Sunday, January 29, 2017

जयपुर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल

विश्व पटल पर गुलाबी नगरी को मिली नई पहचान 



राजेंद्र बोड़ा 

जयपुर का फिल्मों से पुराना रिश्ता रहा है। पिछली सदी में जब पर्दे पर चलती फिरती तस्वीरों की नई यांत्रिक कला हिंदुस्तान में पहुंची तभी से फिल्में बनाने वालों की यहां आवाजाही बन गई। यहां फिल्मांकन करने देश और विदेश दोनों जगहों से सिनेकार लगातार आते रहे हैं। गुलाबी शहर उनके लिए सदैव आकर्षण का केंद्र रहा। मगर इस शहर की पहचान हमेशा ऐतिहासिक आमेर का क़िला और शहर के मध्य स्थित हवा महल ही बने रहे। यहां के जवाहरात उद्योग ने भी इस शहर को पहचान अपनी दी।

वर्ष 1925 में बनी फिल्म लाइट ऑफ एशिया का एक दृश्य

फिल्मों को जयपुर में शुरू से ही प्रोत्साहन मिलता रहा है। वर्ष 1925 में भारत और जर्मनी के तकनीकी सहयोग से बनी भगवान बुद्ध के जीवन पर आधारित फिल्म लाइट ऑफ एशिया (प्रेम संन्यास) एक मूक फिल्म थी जिसकी अधिकांश शूटिंग जयपुर में हुई। तब सवाक फिल्मों का चलन शुरू नहीं हुआ था। तत्कालीन जयपुर महाराजा ने इस फिल्म की यूनिट को फिल्मांकन के लिए पूरी सुविधाएं दीं जिसके लिए फिल्म के क्रेडिट में जयपुर के महाराजा को धन्यवाद ज्ञापित किया गया थाहिंदुस्तानी सिनेमा की सार्वकालिक क्लासिकमुले आजम के अलावा लोकप्रिय संगीत प्रधान फिल्म राजकुमार में आमेर और उसके आसपास के दृश्य आसानी से पहचाने जा सकते हैं तो दुर्गेश नंदिनीके दृश्यों में जयपुर के जवाहरलाल नेहरू मार्ग पर स्थित केसरगढ़, जहां अब राजस्थान पत्रिका का मुख्यालय है, को भी दर्शक आसानी से पहचान सकते हैं। विदेशी फ़िल्मकार भी यहां फिल्में बनाने आते रहे हैं।

ज़माना बदला, दुनिया बदली और शहर का रंग-ढंग भी बदला। नए दौर में पुरातन के प्रति लगाव रखते हुए भी सफलता की नई कहानियां लिखी जाने लगी। इक्कीसवीं सदी का पहला दशक इस मायने में अत्यंत महत्वपूर्ण रहा जब ऐसे जतन हुए जिनसे शहर को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली। इसमें एक महत्वपूर्ण जतन रहा जयपुर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (जिफ) के आयोजन का जिसके जरिये गुलाबी नगरी ने अब विश्व सिनेमा के नक्शे पर प्रमुखता से अपना स्थान बनाया है।जिफ न केवल स्थानीय दर्शकों को विश्व सिनेमा से रूबरू करवाता है बल्कि विश्व को जयपुर से परिचित कराता है।

दुनिया में अनेकों स्थान ऐसे हैं जो सिर्फ अपने यहां होने वाले फिल्म समारोहों के लिए जाने जाते हैं। जैसेकान फिल्म समारोहभारत में गोवा को लें जिसकी नई पहचान वहां प्रति वर्ष होने वाला अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह बनने लगा है। 
  
जयपुर को विश्व में नई पहचान देने वाला जयपुर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल की शुरुआत 2009 में राजस्थान विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में एम.ए. करने के बाद फिल्म निर्माण में पोस्ट ग्रेज्युएट डिप्लोमा लेकर आए हनु रोज ने की। यह शुरुआत उत्साहवर्धक थी। वर्ष 2009 की 31 जनवरी से 2 फरवरी तक चले पहले जयपुर इन्टरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में सात देशों की 148 फिल्मों का प्रदर्शन हुआ।

जयपुर के आधुनिक इतिहास में यह एक निर्णायक मोड साबित हुआ। पहले समारोह ने ही दुनिया के सिने जगत को यह संदेश दे दिया कि विश्व सिनेमा का एक नया गंतव्य करवट ले रहा है। इसका उत्साहवर्धक नतीजा वर्ष 2010 में साफ नज़र आया जब दूसरे समारोह के लिए 41 देशों से 350 फिल्मों की प्रविष्टियां मिली। इसके बाद बस आगे ही आगे बढने की कहानी है। विश्व में होने वाले फिल्म समारोहों में तेजी से उभरते हुए जिफ ने अपने लगातार नौ सालाना आयोजनों से जयपुर को विश्व सिनेमा की राजधानी के रूप में स्थापित स्थापित कर दिया है।

इस साल जिफ-2017 फिल्म समारोह का नौ वां अंक था जिसमें 104 देशों से 2176 फिल्मों की प्रविष्टियां प्राप्त हुई और अंतराष्ट्रीय चयनकर्ताओं द्वारा चुनी गई 80 देशों की 384 फिल्में प्रदर्शित की गईं। यह एक कीर्तिमान है।

फिल्में बनाने की सुविधाओं युक्त करीब 80 देशों को मिला कर लगभग सौ देशों में फिल्में बनती हैं। जहां फिल्में बनाने की सुविधाएं नहीं है वहां के लोग अन्य देशो से तकनीकी और अन्य सुविधाएं लेकर फिल्में बनाते हैं। जयपुर नगर गर्व कर सकता है कि इस शहर में होने वाले इस समारोह में इन सभी देशों से फिल्में आती हैं। यह बात भी गर्व से कही जा सकती है कि इतनी तेजी से बढ़ कर अपनी और गुलाबी नगर जयपुर की पहचान बनाने वाले जिफ जैसी कोई और मिसाल दुनिया में नहीं मिलती।

जिफ की एक दशक की यात्रा में हिन्दी फिल्म जगत के चमकते सितारों ने भरपूर शिरकत की है तो फिल्मों की अन्य विधाओं से जुड़े अन्य लोगों की भागीदारी भी इसमें रही है। इस साल जिफ ने फिल्म समारोह की ओपनिंग दक्षिण भारत की फिल्म इंडस्ट्री को समर्पित कर देश की सांस्कृतिक एकता को प्रदर्शित करने का विनम्र प्रयास किया। इसी के चलते भारतीय फिल्म जगत के सबसे बड़े संस्थान प्रसाद प्रोडक्शन के प्रमुख रमेश प्रसाद को लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार देकर जिफ ने दक्षिण भारत के फिल्म उद्योग को ही नहीं सम्मानित किया बल्कि इस संस्थान के संस्थापक एल वी प्रसाद को भी अपनी श्रद्धांजलि दी जो हिंदुस्तानी फिल्मों के नींव के पत्थरों में से एक थे। रमेश प्रसाद इन्हीं एल वी प्रसाद के बेटे हैं और अपने पिता की कला विरासत को संभाल रहे हैं।
   
रमेश प्रसाद को लाइफ टाइम आचीवमेंट पुरस्कार साथ है दक्षिण के जाने माने फिल्म निर्माता निर्देशक हरिहरन 
जयपुर इतिहास में कभी कारोबारी मंडी के रूप में भी अपनी पहचान रख चुका है। जिफ ने नए युग में इस शहर में फिल्म निर्माण का बाज़ार विकसित करने की भूमिका निबाही है। जिफ ने दुनिया भर के फ़िल्मकारों को एक नया मंच दिया है जहां वे आपस में मिलते हैं और देश की सीमाओं को लांघ कर साझे में फिल्में बनाने के अवसर तलाशते हैं। समारोह के दौरान होने वालीको-प्रोडक्शन मीटकी जयपुर को विश्व सिनेमा की राजधानी के रूप में प्रतिष्ठापित करने में बड़ी भूमिका रही है।

यंत्र तकनीक वाली फिल्म कला की दुनिया में जयपुर की यह नई पहचान राजस्थान को देश का अग्रणी श्रेणी का राज्य बनाने के शासन के प्रयासों में भी एक सकारात्मक योगदान है।

(यह आलेख राजस्थान सरकार के सूचना और जनसंपर्क विभाग की पत्रिकासूजसके 20 जनवरी के अंक में छपा)   

Wednesday, January 11, 2017

ज़ुबान-ए-यार मन तुर्की: भारतीय सिने संगीत में उर्दू





राजेंद्र बोड़ा

यदि कोई पूछे कि भारतीय सिनेमा की ज़ुबान कौन सी है तो जवाब देते हुए यह कहने में कोई ज़रा सी देर भी नहीं लगाएगा – हिन्दुस्तानी। और यह हिन्दुस्तानी क्या है? यह वो ज़ुबान है जिसमें इस देश की गंगा-जमनी संस्कृति बोलती है। इस ज़ुबान में सभी बोलियों का खूबसूरत संगम है।

भारतीय सिनेमा जब 1932 में आर्देशिर ईरानी की फिल्म आलम आरा से बोलने लगा तब फिल्म व्यवसाय के लोगों को बड़ी चिंता हुई कि मूक फिल्मों की देश के सभी भाषाई इलाकों में जो सर्वव्यापकता थी वह कैसे बनी रहेंगी? मगर नए देशी सिनेमा की ज़ुबान की जो भाषा बनी वह थी हिन्दुस्तानी। देश की पहली ही सवाक फिल्म के साथ ही फिल्मी गानों का दौर शुरू हुआ जिससे इस नई ज़ुबान ने सिनेमा के पर्दे के बाहर भी लोगों का दिल ऐसा जीता कि सभी क्षेत्रीय भाषाई दूरियां मिट गईं और देश के कोने-कोने में ही क्यों दुनिया भर में इस ज़ुबान के गाने लोगों के मुंह पर चढ़ गए। फिल्म संगीत ने अपना ऐसा जादू बिखेरा कि लफ़्ज़ कहीं पीछे छूट गए और धुन का जादू सिर चढ़ कर बोलने लगा। हिन्दुस्तानी का एक शब्द भी नहीं समझने वाले विदेशी तक भारतीय फिल्मों के गाने गुनगुनाने लगे।

हिन्दुस्तानी ज़ुबान में सबसे अधिक आमद उर्दू की रही। वैसे उर्दू खुद भी तो भी हिन्दी समेत कईं भाषाओं का गुलदस्ता ही तो है। देखा जाय तो उर्दू और हिन्दुस्तानी सिनेमा जिसे हिन्दी सिनेमा कहते हैं एक दूसरे से ऐसे जुड़े हैं कि इन्हें अलग कर के देखा ही नहीं जा सकता। यही कारण है कि हिन्दुस्तानी फिल्मों में उर्दू के शायरों का दबदबा हिन्दी के कवियों से कहीं अधिक रहा है।  
              
कहते हैं कि हिन्दी सिनेमा की काया उर्दू की जबांदानी और लोकाचारी संस्कारों से बनी है। भारत की बोलती फिल्मों ने अपना बुनियादी ढांचा उर्दू फारसी थियेटर से हासिल किया। इसलिए बोलती फिल्मों की शुरुआत उर्दू से हुई। यहां तक कि कलकत्ता का न्यू थियेटर भी उर्दू के लेखकों का इस्तेमाल करता था।

हिंदुस्तानी फिल्मी गानों को गुनगुनाने के लिए भाषा आड़े नहीं आती यह अनेक बार साबित हो चुका है। कुछ उदाहरणों का जिक्र हम यहां करेंगे। 

अमीर खुसरो ने फारसी और बृज भाषा का अद्भुत संगम करते हुए रचनाएं की। वे फारसी की पंक्तियों से शुरू करके हिन्दी की पंक्तियों पर खत्म करते थे। उनकी इस लेखन शैली की एक उत्कृष्ट रचना है:

ज़िहाल-ए-मिस्कीं मकुन तगाफ़ुल दुराये नैना बनाये बतियां
के ताब-ए-हिज़रां नदारम –ए-जां ना ले हो काहे लगाये छतियां

अमीर खुसरो की फारसी लाइनों से अपना गाना उठाते हुए गुलज़ार ने जे. पी. दत्ता की फिल्म गुलामी (1985) के लिए अपने गाने का मुखड़ा कुछ यूं बनाया:   

जिहाल-ए-मिस्कीं मुकुन-ब-रंजिश, ब-हाल ए हिज़रा बेचारा दिल है/ सुनाई देती है जिस की धड़कन तुम्हारा दिल या हमारा दिल है।

अब शुरुआती फारसी लाइनों का अर्थ न समझते हुए भी लोगों ने यह गाना खूब गाया।
इन फारसी लाइनों का अर्थ है: इस मिसकीं (लाचार) जिहाल (दिल का हाल) देखो तो, रंजिश (गुस्से या अदावत) से मकुन (नहीं)। इस बेचारे दिल को ब-हाल (हाल ही) में अपने महबूब के हिज़रा (जुदाई) का गम मिला है।


इसी प्रकार अल्लामा इकबाल की एक मशहूर नज़्म है जिसे फिल्म संगीत के शौकीन खूब रस लेकर सुनते हैं मगर उसके फारसी लफ्जों वाले मुखड़े का अर्थ उर्दू से नावाकिफ अधिकतर लोग नहीं जानते। इकबाल की इस इस मशहूर नज़्म का उपयोग धर्मेंद्र और नूतन अभिनीत 1966 की फिल्मदुल्हन एक रात कीमें संगीतकार मदन मोहन ने कव्वाली के रूप में किया:


कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़र नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में
के हज़ारों सजदे तड़प रहे हैं मेरी जबीन-ए-नियाज़ में

फिल्म संगीत सुनने वाले इस कव्वाली का आनंद लेते हैं मगर उन्हें यदि फिल्म से इतर इसकी पृष्ठभूमि बहुतों को मालूम नहीं। पीएचडी किए हुए इकबाल से जब लोगों ने पूछा कि डॉक्टर साहब आप तो नमाज़ ही नहीं पढ़ते हैं, क्यों? तो उनके जवाब में इकबाल ने यह नज़्म लिखी। इसमें वे कहते हैं खुदा सामने आए तभी मैं प्रार्थना में झुकूं। मुंतज़र (खुदा) की हकीकत सामने आए तो ही मैं सज़दे करूंगा (और ऐसा होने के) इंतज़ार में मेरी ज़ुबान पर हजारों प्रार्थनाएं मचल रही हैं।

मोमिन खाँ मोमिन का एक मशहूर शेर है जिसके लिए गालिब ने कहा था कि इस इस शेर के बदले वे अपना सारा दिवान देने को तैयार हैं :

तुम मेरे पास होते हो गोया, जब कोई दूसरा नहीं होता

इसी का उपयोग हसरत जयपुरी ने अपने एक गाने के मुखड़े में किया जिसकी पहली पंक्ति बड़ी क्लिष्ट प्रतीकात्मक उर्दू में थी : ओ मेरे शाहे खुबां मेरी जान-ए-ज़नाना फिर उन्होंने इसमें जोड़ा तुम मेरे पास होते हो दूसरा कोई नहीं होता। फिल्मलव इन टोक्यो(1966/मोहम्मद रफी/शंकर जयकिशन)। भले ही लोग इस मुखड़े की पहली पंक्ति का शब्दार्थ न जानें मगर भाव समझ जाते हैं और गाने के आनंद में इससे कोई कमी नहीं आती।             

जॉय मुखर्जी की एक फिल्म थी एक मुसाफिर एक हसीना (1962)। भले ही यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कोई करिश्मा नहीं दिखा सकी मगर ओ. पी. नय्यर के संगीतबद्ध किए जो कयामत की धूम मचाई उसकी गूंज आज भी कम नहीं हुई है। इसमें शेवन रिजवी ने एक गाने में अमीर खुसरो की कुछ पंक्तियों का उपयोग किया था। खुसरो की फारसी पंक्तियां हैं ज़ुबान-ए-यार मन तुर्की, मन तुर्की नमी दानम। इसी को शेवन रिजवी ने अपने गाने के अंतरों के बीच चार बार डाला। नय्यर के संगीत में इतना खूबसूरत गाना बना कि न सुनने वालों ने और न उसे गुनगुनाने वालों ने पूछा कि इस पंक्ति का मतलब क्या है। यह पंक्ति प्रेमी और प्रेमिका के बीच भाषा की मुश्किल को बयान करती है कि बात कैसे हो। दोनों एक दूसरे की ज़ुबान नहीं समझते। तो महबूब कहता है मेरे यार की ज़ुबान तुर्की है, काश उसके मुंह में भी मेरी ही ज़ुबान (भाषा) होती।

जॉय मुखर्जी की पहली फिल्म लव इन शिमला (1960) फिल्म भी सफल हुई और फिल्म की नायिका साधना के बालों का कट देश भर में क्रेज़ बन गया और साथ ही इकबाल कुरैशी के संगीत से सजे गानों की भी जबर्दस्त धूम रही। गीतकार राजेन्द्र कृष्ण ने एक गीत में तो उर्दू की वर्णमाला ही लिख दी। संगीतबद्ध हो कर यह गाना खूब चला और लोगों ने उसे गुनगुनाया भी। यह गाना थाआलिफ़ ज़बर आ आलिफ़ ज़ेर आ आलिफ़ पेश ओ... आलिफ़ से अब्बन   मगर किसी ने यह जानने की कोशि नहीं की कि उसका अर्थ क्या है क्योंकि फिल्मी गानों के आनंद में भाषा कभी आड़े नहीं आती।

मगर ज़माना बदला, भारतीय सिनेमा बदला उसकी ज़ुबान बदल गई अब बाज़ार को अंग्रेजी भाती है तो वही छा रही है। फिल्म संगीत में नज़ाकत, नफासत, मेलोडी गुम हो गई है। लगता है आखरी बार गुलज़ार की उर्दू सुनी फिल्मदिल से(1998) में वो यार है जो खुशबू की तरह जिसकी जुबां उर्दू की तरह  

(यह आलेख कला, संस्कृति और पर्यटन को समर्पित पत्रिका स्वर सरिता के जनवरी 2017 अंक में छपा)