Sunday, December 26, 2010

अकादमियाँ बदहाल : कैसे बचाएँ कला और संस्कृति की पहचान

राजेन्द्र बोड़ा

कला और संस्कृति की पहचान बनाए रखना भी मानव अधिकारों में आता है। मानव अधिकारों की गारंटी देने की जिम्मेवारी राज्य की होती है। राजस्थान अपनी कला और संस्कृति के लिए दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। यह पहचान बनाई रखने में इसीलिए राज्य की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। देश की आज़ादी के बाद अपनाई गई संवैधानिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब लोक की प्रतिनिधि सरकारें बनीं तब अन्य बातों के अलावा लोक कला और संस्कृति के संरक्षण की जिम्मेवारी स्वतः ही उन पर आ गई। राजस्थान में राज्य’ने स्थानीय कला और संस्कृति को बचाए रखने का अपना दायित्व निभाते हुए विभिन्न अकादमियाँ स्थापित कीं। इनकी स्थापना के पीछे सोच यह था कि इनको राज्य की वित्तीय मदद मिले मगर उनका संचालन लोकतान्त्रिक हो। राजस्थान में स्थापित कीं गईं अकादमियों के संविधान इसी के अनुरूप बनाए गए। माना गया कि अपने-अपने क्षेत्र के कुशल लोग, जानकार लोग और कला-संस्कृति से सरोकार रखने वाले लोग इनमें आएँगे जिससे न केवल प्रदेश की कला और संस्कृति का संरक्षण हो सकेगा बल्कि उन्हें बढ़ावा भी मिलेगा। कला और संस्कृति के संरक्षण में राज्याश्रय की अवधारणा हमारे यहाँ बहुत पुरानी है। मगर पुरानी राजाशाही में एक राजा की पसंद या नापसंद और उसकी सनक पर सब कुछ चलता था। इसीलिए पुराने सामन्ती युग में कला और संकृति के उजले और अंधेरे दौर हमें इतिहास के पन्नों में देखने को मिलते हैं। आज़ादी के बाद जब भारत के संविधान में लोक के शासन की व्यवस्था की गई तब यह सपना देखा गया कि अब क्योंकि ‘लोक’अपने भाग्य का विधाता खुद है इसलिए ऐसी लोकतान्त्रिक संस्थायें बनेंगी जिन्हें राज्याश्रय प्राप्त होगा मगर वे किसी की पसंद, ना पसंद या सनक से काम नहीं करेंगी। वे सरकारी विभाग नहीं होंगी और उन पर नौकरशाही का कोई दबाव नहीं होगा। वे स्वतंत्र रूप से काम करेंगी और सरकार का मुँह नहीं ताकेंगी। ऐसे ही जज़्बों के साथ राजस्थान साहित्य अकादमी, राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, और राजस्थानी भाषा एवं संस्कृति अकादमी जैसी संस्थायें स्थापित हुईं। बाद में इसी तरह अन्य अकादमियाँ बनाईं गईं जैसे उर्दू अकादमी, बृज भाषा अकादमी और नवीनतम पंजाबी अकादमी। लेकिन पिछले साठ वर्षों से अधिक का आज़ादी के बाद का अनुभव हमें बताता है कि हम लोकतान्त्रिक संस्थाओं को पल्लवित नहीं कर सके। ऐसी संस्थाएं बनाई जरूर हमने पर उन्हें संवारना तो दूर रहा हम उन्हें सँभाल कर भी नहीं रख सके। बड़ी अपेक्षाओं के साथ बनीं सभी अकादमियाँ आज मृतप्राय: हैं।
स्वतंत्र रूप से काम करने के लिए अकादमियों की स्थापना का श्रेय कॉंग्रेस को जाता है जिसने आज़ादी के बाद लंबे समय तक प्रदेश में लगातार सरकार चलाई। सन 1977 के बाद बीच-बीच में यदा-कदा विपक्ष के लोग सरकारें चलाते रहे मगर वर्चस्व कॉंग्रेस का ही बना रहा है। अब प्रदेश में फिर कॉंग्रेस का शासन है और उसका नेतृत्व अशोक गहलोत कर रहें हैं जो पहले भी पाँच वर्ष का कार्यकाल मुख्यमंत्री के रूप में बिता चुके हैं। इसीलिए उनसे राजस्थान के लोग स्वाभाविक रूप से यह अपेक्षा रखते हैं कि वे अपने पिछले कार्यकाल के अनुभवों की सीख से शासन की बागडोर और अधिक बेहतर तरीके से थाम कर चलेंगे। लोग उनमें गांधी का सोच देखते हैं इसीलिए उनके लिए “राजस्थान का गांधी” का नारा तक लगाते रहते हैं। जमीन से जुड़े हुए इने गिने राजनेताओं में उनका शुमार होता है। प्रदेश की लोक संस्कृति और कलाओं से वे अपना सरोकार का सार्वजनिक रूप से वे इज़हार करते रहते हैं। उन्हीं के नेतृत्व वाली सरकार ने पिछली बार राज्य विधान सभा में राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में रखने का प्रस्ताव पारित करवा कर केंद्र सरकार को भिजवाया था। मगर इसे क्या कहें कि उन्हीं के मौजूदा कार्यकाल में कला, संस्कृति और भाषा अकादमियाँ ठप पड़ीं हैं।
अकादमियों का यह हश्र एक दम या रातों-रात नहीं हुआ है। पहले इनमें राजनीति घुसी। सत्ता के निकट रहने या सत्ता का मुँह ताकने वालों को इन संस्थाओं में पदों पर बिठाने का खेल बहुत पहले शुरू हो गया था। इससे अकादमियों के पद मात्र श्रंगारिक बन कर रह गए। इनके पदों पर रुतबे वाले लोग नहीं बल्कि पद से रुतबे की चाह रखने वाले लोग आसीन होते गए। ये संस्थाएं स्वतंत्र हैसियत वाली बनने की बजाय आत्म समर्पण वाली संस्थाएं बन कर रह गईं। जब उनकी हैसियत ही नहीं रही तब नौकरशाही कब उन्हें बक्षने वाली थीं। आज इन अकादमियों का कोई रुतबा नहीं है, कोई स्वतंत्र वजूद नहीं है। रही-सही कसर सरकार के उस उदासीन रवैये ने पूरी कर दी जिसके तहत नए शासन के डेढ़ वर्ष का कार्यकाल पूरा हो चुकने के बाद भी किसी को यह सुध नहीं है कि वैधानिक व्यवस्थाओं के अनुरूप उनका गठन भी किया जाना है। अकादमियाँ सरकार की प्राथमिकताओं में कहीं कोई स्थान रखती है इसका प्रमाण नहीं मिलता। कला और संस्कृति के सरोकारों से विमुख होकर कोई लोकतान्त्रिक सरकार किस तरह अपने को लोक हित वाली सरकार होने का दम भर सकती है? मगर शासन में बैठे लोग पिछली चुनावी जीत के जश्न से उठे गुबार में इस तरह घिरे रहते हैं कि दीवार पर उकरी इबारत उन्हें पढ़ने में नहीं आती। वरना क्या कारण हो सकता है कि जब बाज़ार सभी क्षेत्रों में अपनी घुसपैठ कर चुका हो और कला और संस्कृति को उत्पाद बना देने पर आमादा हो तब भी उनके संरक्षण की तरफ सरकार का ध्यान नहीं जाता। सरकार चलाने की अपनी लोकतान्त्रिक मजबूरियां हो सकती है। परंतु अकादमियों को पंगु बनाए रखने का खेल इन मजबूरीयों का हिस्सा नहीं हो सकता। यदि ऐसा है तो और भी बुरा है।
मुद्दा यह नहीं है कि इन अकादमियों का पुनर्गठन करके उनमें अध्यक्षों की कुर्सियों पर बैठा कर किन्हीं लोगों की शोभा बढ़ाई जाय या किन्हीं लोगों के राजनैतिक हित सँवारे जाय। मुद्दा यह है कि इन अकादमियों को जीवंत, लोकतान्त्रिक और स्वतंत्र संस्थाओं के रूप में विकसित होने दिया जाय। यह तभी संभव है जब उन्हें नौकरशाही के चंगुल से आज़ाद किया जाय और उन्हें वित्तीय रूप से सक्षम बनाया जाय। इन संस्थाओं की कमान जिन किन्हीं के हाथों में सौंपी जाय उन पर भरोसा किया जाय और सरकार का काम सिर्फ निगरानी का हो हस्तक्षेप का नहीं। आज की परिस्थितियों में ऐसा तभी हो सकता है जब मुख्यमंत्री सीधे इस काम को देखे। सरकार की असली दखलंदाजी अकादमियों को दी जाने वाली वित्तीय मदद से होती है। कुछ ऐसी व्यवस्था करनी होगी जिसमे अकादमियों को भरपूर वित्तीय मदद मिले और एक बार उन्हें बजट दे देने के बाद उनके काम में टाँग नहीं अड़ाई जाय। जिन लोगों को इनकी कमान सौपी जाय उन्हें काम की आज़ादी तभी मिल सकेगी। यदि ऐसा हो जाय और अच्छे लोग इन अकादमियों को संभालने आ जाएँ तभी संभव है कि प्रदेश की कलाओं और संस्कृति के दिन फिरें। मगर यह दिवास्वप्न जैसा लगता है। जिस बुरी हालत में आज प्रदेश की विभिन्न अकादमियाँ पड़ी हुईं है और जिनकी तरफ ध्यान देने की फुर्सत शासन में नहीं है उसके चलते कोई बड़ा उपाय होता नहीं दीखता। कहा जा सकता है कि कला और संस्कृति के संरक्षण के लिए सरकार पर ही क्यों आश्रित रहा जाय। गैर सरकारी प्रयास भी तो हो सकते हैं। हमारे जीवन के हर क्षेत्र में राज्य’की दखलंदाजी भरपूर है। उसका सारा कारोबार जनता के पैसों से ही चलता है। इसलिए यदि उससे इमदाद मांगी जाती है तो यह माँगना हमारा हक है। अपनी कलाओं और संस्कृति को बचाए रखने का हक हमारा मानव अधिकार है। और इस अधिकार की रक्षा करना राज्य’ का दायित्व है। शासन को उसका दायित्व याद दिलाना हमारा फर्ज़ भी है और अधिकार भी।

Wednesday, December 22, 2010

तेल ने राजस्थान के लिए खजाना खोला : क्या शासन तैयार है इस पैसे के सदुपयोग के लिए ?


राजेंद्र बोड़ा

राजस्थान की धरती ने इस प्रदेश के पिछड़ेपन की कालिख को पोंछ कर इसे आधुनिक, खूबसूरत और सम्पन्न राज्य बनाने के लिए अपने गर्भ का खजाना खोल दिया है। पश्चिमी इलाक़े मारवाड़ के बाड़मेर जिले में मिले तेल से होने वाली राजस्व आय राजस्थान की सारी मुश्किलें आसान कर देने के लिए काफी है। एक मोटे अनुमान के अनुसार इस तेल की रॉयल्टी के रूप में राज्य सरकार को प्रति वर्ष करीब 200 करोड़ रुपयों का राजस्व मिलेगा जो हमें प्रकृति से मिला अनुदान है। राज्य सरकार को होने वाली यह अंतिरिक्त आय उसके अपने बजटीय प्रयासों का फल नहीं है। लेकिन जिस प्रकार की संवैधानिक वित्तीय व्यवस्था हमारे यहाँ है उसमें यह अतिरिक्त आय भी उस समेकित निधि में जाएगी जिसमें सभी प्रकार के कर राजस्व तथा अन्य स्रोतों से होने वाली आमद जाती है। इसी समेकित निधि से सरकार अपने सारे खर्चे चलाती है।

मगर क्या इस नई आय को अन्य राजस्व की तरह मान कर सामान्य तौर पर खर्च कर देना उचित होगा? या फिर राजस्थान की तक़दीर बदलने के लिए इस आय को खर्च करने की अलग से कोई योजना बनाना मुनासिब होगा जिससे यह पता चलता रहे कि तेल से मिलने वाली विशाल राशि किन मदों पर और किस तरह खर्च की जा रही है? इन सवालों को आज गंभीर चर्चा की दरकार है। अफसोस है कि विधानसभा में हमने जिन्हें चुन कर भेज रखा है उनमें ऐसा कोई सरोकार नज़र नहीं आता।

लोकतंत्र में आम जन सरकार चलने के लिए अपनी पसंद के प्रतिनिधि चुनते हैं. मगर निर्वाचित प्रतिनिधि चुने जाकर मालिक नहीं हो जाते. वे आम जन या कहें मतदाताओं के प्रतिनिधि की हैसियत से राज में बैठते हैं और शासन का संचालन करते हैं. इसलिए जरूरी है कि जनता के नुमाइंदे सरकार का काम-काज चलाते हुए बीच-बीच में आम जन से संवाद करें और प्रमुख मुद्दों पर उनकी राय जानें और उसी अनुरूप काम करें. किसी भी सरकार का प्रमुख काम होता है प्रशासनिक व्यवस्थाओं को चलाना और विकास के कामों को अंजाम देना. सरकार के सारे कामों के लिए खजाने में जो भी धन आता है वह आम जन की मिल्कियत होती है. शासन में बैठे लोग – राजनेता और नौकरशाह - उसके प्रबंधक भर होते हैं।

अचानक से हुई इस नई आय को कैसे खर्च किया जाय इस पर राज्य में आम सहमति बनानी होगी। इसके लिए जरूरी है इस बात पर बहस हो कि इस पैसे को खर्च करके ऐसी क्या अलग चीज की जा सकती है जो राजस्थान की प्रगति को नया आयाम दे और यहाँ के आम लोगों के जीवन को सुखी बना सके। खर्च की मौजूदा व्यवस्था में हम जानते हैं और जिसकी ताईद हर साल प्रस्तुत होने वाली सीएजी की रिपोर्टें करती हैं कि विकास के नाम पर होने वाले खर्च का अधिकतर पैसा निरर्थक चला जाता है और समूचा प्रशासन इस खेल में भृष्ट तंत्र में तब्दील हो चुका है। यदि तेल से होने वाली आय भी उसी तरह उड़ा दी गई और वह भ्रष्टाचार को समर्पित कर दी गई तो राजस्थान के लोगों के सपनें साकार करने का एक बड़ा अवसर हम खो देंगे।

इसलिए प्रशासनिक पारदर्शिता की आज बेहद जरूरत है। जिस प्रशासनिक तंत्र के कारण राजस्थान का विकास और इसकी उन्नति गति नहीं पकड़ पा रही है उसी के भरोसे तेल की रॉयल्टी की आय नहीं छोड़ी जा सकती। इसके लिए लोक भागीदारी से फैसले लेने की जरूरत है। निर्वाचित प्रतिनिधियों के जरिये लोगों की भागीदारी की लोकतांत्रिक व्यवस्था
के बावजूद आज लोगों की सीधी भागीदारी की भी महत्ती जरूरत है क्योंकि चुने हुए प्रतिनिधियों के सरोकार हम सबके सामने हैं।

तेल की रॉयल्टी के मामले में लोगों की सीधी भागीदारी इसलिए भी जरूरी है क्योंकि राज्य के बड़े हिट भी दांव पर है। हम जानते हैं कि केंद्र सरकार के सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठान ओएनजीसी बाड़मेर से निकालने वाले तेल की रॉयल्टी के भुगतान को लेकर समस्या में है। ओएनजीसी और केयर्न एनर्जी के बीच करार के अनुसार केयर्न जितना भी तेल का दोहन करके उसे बेचेगी राज्य को उसकी रॉयल्टी का भुगतान केंद्र के सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठान को करना है। इस प्रतिष्ठान को अब लगता है कि केयर्न के साथ हुआ करार उसके माथे पड़ गया है और वह उससे राहत चाहता है।

दूसरी बात यह है कि राजस्थान के भूखंड से निकालने वाले तेल की रॉयल्टी तेल के बिक्री दाम की 20 प्रतिशन होती है। बाद के तेल की खोज और दोहन के जो ठेके दिये गए उनके लिए रॉयल्टी की दर 12.50 प्रतिशत ही है। ओ एन जी सी केंद्र को यह समझाने में लगा है कि दरों में यह असमानता दूर की जानी चाहिए। ओ एन जी सी को राजस्थान से निकालने वाले तेल की रॉयल्टी का भुगतान करने में परेशानी है। उसे लगता है कि बड़ी कमाई तो केयर्न कंपनी कर रही है रॉयल्टी भुगतान में जिसकी कोई भागीदारी नहीं है। जब कोई नहीं जानता था कि राजस्थान की भूमि से व्यावसायिक स्तर पर तेल निकलेगा तब केंद्र सरकार ने विदेशी खोजकर्ताओं को आमंत्रित करने के लिए यह आकर्षक नीति बनाई थी कि यदि तेल का व्यावसायिक स्तर पर उत्पादन होता है तो उसकी रॉयल्टी का भुगतान ओ एन जी सी करेगी जिसके पास राजस्थान में तेल की खोज का लाइसेंस था मगर कुछ कर नहीं पा रही थी। मगर अब जब तेल मिल गया और केयर्न कंपनी के इसके बूते पर वारे न्यारे हो गए तब ओंजी सी को लगता है कि केयर्न के साथ करार घाटे का सौदा हो गया है। वह इससे निकालना चाहती है। उसका कहना है कि या तो केंद्र रॉयल्टी की दर घटा कर 12.50 प्रतिशत करे या उतना हिस्सा खुद वहाँ करे। भले ही यह ओ एन जी सी और केंद्र के बीच का मसला है मगर राजस्थान के वित्तीय हिट इससे जुड़े है। ऐसी परिस्थितियों में आवश्यक है कि राज्य केंद्र में कोई ऐसा खेल न होने दे जिससे उसकी आय पर असर पड़े। हम जानते हैं कि राजस्थान की केंद्र में बहुत अधिक नहीं चलती। ऐसा आज नहीं हमेशा से होता आया है। इसलिए जनता का दबाव बना रहना बहुत जरूरी है।

इसीलिए समय की माँग है की राज्य प्रशासन तेल से होने वाली आमद के बारे में पूरी तरह पारदर्शिता बरते और उसके बारे में फैसले केवल सचिवालय के बंद कमरों में ही नहीं ले बल्कि फैसलों से पहले सार्वजनिक बहस के अवसर दे। न केवल नई आमदनी की मात्रा को बचाए रखना है बल्कि पैसे का सदुपयोग भी करना है। वह तभी संभव है जब आम जन को नियमित रूप से लगातार यह जानकारी मिलती रहे कि सरकार क्या करने जा रही है। तभी ऐसे फैसलों पर अंकुश रखा का सकेगा जो राजस्थान के हित में नहीं हैं। केवल प्रशासनिक अधिकारियों के भरोसे सब कुछ नहीं छोड़ा जा सकता। यह अवसर है कि पारदर्शिता और जवाबदेही का दम भरने वाली निर्वाचित सरकार के प्रमुख नई लोकतान्त्रिक पहल करके दिखाये। वर्तमान में चल रही राजनैतिक प्रक्रिया की शून्यता के हालत में कैसे शासन को इसके लिए तैयार किया जाय यह सबके लिए सोचने की बात है।

Wednesday, December 15, 2010

बर्बाद गुलाबी गुलशन, बनाने चले वर्ल्ड सिटी


राजेंद्र बोड़ा

जयपुर को वर्ल्ड सिटी बनाने की घोषणा के साथ कांग्रेस ने दो दशक बाद राजधानी की लोकसभा सीट जीती थी। इस शहर को “वर्ल्ड सिटी” बनाने का सपना राजीव और सोनिया गांधी के बेटे राहुल गांधी ने अपनी चुनावी सभा में लोगों के सामने रखा था। राहुल गांधी की बात को पकड़ते हुए ऊपर से नीचे तक के कांग्रेसजन इस झुंझुने को पकड़ कर बैठ गए। प्रदेश की कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार के मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के प्रमुख सदस्य भी यह जताने में पीछे नहीं रहे कि बस अब उनकी सरकार इस शहर को “वर्ल्ड सिटी” बना कर दिखाने ही वाली है। जिस शहर का ‘गुलाबी नगरी’ का दर्जा भी जो प्रशासन बचा के नहीं रख सका वह उसे ‘विश्व नगरी’ का दर्जा कैसे दिला पाएगा यह किसी ने नहीं पूछा।

किसी ने यह भी नहीं पूछा कि “वर्ल्ड सिटी” बनाने कि घोषणा करने वालों का इससे आशय क्या है। जयपुर को विश्व पर्यटन के मानचित्र पर लाना ही क्या उसे “वर्ल्ड सिटी” बना देना होगा? पर्यटकों के लिए कुछ सुविधाएँ जुटा देना और उन्हें अपना कुछ माल बेच देने की जुगत कर लेना ही क्या जयपुर को ‘विश्व नगरी’ बना देना होगा?

जयपुर को “वर्ल्ड सिटी” बनाने के दावे करने वालों ने कभी यह नहीं बताया कि ‘विश्व नगरी’ के रूप विकसित करने के लिए इस शहर की उनकी कल्पना क्या है। जिस शहर की बसावट के लिए बने ‘मास्टर प्लान’ की रोज धज्जियाँ उड़ती हों, जहाँ की गलियां और सड़कें पूरी तरह साफ नहीं हो पाती हों, जहाँ के ट्रेफिक की समस्या दिन ब दिन बद से बदतर होती जा रही हो जहाँ पीने का पानी दिन में एक बार एक घंटे के लिए सप्लाई होता हो, जहाँ के सरकारी अस्पताल जानवरों के बाड़ों की तरह हों उस शहर को “वर्ल्ड सिटी” बनाने का सपना दिखाने वाले राजनेताओं की हिम्मत की दाद देनी होगी कि वे किस सफाई से ऐसा फरेब लोगों को दे सकते हैं।

जयपुर पुरातन राजस्थान का सबसे नया शहर है। इसे बसाने वाले सवाई जयसिंह और इसे बनाने वाले विद्याधर ने बड़े विधि विधान से इस नगरी की रचना की थी। बाद के रियासती शासकों ने भी इसमें कुछ न कुछ जोड़ा। दो सदी से अधिक समय तक इस शहर की खूबसूरती ने इसे विश्व में इसके नाम का परचम फहराया। लोक गीतों में इसके गुणगान किए गए। यहाँ की हस्त कलाओं तथा जवाहरात के कारीगरों ने इसकी खूबसूरती में चार चाँद लगाए। कभी यह शहर “हिंदुस्तान का पेरिस” भी कहलाया। दुनिया के कोने- कोने से आए पर्यटकों ने इसकी शान में लेख लिखे, किताबें लिखीं। एक माने में यह आधुनिक शहर होने के खिताब का हकदार बना।

जयपुर नगरी की ख्याति चहुँ ओर फैली वह बेसबब नहीं थी। यहाँ का नगर नियोजन, यहाँ की सार्वजनिक सुविधाएँ, यहाँ का वाणिज्य व्यवसाय और यहाँ की कला और संस्कृति ने इस शहर को पहचान दी। गुलाबी नगरी का पुराना वैभव देवयोग से नहीं था। वह था यहाँ के लोगों के इस शहर से प्यार के कारण। बरसों तक ‘राजस्थान पत्रिका’ में ‘नगर परिक्रमा’ कालम में इस नगर के इतिहास का मनोयोग से लेखा जोखा प्रस्तुत करने वाले नंदकिशोर पारीक ने एक किस्सा सुनाया था। सवाई रामसिंह के जमाने की बात है। महाराजा सवाई रामसिंह के काल में ही जयपुर में आधुनिक सुविधाएँ आयीं। शहर में पक्की सड़कें बनीं, सार्वजनिक रोशनी का प्रबंध हुआ, रामनिवास बाग जैसे सार्वजनिक स्थान और रामबाग जैसी तामीरें हुई और शहर गुलाबी रंग में रंगा। रामसिंह एक शाम घोड़े पर सवार होकर शहर का मुलाहजा कर रहे थे। साथ में घोड़े पर उनके वजीर चल रहे थे। वे जिस सड़क पर चल रहे थे वह सफ़ेद पत्थरों की बनी थी। एक जगह महाराजा ने देखा कि सड़क पर पान की पीक थूकी हुई है। सफ़ेद पत्थरों पर पीक का लाल रंग अधिक ही उभर कर दिख रहा था। महाराजा ने साथ चल रहे वजीर की तरफ मुँह करके कहा देखो सड़क कैसी गंदी हो गई है। वजीर ने जवाब दिया हुजूर ये तो आम सड़क है। यहाँ तो ऐसा ही होता है। इस पर सवाई रामसिंह ने जो जवाब दिया वह बताता है कि इस शहर का वह वैभव क्यों था। महाराजा ने कहा “आम सड़क व्हेगी थ्हांकी। म्हाको तो यो घर छै”।

यह शहर विश्व नगरी तब बन सकती है जब इसे संभालने वाले इसे अपना घर समझें। मगर अब कौन इसे अपना घर समझता है। न शहर को संभालने वाले और न शहर के अधिकतर वाशिंदे। सभी को अपने हित लाभ की फिक्र है। बाज़ार आधारित आर्थिक नीतियों ने सभी को चूहा दौड़ का धावक बना दिया है। सभी आँख मूँदे दौड़े चले जा रहे है। कुछ भौतिक साधन पा लेने की जुगाड़ में ही पूरा जीवन गुजर जाता है। दशकों से जयपुर में रहने वालों से यदि पूछा जाये कि रोज हवामहल के सामने से गुजरते हुए उन्होंने कभी दो मिनट ठहर कर इस इमारत को नज़र भर के देखा भी है। क्या जयपुर के अधिकतर वाशिंदों को जानकारी है कि शहर में बालानन्द जी के मठ नाम का कोई ऐतिहासिक स्थान भी है। कितने लोगों को मालूम है की फिल्म गीतकार हसरत जयपुरी जिनके गानों ने आज भी दुनिया भर में हिन्दी फिल्म संगीत के चाहने वालों को दीवाना बना रखा है की हवेली चार दरवाजे के पास मौजूद है। कितने लोगों के दिल में उस समय कोई पीड़ा उठी जब उनकी नज़रों के सामने ताल कटोरे का पानी सूख गया और कंक्रीट का जंगल उस पर उगा दिया गया।

कोई भी शहर विश्व नगर बनने से पहले वहाँ के वाशिंदों का आशियाना बनता है। उसकी पहली शर्त होती है वह रहने लायक हो। जहाँ हर एक की जरूरतों को पूरा करने का सामान हो। सब के लिए खुला आसमान हो। साँस लेने के लिए खुली हवा हो। बच्चों के खेलने के लिए उद्यान हों। अंग्रेजी में एक शब्द है ‘सस्टेनेबल’। शहर ‘सस्टेनेबल’ हो। याने वह इस प्रकार से व्यवस्थित हो जो अपने श्रेष्ठ स्तर को थामे रख सके। विश्व नगरी गुणवत्ता वाली होती है, चलताऊ नहीं। वह ऐसी नगरी होती है जहाँ लोग अपने आप को सहज महसूस कर सकें। विश्व स्तर के शहर की सबसे बड़ी पहचान उसकी फुटपाथें होतीं हैं। वे पैदल चलने वालों को कितनी जगह देतीं हैं उससे शहर का वैभव झलकता है और लोगों के प्रति सरोकार प्रदर्शित होता है। शहर सिर्फ कारों और अन्य वाहनों के लिए नहीं होता। वह जीवित लोगों के लिए होता है।

कोई शहर ‘वर्ल्ड सिटी’ के रूप में कई अर्थों में मशहूर होता है। कला और संस्कृति के लिहाज से जैसे पेरिस, मनोरंजन उद्योग के लिहाज से जैसे लास एंजिल्स, मोटर वाहनों के निर्माण के लिए जैसे डेट्रोइट। इसलिए पहले हमें यह तय करना होगा कि जयपुर को हम किस लिहाज से ‘वर्ल्ड सिटी’ बनाना चाहते हैं। राजनेताओं और सरकार में बैठे प्रशासकों की मोटी बुद्धि में एक ही बात आती है पर्यटन की। चलें पर्यटन की दृष्टि से ही जयपुर को वर्ल्ड सिटी बनानी है तो यह तय करना पड़ेगा कि दुनिया भर से यहाँ आने वाले पर्यटकों को हम कैसा शहर दिखाना चाहते हैं? क्या एक ऐसा शहर जहाँ पैदल चलने के लिए सड़क पर कोई जगह नहीं है। क्या ऐसा शहर जिस पर हर तरफ पैबंद ही पैबंद लगे नज़र आते हों। जहाँ की सीवेज लाइनें जगह जगह उबल रही हो। पर्यटक चैन से इस शहर को देखने के लिए कहाँ जाये? जयपुर शहर की सफाई की पुराने जमाने की बानगी देखनी हो तो 1932 में इस शहर पर बनी एक डाकुमेंट्री फिल्म देखे जो अभी इंटरनेट पर यूट्यूब पर उपलब्ध है। उसमें एक दृश्य है त्रिपोलिया बाज़ार में मुख्य सड़क पर एक हाथी निकाल रहा है। चलते-चलते यह विशालकाय जानवर लीद कर देता है। वह नो-चार कदम ही आगे निकला होगा कि एक जामदार हाथ में झाड़ू और टोकरा लिए आता है और साक पर से लीद साफ कर देता है। सत्तर के दशक तक जयपुर नगर परिषद का प्रशासक मुँह अंधेरे दौरे पर निकलता था और शहर की गलियों और सड़कों की धुलवाई पर नज़र रखता था।

लेकिन प्रशासकों और लोगों के मन में इस शहर के प्रति कहीं कोई लगाव नज़र नहीं आता। सभी लोग इस शहर को छीनने-झपटने और इसके वस्त्र तार-तार करने में लगे हैं। हर कोई, जिसकी जितनी भी चलती है, शहर की जमीन को अपनी मिल्कियत बना लेने के उपाय करने में लगा है। अपने घर दुकान का कचरा बाहर खुले में बिखराने की लगता है होड़ लगी है। कचरा उठाने की जिम्मेवारी जिनकी है उन्हें अपने काम के बिलों को पास करवाने से फुर्सत नहीं है।

जयपुर को वर्ल्ड सिटी बनाने से पहले उसे ‘नेशनल सिटी’ और उससे भी पहले ‘स्टेट सिटी’ बनाने के तो उपाय कर लें। फिर वर्ल्ड सिटी की बात करना। जयपुर शहर का आज महत्व सिर्फ इतना है कि वह राजस्थान की राजधानी है। प्रशासनिक तकलीफ़ों से ग्रस्त लोगों का यहाँ मुख्यालय पर आना मजबूरी है। भले ही यहाँ उनकी तकलीफ़ों का निबटारा अधिकतर नहीं होता हो। शहर किसी को सुकून नहीं देता क्यों कि शहर को खुद को सुकून नहीं है।

वर्ल्ड सिटी बजट के आँकड़ों से नहीं बनता। वह लुभावने नारों से भी नहीं बनता। वह किसी देवयोग से खुद-ब-खुद भी नहीं बन जाता। उसके लिए सबको मिल के कुछ करना होता है। उन सब को जो इस शहर से प्रेम करते हैं। राहुल गांधी से चली बात एक अच्छा सपना भी नहीं है क्योंकि वह इतनी धुंध से भरा है कि उसमे भविष्य की कोई तस्वीर देखना बेमानी होगा।

(आलेख प्रेसवाणी पत्रिका के नवम्बर 2010 अंक में प्रकाशित)

Saturday, September 4, 2010

मनोहारी सिंह के सेक्सोफोन का जादू कभी नहीं टूटेगा


राजेंद्र बोड़ा

सैकड़ों हिन्दी फिल्में हर साल बनती हैं। अब तक बनी हजारों फिल्मों में से कौन सी फिल्में लोगों को याद रहती हैं? ‘मुगले आज़म’ या ‘शोले’ जैसी फिल्मों को छोड़ दें तो अधिकतर फिल्में समय के अंधेरे गलियारों में खो जाती हैं। यदि कोई फिल्म याद रहती है तो वह उसके गानों से। हिंदुस्तानी फिल्म संगीत ने, खास कर गानों ने, पुरानी फिल्मों को लोगों की यादों में बचाए रखा है। यह भी होता है कि गाने याद रह जाते हैं और फिल्मों के नाम भी बिसरा दिये जाते हैं। हालांकि गानों का श्रेय गायकों, संगीतकारों और गीतकारों को मिलता है मगर गानों को सजाने संवारने में साजिन्दों का योगदान भी कम नहीं होता। आप किसी पुराने गाने को याद करते हैं तो कई बार उस गाने की शुरुआत में या उसके इंटरल्यूड में बजे किसी साज की धुन सबसे पहले आपके मन में गूँजती है। आज किसी जमाने की राजेंद्र कुमार, साधना की सुपर हिट फिल्म ‘आरजू’ की किसे याद है। याद है तो उसके गाने। उनमें भी एक गाना जो इतने बरसों के बाद आज भी लोगों के सिर पर चढ़ा हुआ है ‘बेदर्दी बालमा तुझको मेरा मन याद करता है’की याद आती है तो हमारे जेहन में उस वाद्य की आवाज गूँज उठती है जो पतझड़ के मौसम में सूनी वादियों के विस्तार में नायिका की तड़प साकार हो कर देती है। यह वाद्य है सेक्सोफोन जिसने ऐसे ही सैकड़ों गानों को अमर कर दिया। जैसे देवानन्द की क्लासिक फिल्म ‘गाईड’ का किशोर कुमार और लता मंगेशकर का गाया गाना ‘गाता रहे मेरा दिल’और उन्हीं की अभिनीत ‘माया’ का संगीतकार सलिल चौधरी के निर्देशन में बना लता का गाया गाना ‘जा रे जारे उड जा रे पंछी’ में सेक्सोफोन की बीच में उठी तान गाने को नयी उचाइयों पर ले जाती है।

इस वाद्य को बजाने वाले मनोहारी सिंह का इस मंगलवार को मुंबई में निधन हो गया। अस्सी वर्ष की उम्र के मनोहारी दा हिन्दुस्तानी फिल्म संगीत के “सुनहरी दौर” के कलाकार थे। साजिन्दे, सहायक और अरेंजर के रूप में उन्होंने सभी शीर्ष संगीतकारों के साथ काम किया था और उनकी धुनों में अपनी कला के खूबसूरत सितारे जड़े थे। शंकर जयकिशन, एस डी बर्मन, ओ पी नैयर, मदन मोहन, कल्याणजी आनंदजी, सलिल चौधरी और आर डी बर्मन के वे पसंदीदा साजिन्दे थे। आर डी बर्मन जिन्हें लोग प्यार से पंचम भी पुकारते हैं की तो संगीत मण्डली के वे प्रमुख सदस्य थे। वे उनके साजिन्दे भी रहे, अरेंजर भी रहे और सहायक निर्देशक भी रहे। पंचम की पहली फिल्म ‘छोटे नवाब’ से लेकर उनकी आखरी फिल्म ‘1942 –ए लव स्टोरी’तक दोनों का साथ रहा। पंचम के असामयिक निधन के बाद इस फिल्म के अधूरे रह गए पार्श्व संगीत को मनोहारी दा ने ही पूरा किया था।

मनोहारी दा जितने उम्दा सेक्सोफोन वादक थे उतने ही उम्दा इंसान भी थे। अभी एक महीने से भी कम समय पहले हिंदुस्तानी फिल्म संगीत के रसिकों ने उनका जयपुर बुलाकर सम्मान किया था। जयपुर के लोगों को हमेशा इस बात का गर्व रहेगा कि उन्होनें मनोहरी दा को सामने बैठ कर सुना। बढ़ी उम्र और हफ्ते में तीन बार डायलेसिस होते रहने के बावजूद जब सेक्सोफोन उनके मुँह से लगता तो सुरों का ऐसा झरना बह निकलता कि सुनने वाले दंग रह जाते। मनोहारी दा ने दो घंटों से अधिक समय तक गत 20 जून को जयपुर में अपने सम्मान समारोह में जो बजाया वह इतना अद्भुत था। दुर्भाग्य से जयपुर का यह कार्यक्रम उनका अंतिम सार्वजनिक पर्फार्मेंस बन गया।
कलकत्ता में जन्मे मनोहारी दा का परिवार संगीतकारों का परिवार था। उनके पिता और चाचा फिल्मों में और नाइट क्लबों मेन संगीत बजाया करते थे। शुरू में दादा ने इंग्लिश की-फ़्ल्यूट, क्लेरिनेट और मेंडोलिन पर हाथ साधा परंतु अंत में सेक्सोफोन को ही अपनाया। क्योंकि वे पारंगत इन सभी वाद्यों में थे इसलिए फिल्मी गानों की रेकार्डिंग के दौरान वे सेक्सोफोन के अलावा दूसरे वाद्य भी बाजा लेते थे। सलिल चौधरी के संगीत से सजी फिल्म ‘माया’के गाने जा रे जारे उड जा रे पंछी के मुखड़े से पहले प्रील्यूड में ‘पिकोलो’ (एक प्रकार की छोटी बाँसुरी) से गाने का अद्भुत वातावरण बनाते हैं और उसी गाने के इंटरल्यूड में सेक्सोफोन की धुन पर गाने को ऊँचाई पर थामे रहते हैं।

कलकत्ता में वे ग्रामोफोन रेकार्ड बनाने वाली एचएमवी कंपनी में नौकरी करके जीवन की शुरुआत की। कलकत्ता सिंफनी आर्केस्ट्रा में भी उन्होंने पिछली सदी के पचास के दशक में बजाया। संगीतकार सलिल चौधरी के कहने पर 1958 में वे किस्मत आजमाने बम्बई आ गए। सबसे पहले उन्होंने एस डी बर्मन के लिए फिल्म ‘सितारों से आगे’में बजाया। मगर दादा की पहचान बनी कल्याण जी आनंद जी की फिल्म ‘सट्टा बाज़ार’ से। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की जोड़ी के संगीतकार बनने से पहले ये जोड़ी दार साजिन्दों के रूप में काम करते थे। लक्ष्मीकांत ने दादा को एक दिन कहा कि एक गाने की कल रेकार्डिंग है वे अपना सेक्सोफोन लेकर स्टूडियो पंहुच जाएँ। गाने के इंटरल्यूड में सेक्सोफोन का सोलो पीस था। रिहर्सल में जिस शिद्दत से दादा ने वाद्य बजाया उसे सुन कर उसे फाइनल टेक में रखने का फैसला हुआ और वह रेकार्ड हुआ। ‘तुम्हें याद होगा कभी हम मिले थे’ गाने के इंटरल्यूड में मनोहरी दा के सेक्सोफोन का जादू कुछ ऐसा छाया कि पूरी फिल्म इंडस्ट्री में उनकी धाक जाम गई। और उसके बाद उन्होने कभी मूड के पीछे नहीं देखा। हेमंत कुमार का गाया वह गीत आज भी हम सुनते हैं तो उसकी गिरफ्त से आसानी से नहीं छूटते।

जयपुर में दादा से ‘सुरयात्रा’के सदस्यों ने लंबी बातचीत भी की। दादा मानते थे कि ओ पी नैयर की ‘कश्मीर की काली’ फिल्म का जबर्दस्त हिट गाना ‘ये दुनिया उसी की जमाना उसी का’वास्तव में उनके और महान गायक मोहम्मद रफी के बीच जुगलबंदी जैसा है। कभी फिर से सुनिए इस गाने को कि कैसे मनोहरी दा का सेक्सोफोन जहाँ छोडता है और कैसे रफी साहब उसे पकड़ लेते हैं। दोनों को सलाम करने को जी चाहता है।
सेक्सोफोन का सबसे श्रेष्ठ और भरपूर उपयोग किस गाने में हुआ सवाल का जवाब देने में दादा ने एक पलभी नहीं लगाया फिल्म ‘अमीर गरीब’में। बहुत कठिन कंपोजीशन थी मगर लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने धुन बनाने में कमाल कर दिया। दादा ने अपने सेक्सोफोन से गाने को अमर कर दिया। देवानन्द पर फिल्माया गाना आज भी लोगों को याद है ‘मैं आया हूँ लेकर साज हाथों में’।

मनोहारी दा ने अपने साथी बासुदेव चक्रवर्ती के साथ मिल कर जोड़ी बनाई और बासु-मनोहारी के नाम से कुछ फिल्मों में संगीत भी दिया जैसे महमूद की ‘सबसे बड़ा रुपैया’ (1976), ‘कन्हैया’ (1981) और ‘चटपटी'(1983)। ‘इंसान जाग उठा’ के साथ वे दादा बर्मन के अरेंजर बने और कुल 138 फिल्मों में संगीत अरेंज किया।

आज के दौर में भी वे सक्रिय थे मगर नया फिल्म संगीत उन्हें पसंद नहीं था। उन्होने बड़े मार्के की बात काही : आज का फिल्म संगीत एक्स्पायरी डेट के साथ आता है जबकि पुराना फिल्म संगीत कालजयी है।

फिल्मी गानों को सजाने संवारने वाले साजिन्दों के बारे में श्रोता कुछ नहीं जानते। न फिल्म के टाइटल में और न रेकार्ड, या सी डी पर उनके योगदान का कोई जिक्र ही होता है। अब स्टेज शो होने लगे हैं जिससे लोगों को यह पता लगने लगा है कि अमुक गाने में अमुक साज अमुक साजिन्दे ने बजाया। इसी से मनोहारी दा और उन जैसे हमेशा गुमनाम रहे साजिन्दों के नाम अब लोगो के सामने आने लगे हैं। वरना इतिहास ने तो उनके साथ नाइंसाफ़ी ही की है।

(यह आलेख जनसत्ता के रविवारी संस्करण में 10 जुलाई 2010 को प्रकाशित हुआ)

Tuesday, June 29, 2010

साक्षर भारत : टूटते सपनों की कहानी

राजेंद्र बोड़ा

वर्ष 2012 तक देश की समूची आबादी को साक्षर बना देने की केंद्र सरकार की महत्वकांक्षी योजना "साक्षर भारत" के क्रियान्वयन में अभी विभिन्न एजेंसियां जुटी है. देश में कोई भी अशिक्षित नहीं रहे इसके लिए विगत में सरकारों द्वारा कईं बार तिथियाँ निश्चित की गयीं कि अमुक समय तक सबको पढ़ा लिखा बनाने का सपना पूरा हो जाएगा. आज़ादी को साठ साल होने को आये हैं. मगर बावजूद सारे प्रयासों के देश में आज भी करोड़ों लोग ऐसे हैं जो अक्षर नहीं पढ़ पाते.

आज़ादी के इतने सालों बाद प्रौढ़ साक्षरता के प्रयासों की कोई जरूरत नहीं रह जानी चाहिए थी यदि प्रारंभिक शिक्षा हम सभी तक पंहुचा पाते. क्योंकि प्रारम्भिक शिक्षा से उन सभी नए जन्मे बालक - बालिकाओं को, जिन्होंने आज़ाद भारत में आँख खोली, नहीं जोड़ा जा सका इसीलिए नयी पीढियां आती गयीं और पुरानी पीढी के प्रौढ़ों को साक्षर बनाने का काम कम होने की बजाय बढ़ता ही गया और वह आज़ादी के बाद के छठे दशक में आज भी जारी है.

आज़ादी का संग्राम जिन सपनों को सच बनाने के लिए लड़ा गया इन पिछले दशकों में हमने उन सपनों को टूटते हुए ही देखा है. आज़ादी की लड़ाई में जो लोग कूदे और अन्य जिन्होंने उनको जज्बाती समर्थन दिया उन सबकी एक बड़ी आकांक्षा यह थी कि आज़ाद भारत में एक समता मूलक ऐसा समाज रचा जाय जिसमें वर्ण, जाति, धर्म, और धन से लोगों में विभेद न हो. व्यक्ति, व्यक्ति का शोषण नहीं करे और विकास की अवधारणा में मानव केंद्र में हो. इसके लिए जरूरी था कि हम हजारों वर्षों के सामंती युग के संस्कारों का बोझ अपने सिर से उतार फैंकें और आज़ादी के नवप्रभात में कोरी स्लेट पर नयी इबारत लिखें. इस सपने को पूरा करने के लिए सर्वमान्य रास्ता था शिक्षा का. सोचा था ज्यों-ज्यों शिक्षा का प्रसार होगा त्यों-त्यों मानव मुक्त होता चला जाएगा और अपने भाग्य का नियंता खुद बन जाएगा. इसीलिए आज़ाद भारत का संविधान बनाने वालों ने उसकी शुरुआत ही "हम भारत के लोग" उदघोषणा से की. माना गया कि हम भारत के लोग जब शिक्षित हो जायेंगे तो अपनी चुनौतियों से खुद निबट लेंगे और एक ऐसा खूबसूरत समाज बनायेंगे जहाँ भूख और गरीबी के लिए कोई जगह नहीं होगी और जहाँ हर इंसान के लिए इज्जत से रहने की जगह होगी. इसके लिए 'राज्य' की भूमिका महत्वपूर्ण थी. नयी लोकतांत्रिक व्यवस्था में 'राज्य' की बागडोर जनता के प्रतिनिधियों के हाथों में सौपी गयी. कहा गया जनता की, जनता के लिए, जनता द्वारा चुनी हुई सरकार जन सरोकारों के प्रति संवेदनशील होगी और आज़ादी के संग्राम के दौर में देखे गए सपनों को साकार करने में अधिक देर नहीं लगेगी. लेकिन जैसा कि हमने पहले कहा आज़ाद भारत का इतिहास सपनों के टूटने का इतिहास बन कर रह गया है. इक्कीसवीं सदी के आते -आते हमारा रास्ता कब बदल गया हमें पता ही नहीं चला और हमें कहाँ जाना था और हम कहाँ पंहुच गए इसके लिए आज सोचने की भी फुर्सत किसी के पास नहीं है. देश के हर व्यक्ति को साक्षर करके ऐसी शिक्षा देना था जो लोगों के मन के कषायों को दूर करती एक को दूसरे के नज़दीक लाती. एक तरफ हम न तो सभी को साक्षर या शिक्षित कर सके और न वह समाज बना सके जिसे शिक्षा के जरिये रचना था. शिक्षा को डिग्रियों के पुलिंदों में डुबो दिया गया जिससे आपसी होड़ की संस्कृति पैदा हुई जिसने प्रतिस्पर्धा वाली नयी आर्थिक नीतियों का रास्ता सरल कर दिया और नए आर्थिक भेद को स्थापित कर दिया.

आज़ादी के बाद के समय में शिक्षा के महत्व को समझदार लोगों ने बार - बार दोहराया स्वयंसेवी संस्थाएं बना कर उनसे जो बन पड़ा मन से किया. मगर जनता के मत से शासन के नियंता बने लोगों ने ऐसी संस्थाओं को गैर सरकारी संस्थाओं में तब्दील करने का अनोखा खेल खेला जिसने सरकारी विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार को इन संस्थाओं में भी धकेल दिया. आज सारा खेल पैसे का हो कर रह गया है. सरकार जब 'साक्षर भारत' की नयी महत्वकांक्षी योजना लेकर आती है तो उसे लेकर सभी केवल बजट की बात करते हैं. कितने लोग इस योजना से मिलने वाले पैसे से अपनी कच्ची नौकरी पक्की कर सकते हैं यही सबका सरोकार है. एक बड़ी व्यवस्था करनी है. उसके लिए ढांचा तैयार करना है. उसके लिए अमुक वितीय प्रावधान है इसी पर सबका ध्यान है. इससे आगे जाकर कोई नहीं सोचता. राज्य सरकारें इस फ़िराक में है कि नयी योजना में कैसे केंद्र से आने वाले पैसे से काम चल जाए और उसे खुद कम से कम खर्च करना पड़े. नयी व्यवस्था और ढाँचे में कितनों को रोजगार के अवसर मिल सकते हैं यही खोज प्रौढ़ शिक्षा के काम में अपने को पुराने अनुभवी बताने वाले अभी कर रहे है. सबको व्यवस्था बनाने की फ़िक्र है क्या शिक्षा देनी है कैसी शिक्षा देनी और वैसी शिक्षा क्यों देनी है इस पर चिन्तन-मनन का काम सरकारी अहलकारो का नहीं है.

‘साक्षर भारत’ को शुरू हुए डेढ़ वर्ष होने को आये हैं मगर अभी उसकी तैयारियों के दौर ही चल रहे हैं. उसमें अंततः क्या होना है उसकी ‘फाइन ट्यूनिंग’ अभी तक चल रही है जबकि यह योजना 2012 तक के लिए ही है. दिल्ली में बड़े सरकारी आफिसों में कागजों पर जबरदस्त कसरत चलती है जिसके पसीनों से शिक्षा की खेती लहराने का उद्यम किया जाता है. इस उद्यम में लगे लोगों को यह भी लगता है की चल रही जनगणना की रिपोर्ट में साक्षरता दर फिर वैसी ही बड़ी छलांग लगाती नज़र आएगी जैसी पिछले दशक मंह आई थी इसलिए राजकोष का पैसा कैसे भी उड़ाया जाय हर्ज़ नहीं क्यों कि बढ़ी साक्षरता दर से शासन में बैठे लोगों को अपनी पीठ ठोकने का सबब मिल ही जाएगा.

इक्कीसवीं सदी में हम पाते हैं कि शिक्षा आदमी को मुक्त नहीं कर रही है. उसे संकुचित कर रही है. उसे आत्म केन्द्रित कर रही है. उसे अनचाही होड़ में धकेल रही है. वह एक ऐसा समाज रच रही है जो भेद करता है. तनाव और हिंसा हमारे जीवन के जरूरी हिस्से बन गए हैं. लेकिन जिस रास्ते पर हम चल रहे हैं वह उन सपनों को साकार करने की तरफ नहीं ले जाता जो साठ साल पहले हमने देखे थे. कोई नेतृत्व नहीं है जो चेता सके, रोक सके और रास्ता दिखा सके. धार्मिक, सामजिक, व्यावसायिक और राजनैतिक नेतृत्व सब बाज़ार के लिए हो कर रह गए हैं. बाज़ार निर्मम होता है. मगर उसमें मानव मन को लुभाने की जबरदस्त क्षमता होती है. इसीलिए वह भुलावे का संसार रचता है. शिक्षा इस धुंधलके को हटा सके और ऐसा प्रकाश ला सके जिसमें सब साफ़-साफ़ दिखाई दे सके उस सुबह का इंतज़ार है. मशहूर शायर साहिर ने कहा था 'वो सुबहा कभी तो आएगी'. शिक्षा के असली यज्ञ में लगे लोगों को शायर के इस कथन पर भरोसा है.

(यह आलेख समकालीन शिक्षा-चिंतन की पत्रिका ‘अनौपचारिका’ के मई-जून, 2010 के अंक में प्रकाशित हुआ)

Monday, May 10, 2010

कम जल उपयोग वाले विकास की जरूरत

राजेन्द्र बोड़ा


राजस्थान के लोगों ने सदियों पहले प्रकृति से सहकार करना सीख लिया. उन्होंने प्रकृति से जो सीखा उसे अपनी बुद्धि और कौशल से कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में जीने की राह आसान करने के जतन किये. बुद्धि और कौशल का उपयोग राज करने वालों ने नहीं किया बल्कि सामान्य जन ने अपने अनुभवों से किया. राजस्थान में पानी इंसानी याददास्त में कभी इफरात में नहीं रहा. बरसात के बादल जो बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से उठते हैं वे इस प्रदेश तक पहुचते-पहुचते शिथिल पड़ जाते है. इसीलिए सूखा राजस्थान के लिए कोई नई बात नहीं है. बरसों बाद कभी-कभी ज़माना अच्छा होता है. इसीलिए पानी की अहमियत को यहाँ के लोगों नें सबसे अधिक जाना. जीवन की पहली शर्त पानी ही होती है. विकट रेगिस्तानी इलाकों में जहां प्रकृति ने पानी की भयंकर किल्लत की स्थिति बनाए रखी वहां लोगों नें प्रकृति से समझौता किया और अपनी बुद्धि और कौशल से पानी के संरक्षण के अनोखे उपाय किये. पीढ़ी-दर-पीढ़ी पानी के संरक्षण और उसके किफायती उपयोग की सीख लगातार जारी रही. यह सब सामान्य जन ने किया. इसीलिए राजस्थान में पानी के पुराने सार्वजनिक स्रोत - कुए, बावड़ी, तालाब - किसी राजा-महाराजा के नाम से नहीं मिलते. वे अधिकतर दूसरों के बनवाये हुए मिलेंगे. पानी के लिए राज पर यहाँ के लोग कभी निर्भर नहीं रहे. अपने पानी के स्रोतों को संजो कर रखना उन्हें खूब आता था. निजी तौर पर भी लोग बरसात के पानी को आगे के महीनों के लिए संजो कर रखने के लिए संरचनाए बनाना सीखे हुए थे. मगर ज़माना बदल गया. लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में जब राज में आम जन की भागीदारी संवैधानिक व्यवस्था के जरिये निश्चित की गयी तब होना तो यह चाहिए था कि पानी को संजो कर रखने और उसके किफायती उपयोग की परंपरा और मजबूत होती. नए किताबी ज्ञान और परंपरागत कौशल के बीच नया रिश्ता बनता और लोगों का जीवन कुछ अघिक सुखद बन पाता. लेकिन आधुनिक युग में विज्ञान के चमत्कारों की चकाचौंध में पानी से हमारा मानवीय रिश्ता ही बदल गया. सारा समाज जो स्वावलंबी था वह पानी के लिए पूरी तरह सरकार पर आश्रित हो गया. लोक के पास जो बुद्धि और ज्ञान का भण्डार था उसे लोकतान्त्रिक व्यवस्था में आम आदमी की अपनी सरकार ने बिसरा दिए. जीवन के लिए महत्वपूर्ण पानी जैसे मुद्दों को प्रशासनिक और वित्तीय आधार पर सुलझा लेने की कोशिशें होने लगी. ऐसी कोशिशें आज भी जारी है.

सरकार में बैठे लोगों का सारा सोच पैसे से पानी के किल्लत की समस्या सुलझानें का हो गया है. पानी प्रकृति की दें है. वह पैसा देकर पैदा नहीं किया जा सकता. पैसे खर्च करने की योजनायें बनाने में शासन में बैठे लोगों ने विशेष योग्यता हासिल कर ली. इससे कईं लोगों की पौ बारह होती है.

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कहते हैं कि राजस्थान में पानी की कमी उनकी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है. यह चुनौती क्या एक दिन में पैदा हुई है. राजस्थमें कोई बारहमासी नदी नहीं है यह कोई नई जानकारी नहीं है. यहाँ मानसूनी बरसात कम होती है और यहाँ सूखा पड़ना भी कोई अनोखी बात नहीं है. लेकिन पानी की समस्या ने जो विकराल रूप ले लिया है वह नीति निर्माताओं और प्रशासन में बैठे लोगों की बुद्धिहीनता और लापरवाही का नतीजा है. पानी का अंधाधुन्द उपयोग को बढ़ावा देने की नीतियाँ ही आज़ादी के बाद सरकारों ने अपनाई. रेगिस्तान को उसकी प्रकृति के विरुद्ध जाकर हरा-भरा बनाने की जुगत करते हुए शासन में बैठे लोगों ने पानी के संरक्षण की जगह उसकी तबाही के इंतजाम ही किये.

राजस्थान का भूभाग देश के कुल क्षेत्रफल का 10.40 प्रतिशत है जहाँ देश की 5.40 प्रतिशत आबादी रहती है. परन्तु यहाँ देश के कुल सतही पानी का 1.16 प्रतिशत और भूगर्भ जल का केवल 1.70 प्रतिशत हिस्सा इस प्रदेश में उपलब्ध है.

प्रदेश में मानसूनी वर्षा दो-तीन महीने ही होती है. यहाँ पानी के लिए मुख्यतः कमजोर बरसात पर ही निर्भर रहना पड़ता है. प्रदेश का एक तिहाई हिस्सा रेगिस्तान है जबकि 30 प्रतिशत अन्य हिस्सा अर्द्ध शुष्क है. इसका अर्थ यह हुआ कि प्रदेश का करीब दो तिहाई हिस्सा अधिकतर सूखा ही रहता है.

आज हालत ये है कि पानी की मांग और आपूर्ति में अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है जबकि उसकी उपलब्धता हमेशा अनिश्चित बनी रहती है. भूजल के स्टार के लगातार नीचे गिरते जाने से पानी की गुणवत्ता खराब होती जा रही है और वह पीने योग्य नहीं रह पा रहा है. ऐसी हालत में पानी का बंटवारा भी गैर बराबरी का हो गया है. शहरी हैसियत वाले वर्ग पानी का बड़ा हिस्सा उड़ा ले जाता है जबकि गावों और निम्न वर्ग के लोगों को पानी की सबसे अधिक मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.

अपनी परंपरागत जल संरक्षण की विरासत को भुला देने का नतीजा यह हुआ है कि हमारे सभी पारंपरिक जल स्रोत नष्ट हो गए. उन्हें बचाने के हाल ही में हुए सभी प्रयास इसलिए कारगर नहीं हो सके क्योंकि हमने पारंपरिक ज्ञान और बुद्धि से जो सीखा उसे नई नीतियों में शामिल नहीं किया. अभी तक हम पानी के प्रति अपना सोच स्पष्ट नहीं कर पाए हैं इसिलिए सरकारें ऐसे उद्यम ही करती रहती हैं जिनमें पानी का भारी उपयोग होता हो – चाहे वह कृषि का क्षेत्र हो, औद्योगिक क्षेत्र हो या पर्यटन मनोरंजन का क्षेत्र हो.

वास्तव में हम पानी की और नतीजन खुद अपनी तबाही करने को उतारू लगते हैं. राजस्थान की पहली जरूरत पीने का पानी है. मगर उसके लिए 2015 में एक बिलियन क्युबिक मीटर (बीसीएम) पानी की ही जरूरत होगी जबकि कृषि के लिए कुल 40 बीसीएम पानी की जरूरत होगी. क्या रेगिस्तानी राजस्थान के नीतिकारों के लिए यह समझदारी की बात है कि वे फिर भी कृषि को बढ़ावा देते रहें और यहाँ की प्रकृति के विरुद्ध जाते रहें या समझदारी की बात यह है कि वे ऐसी नीतियां बनावें जो इस भूभाग की परिस्थितियों के अनुरूप हों. यह समझदारी किताबों से नहीं आती. हमारे विश्वविद्यालय भी ये समझदारी नहीं सिखाते. राजनैतिक प्रक्रिया के अभाव में और एकाधिकार वाले राजनीतिक दलों के प्रभुत्व के कारण धरती से जुड़े लोग सरकारी व्यवस्था से दूर धकेल दिए जाते हैं.

व्यवहारिक ज्ञान सिखाता है कि हम यह बात नहीं भूल जाएँ कि पिछले पचास-साठ वर्षों के इतिहास में राज्य में केवल पांच-छः वर्ष ही ऐसे गुजरे हैं जब उसका कोई भूभाग सूखे से प्रभावित न रहा हो. यह भी हमारा अनुभव है कि हमें सतही जल के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भर रहना पड़ता है और सारे आपसी समझौतों के बावजूद वे हमारे हक का पानी नहीं देते. उनकी अपनी राजनैतिक मजबूरियां हैं. हमें यह भी जानकारी होनी चाहिए कि जिस प्रकार से शहरों का अनंत फैलाव हो रहा है और औद्योगीकरण के लिए हम उतावले हो रहे हैं उससे पानी की उपलब्धता और आपूर्ति के बीच खाई बढती ही नहीं जा रही है बल्कि पानी उपयोग कर्ताओं तक पहुंचाने का खर्च तेजी से बढ़ता जा रहा है.

नीतियाँ बनाते हुए हमारे नीति निर्माताओं की बुद्धि यह सब क्यों नहीं देखती. उनके सामने सारे आंकड़े मौजूद है. वे जानते हैं कि सतही पानी के अभाव में हमारी निर्भरता भूजल पर लगातार बढती जा रही है. भूजल जितना रीचार्ज होता है उससे अधिक पानी का दोहन हो रहा है यह बात भी सरकारी अमला खुद बताता रहता है. फिर उस तरह के उपाय क्यों नहीं होते जिनसे पानी की उपलब्धता के साथ सामंजस्य बिठाया जा सके? क्यों पानी की मांग बढाने वाले अपने उपक्रमों पर कोई अंकुश लगता है?

विकास के नाम पर जो कुछ आज हो रहा है वह हमारे विनाश का कारण बनता जा रहा है. हम बड़ी-बड़ी टाउनशिप बना लेंगे, बड़े-बड़े औद्योगिक क्षेत्र बना लेगे, मनोरंजन के नाम पर वाटर पार्क बना देंगे, और किसानों के नाम पर खेती का विस्तार करते जायेंगे मगर इन सब के लिए पानी कहाँ से लायेंगे? पानी फेक्टरियों में पैदा नहीं होता. उसके लिए तो प्रकृति पर ही निर्भर रहना पड़ेगा. जब राज में बैठे लोग प्रकृति को समझेंगे और जमीनी हकीकतों से रूबरू होंगे तभी विनाश की तरफ बढ़ते हमारे कदम रुक सकेंगे.

(यह आलेख मासिक पत्रिका 'प्रेस वाणी' के अप्रेल 2010 के अंक में छपा)

Monday, May 3, 2010

बेमिसाल गायन - जीवन











-राजेंद्र बोड़ा

जुथिका रॉय उन महान कलाकारों में से हैं जो न केवल अपनी कला की बुलंदियों पर पहुंचे बल्कि अपने जीवन को भी ऐसे जिया जिससे प्रेरणा ली जा सके. अपनी मीठी आवाज के साथ सरल और सौम्य व्यक्तित्व वाली गायिका जुथिका रॉय ने 20 अप्रेल को अपने जीवन के 90 बसंत पूरे कर 91 वें वर्ष में प्रवेश किया. उन्होंने अपना जन्म दिन जयपुर में सुधि संगीत रसिकों के बीच मनाया. जयपुर के एक अनौपचारिक समूह 'सुरयात्रा' ने उन्हें विशेष तौर पर जयपुर आमंत्रित किया था. बीते युग के बहुत कम संगीत सितारे आज हमारे बीच हैं. मगर नई विज्ञापनी चकाचौंध में वे बिसराए हुए ही रहते है. 'सुरयात्रा' समूह बीते युग के ऐसे कलाकारों को याद करता है, उन्हें बुलाता है और स्नेह से भावभीना सम्मान करता है. भावना यही रहती है कि उस कलाकार को अपने जीवन की सांध्य बेला में लगे कि वे भुला नहीं दिए गए हैं. आज भी उनके चाहने वाले उन्हें इज्जत बख्शने वाले मौजूद हैं. कलाकार को मिली यह ख़ुशी ही सुरयात्रा के हमराहियों की थाती होती है.

जुथिका रॉय तीन दिन जयपुर में रही. रविवार की शाम उनका भव्य सम्मान समारोह हुआ. बीते युग की इस गायिका की यात्रा और उनके सम्मान समारोह के लिए 'सुरयात्रा' ने किसी प्रायोजक की मदद नहीं ली थी. 20 तारीख को सुरयात्रियों ने उनका जन्म दिन मना कर उन्हें कोलकाता के लिए विदाई दी.

वे जब सात बरस की थीं तभी से उन्होंने गाना शुरू कर दिया था और मात्र 13 बरस की उम्र में उन्हें आकाशवाणी के कोलकोता केंद्र से गाने का मौका मिला. 1933 में क़ाज़ी नजरुल इस्लाम के निर्देशन में उनकी दो गीतों की रिकार्ड बनीं, परन्तु वह टेस्ट रिकार्ड से आगे नहीं बढ़ पायी. 1934 में ग्रामोफोन कंपनी में ट्रेनर के पद पर आये कमल दासगुप्ता ने रिजेक्ट की हुई टेस्ट रिकार्ड सुनी और नए सिरे से उन्हें रिकार्ड करवाया और जुथिका रॉय पहली बार रिकार्ड के जरिये लोगों के सामने आयीं. जुथिका रॉय ने सुरयात्रा की बैठक और सम्मान समारोह में अपने गायन जीवन के कई आत्मीय प्रसंगों को याद किया. जुथिका जी ने अधिकतर भजन ही गाये. उनके गाये मीरा के भजन पुरानी पीढ़ी के लोग आज भी घंटो सुनते हैं. महात्मा गांधी, पंडित जवाहर लाल नेहरु, सरोजिनी नायडू और मोरारजी देसाई जैसे नेता भी उन लाखों लोगों में शामिल थे जो जुथिका रॉय को सुनना पसंद करते थे. एक बार वे जब हैदराबाद में एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने गयी हुई थी कि सुबह सुबह उन्हें बताया गया कि सरोजिनी नायडू उन्हें सुनना चाहती हैं और वे उस गेस्ट हाउस में आ रहीं है जहां वे ठहरी हुई हैं. छोटी उम्र की जुथिका के लिए यह यादगार क्षण था.

नायडू ने जुथिका से भजन सुने और खूब आशीर्वाद दिया. उन्होंने बताया की बापू भी जुथिका के गायन को बहुत पसंद करते हैं और पूना जेल में जब वे थे तब वहां उसके भजनों के ग्रामोफोन रिकार्ड रोज सुनते थे. नायडू ने जुथिका से पूछा की क्या वह गाँधी जी से मिली है? फिर कहने लगी तुम गाँधी जी से जरूर मिलना. मगर जुथिका जी से गांधी जी से मिलना बहुत बाद में हुआ जब वे कलकत्ते में सांप्रदायिक सदभाव स्थापित करने आये और बेलियाघाटा में ठहरे थे. जुथिका, उनके पिता, माँ और चाचा गांधी के दर्शन करने सुबह सुबह वहां पहुंचे जहाँ गांधीजी ठहरे हुए थे. उन्होंने अखबार में पढ़ा की गांधी जी बहुत व्यस्त है और किसी से नहीं मिलेंगे. सुबह छः बजे बापू टहलने जाते है. जुथिका के परिवार ने सोचा सुबह जब बापू टहलने निकलेंगे तब उनके दर्शन कर लेंगे. मगर वे जब वहां पहुंचे तो पता चला की गांधी जी सैर करके वापस लौट भी चुके है. बाहर गांधी के दर्शनों के लिए बड़ी भीड़ थी और बारिश हो रही थी. जब उन्होंने चौकीदार से कहा कि उन्हें गांधी जी से मिलना है तो उसने यह कह कर उन्हें अन्दर नहीं जाने दिया कि उसे आदेश हैं कि किसी को भी अन्दर नहीं जाने दूं. जब चौकीदार टस से मस नहीं हुआ तो जुथिका के चाचा जो थोड़े तेज तर्रार किस्म के इंसान थे चौकीदार से अधिकारपूर्ण बोले : “गांधी जी से जाकर बोलो कि जुथिका आयी है”. चौकीदार भभकी में आ गया और अन्दर चला गया. थोड़ी देर में वे क्या देखते हैं कि आभा और मनु तथा कुछ और लोग छाते लिए हुए बाहर आ रहे है. वे आये और जुथिका के परिवार को अन्दर ले गए. अन्दर उन्हें तौलिया दिया गया कि वे भीगे हुए शरीर को पोंछ लें. गांधी जी दूसरे कमरे में थे. उनका उस दिन मौन व्रत था. किसी ने आ कर कहा कि जुथिका और उनकी माँ अन्दर जाकर गांधी जी से मिल सकते है. लगभग 64 साल पुरानी यह घटना जुथिका जी के स्मृति पटल पर आज भी ताजा है. "मैंने अन्दर प्रवेश किया तो देखा कि बापू केवल धोती पहने नंगे बदन बैठे हैं और एक कागज़ पर कुछ लिख रहे है. कागज उनके घुटने पर रखा है जिसके नीचे आधार के लिए कुछ नहीं है. बापू ने सर उठा कर मुस्कराते हुए हमारी और देखा. उनके चेहरे पर जो आत्मीयता थी आभा थी वह आज भी मुझे याद है. मुझे नहीं लगा कि में उनसे पहली बार मिल रही हूँ. मुझे लगा जैसे वे तो मेरे ही कोई अपने हैं. मैंने उन्हें जाकर प्रणाम किया और उन्होंने मेरे सिर पर हाथ हाथ रख कर आशीर्वाद दिया. उन्होंने कागज़ पर लिख कर मेरे बारे में पूछा. मनु उनके लिखे को पढ़ कर सुनाती थी. मनु ने कहा गांधी जी साथ के कमरे में अब स्नान करने जा रहे है. आप यहीं बैठे कुछ भजन गाईये. गाँधी जी नहाते रहे और में बिना किसी संगतकार के मीरा के भजन गाती रही. नेने कोई पांच छः भजन उस समय गाये होंगे. बाद में गांधी जी ने फिर लिख कर दिया कि उनकी प्रार्थना सभा में मैं चालू और वहां भजन गाऊँ. बाद में गांधी जी के साथ की कार में मैं बापू के प्रार्थना स्थल गयी जहां गाँधी जी की सांप्रदायिक सदभाव बनाए रखने की अपील के बाद मेरा गान हुआ और उसके साथ ही सभा समाप्त हुई."

प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु भी जुथिका के गायन को पसंद करते थे. उन्होंने एक बार जुथिका रॉय को अपने सरकारी आवास पर बुलाया और उनसे भजन और गीत सुने. " नेहरूजी चप्पल खोल कर जमीन पर बैठे. उन्होंने अपनी टोपी उतार के रख दी और दो घंटे तक मेरा गान सुनते रहे.

सन 1920 में हावड़ा जिले के आमता गाँव में जन्मी जुथिका रॉय ने 356 से अधिक गीत गाये. इनमें से 214 हिंदी में, जिनमें अधिकतर भजन थे, 133 गीत बांग्ला में और दो तमिल में गाये. हिंदी के भक्ति गीतों में कुछ इस्लामिक नातें भी हैं तो कुछ होली और वर्षा गीत हैं. उन्होंने दो हिंदी फिल्मों – ‘रत्नदीप’ और ‘ललकार’ - में चार गीत गाये. जुथिका रॉय ने बावजूद बड़े आफर के फिल्मों में गीत नहीं गाये. ये दो अपवाद इसलिए हुए कि 'रत्नदीप' के लिए वे जाने माने निर्देशक देवकी बोस को ना नहीं कर सकी जिन्होंने कहा कि उन पर कोइन बंदिश नहीं होगी और वे अपनी पसंद से गायेंगी. दूसरी फिल्म 'ललकार' के निर्माता गीतकार पंडित मधुर थे. जुथिका रॉय ने मीरां के के अलावा जो गीत गाये वे अधिकतर पंडित मधुर के ही लिखे हुए थे इसलिए वह उन्हें भी इनकार नहीं कर सकी.

जुथिका रॉय का परिवार रामकृष्ण मिशन से जुड़ा हुआ था. जुथिका और उनकी दो अन्य बहनों ने 12 बरस का ब्रह्मचर्य का व्रत लिया. बहनों ने 12 वर्ष व्रत निभा कर बाद में शादी कर ली मगर जुथिका रॉय ने यह व्रत आजीवन के लिए अपना लिया. उनके गानों को संगीतबद्ध अधिकतर बंगाल के प्रमुख संगीतकार कमल दासगुप्ता ने किया. वे जुथिका जी से विवाह करना चाहते थे मगर इसी व्रत के कारण यह विवाह नहीं हो सका.

सन 1939 में उनके गाये मीरां और कबीर के भजनों ने जो जबरदस्त लोकप्रियता हासिल की वह आज भी बरकरार है. इसी साल उन्होंने पहली बार सार्वजनिक प्रदर्शन मुंबई में दिया और तब से उन्होंने कभी पीछे मुड कर नहीं देखा. 1972 में उन्हें पद्मश्री का अलंकरण दिया गया. सन 2002 में जुथिका रॉय की बांग्ला में आत्मकथा "आज ओ मोने पड़े" का प्रकाशन हुआ. इसी का गुजराती संस्करण "चुपके चुपके बोल मैना' का प्रकाशन 2008 में हुआ.

(यह आलेख जनसत्ता के 2 मई के रविवारी परिशिष्ट में छपा)

Friday, April 23, 2010

दास्तान 'गर्म हवा' की




राजेंद्र बोड़ा

'गर्म हवा' उर्दू की जानी-मानी लेखिका इस्मत चुगतई की एक अप्रकाशित लघु कहानी पर आधारित फिल्म है जिसका फ़िल्मी तर्जुमा मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी ने शमा जैदी के साथ मिल कर किया. कैफ़ी आज़मी ने फिल्म के संवाद भी लिखे. यह मैसूर श्रीनिवास सथ्यू - एम. एस. सथ्यू - की पहली फीचर फिल्म थी जो 1973 में रिलीज हुई.

इस्मत चुगतई की मूल कहानी का नायक एक स्टेशन मास्टर है जो देश के बंटवारे के चक्र में फंस गया है. फिल्म की स्क्रिप्ट में नायक को चमड़े के जूते बनाने वाली फेक्ट्री के मालिक के रूप में चित्रित किया है.

छः जुलाई 1930 में मैसूर में जन्मे सथ्यू बीएससी की पढाई बीच में छोड़ कर अपनी किस्मत सिने जगत में आजमाने के लिए बम्बई आ गए. बम्बई में 1952-53 में फ्रीलांस एनिमेटर के रूप में काम किया. मगर बाद में चार बरस तक बेरोजगारी में गुजारे. उन्हें सबसे पहला तनख्वाह वाला काम फिल्मकार चेतन आनंद के सहायक के रूप में मिला. फिल्म 'किनारे किनारे' में वे चेतन आनंद के सहायक नेर्देशक बने. बाद में स्वतंत्र रूप से कला निर्देशन करने का काम भी उन्हें चेतन आनंद ने ही दिया. फिल्म थी 'हकीकत', भारत चीन युद्ध पर बनी एक सच्ची फिल्म. सथ्यू को इस फिल्म के श्रेष्ठ कला निर्देशन के लिए वर्ष 1964 का 'फिल्मफेयर पुरस्कार' मिला.


सथ्यू ने हिन्दुस्तान थियेटर, ओखला, हबीब तनवीर, कन्नड़ भारती तथा दिल्ली के अन्य थियेटर समूहों के लिए डिजाइनर तथा निर्देशक के रूप में भी काम किया. फिल्मों में उन्होंने कला निर्देशन के अलावा केमरामेन, स्क्रीन राइटर, निर्माता, और निर्देशक के रूप में अपनी प्रतिभा दिखाई. मगर उनका सर्वश्रेष्ठ काम आज भी 'गर्म हवा' ही माना जाता है.

'गर्म हवा' आज क्लासिक फिल्म मानी जाती है, जिस पर 'भारतीय सिनेमा' को गर्व है. 'इंडिया टाइम्स' वेब पोर्टल ने देश की 25 सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में इस फिल्म की गणना की है. फिल्म देश के बंटवारे के बाद उत्तरी भारत के एक माध्यम वर्ग के मुस्लिम परिवार की कहानी है जिसका नायक अपने सभी रिश्तेदारों के पाकिस्तान चले जाने के बावजूद इसी देश में रहने का फैसला करता है. फिल्म एक ऐसे मुस्लिम परिवार की परीक्षा और पीड़ा प्रकट करती है जिसे देश की बहुसंख्य हिन्दू आबादी संदेह की नज़र से देखती है, उसके साथ साम्प्रदायिक द्वेष रखती है, उसका आर्थिक बहिष्कार करती है.

'गर्म हवा' पिछली शताब्दी के सातवें दशक 'मुख्यधारा सिनेमा' का विकल्प प्रस्तुत करते हुए शुरू हुए 'न्यू-वेव' सिनेमा की शुरूआती फिल्मों में से एक है. 'न्यू-वेव' सिनेमा की फिल्मों ने 'मुख्यधारा' की फिल्मों के उस दुष्चक्र को तोड़ने का प्रयास किया जिसमें परंपरागत प्रेम कहानी होती थी, भोंडी कामेडी होती थी और निरर्थक हिंसा होती है.

देश के मुस्लिम नागरिकों के सरोकारों और उनकी पीड़ा को दर्शाने वाली यह पहली सच्ची - आनेस्ट - फिल्म थी. श्याम बेनेगल ने ऐसे ही मुस्लिम सरोकारों वाली सच्ची फिल्म 'मम्मो' बहुत बाद में बनाई. यह फिल्म तत्कालीन राजनैतिक और सामाजिक स्थितियों से दर्शकों को रूबरू कराती है. भारतीय सिनेमा में ऐसा पहली बार हुआ था जिसने दर्शकों की संवेदना को झकझोरा और मुस्लिमों की तकलीफों को मानवीय नजरिये से देखा.

अपनी फिल्म के बारे में सथ्यू कहते हैं : “What I really wanted to expose in 'Garm Hawa' was the games these politicians play...How many of us in India really wanted the partition. Look at the suffering it caused”.

सन 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध के दो वर्ष बाद रिलीज हुई यह फिल्म अपने कथ्य में ताकत पुरजोर तरीके से उन आदर्शों को पुनर्स्थापित करती है कि इस देश पर मुसलमानों का भी उतना ही हक है जितना हिन्दुओं का.

फिल्म का विषय ही ऐसा था कि वह हमेशा ही विवादों से घिरी रही. हम भारत के लोग वैसे तो अपनी सहिष्णुता के डंके बजाने में कभी पीछे नहीं रहते मगर जब भी ऐसा कोई मौका आता है जम हमें अपनी इस महानता का परिचय देना होता है हम असफल रहते हैं.

बावजूद इसके कि फिल्म सभी वर्गों द्वारा एक क्लास्सिक मानी गयी और समीक्षकों की उसे खूब सराहना मिली वह बड़े पैमाने पर सिनेमाघरों में नहीं पहुँच सकी.

सथ्यू ने जब 'गर्म हवा' बनाई तब वे इस क्लासिक को बनाने के लिए पूरी तरह तैयार थे. वे चेतन आनंद जैसे सिने काव्य रचने वाले फिल्मकार के सहायक के रूप में काम कर चुके थे. मैसूर में छः जुलाई 1930 को जन्मे मैसोर श्रीनिवास सथ्यू - एम. एस. सथ्यू - ने 1952 में कालेज में बीएससी की पढाई बीच में छोड़ कर बम्बई की अनजान फ़िल्मी दुनिया में कुछ कर दिखाने को पहुच गए. बम्बई की फ़िल्मी मायानगरी में उन्होंने फ्रीलांसर के रूप में 1952-53 में रेखाचित्र बनाने के काम से शुरुआत की. मगर इसके बाद चार साल तक उन्हें बेरोजगारी का सामना करना पड़ा. उन्हें पहला नियमित पगार वाला काम चेतनआनंद के सहायक के रूप में मिला. स्वतंत्र कला निर्देशक के रूप में उन्हें पहला मौक़ा चेतनआनंद ने अपनी फिल्म 'हकीकत' में दिया. और 'हकीकत' के कला निर्देशन के लिए सथ्यू को वर्ष 1964 का 'फिल्मफेयर पुरस्कार' मिला.

'गर्म हवा' उन फिल्मों में से है जो आज क्लासिक मानी जाती है मगर बनने पर जो ठीक ढंग से रिलीज भी नहीं हो पायी. फिल्म देश के विभाजन के बाद एक भले मुसलमान परिवार की त्रासदी की कहानी ही नहीं कहती है बल्कि देश के सामजिक और राजनीतिक माहौल की भी सच्ची दास्तान कहती है अपने इस विषय के कारण 'गर्म हवा' को लेकर हमेशा विवाद उठाये जाते रहे. 1971 में जब सथ्यू खुद की पहली फीचर फिल्म बनाने के इरादे से राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (National Film Development Corporation) से वित्तीय मदद मांगने गए तब 'गर्म हवा' की स्क्रिप्ट लेकर नहीं गए थे बल्कि कोई और कहानी लेकर गए थे. वहां वह प्रस्ताव अस्वीकार हो गया और उनसे कहा गया कि वे कोई और कहानी लायें. उनके पास 'गर्म हवा' की स्क्रिप्ट भी तैयार थी मगर उन्हें भरोसा नहीं था कि सरकारी संस्थान ऐसे विवादस्पद विषय की स्वीकार करेगा. मगर जब निगम ने उन्हें दूसरी कहानी लाने का कहा तो उन्होंने 'गर्म हवा' की स्क्रिप्ट वहां पेश कर दी. आश्चर्यजनक रूप से 'गर्म हवा' फिल्म बनाने के लिए वित्तीय मदद देना मंजूर कर लिया.

जब साम्प्रदायिक मानसिकता रखने वालों को फिल्म के थीम का पता चला तो फिल्म की शूटिंग के दौरान खूब झमेले और हंगामे किये गए. यहाँ तक कि उपद्रवकारियों से बचने के लिए एक नकली कैमरा टीम बनाई गई जो खाली कैमरा चला कर सीन की शूटिंग का ढोंग करती और उपद्रवकारियों को अपनी तरफ उलझाए रखती ताकि फिल्म की वास्तविक शूटिग दूसरी जगह पूरी हो सके.

फिल्म बन कर पूरी हुयी तो सेंसर का झंझट हो गया. फिल्म से साम्प्रदायिक भावनाएं फैलने का अंदेशा जताते हुए सेंसर बोर्ड ने उसे सर्टिफिकेट देने से इनकार कर दिया. सथ्यू अपनी फिल्म का प्रिंट लेकर हर महत्वपूर्ण मंत्री और अधिकारी दिखाते फिरते रहे और फिल्म को सेंसर की अनुमति दिलाने की गुहार लगाते रहे. नौ महीनों की जद्दोजहद के बाद आखिर फिल्म को सेंसर बोर्ड का सर्टिफिकेट मिला.

फिल्म शुरू होने और बन कर पूरी होने में थीं साल का वक्त लगा. फिल्म रिलीज हुई तो उसे खरीददार मिलने मुश्किल हो गए. हर कोई इस विवादास्पद थीम वाली फिल्म से दूर ही भागता रहा. यह सच है कि जिन लोगों ने इस फिल्म को देखा है उनमें से बहुत कम ऐसे होंगे जिन्होंने उसे सिनेमा हाल के परदे पर देखा हो. अधिकतर ने उसे 'दूरदर्शन' पर ही देखा है.

फिल्म रिलीज हुई तब किसी को यह आशा नहीं थी कि फिल्म को हर तरफ से सराहना मिलेगी. मगर ज्यों ज्यों समय गुजरता गया फिल्म के प्रति लोगों का लगाव बढ़ता गया. फिल्म कान्स फिल्म समारोह में सर्वश्रेष्ठ फिल्म को मिलने वाले 'गोल्डन पाम' के लिए नामांकित हुई. ‘गर्म हवा’ अकेडमी के ‘आस्कर’ पुरस्कार के लिए भारतीय एंट्री थी. इधर अपने देश में फिल्म को राष्ट्रीय एकता का राष्ट्रपति पुरस्कार दिया गया. 'गर्म हवा' को 'फिल्मफेयर' के तीन पुरस्कार मिले - कैफ़ी आज़मी को सर्वश्रेष्ठ संवाद लेखन के लिए, कैफ़ी आज़मी और शमा जैदी को संयुक्त रूप से फिल्म की स्क्रिप्ट के लिए और इस्मत चुगताई को फिल्म की कहानी के लिए.

लोगों को जान कर आश्चर्य होगा कि 'गर्म हवा' फिल्म कुल आठ लाख रुपयों में बनी. हमारे देश में मुफलिसी और परेशानिया झेलते हुए बनी फ़िल्में ही क्लास्सिक वर्ग में अधिकतर शामिल हुई है. सथ्यू वामपंथी बुद्धिजीवी फिल्मकार के रूप में जाने जाते हैं. इसलिए स्वाभाविक ही है कि फिल्म में अधिकतर इंडियन पीपल्स थियेटर -इप्टा- से जुड़े थियेटर कर्मियों ने काम किया. पूरी फिल्म बलराज साहनी के कन्धों पर चलती है. उन्होंने बिमल राय की 'दो बीघा जमीन' को अपने अभिनय से कालजयी बना दिया था. सथ्यू की 'गर्म हवा' में वे फिर अभिनय के ऐसे ऊंचे शिखर पर हैं जिसे पाना नामचीन कलाकारों के बस का नहीं है.


कईं लोग 'गर्म हवा' में बलराज साहनी के अभिनय को उनके जीवन का सर्वश्रेष्ठ काम मानते हैं. यह उनकी आखरी फिल्म थी. फिल्म के रिलीज होने के पहले ही 13 अप्रेल 1973 को उनका निधन हो गया. फिल्म की डबिंग पूरी करने के दूसरे ही दिन वे इस दुनिया से चल बसे. फिल्म के लिए उन्होंने जो आखरी डायलाग रिकार्ड किया वह था "कोई इंसान कितने समय अकेला जी सकता है".

फिल्म की एक बड़ी खूबी यह भी है कि ऐसा नहीं हुआ कि बलराज साहनी का किरदार इतना हावी हो गया हो कि अन्य कलाकारों के लिए कुछ करने को ही नहीं हो. फिल्म के हर कलाकार ने चाहे उसकी भूमिका कितनी ही छोटी क्यों न हो पूरी शिद्दत से निभाया है. यहाँ तक कि उस वृद्धा ने जिसका अभिनय से अपने जीवन में कभी वास्ता नहीं पड़ा और जो सथ्यू को आगरा की उस हवेली में ही रहती मिली जहाँ उन्होंने फिल्म को शूट करने का तय किया. उस वृद्धा को बलराज साहनी की माँ के किरदार में लिया गया.

भले ही देश भर के अधिकाँश दर्शकों ने 'गर्म हवा' टेलीविजन पर ही देखी हो और व्यावसायिक सिनेमाघरों को यह फिल्म अपने यहाँ प्रदर्शित करने लायक नहीं लगी हो मगर आज इस फिल्म पर भारतीय सिनेमा को गर्व है. लोकप्रिय वेब साईट 'इंडिया टाइम्स' ने 'गर्म हवा' को अब तक की 25 जरूर देखी जाने वाली फिल्मों की सूची में शामिल किया है.

फिल्मफेयर के समीक्षक ने लिखा था: I do not have the language to describe the beautiful sensitivity or the visuals and the sounds of Gram Hava. And though it is painful, it has a raw strength too. If Ghalib was the singer of political gloom after 1857, this film is the chronicle of robust hope after 1947.

टाइम्स आफ इंडिया ने लिखा: In many ways Garm Hava is the most important film made since independence. Never before has the cinema tackled one of the most sensitive issues of our time - the communal situation - with such courage and incissiveness.

हिन्दुस्तान टाइम्स में छपा : Garm Hava is the most courageous piece of political cinema to be seen here for a long time.

सन्डे स्टैण्डर्ड ने कहा : Garm Hava is one of the most important films made in recent months in this country - in fact one of the most significant movies ever made. It is a film with no false notes no melodramas no overplaying and no gimmicks, but a film which is narrated in an off-the-cuff style.

इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा : It is a film which sets you thinking and this can be said of very few films made in this country. Garm Hava is the most important films of our times . It is not an intellectual film. There is nothing esoteric about it. But it is a filmic experience of great power.

फिल्म वर्ल्ड का मानना था : sathyu achieves world class with this film. Every actor and actress has been cast in the right role and there is nothing that is out of place. Balraj has left this film as a memorial to us and no sensitive person will fail to realise the effort that has gone in making of this film. It is beautiful. Go see it to believe that India can make such films.

मशहूर चरित्र अभिनेता ए के हंगल के शब्दों में :


"गर्म हवा हिन्दुस्तानी भाषा में उनफिल्मों में से एक है जिनमें अधिकृत रूप से संवेदनशीलता के साथ साथ भारतीय जीवन के यथार्थ को भी चित्रित किया गया है. इस फिल्म का विषय भारत-पाक विभाजन के बाद अनुलंबित भारतीय समाज का गंभीर संकट है. जब जब मैं इस फिल्म के बारे में सोचता हूँ तो सबसे पहले मेरे मस्तिष्क में जो बात आती है वह है बलराज साहनी द्वारा मध्यमवर्गीय मुस्लिम व्यक्ति का आगरे में भयावह परिस्थितियों से जूझते एक देदीप्यमान चित्रांकन. फिल्म वस्तुतः इस मुस्लिम व्यक्ति को सच्ची श्रद्धांजलि है जिसने साहस और लम्बे समय तक एक दृढ़ संकल्प के साथ आम नागरिकों की भांति अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया, जबकि उसके और सभी रिश्तेदार पाकिस्तान चले गए पर उसने अपने बल बूते पर ही भारत में रहने का निर्णय लिया.
मेरे ख्याल से यह फिल्म इसलिए बन सकी क्योंकि अनेक धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति एक साथ इसमें काम करने को तैयार हुए और इसके निर्माण में उनहोंने मदद की, उनमें से अधिकाँश इप्टा से सम्बद्ध थे. एम एस सथ्यू ने निर्देशन किया, कैफ़ी आज़मी और शमा जैदी ने इस्मत चुगताई की कहानी पर फ़िल्मी पटकथा लिखी, बलराज साहनी ने मुख्य नायक की भूमिका अदा की, फिल्म की सिनेमेटोग्राफी ईशान आर्य ने किया. ये सब इप्टा के गौरवशाली कलाकार थे. मैंने भी एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की. एन सिन्धी व्यापारी जो कि कराची से आया एक शरणार्थी है फिर भी वह समय के विरुद्ध गतिमान है और बिना सांप्रदायिक पक्षपात के वह मुसलमानों से सहानुभूति रखता है और उसके साथ व्यापार जारी रखना चाहता है.

इस फिल्म से सम्बंधित एक त्रासद घटना भी है जो मुझे आज भी याद है. बलराज साहनी ने इस फिल्म में अपनी अविस्मर्णीय भूमिकाओं में एक भूमिका अदा की और जिस दिन इसे प्रदर्शित किया गया उस दिन बलराज साहनी वहां नहीं थे. फिल्म पर अपना काम ख़त्म करने के बाद उनके तो प्राण पखेरू ही उड़ गए. हमने उनकी मृत्यु का समाचार तब सुना जबकि हम सब कलाकार तेजपाल में एक नाट्य प्रदर्शन के लिए मंच पर जाने ही वाले थे. एक बार फिर प्रदर्शनकारी कलाकारों की अनंतकालीन मान्यता ने कि "शो मस्ट गो आन" हमें मंच पर भेज दिया. और "शो" जारी रहा".

(पिंक सिटी प्रेस क्लब और फिल्म फैन्स सोसायटी की तरफ से 10 अप्रेल 2010 को गर्म हवा फिल्म के प्रदर्शन के अवसर पर दिया गया वक्तव्य)

Sunday, April 4, 2010

हमारे भाग्य विधाता

राजेंद्र बोड़ा

हर बार की तरह इस बार भी हुआ. विधान सभा के बजट सत्र का शुक्रवार आखरी दिन था. सत्र के अनिश्चित काल के लिए स्थगित होने के थोड़ी देर पहले विधानसभा अध्यक्ष, मुख्यमंत्री, मंत्रियों और विधायकों के वेतन - भत्तों में यकायक बड़ी बढ़ोतरी करने का विधेयक और वह तुरत - फुरत में पास हो गया. सबके वेतन पांच - पांच हजार रुपये माहवार बढ़ गए. विधायकों के निर्वाचन भत्ते में दस हजार रुपये माहवार अलग से बढ़ गए. उन्हें एक कर्मचारी रखने की सुविधा थी जिसकी जगह विधायकगण अब बीस हजार रुपये माहवार नकद ले सकेंगे. इन निर्वाचित जनसेवकों - विधानसभा अध्यक्ष, मुख्यमंत्री, मंत्री और राज्य मंत्री उपाध्यक्ष मुख्य सचेतक उप मुख्य सचेतक तथा प्रतिपक्ष के नेता - द्वारा अपने मेहमानों का आतिथ्य करने के लिए मिलने वाले भत्ते में भी पांच से छः हजार रुपये माहवार बढ़ा दिए गए. घरों को सजाने और बिजली के बढे हुए बिल भरने की भी व्यवस्था कर दी गई और रेल में यात्रा करने के लिए साल भर में एक लाख रुपये खर्च नहीं हो सकेंगे तो वह राशि लेप्स नहीं होगी उसका उपयोग अगले वर्ष में भी किया जा सकने का इंतजाम करदिया गया. भूतपूर्व विधायकों की पेंशन बढ़ा कर दुगनी कर दी गई.

ऐसा उस प्रदेश में हुआ जहाँ की लगभग आधी आबादी गरीबी की सीमा रेखा से नीचे जीवन निर्वाह करती है. जनता के नुमाइंदों के वेतन भत्तों में हुई बढ़ोतरी की राशि इस प्रदेश के लोगों की ‘प्रति व्यक्ति आय’ से दुगने से अधिक है. यह उस समय हुआ है जब अकाल सिर पर है और पीने के पानी की त्राहि-त्राहि गर्मियों के शुरू में ही होने लगी है.

ऐसे में यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या जनता के नुमाइंदों को उस समय अपने वेतन भत्ते बढाने का कोई नैतिक अधिकार है जब प्रदेश का आमजन को दो जून रोटी का जुगाड़ करने में मुश्किलें आ रही हैं. क्या जनता के लिए काम करने का दम भरने वाले निर्वाचित विधान सभा सदस्यों को वे सभी सुविधाएं पाने का हक बनता है जो आमजन को मुहैया नहीं है? मुख्य मंत्री अशोक गहलोत, जिन्होंने ये वेतन भत्ते बढाने का प्रस्ताव पास कराया. ने पिछले दिनों एक सार्वजनिक सभा में अपने मन की पीड़ा व्यक्त की थी. उनका कहना था कि विवाह समारोहों में इन दिनों जितना खर्चा होता है उसे देखकर उन्हें 'लज्जा' आती है. आज यही सवाल उनसे ही पूछा जा सकता है कि गरीब प्रदेश जो आकंठ उधारी में डूबा है और जो उधार लेकर सरकारी अमले की तनख्वाओं, भत्तों तथा पेंशन की व्यवस्था करता है क्या उसके लिए क्या ऐसा प्रस्ताव लेकर आना लज्जाजनक नहीं लगा?

गहलोत मन से गांधी को अपना आदर्श मानते हैं. आज जब कांग्रेस में महात्मा गांधी के नामलेवा चंद लोग ही बचे हों तब गहलोत जैसे प्रमुख नेता का गांधी के आदर्शों की बात करना आशा की किरण नज़र आता है. इसीलिए इस प्रदेश के लोग उन्हें राजस्थान का गाँधी कह कर गर्व करते हैं. गांधी के आदर्शों की बात करना और उन पर व्यवहार करना दो अलग चीजें हैं. किसी के व्यवहार से ही इतिहास उसे तोलता है न कि उसने क्या कहा इससे. गहलोत गाँधी जी की वह उक्ति बार बार दोहराते हैं जिसमें बापू ने कहा था कि वे एक तिलस्म देते हैं. जब कभी तुम अनिर्णय की स्थिति में हो तो इस देश के गरीब की शक्ल अपने ध्यान में लाना और सोचना कि उसके लिए क्या ठीक रहेगा. विधानसभा में यह प्रस्ताव लाते हुए उन्होंने किन्हीं मौन क्षणों में अपने आप से पूछा कि क्या मंत्रियों - विधायको के वेतन भत्ते बढ़ा देने से राजस्थान के गरीब की हालत सुधर सकेगी?

ऐसी स्थिति में गाँधी क्या करते इसका उदाहरण हमारे सामने मौजूद है. जयपुर शहर में तीस के दशक में जब पहला खादी भण्डार खुला तब उसके प्रबंधक थे कर्पुर चंद पाटनी. गर्मियों में खादी भण्डार में एक टेबल पंखा खरीद कर लगा लिया गया. जब भण्डार का लेखा ब्यौरा केंद्रीय संगठन को भेजा गया जिसके अध्यक्ष खुद गाँधी जी थे तब बापू के हाथ की लिखी चिट्ठी आयी जो पाटनी परिवार के पास आज भी सुरक्षित होगी. उस पत्र में गांधी जी ने कहा कि खादी के काम में लगे हम लोग गरीब की मदद के लिए समर्पित हैं. क्या उन सभी गरीब लोगों के घरों में बिजली का पंखा आ गया है जिनके लिए हम काम कर रहे हैं? ऐसा जब हो जाए तब हमें यह सुविधा लेने के बारे में सोचना चाहिए उससे पहले नहीं. पता नहीं गहलोत गांधीजी के इस आदर्श को कितनी अहमियत देते हैं.

एक तकनीकी सवाल और है. कानून और न्यायविदों के पास इसका जवाब नहीं होगा क्योंकि वे किताबों में लिखे पर ही चलते हैं. वैधानिक व्यवस्थाओं की किताबों के अनुसार विधायक गण विधि निर्माता हैं. वे कानून बनाते हैं. अतः वे अपने वेतन भत्ते बढाने का कानून भी बना सकते हैं और बनाते हैं. कानून बनाने की शक्ति उन्हें "हम भारत के लोग", जिनमें हमारा संविधान सार्वभौम सत्ता निहित्त करता है, अपना प्रतिनिधि बनाकर देते हैं. हम भारत के लोग" मतदाता के रूप में अपने प्रतिनिधियों का भविष्य निर्धारित करते हैं. फिर किस तरह हमारे ये प्रतिनिधि अपने वेतन - भत्तों के बारे में अपना भविष्य खुद निर्धारित कर लेते हैं यह सवाल है जो विधि से अधिक नैतिकता से जुडा हुआ है. क्या यह उचित न होता कि मंत्रियों विधायकों के वेतन-भत्तों के बारे में फैसला जनता करती. विधायिका में इसकी व्यवस्था है कि किसी विधेयक को जनमत जानने के लिए परिचालित किया जा सकता है. कई विधेयकों पर ऐसा होता भी है. फिर विधायको के वेतन भत्तों का विधेयक जनमत जानने के लिए कभी क्यों नहीं भेजा जाता.

इस विधेयक के जरिये भूतपूर्व विधायको की पेंशन में बढ़ोतरी का प्रबंध किया गया है. जो भूतपूर्व विधायक हैं उनमें से अधिकतर वे हैं जिन्हें मतदाता अस्वीकार कर चुका है. मतदाता द्वारा अस्वीकृत नुमाइंदे को किस प्रकार राजकोष से पैसा दिया जा सकता है यह विधि और नैतिकता दोनों का सवाल है.

(जनसत्ता के अप्रेल 5, 2010 के अंक में संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित)

Friday, April 2, 2010

ख़बरों का कारोबार करने वालों पर पाठक कब तक भरोसा करेंगे ?

राजेंद्र बोड़ा

ऐसे कौन से कामकाज हैं जिन पर लोग सबसे कम भरोसा करते हैं ? इस प्रकार की जानकारी पाने के लिए पश्चिमी देशों में लगातार सर्वे होते रहते हैं. पत्रकारिता की साख लोगों में कितनी है यह जानने के लिए यदि हम इन सर्वे के परिणामों पर नज़र डालें तो पाते हैं कि राजनेता और पत्रकार अपनी साख के मामले में लोगों की राय में सबसे निचली पायदानों पर आते हैं. इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि पत्रकारों के काम पर लोगों का सबसे कम भरोसा है. परन्तु यह सोच पश्चिम का है. यह सच है कि हमारे देश में भी राजनेताओं की साख बहुत बुरी तरह गिरी लगती है, मगर पश्चिम के लोगों की पत्रकारों के प्रति सोच भारत के लोगों की सोच से मेल नहीं खाती. हमारे देश में आज भी लोग अख़बारों के लिखे पर भरोसा करते हैं. जब भी किसी को अपनी बात पर दूसरे को भरोसा दिलाना होता है तो वह यही जुमला आम तौर अपनाता है "अखबार में छपा है." अखबार में छपी बात को अटल सत्य की तरह हमारे लोग स्वीकार करते हैं. पाठकों का यही भरोसा है जिसे बनाए रखना अखबारों में काम करने वाले पत्रकारों के लिए आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती है. आज जब राजनेताओं पर से लोगों का भरोसा उठता जा रहा है तब लोग स्वाभाविक रूप से अखबारों और पत्रकारों की ही तरफ़ देखते हैं कि वहां उनके सरोकारों की बात होगी. लोगों के सरोकारों के लिए पैरवी करने करने वाली संस्था के रूप में ही पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मानी गयी है. लोकतंत्र के सरोकार पत्रकारिता में खुल कर नज़र आए इसके लिए जरूरी है पत्रकारों में अपने समय के इतिहास, राजनीति, और अर्थ जगत की गहरी समझ हो और उनमें अपने पेशे की साख बनाए रखने की ईमानदारी हो.

कोई भी व्यक्ति कागज और स्याही के लिए अखबार नही खरीदता. अखबार खरीदा जाता है उसमें क्या छप रहा है उसके लिए. तो अखबार का असली कच्चा माल होती है सूचना - इन्फोर्मेशन- जो समाचारों के रूप में हो सकती है, चित्रों के रूप में हो सकती है या विचारों के रूप में हो सकती है. ये सारी चीजें पाठक की समझ बढ़ाने में मददगार होती है. इसी कारण अपने सारे उद्यमी और कारोबारी स्वरुप और बाजार का होते हुए भी अखबार बाजार से ऊपर होता है.

कभी यह भी पूछा जाने लगा कि क्या अख़बार लोगों की मूलभूत जरूरत है ? क्या रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मूल जरूरत वह होता है ? यह भी कहा जाता रहा है कि आम आदमी की मूलभूत जरूरतों के पूरी होने के बाद अखबार का नंबर आता है. मगर पत्रकारिता के समर्थकों का यह जवाब होता रहा है कि क्योंकि लोकतंत्र में आम नागरिक की मूलभूत आवश्यकताएं पूरी हों उसके लिए जरूरी है कि विधायिका में अच्छे और काबिल लोग चुन कर जाएँ. अखबार नागरिकों को सही जानकारी देकर तथा लोकतंत्र के सभी अंगों की ख़बर रख कर उन्हें सही प्रतिनिधि चुनने में मदद करते हैं. सही निर्वाचन से ही सुशासन आता है जो लोगों की मूलभूत जरूरतों को पूरी करने में ईमानदारी से काम करता है. इसलिए अखबार लोकतंत्र में मूलभूत आवश्यकताओं से भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं क्योंकि वे इन जरूरतों को पूरी कराने में भागीदार बनते हैं.

आज़ादी के चार-पांच दशक तक, कारोबारी होते हुए भी, अखबारों ने सीमित साधनों में भी अपनी यह भूमिका बखूबी निभाई. आज खुले बाज़ार के दौर में अखबारों के साधन खूब बढ़ गए हैं और उनके पाठकों की संख्या में भी बड़ा इजाफा हुआ है. मगर अब ऐसा लगने लगा हैं कि अख़बारों के सामाजिक सरोकार कहीं खोते जा रहे हैं.

इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत में अखबार अपने जन्म से ही कारोबारी रहा है. भारत में छपने वाले पहले अखबार का नाम ही Calcutta Journal Advertiser था जिसे एक अंग्रेज जेम्स ऑगस्ट हिक्की ने निकाला था. इस पहले ही अखबार का उद्येश्य था विज्ञापन से कमाना. लेकिन इसी अखबार ने ईस्ट इंडिया कम्पनी के भ्रष्टाचारों को उजागर करने की मुहिम छेडी और अपने सामाजिक सरोकारों का परिचय दिया. इसके बाद भी हम देखते हैं कि सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचारों, कमजोरियों, खामियों और जन-हित से जुड़े मुद्दों पर भारतीय अख़बारों ने अपना सरोकार लगातार बनाये रखा. अपनी इसी भूमिका के कारण अख़बार समाज की आँख और कान बन गए. आम जन अखबार की निगाह से ही दुनिया को देखते हैं उसे समझने की कोशिश करते हैं और अपने विचारों को पुष्ट करते हैं. अखबार विचार नहीं बनाते. दुनिया भर में इस बात को जांचने के लिए बार-बार हुए सर्वे के नतीजों में यही बात सामने आयी है कि अखबार पाठकों के विचार नहीं बदल सकते , खासकर राजनैतिक विचार. हाँ यह जरूर होता है कि अपने विचारों के नज़दीक वाला अखबार विशिष्ट समूह की पसंद बन जाता है.

अखबार को अधिक से अधिक पाठक चाहिए होते हैं इसलिए उसका किसी एक विचारधारा से जुड़ना उसके हित में नहीं होता. ऐसा जुडाव उसकी प्रसार संख्या सीमित करेगा. इसलिए सभी अखबारों का यही प्रयास होता है कि वे अपना चेहरा निष्पक्ष बनाये रखें जिससे वे सभी के लिए ग्राह्य हो सकें.

अखबार का निष्पक्ष होना पाठकों के बाज़ार में अपनी पहुँच को विस्तार देने के लिए जरूरी होता है. जिस प्रकार अखबारी दुनिया का विकास हुआ उसमे निष्पक्षता अख़बार की पहली शर्त मान ली गयी. इसी विकास के दौर में अख़बार आम-जन का प्रतिनिधि बन गया जो लोकतंत्र के तीन प्रमुख पायों पर निगाह ही नहीं रखने लगा बल्कि जन भावनाओं का प्रकटीकरण भी करने लगा. इससे अखबार का सामाजिक सरोकारों का मूल्य और बढ़ गया. अख़बार को इसीलिए लोकतंत्र का चौथा खंबा कहा जाने लगा.

इन सरोकारों की बात करते हुए बाज़ार की बात करना समीचीन होगा. आज के बाज़ार के झंडाबरदार मानते हैं कि बाज़ार तो बाज़ार है. किसी कार, फ्रिज या किसी टोस्टर की बिक्री को बाज़ार की जो शक्तियां या सिद्धांत प्रभावित करते हैं वे हीं अख़बारों की बिक्री को भी संचालित करते हैं.

अखबार को कारोबार मानने से समस्या पैदा नहीं हुई बल्कि खबर को कारोबार की वास्तु बना देने से आज की स्थिति पैदा हुई है. पहले भी अखबार कारोबार था मगर उससे मुनाफा कमाना उन्हें निकालने वालों का पहला उद्धेश्य नहीं हुआ करता था. अखबार उनके लिए प्रतिष्ठा की चीज थी. आज की नयी धनाड्य पीढी जिनके हाथों में अखबारों की नकेलें हैं वे बाजारवाद की उपज हैं जिनके लिए पैसा ही प्रतिष्ठा है, पैसा ही ताकत है. इसे पाने के लिए वे ख़बर का भी सौदा करने को तत्पर रहते हैं.

इन लोगों के लिए न्यूज़ या समाचार भी एक उत्पाद है . इस उत्पाद को तैयार करने और उसके वितरण में उनके हिसाब से बाज़ार के वही सारे आर्थिक सिद्धांत काम करते हैं जो अन्य औधोगिक माल के उत्पादन पर लागू होते हैं. अमरीका के फेडरल कोम्युनिकेशन्स कमीशन के चेयरमैन थे मार्क फ्राद्लर. उनका कहना था "बाज़ार में लोगों की जैसी पसंद होती हैं उसी से मीडिया के कंटेंट निकलते हैं”. इसका अर्थ यह हुआ कि जिस प्रकार बाज़ार में ग्राहक की पसंद के हिसाब से उत्पाद आते हैं वैसे ही मीडिया में कंटेंट भी आएगा. वे यह भी कहते हैं कि “जनता की रुचियाँ ही जनहित को परिभाषित करेंगी”. मगर हमें यहाँ यह नहीं भूल जाना चाहिए कि खुले बाज़ार में लुभावनें प्रचारों के जरिये जनता की रुचियाँ बनाई और बिगाडी जाने का खेल बड़े पैमाने पर चलता है.

ऐसी ही बाज़ार की शक्तियों के चलते आज अख़बारों में क्या हो रहा है ? अख़बारों के समाचार कक्षों में एक अच्छी कॉपी (ख़बर) किसे मानते हैं? वह कॉपी जो लालच, बेवकूफी, और षडयंत्र की कहानी कहती हो. ऐसा माना जाता है ऐसी चटपटी ख़बरों से अख़बार को अधिक पाठक मिलेंगे.

अभी हाल ही में जेम्स टी. हेमिल्टन का अध्ययन पुस्तक के रूप में आया है . यह अपने प्रकार का दुनिया में पहला अध्ययन है. इसका शीर्षक है 'हाउ द मार्केट ट्रांसफार्म्स इन्फोर्मेशन इन्टू न्यूज़'. हेमिल्टन कहता है "खबरें बाज़ार की ताकतें बनती हैं और ख़बरों (जिसे बाज़ार की भाषा में इन्फोर्मेशन गुड्स कहते हैं) के स्वरुप का निर्धारण अर्थतंत्र करता है.

मौजूदा समय की खुले बाज़ार की सबसे बड़ी हिमायती ब्रिटेन की पूर्व प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर आयरन लेडी के रूप में जानी जाती है. उनका एक कथन अत्यन्त महत्वपूर्ण है. उनका यह कथन बाज़ार की आवाज है . उनहोंने कहा "देयर इज नो सच थिंग एज सोसाइटी" याने समाज जैसी कोई चीज नहीं होती. उनका मतलब था कि समाज को एक एब्सट्रेक्ट या सांस्कृतिक मेटाफर के रूप में ही देखा जा सकता है. मुक्त बाज़ार की अर्थव्यवस्था के समर्थकों ने समाज और सामाजिक सरोकार को हमेशा हिकारत की निगाह से देखा है. ऐसे समर्थक हमारे यहाँ अब अखबारों के नियंता हैं.


आज के अख़बारों के नियंताओं के लिए कोई चीज गैर वाजिब नहीं है. वे अब संपादक नहीं एक प्रमुख कार्यकारी अधिकारी चाहते हैं और ऐसा बनने के लिए तैयार बैठे पत्रकारों की फेहरिस्त लम्बी है. आज तेजी से बढ़ते अखबार अपने संपादकों को सिखा रहे हैं कि वे अपने पाठक को पहचाने. अखबारों के नए नियंता की निगाहों में उन पाठकों का कोई मोल नहीं जिनकी जेब में बड़े बाजारों में - माल्स - में खर्च करने को अतिरिक्त पैसा है. संपादकों को यह सिखाया जा रहा है कि आप उन पाठकों को लक्ष्य करें जो रंगीन टीवी, फ्रिज, कारें वगैरा खरीद रहें हों. यदि यह खरीददार और आपके पाठक एक होंगे तो ही अखबार को बड़े विज्ञापन मिलेंगे. हर साल जब पाठक सर्वे की रिपोर्ट आती है तो अख़बारों में सबसे पहले यही देखा जाता है कि किस अखबार में "हैसियत" वाले पाठकों की संख्या कितनी है.

इस समय चुनाव का मौसम चल रहा है. यह वो समय है जब कईं अखबार ख़बरों के कारोबार में उतर आते हैं. राजनैतिक पार्टियों और उम्मीदवारों से उनके विज्ञापनों का ही सीधा सौदा नहीं होता बल्कि न्यूज़ कालम में छपने वाली विज्ञप्तियों को स्थान देने के लिए भी मोल तय किया जाने लगा है. ऐसे सौदों में पार्टियों का हाथ मरोड़ने के लिए ख़बरों को ही हथियार बनाया जाता है. क्योंकि अभी तक आम लोगों का भरोसा अकबार में छपी ख़बरों पर बना हुआ है इसलिए वे उन पर भरोसा कर लेते हैं और उन्हें पता ही नहीं लगता कि वे ठगे जा रहे हैं.
पत्रकारिता जगत में एक पुरानी कहावत है जो कभी हर पत्रकार की जुबां पर पर रहती थी "फेक्ट्स आर सेक्रेड, इंटरप्रेटेशन इज माइन". तब अखबारी दुनिया में कहा जाता था "न्यूज़ देट इज फिट टू प्रिंट". मगर आज के अखबार शायद कहते हैं "न्यूज़ देट इज फिट तो सेल".

यह "फिट टू सेल" सारे झगडे की जड़ है. अखबार पाठकों के लिए नहीं बाज़ार के लिए हो चले हैं. बार बार कहा जाता है कि बाज़ार के भी " मूल्य" होते हैं. मगर बाजारों के उतार चढाव और घोटालों ने बार बार यही बताया है कि बाज़ार मानवीय चेहरा नहीं होता. दिलचस्प बात यह भी है कि मीडिया ने बड़ी बड़ी चीजें उजागर कीं है मगर बाज़ार की तरफ अपनी खोजी निगाह कभी नहीं की. बाज़ार से उपकृत होते हुए ऐसा हो भी कैसे सकता है.

इन दिनों अख़बारों के कंटेंट संपादक नहीं ब्रांड मेनेजर तय करते हैं. वे पत्रकारिता और मनोरंजन के बीच की सीमा रेखा को मिटा दे रहे हैं. ब्रांड मेनेजर अखबारों का कलेवर तय करते हुए बताते हैं कि सुबह सुबह पाठक अखबार में क्या देखना चाहते हैं. वे संपादक से यह भी अपेक्षा करते हैं कि रोज अखबार में कम से कम एक ऐसी चटपटी खबर अवश्य हो जिसकी शहर में दिन भर चर्चा होती रहे. ख़बरों को चटपटा बनाने के लिए ऐसे मसाले डाले जाते हैं जिनका तथ्यों से कोई लेना देना न हो. ख़बरों में ऐसी मिलावट की आदतें पत्रकारिता को जन सरोकारों से दूर ले जाती है. अख़बारों के नए नियंताओं ने यह भी साध लिया है कि किस प्रकार पाठकों को ऐसे चटपटे मुद्दों पर भटका दिया जाय कि वे असली मुद्दों को बिसरा दें.


पाठकों के बारे में किसी की टिपण्णी है "रीडर इज नॉट अ किंग. ही इज अ नाइस हिप्पोक्रेट (पाठक कोई शहंशाह नहीं है. वह एक अच्छा पाखंडी है). मुक्त बाज़ार जो दिशा देता है अखबार उसी पर चलते हुए जो सामग्री परोसता है वह कईं बार खूब रस लेकर पढ़ी काटी है. पाठन एक तरफ तो ऐसी सामग्री मजे लेकर पढता है और वही बाद में यह आलोचना भी करता है कि अखबार में गंभीरता नहीं रही या वह चलताऊ हो गया है.

इतना सब होते हुए भी सब कुछ ख़त्म नहीं हो गया है. अखबार के सामाजिक सरोकारों की पैरवी करने वालों और उन सरोकारों को अभिव्यक्ति देने वाले संपादकों की कमी नहीं है.

पाठकों की भागीदारी या दबाव अखबारों को सही रास्ते पर चलने पर मजबूर कर सकता है. मगर उसके लिए पाठक को अपनी भूमिका के बारे में सोचना होगा कि क्या वह एक अच्छे अखबार के लिए उसके वाजिब दाम देकर खरीदने को तैयार है ? यदि वह मुफ्त में या नाम मात्र के दाम पर अखबार चाहता है तो उसे वही मिलेगा जो बाज़ार चाहेगा क्योंकि लागत और बिक्री मूल्य के बीच का अंतर वही भर रहा है.


(बीकानेर में आयोजित अजित फाऊंडेशन की सालाना लेक्चर श्रंखला में दिया गया अभिभाषण)

Saturday, March 20, 2010

दास्तान ‘नीचा नगर’ की









राजेंद्र बोड़ा

'नीचा नगर' फिल्म हमेशा ही गुमनामी के अँधेरे में रही. वास्तव में वह दर्शकों तक कभी पहुच ही नहीं सकी. इतने बड़े देश में जहाँ सबसे अधिक संख्या में फ़िल्में बनती है और हर तरह की ऊल-जलूल फ़िल्में सिनेमाघरों के पर्दों पर उतरती हैं वहां इस फिल्म को रिलीज करने वाला कोई नहीं मिला. ऐसा उस फिल्म के साथ हुआ है जिसको अंतर्राष्ट्रीय 'कान्स फिल्म समारोह' का लब्धप्रतिष्ठ 'ग्रां प्री' का खिताब अर्जित करने का गौरव प्राप्त है. फिल्म 1946 में बन कर तैयार हुई और उसी साल शुरू हुए अंतर्राष्ट्रीय 'कान्स फिल्म समारोह' में उसने अपना परचम फहराया. जब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु को पता चला कि एक भारतीय फिल्म ने अंतर्राष्ट्रीय खिताब जीता है तो उन्होंने यह फिल्म देखने की ख्वाइश जाहिर की . दिल्ली के तब 'वाइसरीगल लॉज', जो अब राष्ट्रपति भवन कहलाता है, में 'नीचा नगर' का एक शो रखा गया. शो में नेहरु जी के अलावा माउन्टबेटन दंपत्ति भी मौजूद थे. फिल्म के शो के बाद नेहरु ने फिल्म की खूब तारीफ़ की और माउन्टबेटन ने सलाह दी कि फिल्म के अंग्रेजी में सब-टाइटल तैयार किये जाय और उनके साथ यह फिल्म देश विदेश में प्रदर्शित के जाय. उन्होंने चेतन आनंद से कहा कि वे उस जमाने के बहुत बड़े फिल्मकार अलेक्जेंडर कोरडा के नाम एक चिट्ठी लिख देगे जो फिल्म के अंग्रेजी सब-टाइटल बनवाने में मदद करेंगे. मगर देश के विभाजन के हंगामें में इस फिल्म की किसी को याद नहीं रही.

मगर आज़ादी के बाद जेहरू जी को यह फिल्म जरूर याद रही. सन 1950 में जब दिल्ली में पहली एशियाई कांफ्रेंस हुई तब उसमें भाग लेने वाले प्रतिनिधियों को उन्होंने राष्ट्रपति भवन में ‘नीचा नगर’ विशेष तौर पर दिखाई. गणमान्य दर्शकों में मिश्र के राष्ट्रपति अब्दुल नासर, युगोस्लाविया के मार्शल टीटो, बर्मा के यू थांट जो बाद में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बने और श्रीलंका की राष्ट्रपति एस भंडारनायके के अलावा कांग्रेस के सभी बड़े नेता, स्वतंत्रता सेनानी, फिल्म और व्यवसाय जगत की प्रमुख हस्तियाँ मौजूद थीं.

बावजूद नेहरु और सरकारी दिलचस्पी के और कान्स के पुरस्कार के 'नीचा नगर' के निर्माता राशिद अनवर वितरकों को फिल्म बेचने और उसे सिनेमाघरों में प्रदर्शित कराने में सफल नहीं हो सके. फिल्म के निर्माण के लिए राशिद अनवर ने एक सेठ से कुछ पैसे उधार लिए थे. मूल रकम पर ब्याज की राशि बढती जा रही थी. रकम उधार देने वाला सेठ जो कपास का व्यवसायी था धमकी दे रहा था कि उसके पैसे नहीं चुकाए गए तो वह फिल्म की नीलामी करा देगा. उसने न केवल ऐसी धमकी दी बल्कि वह फिल्म का निगेटिव भी लेबोरेट्री से उठा ले गया और उनके डिब्बे अपने रूई की गांठों के गोदाम में ला पटके. यह फाइनेंसर अपने पैसों के अलावा अन्य कोई बात सुनने को तैयार नहीं था.

हताशा की हालत में चेतन आनंद दौड़ कर दिल्ली गए और जनरल थिमैया से मिले जिन्हें वे पहले से जानते थे. थिमैया ने 'नीचा नगर' देखी थी. चेतन को आशा थी कि वे कुछ ऐसे पैसे वालों को जानते होंगे जो उनकी मदद कर सके. जनरल थिमैया ने चेतन आनंद की सरदार वल्लभ भाई पटेल से मुलाकात तय करा दी. पटेल राज्यों के विलीनीकरण के काम में बहुत अधिक व्यस्त थे मगर क्योंकि थिमैया की सिफारिश थी उन्होंने कहा कि दिन में तो समय नहीं मिलेगा. मैं तडके सैर करने जाता हूँ. चेतन तभी आ जाएँ और बात कर लें. पटेल ने सैर पर चलते-चलते चेतन से सारा किस्सा बड़े धैर्य से सुना और कहा कि फिल्म को रहन से छुड़ाना सबसे महत्वपूर्ण बात है. जब चेतन ने उनसे कहा कि यदि वे बिडला जी या अन्य किसी बड़े उद्योगपति से कह दें तो काम बन सकता है तो पटेल ने कहा कि वे जिस पद पर हैं उसे देखते हुए उनके लिए ऐसा करना उचित नहीं होगा.

'नीचा नगर' मुश्किलों में घिरी है इसकी खबर नेहरु जी तक भी पहुची और उनकी दिल्ली के हयातुल्ला अंसारी साहब से लम्बी खतो-किताबत भी हुई. वे भी इस बात से उदास हुए कि अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाली पहली भारतीय फिल्म शायद थियेटर में कभी रिलीज न हो सकेगी और आम जनता उसे कभी नहीं देख सकेगी.


बाद में जब बम्बई में फाइनेंसर पर सब तरफ से दबाव पड़ा तो वह फिल्म की नीलामी स्थगित करने को राजी हो गया. उसने अपने एक अन्य परिचित फिल्म निर्माता से राय ली. उसने उसे सलाह दी कि क्योंकि वितरक फिल्म उठाने को तैयार नहीं हैं इसलिए बॉक्स आफिस अपील के लिए फिल्म में एक गाना और एक नृत्य का आइटम डाल ले और वह खुद ही फिल्म को सिनेमाघरों में रिलीज कर दे और अपना पैसा वसूल ले.

चेतन आनंद चाहते थे कि फिल्म वैसी ही रिलीज हो कैसी कान्स में प्रस्तुत की गयी थी लेकिन फिल्म को सिनेमाघरों के परदे पर लाने के लिए उन्होंने ऐसा समझौता करना स्वीकार कर लिया. इससे फाइनेंसर जो फिल्म के निगेटिव की नीलामी पर आमादा था थोडा नरम पड़ा और रिलीज प्रिंट बनाने के लिए निगेटिव के डिब्बे लेबोरेट्री को भेज दिए.

और इस तरह एक संकट टला. लेकिन बाद में लेबोरेट्री में आग लग गयी और 'नीचा नगर' फिल्म की निगेटिव उसमें जल कर पूरी तरह ख़ाक हो गयी. लेकिन उससे पहले फिल्म के कुछ प्रिंट बना लिए गए और प्रदर्शन के लिए वहां से बाहर आ गए.

सन 1950 में राष्ट्रपति भवन में फिल्म के शो के बाद फिल्म के निर्माता ने 'नीचा नगर' को अपने स्तर पर रिलीज करने की कोशिश की तो उसे बम्बई में कोई ढंग का सिनेमा हाल ही नहीं मिला और उसे बम्बई के एक उपनगर के मामूली सिनेमाघर में फिल्म प्रदर्शित करनी पड़ी. फिल्म की तकदीर देखिये स्थानीय दर्शकों ने इस प्रयोगवादी सिनेमा के प्रति घोर अरुचि दिखाई. उनके लिए फिल्म में गाने नहीं थे, डांस नहीं थे, कोई लटके-झटके नहीं थे. दर्शकों ने पहले ही शो में सिनेमाघर की सीटें फाड़ डाली और अपने टिकट के पैसे वापस मांगने लगे. रशीद अनवर की हिम्मत फिर और किसी जगह यह फिल्म लगाने की नहीं हुई.

भाग्य का खेल देखिये. फिल्म का एक प्रिंट कलकत्ता पंहुचा होगा. वहां फिल्म देख कर एक बंगाली नौजवान ने चेतन आनंद को चिट्ठी लिखी कि वह फिल्म से बड़ा प्रभावित हुआ है और उसे इससे प्रेरणा मिली है कि वह भी ऐसी फिल्म बनाए. जब यह चिट्ठी आनंद परिवार में पहुंची तो उसे भेजने वाले को कोई नहीं जानता था. चिट्ठी लिखने वाला नौजवान था सत्यजित राय.

यह भी अजब संयोग रहा की 'नीचा नगर' अगर आज हमारे लिए उपलब्ध है उसके लिए भी सत्यजित रॉय के केमरामैन का योगदान नहीं भुलाया जा सकता. कई बरसों बाद एक दिन ये केमरामैन कलकत्ता के चोर बाज़ार में घूम रहे थे. उन्होंने देखा कि एक कबाड़ी के यहाँ किसी फिल्म के डिब्बे पड़े हैं. जिज्ञासावस वे एक रोल उठा कर देखने लगे. उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ. वे मुड़े और अपने साथ चल रहे मित्र से कहा अरे देखो तो ये तो 'नीचा नगर' है. उन्होंने फिल्म के सारे डिब्बे महज दस रुपयों में कबाड़ी से खरीद लिए. वो प्रिंट आज पुणे की फिल्म इंस्टिट्यूट के अभिलेखागार में राष्ट्रीय धरोहर के रूप में संरक्षित है.

'नीचा नगर' को 1946 में कान्स का ग्रां प्री खिताब ही नहीं मिला बल्कि फिल्म क्रिटिक्स जूरी ने भी अपनी मेरिट सूची में उसे सर्वोच्च स्थान पर रखा. सन 1995 में कान्स के स्वर्ण जयंती समारोह में 'नीचा नगर' विशेष तौर पर प्रदर्शित की गयी.

'नीचा नगर' ने आज 64 साल बाद भी अपनी अहमियत नहीं खोई है. फिल्म की कहानी अमीर और गरीब के बीच की लड़ाई है. फिल्म का सबसे पावरफुल किरदार निभाया रफ़ी पीर ने जो जर्मन राइनहार्ट स्कूल आफ थियेटर से प्रशिक्षण पाए हुए थे. जिस प्रकार से उन्होंने किरदार को प्रस्तुत किया उसकी कोई सानी नहीं. फिल्म के टाइटल में यह लिखा हुआ आता है क्रियेशन बाय चेतन आनंद. वास्तव में फिल्म चेतन की ही रचना है. चेतन का फिल्म क्षेत्र में प्रशिक्षण विश्व सिनेमा की तब की बेहतरीन फिल्मों को देखने और उन पर मनन करने के अलावां कुछ नहीं था. लेकिन उन्होंने कैमरे से जो स्वन्सार रचा वह अद्बुत था. रफ़ी पीर ने एक अमीर आदमी का किरदार निभाया जो नगर पालिका का अध्यक्ष चुन लिया जाता है और कम दामों पर जमीने खरीद लेता है जिस पर ऊंची इमारतें बनवाना चाहता है. उसकी जमीन दलदल वाली है क्यों कि उस पर से होकर एक नाला गुजरता है. साम, दाम, दंड, भेद से वह नाले का बहाव गरीबों की बस्ती नीचा नगर की तरफ मुडवा देता है. इससे नीचा नगर में बीमारियाँ फैलने लगती है. उसके कारकून बस्ती का पानी का कनेक्शन भी काट देते है. फिर गरीबों का हितैषी का रूप धर कर वह बीमार मरीजों के लिए नीचा नगर में अस्पताल खोल देता है. यहाँ नीचा नगर के लोग अहिंसक आन्दोलन पर उतर आते है. वे घोषणा करते हैं कि वे मरना मंजूर करेंगे मगर अमीर के अस्पताल में इलाज नहीं करवाएंगे. इन दृश्यों पर गांधी के असहयोग आन्दोलन की पूरी छाप है. चेतन का कैमरावर्क दृश्यों को शानदार तरीके से उभारता है. अमीर के किरदार का नाम दिया गया है सरकार साहब. सरकार साहब के किरदार में रफ़ी पीर का स्टाइलिश अभिनय तो फिल्म की विशेषता है ही उसे उभारने में कैमरे के शाट्स देखने लायक है. सरकार साहब और बस्ती के लोग जब आमने सामने होते हैं तब सरकार साहब के शाट्स लो एंगल से लिए गए है जिससे किरदार सभी पर हावी नज़र आता है. दूसरी तरफ बस्ती के लोगों के प्रतिनिधिमंडल के शाट्स हाई एंगल से लिए गए हैं जिनमें जिनमें वे दबे हुए दिखते है.

फिल्म का अंतिम दृश्य अत्यंत ही प्रभावशाली बन पड़ा है. नायिका गंदे नाले से फैली बीमारी की चपेट में आ जाती है मगर सरकार साहब के अस्पताल में अपना इलाज कराने से इनकार कर देती है और उसकी शहादत हो जाती है. उसकी चिता की लपटों को फ्रेम में लेता हुआ कैमरा लोगों द्वारा थाम ली गयी मशालों पर चला जाता है. बहुत ही खूबसूरत प्रतीकात्मक दृश्य है. लोगों के हाथों में मशालें हैं और उनके चेहरे दीप्तिमान है. मशालें ले कर लोगों का हूजूम सरकार साहब के घर की तरफ निकल पड़ता है. मशालों की लौ से झिलमिलाती रोशनी की लंबी पंक्ति के दृश्य विश्व के किसी भी बड़े निर्देशक के काम से कमतर नहीं है. सबसे दिल्चास्क बात यह है की चेतन आनंद ने ये दृश्य धुंधले हो गए फिल्म के खराब रा स्टाक पर शूट किये. उनके पास दूसरा रा स्टाक खरीदने के पैसे नहीं थे. फिल्म की राशनिंग का ज़माना था. मगर चेतन ने खराब रा स्टाक का उपयोग शाम के धुंधलके में मशालों का दृश्य फिल्माने के लिए किया और एक अद्भुत रचना कर डाली. आज के निर्देशक ऐसे प्रभाव उत्पन्न करने के लिए जान बूझ कर फिल्म को धुंधला करते है.

फिल्म इप्टा के कलाकारों का मिला जुला प्रयास था. बस्ती के लोगो ले लम्बे जूलूस में शामिल प्रत्येक कलाकार इप्टा के थियेटर जत्थे का सदस्य था. फिल्म की गैर परंपरागत नायिका का किरदार निभाने के लिए चेतन ने एक नए चेहरे को चुना जिसने बड़ी खूबसूरती से यह भूमिका अदा की. यह अदाकारा थीं उमा कश्यप. वह लाहोर के गवर्नमेंट कालेज के प्रोफ़ेसर कश्यप की बेटी थी. कश्यप परिवार से चेतन की पुरानी पहचान थी. क्योंकि चेतन कश्यप परिवार के पारिवारिक मित्र थे इसलिए उषा की मां ने इस फिल्म में काम करने के लिए अपनी बेटी को इजाजत दे दी. फिल्म के लिए उषा का नामकरण किया गया कामिनी कौशल जो बाद में बहुत बड़ी अभितेत्री बनी.
सरकार साहब की भूमिका निभाने वाले रफ़ी पीर बाद में पकिस्तान चले गए. उनके बच्चों ने बाद में पाकिस्तान में थियेटर में बड़ा नाम कमाया. वे पीरजादा कहलाते हैं और भारत आते रहते हैं. भारत पाक सांस्कृतिक आदान प्रदान समारोह में पाकिस्तान में भारत के हाई कमिश्नर शिव शंकर मेनन ने पीरजादा परिवार को 'नीचा नगर' फिल्म की एक प्रति भेंट की. पीरजादा बच्चों ने तब पहली बार अपने पिता को फिल्म में अभिनय करते देखा.

अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त अभिनेत्री जोहरा सैगल इस फिल्म में पहली बार परदे पर नज़र आयी. कामिनी कौशल से साथ फिल्म में नायक की भूमिका निभाने वाले मोहन सहगल की भी यह पहली फिल्म थी. उन्होंने फिल्म में चेतन के सहायक निर्देशक के रूप में भी काम किया. मोहन सहगल ने बाद में बहुत सी सामजिक फ़िल्में बनाई. सुपर हिट फिल्म 'सावन भादों' में उन्होंने अभिनेत्री रेखा को पहली बार मौका दिया. सरकार साहब की बेटी की भूमिका के लिए कोई अनुकूल कलाकार नहीं मिला तो वह भूमिका चेतन की पत्नी उमा आनंद ने बड़ी खूबी से निबाही.

चेतन को स्वयं को संगीत में बहुत रूचि थी. इसीलिए उनकी फिल्मों में संगीत को बहुत अहमियत मिली. 'नीचा नगर' के संगीत के लिए चेतन ने चुना पंडित रवि शंकर को. उस समय वे उस्ताद बाबा अल्लाउदीन खान के प्रमुख शिष्यों के रूप में उभर रहे थे. रवि शंकर ने पहली बार किसी फिल्म के लिए संगीत देते हुए जिस प्रकार दृश्यों को संगीत का सहारा दिया उसे संगीत के रसिक आज भी आनंदित होते हैं.

आज भी 'नीचा नगर' का कोई प्रमोटर नहीं है. एक विडियो कंपनी ने बहुत ही बुरे तरीके से 'नीचा नगर' की वीसीडी जारी की जिसे दस दस रुपयों में भी कोई खरीददार नहीं मिला. अपनी धरोहर को ठीक से प्रस्तुत करना ही हमें नहीं आता. फिल्म डिजिटली री-मास्टर की जाय उसका साउंड ट्रेक ठीक किया जाय और उसकी बेहतरीन डीवीडी जारी करने की किसी को सुध नहीं है. विदेशों में ऐसा होता है. फिल्म के शानदार प्रिंट की डीवीडी बनती है. साथ में फिल्म से जुड़े लोगों की विशेष भेंट वार्ताएं होती है. समीक्षकों की भेंट वार्ताएं होती हैं कि क्यों यह फिल्म महान है.

'नीचा नगर' भारतीय सिनेमा की ऐसी धरोहर है जिस पर आने वाली पीढियां गर्व कर सकेंगी. उन्हें यह जान कर आश्चर्य होगा की सत्यजित रॉय की 'पाथेर पांचाली' के निर्माण से दस बरस पहले ऐसी फिल्म बन चुकी थी जिसने भारतीय सिनेमा को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दी. कान्स अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में 1946 में नीचा नगर को जब श्रेष्ठ फिल्मों की सूची में सबसे ऊपर स्थान दिया गया तब उसके साथ की फ़िल्में थीं : डेविड लीन की 'ब्रीफ एनकाउन्टर' और इंगमार बर्गमेन की 'फ्रेंज़ी'.


(पिंक सिटी प्रेस क्लब और फिल्म फैन्स सोसाइटी की और से जयपुर के प्रेस क्लब में 13 मार्च 2010 को 'नीचा नगर' के प्रदर्शन के अवसर पर दिया गया वक्तव्य.)

Friday, February 26, 2010

Human Rights and Media

Rajendra Bora

Although the concept of ‘Human Rights’ came into existence way back in 1948 with the United Nations’ Universal Declaration but the National Human Rights Commission came into existence in India forty-five years later, in 1993, when ‘The Protection of Human Rights Act’ was enacted by Parliament. The State Human Rights Commissions came into existence much later.

One might wonder why the enactment of law by Parliament was delayed for 45 years? It is because no such necessity was felt. Many of the Articles of the Universal Declaration of Human Rights had already found place in the Fundamental Rights in the Indian Constitution.

The Indian Constitution is one of the classical documents of its kind and has been drafted in such a systematic and simplified manner that is easy to understand, even for a layman. Than why Human Rights are being flouted so rampantly? Has the Constitution failed? No. They are the mortal being – We the People - have failed.

What is the role of media in protect the Human Rights? Media is supposed to be surrogate of the people and it is duty of media to make constitutional agencies to play their roles effectively and to make the people aware about safeguarding Human Rights which only could ensure success of democracy.

Civil societies always complain that when it comes to the reporting of the human rights-related incidents, the newspapers devote very little space to them, unless the incidents are very newsworthy and has wider importance in the judgment of editors. Newspapers seldom make a serious effort to follow up such stories, which they report with a greater zeal in the beginning.

The printed media has played a significant role in the past in reporting the violation of human rights. However, of late the printed media has been receiving stiff competition from television with the advent of news channels which, many feel, trivializing the incidents for their TRP ratings.

This competition between print and electronic media has compelled them to carve out a new kind of readership and viewership in other areas such as entertainment, cinema, fashion, cuisine, health care, real estate, environment, sports etc. While defending the latest trends, the media mogul are saying that they cater to the demands of readers and viewers. And this assertion by media owners is the real concern for those who want media to remain watchdog of human rights.

The fear that in the entire modernization and revolution process of the Indian media, human rights might take a back seat is not unfounded. This fear is further compounded due to the constant changes in the global economic pattern, which began with the introduction of the WTO.

While discussing role of media It may be questioned if media are a part of Civil Society or as something entirely outside it ?

There is, of course, no simple answer. As we all know media came in many shapes and sizes. The term Fourth Estate was, I suppose, devised because of the very fact that the media are so difficult to characterize.

Generally outside Civil Society are those media that have been established in pursuit of political power or profit and market share. But the boundaries are fuzzy.

Civil societies want media to be free from government interference and also from commercial pressure. It is expected that media go beyond political dogma and entertainment and inform the people objectively. The civil society wants the media to help create a knowledgeable, entrepreneurial and confident society which could protect human rights and which is able to address contemporary concerns of the masses.

In early eighties, a revelation made by Sunday magazine published by Anand Bazar Patrika group from Kolkata with a front page story of the blinding of prisoners in Bhagalpur Jail had virtually rocked the entire nation. This was the first major case of human rights violations ever to have been reported in Indian media, and which brought to light the alarming state of affairs in the jails.

Thereafter in mid eighties, Sheela Barse’s investigative story on the condition of exploitation and abuse of female inmates of Arthur Road Jail in Mumbai, also in Sunday, resulted in an enquiry into the condition of prisons all over Maharashtra.

That is why the media have a critical role to play. There is important job to be done by media in raising awareness about Human Rights and ensure their protection.

There is a direct link between Human Rights, democracy and development. Therefore, there is an urgent need for independent journalism and free media which provide a bedrock for democratic exchange and respect for Human Rights.

By exposing human rights, media can improve the climate of democratic debate and reduce corruption in public life.

Media sensitive to the importance of Human Rights provide reliable source of information through which citizens, human rights groups, private organizations, and public authorities can work together to promote development and eliminate arbitrary abuse of power.

For protection of Human Rights we need independent minded journalists who will play a central role. That can be ensured by bringing professionalism among journalists, editors and publishers. Since quality of sources of information are vital to the defense of human rights for all a professional media sensitive to the contemporary concerns are need of the hour.

Journalists need to work in professional and social conditions where they are free to resolve ethical dilemmas and where they can make professional decisions on editorial content. This type of editorial independence, free from governmental interference and market forces, should exist both in publicly owned and privately owned media irrespective of ownership.

This can be done by unifying the profession, by creating systems of media accountability, by imparting training to working journalists, by creating media resources by promoting respect for international standards of press freedom, and by strengthening media professional organizations.

In today’s scenario somewhere in the avalanche of information available in media we need to find a place for human rights stories.

In the first decade of new millennium we are witnessing huge concentration of economic power known as corporations. We are witnessing professionalisation and institutionalization of propaganda especially as a means for safeguarding corporate interests against democracy.

Unfortunately most members of the public rely upon the corporate media. The prime motive of the media managers is always profit maximization. If owners have multiple business lines their other interests too affect media content.

Traditionally news stories answer five questions, the five Ws : who, what, where, when and why. But corporate economic models have their own definitions. What information becomes news depends on a different set of five Ws, those asked in the market :

1. Who cares about a particular piece of information?
2. What are they willing to pay to find it, or what are others willing to pay to reach them?
3. Where can media outlets or advertisers reach these people?
4. When is it profitable to provide the information?
5. Why is this profitable.


A journalist will not explicitly consider each of these economic questions while doing a story. But the stories, reporters, firms and media that survive in the market place, however, will depend on the answers to these questions, which means media content can be modeled as if the five economic Ws are driving news decisions. This I am quoting from a recent study in United States on how the market transforms information into news.

The media has changed from being a stalwart defending public’s rights into a timid vacillating entity that all intents and purposes censors itself.

It has reduced from what it once was. The news media has morphed into something unrecognizable from what it once was.

This is not to say that the journalists within corporate media are suffering from amnesia.

The media can play a pivotal role by way of building up public opinion, and also by impressing on the government the need to incorporate the subject of human rights, both in schools and also in police training academies, and also in the training institutes for municipal councils, corporations and other revenue departments.

But the tendency of news media to follow guidelines set down by free market capitalists is a stark reality and there is blurring demarcation between journalism and entertainment from the pressure of brand managers.

Can journalists fight these odds and emerge victorious against market forces? That will decide if the media become watchdog of human rights.

(Text of the address made at a workshop on Human Rights at International College of Girls)

Misuse of Power by Police and Misuse of Police by Persons in Authority

Rajendra Bora

I would like to begin by quoting management guru Arindam Chaudhury whose recent book has taken the Indian business world by storm. In his best selling book “Count Your Chikens Before They Hatch” Arindam tells an interesting observation about Japanese people in the chapter titled “Pegging Cultural Holes”. In Japan “when a man runs short of money in the market place and goes to borrow some from the policeman round the corner, he meets with a pleasant experience. The policeman might not even ask for his address, for, trust levels are too high and policeman knows that a Japanese would rarely cheat his country. When this is how a citizen is treated. In turn he also acts responsibly and reacts by picking up a wastepaper lying by the road and taking it home to throw in his dust bin”.

It may sound a fairy tale to us Indians because the Police force is just not considered as a friend here despite all efforts made in the past to make it so. The overwhelming perception of the common people about the Police is that it is a “force of monsters”. The man in uniform does not come out with flying colours in the hour of needs of common people. Therefore, it is not surprising that half of the total complaints being received by the National Human Rights Commission of India annually are against Police personnel.

It is quite educating if one scans the nature of complaints being received by the Commission because it gives a fair idea about the force which is considered as the most visible organ of the State. These complaints indicate that the Indian Police Force is not only “brutal and lawless, highly corrupt, partisan and politicized” but also lacks “professional competence”.

The Role of Police is every society is always critical because the main tasks of the State , that of maintenance of public order and peace and ensuring protection of citizens, are performed by this force. It is said that the importance of policing stems from the fact that in ultimate analysis the sanction behind state power is the use of force. Since the Police is the tool to enforce the will of the State, the functioning of the Police denotes the level of democracy. When the power of uniform is abused the weaker sections of the society are more oppressed.

The Police Commission in its first report had stated that “one of the fundamental requisites of good government in a democracy is an institutionalized arrangement for effectively guarding against excesses or omissions by the executive in the exercise of their powers or discharge of their mandatory duties which cause injury, harm, annoyance or undue hardship to any individual citizen”.

This check against abuse of authority is most vital in case of the Police force that enjoys abundant power over the people affecting their rights, including that of life and liberty.

Despite explicit constitutional checks and balances, all fundamental rights of a citizen become irrelevant for at least 24 hours before his mandatory production before a magistrate. As the Police Commission pointed out “powers of arrest, search, seizure, institution of a criminal case in court, preparation of reports on the alleged anti-social conduct of any specific individual etc. mark several stages in the executive police action which afford large scope for misconduct by the Police personnel in different ranks, particularly at the operational level causing harm and harassment to the citizens.

During the pre-independence days of British and feudal rule the function of the Police was to establish authority of its masters over the subjects. It is interesting to note the observation of the Police Commission of 1902 which described the British Indian Police as “tyrannical and dishonest”. It is no different now.

The Police force inherited by Independent India had no experience of functioning in democratic governance. Adoption of short cuts and illegal and brutal methods continued unabated not only dehumanizing the Force but also sapping their skill and competence. This causes decline in law and order and erosion of human rights.

Given our colonial legacy the Police learnt only as to how to protect the ruler by suppressing all rebellion and dissent. The present “democratically elected rulers” still want the Police act in the same way.

It is said that an illegitimate political system is inclined to use the Police force illegally to buttress itself. An ideologically bankrupt polity also behaves in a similar fashion making the Police an ultimate agent of corruption. Therefore, the perception of the people that the Police is an instrument of oppression and abuse of power is not off the mark.

In the Indian context the Police is a State subject. That means that the Force is controlled by the present political masters in states. We have seen a tendency of the political executive to use or abuse the Police Force for partisan and personal ends. The governance has been reduced to patronage by way of transfers and postings of bureaucrats. By doing this the persons in power ensures the loyalty of the Police personnel to them and their party cadres. Here comes the misuse of Police by persons in authority that in turn results in misuse of power by the Police.

Because the Police officials allow themselves to be used by political masters or people in authority it seems to me that law enforcement officer simply are in wrong profession. This is the profession that should have no place for spineless persons.

Policing is too serious a business to be left to policemen and politicians alone. However, despite literature galore on the subject there are as yet no coherent ideas about what should be done to make police follow the constitutional mandate. There is no lack of talent in the Indian Police Force that can boast of exceptional quality officers who are able to evolve creative responses to new problems. However, it is a big question whether they are allowed to do so. Their responses rarely find institutional expression or lead to structural reforms. For this, an informed public debate is necessary.
The behaviour of individual officers is a very gray thing. The pressures on them from the higher ups, from the organization and its structure and the society mean that the officers operate in a minefield, an in an area where mistakes are not just mistakes they can learn from, they are often disastrous. I think one of the main problems for policing is loyalty. Loyalty to the society, in whose service the police force function and operate.

And what is about the police culture. It is the culture of taking sides. Society expects the policemen to function fairly and impartially but it is a far dream. In the public perception the Police acts only when there is pressure from above or the palms of policemen are greased.

Despite repeated recommendations of the Police Commissions little has been done for police reforms. We have economic reforms, we have power sector reforms, and we have money market reforms. But there is no talk of police reform. There is a strong resistance to the idea of police reforms because politicians and bureaucrats both have developed a great vested interest in retaining control and superintendence over the Police organization. Within the Police establishment also there are those who are content to retain the status quo. They are closely associated with powerful interests and allow the system to continue.

This system is resulting in subverting the rule of law and also obstructing the growth of a healthy and professional system.

Police does not work in a vacuum. It works in a social and political order. The situation in India has been complicated by not very fair political and electoral system largely funded by black money and criminal muscle power. Such system uses the Police force for its parochial end.

Therefore, for the evolution of a responsible Police force we shall have to create a responsible and responsive polity. But that seems to be a tall order and there is no effort from any quarter to bring the change. There is complete lack of leadership in every field whether it in religious. We have no leaders in true sense who could guide us and lead us to a better democratic governance.

But till we get another Gandhi let us do a little bit ourselves. Debate our ills. That is what we are doing here today.

A beginning can be made by implementing the Police Commission’s recommendations that included suggestion of establishment of a state security commission in every state as a statutory body. The state security commission can lay down policy guidelines for the performance of preventive and service oriented functions by the Police and can evaluate the performance of the state police every year. Although the state legislatures discuss the functioning of police during budget sessions but we know how low the level of discussion there has gone down. There is hardly any objective or constructive discussion on any subject in legislatures.

The police commission can also act as a forum where police personnel could air their grievances over illegal orders and their shifting for not obeying political masters.

There is an urgent need for an independent auditor or monitor to check unfair investigation means.

The police force is really needed to be accountable to create people’s confidence in it.. It should have to be made to understand that it cannot get away with anything it wants to.

The country has invested hugely in the expansion of police force but no related investment has been made in holding its personnel accountable. And that should be our main priority.

(A keynote address presented at a workshop held at University of Rajasthan)