे नौकरी मिल गईबाद में यही कंपनी लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया कहलायी। उनकी पत्नी दिल्ली में चिकित्सक थी और यह दंपती यहीं के हो कर रह गए।

ग्रामोफोन कंपनी के लिए उनकी पहली रिकॉर्डिंग भी उसी जमाने में 1938-39 में हुई। रिकॉर्ड पर मेरा पहला गाना थाआवत मोरी गलियन में गिरधारी। इस गाने के संगीतकार थे गुलाम अहमद चिश्ती जिन्हें अब चिश्ती बाबा के नाम से पाकिस्तानी फिल्म संगीत के पितामह के रूप में जाना जाता है। चिश्ती बाबा संगीतकार ख़ैयाम के भी गुरु रहे।

लाहौर के गंधर्व महाविद्यालय में उनके कुछ साथी शास्त्रीय संगीत के बड़े उस्ताद बने जिनमें डी. वी. पलुस्करवो मुझे अपना बड़ा भाई ही मानता था। नेक आदमी था। कमाल का गाता थाबिहार और अमृतसर जैसी कईं जागहों पर हमने साथ-साथ गाया।  

तब के और आज के संगीत में वे क्या फर्क महसूस करते हैं के जवाब में उनका कहना था तब सभी गाने रागों में होते थे। आज जैसे इधर-उधर का धूम-धड़ाका नहीं होता था

अपने जमाने की कुछ यादें साझा करते हुए वे गायक के. एल. सैगल को याद करना नहीं भूलते। हमारे शहर में सैगल की फिल्ममाई सिस्टरलगी। उसमें सैगल का जबर्दस्त मशहूर हुआ गाना थाऐ क़ातिबे तक़दीर मुझे इतना बता देथा। जब पर्दे पर यह गाना फिल्म में आया तब हाल में दर्शकों ने खड़े हो कर तालियां बजाई मानो सैगल खुद सामने स्टेज पर हो। ऐसा किसी सिनेमा हाल में फिर कभी किसी के लिए नहीं हुआ।  

अपनी लंबी उम्र के अंतिम पड़ाव में भी किस भांति वे प्रसन्नचित्त और स्वस्थ रह सके इसका राज़ उन्हों ने अपना एक कवित्त कह कर यों बताया: कड़वी बात कभी न करना/ मेरी बात पे ध्यान तुम धरना/ कोई नहीं सुनेगा, कोई सहेगा/ दुखी रहोगे प्यारे। इस कवित्त के अंत में उन्होंने कहा दुख-दर्द और गम/इस उम्र में न होंगे कम/ये जान ले मेरे प्यारे/ हिम्मत रख, दिल ना तोड़/ चलता चल भगवान सहारे/ वरना बूढ़ा होकर, घर में सो कर वचन सुनोगे खारे
इसी जीवन दर्शन से वे आखरी सांस तक जीवंत बने रहे किसी से कभी कोई शिकायत नहीं की। जो भी जीवन में होता गया उसे वे सहज रूप से लेते गए। आज की पीढ़ी उनके नाम से नावाकिफ है इसका भी उन्हें कोई शिकवा नहीं रहा।  

(यह आलेख दिनांक 14 जुलाई 2015 की जनसत्ता के रविवारी परिशिष्ठ के अंतिम पृष्ट की लीड के रूप में छपा)