Wednesday, May 8, 2013

शमशाद बेगम: जिनके साथ ही एक ज़माना गुजर गया

राजेंद्र बोड़ा 


राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल शमशाद बेगम को पद्मश्री अलंकरण प्रदान करती हुई
गायिका शमशाद बेगम वह कड़ी थी जो गुजरे ज़माने के साथ हमें जोड़े रखे हुई थीं। उनके चुपके से इस दुनिया से विदा होने के साथ ही यह कड़ी टूट गई है। हिन्दुस्तानी फिल्मों को उसकी अलग पहचान उसके संगीत ने दी। और हिंदुस्तानी फिल्म संगीत को जिन आवाज़ों ने बुलंदियां दीं उनमें एक प्रमुख नाम रहा शमशाद बेगम का जिनकी खनकदार आवाज़ के जादू का प्रभाव  समय की दूरियाँ भी नहीं मिटा सकी हैं।

वर्ष 1931 में आलमआरा से हिंदुस्तानी फिल्मों को आवाज़ मिली। मूक से सवाक् फिल्म के बदलाव का सफर गानों के साथ शुरू हुआ जो आज भी जारी है। 1930 के दशक की फ़िल्मों के उस शुरुआती दौर में वजनदार आवाज़ों का ज़ोर था।  रोशनआरा बेगम, कज्जन बाई, वहीदन, हमीदा बानो आदि के साथ अमीरबाई कर्णाटकी, ज़ोहराबाई अंबालावाली, कानन देवी और सुरैया  अपनी धाक जमा रहीं थीं तभी दो बुलंद आवाज़ें आते ही सब पर छा गईं वे थीं – नूरजहाँ और शमशाद बेगम की।

हिंदुस्तानी फिल्मों का शुरुआती दौर का 1940 का दशक। कुंदनलाल सैगल को छोड़ दें तो गानों महिला गायिकाओं का ही बोलबाला रहा। गायिकाएँ पुरुष गायकों से एक कदम आगे ही रहीं। वे पुरुषों की बराबरी में बुलंद आवाज़ में गा रहीं थी। ऐसे में नूरजहां और शमशाद बेगम ने ऐसी मिठास घोली जिसका स्वाद आज भी बरकरार है।

हिंदुस्तानी फिल्म संगीत के अंतिम मुगल कहे जा सकने वाले संगीतकार नौशाद के शब्दों में शमशाद बेगम की आवाज़ खंजर की ऐसी तेज धार की तरह थी जो सुनने वाले के सीने में सीधे उतर जाती थी।

हिंदुस्तानी फिल्म संगीत में एक अलग घराने के रूप में प्रतिष्ठित ओंकार प्रसाद नैयर को शमशाद बेगम की आवाज़ में मंदिरों में बजती घण्टियों की ध्वनि सुनाई देती थी।  
शमशाद बेगम की आवाज़ की पाकीज़गी में भरपूर ओज था। उसमें भावनाओं के ज्वार था, खुशी का उल्हास था, दर्द का एहसास था। उनकी आवाज़ में सुरों का ऐसा तीव्र झरना फूट पड़ता था जिसमें कोई सुनने वाला बह जाने से बच नहीं सकता था।

खुदा की यह नियामत 12 भाई बहनों के मुस्लिम जाट परिवार में 14 अप्रेल 1919 को लाहौर के लुहारी मंडी इलाके में जन्मी उस बच्ची को मिली जहां संगीत की कोई परंपरा नहीं थी। शमशाद बेगम के परिवार में उनके चाचा अमीरुद्दीन को छोड़ कर किसी को संगीत का शौक नहीं था। हिंदुस्तानी फिल्म संगीत को  शमशाद बेगम की सौगात नहीं मिल पाती यदि उनके इस चाचा ने अपने भाई को किसी प्रकार मना कर 13 वर्ष की बच्ची से ज़ीनो फोन रिकार्ड कंपनी का परिचय नहीं कराया होता। कंपनी के संगीत निर्देशक मास्टर गुलाम हैदर ने उसे सुनते ही 12 गाने रिकार्ड करने का अनुबंध कर लिया। एक गाने के लिए साढ़े बारह रुपये देने का रिकार्ड कंपनी ने करार किया। इस तरह 1939 में शमशाद बेगम का पहला गाना जो रिकार्ड पर जारी हुआ वह एक भजन था जय जगदीश हरेजिस पर गायिका के रूप में उनका नाम छपा उमा देवी। दूसरा गाना पंजाबी में था हथ जोड़िया पंखिया दा, कसम खुदा दी। गाना इतना अच्छा रिकार्ड हुआ कि इस गाने के साढ़े बारह रुपये के मेहनताने के अलावा शमशाद बेगम को छह रुपये ऊपर से इनाम में मिले।

वैसे उन्हों ने लाहौर रेडियो स्टेशन पर गुलाम हैदर के संगीत में बहादुर शाह जफर की गज़ल मेरा यार गर मिले मुझे जान दिल फिदा करूँ गाकर स्वर परीक्षा दी थी। फिर 1934 में किस्मत का शिकार फिल्म में दो गाने गाये।

शमशाद बेगम हिंदुस्तानी फिल्मों में जबर्दस्त धूम मचाने के लिए 1944 में स्थायी रूप से बंबई आ ई। मगर उससे पहले लाहौर में वे अपना ऐसा डंका बजा चुकी थी जिसकी गूंज सारे देश में सुनाई पड़ी थी। पंचोली आर्ट की यमला जट्ट(1940), चौधरी (1941) पंजाबी फिल्मों के बाद लाहौर से उनके गानों से सजी छह हिंदुस्तानी फिल्में आईं – खजांची (1941), खानदान (1942), जमींदार (1942), पूंजी (1943), कैसे कहूं (1945) और शीरीं फरहाद (1945)। गुलाम हैदर के संगीत से सजी खजांची वह फिल्म है जिसके बारे में माना जाता है कि उसने हिन्दुस्तानी फिल्म संगीत में मेलोड़ी की ऐसी धारा बहाई जिसमें समूचा अविभाजित हिंदुस्तान भीग गया। इस धारा को बहाने में गुलाम हैदर ने पंजाबी खनक, उर्दू की मिठास वाली और साथ में नौजवान पीढ़ी की शोख़ी और अल्हड़पन का प्रतिनिधित्व करने वाली शमशाद बेगम की आवाज़ की मदद ली। शमशाद बेगम की आवाज़ का ऐसा जादू चला कि महबूब जैसा निर्माता निर्देशक अपनी फिल्म तकदीर (1943) में शमशाद बेगम से गाने गवाने के लिए बंबई से चल कर लाहौर गए। वे प्रति गाना 300 रुपये के अनुबंध पर शमशाद बेगम को लेकर बंबई आए। इसके बाद नवयुग चित्रपट की फिल्म पन्ना (1944) के गीत गाने के लिए वे फिर बंबई आईं। तब तक गुलाम हैदर भी बंबई आ चुके थे। बाद में यह गायिका स्थायी रूप से बंबई में ही बस गई। देश के बंटवारे पर शमशाद बेगम के परिवार के सभी सदस्य और गुलाम हैदर भी पाकिस्तान जा बसे लेकिन शमशाद बेगम यहीं रह कर फिल्म संगीत के आकाश में अपनी चमक बिखेरती रहीं।

बंबई में गुलाम हैदर के निर्देशन में चल चल रे नौजवान (1944), फूल (1945), और हुमायू(1945) जैसी कई फिल्मों में गाने गाये। सावन के नज़ारे हैंऔर एक कली नाज़ों की पली(खजांची/1941), दुनिया में गरीबों को(जमींदार/1942), गाड़ीवाले दुपट्टा उड़ा जाये(पूंजी/1943) आज भी याद किए जाते हैं।

नौशाद के संगीत में शमशाद बेगम को देखिये: हम दर्द का अफसाना दुनिया को सुना देंगे(दर्द/1947), धरती को आकाश पुकारे(मेला/1948), चाँदनी आई बन के प्यार(दुलारी/1949), धड़के मेरा दिल मुझको जवानी राम कसम ना भाए’, मिलते ही आँखें दिल हुआ दीवाना किसी काऔर छोड़ बाबुल का घर मोहे पी के नगर आज जाना पड़ा (बाबुल/1950), गाड़ी वाले गाड़ी धीरे हांक रेऔर पी के घर आज प्यारी दुल्हनिया चली  (मदर इंडिया/1957) और तेरी महफिल में किस्मत आजमा कर हम भी देखेंगे(मुगले आज़म/1960)।

शमशाद बेगम की आवाज़ में ओ.पी. नैयर के मोती भी कमतर नहीं हैं: कभी आर कभी पार लागा तीरे नज़र (आर पार/1954), बूझ मेरा क्या नाम रे नदी किनारे गाँव रेऔर कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना(सीआईडी/1956), रेशमी सलवार कुर्ता जाली का(नया दौर/1957)।

हिन्दुस्तानी फिल्मों में आधुनिक ऑर्केस्ट्रेशन को बढ़ावा देने वालों में प्रमुख सी.रामचन्द्र ने तो उनसे खूब अल्हड़ गाने गवाए। आना मेरी जान संडे के संडे(शहनाई/1947) के अलावा टम टम से झाँको ना(नमूना/1949) और नमस्ते नमस्ते(पतंगा/1949) आज भी लोगों के पाँवों में थिरकन पैदा कर देते हैं।  
  
उन्होंने 577 हिन्दी फिल्मों में करीब 1300 गानों के अलावा 54 पंजाबी, तीन राजस्थानी, दो भोजपुरी और दो हिन्दी फिल्मों के तमिल संस्कारण के लिए गाने गाये। शमशाद बेगम ने हिंदुस्तानी फिल्मों में आखरी बार 1981 में प्रेम धवन के निर्देशन में फिल्म गंगा मांग रही बलिदान के लिए गाया। उन्हों ने गैर फिल्मी गानों में गीत, गज़ल, भजन, नात और मर्सिया भी गाये। पश्तो भाषा में भी उनके चार गैर फिल्मी गीत होने की जानकारी मिलती है।
         
उन्होंने बेरिस्टर गणपतलाल बट्टो से विवाह किया जिनसे उनके एक पुत्री है। उनके पति का निधन 1956 में ही हो गया। वे अपनी पुत्री उषा और दामाद योगराज रात्रा के साथ ही मुंबई में रहती थीं। वहीं इस अमर गायिका ने अपनी आखरी सांस ली।

शमशाद बेगम ने सभी नामचीन संगीतकारों के साथ काम किया। गुलाम हैदर के अलावा प. अमरनाथ, प. गोबिंदराम, हुस्नलाल भगतराम, खेमचंद प्रकाश, श्याम सुंदर, सी. रामचंद्र, ओ. पी. नैयर, एस. डी. बर्मन, मदन मोहन, शंकर जयकिशन, रोशन और नौशाद सभी ने अपने संगीत को सजाने में इस आवाज़ की मदद ली।

देश के विभाजन के बाद नूरजहां के पाकिस्तान चले जाने के बाद बुलंद मगर खनकदार आवाज़ की परंपरा शमशाद बेगम से ही बनी रही। मगर हिन्दुस्तानी फिल्म संगीत की स्त्री आवाज़ें कोमल होती चली गई। ग्रामीण लोक संगीत से शुरू हुआ हिन्दुस्तानी फिल्म संगीत का सफर शहरी कोमलता लेने लगा क्योंकि शहरी नायिकाएँ कोमलतर होतीं चली गई जिनकी आवाज़ बन गई लता मंगेशकर।

यह सवाल उठता है कि शमशाद बेगम के ऊरूज़ पर होने के बावजूद क्यों संगीतकारों नें 1950 के दशक के मध्य उनसे किनारा करना शुरू कर दिया? क्यों सभी 1949 के बाद लतामय हो गए? शमशाद बेगम जो 15 वर्षों से लगातार शिखर पर थीं, तब, उम्र दराज भी नहीं हुई थीं। कारण शायद यही रहा कि हिंदस्तानी फिल्मों की नायिका का रूप बदल गया। उसमें मजबूती नहीं रही। उसकी आवाज़ में दम नहीं रहा।

गायन के शिखर पर डेढ़ दशक तक बने रहने के बावजूद शमशाद बेगम में कभी अहंकार नहीं आया। उनका किसी के साथ कभी मतभेद नहीं हुआ। वे संगीतकार जिन्होंने उनकी आवाज़ के जरिये बुलंदियां छुई वे उनसे दूर हो गए तो भी उन्हें किसी से कोई शिकायत नहीं रही।

भले ही 1960 के दशक और उसके बाद शमशाद बेगम की आवाज़ फिल्मों में बहुत ही कम सुनाई दी मगर तब तक वे जो कुछ गा चुकी थीं उसने उन्हें हमेशा लोगों के दिलों में बनाए रखा। इक्कीसवीं सदी में जब रीमिक्स का ज़माना आया तो शमशाद बेगम के गाये पुराने गाने ही फिर गूँजे चाहे वह कजरा मोहब्बत वाला(किस्मत/1968) हो या आना मेरी जान संडे के संडे(शहनाई/1947) हो।

प्रचार से वे हमेशा दूर ही रही। तब भी जब 140 के दशक में उन्हें एक गाने के दो हज़ार रुपये  मिल रहे थे और लता मंगेशकर तो 300 रुपये। उनका कोई सार्वजनिक फोटो भी 1970 में जाकर खिंचा। उन्होंने चुपचाप और भीड़ से दूर ज़िंदगी जीना पसंद किया। वर्ष 2009 में जब उन्हें पद्मश्री पुरस्कार दिये जाने की घोषणा हुई तब कई लोगो को यह जान कर ताज्जुब हुआ कि वे जीवित थीं। 93 वर्ष की आयु पाकर पिछले दिनों वे चुपचाप इस दुनिया से चली गईं। मगर अपने पीछे छोड़ गई अपने गाये गानों की महक जो पीढ़ियों बाद भी हल्की नहीं पड़ेगी।

मशहूर शाइर नक्श लायलपुरी ने चंद्रकांत मोहनलाल की बड़ी मेहनत और लगन से लिखी किताब खनकती आवाज़: शमशाद बेगम (2008) में इस गायिका पर एक शेर लिखा था : गज़ल के दिलरुबा लहजे में बोले/ जो सुर छेड़े शहद कानों में घोले/ तेरी आवाज़ में जादू है जैसा/ हजारों ज़िंदगी के राज़ खोले।  

शमशाद बेगम की आवाज़ का यह जादू समय के साथ हमारे सिर पर और अधिक चढ़ता ही जाता है।   

(यह आलेख जनसत्ता के रविवारी अंक में पांच मई 2013 को प्रकाशित हुआ) 


Tuesday, April 30, 2013

पत्रकारिता का दायित्व और अभिव्यक्ति की आज़ादी

राजेंद्र बोड़ा 



अभिव्यक्ति की आज़ादी भले ही हमें कानूनी रूप से अपने संविधान से मिली है मगर वास्तव में यह हमारा मानवीय अधिकार है। लोकतन्त्र में इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। लोकतन्त्र की सफलता अहिंसक समाज में ही संभव हो सकती है। ऐसे समाज में जहां फैसले शारीरिक या आयुध की ताकत से नहीं बल्कि तर्क से, बहस से और विमत के अधिकार की रक्षा करते हुए न्यायसंगत आम सहमति से होते हों।

लोकतंत्र की मर्यादा तभी बनी रह सकती है जब पत्रकारिता स्वतंत्र हो और वह अपना दायित्व पूरी मर्यादा से निबाहे। इसीलिए लोकतान्त्रिक समाज पत्रकारों से अपेक्षा रखता है कि वे एक  तर्कवान संवाद स्थापित करने के वाहक बनेंगे।    

पत्रकारिता का पहला दायित्व सच्ची सूचना देना होता है। सूचना किसी एक पक्ष की नहीं – सब की। यही उसकी मर्यादा है। वह सूचना खुद पैदा नहीं करता। सूचना उसे कहीं न कहीं से मिलती है। यह उसका दायित्व है कि वह उन स्रोतों की विश्वसनीयता की पड़ताल करे जहां से उसे सूचनाएं मिलती हैं। पत्रकारों का यह भी दायित्व है कि वह सूचना के स्रोतों के हाथों में न खेल जाये। पत्रकार का दायित्व अपने पाठकों के प्रति होता है न कि किसी व्यक्ति, संस्थान, या विचार के प्रति। यहां तक कि अपने उस संस्थान के प्रति भी नहीं जहां वह मुलाजिम है। यही सबसे कठिन काम है।

पत्रकारिया का दायित्व केवल सूचना देना ही नहीं बल्कि सूचनाओं का विश्लेषण करना और उन्हें आम पाठक 

के लिए संदर्भ देना भी होता है। और यह खांडे की धार पर चलने जैसा है।

सूचना में खोट नहीं हो यह दायित्व भी पत्रकारों का होता है। पत्रकारिता एक पेशा भी है और वह एक कारोबार भी है। मगर यह कारोबार अन्य कारोबारों और पेशों से अलग है। पत्रकार एक साथ कई भूमिकाएँ निभाता है। वह सूचनाओं का हरकारा है तो वह शिक्षक भी है, वह रक्षक भी है, और वह खल्क की ज़ुबान भी है।

पत्रकारिता आम आदमी की आवाज़ होती है जिसमें उसकी अपेक्षाएँ, आकांक्षाएँ और सपने मुखरित होते हैं। 

जहां आम आदमी खुद लड़ नहीं सकता वहाँ उसके लिए पत्रकारिता लड़ती है। यह लड़ाई 

अन्याय और वहशी ताकतों के खिलाफ मानव मूल्यों के लिए होती है। 

पत्रकारिता के महत्व और दायित्व को हम महात्मा गांधी के जरिये ठीक से समझ सकते हैं। उन्होंने कहा था पत्रकारिता का काम पाठक के दिमाग में चाही-अनचाही चीजें थोपना नहीं है बल्कि आम जन के दिमाग को जाग्रत करना है। उनका कहना कि आधुनिक पत्रकारिता में सतहीपन, एकपक्षता, गलतियां, और यहां तक कि बेईमानी भी, प्रवेश कर गई हैं आज कितना सटीक लगता है। इसके बावजूद गांधी अखबार की आज़ादी के पूरे पक्षधर थे। उन्होंने कहा अखबार की आज़ादी इतनी अनमोल है कि कोई भी देश उसे छोड़ नहीं सकता। गांधी ने एक और बड़ी बात कही : प्रेस लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ कहलाता है। वह निश्चित रूप से एक ताकत है। मगर यदि इस ताकत का दुरुपयोग किया जाता है तो वह अपराध है। 

गांधी ने ये बातें अपने करीब चार दशक लंबे पत्रकारिता के अनुभव से कही। दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने पहली बार इंडियन ओपीनियनअखबार निकाला। फिर भारत आकर यंग इंडिया और नवजीवन का सम्पादन-प्रकाशन किया। उन्होंने अंग्रेजी में हरिजन’, हिन्दी में हरिजन सेवकऔर गुजराती में हरिजन बंधुअखबार भी निकाले। उन्होंने समाचार माध्यमों की ताकत को पहचाना और उन माध्यमों का सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह और देश की आज़ादी के प्रयासों में भरपूर उपयोग किया।

गांधी ने कहा: अखबारों के बिना सत्याग्रह जैसा अभियान संभव नहीं हो सकता था। उनके अपने अखबार खुद उनके शब्दों में उनके लिए आत्म-संयम के प्रशिक्षण स्थल बने। और माध्यम बने मानव की प्रकृति को उसके सभी भेदों और विविधताओं सहित समझने में।

मूल रूप से पत्रकारिता के तीन दायित्व होते हैं - सामाजिक, विधिक और पेशेगत हैं। पत्रकारिता में अपने समाज की छवि परिलक्षित होती है। इसलिए पत्रकारों में अपने समाज की जीवंत परम्पराओं की समझ होनी चाहिए। परम्पराएँ जड़ नहीं होती। जड़ होने पर वह रूढ़ि बन जाती है। पत्रकारों को परंपरा और रूढ़ि में फर्क का बोध होना जरूरी है। पत्रकारिता को विधिक दायित्व का भी निर्वहन करना होता है। लोकतन्त्र विधि का शासन होता है। उसकी आत्मा में आम सहमति होती है। पत्रकार कानून से ऊपर नहीं होता। फिर आता है पेशेवर दायित्व। पत्रकार की प्रतिबद्धता किसी और के प्रति नहीं अपने पेशे के प्रति होती है। इस प्रतिबद्धता की कुंजी सच्चाई और निष्पक्षता में होती है।

पत्रकारिता की एक लक्ष्मण रेखा भी होती है। इस लक्ष्मण रेखा की सीमा कोई और तय नहीं कर सकता। मौका आने पर पत्रकार ही अपने व्यक्तिगत स्तर पर यह तय करते हैं कि वे लोगों को सच्ची और निष्कपट जानकारी देने के अपने दायित्व के निर्वहन के लिए यह रेखा कहां खींचें।

पत्रकारिता को मिली आज़ादी उसकी अपनी मिल्कियत नहीं है। यह आज़ादी उसे सर्व जन को प्राप्त अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के तहत मिली है। अमेरिकी संविधान के पहले संशोधन के जरिये प्रैस की आज़ादी सुनिश्चित की गई है। मगर हमारे यहाँ पत्रकारिता की आज़ादी आम नागरिक को मिली अभिव्यक्ति की आज़ादी का ही हिस्सा है। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता से ही पत्रकारिता का दायित्व पूरा होता है। पर यह आज़ादी निर्बाध भी नहीं है। उसकी सीमाएं हैं। लोकतन्त्र के तीन संवैधानिक स्तंभों – विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका – की भी सीमाएं हैं।

लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ कहलाने वाली पत्रकारिता की विशेष स्थिति है। वह इन तीनों स्तंभों पर नज़र रखती है, उनकी खबर लेती है और उनकी खबर देती है। तीन संवैधानिक स्तम्भ एक दूसरे को बैलेंस करते हैं। पत्रकारिता इस बात पर निगाह रखती है और लोगों को सचेत रखती है कि लोकतान्त्रिक मूल्य बने ही नहीं रहें बल्कि वे और मजबूत हों। मगर इसके लिए खुद पत्रकारिता को लोकतान्त्रिक होना पहली शर्त है। ऐसा उसकी निष्पक्षता से सुनिश्चित होता है।

गलती सबसे होती है। पत्रकार भी गलती कर सकता है। पत्रकार को गलती करने की आज़ादी भी है। क्योंकि गलती नहीं हो जाये इसके सारे जतन करने के बाद भी पत्रकारिता में असत्य चला आता है। मगर पत्रकारों का यह गुरुत्तर दायित्व बनता है कि पता चलते ही वे अपनी गलती सुधार लें। पत्रकारिता को गलती सुधारने की बड़ी आज़ादी है।

कई बार सत्य श्वेत-श्याम नहीं होता। वह साफ और स्पष्ट भी नहीं होता। उसके कई पहलू हो सकते हैं। इसीलिए पत्रकारों का दायित्व बनता है कि वे सिक्के के दोनों पहलुओं की जानकारी अपने पाठकों को दे। बीबीसी टेलीविज़न का एक प्रोमो है जिसमें यह संचार माध्यम दावा करता है कि सत्य के कई रंग होते हैं और हम सभी रंग प्रस्तुत करते हैं।

पत्रकारिता का दायित्व अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता से ही संभव है। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता है तो ही पत्रकारिता है। लोकतन्त्र में यह अधिकार रोटी कपड़ा और मकान, बेहतर, स्वास्थ्य और इज्जत वाला जीवन जीने के अधिकार से भी अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि ये सारे अधिकार पाने का यह हथियार होता है। जनता के लिए, जनता का, जनता द्वारा जिस शासन की कल्पना लोकतन्त्र के लिए की गई है वह इसी हथियार से सुनिश्चित होता है। विधायिका में जनता अपने जिन प्रतिनिधियों को चुन कर भेजती है उनके काम-काज के बारे में जानकारी मतदाता को समाचार माध्यमों से मिलती है। इसीलिए अखबार को वाच डॉग कहा जाता है।

अखबार की आज़ादी दुनिया में बड़े संघर्ष से मिली है। यह मान के नहीं चलना चाहिए कि एक बार यह आज़ादी मिल गई तो वह हमेशा बनी रहेगी। इसकी सुरक्षा के लिए हमेशा जागरूक बने रहना होता है।

अभिव्यक्ति की आज़ादी बहुतों को नहीं सुहाती। जिन्हें यह नहीं सुहाती वे लोकतन्त्र के हितैषी नहीं हो सकते। मगर उन्हें अपने किसी न किसी काले कारनामे पर पर्दा बनाए रखना होता है। लोकतन्त्र पूरी पारदर्शिता की मांग करता है। वह सबकी भागीदारी से फलता-फूलता है। इसमें सामंती या तानाशाही प्रवत्तियों का कोई स्थान नहीं होता। पत्रकारिता का दायित्व इन प्रवत्तियों का शमन करने में मदद करना होता है।

पत्रकारिता मनोरंजन नहीं होता। इन्फोटेनमेंट पत्रकारिता नहीं होती। अखबार केवल स्याही से काले किए हुए कागज़ नहीं होते। पत्रकारिता केवल-आय अर्जन का साधन नहीं होती। वह नौकरी नहीं होती। पत्रकारिता एक प्रवत्ति होती है। यह किसी में होती है या नहीं होती है। इसमें बीच की कोई स्थिति नहीं होती।

आज इस दुआ की सबसे ज्यादा जरूरत है कि पत्रकारिता में ऐसी प्रवत्ति  वाले लोग अधिक से अधिक आयें और उसे सबल बनाएँ। पत्रकारिता सबल होगी तो लोकतन्त्र सबल होगा, आम आदमी सबल होगा। 

(यह आलेख पिंक सिटी प्रेस क्लब के मुखपत्र पाती के अप्रेल 2013 के अंक में प्रकाशित हुआ)