Saturday, September 5, 2020

भारत के अमीर विश्व सूची में, मगर गरीबी नहीं मिट रही

राजेंद्र बोड़ा 

सारा मीडिया जगत इस बात के इंतजाम करता है कि हम उसकी इस सूचना से इतराएं कि भारतीय व्यापार और उद्योग की हस्तियां विश्व के सबसे अधिक अमीरों की सूची में स्थान पा रहीं हैं। फॉरचून की अमीरों की नई सूची में 40 वर्ष से कम वय वाले तीन भारतीय युवाओं के नाम शामिल हैं। हालांकि उन्हें यह अमीरी पारिवारिक विरासत से मिली है। ऐसा माहौल बनाया जाता रहा है कि नई अर्थ व्यवस्था के चलते देश की संपन्नता में इजाफा हो रहा है जिसके लिए सभी को उत्सव मनाना चाहिए। यह सच है कि दुनिया के अमीरों की सूची में शीर्ष स्थानों पर भारत के लोगों के नाम आने लगे हैं और सरकारी तंत्र से जुड़ा, खास कर शहरी इलाकों का, मध्यम वर्ग का सरकारी नौकरियां करता और अवकाशप्राप्त तबका और उनके साथ निजी सेवा क्षेत्र में लगे उत्साही युवा सुरक्षित वित्तीय संपन्नता की सीढ़ियां चढ़ हे हैं और वह विलासिता की चीजों पर खर्च को बढ़ा कर बाज़ार की अपेक्षाओं को पूरा कर रहा है। गावों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना का पैसा पहुंचाया जा रहा है जिससे बाज़ार को मदद मिलती रहे। मगर कोरोना महामारी तथा उससे निबटने के लिए हुए लॉकडाउन से अचानक सब गड़बड़ा गया है। बाज़ार को साध लेने वाला और उसी का होकर रह आगे बढ़ता आधुनिक समाज आज नई परिस्थिति में अपने को असहज पा रहा है। नए वित्त वर्ष की पहली तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद में करीब 24 प्रतिशत की गिरावट ने सबको सहमा दिया है। सरकारी कर्मियों में नई संपन्नता किस प्रकार आ रही है इसकी मिसालें मिलती हैं उनके यहां भ्रष्टाचार निरोधक विभाग तथा अन्य आर्थिक अपराधों पर नियंत्रण और जांच के अन्य विभागों द्वारा पड़ने वाले छापों और उनके यहां बेशुमार धन और संपत्ति पकड़े जाने की आ रही नियमित खबरों से। आज जिस प्रकार से लोगों में धन कमाने की लोलुपता बढ़ती जा रही है उसके चलते हर कहीं छल, कपट और चोरी से पैसा कमाने की होड लगी है। दूसरी तरफ बड़े कार्पोरेशन, बैंक व अन्य समूह आम जन को लुभा कर उनकी जेबें खाली करवाने में जुटे रहते हैं। बाज़ार का खेल खेलने वाली कंपनियां पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की हिस्सा होती हैंइसीलिए उसी व्यवस्था के हिसाब से व्यवहार भी करती है। मुनाफे का अंबार लगाने में लगे रहना इस व्यवस्था की फितरत होती है। पहले एक व्यक्ति शोषण करता था। अब नई अर्थव्यवस्था शोषण का संगठित औज़ार मुहैया कराती है। इस व्यवस्था का सबसे बड़ा नियम होता है कि हर चीज उत्पाद है और हर उत्पाद मुनाफा कमाने के लिए होना चाहिए क्या चीज बनाई जायेगी इसका निर्धारण समाज की आवश्यकता के अनुरूप नहीं होता। उसकी प्रेरणा मुनाफा होती है। प्रचार के जरिये गैर जरूरी चीजें भी जरूरी बना दी जाती हैं। बाज़ार के आकर्षण ने समाज में कुछ ऐसा माहौल बना दिया है जिसमें हर एक को लगता है कि पैसे से ही काम होता है और अमीर होने के लिए सिर्फ पैसे की जरूरत होती है। यहां तक कि नई अर्थव्यवस्था में सामाजिक रिश्ते भी पैसे की तराजू पर तुलते हैं। बाज़ार यह याद नहीं आने देता कि धन से खुशियां नहीं खरीदी जा सकती। धन से सूचना मिल सकती है ज्ञान नहीं। धन किसी को मकसद नहीं देता, उसे पाना ही मकसद बन जाता है। बाज़ार निर्मित इसी भ्रम में मानवीय मूल्य तिरोहित हो जाते हैं। व्यक्ति स्वकेंद्रित हो जाता है। बाज़ार यह भ्रम भी देता है कि वह व्यक्ति को चुनने की स्वतन्त्रता देता है। इस प्रकार वह एक ऐसा मायाजाल रचता है जिसमें मानव को अपना उत्कर्ष लोभ, लालच और अधिक से अधिक धन संग्रह करने की प्रवत्ति में लगने लगता है। इस व्यवस्था को अपने पालन और विस्तार के लिए राज्य सत्ता की आवश्यकता होती है। यही कारण है बाज़ार की ताक़तें येन केन प्रकरेण सत्ता पर अपना प्रभुत्व बनाए रखती हैं। विश्व में जब से एक ध्रुवीय व्यवस्था हो चली है यह शिकंजा और अधिक मजबूत हो चला है। अब राज्य खुले रूप से ऐसी अर्थ व्यवस्था के पोषण और विस्तार के लिए काम करता है जो समूचे समाज को बाज़ार के रंग में रंग दे। राज्य की इस भूमिका को हम बहुत साफ देख सकते हैं। जब कभी यह अर्थ व्यवस्था गंभीर संकट में आती है राज्य उसे बचाने के लिए तुरंत उपाय करता है। उसे संकट से उबारने के लिए राज्य जो उपाय करता है उसकी कीमत समूचे समाज को चुकानी पड़ती है जिसमें सबसे अधिक गरीब तबका ही कुचला जाता है। कोरोना महामारी के कारण बाज़ार पर आई आफत को निपटने के जो भी लाखों करोडों के इंतजाम सरकार ने किए हैं वे सब उसे ही उठाने के लिए हैं।      

 

बाज़ार आधारित अर्थ व्यवस्था का प्रादुर्भाव औद्योगिक सभ्यता के साथ हुआ। जब उत्पादन संगठित क्षेत्र में होने लगा और अधिकतम मुनाफे के लिए श्रम का शोषण एक जरूरत बन गई। इसी के साथ आधुनिक अर्थशास्त्र भी स्वतंत्र विषय के रूप में स्थापित हुआ। इससे पहले अर्थशास्त्र दर्शन शास्त्र का हिस्सा हुआ करता था। तब अर्थ के साथ जीवन के नैतिक सबब की बात भी होती थी। जीवन का नैतिक सबब खुशी पाना होता है। हर एक के अपने जीवन मूल्य होते हैं जिन्हें पाना सच्ची खुशी होती है। पूंजी की व्यवस्था इस खुशी को बाज़ार के हिमें परिभाषित करती है। जीवन दर्शन से अर्थ को अलग करके बाज़ार के समर्थकों ने पश्चिम में उसे व्यक्तिवादी बना दिया। धर्म, जो समाज में सम की अवधारणा पुष्ट करता था उसे भी नए पूंजी समर्थित अर्थशास्त्र ने संकुचित कर मुनाफे के लिए व्यवसाय बना दिया। धर्म को भी प्रतिस्पर्धी बना दिया। यहां तक कि इस युग में खुद पूंजीवाद एक प्रकार का धर्म बन गया। पहले के धर्म कहते थे अपने लिए नहीं दूसरे के लिए जियो। दूसरे की मदद करो। जीवन का मकसद सच्ची खुशी पाना है जो दूसरे के चेहरे पर मुस्कराहट लाने से मिलती है। मगर आज का बाज़ार संचालित धर्म कहता है जो करो अपने के लिए करो। अपना हिसाधना ही सर्वोच्च मूल्य है। इसमें धन को बढ़ाने की लालसा, लोभ, और लालच कोई बुरी बात नहीं है। पहले जो जीवन मूल्य अवगुण माने जाते थे वे ही आज मानव के लिए श्रेष्ठ गुण बन गए हैं। लोकतन्त्र में सरकारें भले ही उनके बहुमत से चुनी जाती हो जिनका बाज़ार शोषण करता है मगर निर्वाचित प्रतिनिधि बाज़ार के ही हुए रहते हैं और उन्हीं के कार्य साधते हैं। सरकारें आम जन की होकर भी गणशत्रु के रूप में व्यवहार करने लगतीं हैं। कहने को उसकी सारी नीतियां और सारे कार्यक्रम जनहित के लिए होते हैं। बाज़ार को प्रोत्साहन जनहित के नाम पर ही दिया जाता है। अकूत मुनाफा कमाने का के लिए लालच, लोभ और वैसी ही महत्वाकांक्षा की जरूरत होती है। नई अर्थ व्यवस्था इसके लिए नैतिक आधार देती है। संचार के माध्यम व्यवसायजनित होकर मुनाफे के लिए होते हैं इसलिए वे भी सारा जतन यह करते हैं कि किस प्रकार व्यक्ति को इसके लिए लुभाया जाय। वे लोगों के इस भरोसे का फायदा उठाते हैं कि वे उनकी बात करते हैं, उनकी आवाज हैं और उनके लिए लड़ते हैं। वे राज्य की भूमिका के बारे में कोई गंभीर और गहरे सवाल नहीं उठाते और न ही ऐसी कोई बहस छेड़ने में रुचि दिखाते हैं। सतही मुद्दों पर चिल्ला कर बहस प्रस्तुत कर अपने जनहितकारी होने का ढोंग वे जरूर कर लेते हैं। बाज़ार की शक्तियां आज विजेता है और गरीब की हालत बद से बदतर हो रही है। एक व्यक्ति राष्ट्रीय संपत्ति का जो हिस्सा अपनी अमीरी के इजाफे के लिए लेता है वह ऐसा किसी न किसी को गरीब करके ही करता है। मजरूह सुल्तानपुरी ने अपने एक गीत में खूब लिखा था “गरीब है वो इस लिये के तुम अमीर हो गये/ के एक बादशाह हुआ तो सौ फ़कीर हो गये”। गरीब का जब धीरज टूटता है तो वह अपराध की और प्रवत्त होता है। ऐसे में उस गरीब का शोषण आतंकी राजनैतिक विचारधारा के पोषण के लिए तो कभी संकीर्ण धार्मिक प्रसार के लिए होने लगता है। ऐसे माहौल में खुशी पाने का जीवन का नैतिक सबब मृग मरीचिका बन जाता है।  पूंजी आज इस हद तक सफल है कि सारे ही राजनैतिक दल अपनी मूल विचारधाराओं से च्युत होकर सत्ता पाने की होड में लगे रहते हैं ताकि उनके नायक अपना और अपनों का हित साध सकें। राजनीति में लोग जन सेवा के लिए नहीं अपनी और अपनों की सेवा के लिए आते हैं। लोकसेवा का तंत्र इन्हीं नायकों के लिए होकर रह गया है। संविधान का आमुख और उसके प्रावधान कागजों पर रह गए हैं। संविधान के नीति निर्देशक तत्वों को तो पूरी तरह भुला दिया गया है। आज के बच्चों से पूछें कि क्या वे जानते हैं कि संविधान के दस्तावेज़ में नीति निर्देशक तत्व भी शामिल हैं तो इसका जवाब उनकी आंखों का सवालिया निशान ही होगा। इसीलिए ज़मीनी स्तर पर बदलाव की संगठनात्मक राजनीति तिरोहित हो चुकी है और बाज़ार नियंत्रित सत्ता प्रबंधन शैली ने सबको मोह लिया है। नतीजन राज्य सत्ता का रुतबा खत्म हो रहा है और संवैधानिक मर्यादाओं, लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं और कानून के शासन को बार-बार आघात लग रहे हैं।   

(राष्ट्रदूत के 05 सितंबर, 2020 अंक में अतिथि संपादकीय)  

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