Wednesday, March 30, 2011

Inauguration of Greater Rajasthan was all royal affairs

Rajendra Bora

When Greater Rajasthan was inaugurated by Sardar Vallabh Bhai Patel, the architect of integration of India, on March 30 in 1949 the ceremony to mark the occasion held at Darbar Hall in the City Palace of Jaipur was mostly all royal affairs as most of the senior Congressmen left the venue in a huff over the sitting arrangements.

On this day, 62 years ago, four major princely states – Jaipur, Jodhpur, Bikaner and Jaisalmer- merged with Samyukt Rajasthan which was earlier inaugurated by Jawahar Lal Nehru in Udaipur on April 18, the previous year.

At the ceremony Patel sworn in Maharaja Sawai Mansingh of Jaipur as Rajpramukh. Rajpramukh later administered the oath of office of the Premier of the newly emerged state to Hiralal Shastri, who was till then Chief Minister of Jaipur.

At the time of formation of Greater Rajasthan the Congress had four stalwarts – Jai Narayan Vyas from Marwar, Manikya Lal Verma from Mewar, Hiralal Shastri from Jaipur and Gokul Bhai Bhatt from Sirohi- leading the organisation.

“Local Congress house was divided,” recalled V. P. Menon, a civil servant who played a vital role in the process of integration of princely states into India, in his book ‘The story of the integration of the Indian States’.

Shastri, who was made the Premier of Grater Rajasthan was the choice of Patel but was not acceptable to leaders from Marwar and Mewar. Verma from Mewar was more vocal in his displeasure over the choice. According to his diary entries he “warned” Patel not to make Shastri head of the newly formed State because “Congress workers in Rajasthan would not accept him.”

In another entry in Verma’s diary states “I did not know (at that time) that Jaipur was being made the capital and Premiership was too going to Jaipur in the bargain of transferring Abu to Gujarat.”

It was probably culmination of the anger among majority Congressmen that exhibited at the inaugural ceremony with Verma leaving the venue after finding that all front rows were reserved for royals. He wrote in his diary that even “ministers of Samyukt Rajasthan and other states joining the Greater Rajasthan” were not provided respectful place in the ceremony.
Another civil servant V. Shankar in his book my ‘Reminiscences of Sardar Patel’ wrote: Maharaka of Jaipur insisted that we should all don Rajasthani dress… His Highness sent turbans for all of us- myself, V. P. Menon. M. K. Vellodi, and N.M, Buch.
The rift in the Congress rank and file was so deep that they refused to join the ministry formed by Shastri. Despite support from Patel and Gokul Bhai Bhatt, the then PCC chief, obeying the Patel’s decision, Shastri ministry could not last long as the Pradesh Congress Committee (PCC) in its emergency meeting on June 11, 1949 passed a vote of no- confidence against it. Hurt over the vote when Bhatt resigned, the PCC elected Vyas as its President. However, AICC turned down the PCC decision. But local sentiments finally reigned supreme and Shastri, a loner, ultimately resigned and a civil servant C S Venkatachari was made the Premier of the State on January 6, in 1951.

However unanimous choice of Rajasthan congressmen prevailed later and Jai Narayan Vyas was sworn is Chief Minister on April 26, 1951.

(The piece appeared on the front page of Hindustan Times on March 30, 2011)

Sunday, March 27, 2011

होली का रंग गेर के संग

राजेन्द्र बोड़ा

होली का उत्सव अन्य सभी उत्सवों से अलग है। हालांकि सभी उत्सव वे समय होते हैं जब थोड़ी देर के लिए हम अपने जीवन की मुश्किलों को भुला कर कुछ आनंद में डूब जाते हैं। इसीलिए हमारे जीवन में उत्सवों का बहुत महत्व है। वे हमें अपनी संस्कृति से भी जोड़े रखते है। संस्कृति समाज को जोड़े रखने में बड़ी भूमिका निभाती है। उत्सवों में विभिन्न कलाओं के माध्यम से समाज के लोगो की प्रतिभाएँ भी सामने आती हैं।

सूर्य नगरी के नाम से विख्यात जोधपुर शहर को उत्सवों का की नगरी कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जोधपुर के लोगों को तो बस कोई मौका चाहिए उत्सव मनाने का। इसीलिए यहाँ हर रोज ही कोई न कोई धार्मिक या सामाजिक उत्सव चलता ही रहता है। यही कारण है यहाँ के लोगों में जैसा प्रेम भाव नज़र आता है वैसा अन्य जगहों पर कम ही देखने को मिलता है। यहाँ के वाशिंदों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि उनमें आपसी मेल बहुत है। यहाँ की मारवाड़ी भाषा ने सबको बड़ी खूबसूरती से इस तरह जोड़ रखा है कि अलग अलग समुदायों के लोगों में फर्क करना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे में जब होली आए और जोधपुर के लोग एक दूसरे को रंगों में पूरी तरह सरोबार नहीं करें ऐसा हो ही नहीं सकता। इस दिन शहर की सदियों से चली आ रही परम्पराएं जीवंत हो उठती है।

होली की जोधपुर में बड़ी पुरानी परंपरा है ‘गेरों’ की। ‘गेर’ पुरुषों की टोलियाँ होती है जो चंग की थाप पर होली के गीत गाते हुए शहर में एक स्थान से दूसरे स्थान को घूमती फिरती हैं। गेरें जहाँ से भी गुजरती हैं उन्हें सुनने के लिए लोगों के हुजूम उमड़ पड़ते हैं। होली के कई दिन पहले से गेरें निकलनी शुरू हो जाती है। होली के जलने के दूसरे दिन, जिसे मारवाड़ी में छालोड़ी कहते हैं, जब गेर के लोग गाते और चंग बजाते शहर की गलियों से निकलते हैं तो लोग अपने मकानों और चबूतरों पर बैठे उनका इंतजार करते हैं। होली के गीतों का आनंद तो होता ही है साथ ही रंगीन पानी की बौछारें भी चलती रहती हैं।

पास के गावों से भी टोलियां आती हैं और शहर की मोहब्बत में भीग जाती हैं और शहर वालों को अपने गीतों से भिगो देतीं हैं।

मगर सबसे दिलचस्प होती हैं पुष्कर्णा ब्राह्मणों की गेरें। जमाना बादल गया। होली की मौज-मस्ती जो पहले बहुत लंबी चलती थी अब कुछ घण्टों में सिमट गई फिर भी गेरों की यहाँ अभी जीवित हैं। बीच-बीच में जब भी ऐसा समय आया कि लगने लगा यह परंपरा लोप हो रही है तो कोई न कोई बंदा इसे बचाने को कूद पड़ा और उसे समाज का समर्थन भी मिल गया।

फाल्गुन के यह फाग उत्सव की मौसम के मिज़ाज से मेल खाता है। इस परंपरा का करीब डेढ़ सौ सालों का इतिहास तो लोगों को जबानी याद है। यह परंपरा ऐसी है जिसमे आम जन तो फाग के रंगों में डूबते उतरते रहे ही हैं पुराने सामन्ती काल में तब के शासक भी उससे सरोबार होते रहे हैं।

जोधपुर के पुष्कर्णा ब्राह्मणों की फाग और महिलाओं द्वारा गायी जाने वाली गालियों की निराली परंपरा की ख्यात दिसावर भी पहुची हुई थी इसका एक दिलचस्प पुराना वर्णन लंबे समय तक एक प्रमुख गेर मंडली के प्रमुख रहे रामदेव व्यास ‘बाबूसा’ सुनते हैं। जोधपुर के तत्कालीन महाराजा मानसिंह स्वयं गुणी व्यक्ति थे। वे कविताएँ रचते थे और संगीत के भी ज्ञाता थे। इसीलिए उन्हें ‘रसीले राज’ भी कहा जाता था। जब उन्होंने अपनी कन्या का उदयपुर के राजकुमार के साथ संबंध पक्का किया तो उदयपुर के महाराणा चाहते थे कि लड़की वाले वहीं आ जाएँ और वहीं विवाह हो। मगर महाराजा मानसिंह ने उन्हें बारात लेकर जोधपुर आने का आग्रह के साथ निमंत्रण दिया। कहते हैं उदयपुर के महाराणा ने इस शर्त पर बारात लेकर जोधपुर आना स्वीकार किया कि पुष्कर्णा ब्राह्मणों में जिस विधि विधान से विवाह होता है वैसा ही विवाह होगा और पुष्करणों के विवाहों में जिस प्रकार समधिनों को संबोधित करते हुए ‘गाल’ गायी जाती है वैसी ही ‘गाल’ खुद महाराजा मानसिंह गाएँगे। लड़के वालों की दोनों बातें मानी गई। महाराजा मानसिंह कि गायी गाल “नाजकड़ी ब्यावण आवे/ नाजकड़ी ब्यावण क्यूँ शरमावे” आज भी प्रचलित है।

रंगों में भींजते हुए अपने समधियों के घरों के बाहर जाकर गालियाँ गाकर फाग का धमाल मचाने में भी अनोखा अदब रखा जाता रहा है। इसीलिए फाग कि गालियां, जिनमें अश्लील संकेतों वाली चुहलबाजियों का आनंद होता है, को सुनने स्त्रियाँ भी पुरुषों से पीछे नहीं रहतीं।

होली से बहुत पहले गैरों की टोलियाँ नए नए गीत बनाने की तैयारी शुरू कर देती हैं। गीत लिखे जाते हैं, उनकी धुनें बनती है और उन पर नृत्य की तैयारी भी होती है। पहले केवल चंग वाद्य ही गालियों को रिदम देने के लिए हुआ करता था। फिर उसमें चिमटा और हारमोनियम भी जुड़ गया। कालांतर में पूरा आर्केस्ट्रा ही साथ में बजने लगा जिसमें इलेक्ट्रॉनिक वाद्य भी जुड़ गए।

गेर परंपरा के सबसे पुरानी याद 140 वर्ष पहले मारवाड़ राज में दीवान रहे सूरज राज रामदेव की है जब वे अपने पाँच पुत्रों और मित्र मंडली के साथ ‘रामदेव रसाला’ गेर के नाम से मोहल्ले मोहल्ले जाकर अपनी ‘गालियों’ का रंग जमाते थे। उस मंडली की एक ‘गाल’ आँख रसीली ने अद्भुत मारी/ बस कियो ए भोलों भ्रह्मचारी” खूब लोकप्रिय हुई जो आज भी गाई जाती है।

‘गेरों’ में वाद्यवृंद –‘आर्केस्ट्राइजेशन’ – का प्रयोग शुरू करने का श्रेय आमतौर पर जालप मोहल्ले के लोगों को जाता है। जाने माने रंगकर्मी थे और ध्रुपद गायन में माहिर भानीरामजी होली के लिए ‘गालियाँ’ लिखते। जिन्हें संगीतबद्ध किया जाता और पूरे वाद्यवृंद के साथ वह ‘गेर’ निकली थी जिसका संचालन राजाराम पुरोहित करते थे। उस गेर की एक रचना अब भी लोगों की जुबान पर है “देखो नाचण पाटी पाडी/ पैरी फूल गुलाबी साड़ी/ आवो आवो जल्दी आवो कोई आस पुरावो”। इनकी शिष्य परंपरा में राजाराम, बदरिदास गुणिया, मोतीलाल कल्ला, नरजी उस्ताद, चतुर्भुक, चन्द्रशेखर कल्ला, गोविंद कल्ला, गिरधर कल्ला, मंशाराम पुरोहित ‘लुच्चा साहब’’, दाऊलाल रामदेव के साथ हिन्दी फिल्मों में संगीतकार बने बालकृष्ण कल्ला तथा राजस्थान संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष रहे राम कृष्ण कल्ला के नाम आज भी लोगों को याद है।

पिछली सदी के चालीस के दशक में आत्माराम रामदेव, जिन्हें सभी प्रेम से ‘आतूजी’ नाम से जानते और पुकारते थे की गेर सबसे मशहूर थी. , वे रेलवे में गार्ड थे। ‘आतूजी’ धोती, ऊपर बंद गले का कोट और सिर पर जोधपुरी साफा पहने, गले में बड़ा सा चन्द्रहार पहने गेर का नेतृत्व करते थे। पुष्ट देह और बुलंद और जबर्दस्त मीठी आवाज़ के धनी ‘आतूजी’ रंग से सरोबार हुए जब नौचोकिये से लेकर जालप मोहल्ले तक चंग पर होली के गीत गाते हुए निकलते थे तो राहों में उन्हें सुनने लोग उमड़ पड़ते थे। मोहल्लों के चौकों में जब रुक कर वे गाते थे तो वहाँ तिल रखने को जगह नहीं होती थी। मकानो की बालकनियों, खिड़कियों और छतों पर चढ़ कर लोग उनके गीतों का लुत्फ लेते थे। दिलचस्प बात यह है की होली के गीतों में बड़ी सफाई से अश्लील संकेत होते थे मगर पुरुषों के साथ महिलायें भी बड़ी संख्या में उनको सुनने उमड़ती थीं.

आजादी के आंदोलन में कूदे नेता सामाज सुधार के काम के जरिये राजनीति की सीढ़ियाँ चढ़ते थे। मूथा शिवदत्त जी महाराज व मारवाड़ में राजनीतिक और सामाजिक जागृति की अलख जमाने वाले जयनारायण व्यासने श्लील गेरें निकाली लेकिन अश्लील गेरों की लोकप्रियता कभी कम नहीं हुई.

बाद में राजस्थान के मुख्यमंत्री बने जयनारायण व्यास की ‘गेर’ सूर्य नगरी के इतिहास में एक अलग ही स्थान रखती है। उनकी ‘गेर’ में सरदारमल थानवी, मथुरादास, रामदत्त थानवी, मानमल, रण छोड़ दास गट्टाणी, जो बाद में हाईकोर्ट के जज रहे, आदि लोग होते थे। उनकी सीख भरी ‘गालियाँ’ होती थीं “मत दूध लजाईजे/ पाछो मत आइजे बेटा राड सूं”। उनकी ‘गालें’ जैसे “छोड़ो-छोड़ो ऐ सवागण काला ओढ़णा” समाज में नई चेतना खासकर स्त्रियों में जोश भरने में खूब कामयाब रहीं। “हाँ अगर जाति हित चावो तो बाल विवाह की रीत हटाओ” जैसी ‘गालियाँ” नया युग बोध देने का सशक्त माध्यम बनी। ऐसी ही कुछ ‘गालियों’ की बानगी देखिए “त्याग दे उत्तम रामजी वाली लक्ष्मी तूँ / खोटी रीतों ने जल्दी त्याग”, “जब तक पढ़ी लिखी नहीं नार / तब तक कठिन सुधार पियाजी”, “खोला छोड़ दो / मिलणी रो बढ्यो प्रचार/ रोको सरदारों”, “नासमझ रहेंगी जब तक ये घरवालियाँ “ जैसी गालियों का वर्षों तक प्रचार रहा।

यह जानना भी दिलचस्प होगा कि श्लील और अश्लील गेरों की धाराएं साथ चलती रहीं और दोनों किस्म की गेरों में कभी टकराव नहीं हुआ। होता तो यह था कि दोनों ही पख के लोग एक दूसरे के मंच पर आकार प्रस्तुतियाँ देते थे और दोनों को भरपूर दाद मिलती थीं।

जोधपुर में हालांकि ‘गेरों’ में बड़ा योगदान पुष्कर्णा ब्राह्मणों का रहता है मगर उनमें मुसलमानों समेत सभी समुदायों के लोगों की सक्रिय भागीदारी होती है।

गेरों की इस परंपरा को थानवी माईदास और सत्यनारायण ‘मुलसा’ जैसे लोग आज भी जीवित रखे हुए हैं। माईदास, जिन्हें ‘गेरों का अमिताभ बच्चन’ कहा जाता है की ‘गेर’ में नृत्य और संगीत का माहौल हावी रहता है जो दर्शकों को पूरी तरह बाँधे रहता है।

‘मुलसा’ की ‘गेर’ अपने गीत संगीत के लिए विख्यात है। कृपाकिशन ‘रिन्दी’ इनके लिए गीत लिखते हैं तो अमरदत्त ‘भा’सा’ संगीत निर्देशन रते हैं। ‘मुलसा’ की मशहूर ‘गालों’ में है “कागद बाँच ने भेगी आइजे”, “नाथूरामसा वाली लाडकी सुपने में रंग जावे रे/ झोंझरके तारो टूटेला”। उनकी ‘गेर’ 40 वर्षसे भी अधिक समय से निकल रही है।

उनके अलावा शहर में चार पाँच और टीमें भी हैं जो इस परंपरा का परचम थामे हुए है। इनमें दो भाई दिनेश और नरेश बोहरा अपनी अलग पहचान रखते हैं।

जोधपुर के ‘गेरों’ की बात हो और ‘फायसा गेर’ का जिक्र न हो तो बात अधूरी रह जाएगी। इसका प्रचलन अब तो नहीं है मगर गेर परंपरा में इसका भी स्थान रहा है। यह पूरी तरह अश्लील गीतों की गेर होती थी जो लोढ़ों की गली से निकलती थी। इसका समय निश्चित था। वह सवेरे-सवेरे निकलती थी। बिरदा उस्ताद और मीड़ा महाराज आदि इसके प्रमुख थे। ऐसा रिवाज था इस ‘गेर’ का प्रमुख गायक वही होता था जो अपने मोहल्ले की गली या अपने घर के बाहर अपने गेरियों के साथ परिवार की बहू बेटियों के बीच बच्चों के साथ सबसे पहले गा सके। दूसरी गेर निकालने वाले भी सुबह सुबह ‘फायसा गेर’ अलग से भी निकलते रहे हैं।

जोधपुर में होली का रंग और उल्हास कृष्ण मंदिरों में भी जम कर नज़र आता है। वैष्णव या वल्लभकुल संप्रदाय का यहाँ बड़ा प्रभाव रहा है और आज भी है। विशाल गंगश्याम मंदिर में फगोत्सव की छटा निरखते ही बनती है। आधी रात तक लोगों की भीड़ जमी रहती है और सारा माहौल गीत, संगीत और नृत्य की छटाओं से भीगा रहता है। मंदिर में यह फगोत्सव कई दिनों तक चलता है।

(यह लेख वीणा समूह की मासिक पत्रिका स्वर सरिता के मार्च 2011 अंक में छपा)

Thursday, March 3, 2011

'Fathji' wrote Ranthambhore’s success story


Rajendra Bora

Jaipur. Fateh Singh Rathore who lost battle with cancer in Jaipur on Monday fought untiring batlles for more than three decades against the establishment and poachers to save tigers in Ranthambhore. He wrote the success story of Ranthambhore Tiger reserve which could not be carried forward by his predesessors.

Born in a desert village in the then Royal state of Marwar, near Jodhpur, with little vegetation Rathore, fondly called Fathji by wild life enthusiasts, was nothing in his family background that could forecast that he would become a great protector of endangered wild animals.

In his schooldays he was not a studious boy and once aspired to become an actor. His grandfather pushed him into the Navy which could not hold him more than six months. He tried to become a lawyer and sold soft coal for a while.

Rathore joined the Forest department in 1960 as a Game Ranger in Sariska. That was the turning point in the life of Fathji. His fascination with forest and wild life remained with him till his last. Four years later he was posted at Mount Abu where he remained till 1971.

His tryst with Ranthambhorev came when he was asked by the government to organise a tiger shoot in 1961 for Queen Elizabeth II of Great Britain and her husband Duke of Edinburgh. It will be interesting to know that government issued permits for hunting until 1969.

The “Tiger Man” Kailash Shankhla, who launched ‘Project Tiger’ with the blessings and support of the then Prime Minister Indira Gandhi, handpicked Fathji and included him in the first group of foresters that was sent to Wild Life Institutte of India in Dehradun to get trained in forest management.

Fathji developed Ranthambhore with passion and with consummate skill bringing the wild life forest reserve on the global map. He was officially appointed as Field Director of Ranthambhore in 1978. During his tenure the forest area was declared as a National Park.

In 1970s prevalent opinion of experts was that it was no longer viable for tigers. But he did miracle. Fighting heavy odds he succeeded in freeing the wild area from human activities by relocating 20 villages from the core area to out of the sanctuary.

Althoug he wrote a fantastic success story of Project Tiger in Ranthambhore but he was always at loggerhead with the local administration and politicians. He suffered heavily and his career too was jolted as he was forced to face indignation of being suspended from service and later posted in Jaipur. The National Park later started deteriorating with abject apathy by the civil administration and interference from different lobbies.

After retirement he formed a NGO Tiger Watch and fought for survival of tigers and was a role model to wild life conservationists. His knowledge of the behaviour of big cat was legendry. He protected the tiger putting his own life in danger receiving physical assaults.

He was awarded International Valour Award in 1983 for breavery in the field. He was also presented with WWF Lifetime Conservatyion Award in recognition of his outstanding contribution in this field.

The wild life conservationists would miss him.

(The obit piece published in Hindustan Times on March 3, 2011)

Mehboob Ali : An Honest Intellectual in Politics


Rajendra Bora

Eighty year old Mehboob Ali, who passed away early Wednesday morning in Bikaner, was basically an intellectual rather than a run of a mill politician. Honesty and commitment was his hall mark. He was like an alien in the today’s breed of politicians.

In a political system which does not allow an honest, independent and impartial person to survive Mehboob Ali, fondly called Mehboob Saheb, was a shining example of a politician who could not be corrupted. He showed his mettle serving as minister for Public Health Engineering Department (PHED) in first ever non-Congress government in Rajasthan in 1977 when no tempting offer of money and political pressure could deter him from his crusade against corrupt officials.

He was like a Rishi (saint) having great insight into ills of society. An intellectual we should be proud of. He could call a spade a spade. But he was a misfit. Hindus would not accept him because he was a Muslim. And Muslims would not accept him because of his radical views. But people who knew him loved him and adore him.

People remember him as a minister who rode on bicycle. He used to go to his ministerial office in secretariat from his official residence peddling a bike. On bike he went to attend functions in the capital and frequented his friends’ places. There was no gimmick in it. He was like that only.

Mehboob Ali had a humble beginning and remained humble all his life. But on principles and idealism he could never compromise.

Born in 1931 in village Malkisar in Bikaner district he did his graduation from Bikaner and studied law in Jaipur. He started his career as a peon in Agriculture Department and later served as Maal Babu in Railways. His literary and political leanings shaped his life. He practiced law and edited noted weekly ‘Saptaahaant’ and ‘Gurudeep’.

He was a wanderer in politics because of his unconventional ideas and views. He could win only one assembly election from Bikaner during Janata wave in 1977. After the Janata Party split he remained with BJP and became its state vice-president. It was apparent that a radical like him had no space in a saffron party.Later he joined Congress but there too he was a misfit. He also dabbled with a non functioning Sarvodaya Party.

A noted Delhi weekly listed Mehboob Ali among half a dozen prominent persons in the country who had their distinct mark on society. Others include industrialist Ratan Tata, and activists like Vinayak Sen, and Badal Sirkar.

In the death of Mehboob Ali we have lost a true son of Rajasthan who set an example of a clean political leader of integrity. He was intellectually rich but financially died a pauper.

(The piece published in Hindustan Times on February 24, 2011)

महबूब अली : सार्वजनिक जीवन में सादगी और ईमानदारी की मिसाल


राजेंद्र बोड़ा

महबूब अली, जिनका 80 वर्ष की आयु में गुरूवार को बीकानेर में निधन हो गया, बच रहे उन इने गिने राजनेताओं में थे जो जीवन पर्यंत अपने विचारों के प्रति निष्ठावान रहे और उनसे कभी कोई समझौता नहीं किया और हमेशा जमीन से गहरे जुड़े रहे। ऐसा उन्होंने किसी मजबूरी में नहीं किया। उन्होंने सत्य और निष्ठा का कठोर जीवन खुद चुना. उसके लिए कभी पछताए भी नहीं।

तत्कालीन बीकानेर रियासत के मलकीसर गाँव में 1931 के दिसंबर माह के अंतिम दिन जन्मे महबूब अली, जिन्हें सभी प्यार से महबूब साहब कह कर पुकारते थे, जमीन से उठे ऐसे नेता थे जिन्हें काजल भरी सत्ता की कोठरी भी अपने रंग में नहीं रंग पाई। जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति के आह्वान के साथ देश में 1977 में आपातकाल के बाद जो सत्ता परिवर्तन हुआ उनमें यदि महबूब साहब जैसे नेता और होते तो देश का आज नक्शा अलग होता। वे भैरोंसिंह शेखावत के नेतृत्व में राजस्थान में बनी पहली गैर कांग्रेस सरकार में मंत्री बने. उन्हें आज भी लोग “साइकिल वाले मंत्री” ने नाम से जानते हैं। राजधानी में अपने सरकारी आवास से सचिवालय में अपने आफिस तक, अपने मिलने जुलने वालों के यहाँ और सार्वजनिक समारोहों में वे साइकिल पर ही जाते थे. सादगी का यह उनका आडम्बर नहीं था. वे खुद ऐसे ही थे। उनको अन्य विभागों के अलावा महत्वपूर्ण जलदाय विभाग का कार्यभार मिला। भारी प्रलोभनों और दबावों के सामने वे अपने कभी नहीं झुके इसीलिए संगठित राजनीति के लिए वे हमेशा त्याज्य बने रहे।

अपने जीवन यापन की शुरुआत कृषि विभाग में चपरासी के रूप में करने वाले महबूब अली राजनीति के अभिजात्य वर्ग में कभी शामिल नहीं हो सके। उन्हें अपने विचारों से कोई नहीं डिगा सका। विचारों से वे ‘रेडिकल’ थे। इसका कारण उन पर एम एन रॉय का प्रभाव था। बीकानेर में छगन मोहता के वैचारिक आभामंडल में पनपी राजनेताओं और साहित्यकारों की पीढ़ी के वे प्रतिनिधि थे। रॉय द्वारा राजनैतिक दल ‘रेडिकल हयूमिनिस्ट पार्टी’ को भंग कर दिये जाने के बाद वे प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े। उसमें दो फाड़ होने पर वे बीकानेर के एक अन्य समाजवादी नेता माणिकचंद सुराणा की तरह संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से जुड़ गए। बाद में जब दोनों पार्टियाँ मिली और समाजवादी पार्टी बनी तो वे उसे सदस्य रहे। आपातकाल के बाद बनी जनता पार्टी में जब समाजवादी पार्टी का विलय हो गया तो वे उसके सदस्य हो गए। जनता पार्टी के टुकड़े होने पर वे भैरोंसिंह शेखावत के कारण भाजपा में रह गए और उसके प्रदेश उपाध्यक्ष भी बने। मगर वहाँ ‘रेडिकल’ विचारों के कारण उनका गुजारा संभव नहीं था। भाजपा छोड़ कर वे कांग्रेस में शामिल हो गए। मगर वहाँ उन जैसे आज़ाद विचारों की वहाँ भी कहाँ जगह थी। बाद में कुछ अकादमिक लोगों ने मिल कर ‘सर्वोदय पार्टी’ बनाई तो वे उससे जुड़ गए। मगर वह पार्टी कागजों तक ही रह गई। इसीलिए अपने जीवन के अंतिम दशक में वे स्वतंत्र विचारक की तरह ही रहे।

उन्होंने पत्रकारिता भी की। वे बीकानेर से निकालने वाले कभी बड़े ताकतवर माने जाने वाले अख़बार ‘सप्ताहांत’ के बरसों संपादक रहे। बाद में बीकानेर के प्रमुख बुद्धिजीवियों के साझा प्रयास से शुरू हुए महत्वपूर्ण प्रकाशन ‘मरूदीप’ के भी संपादक रहे। जब वे मंत्री बन गए तब ‘मरुदीप’ के संपादन का जिम्मा प्रख्यात साहित्यकार नंदकिशोर आचार्य ने संभाला। अंत तक महबूब अली की कलम के रंग ‘बीकानेर एक्स्प्रेस’ में नज़र आते रहे।

अपने जीवन और व्यवहार में वे जितने सहज और सरल थे अपने विचारों में उतने ही कठोर थे। कोई प्रलोभन, कोई दबाव उन्हें अपने विचारों के अनुसार चलने से नहीं डिगा सकता था। जब वे मंत्री बने तो बहुतों ने उन्हें एक मुस्लिम राजनेता के रूप में खुद को प्रस्तुत कराने का जबर्दस्त प्रयास किया मगर उन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर ही एक सच्चा मुसलमान बने रहना पसंद किया और राजनीति में धर्म का भावनात्मक खेल नहीं खेला। ऐसा करना विरले राजनेताओं के बस में होता है। इसीलिए वे विरले राजनेता थे।

जलदाय विभाग के मंत्री के रूप में भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी मुहिम की कहानी आज कहें तो वह सपना सा लगती है। किस प्रकार उनकी मुहिम को रोकने के लिए धन का प्रलोभन और राजनैतिक दबाव आए और उन्होंने कोई समझौता नहीं किया उसकी मिसाल नहीं मिलती।

कई बार कोई व्यक्ति धन के प्रलोभन से नहीं, दबाव से नहीं मगर यारी-दोस्ती में अपने ऊसूलों से समझौता कर लेता है। मगर महबूब अली, जो बड़े मिलनसार और दोस्तों के दोस्त थे, अपने ऊसूलों के चलते दोस्तों की बात भी नहीं मानते थे।

महबूब अली जैसा मस्त मौला, फक्कड़ तबीयत का आदमी जो वैचारिक स्तर पर बड़ा गहरा हो उसे वर्तमान चलन की राजनीति में अजूबा ही माना जाता है। मगर ऐसे लोगों से राजनैतिक और सामाजिक मूल्य पूरी तरह तिरोहित होने से बचे रहते हैं। महबूब अली के चले जाने की पीड़ा इसलिए और घनी हो जाती है।

एक बार जलदाय विभाग की बजट मांगों पर विधान सभा में हुई बहस का जवाब देते हुए उन्होंने कहा था “ हम जब सड़क पर चलते हैं तो बीच-बीच में अपने पाँव से जमीन को खुरच कर देखते भी रहते हैं कि हम जमीन पर ही हैं ना। हवा में तो नहीं उड रहे है”। महबूब साहब कभी हवा में नहीं उड़े। हमेशा जमीन से जुड़े रहे। कष्ट सह कर भी अपने ऊसूलों से कभी समझौता नहीं किया। राजस्थानवासियों को अपने इस सपूत पर हमेशा गर्व रहेगा।

(यह आलेख जनसत्ता के दिनांक 25 फरवरी, 2011 के अंक में छपा)