Monday, March 19, 2012

लोकतन्त्र शीर्षासन की स्थिति में: बजट कौन बनाता है!

राजेंद्र बोड़ा

गणतन्त्र की संवैधानिक घोषणा के छह दशकों के बाद आज ऐसा लगता है जैसे लोकतन्त्र हमारे देश में शीर्षासन कर रहा हो। संविधान में राज चलाने के लिए दो संस्थाओं को अधिकार दिया गया – विधायिका और कार्यपालिका। दोनों संस्थाएं संविधान और विधि सम्मत तरीके से काम कर रहीं है या नहीं इसका फैसला करने की जिम्मेवारी न्यायपालिका में निहित की गयी। निर्वाचित विधायिका में बहुमत प्राप्त व्यक्ति सरकार का नेतृत्व करता है और सामुहिक जिम्मेवारी वाली मंत्री परिषद बना कर अगले जनादेश तक शासन की बागडोर संभालता है।

संविधान की व्यवस्था यह है की निर्वाचित सरकार विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है और विधायिका जनता के प्रति, जिसके हाथ में सार्वभौम सत्ता है। सरकार का काम विधायिका के प्रति जवाबदेही निभाते हुए ऐसी नीतियां और कार्यक्रम बनाना होता है जिनसे आम जन की आशाओं और अपेक्षाओं के अनुरूप और संविधान के निर्देशों के अनुसार काम हो। कार्यपालिका का काम उन नीतियों और कार्यक्रमों को लागू करने का होता है। इस प्रकार संविधान में स्पष्ट रूप से काम का बंटवारा किया हुआ है कि सरकार में बैठे निर्वाचित लोग नीतियां और कार्यक्रम बनायेंगे और अफसरशाही उन्हें लागू करेगी। इस व्यवस्था पर निगाह रखने और जवाब मांगने का काम विधायिका का है।

संवैधानिक व्यवस्थाएँ तो वैसी की वैसी ही है मगर सरकार और कार्यपालिका के बीच भूमिका, संविधान की नीयत के विपरीत, बदली हुई नज़र आती है। आज बहुत ही साफ तौर पर देखा जा सकता है कि जिनका काम नीति निर्धारण का है उन्हें क्रियान्वयन के काम में अधिक रुचि है और वे उसी में हमेशा सक्रिय रहते हैं और नीति निर्धारण का काम कार्यपालिका के भरोसे छोड़ दिया गया है।

मंत्रियों की रुचि तबादलों और ठेके देने जैसे कामों में ही अधिक नज़र आती है। दूसरी तरफ नीतियाँ सचिवालय के बंद कमरों में अफसर बनाते हैं और मंत्री गण उन पर केवल मुहर लगाते हैं। इसके चलते राज नेताओं नौकरशाहों और अपराध जगत के लोगों का गठजोड़ जैसा बन गया है। ऐसी स्थिति में सभी को रस आने लगा है। इसी से चुनाव भी प्रपंच वाले बन गए हैं। आम जन की लोकतान्त्रिक भागीदारी चुनाव में वोट देने तक ही सीमित हो गई है। यह प्रतिनिधिक लोकतन्त्र तो है मगर सहभागी लोकतन्त्र नहीं है जिसका सपना संविधान निर्माताओं ने देखा था।

मार्च का महिना शासन तंत्र और विधायिका के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। यह वित्तीय वर्ष का अंतिम महिना होता है। नया वित्तीय वर्ष अप्रेल से शुरू होता है। इसलिए मार्च के अंत तक अगले वित्तीय वर्ष का लेखा जोखा – बजट – का पारित होना आवश्यक होता है क्योंकि बिना विधायिका की अनुमति के सरकार एक पैसा भी नहीं खर्च कर सकती। वास्तव में बजट वह दस्तावेज़ होता है जिसमें निर्वाचित सरकार अपनी नीतियों और कार्यक्रमों की घोषणा करती है और उनके लिए वित्तीय प्रबंध करती है। क्योंकि यह एक वित्तीय दस्तावेज़ होता है जिसमें करों से राजस्व पाने की व्यवस्था की जाती है इसलिए इसका प्रभाव देश के हर नागरिक पर पड़ता है। मगर क्या इस दस्तावेज़ के निर्माण में आम जन की या उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों की कोई भूमिका होती है? कहा जा सकता है कि बजट पेश करने वाला वित्त मंत्री निर्वाचित प्रतिनिधि होता है। फिर बजट और उसके प्रावधानों पर निर्वाचित सदनों में चर्चा होती है और बहुमत से उसके पास होने पर ही वह लागू होता है। यही लोकतान्त्रिक व्यवस्था है।

हम जानते हैं कि राज्य का बजट कैसे बनाता है। यह एक यांत्रिक प्रक्रिया होती है। सभी विभाग अपने अपने अगले वर्ष के खर्चों के प्रस्ताव बना कर वित्त विभाग को भेजते हैं। ये प्रस्ताव बनाते हुए सभी विभाग अपने आंकड़े अतिरेक करके भेजते हैं क्योंकि उन्हें मालूम होता है कि वे जितने रुपयों के प्रस्ताव बना कर भेजेंगे उनकी वित्त विभाग अनिवार्य रूप से कतर ब्योंत करेगा। आने वाले साल में कौन से काम करने हैं और किस मद में कितना पैसा खर्च करना है इसका हिसाब किताब नौकरशाही बनाती है जो अपने राजनैतिक आकाओं को खुश रखने का अद्भुत कौशल रखती है।

बजट के निर्माण में समूचे मंत्री परिषद की भी कोई भूमिका नहीं होती। कार्यपालिका द्वारा तैयार किया गया बजट दस्तावेज़ क्योकि निर्वाचित व्यक्ति – वित्त मंत्री – प्रस्तुत करता है इसलिए ही वह लोकतान्त्रिक तरीके से तैयार किया हुआ दस्तावेज़ नहीं माना जा सकता।

कहा जा सकता है कि भई इसे पास तो विधानसभा करती है जो समूचे राज्य का प्रतिनिधित्व करती है। मगर देखें कि क्या सदन को बजट पर कोई समझदारी वाली गहन चर्चा के लिए समय मिलता है? सदन का बजट सत्र अमूमन फरवरी के अंतिम दिनों में शुरू होता है। क्योंकि वह साल का पहला सत्र होता है इसलिए उसकी शुरुआत राज्यपाल के अभिभाषण से होती है। एक हफ्ता इस अभिभाषण पर बहस और उसके पारण में चला जाता है। मार्च के पहले हफ्ते के अंत तक वित्त मंत्री बजट प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकार कुल मिला कर बजट पर विचार और उसके पारण के लिए लगभग बीस दिनों का समय मिलता है। कोई यह सवाल नहीं करता कि बजट जैसे गंभीर विषय की चर्चा पर क्यों हमारे प्रतिनिधि अधिक समय नहीं देते? विपक्ष के लोग कहेंगे यह समय तो सरकार तय करती है। मगर इसका क्या जवाब है कि जब वे खुद सत्ता में होते हैं तब भी व्यवस्था यही रहती है।

असली बात यह है कि बजट प्रक्रिया में निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिका बिलकुल सतही होती है इसलिए उन्हें उसमें कोई रुचि होना संभव भी नहीं है। फिर बजट राज्य का वित्तीय लेखा जोखा होता है जो आर्थिक और वित्तीय मामलों की विशेषज्ञता तो मांगता ही है साथ ही जमीनी स्तर पर लोक से जुड़ाव भी मांगता है। दोनों ही मामलों में शासन और प्रशासन में फिसड्डीपन झलकता है। अफसोस इस बात का है कि राजनैतिक दल सरकार के पिछलग्गू बन चले हैं। सरकार के मुखिया की अपनी पार्टी पर धौंस चलती है। राजनैतिक दल के मुखिया की अपनी ही पार्टी की सरकार में कोई हैसियत नहीं होती। जबकि लोकतन्त्र में हुकम पार्टी का चलना चाहिए। मगर व्यवस्था ऐसी हो चली है कि सरकार का मुखिया ही खुद सम्पूर्ण पार्टी बन जाता है। नहीं तो क्यों नहीं लोगो के जीवन को प्रभावित करने वाला बजट जैसा दस्तावेज़ का प्रारूप पार्टी से बन कर आए।

ऐसा हो सकता है। अगले वित्तीय वर्ष में कौन से काम किए जाने हैं और किन प्राथमिकताओं से किए किए जाने है इसकी सलाह ठेठ नीचे के स्तर से आए। सत्तारूढ राजनैतिक पार्टी का विस्तार सहज रूप से नीचे जड़ों तक होता है। उसके जमीनी कार्यकर्ता और नेता बेहतर तरीके से बता सकते हैं कि उनके इलाकों की जनता की जरूरतें और अपेक्षाएँ क्या है। इस प्रकार नीचे से ऊपर आकर जिला स्तर पर बजट में क्या लिया जाय क्या छोड़ा जाय की चर्चा पार्टी में हो। यह प्रक्रिया हर साल एक अक्तूबर से शुरू हो जाये। सभी जिलों से सलाहें आ जाने के बाद दिसंबर में राज्य स्तर पर उन सब सलाहों पर फिर से गंभीर मंथन हो। सरकार के बाहर आर्थिक और वित्तीय विश्लेषकों की कमी नहीं है। उन सब के साथ बैठ कर पार्टी में बजट प्रस्तावों पर जाम कर खुली चर्चा हो। इस चर्चा में सबकी सहभागिता हो जो उन प्रस्तावों से प्रभावित होने वालें है। इन चर्चाओं में निर्वाचित प्रतिनिधियों की भी भागीदारी हो मगर विशिष्ट जन की तरह नहीं। और फिर एक सर्वमान्य दस्तावेज़ का प्रारूप बने। वित्त मंत्री को पार्टी मुख्यालय में बुला कर यह दस्तावेज़ सौप दिया जाय। वित्त मंत्री सचिवालय में जाकर वित्त सचिव को वह दस्तावेज़ सौपे ताकि उसे सरकारी भाषा में लिखा जा सके। यह दस्तावेज़ लेकर जब वित्त मंत्री सदन में खड़ा होगा और अपना बजट भाषण पढ़ेगा तब वह वास्तव में लोक की बात कर रहा होगा। फिर उस पर सदन में दो माह से अधिक समय तक चर्चा रखी जाये ताकि अन्य दलों के निर्वाचित प्रतिनिधियों की जमीनी समझ का फायदा मिल सके और राज्य का संतुलित विकास की राह प्रशस्त हो सके।

ऐसा होगा तो राज्य के हर काम में जन भागीदारी स्वतः होने लगेगी। आज की तरह मतदाता वोट डालने के बाद निष्क्रिय हो कर नहीं बैठ जाएगा। राजनैतिक दलों में और उनके कार्यकर्ताओं में जबर्दस्त उत्साह आएगा जो लुप्त हो रही राजनैतिक प्रक्रिया को फिर से स्थापित करेगा। ठेठ नीचे तक के कार्यकर्ता की पूछ होगी। सब को लगेगा राज चलाने में उनकी भागीदारी है। कार्यपालिका को उसका सही स्थान बता दिया जाएगा और उसे वास्तविक रूप से जवाबदेह बनाना पड़ेगा।

लेकिन आज लोकतन्त्र की शीर्षआसन जैसी स्थिति है उसमें आश्चर्य नहीं कि नौकरशाह और पुलिस के लोग सेवानिवृत्त होने के बाद या समय से पहले सेवानिवृत्ति लेकर राजनैतिक दलों के प्रत्याशी बन कर जनप्रतिनिधि बन बैठते हैं। दूसरी तरफ सरमायेदार और अपराध जगत के लोग भी जन प्रतिनिधि बन जाते हैं। ऐसे माहौल में जनता के साथ काम करने वाले जमीनी स्तर के लोग ही ठुकराये जाते हैं।

(यह आलेख 'प्रेसवाणी' के मार्च 2012 अंक में छपा)

Sunday, March 18, 2012

संगीतकार रवि: इस भरी दुनिया में कोई हमारा ना हुआ


राजेंद्र बोड़ा

हिन्दुस्तानी फिल्मों में अनगिनत संगीतकार हुए हैं जिनके सुरों के संयोजन के अपने अंदाज़ थे अपनी अलग पहचान थी। मगर गिनने बैठें तो बहुत कम ऐसे संगीतकार पाये जाएंगे जिनके गानों ने “कल्ट” गीत की ऊंचाइयों को छुआ। ऐसे कालजयी गीतों की रचना करने वालों में रवि का नाम बहुत ऊंची पायदान पर आता है। गत सात मार्च को होली के दिन काल ने उन्हें हमसे छीन लिया। मगर अपने सुरीले फिल्म संगीत से उनहों ने तो अमरत्व पा लिया था। अपने नश्वर शरीर के नहीं होने पर भी वे अपने संगीत में हमेशा हमारे साथ रहेंगे।

वे अपने जमाने के वे सफलतम संगीतकार रहे। आम तौर पर किसी फिल्म के सभी गाने सुपर हिट नहीं होते। मगर वे ऐसे संगीतकार रहे जिनकी अनेकों फिल्मों के सारे के सारे गाने सुपरहिट हुए। जैसे ‘चौदहवीं का चांद’ (1960), ‘गुमराह’ (1963), ‘वक्त’ (1965), ‘दो बदन’ (1966), ‘हमराज़’ (1967) आदि।

दिल्ली में तीन मार्च 1926 को जन्मे और बड़े हुए रविशंकर शर्मा गायक बनने का जुनून लेकर 1950 में सिने नगरी मुंबई पहुंचे थे। और कड़े संघर्ष के बाद उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में अपना स्थान बनाया। उनकी पहली ही फिल्म ‘वचन’ (1955) के संगीत ने खूब धूम मचाई। गुरुदत्त की फिल्म ‘चौदहवीं का चांद’ (1960) के संगीत की जबदस्त लोकप्रियता ने उन्हें तब के सफलतम संगीतकारों की श्रेणी में ला बिठाया।

पिछली सदी का साठ से सत्तर का दशक सुरीले हिंदुस्तानी फिल्म संगीत का ऐसा सुनहरा दौर था जब सचिन देव बर्मन, शंकर-जयकिशन, ओ. पी. नैयर, कल्याणजी-आनंदजी, मदन मोहन, रोशन जैसे संगीतकार अपनी रचनात्मकता के शिखर पर थे। ऐसे में रवि ने एक के बाद एक लगातार कर्णप्रिय घुनें देकर फिल्म संगीत के इतिहास में अपना कभी ना मिट सकने वाला नाम लिख दिया।

एक समय आया जब 70 के दशक में मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री ने उनसे किनारा करना शुरू कर दिया तो उन्हें दक्षिण भारत के फिल्म उद्योग ने अपना लिया। अपने संगीत से दक्षिण भारतीय मलयाली फिल्मों में भी उन्होंने अपनी ऐसी छाप छोड़ी कि वहां वे ‘बोंबे रवि’ के नाम से घर-घर में ही नहीं मशहूर हो गए बल्कि दक्षिण के छह सर्वश्रेष्ट फिल्म संगीकारों में उन्हें गिना जाने लगा।।

हिन्दी फिल्मों में उनकी धमाकेदार वापसी अस्सी के दशक में हुई जब नए संगीतकार पुरानों को पीछे धकेलते हुए तेजी से आगे बढ़ रहे थे मगर संगीत के स्तर का बंटाढार हो रहा था क्योंकि तब एक्शन फिल्मों का ऐसा दौर शुरू हो गया था जिनमें सुरीले रूमानी संगीत के लिए कोई स्थान नहीं था। बी. आर. चोपड़ा की फिल्म ‘निकाह’ (1982) में संगीतकार के रूप में रवि की वापसी ज्वालामुखी फटने जैसी हुई। अचानक इस फिल्म के सुरीले संगीत ने अपने जादू से समूचे देश को अपने वश में कर लिया। एक नई आवाज सलमा आगा का रवि की तर्ज पर गाया गाना ‘दिल के अरमां आंसुओं में बह गए’ हर संगीत प्रेमी की जुबान पर चढ़ गया।इस फिल्म के भी सभी गीत जबर्दस्त हिट रहे।


रवि एक मुकम्मल संगीतकर थे। उनमें कविता और शायरी की समझ थी। इसीलिए उनके गीत जीवंत बन सके। मेलोडी रचने में तो उनकी कोई सानी नहीं थी। उनके कम्पोज़ किए गानों में अनोखा ओज था। उनके संगीत निर्देशन में गायक या गायिका की आवाज हमेशा एक अनोखे उठान पर रहती थी। उनके गानों में आतंत ही मधुर मधुर आर्केस्ट्रेशन पाते हैं है मगर वह गायन की मधुरता में अतिक्रमण नहीं करता।

फिल्मों में उन्होंने संगीत ही नहीं दिया बल्कि गाने भी लिखे और कुछ गाने गाये भी। उन्होंने ये तीनों किरदार जबर्दस्त सफलता से निबाहे।

बंबई के फिल्म उद्योग में उनका कोई गॉडफादर नहीं था। उन्होंने जो कुछ भी हासिल किया वह अपनी मेहनत और प्रतिभा के बल बूते पर किया। वे आम तौर पर वे पहले लिखे हुए गीतों पर धुनें बनाते थे। जीवन की हर परिस्थिति और हर अवसर के लिए रवि ने यादगार गीत कम्पोज़ किए। बाल गीतों को सुनें: ‘चंदा मामा दूर के पूए पकाए बूर के आप खाये थाली में मुन्ने को दे प्याली में’। ‘वचन’ (1955) का रवि का ही लिखा यह गाना आज तीसरी पीढ़ी में भी लोकप्रिय है। ऐसा ही एक बाल गीत है जिसे आज के बच्चे भी उसी मजे से गाते हैं: ‘दादी अम्मा दादी अम्मा मान जाओ/ छोड़ो भी ये गुस्सा जरा हंस के दिखाओ’ (घराना/1961/शकील बदायुनी/ आशा भोसले व कमाल बारोट)। रोमांटिक गानों को सुनें: ‘चौदहवीं का चांद हो या आफताब हो/ जो भी हो तुम खुदा की कसम लाजवाब हो’(चौदहवीं का चांद/1960/शकील बदायुनी/ रफी), ‘ये खामोशियां ये तन्हाइयां मोहब्बत की दुनिया है कितनी जवां’’(ये रास्ते हैं प्यार के/1963/राजेंद्रकृष्ण/रफी) या फिर ‘छू लेने दो नाज़ुक होठों को कुछ और नहीं हैं जाम हैं ये’(काजल/1965/साहिर/रफी)।

दुल्हन के विदाई गीतों का सरताज गीत ‘बाबुल की दुआएं लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिले’ (नीलकमल/1968/साहिर/रफी) को कौन भूल सकता है जिसने ने हमेशा ही लोगों की आंखे नाम की है।

दूल्हे की बारात में इस गाने के बिना तो दोस्तों के धमाल की कल्पना ही नहीं की जा सकती: “मेरा यार बना है दूल्हा और फूल खिले हैं दिलके” (चौदहवीं का चांद)। उनका रचा गीत “आज मेरे यार की शादी है” (आदमी सड़क का/1977/वर्मा मलिक/रफी) आज भी बारात के बैंड की एक आवश्यक धुन है। फिर इस कालजयी गीत को कौन भूल सकता है जो बलराज साहनी और आशा सचदेव पर फिल्म “वक़्त” के लिए फिल्माया गया था “ऐ मेरी ज़ोहरा ज़बीं तुझे मालूम नहीं तू अभी तक है हसीं और में जवां तुझपे कुर्बान मेरी जान मेरी जान” (1965/साहिर/मन्नाड़े)। दिल को छू जानवे वाले गानों में इस गाने को भी कोई कैसे भूल सकता है ‘ऐ मेरे दिले नादां तू गम से ना घबराना/ एक दिन तो समझ लेगी दुनिए तेरा अफसाना’ (टावर हाउस/1962/असद भोपाली/लता)

रवि दिल्ली के निवासी थे। उनके पिता कल्कि भगवान मण्डल से सदस्य थे। मण्डल में रोज शाम भजन होते थे। एक दिन पिता ने उनसे भजन गाने को कहा। वे तब 11 वर्ष के रहे होंगे। उन्हों ने गाया तो उसकी सबने तारीफ की। मगर एक लड़का जिसने उनसे पहले भजन गाया था वह उनकी तारीफ से ईर्ष्या करने लगा। दूसरे दिन जब बालक रवि से फिर गाने को कहा गया तो वह लड़का जो साथ में हार्मोनियम बाजा रहा था जानबूझ कर बीच में गलत सुर लगाने लगा जिससे उनका गाना बिगड़ गया औरसब हंसने लगे। तभी उन्होंने बड़ा गायक बनाने की ठान ली। वे विभिन्न साज बजाना सीखने लगे। मगर किसी शास्त्रीय संगीत के गुरु से कोई शिक्षा नहीं ली। पढ़ाई लिखाई वे ज्यादा नहीं कर सके। “पतंगबाजी में मन ज्यादा लगता था तो परीक्षाओं में फेल होना ही था”।

आज़ादी से पहले वे सेना में इलेक्ट्रिशियन के रूप में मुलाज़मत करते थे जहां उन्हें 196 रुपये प्रतिमाह पगार मिलती थी। वर्ष 1946 में उनका विवाह हो गया। मगर उनका गाने का शौक बना रहा। हालांकि उन्होंने किसी शास्त्रीय संगीत के गुरु से कोई शिक्षा नहीं ली थी। वे बताते थे कि एक बार जब मोहम्मद रफी किसी कार्यक्रम के सिलसिले में दिल्ली आए थे तब वे उनसे जाकर मिले और कहा कि वे भी फिल्मों में पार्श्व गायक बनाना चाहते है। रफी साहब ने उन्हें उत्साहित किया और बंबई आने की सलाह दी। वे सब कुछ छोड़ कर 1950 में मुंबई आ गए जहां शुरू हुआ उनके भीषण संघर्ष का समय। रात में वे मलाड रेल्वे स्टेशन पर या सड़क पर किसी दूकान के बाहर सो जाया करते थे।

फिल्म में गाना मिल जाये इसकी जुगाड़ में जुटे रहते। वे अपने साथ बिजली के औज़ार साथ में ले गए थे तो बिजली की मरम्मत का कुछ काम भी कर लेते। उनके पिताजी अपनी 80 रुपये की पगार में से हर माह 40 रुपया रवि को भेज देते थे। पिताजी ने ही बाद में इनके रहने के लिए कालबा देवी में व्यवस्था कराई। आठ आने में दिन गुजारते थे –एक समय खाना और एक गिलास चाय। बाद में जब कोरस में गाने का कुछ काम मिलने लगा तब उन्हों ने टीन की परतों से बना एक मकान कांदीवली में ले लिया।

1951 में वे अपनी पत्नी और बच्चों को भी बंबई ले आए। एक बार सगीतकार जोड़ी हुस्नलाल भगतराम ने उन्हें अपने एक गाने के कोरस में शामिल होने के लिए बुलाया और 50 रुपये देने की पेशकश की।। मगर कुछ रिहर्सलों बाद उन्हें रिजेक्ट कर दिया गया। फिर उनकी मुलाक़ात हेमंत कुमार से हुई जिन्हों ने उन्हें अपने संगीत में बन रही ‘आनंद मठ’ फिल्म के गीत ‘वंदे मा’तरम’ में कोरस में गवाया और बाद में उन्हें अपना सहायक बना लिया और बंबई में रवि की गाड़ी पटरी पर आ गई। हेमंत हुमार के सहयोगी के रूप में उन्होंने कई फिल्में की। संगीत की सुपर-डूपर हिट फिल्म ‘नागिन’ में बीन की धुन को कौन भूल सकता है। यह उन चुनिंदा गानों में से है जो आधे दशक बाद आज भी अपनी धुन के कारण लोगों को याद है। ‘मन डोले मेरा तन डोले मेरे दिल का गया करार रे ये कौन बजाए बांसुरिया’ गाने की धुन के साथ बीन पर कुछ बजाना था। तो रवि ने बीन की यह धुन हारमोनियम पर बना कर हेमंत दा’ को सुनाई। फिर इस धुन को क्ले वायलिन पर संगीतकार जोड़ी कल्याणजी आनंद जी के कल्याणजी से बजवाई गई। नागिन की सफलता पर हेमंत दा ने रवि को एक मोटर गाड़ी तोहफे में दी।

हेमंत कुमार को नागिन की सफलता के बाद करीब एक दर्जन फिल्में मिल गई। “मैं उनका सहायक था और हरेक फिल्म के लिए मुझे हर माह 200 रुपये मिलते थे। इस प्रकार मेरी मासिक आय 2200 रुपये हो गई जो कि उस समय बड़ी रईसी आय थी। मेरे ठाठ थे। एक दिन हेमंत कुमार ने मुझे बुलाया और कहा कि वे कश्मीर जा रहे हैं। साथ ही मुझसे कहा कि अब तुम अलग काम करो। मेरे तो पांव तले जमीन ही खिसक गई। मैंने कहा दादा मुझे आपके साथ काम करने में कोई तकलीफ नहीं है। मगर उन्होंने कहा रवि मैं तुम्हारा टेलेंट जानता हूं। तुम बड़े संगीतकार बन सकते हो। तुम मेरा साथ छोड़ दो वरना मेरे असिस्टेंट हो कर ही रह जाओगे। मैं बड़ा मायूस हो कर चला आया। मगर आज सोचता हूं कि हेमंत दा मेरे कितने खैरख्वा थे।

मगर जो हुआ अच्छा ही हुआ। जब वे उस महीने के 200 रुपये लेने निर्माता करीम भाई नडियाडवाला के पास गए तो उन्हों ने रवि का उतरा हुआ चेहरा देखा तो पूछने लगे क्या परेशानी है? रवि ने बताया कि हेमंत कुमार ने उन्हें अलग कर दिया है और आगे क्या होगा कुछ पता नहीं। इस पर करीम भाई ने अपने मैनेजर मेहता को बुलाया और उससे कहा मेहता जी रवि को तींन पिक्चरों के लिए साइन कर लीजिये। इस तरह पहले ही दिन उन्हें तीन फिल्में बतौर संगीत निर्देशक मिल गई।

इससे पहले हेमंत कुमार के साथ काम करते हुए बाहर गाने का मौका मिले इस कोशिश में भी लगे रहे। उन्हें दिल्ली का एक दोस्त मिला जिसने उन्हें बताया कि उसके चाचा देवेन्द्र गोयल फिल्म बना रहे है। “मैंने उससे कहा कि मुझे उनकी फिल्म में गाना गवाने के लिए सिफारिश करो ना। एक दिन उसने कहा उसके चाचा को नए संगीतकार की जरूरत है मैं तुम्हें उनसे मिलाता हूं। उसने कहा मगर मेरी एक शर्त है। यदि तुम्हें काम मिलता है तो संगीतकार के रूप में तुम्हारे साथ मेरा भी नाम जाएगा। मैंने कहा तुम्हें तो संगीत-वंगीत कुछ आता नहीं। तो वह कहने लगा मैं तुम्हें काम दिला रहा हूं इसके लिए तुम्हें मेरा नाम तो देना ही पड़ेगा।” रवि ने सोचा काम-वाम तो मिलना नहीं है इसे क्यूं नाराज करूं तो कह दिया ठीक है। वे जब देवेंद्र गोयल से मिले और उन्हें अपने ही लिखे दो गीतों को अपनी ही धुनों पर सुनाया तो गोयल एक दम राजी हो गए और कहने लगे कि उन्हें ऐसे ही गाने चाहिए अपनी नई फिल्म के लिए। यह फिल्म थी ‘वचन’ जिसमें रवि स्वतंत्र संगीतकार के रूप में फिल्मी दुनिया में सामने आए। मगर फिल्म में संगीतकार के रूप में पहली और आखरी बार रवि के नाम के साथ कोई और नाम भी था - चन्द्र। रवि को अपने दोस्त का नाम देने का कौल निभाना था। जब देवेंद्र गोयल की अगली फिल्म के लिए फिर रवि को साइन किया गया तो उनसे पूछा गया कि क्या फिर दो नाम जाएंगे? इस पर रवि ने सारी कथा गोयल को सुनाई। गोयल ने अपने भतीजे को बुलाया और खूब झाड़ लगाई।

उनका संगीत लाखों की पसंद बना। उन्हें जेमिनी पिक्चर्स की एस. एस. वासन निर्देशित फिल्म ‘घराना’ (1961) और वासू फिल्म्स की ए. भीमसिंह निर्देशित ‘खानदान’ (1965) के संगीत निर्देशन के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार मिले। वर्ष 1971 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री देकर सम्मानित किया। दक्षिण भारतीय फिल्मों के संगीत के लिए भी वहां के राज्य पुरस्कार और राष्ट्रीय पुरस्कार के अलावा और भी कई पुरस्कार और सम्मान हासिल किए।

अपने तकलीफ के दिनों की बात छिड़ जाने पर उनका कवि हृदय कुछ ऐसे बोल उठता था: “दिल की बातें किसी हसीं से कहें/ मगर कहें तो किस यकीं से कहें। बर्फ सी जम रही है होठों पर/ किसके रुखसार-ए-आतिश से कहें।”

बड़ी मुश्किलों से उन्होंने फिल्म संगीत में अपना मुकाम बनाया था सभी तरह के उतार-चढ़ाव देखे थे इसलिए वे दूसरों को यही सलाह ही देते थे : “वक़्त की बात है जब वक़्त बदल जाता है/ वार कमजोर से कमजोर का चल जाता है/ क्या सहारे ही ज़रूरी है संभलने के लिए/ ठोकरें खाकर भी इंसान संभाल जाता है।”

(आलेख जनसत्ता दैनिक के 18 मार्च 2012 के रविवारीय परिशिष्ठ में प्रकाशित)