Saturday, March 20, 2010

दास्तान ‘नीचा नगर’ की









राजेंद्र बोड़ा

'नीचा नगर' फिल्म हमेशा ही गुमनामी के अँधेरे में रही. वास्तव में वह दर्शकों तक कभी पहुच ही नहीं सकी. इतने बड़े देश में जहाँ सबसे अधिक संख्या में फ़िल्में बनती है और हर तरह की ऊल-जलूल फ़िल्में सिनेमाघरों के पर्दों पर उतरती हैं वहां इस फिल्म को रिलीज करने वाला कोई नहीं मिला. ऐसा उस फिल्म के साथ हुआ है जिसको अंतर्राष्ट्रीय 'कान्स फिल्म समारोह' का लब्धप्रतिष्ठ 'ग्रां प्री' का खिताब अर्जित करने का गौरव प्राप्त है. फिल्म 1946 में बन कर तैयार हुई और उसी साल शुरू हुए अंतर्राष्ट्रीय 'कान्स फिल्म समारोह' में उसने अपना परचम फहराया. जब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु को पता चला कि एक भारतीय फिल्म ने अंतर्राष्ट्रीय खिताब जीता है तो उन्होंने यह फिल्म देखने की ख्वाइश जाहिर की . दिल्ली के तब 'वाइसरीगल लॉज', जो अब राष्ट्रपति भवन कहलाता है, में 'नीचा नगर' का एक शो रखा गया. शो में नेहरु जी के अलावा माउन्टबेटन दंपत्ति भी मौजूद थे. फिल्म के शो के बाद नेहरु ने फिल्म की खूब तारीफ़ की और माउन्टबेटन ने सलाह दी कि फिल्म के अंग्रेजी में सब-टाइटल तैयार किये जाय और उनके साथ यह फिल्म देश विदेश में प्रदर्शित के जाय. उन्होंने चेतन आनंद से कहा कि वे उस जमाने के बहुत बड़े फिल्मकार अलेक्जेंडर कोरडा के नाम एक चिट्ठी लिख देगे जो फिल्म के अंग्रेजी सब-टाइटल बनवाने में मदद करेंगे. मगर देश के विभाजन के हंगामें में इस फिल्म की किसी को याद नहीं रही.

मगर आज़ादी के बाद जेहरू जी को यह फिल्म जरूर याद रही. सन 1950 में जब दिल्ली में पहली एशियाई कांफ्रेंस हुई तब उसमें भाग लेने वाले प्रतिनिधियों को उन्होंने राष्ट्रपति भवन में ‘नीचा नगर’ विशेष तौर पर दिखाई. गणमान्य दर्शकों में मिश्र के राष्ट्रपति अब्दुल नासर, युगोस्लाविया के मार्शल टीटो, बर्मा के यू थांट जो बाद में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बने और श्रीलंका की राष्ट्रपति एस भंडारनायके के अलावा कांग्रेस के सभी बड़े नेता, स्वतंत्रता सेनानी, फिल्म और व्यवसाय जगत की प्रमुख हस्तियाँ मौजूद थीं.

बावजूद नेहरु और सरकारी दिलचस्पी के और कान्स के पुरस्कार के 'नीचा नगर' के निर्माता राशिद अनवर वितरकों को फिल्म बेचने और उसे सिनेमाघरों में प्रदर्शित कराने में सफल नहीं हो सके. फिल्म के निर्माण के लिए राशिद अनवर ने एक सेठ से कुछ पैसे उधार लिए थे. मूल रकम पर ब्याज की राशि बढती जा रही थी. रकम उधार देने वाला सेठ जो कपास का व्यवसायी था धमकी दे रहा था कि उसके पैसे नहीं चुकाए गए तो वह फिल्म की नीलामी करा देगा. उसने न केवल ऐसी धमकी दी बल्कि वह फिल्म का निगेटिव भी लेबोरेट्री से उठा ले गया और उनके डिब्बे अपने रूई की गांठों के गोदाम में ला पटके. यह फाइनेंसर अपने पैसों के अलावा अन्य कोई बात सुनने को तैयार नहीं था.

हताशा की हालत में चेतन आनंद दौड़ कर दिल्ली गए और जनरल थिमैया से मिले जिन्हें वे पहले से जानते थे. थिमैया ने 'नीचा नगर' देखी थी. चेतन को आशा थी कि वे कुछ ऐसे पैसे वालों को जानते होंगे जो उनकी मदद कर सके. जनरल थिमैया ने चेतन आनंद की सरदार वल्लभ भाई पटेल से मुलाकात तय करा दी. पटेल राज्यों के विलीनीकरण के काम में बहुत अधिक व्यस्त थे मगर क्योंकि थिमैया की सिफारिश थी उन्होंने कहा कि दिन में तो समय नहीं मिलेगा. मैं तडके सैर करने जाता हूँ. चेतन तभी आ जाएँ और बात कर लें. पटेल ने सैर पर चलते-चलते चेतन से सारा किस्सा बड़े धैर्य से सुना और कहा कि फिल्म को रहन से छुड़ाना सबसे महत्वपूर्ण बात है. जब चेतन ने उनसे कहा कि यदि वे बिडला जी या अन्य किसी बड़े उद्योगपति से कह दें तो काम बन सकता है तो पटेल ने कहा कि वे जिस पद पर हैं उसे देखते हुए उनके लिए ऐसा करना उचित नहीं होगा.

'नीचा नगर' मुश्किलों में घिरी है इसकी खबर नेहरु जी तक भी पहुची और उनकी दिल्ली के हयातुल्ला अंसारी साहब से लम्बी खतो-किताबत भी हुई. वे भी इस बात से उदास हुए कि अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाली पहली भारतीय फिल्म शायद थियेटर में कभी रिलीज न हो सकेगी और आम जनता उसे कभी नहीं देख सकेगी.


बाद में जब बम्बई में फाइनेंसर पर सब तरफ से दबाव पड़ा तो वह फिल्म की नीलामी स्थगित करने को राजी हो गया. उसने अपने एक अन्य परिचित फिल्म निर्माता से राय ली. उसने उसे सलाह दी कि क्योंकि वितरक फिल्म उठाने को तैयार नहीं हैं इसलिए बॉक्स आफिस अपील के लिए फिल्म में एक गाना और एक नृत्य का आइटम डाल ले और वह खुद ही फिल्म को सिनेमाघरों में रिलीज कर दे और अपना पैसा वसूल ले.

चेतन आनंद चाहते थे कि फिल्म वैसी ही रिलीज हो कैसी कान्स में प्रस्तुत की गयी थी लेकिन फिल्म को सिनेमाघरों के परदे पर लाने के लिए उन्होंने ऐसा समझौता करना स्वीकार कर लिया. इससे फाइनेंसर जो फिल्म के निगेटिव की नीलामी पर आमादा था थोडा नरम पड़ा और रिलीज प्रिंट बनाने के लिए निगेटिव के डिब्बे लेबोरेट्री को भेज दिए.

और इस तरह एक संकट टला. लेकिन बाद में लेबोरेट्री में आग लग गयी और 'नीचा नगर' फिल्म की निगेटिव उसमें जल कर पूरी तरह ख़ाक हो गयी. लेकिन उससे पहले फिल्म के कुछ प्रिंट बना लिए गए और प्रदर्शन के लिए वहां से बाहर आ गए.

सन 1950 में राष्ट्रपति भवन में फिल्म के शो के बाद फिल्म के निर्माता ने 'नीचा नगर' को अपने स्तर पर रिलीज करने की कोशिश की तो उसे बम्बई में कोई ढंग का सिनेमा हाल ही नहीं मिला और उसे बम्बई के एक उपनगर के मामूली सिनेमाघर में फिल्म प्रदर्शित करनी पड़ी. फिल्म की तकदीर देखिये स्थानीय दर्शकों ने इस प्रयोगवादी सिनेमा के प्रति घोर अरुचि दिखाई. उनके लिए फिल्म में गाने नहीं थे, डांस नहीं थे, कोई लटके-झटके नहीं थे. दर्शकों ने पहले ही शो में सिनेमाघर की सीटें फाड़ डाली और अपने टिकट के पैसे वापस मांगने लगे. रशीद अनवर की हिम्मत फिर और किसी जगह यह फिल्म लगाने की नहीं हुई.

भाग्य का खेल देखिये. फिल्म का एक प्रिंट कलकत्ता पंहुचा होगा. वहां फिल्म देख कर एक बंगाली नौजवान ने चेतन आनंद को चिट्ठी लिखी कि वह फिल्म से बड़ा प्रभावित हुआ है और उसे इससे प्रेरणा मिली है कि वह भी ऐसी फिल्म बनाए. जब यह चिट्ठी आनंद परिवार में पहुंची तो उसे भेजने वाले को कोई नहीं जानता था. चिट्ठी लिखने वाला नौजवान था सत्यजित राय.

यह भी अजब संयोग रहा की 'नीचा नगर' अगर आज हमारे लिए उपलब्ध है उसके लिए भी सत्यजित रॉय के केमरामैन का योगदान नहीं भुलाया जा सकता. कई बरसों बाद एक दिन ये केमरामैन कलकत्ता के चोर बाज़ार में घूम रहे थे. उन्होंने देखा कि एक कबाड़ी के यहाँ किसी फिल्म के डिब्बे पड़े हैं. जिज्ञासावस वे एक रोल उठा कर देखने लगे. उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ. वे मुड़े और अपने साथ चल रहे मित्र से कहा अरे देखो तो ये तो 'नीचा नगर' है. उन्होंने फिल्म के सारे डिब्बे महज दस रुपयों में कबाड़ी से खरीद लिए. वो प्रिंट आज पुणे की फिल्म इंस्टिट्यूट के अभिलेखागार में राष्ट्रीय धरोहर के रूप में संरक्षित है.

'नीचा नगर' को 1946 में कान्स का ग्रां प्री खिताब ही नहीं मिला बल्कि फिल्म क्रिटिक्स जूरी ने भी अपनी मेरिट सूची में उसे सर्वोच्च स्थान पर रखा. सन 1995 में कान्स के स्वर्ण जयंती समारोह में 'नीचा नगर' विशेष तौर पर प्रदर्शित की गयी.

'नीचा नगर' ने आज 64 साल बाद भी अपनी अहमियत नहीं खोई है. फिल्म की कहानी अमीर और गरीब के बीच की लड़ाई है. फिल्म का सबसे पावरफुल किरदार निभाया रफ़ी पीर ने जो जर्मन राइनहार्ट स्कूल आफ थियेटर से प्रशिक्षण पाए हुए थे. जिस प्रकार से उन्होंने किरदार को प्रस्तुत किया उसकी कोई सानी नहीं. फिल्म के टाइटल में यह लिखा हुआ आता है क्रियेशन बाय चेतन आनंद. वास्तव में फिल्म चेतन की ही रचना है. चेतन का फिल्म क्षेत्र में प्रशिक्षण विश्व सिनेमा की तब की बेहतरीन फिल्मों को देखने और उन पर मनन करने के अलावां कुछ नहीं था. लेकिन उन्होंने कैमरे से जो स्वन्सार रचा वह अद्बुत था. रफ़ी पीर ने एक अमीर आदमी का किरदार निभाया जो नगर पालिका का अध्यक्ष चुन लिया जाता है और कम दामों पर जमीने खरीद लेता है जिस पर ऊंची इमारतें बनवाना चाहता है. उसकी जमीन दलदल वाली है क्यों कि उस पर से होकर एक नाला गुजरता है. साम, दाम, दंड, भेद से वह नाले का बहाव गरीबों की बस्ती नीचा नगर की तरफ मुडवा देता है. इससे नीचा नगर में बीमारियाँ फैलने लगती है. उसके कारकून बस्ती का पानी का कनेक्शन भी काट देते है. फिर गरीबों का हितैषी का रूप धर कर वह बीमार मरीजों के लिए नीचा नगर में अस्पताल खोल देता है. यहाँ नीचा नगर के लोग अहिंसक आन्दोलन पर उतर आते है. वे घोषणा करते हैं कि वे मरना मंजूर करेंगे मगर अमीर के अस्पताल में इलाज नहीं करवाएंगे. इन दृश्यों पर गांधी के असहयोग आन्दोलन की पूरी छाप है. चेतन का कैमरावर्क दृश्यों को शानदार तरीके से उभारता है. अमीर के किरदार का नाम दिया गया है सरकार साहब. सरकार साहब के किरदार में रफ़ी पीर का स्टाइलिश अभिनय तो फिल्म की विशेषता है ही उसे उभारने में कैमरे के शाट्स देखने लायक है. सरकार साहब और बस्ती के लोग जब आमने सामने होते हैं तब सरकार साहब के शाट्स लो एंगल से लिए गए है जिससे किरदार सभी पर हावी नज़र आता है. दूसरी तरफ बस्ती के लोगों के प्रतिनिधिमंडल के शाट्स हाई एंगल से लिए गए हैं जिनमें जिनमें वे दबे हुए दिखते है.

फिल्म का अंतिम दृश्य अत्यंत ही प्रभावशाली बन पड़ा है. नायिका गंदे नाले से फैली बीमारी की चपेट में आ जाती है मगर सरकार साहब के अस्पताल में अपना इलाज कराने से इनकार कर देती है और उसकी शहादत हो जाती है. उसकी चिता की लपटों को फ्रेम में लेता हुआ कैमरा लोगों द्वारा थाम ली गयी मशालों पर चला जाता है. बहुत ही खूबसूरत प्रतीकात्मक दृश्य है. लोगों के हाथों में मशालें हैं और उनके चेहरे दीप्तिमान है. मशालें ले कर लोगों का हूजूम सरकार साहब के घर की तरफ निकल पड़ता है. मशालों की लौ से झिलमिलाती रोशनी की लंबी पंक्ति के दृश्य विश्व के किसी भी बड़े निर्देशक के काम से कमतर नहीं है. सबसे दिल्चास्क बात यह है की चेतन आनंद ने ये दृश्य धुंधले हो गए फिल्म के खराब रा स्टाक पर शूट किये. उनके पास दूसरा रा स्टाक खरीदने के पैसे नहीं थे. फिल्म की राशनिंग का ज़माना था. मगर चेतन ने खराब रा स्टाक का उपयोग शाम के धुंधलके में मशालों का दृश्य फिल्माने के लिए किया और एक अद्भुत रचना कर डाली. आज के निर्देशक ऐसे प्रभाव उत्पन्न करने के लिए जान बूझ कर फिल्म को धुंधला करते है.

फिल्म इप्टा के कलाकारों का मिला जुला प्रयास था. बस्ती के लोगो ले लम्बे जूलूस में शामिल प्रत्येक कलाकार इप्टा के थियेटर जत्थे का सदस्य था. फिल्म की गैर परंपरागत नायिका का किरदार निभाने के लिए चेतन ने एक नए चेहरे को चुना जिसने बड़ी खूबसूरती से यह भूमिका अदा की. यह अदाकारा थीं उमा कश्यप. वह लाहोर के गवर्नमेंट कालेज के प्रोफ़ेसर कश्यप की बेटी थी. कश्यप परिवार से चेतन की पुरानी पहचान थी. क्योंकि चेतन कश्यप परिवार के पारिवारिक मित्र थे इसलिए उषा की मां ने इस फिल्म में काम करने के लिए अपनी बेटी को इजाजत दे दी. फिल्म के लिए उषा का नामकरण किया गया कामिनी कौशल जो बाद में बहुत बड़ी अभितेत्री बनी.
सरकार साहब की भूमिका निभाने वाले रफ़ी पीर बाद में पकिस्तान चले गए. उनके बच्चों ने बाद में पाकिस्तान में थियेटर में बड़ा नाम कमाया. वे पीरजादा कहलाते हैं और भारत आते रहते हैं. भारत पाक सांस्कृतिक आदान प्रदान समारोह में पाकिस्तान में भारत के हाई कमिश्नर शिव शंकर मेनन ने पीरजादा परिवार को 'नीचा नगर' फिल्म की एक प्रति भेंट की. पीरजादा बच्चों ने तब पहली बार अपने पिता को फिल्म में अभिनय करते देखा.

अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त अभिनेत्री जोहरा सैगल इस फिल्म में पहली बार परदे पर नज़र आयी. कामिनी कौशल से साथ फिल्म में नायक की भूमिका निभाने वाले मोहन सहगल की भी यह पहली फिल्म थी. उन्होंने फिल्म में चेतन के सहायक निर्देशक के रूप में भी काम किया. मोहन सहगल ने बाद में बहुत सी सामजिक फ़िल्में बनाई. सुपर हिट फिल्म 'सावन भादों' में उन्होंने अभिनेत्री रेखा को पहली बार मौका दिया. सरकार साहब की बेटी की भूमिका के लिए कोई अनुकूल कलाकार नहीं मिला तो वह भूमिका चेतन की पत्नी उमा आनंद ने बड़ी खूबी से निबाही.

चेतन को स्वयं को संगीत में बहुत रूचि थी. इसीलिए उनकी फिल्मों में संगीत को बहुत अहमियत मिली. 'नीचा नगर' के संगीत के लिए चेतन ने चुना पंडित रवि शंकर को. उस समय वे उस्ताद बाबा अल्लाउदीन खान के प्रमुख शिष्यों के रूप में उभर रहे थे. रवि शंकर ने पहली बार किसी फिल्म के लिए संगीत देते हुए जिस प्रकार दृश्यों को संगीत का सहारा दिया उसे संगीत के रसिक आज भी आनंदित होते हैं.

आज भी 'नीचा नगर' का कोई प्रमोटर नहीं है. एक विडियो कंपनी ने बहुत ही बुरे तरीके से 'नीचा नगर' की वीसीडी जारी की जिसे दस दस रुपयों में भी कोई खरीददार नहीं मिला. अपनी धरोहर को ठीक से प्रस्तुत करना ही हमें नहीं आता. फिल्म डिजिटली री-मास्टर की जाय उसका साउंड ट्रेक ठीक किया जाय और उसकी बेहतरीन डीवीडी जारी करने की किसी को सुध नहीं है. विदेशों में ऐसा होता है. फिल्म के शानदार प्रिंट की डीवीडी बनती है. साथ में फिल्म से जुड़े लोगों की विशेष भेंट वार्ताएं होती है. समीक्षकों की भेंट वार्ताएं होती हैं कि क्यों यह फिल्म महान है.

'नीचा नगर' भारतीय सिनेमा की ऐसी धरोहर है जिस पर आने वाली पीढियां गर्व कर सकेंगी. उन्हें यह जान कर आश्चर्य होगा की सत्यजित रॉय की 'पाथेर पांचाली' के निर्माण से दस बरस पहले ऐसी फिल्म बन चुकी थी जिसने भारतीय सिनेमा को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दी. कान्स अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में 1946 में नीचा नगर को जब श्रेष्ठ फिल्मों की सूची में सबसे ऊपर स्थान दिया गया तब उसके साथ की फ़िल्में थीं : डेविड लीन की 'ब्रीफ एनकाउन्टर' और इंगमार बर्गमेन की 'फ्रेंज़ी'.


(पिंक सिटी प्रेस क्लब और फिल्म फैन्स सोसाइटी की और से जयपुर के प्रेस क्लब में 13 मार्च 2010 को 'नीचा नगर' के प्रदर्शन के अवसर पर दिया गया वक्तव्य.)

1 comment:

Anonymous said...

I love readding, and thanks for your artical...................................................