Saturday, February 12, 2011

अशोक गहलोत रखते हैं फूँक-फूँक कर कदम, मगर कदम के निशां तक नहीं


राजेंद्र बोड़ा

राजस्थान पत्रिका ने आज (12 फरवरी, 2011) के अंक में अपने पूर्व संपादक विजय भण्डारी का एक लेख “फूँक-फूँक कर कदम” प्रकाशित किया है। भण्डारी कहते हैं कि राज्य में अब तक हुए कुल 11 मुख्य मंत्रियों (नौ कांग्रेस, दो भाजपा) में अशोक गहलोत “पहले ऐसे मुख्य मंत्री हैं, जो आम आदमी की बोली बोलने में गुरेज नहीं करते हैं”। इसके लिए वे गहलोत के उस सार्वजनिक वक्तव्य को आधार बनाते हैं जिसमें कहा गया है कि पुलिस के थानेदारों की जानकारी में है कि उनके क्षेत्र में कौन चोर है, मगर वे उन्हें पकड़ते नहीं। भण्डारी गहलोत के इस वक्तव्य से खुद “चकित” हैं। वे कहते हैं कि “थानेदारों को राज्य के पदासीन मुख्य मंत्री द्वारा इससे बड़ा काला प्रमाणपत्र क्या हो सकता है? मुख्य मंत्री ने उनका चेहरा काला पोत के रख दिया है, लेकिन उन्हें (थानेदारों को) शर्म नहीं आती है”।

भण्डारी बाद में यहाँ तक लिख बैठे कि “अशोक गहलोत ने अपने द्वितीय कार्यकाल के 26 महीनों में प्रशासन के अनेक लोगों के मुँह काले पोत दिये मगर उनके कान में जूँ नहीं रेंगी”।

ऐसे वक्तव्यों में वे अशोक गहलोत के बड़े सुकोमल रूप को देखते हैं। वे यह भी कहते हैं कि “हालांकि नए कार्यकाल में कोई विशेष परिवर्तन हो गया हो ...ऐसा तो नहीं है, लेकिन चेष्ठा दिखाई देती है”।

यह सवाल उठाते हुए कि “गहलोत को अपनी कमीज ही चमकाने की चिंता क्यों है? भण्डारी खुद ही जवाब देते हैं गहलोत समझ गए हैं कि “राजनेताओं से अधिक आमजन जागरूक है। उसके सामने आपकी चोरी छिपती नहीं”।

भण्डारी आमजन की जागरूकता की बात तो करते हैं मगर गहलोत की चमकती कमीज पर कोई छाया नहीं पडे इसका भी ध्यान रखते हैं। गहलोत के प्रति ऐसा मोह दिखाने वाले वे अकेले पत्रकार नहीं है।

राज्य के सारे अख़बारों, जिसमें राजस्थान पत्रिका भी शामिल हैं, के पन्ने रोजाना ऐसे समाचारों से भरे रहते हैं जिसमें कानून, व्यवस्था और प्रशासनिक व्यवस्थाएँ छिन्न भिन्न हुई साफ दीखती है। मगर भण्डारी उन पत्रकारों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिन्हें इन सारी प्रशासनिक असफलताओं से गहलोत का दामन बचाने का मोह है। वरना क्या कारण है कि जिन प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों की अपराधियों से मिलीभगत की ओर गहलोत अपने वक्तव्य में बात कर रहे हैं उसके लिए लिए उन्हें साधुवाद दिया जाता है।

मुख्यमंत्री की यह साफ़गोई नहीं है। वरना गहलोत अपने मातहत अफसरों का मुँह काला पोतने वाला सार्वजनिक वक्तव्य देने से पहले अपनी भूमिका पर ध्यान देते। लोकतंत्र में शासन में बैठे राजनेता जनता के नुमाइन्दे होते हैं। जनता उन्हें राज में इसलिए भेजती है कि वे उनकी आकांक्षाएं और अपेक्षाएं पूरी करेंगे। आमजन जो जानता है उसकी मुख्य मंत्री से ताईद की जनता को दरकार नहीं है। आमजन चाहते हैं कि जो गड़बड़ी मुख्यमंत्री की जानकारी में आ गई है वह तो कम से कम दूर हो। राज्य के शीर्ष पर बैठा कोई राजनेता अपनी इस जिम्मेदारी से सिर्फ इसलिए नहीं बच सकता कि वह तो खुद ही जनता की समस्या बता रहा है। जनता चाहती है मुख्यमंत्री जी समस्याएँ बताना छोड़ें उनके समाधान की बात करे और उसे करके बताएँ। जनता अपने प्रतिधियों को इसलिए नहीं चुनती है कि वह कुर्सी पर बैठ कर उन्हें उपदेश देने लगे या वह कुछ कर नहीं पा रहा है उसके लिए अपनी कमजोरी का ठीकरा दूसरों पर फोड़ता रहे और बहाने बनाता रहे।

गहलोत शासन के प्रमुख हैं इसलिए वे अपने प्रशासनिक अफसरों के बारे कुछ भी कह सकते हैं। मातहत उन्हें जवाब भी नहीं दे सकते। प्रशासन तंत्र में बैठे लोगों को संवैधानिक और सेवा नियमों की मर्यादाओं का पालन करना होता है। राजनेता के लिए सब छूट है। इसलिए गहलोत तो अपने प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों का “काला मुँह” कर सकते हैं पर खुद उनसे जवाब कौन माँगे। लोकतंत्र में जनता यह जवाब पाँच साल बाद माँगती है। मगर पाँच साल के कार्यकाल के दौरान निर्वाचित प्रतिनिधियों से सवाल करने का दायित्व अखबारों का होता है क्योंकि लोकतांत का ‘चौथा स्तंभ’ कहलाने वाले पत्रकार भी जनता के नुमाइन्दे होते है जिनका काम केवल सूचना देना नहीं होता बल्कि लोग जो बोल कर कह नहीं सकते उसे अभिव्यक्ति देना। अभिव्यक्ति की आज़ादी हमें अपने संविधान से मिलती है। किसी के रहम-ओ-करम से नहीं। मगर जब हम कहते हैं “मीडिया” तब सूचना के सभी स्रोत – अख़बार, रेडियो, टीवी समेत – व्यवसायगत हो जाते हैं। मीडिया बाज़ार की चाल चलता है और उसी के लिए हो रहता है। बाज़ार सिर्फ पूंजी के लिए होता है मगर वह यह भ्रम पैदा करने में सफल रहता है कि वह ग्राहक के लिए है। खुले बाज़ार के पैरोकार ग्राहक को चुनने की छूट देने का लोकतान्त्रिक ढोंग रचते हैं। उसी प्रकार आज के अख़बार, जो अब प्रिन्ट मीडिया कहलाने लगे हैं, यह भरम बनाए रखते हैं कि शासन-प्रशासन पर खोजी निगाह उनकी है और वे जनता की बात करते हैं। मगर वास्तव उनका सरोकार अपने मुनाफे से होता है जिसे वे उंन स्रोतों से भी पाते हैं जिसका उनके सूचना के व्यवसाय से कोई संबंध नहीं होता। अख़बार से मुनाफा पाने के साथ वे इसके प्रभाव का उपयोग अपने इतर व्यवसायों के हित साधने का बड़ी चालाकी से करते है। यह चालाकी हमें मौजूदा राजनैतिक दौर में साफ नज़र आती है। यदि यह चालाकी नहीं होती तो तो प्रशासनिक असफलता के लिए गहलोत से सवाल क्योंकर नहीं होता। आज के मीडिया में भण्डारी अकेले नहीं हैं जो यह तो कहते हैं कि आम आदमी तकलीफ में है, हर ओर भृष्टाचार का आलम है मंत्री नाकारा हैं और सबसे बढ़ कर राज का कोई रुतबा नहीं रह गया है मगर इसके लिए वे मासूमियत से गहलोत को सुरक्षा कवच भी देते हैं और कहते हैं कि गहलोत तो बड़े स्वछ हैं मगर उनकी टीम ठीक नहीं है। कोई यह नहीं कहता कि गहलोत कमजोर व्यक्ति या नेता हैं। सभी उनकी राजनैतिक ताकत को हिमालय जैसी मानते हैं। यदि वे ऐसे ताकतवर हैं तो उन्होने कमजोर और भृष्ट टीम क्यों चुनी। इसका जवाब उनकी पैरवी करने वाले मीडियाकर्मी यह कह देते हैं कि उनकी राजनैतिक मजबूरी है। मजबूरी वाला नेता ताकतवर हुआ या कमजोर हुआ? एक तरफ सभी गहलोत को एक ताकतवर नेता मानते हैं मगर उन्हें अपने मंत्रियों और प्रशासनिक अधिकारियों के सामने लाचार भी मानते हैं। यह अंतर्विरोध किसी को नहीं दिखता या देखना नहीं चाहते।

गहलोत का सत्ता व्याहमोह अनोखा है। उनका सच सिर्फ अपनी कुर्सी का सच है। उन्होंने अपने आभामंडल का एक सुरक्षा घेरा बना रखा है। मगर इस घेरे से बाहर वे खुद भी कुछ नहीं देख पा रहे है, यह कड़वा सच कोई उन्हें नहीं कहता। यह घेरा उन्हें दीवार पर लिखी लिखाई नहीं देखने देता। यह घेरा उनकी सफलताओं के कसीदों की इतनी तेज रोशनी करता है कि उसमें उनकी खुद की आँखे चौंधिया जाती है और उन्हें जमीनी हकीकत के मुकाबले इसी घेरे की दुनिया सच लगने लगती है।

गहलोत के पिछले कार्यकाल में भी ऐसा ही था। तब उनके अपने शिवचरण के अख़बार ‘लोक दशा’ के पहले पन्ने पर एक आलेख ने गहलोत को जगाने का प्रयास करते हुए लिखा था कि वे इस घेरे के बाहर देखें। मगर गहलोत ऐसा नहीं कर पाये और चुनाव परिणामों ने वास्तविक तस्वीर से उन्हें रूबरू करा दिया। उन्हें परास्त कर सत्ता में आई वसुंधरा राजे भी अपनी शाही घेरे की चकाचौंध से व्यामोहित रही और अपने घेरे के बाहर की दुनिया का पता उन्हें चुनाव परिणामों ने ही दिया।

फिर चुनाव जीत कर आए गहलोत से लोगों की जबर्दस्त अपेक्षा थी कि वे अपने पिछले कार्यकाल और काम काज के नतीजों से बहुत कुछ सीख कर आए होंगे और अपने दूसरे कार्यकाल में राजस्थान को मजबूत और कुशल नेतृत्व देंगे। मगर मजबूती की जगह एक ऐसा लाचार राजनेता हमारे सामने आता है जिसकी सारी कोशिशें कुर्सी के लिए होती है। जो अपने प्रशासन को कुशल नहीं बना सकता। वह समझौते करता है। जो आदर्शों की बातें करता है मगर जिसमे उन्हें व्यवहार में लाने की कोई गंभीरता नहीं। गहलोत ऐसे क्यों है इसके लिए वे राजनैतिक परिस्थितियां जिम्मेवार हैं जिसमें उन्होंने सत्ता की सीढ़िया चढ़ी। जब उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया तब राज में से नीतियाँ तिरोहित हो रही थीं और व्यक्तिवाद अपनी नींव पक्की कर रहा था। ऐसे में जोधपुर से अशोक गहलोत के रूप में जो राजनेता प्रदेश के परिदृश्य पर उभरा वह ‘सेल्फ मेड’ था। उसने कांग्रेस की आंतरिक राजनीति को पूरी तरह साध लिया। अब वे अपने ही बुने राजनीति के जाल में घोर अकेले हैं। उनका अकेलेपन का शोर उनके वक्तव्यों में फूट पड़ता है। वे मीडिया के जरिये अपनी छवि को सरल, सौम्य और मिस्टर क्लीन दिखाये रखने में सफल रहते हैं। मगर वे भूल जाते हैं कि मीडिया द्वारा बनाई गई छवि एक हद तक ही बनी रह सकती है। इसमें ख़तरा यह होता है कि मीडिया में बनवाई गई छवि को खुद वह व्यक्ति सच मानने लगता है। राजस्थान पत्रिका में छपा यह लेख गहलोत को ऐसे ही भुलावे में डालता है।

Wednesday, February 9, 2011

गीत-संगीत में ढल कर आम जन तक पंहुचे गांधी


राजेंद्र बोड़ा

महात्मा गांधी का संगीत से क्या वास्ता हो सकता है। सतही तौर पर देखने पर गांधीजी का जीवन बड़ा ही नीरस और उबाऊ लग सकता है। एक राजनेता और समाज सुधारक की महात्मा गांधी की छवि में आम तौर पर कला या संगीत के लिए कोई स्थान नहीं दिखता। संगीत और अन्य कलाओं के लिए उनके पास वक्त ही कहाँ था। देश की आजादी और विभिन्न समुदायों खास कर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच भाईचारे को मजबूत बनाने के लिए प्रयासों में ही उनका सारा जीवन बीत गया। खुद उनके जीवनकाल में लोगों को लगता था कि वे जिस प्रकार का जीवन व्यतीत करते हैं और जिस सादे जीवन की अपेक्षा वे लोगों से करते हैं उसमें संगीत जैसी कलाओं का कोई स्थान नहीं हो सकता। ख्यातनाम गायक दिलीप ने एक बार गांधीजी से संगीत की चर्चा छेड़ ही दी। दिलीप बंगाल के जाने माने नाट्यकार द्विजेंद्रलाल राय के बेटे थे और गायन के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति पा चुके थे। संगीत की बात छेडते हुए दिलीप ने कहा महात्मा जी मुझे लगता है हमारे स्कूलों और कालेजों में हमारे खूबसूरत संगीत की उपेक्षा होती है। जवाब में गांधी जी बोले “यह दुर्भाग्यजनक है। मैंने तो हमेशा ही यह कहा है”।

दिलीप ने जब महात्मा जी से कहा कि वे तो इस भ्रांति में थे कि आपके जीवन में कला का कोई स्थान नहीं है। मैं तो यह सोचता था कि आप जैसा संत तो संगीत का विरोधी होगा। गांधी जी चौंक कर बोले “संगीत के खिलाफ और मैं?” फिर बापू कहने लगे “मेरे बारे में लोग ऐसी ऐसी बातें फैला देते हैं कि मेरे लिए उनका प्रतिकार करना भी असंभव हो जाता है। नतीजा यह होता है कि जब मैं कहता हूँ कि मैं खुद एक कलाकार हूँ तो लोग मुस्करा देते हैं”। गांधी जी ने आगे और खुलासा किया कि “मैं तो मानता हूँ कि धर्म का विकास बिना संगीत के हो ही नहीं सकता था”।

हम जानते हैं कि गांधी की प्रार्थना सभाओं में सभी धर्मों के भजन गाये जाते थे। यह भजन गायन संगीत नहीं तो और क्या था। महान गायिका जुथिका राय ने कुछ दिनो पूर्व जयपुर में गांधीजी का एक प्रसंग सुनाया था। गांधी जी कलकत्ता आए तब वे पहली बार उनके “दर्शन करने” गई थी। तब अत्यंत व्यस्त होने के बावजूद गांधी जी ने जुथीका राय से भजन सुने थे। जब जुथीका रॉय पहुँची तब गांधीजी नहाने के लिए जा रहे थे। उन्होंने जुथीका से कहा मैं पास के कमरे में नहाता हूँ तुम यहाँ बैठ कर गाओ। और जब तक गांधी जी नहा कर बाहर नहीं आ गए किशोरी जुथीका एक के बाद एक भजन गाती रही। गांधी जी बहुत प्रसन्न हुए और गायिका को खूब आशीर्वाद दिया। फिर बोले तुम्हें शाम को प्रार्थना सभा में गाना है। जुथीका को को प्रार्थना स्थल तक ले जाने के लिए एक मोटर कार आई और कलकत्ता में हजारों लोगों के समक्ष जुथीका के भजन के साथ गांधी जी की सभा का समापन हुआ।

कहा जाता है कि एक बार नारद जी ने भगवान विष्णु से पूछा कि आप कहाँ निवास करते हैं ?
भगवान ने कहा :

नाहं वसामि वैकुंठे योगिनां हृदये न च,
मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद ।


अर्थात न मैं वैकुंठ में वास करता हूँ और न योगियों के हृदय में।
हे नारद जहाँ मेरे भक्तगण मेरा गान करते हैं मैं वहाँ वास करता हूँ।

गांधीजी की प्रार्थना सभाओं में सभी धर्मों के गीतों का गान होता था। इसीलिए वहाँ भगवान विष्णु का वास होता था। इसीलिए वहाँ से प्रेम और भाईचारे की गंगा प्रवाहित होती थी।

गांधीजी का भारतीय जन जीवन पर गहरे तक प्रभाव रहा। वे हर परिवार के बुजुर्ग या मुखिया की तरह हो गए। इसीलिए कवि ने कहा “चल पड़े जिधर दो डग मग में/ चल पड़े कोटि पग उसी ओर”।

गांधी की गूँज कवियों की कविताओं में और आम जन के लोक गीतों में जाम कर उभरी। गांधी ने सूट कातने का नारा दिया तो हर तरफ यह गीत गूँज उठा “कतली कातो मेरे भाई इसको गांधी ने अपनाई”।

अहिंसा के पुजारी के लिए देश के बच्चे बच्चे ने गया “दे दी हमें आजादी बिना खड़ग बिना ढाल/ साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल।“

अपनी मृत्यु तक गांधीजी के सचिवे रहे महादेव देसाई के बेटे नारायण देसाई तो देश के कोने कोने में गांधी कथा का वाचन करते फिरते हैं और हर जगह उनके गान को सुनने के लिए लोग लालायित रहते हैं।

गांधी के महाप्रयाण के बाद राजेंद्र क़ृष्ण की लिखी गांधी कथा जिसे हुस्नलाल भगतराम ने सुरों में बांधा था घर-घर गूँजी। “सुनो – सुनो ए दुनिया वालों बापू की ये अमर कहानी” को कौन भूल सकता है जिसे मोहम्मद रफी ने बड़े मनोयोग से गाया था।

जोधपुर में विवाह के मौके पर पुष्करकरणा ब्राह्मणों में महिलाएँ जो गीत गातीं हैं उन में गांधीजी का भी जिक्र आता है। एक गीत में महिलाएँ गातीं है चरखा कातो क्योंकि गांधी जी ने ऐसा कहा है। पुष्करणा ब्राह्मणों के विवाह गीतों में सामाजिक सुधार की यह भावनाएँ स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों और सामन्ती शासन से लोहा ले रहे सेनानियों पर गांधी जी के प्रभाव के कारण समाहित हुई। इन सेनानियों में एक प्रमुख नेता थे जयनारायण व्यास। वे न केवल राजनेता थे बल्कि गीत संगीत और नृत्य में स्वयं बड़े माहिर थे। उनके लिखे गीतों नें लोगों में आज़ादी की लड़ाई का जोश ही नहीं फूंका बल्कि सामाजिक कुरीतियों पर भी वार किया और समाज को सुधार की तरफ प्रेरित किया। जयनारायण व्यास जो बाद में राजस्थान के मुख्यमंत्री बने ने गांधीजी पर एक गीत लिखा और गाया भी। वह गीत उनकी ही आवाज में मारवाड़ी रिकार्ड कंपनी ने जारी किया जो आज हमारी ऐतिहासिक धरोहर है।

उस गीत को आज फिर याद करना बड़ा ही अनोखा अनुभव है। सीधे सरल शब्दों में मारवाड़ी में व्यास जी ने गाया “साथीड़ा रे, करमोजी रे घरे जायो रे/ मोहन जी नाम धरायो रे / भारत आज़ाद करायो रे / म्हारो बाबो गांधीजी।

आगे वे लोगों को सीख देते हुए गाते हैं “साथीड़ा गांधी दोय बात बताई रे / हिंसा तज राख सच्चाई रे / आ सीख घणी सुखदाई रे / म्हारो बाबो गांधी जी”।

व्यासजी अपने गीत में गांधी के हवाले से केवल अहिंसा और सच्चाई की ही बात नहीं करते बल्कि समाज में व्याप्त कुव्यसनों को छोडने और ईमानदारी पर भी ज़ोर देते हैं और गाते हैं “साथीड़ा रे पर नारी ने माता जाणो रे / पर धन पापोड़ो मानो रे / जन सेवा ने अपनाणो रे / म्हारो बाबो गांधी जी”।

गांधी के रास्ते को निराला बताते हुए शेरे राजस्थान कहलाने वाले जयनारायण व्यास आखिर में कहते हैं “साथीड़ा रे गांधी रो पंथ निरालो रे / सब कौमां हिल-मिल चालो रे/ थे छूआ-छूत मिटावो रे / म्हारों बाबो गांधी जी”।

उस जमाने की 78 आरपीएम रेकार्ड पर गीत के तीन अंतरे ही आते थे इस लिए व्यास जी के गीत का चौथा और अंतिम अंतरा उसमें नहीं है। उस अंतरे में वे उन्होंने कहा : “गांधी रे पथ पर चालो रे / सत न्याय मार्ग अपनालो रे / अड़कर अन्याय मिटलों रे / म्हारों बाबो गांधी जी।

नारी उत्थान और सामाजिक सुधार के लिए जयनारायण व्यास के गीतों अन्य गीतों में भी गांधी की सीख की झलक मिलती है। उनके एक अत्यंत लोकप्रिय गीत “सुनो सुलक्षणी नार” में वे कहते हैं : “सुनो सुलक्षणी नार बात तेरे हितकारी है, विनय हमारी है / ... बचा बचा तू बचा देश को, जो कुछ भी उपकारी है”। आज भी जब स्त्रियाँ यह गीत गाती हैं तो उसमें गांधी के बोल सुनाई पड़ते हैं : “कह निज पति को प्रेम भाव से, जो तो कृष्ण मुरारी है / देशी पहनूंगी यह बात मैंने विचारी है, विनय हमारी है / चरखा ला दो मैं कातूंगी, इसकी छवि कुछ न्यारी है... कते सूत से मुझे बनादो, वस्त्र सभी जो जारी है”

इस प्रकार गीत और संगीत में ढल कर महात्मा गांधी के विचार और उनका जीवन दर्शन आम जन तक पंहुचे और समूचे देश में एक ऐसी चेतना जगाई जिसने ‘हम भारत के लोग’ वास्तव में अपनी सामर्थ्य पहचान सके।

(स्वर सरिता के फरवरी 2011 के अंक में प्रकाशित आलेख)

Monday, February 7, 2011

जयपुर लिट्रेचर फेस्टीवल : कंचन के सहारे साहित्यिक गुणों को परिभाषित करने का प्रयास


राजेन्द्र बोड़ा

राजधानी में होने वाला जयपुर लिटरेचर फेस्टीवल, अंतर्जाल (इंटरनेट) के एक खबरिया मुकाम ‘डेली बीस्ट’ के मुताबिक, विश्व के अव्वल नंबर के समागमों में शुमार हो गया है। उसने इसे “धरती पर साहित्य का महानतम प्रदर्शन” बताया। आयोजक खुश थे कि उनके प्रयासों की सफलता का डंका सभी मानने लगे हैं। लिटरेचर फेस्टिवल का इस बार यह छठा सालाना संगम था। इस समारोह की कल्पना को जयपुर में पहली बार साकार ब्रितानवी मूल की महिला फेथ सिंह ने जयपुर विरासत फ़ाउंडेशन के झंडे तले किया था। छह सालों के सफर में इस आयोजन की सफलता इसी से आँकी जा सकती है कि इस बार उसके पास प्रायोजकों की भीड़ थी। प्रमुख प्रायोजक डीएससी कंपनी थी जो राजमार्ग और रेल पथ के साथ पन बिजली उत्पादन के क्षेत्र में बड़ी निवेशक है। समारोह पर बड़ा निवेश करने की एवज में इस बार उसके नाम से – “डीएससी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल” का आयोजन हुआ।

हर बार की तरह इस बार भी जलसे में अभिजात्य लोगों की खूब रौनक रही। यह सवाल अलहदा है कि क्या यह अभिजात्य वर्ग सचमुच साहित्य पढ़ता है या उसे तस्वीर की तरह देख कर अलग रख देता है या उसे अपने ड्राइंग रूम में सजा देता है।

अभिजात्य वर्ग के लोग कभी-कभी अवकाश चाहते है। उच्चतर किस्म का काम करके – बौद्धिक काम, आध्यात्मिक काम। कुछ समय के लिए फुर्सत की तलाश। मार्शल मैक्लूहन ऐसे लोगों को “ड्राप-आउट” की संज्ञा देते हैं। ऊबे हुए लोग, समाज विमुख लोग। दूसरे लोग उनसे जुड़ना चाहते हैं क्यों कि वे महत्व चाहते हैं। जैसे एक देह से निकल कर दूसरी देह में घुस जाने की चाह।


आलीशान मेले में शामिल लोगों को अपनी अहमियत मालूम थी। अहमियत रखने वालों मे शामिल होने की ललक हर प्रतिभागी में थी। सहभागियों में अपने बड़प्पन का छद्म था। बुद्धिवाद का नजारा चहुं ओर बिखरा पड़ा था। डिज़ाइनर चश्मे, डिज़ाइनर परिधान, डिज़ाइनर भौहें, डिजाइनर काजल। नई वर्ण व्यवस्था का नया डिजाइनर वर्ग। शास्त्र जीवी होने का अभिमान लिए अर्थ जीवियों का यह अद्भुत संगम था।

एक भिखारी द्वारा अपने बच्चे को लेकर वहाँ पहुँचने पर उसका भी वहाँ स्वागत का घोष करके आयोजकों ने उसे बराबरी का अधिकार देने का बड़प्पन दिखाया।

स्थानीय भागीदारों को लगा जैसे वे साहित्य के अभिजात्य वर्ग में शामिल हो रहे हैं मगर वास्तविकता में वे उनके अनुगामी बने। आयोजक आश्रयदाता थे। समृद्धवर्गीय स्वार्थ। आयोजन समृद्धि का एक उपकरण।

यह आयोजन बाज़ार जनित था। बाज़ार को आडंबर की जरूरत होती है। भारतीय संस्कृति और पश्चिम में यही फर्क है। भारत की बौद्धिक परंपरा पश्चिम की बौद्धिक परंपरा से भिन्न रही है। उनके लिए संस्कृति सिर्फ समारोह है या इतिहास है।

प्रोफ़ेशनल राइटर्स – जो धड़ाधड़ छपे और खूब पैसे कमाए। बाज़ार को ऐसे लेखकों की ही जरूरत होती है जो उसे भी कमाकर दे। ऐसे फेस्टीवल एक उपक्रम होते हैं।

बाज़ार को ऐसे लेखक चाहिए जो उसके लिए लिखे। वह अपना उत्पाद खपाने और उसके उपभोक्ता पैदा करने के लिए ऐसे फेस्टीवल करता है। यह रीत दुनिया भर में चल रही है।

तात्कालिक आवश्यकताओं कि पुस्तकें ही बाज़ार में सबसे अधिक दिखती हैं। नया दौर कहानीनुमा इतिहास लिखने का है।

जो छप रहा है वह खरा हो आवश्यक नहीं है। परंतु वही खरा है इसका भ्रम बनाने और उसके खरीददार पैदा करने में आज का विज्ञापन युग का बाज़ार पूरी तरह सक्षम है।

बाज़ार में क्या चलना चाहिए यह भी बाज़ार की ताक़तें ही तय करती हैं। इसे कुछ लोग साहित्यिक सद्प्रयास कहते हैं। बाज़ार की यह खूबी होती है कि वह यह भुलावा सफलता से दे देता है कि उसके यहाँ विरोधी के लिए भी जगह है। ऐसा करते हुए वह सर्वव्यापी हो जाता है जो उसका धर्म है। इसीलिए समारोह में चे गवेरा, जिसने पूरी उम्र पूंजी के आधिपत्य से लड़ते हुए गुजारी और अपना जीवन कुरबान कर दिया, की जीवनी पर चर्चा को पूंजीवाद की पोषक बहुराष्ट्रीय कंपनी गोल्डमैन साक्स प्रायोजित करती है तो क्या आश्चर्य। यह भी अभिजात्य वर्ग का मनोरंजन होता है। बाबा नागार्जुन की फकीरी की बातें सुन कर सहभागियों को आनंद हुआ और मामूली लोगों का मसीहा गैर मामूली लोगों के रंजन का साधन बना।

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ ने एक बार अखिल भारतीय रेडिकल ह्यूमेनिस्ट एसोसिएशन के द्विवार्षिक सम्मेलन में स्वागत भाषण देते हुए जो बात कही थी वह आज याद आती है। उन्होंने कहा था: “हमारा सार्वजनिक जीवन एक व्यापक दूषण से दूषित है जिसे अंग्रेजी अभिजात्यवाद कहा जा सकता है। मैंने कई बार सोचा है कि क्या यह बात सच नहीं है कि अंग्रेजी के प्रति इस मोह के और सत्ता की राजनीति के बीच एक घनिष्ठ संबंध है।... इसका यह अर्थ नहीं कि अंग्रेजी का परित्याग या बहिष्कार किया जाये, आशा यही है कि उसे उसके उचित पद पर बैठाया जाए और उसके साथ जुड़ी हुई उच्चता और अभिजात्य की भावना का परित्याग किया जाये। अंग्रेजी के साथ सत्ता के अधिकार का जो दावा जुड़ा रहता है उसका खंडन किया जाए”।

अंग्रेजी की आक्रामकता केवल शोषण के लिए रही है। अंग्रेज दूसरी दुनिया पश्चिम से आए, यहाँ बसने के लिए नहीं केवल मुनाफा कमाने के लिए - शोषण करके। हमारे पास इनका सीधा रचनात्मक और ध्वंसात्मक जवाब न तब था न आज है।

आज की राज व्यवस्था ने इस आयोजन को सांस्कृतिक समारोह माना। फिल्म अभिनेता सलमान खान को अपना प्रिय मानने वाली राजस्थान की कला और संस्कृति मंत्री बीना काक, जिन्हें अपने दो वर्ष के कार्यकाल में राज्य की कला संस्कृति, भाषा और साहित्य अकादमियों की एक बार भी सुध लेने की फुर्सत नहीं मिली, वे इस आयोजन पर इतनी मेहरबान हुई कि उसके लिए राज कोष से दस लाख रुपयों का अनुदान घोषित कर दिया।

हमारे राजनेताओं को यह दंभ रहता है कि वे संस्कृति और साहित्य पर अनुग्रह करते हैं। मगर वे ही बाज़ार के सामने मिमियाते हुए उसके लिए सार्वजनिक कोष की राशि उंडेलते नहीं अघाते। वैसे आज की सरकारों से सुबुद्धि की अपेक्षा करना व्यर्थ है। ऐसे समय हमें चिंतक लेखक विद्यानिवास मिश्र की वह टिप्पणी याद आती है जिसमें उन्होंने कहा था “शूद्र समाज तो वह है जहाँ कंचन के सहारे सारे गुण परिभाषित होते हों”।

ऐसे फेस्टीवल बाज़ार के हो रहे लेखकों की ख्याति बढ़ाने के विज्ञापनी जतन करता है। इसमें आज का मीडिया उसका भागीदार बनता है। कभी इसी फेस्टिवल में स्थानीय अस्मिता के सवाल पर फेस्टीवल की एक प्रमुख कर्ताधर्ता नमिता गोखले से तूँ-तूँ मैं-मैं की हद तक उतर जाने वाला ‘दैनिक भास्कर’ इस बार उसका प्रायोजक था। बाज़ार ने अखबारों की यह मजबूरी कर दी है कि उन्हें यदि उसका साथ चाहिए तो अपने ऐसे पाठक बढ़ाए जो बाज़ार के अन्य उत्पादों के उपभोक्ता भी हों। ऐसे ही उपभोक्ताओं की तलाश में ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’, ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ और ‘दैनिक भास्कर’ जैसे अपने को सबसे बड़ा कहने वाले अख़बार फेस्टीवल में खुले हाथों से मुफ्त बाँटे जा रहे थे।

फेस्टीवल का दामन पकड़ने में ‘दैनिक भास्कर’ से पीछे रह गए दूसरे प्रमुख अख़बार ‘राजस्थान पत्रिका’ की खीज उसके प्रथम पृष्ठ पर रामकुमार की एक प्रभावी टिप्पणी के रूप में सामने आई “... कौन ठगवा नगरिया लूटन हो”।

समारोह में साहित्यिक प्रेरणा को उकसाने का कोई श्रम हुआ हो हमें नहीं मालूम। एक अनुशासित समय ढांचे में सभी कुछ डिजाइन की हुई चीजें। जैसे सबसे पहले सूत्रधार का वक्तव्य फिर लेखक से कुछ सवाल जिसके जवाब उसी किताब की प्रस्तावना में जिस पर चर्चा की जा रही हो मौजूद होते है जिसे वह फिर दोहरा देता है। इसके बाद लेखक द्वारा किताब के कुछ अंशों का वाचन और अंत में सामने जुटे लोगों को लेखक से सवाल करने की इजाजत। मगर उनमें सवाल कम अपना ज्ञान बघारने की मत्वाकांक्षा अधिक झलकती है।

इसीलिए आम आदमी आयोजकों की दिखावटी नेकनीयता के बावजूद समारोह से दूर रहा। कोई रोक टोक नहीं थी। सभी के लिए एंट्री फ्री। मगर जो अंदर थे वे जलसे का डिज़ाइनर तमगा गले में लटकाए रखने की अजीब तहज़ीब से बंधे थे।

यह हमारे समय और समाज की विडंबना है कि हमारी सामाजिक चेतना को झंझोड़ने वाले सभी साधन ऐसे लोगों के हाथों में है जो तेजी से केंद्रित होते जा रहे हैं और हमारी बुद्धि को कंडीशंड कर रहे हैं। बुद्धि को कुंठित और निष्प्राण किए बिना कोई भी निकृष्ट स्वार्थपरकता संभव नहीं है।

ऐसे आयोजनों में शामिल होने वाले अपनी आत्मिक पराजय को शायद स्वीकार नहीं करें मगर बाज़ार की जीत को तो सभी को स्वीकार करना ही पड़ेगा।

ऐसे जलसे एक पाखंड रचते हैं। कहा गया है कि लेखन या तो लेखक के लिए होता है या मनोरंजन के लिए। दोनों रास्ते विनाश के है। फेस्टीवल से यही रास्ता निकलता है।