Wednesday, December 10, 2008

भाजपा के लिए बोझ साबित हुई वसुंधरा राजे


राजेंद्र बोड़ा

राजस्थान विधानसभा चुनावों के नतीजे अनपेक्षित नहीं हैं. किसी को यह अपेक्षा नहीं थी कि चुनाव के नतीजे किसी एक पार्टी के समर्थन या विरोध में लहर के से परिणाम देंगे. भारतीय जनता पार्टी बहुत बुरी तरह से नहीं हारी है तो कांग्रेस भी बहुत शानदार तरीके से नहीं जीत पायी है. मतदाताओं ने बहुत ही समझबूझ से अपने मताधिकार का प्रयोग किया है. उन्होंने हरेक जगह अपने हिसाब से अपने प्रतिनिधियों का चयन किया है और अपने मुद्दे ख़ुद तय किए हैं. सबसे दिलचस्प बात तो यह रही कि अनेक सीटों पर तो ख़ुद प्रत्याशी ही प्रमुख मुद्दे बन गए थे.

लोकतान्त्रिक चुनावों के इतिहास में राजस्थान में यह दूसरा मौका है जब कांग्रेस सत्ता में तो आ रही है मगर 200 सदस्यों की विधानसभा में 96 सीटों पर जीत दर्ज कर पूर्ण बहुमत के जादूई आंकडे से पाँच सीटों से पीछे है. ऐसा ही 1967 के चुनावों में हुआ था जब आजादी के बाद से लगातार सत्ता में रही कांग्रेस पूर्ण बहुमत से पाँच सीटें पीछे रह गयी थी. तब संगठित विपक्ष का दावा राज्यपाल द्वारा नहीं मानने पर राजधानी जयपुर में हिंसक आन्दोलन छिड गया था और पुलिस गोलीबारी में कईं जानें गयीं थी. पूरे 44 दिन के राष्ट्रपति शासन और कुछ विपक्षी विधायकों के कांग्रेस में शामिल हो जाने के बाद ही मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाडिया सरकार बना सके थे. लेकिन इस बार कांग्रेस बहुत ही सुविधाजनक स्थिति में है. जो 26 निर्दलीय तथा अन्य प्रत्याशी जीत कर विधान सभा में पहुंचे हैं उनमें से कईं ख़ुद आगे बढ़कर समर्थन का प्रस्ताव कर रहे हैं. जिस प्रकार का जनादेश जनता ने दिया है उसको चुनौती देने की हालत में भारतीय जनता पार्टी नहीं है और उसने तथा मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने मतदाताओं के फैसले को स्वीकार कर लिया है.

मतदाताओं ने इन चुनावों में जिस प्रकार अपने विवेक से जनादेश दिया है वह सामंती पृष्ठभूमि वाले इस प्रदेश में लोकतंत्र की मजबूती का संकेत है. चुनावी नतीजे स्पस्ट तौर पर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के राजसी स्वभाव को अस्वीकार करने वाले हैं. राजे ने ये चुनाव पूरी तरह अपने पाँच साल के काम और अपनी करिश्माई छवि के आधार पर लड़ा था. उनकी व्यवस्थाओं में भारतीय जनता पार्टी संगठन का वैसा ही मामूली स्थान चुनावों में भी रहा जैसा उनके पूरे शासन काल में था. इसी कारण चुनावी नतीजों पर पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं में संतोष का भाव ही नज़र आता है. राजे राजस्थान की पहली मुख्यमंत्री थीं जो उच्च वर्ग - शाही परिवार- से आयीं थी. अब तक यहाँ मध्यम वर्ग से ही मुख्यमंत्री बनते आए है. उन्होंने अपना शासन कारपोरेट तर्ज पर चलाया और पूँजी जगत के प्रमुखों को हर जगह तरजीह दी. वे शायद इसी दुनिया में अपने को सहज पाती थी इसीलिए पार्टी संगठन से उनका संबंध असहज रहा. पूँजी जगत के दिग्गजों से नजदीकियों के चलते उन पर और उनकी सरकार पर भ्रस्टाचार के तथा अपने करीबियों को मदद पहुचाने के आरोप लगते रहे मगर वे हमेशा अपनी ठसक में उन्हें नज़रअंदाज करती रहीं. अशोक गहलोत अकेले नेता रहे जिन्होंने राजे को इसी मुद्दे पर पूरी तरह घेरा और चुनाव में उन्हें
पटखनी दी. गहलोत के पिछले कार्यकाल की बात राजे ने की तो मतदाताओं ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया.

ख़ुद अपनी मुख्यमंत्री से भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता और नेता कितने असहज थे इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पूरे चुनाव प्रचार के दौरान वे ही सबसे अधिक संशय में नज़र आ रहे थे. दिल्ली से आए भाजपा नेता जानते थे कि राजे सरकार पर भ्रस्टाचार के आरोपों का वे जवाब नही दे सकते हैं इसलिए उन्होंने आर्थिक मंदी और आतंकवाद पर केन्द्र की कांग्रेस सरकार नरमी को चुनावी मुद्दा बनाने की भरसक कोशिश की. चुनाव प्रचार के अन्तिम चरण में मुंबई में आतंकी हमलों ने भाजपा नेताओं के चेहरों को खिला दिया. मगर राजस्थान के मतदाताओं ने इन मुद्दों पर नज़र ही नही डाली.

राज्य के मतदाताओं की परिपक्वता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बावजूद जातिवाद की जटिलताओं के उन्होंने भाजपा और कांग्रेस दोनों के दिग्गजों को ठिकाने लगा दिया. विधानसभा अध्यक्ष के अलावा राजे मंत्रिमंडल के 13 सदस्यों तथा छः बोर्डों और निगमों के अध्यक्षों को उन्होंने समर्थन देने से इनकार कर दिया. इसी प्रकार कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष, दो पूर्व प्रदेश अध्यक्षों और आधा दर्जन से अधिक नेताओं को भी मतदाताओं ने नकार दिया. दल बदलुओं को भी इन चुनावों में शर्मनाक पराजय का सामना करना पड़ा भले ही वे भाजपा छोड़ कर कांग्रेस के टिकट पर मैदान में थे या कांग्रेस छोड़ कर भाजपा के प्रत्याशी के रूप में चुनावी जंग में उतरे थे.

अशोक गहलोत एक सोची समझी रणनीति के तहत पिछले एक साल में जिस तरह परिवर्तन की बयार लाने के लिए पूरे प्रदेश में घूम रहे थे वह रंग लाई और चुनाव आने तक वे कांग्रेस संगठन को एकजुट करने में सफल रहे. यदि गहलोत का अंदरूनी तौर पर विरोध नही होता तो कांग्रेस की झोली और बड़ी होती जिसे भरने को मतदाता तैयार थे. कांग्रेस को एक ऐसी धुरी की
जरूरत थी जिसके गिर्द कार्यकर्ता काम कर सकें. अशोक गहलोत ने आगे बढ़कर यह रिक्त स्थान भरा जिससे उनकी पार्टी शासन में आने का सफर तय कर सकी. चुनाव के नतीजे यह भी बताते हैं कि अपने रुतबे से कोई समझौता नहीं करने वाली मजबूत मुख्यमंत्री भारतीय जनता पार्टी के लिए बोझ साबित हुई.

चुनावी नतीजे यह भी संकेत देते हैं कि जाट और मीणाओं के अलावा अन्य जातियाँ भी अब अपना राजनैतिक हक़ माग रही है. बड़ी पार्टियों का वैचारिक आधार पर कमजोर होने से भी जातियों के नए समीकरण बन रहे हैं. राजे ने अपने तरीके से सोशल इंजीनियरिंग करके अपना और अपनी पार्टी का राजनैतिक आधार बढाने का प्रयास किया वही उनके लिए उल्टा पड़ा. वे दक्ष प्रशाशक के रूप में ऐसी उभरी कि उच्च स्टार की सारी प्रशासनिक मशीनरी उनके खिलाफ हो गयी. राजे की हार का जश्न ऊंचे पदों पर बैठे उन भारतीय प्रशासनिक अधिकारियों ने मनाया जिन्हें राजे मौके बेमौके सार्वजनिक रूप से डपटती रहीं.

भारतीय जनता पार्टी की पराजय किसी एक क्षेत्र में नही है. उसकी सीटें राजस्थान के हर संभाग में कम हुईं हैं. कांग्रेस ने 40 सीटें बधाई है तो भाजपा ने 42 सीटें खोई हैं. बहुजन समाज पार्टी ने अपना वजूद बढाया है तो बागी लोगों ने भी अपने तेवर इन चुनावों में दिखाए हैं. सबसे अधिक 50 सीटों वाले जयपुर संभाग में कांग्रेस ने 20 तो भाजपा ने 19 सीटें हासिल की है. जोधपुर संभाग में 33 सीटें है जिनमें से कांग्रेस ने 15 और भाजपा ने 16 सीटें जीती हैं. बीकानेर संभाग की 24 में से दोनों पार्टियाँ दस दस सीटें ले सकीं हैं. भाजपा को उदयपुर में सबसे अधिक नुकसान हुआ है जहाँ कांग्रेस 28 में से 20 सीटें लेने में सफल रही है जबकि भाजपा छः पर सिमट गयी. कोटा की 17 में से दस कांग्रेस के खाते में गयी जबकि सात भाजपा
को गयी. केवल भरतपुर संभाग में कांग्रेस को 19 में से पाँच सीते मिली जबकि भाजपा दस सीटें ले गयी. अजमेर संभाग में 29 में से 15 सीटें कांग्रेस को और 11 सीटें भाजपा को मिली.

चुनावों में मतदाताओं ने कांग्रेस को राज तो सौपा है मगर उसके सामने एक शशक्त विपक्ष भी खड़ा करदिया है. यह लोकतंत्र की मजबूती ही कहा जायेगा.

(जनसत्ता के दिनांक 11 दिसम्बर 2008 के अंक में प्रकाशित)

Saturday, November 29, 2008

राजस्थान : चुनाव 2008

राजेंद्र बोड़ा

इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में राजस्थान के लोग एक बार फिर शासन की बागडोर सौपने के लिए अपने नए प्रतिनिधियों का चुनाव चार दिसम्बर को करने जा रहे हैं. नई सदी में हुए विधानसभा के पहले चुनावों में राज्य के मतदाताओं ने दो तिहाई बहुमत के बल पर अशोक गहलोत के नेतृत्व में शासन कर रही कांग्रेस को बुरी तरह नकारते हुए दिल्ली से राजस्थान भेजी गई भारतीय जनता पार्टी की वसुंधरा राजे के सर पर जीत का सेहरा बाँधा था. मरू प्रदेश में यह पहली बार हुआ जब भारतीय जनता पार्टी यहाँ अपने बूते पर पूर्ण बहुमत पाने में सफल रही. इससे पहले दो बार यह पार्टी भैरोंसिंह शेखावत
के नेतृत्व में सत्ता में रही मगर तब उसे पूर्ण बहुमत नहीं था और उसे अन्य पार्टियों तथा निर्दलियों के समर्थन से राज चलाना पड़ा.

पाँच वर्ष बाद भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस सत्ता में आने के लिए जनता का मत हासिल करने के वास्ते फ़िर आमने सामने हैं. सन् 2008 के विधानसभा चुनावों की सन् 2003 के चुनावों से अनोखी समानता है. पिछली बार अशोक गहलोत अपने "शानदार" और "सफल" कार्यकाल का झंडा लिए दम ख़म के साथ मैदान में थे और उन्हें जीत का हिमालय जितना बड़ा विश्वास था. यदि कोई उनसे मतदाताओं में फैली नारजगी का जरा भी संकेत देता तो वे उसे पत्रकारों की सनक कह
कर खारिज कर देते थे. इस बार वसुंधरा राजे उसी तर्ज पर अपने पाँच सालों के "शानदार" और "सफल" कार्यकाल की दुदुम्भी बजा रहीं हैं. पिछली बार चुनाव आचार संहिता लागू होने तक गहलोत सरकार के "जनहित के कामों का ब्यौरा देते हुए सरकारी विज्ञापनों से अखबारों के पन्ने भरे रहते थे तो इस बार वसुंधरा सरकार की उपलब्धियों को गिनाते हुए सरकारी विज्ञापनों से अखबारों के पन्ने रंगे रहे हैं.

आज कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों दलों में एक समानता और है. दोनों प्रमुख प्रतिस्पर्धी पार्टियों में ऐसा एकछत्र नेतृत्व है जो सर्वमान्य तो कत्तई नहीं है पर इन दोनों दलों में इन नेताओं का कोई विकल्प भी नहीं है. अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे दोनों का अपनी अपनी पार्टी में ऐसा वर्चस्व बना हुआ है कि वहां दूसरे नम्बर से लगा कर दस नम्बर तक का नेता ढूंढे नहीं मिलता. भारतीय जनता पार्टी की राज्य में हालत यह है कि यहाँ पार्टी संगठन का मुखिया कौन होता है वह वसुंधरा राजे के रुख पर निर्भर करता है. इसी प्रकार कांग्रेस में भी अशोक गहलोत को भले ही उनके विरोधी, खास कर प्रभावी जाट लॉबी, सर्वमान्य नेता नहीं मानते हों मगर राज्य स्तर पर उनकी काट का कोई नेता लंबे इतिहास वाली इस पार्टी में नहीं बचा है और कांग्रेस के आंतरिक ढांचे और दिल्ली के नेताओं पर उनका कुछ ऐसा जादू चला हुआ है कि राज्य में संगठन का मुखिया उनकी मर्जी से ही बनता है.

पिछले पाँच सालों में राज्य में दोनों पार्टियों में उनके संगठन के मुखिया बार-बार बदले गए है और साफ़ तौर से गहलोत और राजे की मर्जी ही सम्बंधित दलों में चली है. दोनों अपने यहाँ अपने आप को धुरंधर समझने वालों को कोने में बिठाने में सफल रहे है. ऐसी परिस्थिति में विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं. ऐसे में स्वाभाविक तौर पर चुनावी प्रचार की डोर इन दो नेताओं के हाथ में ही है जो युवा अवस्था से अधेड़ अवस्था की देहलीज में दाखिल हो चुके हैं.

इन चुनावों में कई नई चीजें भी हो रही है. गहलोत सरकार में शिक्षा मंत्री रहे शैलेन्द्र जोशी जैसे घोर कांग्रेस में रमे लोग भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर उम्मीदवार बने हुए हैं तो भगवा गमछा गले में डाले प्रताप सिंह खाचारियावास जैसे लोग जो कभी भाजपा के दफ्तर में कांग्रेस को कोसते नहीं अघाते थे वे पंजे के निशान को थामे कांग्रेस के लिए चुनाव लड़ रहे हैं.
बीजेपी में परिवार सहित सत्ता सुख भोगने वाले विश्वेन्द्र सिंह जैसे लोग भी कांग्रेस परचम के नीचे चुनावी जंग में मौजूद हैं. दो विपरीत विचारधाराओं वाली पार्टियों में सत्ता में आने के प्रयासों का यह खेल अनोखा है. पिछली सदी के नब्बे का दशक आते हालत ऐसे बदले कि दुनिया एक ध्रुवीय हो गई और पूंजीवाद का कोई विकल्प नही रहा तब भारत में भी विचारधाराएँ अपना अर्थ खोने लगीं. अब जब सभी राजनैतिक पार्टियाँ सिर्फ़ सत्ता में आने और उससे लाभ उठाने वालों का जमावडा बन कर रह गई हैं विचारधाराएं तिरोहित हो गयीं है तब कौन कहाँ जा रहा है यह कोई मायने नहीं रखता.

अब जब मतदान के चंद दिन ही रह गएँ हैं यदि हम चुनावी परिदृश्य पर नज़र डालें तो पाते हैं कि प्रचार में आम आदमी के सरोकारों की गूँज किसी भी तरफ़ नहीं है. कांग्रेस अति उत्साह में है कि पाँच साल पहले मतदाताओं ने जैसा सलूक उसके साथ किया था वैसा ही सलूक इस बार वे भाजपा के साथ करेंगे. उधर भारतीय जनता पार्टी पूरी तरह मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के करिश्माई व्यक्तित्व के बल बूते पर चुनावी वैतरणी पार करना चाहती है. कांग्रेस के चुनाव संचालकों ने यह तो शुरू से ही समझ लिया था कि वसुंधरा राजे के करिश्मे की चमक बरक़रार है. भले ही राजे के मंत्रिपरिषद के सदस्यों की साख धूल में मिली हुई है मगर राजे का जनता पर अपना जादू बरक़रार है. उन्होंने यह भी जान लिया कि विकास के कामों पर राजे का कार्यकाल गहलोत के शासन पर बहुत अधिक भारी पड़ेगा इसीलिए चुनाव प्रचार के पहले दिन से ही कांग्रेस भ्रष्टाचार के आरोपों का हथियार बना कर राजे की छवि को तोड़ने का प्रयास करने लगी. इसका जवाब भाजपा के पास स्वाभाविक तौर पर यही था कि वह मतदाताओं को गहलोत सरकार के वे दिन याद दिलाये जिसमे सरकारी नौकरियों पर उसके पूरे कार्यकाल तक पाबंदी रही, राज्य कर्मचारियों के भत्ते और सुविधाएँ रोक दीं गयीं और किसानों को बिजली का जबरदस्त अभाव रहा. गहलोत द्वारा अपने मुख्यमंत्री काल में हर समय पैसे की कमी होने की शिकायत करते रहने को भी भाजपा ने कांग्रेस के खिलाफ हथियार बनाया. इसके साथ ही भाजपा के चुनाव संचालकों ने केन्द्र की कांग्रेस सरकार को भी निशाना बनाया खासकर मौजूदा आर्थिक मंदी और आतंकवाद से निबटने में उसकी असफलता को.

इसे दैवयोग कहें या क्या कहें कि गहलोत सरकार के कार्यकाल में मरुप्रदेश को बहुत बुरे अकालों का सामना करना पड़ा मगर राजे सरकार के पिछले पाँच साल के दौरान मानसून अमूमन बेहतर रहा जिससे गावों में सामान्य तौर पर खुशहाली रही. सड़क, पानी और बिजली के मामले में अच्छा काम हुआ और केन्द्र की रोज़गार गारंटी योजना का राजे सरकार ने भरपूर फायदा उठाया और लोगों को काम दिया. यह भी सच है कि इस योजना के क्रियान्वयन में बहुत बड़ी गडबडी की शिकायत कहीं से नही मिली. मगर राजे मंत्रिपरिषद के सदस्य हमेशा ही भ्रस्टाचार के आरोपों से घिरे रहे. इस पूरे कार्यकाल में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं और मंत्रियों तथा राजे के बीच हमेशा कशमकश चलती रही मगर कोई भी राजे को खुल कर चुनौती नहीं दे सका. लेकिन इससे लोगों की नज़र में सरकार की छवि गिरती गई. उधर कांग्रेस की चुनावी हार के बाद अशोक गहलोत चतुराई से विपक्ष के नेता की भूमिका से दूर रहे. न तो उन्होंने विधान सभा में विपक्ष का नेतृत्व करना पसंद किया और न संगठन को सँभालने का. नए चुनाव आने तक वे ख़ुद दूर दूर रहे और दूर से ही संगठन और विधायक दल के नेता चुनने की गणित बिठाते रहे और जब नई चुनावी जंग शुरू होने का अवसर पास आने आने लगा तो वे कूद कर आगे आ गए.
जिस प्रकार गहलोत ने अपने आप को कांग्रेस के लिए अपरिहार्य बना लिया है वैसे ही वसुंधरा राजे भी भाजपा के लिए अपरिहार्य है.

राजस्थान आज जिस तरह की जाति आधारित चुनावी राजनीति में उलझ गया है वह इस प्रदेश के लिए एक नया अनुभव है. जातियों का यह खेल पिछले चुनावों के दौरान जाटों को अन्य पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में लाकर भाजपा ने शुरू किया. यह एक ऐसा जिन्न साबित हुआ जिसने हर जाति को आरक्षण के लिए राजनैतिक दबाव बनाने के लिए लामबंद होने की हूक जगा दी. इसका हिंसात्मक रूप विराट गुर्जर आन्दोलन के रूप में सामने आया. हांलाकि गुर्जर आन्दोलन का नेतृत्व बाद में
छिन्न-भिन्न हो गया मगर उसने जातियों के बीच वैमनस्य जरूर पैदा कर दिया जिसके दुष्परिणाम दूर तक भुगतने पड़ सकते हैं.

ऐसी स्थिति में हो रहे चुनावों में कोई भी पार्टी राज्य के लोगों के सरोकारों को मुद्दा बनाने से कतरा रही है. चुनाव प्रचार जब शुरू हुआ तो लगता था कही कोई मुद्दा ही नही है. फ़िर कांग्रेस भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर वसुंधरा राजे को घेरने लगी तो भाजपा नेता आतंकवाद और आर्थिक मंदी से निपटने में केन्द्र अर्कार की असफलता का मुद्दा बनाने की चेष्टा करने लगे. 28 नवम्बर को मुंबई में हुए अबतक के सबसे बड़े आतंकी हमले ने भाजपा के चुनाव संचालकों में मानो जान फूंक दी. उनके चेहरे खिल गए. अब वे आतंक के खिलाफ लोगों के गुस्से को कांग्रेस के खिलाफ और अपने पक्ष में करने में जुट गए है. आतंकवाद के खिलाफ नर्म रुख अपनाने के कांग्रेस के खिलाफ उनके आरोप को नै धार मिल गई है. बिना कोई वक्त गवांये भाजपा ने राज्य के 200 विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों में आतंकवाद के खिलाफ 28 नवम्बर को प्रदर्शन किए. हालाँकि मुंबई में आतंकी हमलों के बाद अपनी पहली प्रतिक्रिया में भाजपा के शीर्ष नेताओं ने वक्तव्य दिए कि चुनौती की इस घड़ी में वे सरकार के साथ हैं और इस पर कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए. मगर 48 घंटों में ही कांग्रेस को पीटने के लिए वे आतंकवाद को छड़ी
बना ले गए क्यों कि यह चुनाव जीतने और हारने का सवाल है. भाजपा के नेता इस बात पर भी खुश हैं कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लोग और ख़ुद उनके कार्यकर्ता जो चुनावी अभियान से बेरुखे मन से ही जुड़ रहे थे आतंकवाद का भावनात्मक मुद्दा आ जाने से उनमे उत्साह की लहर आ जायेगी.

भारतीय जनता पार्टी ने अपना घोषणापत्र मतदान के ठीक पाँच दिन पहले जारी किया है जिसमें अति गरीबों को दो रुपये किलो और अन्य गरीबों को पांच रुपये किलो गेहूं देने, किसानों का लगन माफ़ करने और उन्हें सस्ती बिजली देने और बालिका के जन्म पर उसके खाते में इतनी एकमुश्त रकम जमा कराने जिससे कि जब वह बीस बरस की हो तब उसे 50 हजार रुपये मिल जाय जैसी लोक लुभावनी बातें की गयी हैं. ऐसे वादों का घोषणापत्र मतदान के एक हफ्ते से भी कम समय पहले जारी करने के पीछे भाजपा की यही रणनीति रही है की लोग जब वोट देने जाएँ तब तक ये घोषणाएं उनके मस्तिष्क में दर्ज रहे.

राजनीति के समीक्षक शुरू से कह रहे हैं कि चार दिसम्बर को होने वाले चुनाव में सारा दारोमदार इस बात पर रहेगा कि कांग्रेस की झोली कितनी बड़ी है. अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस मतदाताओं में कितना भरोसा पैदा कर सकती है. मगर कांग्रेस के आला नेता यह भी जानते हैं कि जाटों में गहलोत के प्रति नफरत कम नहीं हुई है. गहलोत ने वरिष्ठ नेता परसराम मदेरणा को लाँघ कर मुख्य मंत्री पद हासिल कर लिया था उसके लिए वे अब भी उन्हें माफ़ करने को तैयार नहीं है.
इसीलिए कांग्रेस गहलोत को नेता के रूप में प्रतिष्ठित कर चुनाव प्रचार में नही उतरी है. मगर गहलोत के आलावा अन्य किसी को नेता के रूप में प्रोजेक्ट करके गहलोत को दरकिनार करने की हालत में भी कांग्रेस नहीं है. ऐसे दिलचस्प हालत में राजस्थान के मतदाता का रुख क्या रहेगा इसका जवाब आज किसी के पास नहीं है. दोनों प्रमुख प्रतिद्वंद्वी दलों ने अमूमन जातियों के समीकरण सामने रख कर ही अपने अपने प्रत्याशियों का चयन किया है. चुनाव में सीधी और बड़ी जीत मिल जायेगी इसके प्रति कोई दल आश्वस्त नहीं है. कांग्रेस को सत्ता विरोधी रुझान का आसरा है तो भाजपा को राजे के करिश्माई
व्यक्तित्व पर भरोसा है जो ख़ास कर महिलाओं को आकर्षित करता है. अशोक गहलोत की राजनैतिक चतुराई और राजे की दबंगता के बीच भी मुकाबला है. दोनों चुनाव प्रचार के लिए राज्य के कोने कोने में जा रहे हैं. किसका परचम आठ दिसम्बर को वोटिंग मशीनों से निकलता है यह देखना दिलचस्प होगा. इसमे चार दिसम्बर को मतदान के दिन का पार्टी प्रबंधन किसी के लिए भी निर्णायक सिद्ध हो सकता है.
(जनसत्ता में दिनांक 1.12.2008 को मुख पृष्ठ पर प्रकाशित)

Tuesday, September 16, 2008

हसरत जयपुरी को कैसे भुला सकते हैं


राजेंद्र बोड़ा

जिसे सारे हिंदुस्तान ने गुनगुनाया उसे राजस्थान ही क्यों ख़ुद उसके शहर जयपुर ने भुला दिया. किसी को याद भी नहीं कि आज उम्दा शायर हसरत जयपुरी की पुण्य तिथि है. अपने सरल और शोख़ गीतों से लाखों करोड़ों की जुबान पर चढ़ जाने वाले इस मकबूल शायर ने अपने शहर के नाम को अपनी पहचान बनाए रखा और गुलाबी नगरी का नाम रोशन किया मगर उनके घर वालों ने ही उन्हें भुला दिया. फ़िल्म संगीत के शौकीनों से पूछें तो कोई बताता है कि राजधानी के 'चार दरवाजा' इलाके में 15 अप्रेल 1922 को जन्मे इस आशिकाना शायर के नाम से, १९९९ में उसके निधन के बाद एक रास्ते का नामकरण जरूर हुआ था मगर अब उसे बताने वाला ही कोई नहीं मिलता .

दूर गुजरात के जामनगर में जयपुर की इस प्रतिभा की याद में हर साल इस दिन उनके मुरीद शानदार संगीतमय कार्यक्रम करते हैं जिसमें गुजरात के कोने-कोने से ही नहीं देश भर से रसिक जुटते हैं, इस शायर के गीत गाते हैं और उनकी यादों में खो जाते हैं. मगर हसरत के अपने शहर और प्रदेश में कोई उनके लिए कंदील भी नहीं जलाता. हम मौके-बे-मौके बड़े जलसे करते हैं बाहर के लोगों को बुलाते है, उन्हें सिर पर चढाते हैं लेकिन हम अपने ही लोगों को बिसरा देते हैं.

नाम तो हसरत साहब का उनके बड़े बुजुर्गों ने इकबाल हुसैन रखा था लेकिन 20 की उम्र में एक खामोश इश्क में ऐसे पड़े कि शायरी की सीढियां चढ़ने लगे. उसी कमसिन उम्र में उन्हें अपने पड़ोस में रहने वाली एक लड़की राधा से प्यार हो गया. वे उससे अपने प्यार का सीधे इजहार तो नहीं कर सके मगर उसे एक कविता लिख कर जरूर भेज दी जिसमे उन्होंने अपनी भावनाओं को कुछ यूँ व्यक्त किया 'ये मेरा प्रेम पत्र पढ़ कर के तुम नाराज़ ना होना' . बाद में यही पंक्तियाँ सन् 1964 में शंकर जयकिशन की धुन में बंध कर फ़िल्म 'संगम' का सर्वकालीन लोकप्रिय गीत बनी. यह तो हसरत साहब को भी कभी पता नही चल पाया कि उनका यह प्रेम पत्र राधा तक पंहुचा या नहीं मगर ‘संगम’ से अब तक उनका यह गीत देश भर के नौजवानों के लिए मंत्र बना हुआ है.

यह उम्दा शायर जिसे लोग ‘अनादि यथार्थवादी’ (eternal realist) कहते हैं सन् 1939 तक जयपुर की गलियों में ही रमा रहा. शुरुआती मध्यम दर्जे तक की पढ़ाई अंग्रेजी माध्यम से पूरी की. अपने दादा फ़िदा हुसैन से उन्होंने उर्दू और फ़ारसी की तालीम पाई और 20 की उम्र तक पहुचते शेर कहना शुरू कर दिया. सन् १९४० में वे बम्बई पहुंचे जहाँ रोजी रोटी के लिए बस कंडक्टर बन गए. रोटी के इस जुगाड़ के साथ वे मुशायरों में भी शामिल होने लगे और दाद पाने लगे. ऐसे ही किसी एक मुशायरे में उन्हें पृथ्वीराज कपूर ने सुना और हसरत की सिफारिश अपने बेटे राज कपूर से की जो उन दिनों ‘बरसात’ बनाने की योजना बना रहे थे. रॉयल ऑपेरा हाउस में जहाँ पृथ्वीराज जी नाटक मंचित किया करते थे एक दिन राजकपूर, शंकर, जयकिशन और हसरत की मुलाकात हुई. बात बन गयी और ‘बरसात’ फ़िल्म के लिए हसरत ने अपना पहला फिल्मी गीत लिखा. संगीतकार शंकर-जयकिशन की जोड़ी की यह पहली फ़िल्म थी. इस ग्रुप में एक नाम और जुडा शैलेन्द्र का. राजकपूर, शंकर ,जयकिशन , हसरत जयपुरी और शैलेन्द्र की जो जोड़ी बनी वह दशकों तक धूम मचाती रही. शंकर ने अपने डमी शब्दों पर एक धुन बना राखी थी 'अम्बुआ का पेड़ है/ गोरी मुंडेर है/आजा मोरे बालमा/ अब काहे की देर है. इसी पर हसरत ने अपना पहला फिल्मी गाना लिखा जिया बेकरार है/ छाई बहार है/ आजा मोरे बालमा/ तेरा इंतज़ार है.

अपने चालीस साल लंबे फिल्मी सफर के दौरान हसरत ने राजकपूर कैंप के बाहर भी खूब गाने लिखे. सबसे बड़ी बात यह है कि उन्होंने कभी छोटी या बड़ी फिल्मों में फर्क नहीं किया. उन्होंने बिल्कुल अनजान संगीतकारों के लिए भी ऐसे-ऐसे गाने लिखे जिन्हें आज भी उसी शिद्दत से लोग गुनगुनाते हैं जिस शिद्दत से दो या तीन दशक पहले उन्हें गुनगुनाते थे. उन्होंने सज्जाद हुसैन से लगा कर वर्तमान के आनंद मिलिंद, जतिन-ललित और नदीम-श्रवण जैसे संगीतकारों के लिए गीत लिखे जो अपने आप में एक रिकार्ड है.

अपने लंबे फिल्मी करियर में हसरत ने करीब 350 फिल्मों में गीत लिखे. उनके रिकॉर्ड किए गानों की फेहरिस्त लगभग 2000की बनती है. उन्हें हिंदुस्तान, पाकिस्तान और उन मुल्कों में जहाँ हिन्दी फिल्मी गानों के रसिया रहते हैं श्रोताओं का अपार प्यार मिला. उन्हें सम्मान और पुरस्कार भी ढेर सारे मिले. साल के सर्वश्रेष्ठ गानों की फ़िल्मफेयर ट्राफी दो बार मिली. पहली 1964 में फ़िल्म 'सूरज' के गाने 'बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है' के लिए जो हर बारात में आज भी आवश्यक रूप से बजाया जाता है. दूसरी 1972 में फ़िल्म 'अंदाज' फ़िल्म के गाने 'ज़िन्दगी एक सफर है सुहाना यहाँ कल क्या हो किसने जाना के लिए. इसी प्रकार फ़िल्म 'मेरे हुज़ूर' के गीत 'झनक झनक तोरी बाजे पायलिया' के लिए उन्हें ‘डॉक्टर आंबेडकर पुरस्कार’ से नवाजा गया. उर्दू कांफ्रेंस ने उन्हें जोश मलीहाबादी पुरस्कार देकर उनके उर्दू अदब में योगदान को रेखांकित किया गया. वर्ल्ड यूनिवर्सिटी राउंड टेबल ने उन्हें डाक्टरेट की उपाधि देकर सम्मान किया.

फिल्मों के अलावा उर्दू शायरी में भी वे अपना महत्व बनाये रहे. उनकी शायरी के संग्रहों में प्रमुख है ‘आबशार-ए-ग़ज़ल’ .

उनकी गैर फिल्मी ग़ज़लें भी वैसी ही रोमेंटिक है जिसके लिए वे फिल्मों में मशहूर थे. जैसे 'वो अपने चेहरे में सौ आफताब रखते हैं/ इसलिए तो वो रुख पे नकाब रखते हैं' , या फ़िर 'इस तरह हर गम भुलाया कीजिये/ रोज मैखाने में आया कीजिये', और ‘शोले ही सही आग लगाने के लिए आ/ फ़िर तूर (पर्वत) के मंजर को दिखने के लिए आ’.

इस शायर को अपने पर पूरा यकीन था इसीलिए जहाँ फ़िल्म के लिए लिखा 'तुम मुझे यूँ भुला न पाओगे/ जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे संग संग तुम भी गुनगुनाओगे'. वहीं अदबी शायरी में कहा 'हमने वो नक्श छोडे हैं/ कि मेरे जाने के बाद भी/ लोग मुझे याद रखेंगे'. सही कहा हसरत साहब ने. कैसे भुलाये जा सकते हैं हसरत जयपुरी.

(यह लेख दैनिक भास्कर के राजस्थान संस्करणों में 17 सितम्बर 2008 को छपा)

Thursday, August 28, 2008

सिने मायावी आई. एम. कुन्नू


राजेंद्र बोड़ा

राजस्थान की प्रतिभाओं ने हर क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई है, अपनी धाक जमाई है और कीर्तिमान कायम किए हैं. मगर हमें उनका मोल करना नहीं आता. शासन और समाज दोनों इस प्रदेश की अपनी कई विभूतियों से विरक्त नज़र आते है. लगता है उन्हें अपने ही गुणीजनों की पहचान नहीं है या जानकारी नहीं है. ऐसी ही एक शक्सियत है आई. एम. कुन्नू जो अपने फन के माहिर है मगर उनको उनके घर-प्रदेश के लोग ही नहीं जानते. टोंक के निवासी कुन्नू ने साठ सालों तक मुंबई में इतनी हिन्दी, गुजरती और राजस्थानी फिल्मों का संपादन किया है कि उनका नाम शीघ्र ही गिनीज बुक आव रेकॉर्ड्स में शामिल होने वाला है. मुंबई की फ़िल्म एडिटर्स असोसिएशन अपने इस पूर्व अध्यक्ष के काम की सारी जानकारी एकत्र कर फ़िल्म एडिटिंग का विश्व कीर्तिमान उनके नाम कराने का उद्यम कर रही है. कुन्नू विश्व के एकमात्र ऐसे फ़िल्म संपादक हैं जिन्होंने पाँच सौ से अधिक फिल्मों को अपने संपादन से संवारा. इनमें आठ विदेशी फिल्में भी शामिल है.

अपनी उम्र के अन्तिम पड़ाव में कुन्नू जिन्हें फिल्मी दुनिया में सभी लोग इज्ज़त और प्यार से 'दादा' कहते हैं अब फिल्मों से सन्यास लेकर अपने घर टोंक लौट आए हैं. मगर राजस्थान के लोग ही उनसे नावाकिफ है.

साठ साल पहले बम्बई जाने वाली भीड़ अधिकतर अभिनेता बनने का सपना लिए हुए होती थी तब कुन्नू ने फ़िल्म एडिटर बनने का फ़ैसला किया. उनके भाई ए. करीम फ़िल्म निर्देशक थे जिन्होंने कुन्नू को अपना सहायक बना लिया. यह १९४३ की बात है. कुन्नू ने देखा कि ऐक्टर तो निर्देशक के इशारों पर काम करता है और निर्देशक जो शूट करता है उसे एडिटर संजोता है, ठीक करता है तो उन्होंने एडिटर बनने की ठानी.

फिल्मों की जब बात की जाती है तो उसके बाकी सभी पक्षों की तो चर्चा होती है मगर एडिटिंग की कला आर कोई बात नहीं करता. फ़िल्म संपादन एक ऐसी कला है जिसे समझ पाने में दर्शक मुश्किल पाता है. हांलाकि सभी जानते हैं कि जब भी फ़िल्म में एक दृश्य से दूसरा दृश्य आता है वह एडिटिंग ही होती है. मगर संपादक का काम केवल दृश्यों को जोड़ना भर नहीं होता. संपादक पूरी फ़िल्म को उसकी रिदम देता है उसे फ्लो देता है. मगर आम दर्शक ही क्यों फ़िल्म समीक्षक भी उसके योगदान को रेखांकित नहीं कर पाते. यह एक तकनीकी विधा है जिस पर सारी फ़िल्म का दारोमदार होता है. स्क्रिप्ट राइटर, फोटोग्राफर और निर्देशक जो कुछ प्रस्तुत करना चाहते हैं वह प्रस्तुतीकरण फ़िल्म एडिटर ही अपने कौशल से करता है. यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इसी माध्यम से फ़िल्म अपनी बात कहने के काबिल बनती है. सेलुलोइड की भाषा को एडिटिंग परिष्कृत करती है. मगर यह बड़ा कठिन काम है. कहानीकार और निर्देशक की जो कल्पना है संपादक ही उसे अन्तिम रूप में साकार करता है और उनकी कल्पना के अनुरूप उसे स्वरुप देता है.
कुन्नू ने मुंबई की फिल्मों की माया नगरी में काम किया मगर कभी किसीके सामने कभी झुके नहीं. अपनी शर्तों पर ईमानदारी से काम किया. यह आज की पीढी को अनोखी बात लग सकती है कि उन्होंने कोई फ़िल्म ले ली तो उसके बाद उन्हें पैसा मिले या नहीं इसकी कभी परवाह नहीं की. अपना काम पूरा करके ही उन्हें तसल्ली मिलती थी. वे कहते हैं " मैंने कभी यह नहीं देखा कि प्रोड्यूसर या डायरेक्टर छोटा है या बड़ा. मैं उसके काम को देखता था. मेरी कोशिश हमेशा यही रहती थी कि डायरेक्टर ने जो फिल्माया है मैं कैसे उसे बेहतर करूँ”.

बड़े बड़े नामी गिरामी लोगों की फिल्में पूरी होने के बाद मुश्किल में दिखीं तो री-एडिटिंग के लिए उनके निर्माताओं ने कन्नू की शरण ली . फ़िल्म ‘सोने पे सुहागा’ बनी और चली नहीं तो रिलीज के दो साल बाद कन्नू ने उसे फ़िर से एडिट की और उसके बाद फ़िल्म चली. मल्टी स्टार वाली फ़िल्म थी ‘जोशीले’ जिसे डायरेक्ट किया था जाने माने निर्देशक शेखर कपूर ने और उसके लेखक थे ख्यातनाम जावेद अख्तर. मगर कुछ ऐसा झमेला हुआ कि हैरान परेशान प्रोड्यूसर कुन्नू की शरण में आया कि दादा कुछ मदद करों . लेखक कह रहा था कि डायरेक्टर ने जो बनाया है वह तो उनकी कहानी ही नहीं है. कन्नू ने पूरी फ़िल्म देखी और लेखक की बात को समझा और फ़िल्म को फ़िर से लाइन अप किया और पुनः संपादित किया. इसमे छह माह लगे और फ़िल्म अपने शेप में आई. कुन्नू ने फ़िल्म के निर्देशक शेखर कपूर को उसने जिस तरह से फ़िल्म को शूट किया उसके लिए खूब डांट लगाई. आख़िर उसने अपनी गलती मानते हुए फ़िल्म छोड़ने की घोषणा की. बाद में फ़िल्म में निर्देशक के रूप में उसके निर्माता का ही नाम गया.

अपने काम में कन्नू ने कोई समझौता नहीं किया. यदि कोई उनके काम में टांग अडाने की कोशिश करता तो वह दादा की खिड़की ही खाता था. अभिनेता अनिल कपूर जब अपने शिखर पर थे तो और अपनी फ़िल्म के शॉट्स के संयोजन पर अपनी राय देने लगे तो कन्नू ने उन्हें कह दिया कि “आप हिंदुस्तान के प्रेसीडेंट होंगे मगर इस एडिटिंग रूम में मैं प्रेसीडेंट हूँ. जाइए आप एक्टिंग करिए एडिटिंग मुझ पर छोडिये”.

ऐसा ही एक किस्सा मशहूर संगीतकार नौशाद साहब का है. उन्होंने कहा इस सीन को बढ़ा दीजिये. कुन्नू ने पुछा क्यों तो वे कहने लगे मुझे संगीत देना है. कुन्नू ने कहा सीन में जो बात कही जा रही है वह ख़त्म हो जाने पर सीन कट हो गया है. आप के संगीत के लिए सीन आगे कैसे बढ़ा दूँ.


कन्नू साहब की पहचान 'चेतना' और ‘जरूरत’ जैसी बोल्ड फिल्मों के निर्माता के रूप में भी है. उन्होंने काल गर्ल की मजबूरी पर 'चेतना' बनाई तो आफिसों में महिलाओं के शोषण को ‘जरूरत’ में प्रस्तुत किया. अबोर्शन की वैधानिक मान्यता पर ‘यह सच है’ बनाई. जब कुन्नू ने सुना की हॉलीवुड में मात्र नौ दिन में एक फ़िल्म बनी है ‘ओथेलो’ तो उस चैलेन्ज को स्वीकार करते हुए फ़िल्म ‘कामना’ मात्र सात दिन में बना डाली जो आज भी एक विश्व रिकॉर्ड है. कुन्नू ने अनिल धवन, डैनी, रीना राय, विजय अरोडा तथा रेहाना सुल्तान जैसे कलाकारों को फिल्मों में चांस दिया.

सीधे, सहज और आत्म प्रचार से हमेशा दूर रहने वाले कुन्नू का आज जन्म दिन है. आज के ही दिन १९२९ में एक स्वतंत्रता सेनानी के घर जन्मे कुन्नू को राजस्थानी होने पर गर्व है. और कुन्नू पर हम राजस्थानियों को गर्व है.

Wednesday, May 14, 2008

जयपुर में सिरिअल बम ब्लास्ट : कौन जिम्मेवार

-राजेंद्र बोड़ा
राजधानी जयपुर में हुए बम धमाकों में पाँच दर्जन से अधिक लोगों की मौत से हर कोई सदमे में है. स्पष्ट रूप से यह आतंकी कार्यवाही है. इस दुर्दांत कार्यवाही को अंजाम देने वाले सामने नहीं है. छुप कर वार करने वाला हमेशा कायर होता है. यह कायरतापूर्ण कार्यवाही शांति भंग करने और सांप्रदायिक सदभाव बिगाड़ने और अस्थिरता पैदा करने के लिए होती है. मगर जयपुर के वासियों ने इस मुश्किल की घड़ी में जिस तरह के संयम और परिपक्वता का परिचय दिया है वह उल्लेखनीय है. घटनाओं के तुरंत बाद लोगों ने घायलों की मदद करने और अस्पतालों में रक्त देने ले लिए उमड़ कर अपने सामाजिक सरोकारों का परिचय दिया वह पूरे राजस्थान का सिर ऊँचा करता है. शहर के लोग सदमे में है दहशत में नही. यह घड़ी ऐसी है जो समझदार लोगों से संयम की अपेक्षा रखती है. मगर सभी के मन में यह सवाल जरूर है कि ऐसा क्यों हुआ ? आतंकवादियों ने जयपुर को क्यों चुना. क्यों हमारी सुरक्षा एजंसियां ऐसी काली करतूत करने वालों के इरादों का पहले से पता नहीं जान पाई ?

देश पिछले दो दशक से अधिक समय से आतंकी गतिविधियों का शिकार बना हुआ है. लंबे समय से ऐसी घटनाओं का सामना करते हुए अब तक हमारी सुरक्षा एजेंसियों को इतना सक्षम तो हो जाना चाहिए था कि आतंककारी इतनी आसानी से अपना काम अंजाम नहीं दे सकें. यह हमारी सबसे बड़ी असफलता है कि हमारी सरकारों ने सुरक्षा एजेंसियों को प्रोफेशनल बनाने और उन्हें अपने तरीके से काम देने की छूट नहीं दी और उनके काम काज में हमेशा राजनैतिक हस्तक्षेप रहा. इसका नतीजा आम जनता को ही भुगतना पड़ता है. पुलिस फोर्स को नए जमाने की जरूरतों के अनुरूप बनाने के लिए दी गई विभिन्न आयोगों की सिफारिशों पर अमल करना सरकार में बैठे लोगों की प्राथमिकता में नहीं होता. इसीलिए हम पाते हैं कि बार-बार ऐसी सूचनाओं के मिलने के बाद भी कि राजस्थान के इलाके आतंकवादियों के निशाने पर है सुरक्षा एजेंसियां सुस्त पड़ी रहती है और अजमेर में दरगाह के बाहर आतंकी विस्फोट होने के बाद भी इस बात की फिक्र नहीं की जाती कि ऐसा हमला फ़िर हो सकता है. बंगलादेश के आतंकी संगठन हूजी का नाम भी कुछ दिनों पहले उजागर हो चुका था था कि वह ऐसी वारदात राजस्थान में अंजाम दे सकता है. अब जयपुर के बम हमलों के पीछे भी इसी संगठन का हाथ होने की आशंका सामने आई है. ऐसे में स्वाभाविक रूप से पूछा का सकता है कि इतनी सारी सूचनाएं होने पर भी कोई सुरक्षात्मक कदम क्यों नही उठाये गए. इसके लिए राज्य सरकार से ही जवाब माँगा जायेगा. आम जन को इस आरोप और प्रत्यारोप से कोई सरोकार नही है कि केंद्रीय एजेंसियों ने राज्य को संभावित आतंकी हमले की सूचना दी थी या नही. यह उनके जीवन की सुरक्षा का मामला है और यह हादसा किसी भी एजेंसी की गफलत से हुआ हो मगर जनता अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों से ही जवाब मांगेगी. यदि वास्तव में सरकार लोगों के जान माल की सुरक्षा के प्रति चिंतित है तो उसे अपनी चिंता अपने क्रिया- कलापों से जाहिर करनी होगी. लोग इस बात से अब पूरी तरह ऊब चुके हैं कि घटना-दुर्घटना हो जाने पर तो सरकार और उसकी एजेंसियों की जबरदस्त सक्रियता दिखे और समय गुजर जाने के बाद उनका काम-काज फ़िर पुराने ढर्रे पर लौट आए.

(दैनिक भास्कर का दिनांक 15 मई 2008 के अंक का सम्पादकीय)

Sunday, March 30, 2008

लील रहा है बाज़ार हमारी कला और सांस्कृतिक धरोहरों को

राजेंद्र बोड़ा

राजस्थान अपनी स्थापना के ६० वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है. इस मौके पर सरकार एक बड़ा जश्न मना रही है. राजस्थान सदियों से बाहर के लोगों के लिए अजूबा रहा है. जहाँ प्रकृति जीवन के विपरीत रही हो और इंसान को जीने के लिए अपने आस पास के कठोर वातावरण से झूझना पड़ता रहा हो, वहीं खूबसूरत संस्कृति और कलाएं किस भांति पनपी उस पर पूरी दुनिया आश्चर्य करती रही है. मरू भूमि में रहने वालों ने दुनिया को सिखाया कि किस प्रकार प्रकृति से लड़ कर नही उससे सहकार करके ही मानव जी सकता है और अपनी नैसर्गिक प्रतिभा को पल्लवित कर सकता है. इसी सहकार से राजस्थान की संस्कृति में गहरे रंगों की छठा नज़र आती है और यहाँ गीत संगीत और नृत्य की अनोखी बानगियाँ मुखर और हाथ की कलाएं सजीव हो उठती हैं.

यही राजस्थान की पुरातन धरोहर है जिसे यहाँ के लोगों ने बड़े जतन से सहेज रखा है. विपरीत प्राकृतिक परिस्थितियों में तप कर ही यहाँ के लोग देश के कोने कोने में गए और अपनी उद्यमशीलता के बलबूते पर सफल हुए और बड़े नाम ही नही कमाए बल्कि देश की आर्थिक उन्नति में योगदान करने वालों में प्रमुख रहे. वे बाहर जाकर सफल हुए और ऊंचे परचम फहराए मगर अपनी भूमि को नही भूले. यहाँ अपना ठिकाना बनाए रखा, रिश्ता बनाए रखा. भले ही यहाँ आने का सिलसिला कम से कमतर होता गया. मगर अब गुजरा ज़माना बहुत पीछे छूट गया है और नई पीढ़ी चाहती है कि राजस्थान आधुनिक हो जाए. सरकार उनके इस सपने को पूरा करने के लिए ऐसे उद्यम कर रही है जिससे नई अर्थ व्यवस्था की भाषा में कहें तो राजस्थान की “मार्केटिंग” की जा सके.

मार्केटिंग बड़ा सुंदर शब्द लगता है. इसका अर्थ सीधे शब्दों में होता है राजस्थान में धन लगाने के लिए पैसे वाले व्यक्तियों और कम्पनियों को लुभाया जा सके. मार्केट यानी बाज़ार. ऐसे जश्नों के जरिये बाज़ार में हम क्या बेचना चाहते हैं ? और फिर कोई चीज बेचने के लिए ग्राहक के मन की तो बात करनी ही पड़ती है. अच्छा सेल्समैन वह होता है जो ग्राहक की पसंद की बात करे. संस्कृति और परम्पराओं के प्रतीकों से राजस्थान की “मार्केटिंग” की जाती है.

राजस्थान की वह क्या संकृति है, वे कौन सी धरोहरें हैं, और कौन सी परम्पराएं हैं जिन्हें हम सहेजे भी रखना चाहते हैं और उन्हें आधुनिक पॉप बाना पहना कर बेचना भी चाहते हैं. यह समस्या उन लोगों की भी है जो हमारी कला, संस्कृति के वाहक बने रहे हैं. कैसे अपनी धरोहर को बचाए रखे जब बाज़ार का दबाव उन्हें ग्राहक की पसंद के अनुसार माल देने का हो. इसका एक उदाहरण पिछले दिनों मिला जब जैसलमेर जाना हुआ और वहां एक सर्द शाम 'सम' के धोरों पर राजस्थानी लोक संगीत के मानीते कलाकारों की कला के जादू के प्रभाव में खो जाने का मौका मिला. राजस्थान के पर्यटन विभाग सम पर शाम को ऐसी महफिलें पर्यटकों के लिए आयोजित करता है जो मार्केटिंग की दृष्टि से खूब सफल भी है. सम की उस शाम की महफ़िल में हिन्दुस्तान के हर कोने से आए लोग थे. गुजराती, पंजाबी, बंगाली, मराठी और दक्षिण भारतीय. साथ में विदेशी भी राजस्थानी लोक संगीत का लुफ्त उठाने को वहां मौजूद थे. बाज़ार की दृष्टि राजस्थानी लोक गीत, संगीत और नृत्य की ये शाम सफल थी. लोक संगीत का जादू ऐसा चढ़ा कि अधिकतर पर्यटक लोक गायकों और संगीतकारों की धुनों पर नाचने से अपने को नहीं रोक सके. कार्यक्रम के बाद मांगंनियार लोक गायकों से चर्चा हुई और मैंने उनसे पूछा कि उन्होंने जो चीजें पेश की क्या वे ठेठ राजस्थानी है? क्यों उन्होंने वे श्रोताओं को बहलाने वाली चीजें प्रस्तुत की? ऐसी चीजें जो राजस्थानी संस्कृति और परम्पराओं का प्रतिनिधित्व नहीं करती . हाँ उनका पॉप संस्करण जरूर है. उनका जवाब था "क्या करें सा’ब करना पड़ता है. ये जो सामने लोग बैठे है कितने ऐसे है जो असली राजस्थानी लोक संगीत को सुन कर लाजवाब होंगें".

उन्होंने सच कहा. वहाँ जो दर्शक थे वे ऐसे ग्राहक थे जो बस तमाशा चाहते थे और तमाशा करके उनका मनोरंजन करना हमारे कलाकारों की मजबूरी थी क्योंकि बाजार यही चाहता था. यही हम 'राजस्थान दिवस' के जलसों में देखते है. तमाशे है, मनोरंजन है. जिस कला संस्कृति और परम्पराओं के नाम पर राजस्थान की 'मार्केटिंग' की जा रही है उसमे यही चीजें जो राजस्थान की पहचान है कही खोती जा रही है. यहाँ राज्य का दायित्व आता है. जब रियासती जमाने के दरबारों में कलाओं और हुनरों को इज्जत बख्शी जाती थी तब उन्हें तमाशा नही बनाया जाता था. इसीलिए ये धरोहरें बच गई. क्या आज के मार्केटिंग के जमाने में ये धरोहरें बचाई जा सकेगीं ?

धरोहरें केवल पत्थर की इमारतें नहीं होती जिन्हें ईंट-गारे से लेप कर बचा सकते है. कला, हुनर, संस्कृति और परम्पराएं बड़ी नाजुक होती है. उन्हें बड़े जतन से सहेजना होता है. राजस्थान की मार्केटिंग के लिए वे ही कुछ प्रतीक बार-बार पकड़े जाते हैं जिन्हें बाज़ार ने राजस्थान की एक मात्र पहचान के रूप में स्थापित कर रखा है. क्या सबसे कम उम्र का शहर जयपुर ही राजस्थान की धरोहर है ? क्या काले कपड़े पहन नाच करने वाली लड़कियों का "कालबेलिया" नृत्य ही राजस्थान के लोक नृत्यों का प्रतिनिधित्व करता है ? बाज़ार “नीम्बूडा” जैसे गानों को राजस्थान का प्रतिनिधि लोक संगीत बना देता है.

सरकार में बैठे लोग कला और संस्कृति के मर्मज्ञ हों जरूरी नही है. मगर शासन चलने वाले ऐसे लोगों से राय तो कर ही सकते है जिनके कला और संस्कृति के सरोकारों से जग परिचित है. मगर शायद ऐसा बाज़ार को नही भाता. सरकार के पास आधुनिक राजस्थान की पहचान की छवि उस काफ़ी टेबल बुक की तरह है जो बड़ी महंगी होती है मगर उसका काम खूबसूरत ड्राइंग रूम की सजावट बनना होता है और जिसे कोई पढता नहीं.

Monday, February 18, 2008

R. C. Bora Passes Away


Veteran freedom fighter and well known journalist and man of words Mr. Ram Chandra Bora is no more. He was President of Rajasthan Nav Manav Vaad Sanghthan.

Affectionately, called RC by his friends, Ram Chandra Bora, who died in Jaipur on January 31, was a restless non-conformist of sort. Born on February 17, 1923 in Jodhpur , once a political and cultural centre, he took his early education in Agra at a time when appreciation for studying out of the native town was wanting.

Back home he played for some time with the mores code in buzzing telegraph offices of different railway stations, now in Pakistan. The job was cut short after his arrest for blasting a bomb in the Stadium Cinema Hall in Jodhpur where British officials were enjoying a English film on Sunday morning. He was subsequently tried and jailed for eight years for waging war against British Empire. He indulged in revolutionary activities as Quit India movement stirred something deep within him and his participation in the movement a la revolutionaries landed him in what was then considered a holy place - jail. This he promptly converted into a university where the subject of his studies was life itself - human life so to say.

Nothing of human interest was alien to him and he pursued his enquiries within of course the limitations which in any case were inevitable in the circumstance obtaining then. He felt the pull of Marxism, gravitated towards it but he regarded it as philosophy rather than what half baked leftists called it “a technique of revolution”. This led him to M. N. Roy whose philosophy exercised an enduring influence in the intellectual progress of him.

Independence saw Mr. Bora emerging out of his confinement - Radical. The tough non-conformist streak in him asserted itself. He refused to be fed by doles and insulted by the name of a “political sufferer”. Instead he took his M. A. in philosophy from University of Rajasthan in the year 1951 and was selected in state information service from which he retired as Regional Deputy Director in the Department of Public Relations in 1979.

His academic pursuits did not hinder his intellectual activities. He contributed regularly to ‘The Statesman‘, ‘The Deccan Herald‘, ‘The Radical Humanist‘, ‘Thought‘, ‘Sahitya Sandesh‘, ‘Prateek‘, ‘Naya Prateek‘, ‘Viplav‘, ‘Ajanta‘, ‘Rajasthan Patrika‘, ‘Rashtradeoot‘, ‘Dainik Navjyoti’ and ‘Lok Jeevan‘. For about four years he edited a philosophico-cultural journal “Vivek’, a monthly which was noted for its high standard of journalism and excellent intellectual caliber of its contribution. He also represented ‘The Times of India‘, ‘The Press Trust of India’ and ‘The United News of India’ for years.

Mr. Bora had twelve books to his credit of which important ones are ‘Lok Sahitya‘, ‘Freud Ki Manovishleshan Paddhati’, ‘Amar Shaheed Sagarmal Gopa‘, ‘Charvaak Darshan‘, ‘Bangla Desh‘, ‘Contemporary Rajasthani Literature’ and ‘Gora Hat Jaa: 1857 revolution‘.

Evidently RC was one of the few who stood committed to bring about a renaissance by revitalizing the essentially humanistic traditions of philosophers and encyclopaedists of enlightenment.

Former Vice-President of India Bhairon Singh Shekhawat, Rajasthan Governor, S.K.Singh, Gujarat Governor Nawal Kishore Sharma, Chief Minister Vasundhara Raje and former chief minister Ashok Gehlot were among those who paid glowing tributes to late Mr. Bora.

Friday, January 25, 2008

राजस्थान में सामंतवाद

रामचंद्र बोडा

राजस्थान में सामंतवाद की बात की जाती रही है. कर्नल जेम्स टाड़ ने इसको विस्तार दिया है. जेम्स टाड़ ने इसकी तुलना योरूप में मध्य युग में पनपे सामंतवाद से की है. राजस्थान के कतिपय इतिहासकारों ने, जिसमें राम प्रसाद व्यास शामिल हैं, इस राज्य में पनपे सामंतवाद को योरूप में पनपे सामंतवाद से अलग माना है. राजस्थान को लेकर जितनी सामग्री जेम्स टाड़ ने एकत्रित की है उतनी सामग्री किसी अन्य ने नहीं की है. इसलिए उसे ही यहाँ वाद-विवाद का आधार बनाया गया है. कर्नल टाड़ इस सम्बन्ध में संश्कीय होते हुए भी सामंतवादी पद्धति को विस्थापित करने का प्रयास किया है.

कर्नल टाड़ ने ऐसा सामंतवादी परिभाषा देकर नहीं किया है. वे योरूप के उन लेखकों में से हैं जो सामंतवाद को बिना परिभाषित किए सामंती पद्धति की बात करते है. कर्नल टाड़ ने अपनी सामंतवाद की अवधारणा में हेनरी हेलम के अलावा मंतास्क, ह्यूम तथा गिब्बन को आधार बनाया है. सामंतवाद का कच्चा चिट्ठा अपनी कालजयी पुस्तक ‘राजस्थान की वात और ख्यात’ में प्रस्तुत किया है.

राजस्थान में मध्य युग में सामंतवाद की परिरेखायें बनने लगी थी. विशेषकर यहाँ के देवधर्मी पितृस त्तात्मक समाज - रावला समाज - में. इसके पहले की देवधर्मी पितृस त्तात्मक समाज सामंतवाद का रूप लेता मुसलमानों के भारत पर आक्रमण होने लगे थे और उससे सामंतवाद की खिलने वाली कोंपलें बिखर गई और रह गई द्विप्रशासनिक पद्धति. वह सामंतवाद न होकर साम्राज्यवाद था. मुगलिया सामंती साम्राज्यवाद. पूंजीवाद वाला साम्राज्यवाद नहीं. ब्रिटिश साम्राज्यवाद जैसा. भारत में अंग्रेजों के उपनिवेशवाद जैसा, मुग़लों का उपनिवेशवाद भी नहीं. उस द्विप्रशासनिक प्रणाली में मुगलों और अंग्रेजों में आर्थिक, सामजिक और राजनैतिक अन्तर था.

मुग़लों ने भारत पर विजय के बाद जो राज्य स्थापित किया उसमें सामंतवाद की प्रक्रिया, पद्धति और व्यवस्था चलती रही. कर्नल टाड़ ने उस संबंधों में विद्यमान स्रोतों को एकत्रित कर सामंतवाद की पद्धति को देखा. वह लिखता है- It is more than doubtful whether any code of civil or criminal jurisprudence ever existed in any of these principalities; though it is certain that none at this day discoverable in their archives. But there is a martial system peculier to these Rajput states, so expensive in its operationas to embrace every object of society. There is no analogous to the ancient feudal system of Europe that I had not hesitated to hazard a comparision between them, with reference to period when the latter was yet imperfect. ऐसा मानते हुए वह आगे लिखता है – Long and alternative observation enables me to give this outline of a system, of which there exists little written evidence.

कर्नल टाड़ ने योरूप में कबीलों, जातियों में जो नियम जर्मनी के गोथ और फ्रेंक जातियों में देखे थे वे ही नियम उसे राजपूतों के रावलों में देखने को मिले. राजपूतों के रावलों में देवधर्मी समाज के पितृस त्तात्मक परिवारों में. उन्हीं को लेकर टाड़ सामंतवाद की बात करता है. ऐसा करने में वह हेनरी हेलम की पुस्तक मध्य युग (Middle Ages) पर विश्वास करता है. हेनरी हेलम अपनी पुस्तक में रावलों में भी परस्पर ‘कुल बैर’ और पुश्तैनी दुश्मनी को आधार बना कर लिखता है – It has been very common to seek for origin of feuds, or at least for analogies to them, in the history of various countries, but though it is of great importance to trace the similarity of customs in different parts of the world, we would guard against seeming analogies, which vanish away when they are closely observed. It is easy to find partial resemblences to the feudal system. The relations of patron and client in the public of Rome has been deemed to resemble it, as well as the barbanans and vetarans who held frontier lands on the tenure of defending them and frontier; but they were bound to not an individual, but to the state. Such a resemblance of fiefs may be found in the zamindars of Hindustan and the Timaroits of Turkey. The clans of high landers and Irish followed their chieftain into the field but their tie was that of imagined kindered and birth not the spontaneous compact of vassalage.

हेनरी हेलम भी सामंतवाद की परिभाषा देकर नहीं चलता परन्तु उस सामंतवाद को कर्नल टाड़ की तरह समझने का प्रयास करता है. यह प्रयास राजपूत कबीलों में सामंती परम्पराओं को खोजना था. मुसलमानों के आक्रमणों ने सामंतवाद की मूल भूमि उत्पादन की स्थिति को तोड़ दिया था. कर्नल टाड़ को इस बदले परिवेश में मुग़लों के पैर जम जाने के बावजूद उभरते सामंतवाद के नष्ट होने के बावजूद उन परम्पराओं को खोज निकालना चाहा जो अवशेष के रूप में बच रहीं थीं. कर्नल टाड़ कहता है – “ I give this at length to show that if I still persist in deeming the Rajput system a pure relations of feuds, I have before my eyes the danger of seeming resemblance…” और इसे स्थापित करने के लिए वह कहता है – “…But grants, deeds, charters, traditions, copies of which will be found in the Appences, will establish my opinion. I hope to prove that the tribes in the northern regions of Hindustan did possess the system, and that it was handed down and still obtains, notwithstanding seven centuries of paramount sway of the Mogul and Pathan dynasties altogether oppositing to them except in this feature of government where there was an original similarity.” कर्नल टाड़ को यह ग़लतफहमी हो जाती है कि – “Notwithstanding seven centuries of permanent sway of Mogul and Pathan dynasties altogether opposed to them except in the feature of government where there was original similarity.”

भूमि उत्पादन के तरीके में एक बड़ा परिवर्तन आ जाता है. इस आर्थिकता को टाड़ समझता है. तभी तो वह कहता है – “ In some of these states those atleast affected by conquest the system remained freer from innovation.”
इसका सीधा नतीजा यह है कि वह कार्य पद्धति को महत्व देता है चाहे फिर उसका प्रयोजन भूमि उत्पादन से हट ही क्यों न गया हो. वह मूलतः मेवाड़ को अपने अध्ययन का केन्द्र बनता है जिसकी आतंरिक प्रशासनिक व्यवस्था विदेशी निति से प्रभावित होती है जबकि दिल्ली की साम्राज्यवादी शक्ति थी. सामंतवाद कि मूल पीठिका -भूमि उत्पादन- को छोड़ कर इस पद्धति को सामंतवाद मान लेने से पूरे इतिहास का मूल्यांकन झुठला गया है. उसे केवल राजपूत जाति ही दिखाई देने लगती है. वह उसकी प्रशंसा में लग जाता है.

सामंतवाद के इतिहास की भौतिक व्याख्या को कार्ल मार्क्स और उनके अनुयाइयों ने ठीक से समझा. यहाँ मेरा अर्थ मार्क्स की आर्थिक व्यवस्था से नहीं है जिसे मार्क्स ने भौतिकवादी व्याख्या कहा है.

योरूप में नवी शताब्दी से १५ वी शताब्दी और उसके बाद भी जमीन उत्पादन की जोत रही है. Lord (राजा), Vassal (ठिकानेदार) और Fief (जागीर) के रूप में. जमीन ही सिरमौर रही. मुग़लों ने इस पद्धति को तोडा. जागीरदार राजा की सेवा में रहे - बडो हुकुम और घणी खम्मा के रूप में. जमीन की उपज की आय राजा (Lord) अपने पर अपने किलों पर अपने हरम पर अपनी रानियों पर अपनी सेना पर और अपने परिवेश पर खर्च करता था. समाज की आर्थिकता उससे बंधी थी. दास (गोलों) की फौज बनी रहती थी. बदले आर्थिक संबंधों में पहले मुग़लों के हाथ और बाद में अंग्रेजों के हाथ भूमि उत्पादन की पद्धति टूटी और एक प्रकार की द्विशासन प्रणाली (Diarchy) कायम हुई. तरीका काफ़ी अंशों में वही रहा बदले रूप में .

सामंतवाद वह सामजिक परिवेश था जिसमे जागीरदार राजा के लिए लड़ता था और उसके बदले राजा उसे सम्मान देता था. कार्ल मार्क्स ने इस सामाजिक व्यवस्था को प्रागस्थिति माना था. उसने उसे प्राचीन सैनिक आर्थिक पद्धति कहा है. यह व्यवस्था योरूप की मध्य युगीन व्यवस्था थी.

वैसे देखा जाए तो सामंतवाद लेटिन भाषा की संज्ञा FEUDUM-FOEDUM से बना है जिसका अनुवाद जागीर के अर्थ में किया जाता रहा है. जागीर (Fief) का अर्थ जमीन से. उन्नीसवी शताब्दी तक पहुचते पहुचते जमीन पर वंशानुगत (पैतृक) परम्परा चल पड़ी थी. फ्रांस में ऐसा हुआ. वैसे विलियम प्रथम ने इसे चालू किया. कर्नल टाड़ ने इसे विस्तार से समझाया है. इस सामाजिक व्यवस्था का नाम सामंतवाद फ्रांसीसी क्रांति के समय पड़ा था - फ्रांसीसी भाषा के शब्द Feodalism से.

सन १९१२ में ब्लादिमियेर लेनिन ने सामंतवाद को परिभाषित करते हुए कहा था जमीन पर मालिकाना हक और सामंतों का दासों पर मालिकाना हक. अंग्रेजी के तीन शब्द Lord, Vassal और Fief सामंतवाद को प्रकट करते हैं. Lord यानि सामंत, Vassal यानि अधिपति (ठाकुर) और Fief यानि जागीर.

इसके पहले कि सामंत किसी अधिपति (ठाकुर) को जमीन देता उसके पहले उसे एक अनुष्ठान द्वारा अधिपति (ठाकुर) - जैसे मेवाड़ में राणा घोषित किया जाता रहा है - घोषित किया जाता था. (पगड़ी बंधाई रस्म की तरह). यह विधिवत और व्यवस्थित तरीके से किया जाता था जिसे श्लाघा अनुष्ठान (Commendable Ceremony) कहा जाता रहा है. इस अनुष्ठान के दो काण्ड होते थे. एक श्रृद्धा सुमन अर्पण, और दूसरा वफादारी की शपथ. श्रृद्धा सुमन के साथ सामंत और अधिपति एक अनुबंध में बंधते थे जिसमे अधिष्ठाता वायदा करता था कि वह सामंत के आदेश पर लड़ेगा और अपनी जान दे देगा. उसे Fiefty कहा जाता था जो लेटिन भाषा (Fedelitas) से निकला शब्द है इसका अर्थ है स्वामिभक्ति. यही सामंती संस्कृति है. ज्यों ही श्लाघा अनुष्ठान द्वारा सामंत और अधिष्ठाता परस्पर अनुबंध से बंध जाते. अधिष्ठाता सामंत का होकर रह जाता. इस श्लाघा अनुष्ठान के लिए अधिपति नजराना के रूप में पाता था. आय के रूप में तलवार बंधाई लाग की तरह. टाड ने इस परिवेश में समझाया है.

ऐसा कुछ भारत में भी मिलेगा पर सामंतवाद योरूप जैसा परिपक्व रूप नही ले सका. पर भारत के इतिहास में हमें एक दूसरा रूप देखने को मिलता है जिस पर कर्नल टाड का ध्यान नहीं गया है. मोहम्मद बिन कासिम के भारत पर आक्रमण को ही लें. उसे जाटों का और अन्य कृषकों का भरपूर सहयोग मिला था क्योंकि वे यहाँ अपनी स्थिति से ख़ुश नहीं थे. उनका शोषण ब्राह्मण राजाओं द्वारा खुल कर किया जाता रहा था. जीतने के बाद मोहम्मद बिन कासिम ने उसके पहले भारत पर अरब आक्रमणकारियों का अनुशरण किया. इतिहासकार इलियट के शब्दों में “He employes the Brahmins in pacifying the country by taking them into confidence. He allowed them to repair their temples and to follow their own religion as before placed the collection of revenue in their hands and employed them in continuing the traditional system of local administration.”

ऐसी स्थिति में यद्यपि कतिपय ब्राह्मण राजा विजेताओं के साथ हो गए पर तत्कालीन समाज की साधारण स्थिति वैसी ही बनी रही. तत्कालीन समाज विश्रंख्लित हुआ और वहां अराजकता की स्थिति पैदा हो गई जैसी कि प्रतिक्रान्ति के सफल होने पर होती है. प्रतिक्रान्ति किन्ही कारणों से सफल हो सकती है व क्रांति असफल . लेकिन जिन कारणों से क्रांति उठी थी वे कारण प्रतिक्रांति के सफल होने के बाद भी बने रहते हैं. समाज का विश्रंख्लित रूप बना रहता है जिसने क्रांति को जन्म दिया था. जो सामाजिक शक्तियां उसके लिए जिम्मेवार होती हैं. प्रतिक्रान्ति इसलिए सफल हो जाती है कि क्रांति की जिम्मेवार शक्तियां परिपक्व नहीं होतीं जिससे क्रांति सफल होती है. यही मुसलमानों की भारत में विजय के बाद स्थिति रही. और यहाँ यह कहना अप्रासंगिक नहीं होगा कि भारत में प्राचीन काल में बौद्ध क्रांति के समय भी ऐसा ही हुआ. बौद्ध क्रांति के बाद भारत आर्थिक तौर पर गड़बडा गया, राजनीतिक उत्पीडन गहरा गया, बौद्धिक दिवालियापन फैल गया. सामाजिक व्यवस्था पूर्ण रूप से अव्यवस्थित बनी रही. सारा का सारा समाज क्षतिग्रस्त रहा. यही कारण था कि इस्लामी आक्रमणकारियों का भारत की जनता ने साथ दिया और स्वागत किया. उस समय के सुविधाभोगी वर्ग ने भी आक्रमणकारियों का साथ दिया क्योंकि इस्लामी आक्रमणकारियों ने भारत के उस वर्ग को सामाजिक समता तो दी पर राजनीतिक रूप से उसे परतंत्र रखा. यह सब यही बताता है कि जनता और समाज जब हतोत्साहित होता है तब ऐसा ही होता है. भारत की यह स्थिति अंग्रेजों के आने तक ऐसी ही बनी रही. बौद्ध क्रांति के अपवाहित हो जाने के कारण. कर्नल टाड़ शायद इस स्थिति को नहीं समझ पाया. राजस्थान में राजपूतों का राज रहने के बावजूद वे ब्राहमणों द्वारा प्रदत्त नियमों से ऊपर नही उठ सके. उन्होंने राम को मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में ऊपर उठाया और कृष्ण को क्षत्रिय धर्म विस्थापित करने के रूप में. पर मोटे रूप में वे ब्राहमणों द्वारा प्रतिपादित (मनु जैसों के) नैतिकता से ऊपर नहीं उठ सके. वैशम्पायन व्यास कि वाणी गीता में कृष्ण कि वाणी बन कर उभरी. कृष्ण, अर्जुन, धृतराष्ट्र, संजीव - महाभारत के सभी चरित्र - आज के दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन और धर्मेन्द्र कि तरह वैशम्पायन द्वारा निर्मित चरित्र ही बने रहे. और तो और महाभारत और रामायण के स्त्री पात्र द्रौपदी और सीता का आध्यात्मिक रूप रहा.

कर्नल टाड प्रत्यक्ष में राजपूतों को शौर्य पूर्ण बताते हुए भी उनके पतन का खुल कर वर्णन करता है. उन्हें थर्मोपाली और लेओनिदास की संज्ञा देते हुए उनके युद्ध को अर्थहीन और दिशाहीन बताता है.

भारत में बौद्ध क्रांति विफल नहीं हुई वह आंतरिक कमजोरियों के कारण अपवाहित रही. बौद्ध क्रांति के अपवाहित होने को उसके बाद के हजार वर्ष प्रकट करते हैं. शंकराचार्य ने उसका पूरा लाभ उठाया और प्रछन्न बौद्ध की तरह बुद्ध दर्शन को भारत से साफ कर दिया. और तो और बौद्धों के पवित्र स्थान बौद्ध गया तक में हिंदू के संस्कार की दृष्टि से 'बाकी तीरथ बार बार , गया तर्पण एक बार' की भावना ही नहीं भर दी वरन उसे व्यावहारिक रूप भी दे दिया. बौद्ध क्रांति का अपवाहित (Mis-carriage) होना इतना व्यापक रहा कि भारत अंग्रेजों के पदार्पण तक वह उस निस्तेज स्थिति से ऊपर नहीं उठ सका.

इसी स्थिति को इतिहासकार हावेल ने अपनी पुस्तक भारत में आर्य (Aryans in India)
में लिखता है “Those who did so (embraced Islam) acquired all the rights of a musalman citizen in law courts where the Quran and not the Aryan law and custom decided dispute of all cases. The method of proslytism was very effective among the lower castes of Hindus, specially among those who sufferred from severity of Brahminical Law with regard to the impure classes.”

राजस्थान में यह स्थिति मुग़ल साम्राज्य के पैर जमने से गहरा गई. मुग़ल साम्राज्य में एक विशाल गिरावट का सामजिक परिवर्तन आया पर आय के कारण नहीं. वह तो अकबर बादशाह से लेकर औरंगजेब तक बढ़ती गई ऐश आराम कि जिंदगी ने उसे निस्तेज कर दिया और ज्यों ही दूसरी औधोगिक ताकत अंग्रेजों के रूप में आई, मुग़ल साम्राज्य अपने अंतर्विरोध के कारण ताश के पत्तों से बने घर की तरह ढह गया .

टाड़ ने अपनी सारी “वात और ख्यात” की कल्पना मेवाड़ में उपलब्ध स्रोतों के आधार पर की है. वह यह नहीं बता सका कि बौद्ध दर्शन का ब्राहमणों के हाथ पिट जाने के बावजूद, राजस्थान में अधिकांश राजा राजपूत होते हुए भी बौद्ध क्रांति के अपवाहित होने के बाद वे भारत को आगे नहीं बढ़ा सके. वेदों के समय ब्राहमणों और क्षत्रियों में हुए दस युद्ध के बाद ब्राहमण इस बुरी तरह हार गए कि वे सिछक हो सिघरे जग को, ताको का देती है सिच्छा. औरों को धन चाहिए, बावरी ब्राहमण को धन केवल भिच्छा की स्थिति में आ गए. केवल एक बलशाली राजा रावण लंका में रह गया था. उसकी क्षत्रियों ने ऐसी दुर्गति की कि वह लोक त्योंहार का कुपात्र बन गया और हर वर्ष उसका और उसके परिवार का नैतिक पतन के रूप में दहन किया जाने लगा. राजपूतों ने ब्राहमणों द्वारा प्रतिपादित धर्म और कर्म कांडों को ओढ़ना आरंभ कर दिया और उन्होंने राजऋषि उत्पन्न करने आरंभ कर दिए. संस्कृति और सभ्यता का यह गहरापन अपने तरीके से सारे देश में फैला. वाल्मीकि से लेकर कालिदास और तुलसीदास ने जमकर क्षत्रियों का साथ दिया पर अंग्रेज इसे शिक्षा के माध्यम से व्यवहार में लाने में कोर कसर नहीं रखी. यह तीन लेखकों को छोड़ कर अन्य १०८ रामायणों में एक दम अलग इतिहास मिलता है. ‘राघव राग’ पुस्तक इसका उदाहरण है. वह रावण के चरित्र को बादलों से दबे सूर्य की रोशनी की तरह उठता है. कर्नल टाड की ‘वात और ख्यात: राजस्थान का इतिहास’ बन कर उभरी. इतिहास का सही पहलू लुप्त हो गया.


कर्नल टाड़ सामंतवाद कि प्रशंसा में गिब्बन का उदाहरण भी देता है. वह कहता है - I have sometimes been inclined to agree with the definition of Gibbon, who styles the system of our ancestors the offering of chance and barbarism.” – Le systeme feudal assemblage monstreux de tant de parties que le tems et l’hazard out reunies, none offer un object tres complique: pour l’etudiez taut le decomposer. ( Gibbon Vol.III)

स्मरण रखने कि बात है कि इतिहास में ही नही प्रकृति के हर भाग में कारणता है offering of chance कहीं नहीं है. जिन कारणों का हमें पता नहीं होता उन्हें offering of chance कह दिया जाता है. कर्नल टाड़ के साथ यही रहा .

जिस प्रकार Lord (सामंत), Vassal अधिपति (ठाकुर) और Fief (जागीर) को समझा जा सकता है उसी प्रकार Mugal Feudal Imperialism (मुगलिया सामंतवादी साम्राज्यवाद) और Modern British Imperialism (आधुनिक ब्रिटिश साम्राज्यवाद से लगाकर मुगलों की द्विप्रशासनिक प्रणाली को भली भांति समझा जा सकता है.

पहले Mugal Feudal Imperialism (मुगलिया सामंतवादी साम्राज्यवाद) को ही लें :
अंग्रेज ही भारत के पहले विजेता नहीं थे. भारत तेरहवीं शताब्दी से ही बाहरी हमलावरों से विजित देश रहा. अंग्रेजों के आने से पहले मुसलमान यहाँ के विजेता रहे. सही बात तो यह है कि आधुनिक अंग्रेजी साम्राज्य और मुगलिया सामंती साम्राज्य में रात - दिन का अन्तर रहा. लेकिन यह बात एक दम सही है कि विजेताओं ने भारत में बस रही सभ्यता के सामान्य विकास को अवरुद्ध किया और भारत को स्वतः एक राष्ट्र के रूप में विकसित नहीं होने दिया.

मुसलमानों के भारत पर आक्रमण तब होने लगे जब भारत में सामंतवाद अपनी पहली अवस्था में था. केवल उत्तरी भारत के राजपूतों में सामंती राज्यतंत्र पूरी तरह विकसित था. शेष भारत में विभिन्न अलग अलग राज्यों में विभाजित रहा. वे या तो देवधर्मी राज्य (Theocratic) थे या आंशिक गैर पितृस त्तात्मक . ऐसी स्थिति में नैसर्गिक था कि समूचे भारत में राष्ट्रीय भावना उत्पन्न होती. यह असंभव सी बात थी. छितराए हुए विभिन्न राज्यों द्वारा अपनी सीमाओं के विस्तार के प्रयास तब तक एक संयुक्त राष्ट्र की भावना से प्रेरित नहीं थे. उन राज्यों के पीछे साफ तौर पर उद्धेश्य अनुवांशिक राज्यों को फैलाना था. और न ही राजपूतों के मुसलमानों विरोध को राष्ट्रीय विरोध कहा जा सकता है, जैसा कि महाराणा प्रताप को लेकर राष्ट्रीय इतिहासकारों ने किया है. ऐसा इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि राजपूतों ने मुसलमानों का विरोध अपने सामंती अधिकारों को बनाये रखने के लिए बड़ी बहादुरी से किया जैसा कि कर्नल ताड़ ने उसे थर्मोपाइल और लेओनिदास कि संज्ञा दी है. राजपूतों ने इसके अलावा अपने किलों कि, अपनी स्त्रियों के सतीत्व की , अपने कुलदेवी देवताओं की प्राथमिकता से रक्षा की, उन्हें पवित्र मान कर. अपने राज्यों की रक्षा के लिए अपनी सेना को इस विरोध के लिए बनाए रखा. यद्यपि अकबर तक पहुचते उनहोंने मुसलमानों से विवाह सम्बन्ध बनाने चालू कर दिए. कहीं पर भी भारतीय राष्ट्र को बचाने की बात नही उठी या भारत को बचाने की जैसा की देशभक्त इतिहासकारों ने बिना इतिहास के प्रवाह को समझे ऐसा किया है.

मुसलमान विजेताओं ने नि:संदेह देश के अधिकांश भाग को एकीकृत केंद्रीय राज्य में मिला लिया था पर एक राष्ट्र के रूप में नहीं क्योंकि दिल्ली का न्यायालय या राज्य राष्ट्रीय राज्य के अंतर्गत नहीं था. दिल्ली के सम्राज्ञों का आधार स्थानीय राज घराने नहीं थे. वे स्थानीय राजघरानों की इमारत की ऊपरी मंजिल नहीं थे जो दासों के सामाजिक संगठन के रूप में निर्मित हुआ हो. देश पर स्थानीय सामंतों का अधिकार नही था. बल्कि देश पर विदेशी आक्रमणकारियों और विजेताओं द्वारा नियुक्त प्रतिनिधियों का था. अतः इस तरह नियुक्त प्रतिनिधि सामंती होते हुए भी उन्हें जनता का सहज सहयोग नहीं मिलता था. उस जनता का, जिस पर ये राज करते थे. ऐसा इसलिए था क्योंकि उनका नेतृत्व स्थानीय पैतृक-समाज से नही उभरा था. देश की राज्य सत्ता का आधार स्थानीय सामजिक शक्तियां नहीं थीं वरन किराए की सेना थी. भारतीय समाज की ताकत छितराई हुई ग्रामीण जातियाँ थीं जो बाह्य राजनितिक संगठनों के कारण विश्रन्खलित रूप में रह रहीं थीं. यही कारण था कि भारतीय जनता एक केन्द्र राज्य के अंतर्गत एकत्रित नहीं हो सकीं. किसी भी राष्ट्रीय शक्ति का उदय राष्ट्रीय राजनीतिक जाग्रति से ही होता है. सामन्ती मुसलमान इसलिए भारत पर विजय प्राप्त कर सके क्योंकि जनता ने एकत्रित होकर उनका विरोध नहीं किया. समाज का ऐसा विकास नही हो सका था. केवल राजपूताना में जहाँ सामंतवाद काफ़ी प्रगति कर चुका था को विदेशी पूरी तरह अपने अधिकार में नहीं ले सके. सामंतवाद यहाँ कि जमीनी उपज थी जबकि बाहर से आया मुसलमानी सामंतवाद जबरदस्ती थोपा गया सामंतवाद था जिसने स्थानीय सामंतवाद को आगे अपनापन नहीं दिया. हुआ यह कि देवधर्मी पैतृक हिंदू राज्य जो सामंती राजतंत्र में विकसित हो सकते थे उनको साम्राज्यवादी प्रांतों का रूप दे दिया गया. सामंतवाद, जो बनने की स्थिति में था, राष्ट्रीय संगठन के रूप में स्थानीय रूप से विकसित नहीं हो सका.

मुसलमानों का साम्राज्यीय और प्रांतीय राज्य स्थानीय सामंती सरदारों के ख़िलाफ़ था और यदि वे ताकतवर होते तो मुसलमानी हक़ को खल्श होती. मुसलमान देश के सामंतों को पूरी तरह अपने अधीन नहीं कर सके. यही कारण है कि हम उन स्थानीय सामंतों को बारम्बार विद्रोह करते देखते हैं. पर इन सामंतों के विद्रोह को राष्ट्रीय जागृति नहीं माना जा सकता.

अठारहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक मुसलमानी सामंती साम्राज्यवाद भारत पर करीब पांच सौ राज कर ढह गया. उसका पतन किसी एक वर्ग के कारण नही हुआ. मुसलमानों का राजतंत्री सामंतवाद सेना के बल पर टिका था वह स्थानीय राज्यों के विद्रोह से ढह गया क्योंकि स्थानीय सामंतों के पीछे जन बल था. मुग़ल साम्राज्य और उसकी सेनाओं ने आक्रमणकारिता के साथ लुटेरा रूप ले लिया था. भारत में बसने वाली सभ्यता बारम्बार लूटी जाती रही. उनकी सेनाओं का लुटेरों का रूप अधिक रहा जन रक्षा का रूप कम. मुग़ल सेना का उपयोग व्यक्तिगत लाभ के लिए लेने लगे. सिख, राजपूत और मराठों के शक्तिशाली होने के कारण भी मुग़ल साम्राज्यवाद का पतन हुआ.

थोड़े में मुगलिया सामंती साम्राज्यवाद की यह रूपरेखा प्रकट की गई है. अब आधुनिक ब्रिटिश साम्राज्यवाद को लेते हैं :

अठारहवीं शताब्दी के प्रथम दशकों में जब मुग़ल साम्राज्य का पतन हुआ तब भारत में व्यापारिक कम्पनी विद्यमान थी जो मुग़ल साम्राज्य के पतन की निर्णायक रही. ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी भारत पर राजनीतिक पैर ज़माने में सफल रही. इसका साथ स्थानीय व्यापारियों ने भी दिया.अंग्रेजों ने जिस सरलता से अलग-अलग राजाओं पर विजय प्राप्त की उससे पता चलता है कि भारतीय सामंतवाद पतनोन्मुख हो गया था. इस विजय में अंग्रेजों का साथ स्थानीय सेना ने दिया जिसमें अधिकांशतः कृषक थे. बाहर से आए व्यापारी बाहर से आए विजेताओं को आसानी से हरा सके.

अंग्रेज आभिजात्य वर्ग भारत को उपनिवेश बनाने में अधिक दिलचस्पी रखता था. अंग्रेज आभिजात्य वर्ग राजनितिक सत्ता में आ गया तो यह अवश्यम्भावी था कि भारत में भी अभिजात्य वर्ग उभरता. सम्भावना थी कि यही वर्ग आगे चल कर अंग्रेजी राज्य के लिए खतरा बनता. आभिजात्य वर्ग की पराजय ने सामंतों को पुनर्स्थापन की स्थिति में ला दिया जिससे किसान पुनः दासता की स्थिति में आ गया. समाज का (व्यापारिक) विकास इससे ठप हो गया. स्थिति विपरीत हो गई. सारे देश में राजनीतिक अराजकता फ़ैल गयी. बाहर से आयी अधिक उन्नत ताकत ने कब्जा कर लिया.

१८५७ की प्रथम स्वातंत्र्य क्रांति (जिसे अंग्रेजों ने सिपाही विद्रोह की संज्ञा दी थी) के बाद सामंतवाद समाप्त हो गया - मुगलिया सामंती साम्राज्यवाद और स्थानीय सामंतवाद दोनों. एम.एन.रॉय ने अपनी पुस्तक ‘इंडिया इन ट्रांसिशन’ (India in Transition) में पृष्ठ २०-२१ पर लिखा है “The revolution of 1857 was nothing but the last effort of the dethroned feudal potentates to regain their power. It was a struggle between the worn out feudal system and newly introduced commercial capitalism for political supremacy. At the same time, when feudalism was crumbling down in Europe before the rising bourgeoisie, a vibration of this great social struggle did not remain unfelt in India.”

अंग्रेजों ने भारत को दो प्रकार की प्रशासनिक पद्धतियों में बाँट दिया. एक रियासती भारत और दूसरा ब्रिटिश भारत. रियासतों में राजाओं को Wards of the British Empire की स्थिति में ला दिया. जैसा कि आज कहा जाता है भारत सामंतवादी देश नहीं रहा. भारत में सामंतवाद किसी भी क्रांति के कारण समाप्त नहीं हुआ ( योरूप कि तरह) वरन शांति और प्रगतिशीलता के कारण हुआ.

सामंतवाद, जिसकी अपनी आर्थिकता रही है, को पहला मरण-धक्का उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य लगा जब राजनीतिक सत्ता अंग्रेजों के हाथ से आभिजात्य वर्ग के हाथ में चली गयी. जिस रूप में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अंग्रेजी व्यापारिक पूँजी को भारत में मजबूत बनाया उसी अनुपात में सामंतवाद ढहता गया. परन्तु ईस्ट इंडिया कम्पनी को ताक़तवर होनें में सौ साल लगे.

अंग्रेजों का आधुनिक पूंजीवादी साम्राज्य का रूप क्या रहा उसे जानने के लिए हम एम. एन. रॉय की पुस्तक India in Transition 'संक्रान्ति में भारत' का लंबा उद्धरण यहाँ प्रस्तुत कर रहें हैं जो उस स्थिति को अच्छी तरह प्रकट करता है:

“…of the 12,328 big land owners, nearly 700 are classed in the category of Native States. Their chiefs are called Feudalatory or Protected Wards of the British Government. One third of the area of the country, or 20,555 square miles, is governed by these chiefs and is known as native India. The biggest of these is Hyderabad or Nizam’s dominions, which equals Italy in area with 13,500,000population. The smallest is limited to only five villages. The aggregate population of native India is 72,000,000 a little less than one fourth of the entire population of the country. The existence of these native states is responsible for India being called a feudal country. Theoretically the native chiefs enjoy the sovereign power with their respective territories, but practically they have no power whatever much less do they constitute the backbone of the socio economic structure of the country. The internal administration of some of these states is feudal , except a few, none of these feudal states is directly descendent from the feudal nobility of pre-British India . To all intent purposes, they are puppets in the hands of British Government. Besides the local and municipal administration, all these states are governed politically and militarily by the British commercially and industrially by the native bourgeoisie. In fact the native bourgeoisie has more influence in the government of the native states than the Government of India. All these states have legislative councils of their own representing the local commercial and land owning class and lately the industrial bourgeoisie is fast making itself supreme. But the autocrat in whom the absolute power is vested for all practical purposes is the one who is the representative of the British Government. Originally the Residents were sent to the courts of the native princes as administrators of the British Government…but being the representative of the more advanced social class, namely the bourgeoisie, these Residents have in course of time become the arbiters of the states… Therefore we see that even in thesenative states where at least the shadow of feudalism still clings to a certain extent, it is the bourgeoisie which wields the political power.
“In the internal administration of many of the larger native states the progressive tendency of the bourgeoisie is more clearly manifested. In states like Mysore, Travancore, Baroda Cochin etc the percentage of literacy is much lower than in British India.”

यहीं समाप्त होती है राजस्थान में सामंतवाद की गाथा.

सामंतवाद का पहला स्वरूप:

“So long as the surplus product of labour passed, in forms of tax, toll, and rent into the hands of kings and nobles, the church, the orders, and city funds whether consumed, to be consumed in luxury or to be accumulated as a treasure it remained feudalism. It could not give rise to capitalism. (The Evolution of Modern Capitalism By J.Thomson Page-7)

और मुगलिया सामंती साम्राज्यवाद विदेशी शक्तियों का स्थानीय उभरते सामंतवाद का शोषण और भारत के अलग-अलग राज्यों का एकीकरण मातहती के रूप में किया जिसका विरोध स्थानीय राजपूताना के राजाओं ने केवल अपने राज्य को कायम रखने के लिए किया. जबकि आधुनिक अंग्रेजी पूंजीवादी साम्राज्यवाद ने रियासतों के रूप में अपने स्वार्थों के कारण अर्द्ध सामंतवाद को कठपुतली के रूप में कायम रखा.

इंग्लैंड को, कार्ल मार्क्स के अनुसार, भारत में दो लक्ष्य प्राप्त करने थे. एक विध्वंशंक (विघटनकारी) और दूसरा पुनरुद्धारक- प्राचीन एशियाई समाज का विनाश और एशिया में पाश्चात्य समाज की भौतिक नींव डालना. एशियाई समाज जो पूर्वी सामंतवाद के रूप में विद्यमान था. ब्रिटिश पूँजी ने भारत को एक उत्पादक देश बनाने की ओर प्रेरित किया - रेलों की स्थापना से औधोगिक विकास के रूप में.

इतिहासकारों में, जैसा कि उनका विश्वास रहा, अंग्रेजों का भारत सामंती देश नहीं था. वह पूंजीवादी देश भी नहीं था. यद्यपि अंग्रेजों नें सामंतवाद को रियासतों के रूप में बर्दाश्त किया. कहना होगा कि भारत पूंजीवादी व्यवस्था की कक्षा (धुरी) में था.