Wednesday, December 28, 2011

झगड़े की जड़ 'फिट टू सेल'

राजेंद्र बोड़ा

पत्रकारों का मीडियाकर्मी बनने का सफर बहुत पुराना नहीं है। वैसे ही जैसे प्रेस का मीडिया में तब्दीली का सफर। इक्कीसवीं सदी की दहलीज़ से शुरू हुए इस सफर को बहुत देर नहीं हुई है। लेकिन छोटे से सफर में ही पत्रकारिता और पत्रकारों का बहुत कुछ बदल गया है।

जब तक पत्रकारिता थी तब तक प्रेस थी, तब तक अख़बार थे, तब तक छपे हुए शब्द थे। तब भले ही अख़बार छोटे होते थे परंतु उनके संपादक बहुत बड़े होते थे। अख़बार से 'प्रिन्ट मीडिया' बन गए समाचार पत्र अब बहुत बड़े होने का दावा करने लगे हैं। लाखों में अपनी प्रसार संख्या के बूते पर वे यह दावा दम ठोक कर करते हैं। इस सफर में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने भी धमाकेदार शुरुआत की जिसकी होड़ में प्रिन्ट मीडिया भी पढ़ने के साथ देखने वाला उत्पाद बन गया।

पत्रकारिता जब बाज़ार का उत्पाद बन जाये तब अख़बार और टीवी चैनलों के दर्शक सभी सिर्फ ग्राहक होते हैं जिनकी जरूरत उत्पादनकर्ताओं के लिये केवल मुनाफा कमाने के लिए होती है। मीडिया का संचालन बाज़ार की ताक़तें करने लगे तब अभिव्यक्ति की आज़ादी, लोकतान्त्रिक सिद्धांत, मानवीय अधिकारों की रक्षा और एक खुले और स्वतंत्र समाचार माध्यम की बातें करना बेमानी हो जाता है।

अखबार को कारोबार मानने से समस्या पैदा नहीं हुई बल्कि खबर को कारोबार की वस्तु बना देने से आज की स्थिति पैदा हुई है। पहले भी अखबार कारोबार था मगर उससे मुनाफा कमाना उन्हें निकालने वालों का पहला उद्धेश्य नहीं हुआ करता था। अखबार उनके लिए प्रतिष्ठा की चीज थी। तब केवल दौलत किसी की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ाती थी। मगर पूंजीवाद के आज के युग में ये जीवन मूल्य बादल गए है। आज पैसा ही एकमात्र प्रतिष्ठा की चीज बन गया है। आज की नयी धनाढ्य पीढी जिनके हाथों में अखबारों की नकेलें हैं वे बाजारवाद की उपज हैं जिनके लिए पैसा ही प्रतिष्ठा है, पैसा ही ताकत है. इसे पाने के लिए वे ख़बर का भी सौदा करने को तत्पर रहते हैं।

इन लोगों के लिए ‘न्यूज़’ या ‘समाचार’ भी एक उत्पाद है। इस उत्पाद को तैयार करने और उसके वितरण में उनके हिसाब से बाज़ार के वही सारे आर्थिक सिद्धांत काम करते हैं जो अन्य औद्योगिक माल के उत्पादन पर लागू होते हैं। अमरीका के फेडरल कम्युनिकेशन्स कमीशन के चेयरमैन थे मार्क फ्राद्लर। उनका कहना था "बाज़ार में लोगों की जैसी पसंद होती हैं उसी से मीडिया के कंटेंट निकलते हैं”। इसका अर्थ यह हुआ कि जिस प्रकार बाज़ार में ग्राहक की पसंद के हिसाब से उत्पाद आते हैं वैसे ही मीडिया का कंटेंट (विषय वस्तु) भी आएगा। वे यह भी कहते हैं कि “जनता की रुचियाँ ही जनहित को परिभाषित करेंगी”।

मगर हमें यहाँ यह नहीं भूल जाना चाहिए कि खुले बाज़ार में लुभावनें प्रचारों के जरिये जनता की रुचियाँ बनाई और बिगाडी जाने का खेल बड़े पैमाने पर चलता है।

ऐसी ही बाज़ार की शक्तियों के चलते आज अख़बारों में क्या हो रहा है ? अख़बारों के समाचार कक्षों में एक अच्छी 'कॉपी' (ख़बर) किसे मानते हैं? वह कॉपी जो लालच, बेवकूफी, और षडयंत्र की कहानी कहती हो। संपादकीय कक्षों में माना जाता है कि चटपटी ख़बरों से ही अख़बार को अधिक पाठक मिलेंगे।

कुछ समय पहले जेम्स टी. हेमिल्टन का अध्ययन पुस्तक के रूप में आया। यह अपने प्रकार का दुनिया में पहला अध्ययन है। इसका शीर्षक है 'हाउ द मार्केट ट्रांसफार्म्स इन्फोर्मेशन इन्टू न्यूज़'। हेमिल्टन कहता है: "खबरें बाज़ार की ताकतें बनती हैं और ख़बरों (जिसे बाज़ार की भाषा में इन्फोर्मेशन गुड्स कहते हैं) के स्वरुप का निर्धारण अर्थतंत्र करता है।"

आज तेजी से बढ़ते अखबार अपने संपादकों को सिखा रहे हैं कि वे अपने पाठक को पहचानें। अखबारों के नए नियंताओं की निगाहों में उन पाठकों का कोई मोल नहीं जिनकी जेब में बड़े बाजारों में – मॉल्स - में खर्च करने के लिए अतिरिक्त पैसा नहीं है। संपादकों को यह सिखाया जा रहा है कि आप उन पाठकों को लक्ष्य करें जो रंगीन टीवी, फ्रिज, कारें वगैरा खरीद रहें हों। यदि बाज़ार के ऐसे खरीददार और आपके पाठक एक होंगे तो ही अखबार को बड़े विज्ञापन मिलेंगे। हर साल जब पाठक सर्वे की रिपोर्ट आती है तो अख़बारों में सबसे पहले यही देखा जाता है कि किस अखबार में "हैसियत" वाले पाठकों की संख्या कितनी रही है।

आम चुनाव का मौसम आता है तब भी वह समय होता है जब कईं अखबार ख़बरों के कारोबार में उतर आते हैं। राजनैतिक पार्टियों और उम्मीदवारों से उनके विज्ञापनों का ही सीधा सौदा नहीं होता बल्कि ‘न्यूज़ कालम’ में छपने वाली विज्ञप्तियों को स्थान देने के लिए भी मोल तय किया जाता है। ऐसे सौदों में पार्टियों का हाथ मरोड़ने के लिए ‘ख़बरों’ को ही हथियार बनाया जाता है।
अभी तक आम लोगों का भरोसा अखबार में छपी ख़बरों पर बना हुआ है इसलिए वे उन पर भरोसा कर लेते हैं और उन्हें पता ही नहीं लगता कि चुनावी कवरेज के नाम पर जो छाप रहा है उससे वे ठगे जा रहे हैं।
पत्रकारिता जगत में एक पुरानी कहावत है जो कभी हर पत्रकार की ज़ुबान पर रहती थी: "फेक्ट्स आर सेक्रेड, इंटरप्रेटेशन इज माइन"- तथ्य पवित्र हैं मगर उनकी व्याख्या मेरी है। तब अखबारी दुनिया में कहा जाता था "न्यूज़ देट इज फिट टू प्रिंट"। मगर आज के अखबार शायद कहते हैं "न्यूज़ देट इज फिट तो सेल"।

यह "फिट टू सेल" सारे झगडे की जड़ है। अखबार पाठकों के लिए नहीं बाज़ार के लिए हो चले हैं। बार बार कहा जाता है कि बाज़ार के भी " मूल्य" होते हैं। मगर बाजारों के उतार-चढाव और घोटालों ने बार-बार यही चेताया है कि बाज़ार का कोई मानवीय चेहरा नहीं होता। दिलचस्प बात यह भी है कि मीडिया ने बड़ी-बड़ी चीजें उजागर कीं है मगर बाज़ार की तरफ अपनी खोजी निगाह कभी नहीं की। बाज़ार से उपकृत होते हुए वह कर भी कैसे सकता है।

इन दिनों अख़बारों के ‘कंटेंट’ (विषय वस्तु) संपादक नहीं ‘ब्रांड मेनेजर’ तय करते हैं। वे पत्रकारिता और मनोरंजन के बीच की सीमा रेखा को मिटा दे रहे हैं। ब्रांड मेनेजर अखबारों का कलेवर तय करते हुए बताते हैं कि सुबह-सुबह पाठक अखबार में क्या देखना चाहते हैं। वे संपादक से यह भी अपेक्षा करते हैं कि रोज अखबार में कम से कम एक ऐसी चटपटी खबर अवश्य हो जिसकी शहर में दिन भर चर्चा होती रहे। ख़बरों को चटपटा बनाने के लिए ऐसे मसाले डाले जाते हैं जिनका तथ्यों से कोई लेना-देना न हो। ख़बरों में ऐसी मिलावट की आदतें पत्रकारिता को जन सरोकारों से दूर ले जाती है। अख़बारों के नए नियंताओं ने यह भी साध लिया है कि किस प्रकार पाठकों को ऐसे चटपटे मुद्दों पर भटका कर रखा जाय कि वे असली मुद्दों को बिसरा दें।

पाठकों के बारे में किसी की टिपण्णी है "रीडर इज नॉट अ किंग। ही इज अ नाइस हिप्पोक्रेट (पाठक कोई शहंशाह नहीं है। वह एक अच्छा पाखंडी है)।" मुक्त बाज़ार जो दिशा देता है अखबार उसी पर चलते हुए जो सामग्री परोसता है वह कईं बार खूब रस लेकर पढ़ी जाती है। पाठक एक तरफ तो ऐसी सामग्री मजे लेकर पढता है और वही बाद में यह आलोचना भी करता है कि अखबार में गंभीरता नहीं रही या वह चलताऊ हो गया है।

इतना सब होते हुए भी सब कुछ ख़त्म नहीं हो गया है. अखबार के सामाजिक सरोकारों की पैरवी करने वालों और उन सरोकारों को अभिव्यक्ति देने वाले संपादकों की कमी नहीं है।

पाठकों की भागीदारी या दबाव अखबारों को सही रास्ते पर चलने पर मजबूर कर सकता है। मगर उसके लिए पाठक को भी अपनी भूमिका के बारे में सोचना होगा कि क्या वह एक अच्छे अखबार के लिए उसके वाजिब दाम देकर खरीदने को तैयार है ? यदि वह मुफ्त में या नाम मात्र के दाम पर अखबार चाहता है तो उसे वही मिलेगा जो बाज़ार चाहेगा क्योंकि लागत और बिक्री मूल्य के बीच का अंतर वही भर रहा है।

(यह आलेख प्रेसवाणी के दिसंबर 2011 के अंक में प्रकाशित हुआ)