Saturday, November 26, 2011

सात पीढ़ियों के लिए इंतजाम

राजेंद्र बोड़ा



सारा मीडिया जगत इस बात के इंतजाम करता है कि हम उसकी इस सूचना से इतराएँ कि भारतीय व्यापार और उद्योग की हस्तियां विश्व के सबसे अधिक अमीरों की सूची में स्थान पा रहीं हैं। ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि नई अर्थ व्यवस्था के चलते देश की संपन्नता में इजाफा हो रहा है जिसके लिए सभी को उत्सव मनाना चाहिए।

यह सच है कि दुनिया के अमीरों की सूची में शीर्ष स्थानों पर भारत के लोगों के नाम आने लगे हैं और सरकारी तंत्र से जुड़ा, खास कर शहरी इलाकों का, मध्यम वर्ग का एक तबका छठे वित्त आयोग की सिफ़ारिशों के हिसाब से वेतन पाने से वित्तीय संपन्नता से सरोबार हो रहा है और वह विलासिता की चीजों पर खर्च को बढ़ा कर बाज़ार की अपेक्षाओं को पूरा कर रहा है। गावों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना का पैसा पहुंचाया जा रहा है जिससे बाज़ार को मदद मिलती रहे।

बाज़ार को साध लेने वाला और उसी का होकर रह जाने वाला आज एक पुराने मुहावरे के अनुसार “सात पीढ़ियों का सामान” कर रहा है। आज जिस प्रकार से धन कमाने की लोलुपता बढ़ती जा रही है वह इस मुहावरे को अर्थहीन कर रही है। पहले एक व्यक्ति अपनी आने वाली सात पीढ़ियों के लिए सामान करता था वहीं आज बड़े कार्पोरेशन और बैंक व्यक्तियों के समूहों के लिए सात पीढ़ियों का सामान कर रहे हैं। और ऐसा वे आम जन की जेबें खाली करवा कर करते हैं। गोल्डमेन साक्स का उदाहरण हमारे सामने है। यह बहुराष्ट्रीय कंपनी अब ‘फूड कोमोडिटी’ के काम में लग गई है। जिस बड़े पैमाने पर यह कंपनी सट्टे बाज़ार में उतरी है और उसका खेल खेल रही है उसने दुनिया भर में खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ा दिये है जिसके नतीजे के फलस्वरूप दुनिया में भूख और गरीबी का दानव और विकराल हो गया है।

बाज़ार का खेल खेलने वाली कंपनियाँ पूंजीवादी व्यवस्था की हिस्सा होती है। इसीलिए उसी व्यवस्था के हिसाब से व्यवहार करती है। मुनाफे का अंबार लगाने के लिए लगे रहना इस व्यवस्था की फितरत होती है। पहले व्यक्ति शोषण करता था। अब पूंजीवादी व्यवस्था शोषण का संगठित औज़ार मुहैया करती है। पूंजीवादी व्यवस्था का सबसे बड़ा नियम होता है हर चीज उत्पाद होती है और हर उत्पादन मुनाफा कमाने के लिए होना चाहिए। उसके लिए हर चीज बिक्री के लिए होती है और क्या चीज बनाई जायेगी इसका निर्धारण समाज की आवश्यकता के अनुरूप नहीं होता। उसकी प्रेरणा मुनाफा होती है। इसीलिए मुनाफे की जरूरत के अनुरूप ही उत्पादन होता है। किसी उत्पाद की आवश्यकता उससे होने वाले मुनाफे से ही आंकी जाती है।

बाज़ार के आकर्षण ने समाज में कुछ ऐसा माहौल बना दिया है जिसमें हर एक को लगता है कि पैसे से ही काम होता है और अमीर होने के लिए सिर्फ पैसे की जरूरत होती है। यहां तक कि पूंजीवादी व्यवस्था में सामाजिक रिश्ते भी पैसे की तराजू पर तुलते हैं। बाज़ार यह याद नहीं आने देता कि धन से खुशियां नहीं खरीदी जा सकती। धन से सूचना मिल सकती है ज्ञान नहीं। धन किसी को मकसद नहीं देता, उसे पाना ही मकसद बन जाता है। बाज़ार निर्मित इसी भ्रम में मानवीय मूल्य तिरोहित हो जाते हैं। व्यक्ति स्वकेंद्रित हो जाता है। बाज़ार यह भ्रम भी देता है कि वह व्यक्ति को चुनने की स्वतन्त्रता देता है। इस प्रकार पूंजीवाद एक ऐसा मायाजाल रचता है जिसमें मानव को अपना उत्कर्ष लोभ, लालच और अधिक से अधिक धन संग्रह करने की प्रवत्ति में लगने लगता है।

दिलचस्प बात यह है कि पूंजीवाद को अपने पालन और विस्तार के लिए राज्य सत्ता की आवश्यकता होती है। यही कारण है पूंजीवादी वर्ग सत्ता पर येन केन प्रकरेण सत्ता पर अपना प्रभुत्व बनाए रखता है। विश्व में जब से एक ध्रुवीय व्यवस्था हो चली है पूंजीवाद का शिकंजा और अधिक मजबूत हो चला है। अब राज्य खुले रूप से ऐसी अर्थ व्यवस्था के पोषण और विस्तार के लिए काम करता है जो समूचे समाज को पूंजीवाद के रंग में रंग देना चाहती है।

राज्य की इस भूमिका को हम बहुत साफ देख सकते हैं। जब कभी यह अर्थ व्यवस्था गंभीर संकट में आती है राज्य उसे बचाने के लिए तुरंत उपाय करता है। उसे संकट से उबारने के लिए राज्य जो उपाय करता है उसकी कीमत समूची मानवता को चुकानी पड़ती है जिससे सबसे अधिक गरीब कुचला जाता है।

पूंजीवाद का प्रादुर्भाव औद्योगिक सभ्यता के साथ हुआ। जब उत्पादन संगठित क्षेत्र में होने लगा और अधिकतम मुनाफे के लिए श्रम का शोषण एक जरूरत बन गई। इसी के साथ आधुनिक अर्थशास्त्र स्वतंत्र विषय के रूप में स्थापित हुआ। इससे पहले अर्थशास्त्र दर्शन शास्त्र का ही हिस्सा हुआ करता था। तब अर्थ के साथ जीवन के नैतिक सबब की बात भी होती थी। जीवन का नैतिक सबब खुशी पाना होता है। हर एक के अपने जीवन मूल्य होते हैं जिन्हें पाना सच्ची खुशी होती है। पूंजी की व्यवस्था इस खुशी को बाज़ार के हित में परिभाषित करती है।

जीवन दर्शन से अर्थ को अलग करके पूंजीवाद के समर्थकों ने पश्चिम में उसे व्यक्तिवादी बना दिया। धर्म जो समाज में ‘सम’ की अवधारणा पुष्ट करता था उसे भी नए पूंजी समर्थित अर्थशास्त्र ने संकुचित कर मुनाफे के लिए व्यवसाय बना दिया। उसे प्रतिस्पर्धी बना दिया। यहां तक कि इस युग में खुद पूंजीवाद एक प्रकार का धर्म बन गया है।

पहले के धर्म कहते थे अपने लिए नहीं दूसरे के लिए जियो। दूसरे की मदद करो। जीवन का मकसद सच्ची खुशी वह होती है जो दूसरे के चेहरे पर मुस्कराहट लाने से मिलती है। मगर आज का पूंजीवाद का धर्म कहता है जो करो अपने के लिए करो। अपना हित साधना ही सर्वोच्च मूल्य है। इसमें धन को बढ़ाने की लालसा, लोभ, और लालच कोई बुरी बात नहीं है। पहले जो-जो जीवन मूल्य अवगुण माने जाते थे वे ही आज मानव के लिए श्रेष्ठ गुण बन गए हैं।

लोकतन्त्र में सरकारें भले ही उनके बहुमत से चुनी जाती हो जिनका पूंजी शोषण करती है मगर निर्वाचित प्रतिनिधि पूँजीपतियों की जेब में ही रहते हैं और उन्हीं के कार्य साधते हैं और सरकारें आम जन की होकर भी गणशत्रु के रूप में प्रस्तुत होने लगतीं हैं। उसकी सारी नीतियां और सारे कार्यक्रम “जनहित” के लिए होते हैं। बाज़ार को बढ़ावा भी जनहित के नाम पर ही दिया जाता है।

इतना पैसा कमाने के लिए कि सात पीढ़ी का जतन हो जाये लालच, लोभ और वैसी ही महत्वाकांक्षा की जरूरत होती है। नई अर्थ व्यवस्था की नीतियां इसके लिए नैतिक आधार देती है, भरमाती हैं। संचार के माध्यम व्यवसायजनित होकर मुनाफे के लिए होते हैं इसलिए वे सारा जतन यह करते हैं कि किस प्रकार व्यक्ति को इसके लिए लुभाया जाय। वे लोगों के इस भरोसे का फायदा उठाते हैं कि संचार के माध्यम व्यावसायिक होने पर भी उनकी बात करते हैं, उनकी आवाज होते हैं और उनके लिए लड़ते हैं। वास्तव में वे राज्य की भूमिका के बारे में कोई गंभीर और गहरे सवाल नहीं उठाते आयें और न ही ऐसी कोई बहस छेड़ने में रुचि दिखाते हैं। सतही मुद्दों पर जोरदार बहस प्रस्तुत कर अपने जनहितकारी होने का ढोंग वे जरूर रचते हैं।

पूंजी की शक्तियां आज विजेता है और गरीब की हालत बद से बदतर हो रही है। एक व्यक्ति राष्ट्रीय संपत्ति का जो हिस्सा अपनी अमीरी के इजाफे के लिए लेता है वह ऐसा किसी न किसी को गरीब करके ही करता है। गरीब का जब धीरज खत्म होता है तो वह अपराध की और प्रवत्त होता है। ऐसे में उस गरीब का शोषण कभी आतंकी राजनैतिक विचारधारा के पोषण के लिए तो कभी संकीर्ण धार्मिक प्रसार के लिए होने लगता है। ऐसे माहौल में खुशी पाने का जीवन का नैतिक सबब मृग मरीचिका बन जाता है क्योंकि जब चारों ओर दुख का वातावरण हो तब कोई अपनी अट्टालिका में बैठा खुशी कैसे पा सकता है।

पूंजी आज इस हद तक सफल है कि सारे ही राजनैतिक दल अपनी मूल विचारधाराओं से च्युत होकर सत्ता पाने की होड में लगे हैं ताकि उनके नायक अपनी सात पीढ़ियों के लिए धन संचय कर सकें। राजनीति में लोग जन सेवा के लिए नहीं अपनी और अपनों की सेवा के लिए आते हैं। लोकसेवा का तंत्र इन्हीं नायकों के लिए होकर रह गया है। संविधान का आमुख और उसके प्रावधान कागजों पर रह गए हैं। संविधान के नीति निर्देशक तत्वों को तो पूरी तरह भुला दिया गया है। आज के बच्चों से पूछें कि संविधान के दस्तावेज़ में नीति निर्देशक तत्व भी शामिल हैं, क्या वे जानते हैं? तो इसका जवाब उनकी आँखों के सवालिया निशान ही होगा।

(प्रेसवाणी के नवंबर 2011 के अंक में प्रकाशित आलेख)