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सामाजिक विवेक की शिक्षा   राजेंद्र बोड़ा मैं अपनी बात इसी किताब के एक अंश से करूंगा : “ हम कोई अच्छी पुस्तक पढ़ते हैं या कोई अच्छी फिल्म देखते हैं या किसी दवा का चमत्कारिक प्रभाव अनुभव करते हैं तो हमारा मन करता है कि जो मिले उससे कहें। ”  सच कहूं तो यही हाल उस पाठक का होता है जो यह पुस्तक पढ़ता है। मेरा यह हाल है , शारदा जी का भी यही हाल है। इस किताब के बारे में दूसरे को बताने की हमारी इसी व्यग्रता का नतीजा यह ‘ संवाद ’ है। शिक्षा की दीक्षा-प्रशिक्षा की रूढ़ि पर शिक्षाविद शिवरतन थानवी हमेशा सवा ल खड़े करते रहे हैं। उनकी किताब ‘ सामाजिक विवेक की शिक्षा ’ ऐसे समय में आई है जब बाजारवाद के दौर में शिक्षा कारोबार बनती जा रही है। पुस्तक थानवी जी के उन लेखों का संकलन है जो समय-समय पर देश के विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में छपे हैं। संकलन के लेख भले ही विगत के वर्षों में लिखे गए और प्रकाशित हुए मगर वे आज भी प्रासंगिक हैं क्योंकि जिन मुद्दों पर उन्होंने बातें की हैं वे आज और अधिक विकरालता के साथ हमारे सामने उपस्थित हैं। आज के माहौल में जब शिक्षा पूरी तरह का...