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Showing posts from 2010

अकादमियाँ बदहाल : कैसे बचाएँ कला और संस्कृति की पहचान

राजेन्द्र बोड़ा कला और संस्कृति की पहचान बनाए रखना भी मानव अधिकारों में आता है। मानव अधिकारों की गारंटी देने की जिम्मेवारी राज्य की होती है। राजस्थान अपनी कला और संस्कृति के लिए दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। यह पहचान बनाई रखने में इसीलिए राज्य की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। देश की आज़ादी के बाद अपनाई गई संवैधानिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब लोक की प्रतिनिधि सरकारें बनीं तब अन्य बातों के अलावा लोक कला और संस्कृति के संरक्षण की जिम्मेवारी स्वतः ही उन पर आ गई। राजस्थान में राज्य’ने स्थानीय कला और संस्कृति को बचाए रखने का अपना दायित्व निभाते हुए विभिन्न अकादमियाँ स्थापित कीं। इनकी स्थापना के पीछे सोच यह था कि इनको राज्य की वित्तीय मदद मिले मगर उनका संचालन लोकतान्त्रिक हो। राजस्थान में स्थापित कीं गईं अकादमियों के संविधान इसी के अनुरूप बनाए गए। माना गया कि अपने-अपने क्षेत्र के कुशल लोग, जानकार लोग और कला-संस्कृति से सरोकार रखने वाले लोग इनमें आएँगे जिससे न केवल प्रदेश की कला और संस्कृति का संरक्षण हो सकेगा बल्कि उन्हें बढ़ावा भी मिलेगा। कला और संस्कृति के संरक्षण में राज्याश्रय क

तेल ने राजस्थान के लिए खजाना खोला : क्या शासन तैयार है इस पैसे के सदुपयोग के लिए ?

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राजेंद्र बोड़ा राजस्थान की धरती ने इस प्रदेश के पिछड़ेपन की कालिख को पोंछ कर इसे आधुनिक, खूबसूरत और सम्पन्न राज्य बनाने के लिए अपने गर्भ का खजाना खोल दिया है। पश्चिमी इलाक़े मारवाड़ के बाड़मेर जिले में मिले तेल से होने वाली राजस्व आय राजस्थान की सारी मुश्किलें आसान कर देने के लिए काफी है। एक मोटे अनुमान के अनुसार इस तेल की रॉयल्टी के रूप में राज्य सरकार को प्रति वर्ष करीब 200 करोड़ रुपयों का राजस्व मिलेगा जो हमें प्रकृति से मिला अनुदान है। राज्य सरकार को होने वाली यह अंतिरिक्त आय उसके अपने बजटीय प्रयासों का फल नहीं है। लेकिन जिस प्रकार की संवैधानिक वित्तीय व्यवस्था हमारे यहाँ है उसमें यह अतिरिक्त आय भी उस समेकित निधि में जाएगी जिसमें सभी प्रकार के कर राजस्व तथा अन्य स्रोतों से होने वाली आमद जाती है। इसी समेकित निधि से सरकार अपने सारे खर्चे चलाती है। मगर क्या इस नई आय को अन्य राजस्व की तरह मान कर सामान्य तौर पर खर्च कर देना उचित होगा? या फिर राजस्थान की तक़दीर बदलने के लिए इस आय को खर्च करने की अलग से कोई योजना बनाना मुनासिब होगा जिससे यह पता चलता रहे कि तेल से मिलने वाली विशाल राश

बर्बाद गुलाबी गुलशन, बनाने चले वर्ल्ड सिटी

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राजेंद्र बोड़ा जयपुर को वर्ल्ड सिटी बनाने की घोषणा के साथ कांग्रेस ने दो दशक बाद राजधानी की लोकसभा सीट जीती थी। इस शहर को “वर्ल्ड सिटी” बनाने का सपना राजीव और सोनिया गांधी के बेटे राहुल गांधी ने अपनी चुनावी सभा में लोगों के सामने रखा था। राहुल गांधी की बात को पकड़ते हुए ऊपर से नीचे तक के कांग्रेसजन इस झुंझुने को पकड़ कर बैठ गए। प्रदेश की कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार के मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के प्रमुख सदस्य भी यह जताने में पीछे नहीं रहे कि बस अब उनकी सरकार इस शहर को “वर्ल्ड सिटी” बना कर दिखाने ही वाली है। जिस शहर का ‘गुलाबी नगरी’ का दर्जा भी जो प्रशासन बचा के नहीं रख सका वह उसे ‘विश्व नगरी’ का दर्जा कैसे दिला पाएगा यह किसी ने नहीं पूछा। किसी ने यह भी नहीं पूछा कि “वर्ल्ड सिटी” बनाने कि घोषणा करने वालों का इससे आशय क्या है। जयपुर को विश्व पर्यटन के मानचित्र पर लाना ही क्या उसे “वर्ल्ड सिटी” बना देना होगा? पर्यटकों के लिए कुछ सुविधाएँ जुटा देना और उन्हें अपना कुछ माल बेच देने की जुगत कर लेना ही क्या जयपुर को ‘विश्व नगरी’ बना देना होगा? जयपुर को “वर्ल्ड

मनोहारी सिंह के सेक्सोफोन का जादू कभी नहीं टूटेगा

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राजेंद्र बोड़ा सैकड़ों हिन्दी फिल्में हर साल बनती हैं। अब तक बनी हजारों फिल्मों में से कौन सी फिल्में लोगों को याद रहती हैं? ‘मुगले आज़म’ या ‘शोले’ जैसी फिल्मों को छोड़ दें तो अधिकतर फिल्में समय के अंधेरे गलियारों में खो जाती हैं। यदि कोई फिल्म याद रहती है तो वह उसके गानों से। हिंदुस्तानी फिल्म संगीत ने, खास कर गानों ने, पुरानी फिल्मों को लोगों की यादों में बचाए रखा है। यह भी होता है कि गाने याद रह जाते हैं और फिल्मों के नाम भी बिसरा दिये जाते हैं। हालांकि गानों का श्रेय गायकों, संगीतकारों और गीतकारों को मिलता है मगर गानों को सजाने संवारने में साजिन्दों का योगदान भी कम नहीं होता। आप किसी पुराने गाने को याद करते हैं तो कई बार उस गाने की शुरुआत में या उसके इंटरल्यूड में बजे किसी साज की धुन सबसे पहले आपके मन में गूँजती है। आज किसी जमाने की राजेंद्र कुमार, साधना की सुपर हिट फिल्म ‘आरजू’ की किसे याद है। याद है तो उसके गाने। उनमें भी एक गाना जो इतने बरसों के बाद आज भी लोगों के सिर पर चढ़ा हुआ है ‘बेदर्दी बालमा तुझको मेरा मन याद करता है’की याद आती है तो हमारे जेहन में उस वाद्य की आवाज गूँ

साक्षर भारत : टूटते सपनों की कहानी

राजेंद्र बोड़ा वर्ष 2012 तक देश की समूची आबादी को साक्षर बना देने की केंद्र सरकार की महत्वकांक्षी योजना "साक्षर भारत" के क्रियान्वयन में अभी विभिन्न एजेंसियां जुटी है. देश में कोई भी अशिक्षित नहीं रहे इसके लिए विगत में सरकारों द्वारा कईं बार तिथियाँ निश्चित की गयीं कि अमुक समय तक सबको पढ़ा लिखा बनाने का सपना पूरा हो जाएगा. आज़ादी को साठ साल होने को आये हैं. मगर बावजूद सारे प्रयासों के देश में आज भी करोड़ों लोग ऐसे हैं जो अक्षर नहीं पढ़ पाते. आज़ादी के इतने सालों बाद प्रौढ़ साक्षरता के प्रयासों की कोई जरूरत नहीं रह जानी चाहिए थी यदि प्रारंभिक शिक्षा हम सभी तक पंहुचा पाते. क्योंकि प्रारम्भिक शिक्षा से उन सभी नए जन्मे बालक - बालिकाओं को, जिन्होंने आज़ाद भारत में आँख खोली, नहीं जोड़ा जा सका इसीलिए नयी पीढियां आती गयीं और पुरानी पीढी के प्रौढ़ों को साक्षर बनाने का काम कम होने की बजाय बढ़ता ही गया और वह आज़ादी के बाद के छठे दशक में आज भी जारी है. आज़ादी का संग्राम जिन सपनों को सच बनाने के लिए लड़ा गया इन पिछले दशकों में हमने उन सपनों को टूटते हुए ही देखा है. आज़ादी की लड़ाई में

कम जल उपयोग वाले विकास की जरूरत

राजेन्द्र बोड़ा राजस्थान के लोगों ने सदियों पहले प्रकृति से सहकार करना सीख लिया. उन्होंने प्रकृति से जो सीखा उसे अपनी बुद्धि और कौशल से कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में जीने की राह आसान करने के जतन किये. बुद्धि और कौशल का उपयोग राज करने वालों ने नहीं किया बल्कि सामान्य जन ने अपने अनुभवों से किया. राजस्थान में पानी इंसानी याददास्त में कभी इफरात में नहीं रहा. बरसात के बादल जो बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से उठते हैं वे इस प्रदेश तक पहुचते-पहुचते शिथिल पड़ जाते है. इसीलिए सूखा राजस्थान के लिए कोई नई बात नहीं है. बरसों बाद कभी-कभी ज़माना अच्छा होता है. इसीलिए पानी की अहमियत को यहाँ के लोगों नें सबसे अधिक जाना. जीवन की पहली शर्त पानी ही होती है. विकट रेगिस्तानी इलाकों में जहां प्रकृति ने पानी की भयंकर किल्लत की स्थिति बनाए रखी वहां लोगों नें प्रकृति से समझौता किया और अपनी बुद्धि और कौशल से पानी के संरक्षण के अनोखे उपाय किये. पीढ़ी-दर-पीढ़ी पानी के संरक्षण और उसके किफायती उपयोग की सीख लगातार जारी रही. यह सब सामान्य जन ने किया. इसीलिए राजस्थान में पानी के पुराने सार्वजनिक स्रोत - कुए, बावड़ी, ताला

बेमिसाल गायन - जीवन

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-राजेंद्र बोड़ा जुथिका रॉय उन महान कलाकारों में से हैं जो न केवल अपनी कला की बुलंदियों पर पहुंचे बल्कि अपने जीवन को भी ऐसे जिया जिससे प्रेरणा ली जा सके. अपनी मीठी आवाज के साथ सरल और सौम्य व्यक्तित्व वाली गायिका जुथिका रॉय ने 20 अप्रेल को अपने जीवन के 90 बसंत पूरे कर 91 वें वर्ष में प्रवेश किया. उन्होंने अपना जन्म दिन जयपुर में सुधि संगीत रसिकों के बीच मनाया. जयपुर के एक अनौपचारिक समूह 'सुरयात्रा' ने उन्हें विशेष तौर पर जयपुर आमंत्रित किया था. बीते युग के बहुत कम संगीत सितारे आज हमारे बीच हैं. मगर नई विज्ञापनी चकाचौंध में वे बिसराए हुए ही रहते है. 'सुरयात्रा' समूह बीते युग के ऐसे कलाकारों को याद करता है, उन्हें बुलाता है और स्नेह से भावभीना सम्मान करता है. भावना यही रहती है कि उस कलाकार को अपने जीवन की सांध्य बेला में लगे कि वे भुला नहीं दिए गए हैं. आज भी उनके चाहने वाले उन्हें इज्जत बख्शने वाले मौजूद हैं. कलाकार को मिली यह ख़ुशी ही सुरयात्रा के हमराहियों की थाती होती है. जुथिका रॉय तीन दिन जयपुर में रही. रविवार की शाम उनका भव्य सम्मान समारोह हुआ. बीते

दास्तान 'गर्म हवा' की

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राजेंद्र बोड़ा 'गर्म हवा' उर्दू की जानी-मानी लेखिका इस्मत चुगतई की एक अप्रकाशित लघु कहानी पर आधारित फिल्म है जिसका फ़िल्मी तर्जुमा मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी ने शमा जैदी के साथ मिल कर किया. कैफ़ी आज़मी ने फिल्म के संवाद भी लिखे. यह मैसूर श्रीनिवास सथ्यू - एम. एस. सथ्यू - की पहली फीचर फिल्म थी जो 1973 में रिलीज हुई. इस्मत चुगतई की मूल कहानी का नायक एक स्टेशन मास्टर है जो देश के बंटवारे के चक्र में फंस गया है. फिल्म की स्क्रिप्ट में नायक को चमड़े के जूते बनाने वाली फेक्ट्री के मालिक के रूप में चित्रित किया है. छः जुलाई 1930 में मैसूर में जन्मे सथ्यू बीएससी की पढाई बीच में छोड़ कर अपनी किस्मत सिने जगत में आजमाने के लिए बम्बई आ गए. बम्बई में 1952-53 में फ्रीलांस एनिमेटर के रूप में काम किया. मगर बाद में चार बरस तक बेरोजगारी में गुजारे. उन्हें सबसे पहला तनख्वाह वाला काम फिल्मकार चेतन आनंद के सहायक के रूप में मिला. फिल्म 'किनारे किनारे' में वे चेतन आनंद के सहायक नेर्देशक बने. बाद में स्वतंत्र रूप से कला निर्देशन करने का काम भी उन्हें चेतन आनंद ने ही दिया. फिल्म थी 

हमारे भाग्य विधाता

राजेंद्र बोड़ा हर बार की तरह इस बार भी हुआ. विधान सभा के बजट सत्र का शुक्रवार आखरी दिन था. सत्र के अनिश्चित काल के लिए स्थगित होने के थोड़ी देर पहले विधानसभा अध्यक्ष, मुख्यमंत्री, मंत्रियों और विधायकों के वेतन - भत्तों में यकायक बड़ी बढ़ोतरी करने का विधेयक और वह तुरत - फुरत में पास हो गया. सबके वेतन पांच - पांच हजार रुपये माहवार बढ़ गए. विधायकों के निर्वाचन भत्ते में दस हजार रुपये माहवार अलग से बढ़ गए. उन्हें एक कर्मचारी रखने की सुविधा थी जिसकी जगह विधायकगण अब बीस हजार रुपये माहवार नकद ले सकेंगे. इन निर्वाचित जनसेवकों - विधानसभा अध्यक्ष, मुख्यमंत्री, मंत्री और राज्य मंत्री उपाध्यक्ष मुख्य सचेतक उप मुख्य सचेतक तथा प्रतिपक्ष के नेता - द्वारा अपने मेहमानों का आतिथ्य करने के लिए मिलने वाले भत्ते में भी पांच से छः हजार रुपये माहवार बढ़ा दिए गए. घरों को सजाने और बिजली के बढे हुए बिल भरने की भी व्यवस्था कर दी गई और रेल में यात्रा करने के लिए साल भर में एक लाख रुपये खर्च नहीं हो सकेंगे तो वह राशि लेप्स नहीं होगी उसका उपयोग अगले वर्ष में भी किया जा सकने का इंतजाम करदिया गया. भूतपूर्व विधायकों क

ख़बरों का कारोबार करने वालों पर पाठक कब तक भरोसा करेंगे ?

राजेंद्र बोड़ा ऐसे कौन से कामकाज हैं जिन पर लोग सबसे कम भरोसा करते हैं ? इस प्रकार की जानकारी पाने के लिए पश्चिमी देशों में लगातार सर्वे होते रहते हैं. पत्रकारिता की साख लोगों में कितनी है यह जानने के लिए यदि हम इन सर्वे के परिणामों पर नज़र डालें तो पाते हैं कि राजनेता और पत्रकार अपनी साख के मामले में लोगों की राय में सबसे निचली पायदानों पर आते हैं. इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि पत्रकारों के काम पर लोगों का सबसे कम भरोसा है. परन्तु यह सोच पश्चिम का है. यह सच है कि हमारे देश में भी राजनेताओं की साख बहुत बुरी तरह गिरी लगती है, मगर पश्चिम के लोगों की पत्रकारों के प्रति सोच भारत के लोगों की सोच से मेल नहीं खाती. हमारे देश में आज भी लोग अख़बारों के लिखे पर भरोसा करते हैं. जब भी किसी को अपनी बात पर दूसरे को भरोसा दिलाना होता है तो वह यही जुमला आम तौर अपनाता है "अखबार में छपा है." अखबार में छपी बात को अटल सत्य की तरह हमारे लोग स्वीकार करते हैं. पाठकों का यही भरोसा है जिसे बनाए रखना अखबारों में काम करने वाले पत्रकारों के लिए आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती है. आज जब राजनेताओं पर से लोगों का

दास्तान ‘नीचा नगर’ की

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राजेंद्र बोड़ा 'नीचा नगर' फिल्म हमेशा ही गुमनामी के अँधेरे में रही. वास्तव में वह दर्शकों तक कभी पहुच ही नहीं सकी. इतने बड़े देश में जहाँ सबसे अधिक संख्या में फ़िल्में बनती है और हर तरह की ऊल-जलूल फ़िल्में सिनेमाघरों के पर्दों पर उतरती हैं वहां इस फिल्म को रिलीज करने वाला कोई नहीं मिला. ऐसा उस फिल्म के साथ हुआ है जिसको अंतर्राष्ट्रीय 'कान्स फिल्म समारोह' का लब्धप्रतिष्ठ 'ग्रां प्री' का खिताब अर्जित करने का गौरव प्राप्त है. फिल्म 1946 में बन कर तैयार हुई और उसी साल शुरू हुए अंतर्राष्ट्रीय 'कान्स फिल्म समारोह' में उसने अपना परचम फहराया. जब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु को पता चला कि एक भारतीय फिल्म ने अंतर्राष्ट्रीय खिताब जीता है तो उन्होंने यह फिल्म देखने की ख्वाइश जाहिर की . दिल्ली के तब 'वाइसरीगल लॉज', जो अब राष्ट्रपति भवन कहलाता है, में 'नीचा नगर' का एक शो रखा गया. शो में नेहरु जी के अलावा माउन्टबेटन दंपत्ति भी मौजूद थे. फिल्म के शो के बाद नेहरु ने फिल्म की खूब तारीफ़ की और माउन्टबेटन ने सलाह दी कि फिल्म के अंग्रेजी में सब-टाइटल

Human Rights and Media

Rajendra Bora Although the concept of ‘Human Rights’ came into existence way back in 1948 with the United Nations’ Universal Declaration but the National Human Rights Commission came into existence in India forty-five years later, in 1993, when ‘The Protection of Human Rights Act’ was enacted by Parliament. The State Human Rights Commissions came into existence much later. One might wonder why the enactment of law by Parliament was delayed for 45 years? It is because no such necessity was felt. Many of the Articles of the Universal Declaration of Human Rights had already found place in the Fundamental Rights in the Indian Constitution. The Indian Constitution is one of the classical documents of its kind and has been drafted in such a systematic and simplified manner that is easy to understand, even for a layman. Than why Human Rights are being flouted so rampantly? Has the Constitution failed? No. They are the mortal being – We the People - have failed. What is the role of medi

Misuse of Power by Police and Misuse of Police by Persons in Authority

Rajendra Bora I would like to begin by quoting management guru Arindam Chaudhury whose recent book has taken the Indian business world by storm. In his best selling book “Count Your Chikens Before They Hatch” Arindam tells an interesting observation about Japanese people in the chapter titled “Pegging Cultural Holes”. In Japan “when a man runs short of money in the market place and goes to borrow some from the policeman round the corner, he meets with a pleasant experience. The policeman might not even ask for his address, for, trust levels are too high and policeman knows that a Japanese would rarely cheat his country. When this is how a citizen is treated. In turn he also acts responsibly and reacts by picking up a wastepaper lying by the road and taking it home to throw in his dust bin”. It may sound a fairy tale to us Indians because the Police force is just not considered as a friend here despite all efforts made in the past to make it so. The overwhelming perception of the com