Sunday, December 26, 2010

अकादमियाँ बदहाल : कैसे बचाएँ कला और संस्कृति की पहचान

राजेन्द्र बोड़ा

कला और संस्कृति की पहचान बनाए रखना भी मानव अधिकारों में आता है। मानव अधिकारों की गारंटी देने की जिम्मेवारी राज्य की होती है। राजस्थान अपनी कला और संस्कृति के लिए दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। यह पहचान बनाई रखने में इसीलिए राज्य की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। देश की आज़ादी के बाद अपनाई गई संवैधानिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब लोक की प्रतिनिधि सरकारें बनीं तब अन्य बातों के अलावा लोक कला और संस्कृति के संरक्षण की जिम्मेवारी स्वतः ही उन पर आ गई। राजस्थान में राज्य’ने स्थानीय कला और संस्कृति को बचाए रखने का अपना दायित्व निभाते हुए विभिन्न अकादमियाँ स्थापित कीं। इनकी स्थापना के पीछे सोच यह था कि इनको राज्य की वित्तीय मदद मिले मगर उनका संचालन लोकतान्त्रिक हो। राजस्थान में स्थापित कीं गईं अकादमियों के संविधान इसी के अनुरूप बनाए गए। माना गया कि अपने-अपने क्षेत्र के कुशल लोग, जानकार लोग और कला-संस्कृति से सरोकार रखने वाले लोग इनमें आएँगे जिससे न केवल प्रदेश की कला और संस्कृति का संरक्षण हो सकेगा बल्कि उन्हें बढ़ावा भी मिलेगा। कला और संस्कृति के संरक्षण में राज्याश्रय की अवधारणा हमारे यहाँ बहुत पुरानी है। मगर पुरानी राजाशाही में एक राजा की पसंद या नापसंद और उसकी सनक पर सब कुछ चलता था। इसीलिए पुराने सामन्ती युग में कला और संकृति के उजले और अंधेरे दौर हमें इतिहास के पन्नों में देखने को मिलते हैं। आज़ादी के बाद जब भारत के संविधान में लोक के शासन की व्यवस्था की गई तब यह सपना देखा गया कि अब क्योंकि ‘लोक’अपने भाग्य का विधाता खुद है इसलिए ऐसी लोकतान्त्रिक संस्थायें बनेंगी जिन्हें राज्याश्रय प्राप्त होगा मगर वे किसी की पसंद, ना पसंद या सनक से काम नहीं करेंगी। वे सरकारी विभाग नहीं होंगी और उन पर नौकरशाही का कोई दबाव नहीं होगा। वे स्वतंत्र रूप से काम करेंगी और सरकार का मुँह नहीं ताकेंगी। ऐसे ही जज़्बों के साथ राजस्थान साहित्य अकादमी, राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, और राजस्थानी भाषा एवं संस्कृति अकादमी जैसी संस्थायें स्थापित हुईं। बाद में इसी तरह अन्य अकादमियाँ बनाईं गईं जैसे उर्दू अकादमी, बृज भाषा अकादमी और नवीनतम पंजाबी अकादमी। लेकिन पिछले साठ वर्षों से अधिक का आज़ादी के बाद का अनुभव हमें बताता है कि हम लोकतान्त्रिक संस्थाओं को पल्लवित नहीं कर सके। ऐसी संस्थाएं बनाई जरूर हमने पर उन्हें संवारना तो दूर रहा हम उन्हें सँभाल कर भी नहीं रख सके। बड़ी अपेक्षाओं के साथ बनीं सभी अकादमियाँ आज मृतप्राय: हैं।
स्वतंत्र रूप से काम करने के लिए अकादमियों की स्थापना का श्रेय कॉंग्रेस को जाता है जिसने आज़ादी के बाद लंबे समय तक प्रदेश में लगातार सरकार चलाई। सन 1977 के बाद बीच-बीच में यदा-कदा विपक्ष के लोग सरकारें चलाते रहे मगर वर्चस्व कॉंग्रेस का ही बना रहा है। अब प्रदेश में फिर कॉंग्रेस का शासन है और उसका नेतृत्व अशोक गहलोत कर रहें हैं जो पहले भी पाँच वर्ष का कार्यकाल मुख्यमंत्री के रूप में बिता चुके हैं। इसीलिए उनसे राजस्थान के लोग स्वाभाविक रूप से यह अपेक्षा रखते हैं कि वे अपने पिछले कार्यकाल के अनुभवों की सीख से शासन की बागडोर और अधिक बेहतर तरीके से थाम कर चलेंगे। लोग उनमें गांधी का सोच देखते हैं इसीलिए उनके लिए “राजस्थान का गांधी” का नारा तक लगाते रहते हैं। जमीन से जुड़े हुए इने गिने राजनेताओं में उनका शुमार होता है। प्रदेश की लोक संस्कृति और कलाओं से वे अपना सरोकार का सार्वजनिक रूप से वे इज़हार करते रहते हैं। उन्हीं के नेतृत्व वाली सरकार ने पिछली बार राज्य विधान सभा में राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में रखने का प्रस्ताव पारित करवा कर केंद्र सरकार को भिजवाया था। मगर इसे क्या कहें कि उन्हीं के मौजूदा कार्यकाल में कला, संस्कृति और भाषा अकादमियाँ ठप पड़ीं हैं।
अकादमियों का यह हश्र एक दम या रातों-रात नहीं हुआ है। पहले इनमें राजनीति घुसी। सत्ता के निकट रहने या सत्ता का मुँह ताकने वालों को इन संस्थाओं में पदों पर बिठाने का खेल बहुत पहले शुरू हो गया था। इससे अकादमियों के पद मात्र श्रंगारिक बन कर रह गए। इनके पदों पर रुतबे वाले लोग नहीं बल्कि पद से रुतबे की चाह रखने वाले लोग आसीन होते गए। ये संस्थाएं स्वतंत्र हैसियत वाली बनने की बजाय आत्म समर्पण वाली संस्थाएं बन कर रह गईं। जब उनकी हैसियत ही नहीं रही तब नौकरशाही कब उन्हें बक्षने वाली थीं। आज इन अकादमियों का कोई रुतबा नहीं है, कोई स्वतंत्र वजूद नहीं है। रही-सही कसर सरकार के उस उदासीन रवैये ने पूरी कर दी जिसके तहत नए शासन के डेढ़ वर्ष का कार्यकाल पूरा हो चुकने के बाद भी किसी को यह सुध नहीं है कि वैधानिक व्यवस्थाओं के अनुरूप उनका गठन भी किया जाना है। अकादमियाँ सरकार की प्राथमिकताओं में कहीं कोई स्थान रखती है इसका प्रमाण नहीं मिलता। कला और संस्कृति के सरोकारों से विमुख होकर कोई लोकतान्त्रिक सरकार किस तरह अपने को लोक हित वाली सरकार होने का दम भर सकती है? मगर शासन में बैठे लोग पिछली चुनावी जीत के जश्न से उठे गुबार में इस तरह घिरे रहते हैं कि दीवार पर उकरी इबारत उन्हें पढ़ने में नहीं आती। वरना क्या कारण हो सकता है कि जब बाज़ार सभी क्षेत्रों में अपनी घुसपैठ कर चुका हो और कला और संस्कृति को उत्पाद बना देने पर आमादा हो तब भी उनके संरक्षण की तरफ सरकार का ध्यान नहीं जाता। सरकार चलाने की अपनी लोकतान्त्रिक मजबूरियां हो सकती है। परंतु अकादमियों को पंगु बनाए रखने का खेल इन मजबूरीयों का हिस्सा नहीं हो सकता। यदि ऐसा है तो और भी बुरा है।
मुद्दा यह नहीं है कि इन अकादमियों का पुनर्गठन करके उनमें अध्यक्षों की कुर्सियों पर बैठा कर किन्हीं लोगों की शोभा बढ़ाई जाय या किन्हीं लोगों के राजनैतिक हित सँवारे जाय। मुद्दा यह है कि इन अकादमियों को जीवंत, लोकतान्त्रिक और स्वतंत्र संस्थाओं के रूप में विकसित होने दिया जाय। यह तभी संभव है जब उन्हें नौकरशाही के चंगुल से आज़ाद किया जाय और उन्हें वित्तीय रूप से सक्षम बनाया जाय। इन संस्थाओं की कमान जिन किन्हीं के हाथों में सौंपी जाय उन पर भरोसा किया जाय और सरकार का काम सिर्फ निगरानी का हो हस्तक्षेप का नहीं। आज की परिस्थितियों में ऐसा तभी हो सकता है जब मुख्यमंत्री सीधे इस काम को देखे। सरकार की असली दखलंदाजी अकादमियों को दी जाने वाली वित्तीय मदद से होती है। कुछ ऐसी व्यवस्था करनी होगी जिसमे अकादमियों को भरपूर वित्तीय मदद मिले और एक बार उन्हें बजट दे देने के बाद उनके काम में टाँग नहीं अड़ाई जाय। जिन लोगों को इनकी कमान सौपी जाय उन्हें काम की आज़ादी तभी मिल सकेगी। यदि ऐसा हो जाय और अच्छे लोग इन अकादमियों को संभालने आ जाएँ तभी संभव है कि प्रदेश की कलाओं और संस्कृति के दिन फिरें। मगर यह दिवास्वप्न जैसा लगता है। जिस बुरी हालत में आज प्रदेश की विभिन्न अकादमियाँ पड़ी हुईं है और जिनकी तरफ ध्यान देने की फुर्सत शासन में नहीं है उसके चलते कोई बड़ा उपाय होता नहीं दीखता। कहा जा सकता है कि कला और संस्कृति के संरक्षण के लिए सरकार पर ही क्यों आश्रित रहा जाय। गैर सरकारी प्रयास भी तो हो सकते हैं। हमारे जीवन के हर क्षेत्र में राज्य’की दखलंदाजी भरपूर है। उसका सारा कारोबार जनता के पैसों से ही चलता है। इसलिए यदि उससे इमदाद मांगी जाती है तो यह माँगना हमारा हक है। अपनी कलाओं और संस्कृति को बचाए रखने का हक हमारा मानव अधिकार है। और इस अधिकार की रक्षा करना राज्य’ का दायित्व है। शासन को उसका दायित्व याद दिलाना हमारा फर्ज़ भी है और अधिकार भी।

Wednesday, December 22, 2010

तेल ने राजस्थान के लिए खजाना खोला : क्या शासन तैयार है इस पैसे के सदुपयोग के लिए ?


राजेंद्र बोड़ा

राजस्थान की धरती ने इस प्रदेश के पिछड़ेपन की कालिख को पोंछ कर इसे आधुनिक, खूबसूरत और सम्पन्न राज्य बनाने के लिए अपने गर्भ का खजाना खोल दिया है। पश्चिमी इलाक़े मारवाड़ के बाड़मेर जिले में मिले तेल से होने वाली राजस्व आय राजस्थान की सारी मुश्किलें आसान कर देने के लिए काफी है। एक मोटे अनुमान के अनुसार इस तेल की रॉयल्टी के रूप में राज्य सरकार को प्रति वर्ष करीब 200 करोड़ रुपयों का राजस्व मिलेगा जो हमें प्रकृति से मिला अनुदान है। राज्य सरकार को होने वाली यह अंतिरिक्त आय उसके अपने बजटीय प्रयासों का फल नहीं है। लेकिन जिस प्रकार की संवैधानिक वित्तीय व्यवस्था हमारे यहाँ है उसमें यह अतिरिक्त आय भी उस समेकित निधि में जाएगी जिसमें सभी प्रकार के कर राजस्व तथा अन्य स्रोतों से होने वाली आमद जाती है। इसी समेकित निधि से सरकार अपने सारे खर्चे चलाती है।

मगर क्या इस नई आय को अन्य राजस्व की तरह मान कर सामान्य तौर पर खर्च कर देना उचित होगा? या फिर राजस्थान की तक़दीर बदलने के लिए इस आय को खर्च करने की अलग से कोई योजना बनाना मुनासिब होगा जिससे यह पता चलता रहे कि तेल से मिलने वाली विशाल राशि किन मदों पर और किस तरह खर्च की जा रही है? इन सवालों को आज गंभीर चर्चा की दरकार है। अफसोस है कि विधानसभा में हमने जिन्हें चुन कर भेज रखा है उनमें ऐसा कोई सरोकार नज़र नहीं आता।

लोकतंत्र में आम जन सरकार चलने के लिए अपनी पसंद के प्रतिनिधि चुनते हैं. मगर निर्वाचित प्रतिनिधि चुने जाकर मालिक नहीं हो जाते. वे आम जन या कहें मतदाताओं के प्रतिनिधि की हैसियत से राज में बैठते हैं और शासन का संचालन करते हैं. इसलिए जरूरी है कि जनता के नुमाइंदे सरकार का काम-काज चलाते हुए बीच-बीच में आम जन से संवाद करें और प्रमुख मुद्दों पर उनकी राय जानें और उसी अनुरूप काम करें. किसी भी सरकार का प्रमुख काम होता है प्रशासनिक व्यवस्थाओं को चलाना और विकास के कामों को अंजाम देना. सरकार के सारे कामों के लिए खजाने में जो भी धन आता है वह आम जन की मिल्कियत होती है. शासन में बैठे लोग – राजनेता और नौकरशाह - उसके प्रबंधक भर होते हैं।

अचानक से हुई इस नई आय को कैसे खर्च किया जाय इस पर राज्य में आम सहमति बनानी होगी। इसके लिए जरूरी है इस बात पर बहस हो कि इस पैसे को खर्च करके ऐसी क्या अलग चीज की जा सकती है जो राजस्थान की प्रगति को नया आयाम दे और यहाँ के आम लोगों के जीवन को सुखी बना सके। खर्च की मौजूदा व्यवस्था में हम जानते हैं और जिसकी ताईद हर साल प्रस्तुत होने वाली सीएजी की रिपोर्टें करती हैं कि विकास के नाम पर होने वाले खर्च का अधिकतर पैसा निरर्थक चला जाता है और समूचा प्रशासन इस खेल में भृष्ट तंत्र में तब्दील हो चुका है। यदि तेल से होने वाली आय भी उसी तरह उड़ा दी गई और वह भ्रष्टाचार को समर्पित कर दी गई तो राजस्थान के लोगों के सपनें साकार करने का एक बड़ा अवसर हम खो देंगे।

इसलिए प्रशासनिक पारदर्शिता की आज बेहद जरूरत है। जिस प्रशासनिक तंत्र के कारण राजस्थान का विकास और इसकी उन्नति गति नहीं पकड़ पा रही है उसी के भरोसे तेल की रॉयल्टी की आय नहीं छोड़ी जा सकती। इसके लिए लोक भागीदारी से फैसले लेने की जरूरत है। निर्वाचित प्रतिनिधियों के जरिये लोगों की भागीदारी की लोकतांत्रिक व्यवस्था
के बावजूद आज लोगों की सीधी भागीदारी की भी महत्ती जरूरत है क्योंकि चुने हुए प्रतिनिधियों के सरोकार हम सबके सामने हैं।

तेल की रॉयल्टी के मामले में लोगों की सीधी भागीदारी इसलिए भी जरूरी है क्योंकि राज्य के बड़े हिट भी दांव पर है। हम जानते हैं कि केंद्र सरकार के सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठान ओएनजीसी बाड़मेर से निकालने वाले तेल की रॉयल्टी के भुगतान को लेकर समस्या में है। ओएनजीसी और केयर्न एनर्जी के बीच करार के अनुसार केयर्न जितना भी तेल का दोहन करके उसे बेचेगी राज्य को उसकी रॉयल्टी का भुगतान केंद्र के सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठान को करना है। इस प्रतिष्ठान को अब लगता है कि केयर्न के साथ हुआ करार उसके माथे पड़ गया है और वह उससे राहत चाहता है।

दूसरी बात यह है कि राजस्थान के भूखंड से निकालने वाले तेल की रॉयल्टी तेल के बिक्री दाम की 20 प्रतिशन होती है। बाद के तेल की खोज और दोहन के जो ठेके दिये गए उनके लिए रॉयल्टी की दर 12.50 प्रतिशत ही है। ओ एन जी सी केंद्र को यह समझाने में लगा है कि दरों में यह असमानता दूर की जानी चाहिए। ओ एन जी सी को राजस्थान से निकालने वाले तेल की रॉयल्टी का भुगतान करने में परेशानी है। उसे लगता है कि बड़ी कमाई तो केयर्न कंपनी कर रही है रॉयल्टी भुगतान में जिसकी कोई भागीदारी नहीं है। जब कोई नहीं जानता था कि राजस्थान की भूमि से व्यावसायिक स्तर पर तेल निकलेगा तब केंद्र सरकार ने विदेशी खोजकर्ताओं को आमंत्रित करने के लिए यह आकर्षक नीति बनाई थी कि यदि तेल का व्यावसायिक स्तर पर उत्पादन होता है तो उसकी रॉयल्टी का भुगतान ओ एन जी सी करेगी जिसके पास राजस्थान में तेल की खोज का लाइसेंस था मगर कुछ कर नहीं पा रही थी। मगर अब जब तेल मिल गया और केयर्न कंपनी के इसके बूते पर वारे न्यारे हो गए तब ओंजी सी को लगता है कि केयर्न के साथ करार घाटे का सौदा हो गया है। वह इससे निकालना चाहती है। उसका कहना है कि या तो केंद्र रॉयल्टी की दर घटा कर 12.50 प्रतिशत करे या उतना हिस्सा खुद वहाँ करे। भले ही यह ओ एन जी सी और केंद्र के बीच का मसला है मगर राजस्थान के वित्तीय हिट इससे जुड़े है। ऐसी परिस्थितियों में आवश्यक है कि राज्य केंद्र में कोई ऐसा खेल न होने दे जिससे उसकी आय पर असर पड़े। हम जानते हैं कि राजस्थान की केंद्र में बहुत अधिक नहीं चलती। ऐसा आज नहीं हमेशा से होता आया है। इसलिए जनता का दबाव बना रहना बहुत जरूरी है।

इसीलिए समय की माँग है की राज्य प्रशासन तेल से होने वाली आमद के बारे में पूरी तरह पारदर्शिता बरते और उसके बारे में फैसले केवल सचिवालय के बंद कमरों में ही नहीं ले बल्कि फैसलों से पहले सार्वजनिक बहस के अवसर दे। न केवल नई आमदनी की मात्रा को बचाए रखना है बल्कि पैसे का सदुपयोग भी करना है। वह तभी संभव है जब आम जन को नियमित रूप से लगातार यह जानकारी मिलती रहे कि सरकार क्या करने जा रही है। तभी ऐसे फैसलों पर अंकुश रखा का सकेगा जो राजस्थान के हित में नहीं हैं। केवल प्रशासनिक अधिकारियों के भरोसे सब कुछ नहीं छोड़ा जा सकता। यह अवसर है कि पारदर्शिता और जवाबदेही का दम भरने वाली निर्वाचित सरकार के प्रमुख नई लोकतान्त्रिक पहल करके दिखाये। वर्तमान में चल रही राजनैतिक प्रक्रिया की शून्यता के हालत में कैसे शासन को इसके लिए तैयार किया जाय यह सबके लिए सोचने की बात है।

Wednesday, December 15, 2010

बर्बाद गुलाबी गुलशन, बनाने चले वर्ल्ड सिटी


राजेंद्र बोड़ा

जयपुर को वर्ल्ड सिटी बनाने की घोषणा के साथ कांग्रेस ने दो दशक बाद राजधानी की लोकसभा सीट जीती थी। इस शहर को “वर्ल्ड सिटी” बनाने का सपना राजीव और सोनिया गांधी के बेटे राहुल गांधी ने अपनी चुनावी सभा में लोगों के सामने रखा था। राहुल गांधी की बात को पकड़ते हुए ऊपर से नीचे तक के कांग्रेसजन इस झुंझुने को पकड़ कर बैठ गए। प्रदेश की कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार के मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के प्रमुख सदस्य भी यह जताने में पीछे नहीं रहे कि बस अब उनकी सरकार इस शहर को “वर्ल्ड सिटी” बना कर दिखाने ही वाली है। जिस शहर का ‘गुलाबी नगरी’ का दर्जा भी जो प्रशासन बचा के नहीं रख सका वह उसे ‘विश्व नगरी’ का दर्जा कैसे दिला पाएगा यह किसी ने नहीं पूछा।

किसी ने यह भी नहीं पूछा कि “वर्ल्ड सिटी” बनाने कि घोषणा करने वालों का इससे आशय क्या है। जयपुर को विश्व पर्यटन के मानचित्र पर लाना ही क्या उसे “वर्ल्ड सिटी” बना देना होगा? पर्यटकों के लिए कुछ सुविधाएँ जुटा देना और उन्हें अपना कुछ माल बेच देने की जुगत कर लेना ही क्या जयपुर को ‘विश्व नगरी’ बना देना होगा?

जयपुर को “वर्ल्ड सिटी” बनाने के दावे करने वालों ने कभी यह नहीं बताया कि ‘विश्व नगरी’ के रूप विकसित करने के लिए इस शहर की उनकी कल्पना क्या है। जिस शहर की बसावट के लिए बने ‘मास्टर प्लान’ की रोज धज्जियाँ उड़ती हों, जहाँ की गलियां और सड़कें पूरी तरह साफ नहीं हो पाती हों, जहाँ के ट्रेफिक की समस्या दिन ब दिन बद से बदतर होती जा रही हो जहाँ पीने का पानी दिन में एक बार एक घंटे के लिए सप्लाई होता हो, जहाँ के सरकारी अस्पताल जानवरों के बाड़ों की तरह हों उस शहर को “वर्ल्ड सिटी” बनाने का सपना दिखाने वाले राजनेताओं की हिम्मत की दाद देनी होगी कि वे किस सफाई से ऐसा फरेब लोगों को दे सकते हैं।

जयपुर पुरातन राजस्थान का सबसे नया शहर है। इसे बसाने वाले सवाई जयसिंह और इसे बनाने वाले विद्याधर ने बड़े विधि विधान से इस नगरी की रचना की थी। बाद के रियासती शासकों ने भी इसमें कुछ न कुछ जोड़ा। दो सदी से अधिक समय तक इस शहर की खूबसूरती ने इसे विश्व में इसके नाम का परचम फहराया। लोक गीतों में इसके गुणगान किए गए। यहाँ की हस्त कलाओं तथा जवाहरात के कारीगरों ने इसकी खूबसूरती में चार चाँद लगाए। कभी यह शहर “हिंदुस्तान का पेरिस” भी कहलाया। दुनिया के कोने- कोने से आए पर्यटकों ने इसकी शान में लेख लिखे, किताबें लिखीं। एक माने में यह आधुनिक शहर होने के खिताब का हकदार बना।

जयपुर नगरी की ख्याति चहुँ ओर फैली वह बेसबब नहीं थी। यहाँ का नगर नियोजन, यहाँ की सार्वजनिक सुविधाएँ, यहाँ का वाणिज्य व्यवसाय और यहाँ की कला और संस्कृति ने इस शहर को पहचान दी। गुलाबी नगरी का पुराना वैभव देवयोग से नहीं था। वह था यहाँ के लोगों के इस शहर से प्यार के कारण। बरसों तक ‘राजस्थान पत्रिका’ में ‘नगर परिक्रमा’ कालम में इस नगर के इतिहास का मनोयोग से लेखा जोखा प्रस्तुत करने वाले नंदकिशोर पारीक ने एक किस्सा सुनाया था। सवाई रामसिंह के जमाने की बात है। महाराजा सवाई रामसिंह के काल में ही जयपुर में आधुनिक सुविधाएँ आयीं। शहर में पक्की सड़कें बनीं, सार्वजनिक रोशनी का प्रबंध हुआ, रामनिवास बाग जैसे सार्वजनिक स्थान और रामबाग जैसी तामीरें हुई और शहर गुलाबी रंग में रंगा। रामसिंह एक शाम घोड़े पर सवार होकर शहर का मुलाहजा कर रहे थे। साथ में घोड़े पर उनके वजीर चल रहे थे। वे जिस सड़क पर चल रहे थे वह सफ़ेद पत्थरों की बनी थी। एक जगह महाराजा ने देखा कि सड़क पर पान की पीक थूकी हुई है। सफ़ेद पत्थरों पर पीक का लाल रंग अधिक ही उभर कर दिख रहा था। महाराजा ने साथ चल रहे वजीर की तरफ मुँह करके कहा देखो सड़क कैसी गंदी हो गई है। वजीर ने जवाब दिया हुजूर ये तो आम सड़क है। यहाँ तो ऐसा ही होता है। इस पर सवाई रामसिंह ने जो जवाब दिया वह बताता है कि इस शहर का वह वैभव क्यों था। महाराजा ने कहा “आम सड़क व्हेगी थ्हांकी। म्हाको तो यो घर छै”।

यह शहर विश्व नगरी तब बन सकती है जब इसे संभालने वाले इसे अपना घर समझें। मगर अब कौन इसे अपना घर समझता है। न शहर को संभालने वाले और न शहर के अधिकतर वाशिंदे। सभी को अपने हित लाभ की फिक्र है। बाज़ार आधारित आर्थिक नीतियों ने सभी को चूहा दौड़ का धावक बना दिया है। सभी आँख मूँदे दौड़े चले जा रहे है। कुछ भौतिक साधन पा लेने की जुगाड़ में ही पूरा जीवन गुजर जाता है। दशकों से जयपुर में रहने वालों से यदि पूछा जाये कि रोज हवामहल के सामने से गुजरते हुए उन्होंने कभी दो मिनट ठहर कर इस इमारत को नज़र भर के देखा भी है। क्या जयपुर के अधिकतर वाशिंदों को जानकारी है कि शहर में बालानन्द जी के मठ नाम का कोई ऐतिहासिक स्थान भी है। कितने लोगों को मालूम है की फिल्म गीतकार हसरत जयपुरी जिनके गानों ने आज भी दुनिया भर में हिन्दी फिल्म संगीत के चाहने वालों को दीवाना बना रखा है की हवेली चार दरवाजे के पास मौजूद है। कितने लोगों के दिल में उस समय कोई पीड़ा उठी जब उनकी नज़रों के सामने ताल कटोरे का पानी सूख गया और कंक्रीट का जंगल उस पर उगा दिया गया।

कोई भी शहर विश्व नगर बनने से पहले वहाँ के वाशिंदों का आशियाना बनता है। उसकी पहली शर्त होती है वह रहने लायक हो। जहाँ हर एक की जरूरतों को पूरा करने का सामान हो। सब के लिए खुला आसमान हो। साँस लेने के लिए खुली हवा हो। बच्चों के खेलने के लिए उद्यान हों। अंग्रेजी में एक शब्द है ‘सस्टेनेबल’। शहर ‘सस्टेनेबल’ हो। याने वह इस प्रकार से व्यवस्थित हो जो अपने श्रेष्ठ स्तर को थामे रख सके। विश्व नगरी गुणवत्ता वाली होती है, चलताऊ नहीं। वह ऐसी नगरी होती है जहाँ लोग अपने आप को सहज महसूस कर सकें। विश्व स्तर के शहर की सबसे बड़ी पहचान उसकी फुटपाथें होतीं हैं। वे पैदल चलने वालों को कितनी जगह देतीं हैं उससे शहर का वैभव झलकता है और लोगों के प्रति सरोकार प्रदर्शित होता है। शहर सिर्फ कारों और अन्य वाहनों के लिए नहीं होता। वह जीवित लोगों के लिए होता है।

कोई शहर ‘वर्ल्ड सिटी’ के रूप में कई अर्थों में मशहूर होता है। कला और संस्कृति के लिहाज से जैसे पेरिस, मनोरंजन उद्योग के लिहाज से जैसे लास एंजिल्स, मोटर वाहनों के निर्माण के लिए जैसे डेट्रोइट। इसलिए पहले हमें यह तय करना होगा कि जयपुर को हम किस लिहाज से ‘वर्ल्ड सिटी’ बनाना चाहते हैं। राजनेताओं और सरकार में बैठे प्रशासकों की मोटी बुद्धि में एक ही बात आती है पर्यटन की। चलें पर्यटन की दृष्टि से ही जयपुर को वर्ल्ड सिटी बनानी है तो यह तय करना पड़ेगा कि दुनिया भर से यहाँ आने वाले पर्यटकों को हम कैसा शहर दिखाना चाहते हैं? क्या एक ऐसा शहर जहाँ पैदल चलने के लिए सड़क पर कोई जगह नहीं है। क्या ऐसा शहर जिस पर हर तरफ पैबंद ही पैबंद लगे नज़र आते हों। जहाँ की सीवेज लाइनें जगह जगह उबल रही हो। पर्यटक चैन से इस शहर को देखने के लिए कहाँ जाये? जयपुर शहर की सफाई की पुराने जमाने की बानगी देखनी हो तो 1932 में इस शहर पर बनी एक डाकुमेंट्री फिल्म देखे जो अभी इंटरनेट पर यूट्यूब पर उपलब्ध है। उसमें एक दृश्य है त्रिपोलिया बाज़ार में मुख्य सड़क पर एक हाथी निकाल रहा है। चलते-चलते यह विशालकाय जानवर लीद कर देता है। वह नो-चार कदम ही आगे निकला होगा कि एक जामदार हाथ में झाड़ू और टोकरा लिए आता है और साक पर से लीद साफ कर देता है। सत्तर के दशक तक जयपुर नगर परिषद का प्रशासक मुँह अंधेरे दौरे पर निकलता था और शहर की गलियों और सड़कों की धुलवाई पर नज़र रखता था।

लेकिन प्रशासकों और लोगों के मन में इस शहर के प्रति कहीं कोई लगाव नज़र नहीं आता। सभी लोग इस शहर को छीनने-झपटने और इसके वस्त्र तार-तार करने में लगे हैं। हर कोई, जिसकी जितनी भी चलती है, शहर की जमीन को अपनी मिल्कियत बना लेने के उपाय करने में लगा है। अपने घर दुकान का कचरा बाहर खुले में बिखराने की लगता है होड़ लगी है। कचरा उठाने की जिम्मेवारी जिनकी है उन्हें अपने काम के बिलों को पास करवाने से फुर्सत नहीं है।

जयपुर को वर्ल्ड सिटी बनाने से पहले उसे ‘नेशनल सिटी’ और उससे भी पहले ‘स्टेट सिटी’ बनाने के तो उपाय कर लें। फिर वर्ल्ड सिटी की बात करना। जयपुर शहर का आज महत्व सिर्फ इतना है कि वह राजस्थान की राजधानी है। प्रशासनिक तकलीफ़ों से ग्रस्त लोगों का यहाँ मुख्यालय पर आना मजबूरी है। भले ही यहाँ उनकी तकलीफ़ों का निबटारा अधिकतर नहीं होता हो। शहर किसी को सुकून नहीं देता क्यों कि शहर को खुद को सुकून नहीं है।

वर्ल्ड सिटी बजट के आँकड़ों से नहीं बनता। वह लुभावने नारों से भी नहीं बनता। वह किसी देवयोग से खुद-ब-खुद भी नहीं बन जाता। उसके लिए सबको मिल के कुछ करना होता है। उन सब को जो इस शहर से प्रेम करते हैं। राहुल गांधी से चली बात एक अच्छा सपना भी नहीं है क्योंकि वह इतनी धुंध से भरा है कि उसमे भविष्य की कोई तस्वीर देखना बेमानी होगा।

(आलेख प्रेसवाणी पत्रिका के नवम्बर 2010 अंक में प्रकाशित)