एक पत्रकार का आत्मकथ्य: पेशे में आदर्शों के तिरोहित होने की पीड़ा

 

                             पुस्तक चर्चा

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                                 राजेंद्र बोड़ा

राजस्थान में पत्रकारिता की कहानी अब तक अकादमिक स्तर पर ही कही जाती रही है जो नीरस बोझिल आंकड़ों के जरिये शैक्षणिक जगत के लोगों के परचों में ही जगह पाती रही। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि राज्य में पत्रकारिता के विकास के लंबे सफर के राही – खुद पत्रकारों ने – अपनी कहानी कभी नहीं कही। उन्हें शायद लगता रहा कि वे तो दूसरों की कहानियां कहते हैं। अपनी कहानी क्या कहें! ऐसे में सक्रिय पत्रकारिता में पूरी उम्र गुजार देने वाला कोई पत्रकार यदि अपने जीवन के बारे में लिखता है तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए।         

मेवाड़ में उदयपुर के छोटे से कस्बे कापासन में बीसवी सदी के पूर्वार्ध में जन्मे विजय भण्डारी ने अपना आत्मकथ्य “भूलूं कैसे” लिख कर अपने गुजरे जीवन तथा पत्रकारिता के पुराने दौर को याद किया है। उनका यह आत्मकथ्य इतिहास तो नहीं है मगर आने वाले समय में यदि कोई शोधार्थी राज्य के पत्रकारिता के विभिन्न काल खंडों का इतिहास लिखने बैठेगा तब उसके लिए “भूलूं कैसे एक महत्वपूर्त स्रोत जरूर होगा।

पुस्तक में भण्डारी जी ने अपने परिवार की स्मृतियों के साथ समकालीन पत्रकारों तथा समाचारपत्रों का परिचयात्मक विवरण दिया है। मगर, जैसा कि वे स्वयं कहते हैं, “यह कोई चिंतन, चिंता या टीका टिप्पणी की दृष्टि से लेखन नहीं है।” वे मात्र उनके संस्मरण है। उन्होंने जिनको जैसा जाना, समझा या ऑबज़र्व किया वैसा आरके रिपोर्टर की भाषा में लिखा है। उनकी यह जीवनी खुद उनके शब्दों में “बीसवी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में राजस्थान की पत्रकारिता की एक झलक है, जो मोटे रूप से सत्य से परे नहीं हैं।” उनका यह कथन उस पत्रकारिता की पहचान है जिसे आज का मीडिया बहुत पीछे छोड़ चुका है। उनका “मोटे रूप से सत्य से परे नहीं है” कहना उनके दौर की पत्रकारिता के उस आदर्श को रेखांकित करता है जिसमें पत्रकार को हमेशा संशय रखना सिखाते हुए उसे किसी निर्णायक या फैसला देने वाले की भूमिका में न जाने की हिदायत होती है क्योंकि सत्य कभी ब्लैक एंड व्हाइट नहीं होता, उसके अनेक शेड्स होते हैं। पत्रकार का काम सत्य के हर संभव नजदीक रहते हुए तथा अपनी धारणाओं व आस्थाओं को अपने कर्म में दखल नहीं देते हुए अपने समय का त्वरित इतिहास दर्ज करना होता है। इसीलिए उस दौर की पत्रकारिता के प्रतिनिधि के तौर पर भंडारी जी ताल ठोक कर कह सके हैं कि उनकी किताब “लोकनुरंजन के लिए नहीं है, आत्माभिव्यक्ति है”। इसके विपरीत आज के मीडिया का आदर्श “इन्फोटेनमेंट” है जिसमें सूचना का प्रकाशन लोकनुरंजन के लिए होता है।

वे अपनी पुस्तक के शुरू में ही वे बता देते हैं कि उनकी “यह नितांत व्यक्तिगत जीवन डायरी है।” अपने इस डायरीनुमा आत्मकथ्य में वे पत्रकारिता की कोई विश्लेषणात्मक या गवेषणात्मक विवेचना नहीं करते और विषयों की गहराई में भी नहीं उतरते हैं। फिर भी उनकी पुस्तक में जो व्यक्त हुआ है वह पाठक को अपना संदेश दे ही देता है। पुस्तक में भंडारी जी अपने काम के प्रति पूरी तरह समर्पित नज़र आते हैं। ऐसा समर्पण आज के नए मीडिया युग में किसी विरले में ही मिलेगा। इसलिए इस पुस्तक में अपने अखबार के काम से इतर उनकी अन्य रुचियों की कोई जानकारी नहीं मिलती। उनके आत्मकथ्य में हम साहित्य, कला, संगीत, सिनेमा आदि जैसे उनके किसी भी शौक की अनुपस्थिति पाते हैं।

पत्रकारिता में उनका प्रवेश “न बाई च्वाइस था न बाई चान्स। यह परिस्थितिजन्य था”। ऐसा सिर्फ भण्डारी जी के साथ ही नहीं हुआ है। शायद तब के अमूमन सभी पत्रकारों की परिस्थितिजन्य भूमिका ही रही थी। पत्रकारिता का पेशा उस जमाने में कोई पहले से नहीं चुनता था। आज के मीडिया जगत में पत्रकारिता और जनसंचार की डिग्रियां लेकर लोग प्रवेश करते हैं। पत्रकारिया में तब लगभग सभी मध्यम वर्ग से आते थे। आज यह सीमा मिट चुकी है। पत्रकारिता कर्म तब ऐसा था जिसमें लगा व्यक्ति बस उसी का हो कर रह जाता था जैसे भंडारी जी हुए जो कहते हैं, “पैतीस वर्ष तक घर-बार, परिवार तथा रिश्तेदारों के प्रति अपना सांसारिक कर्म नहीं निभा सका।” यह उस जमाने के सभी पत्रकारों ऐसे ही थे। उन लोगों के      

भंडारी जी पत्रकारिता के मीडिया में तब्दील होने के सफर के साक्षी रहे हैं। उन्होंने अपने सामने देखा है जमाने को बदलते देखा है जो स्पष्ट रूप से यंत्र तकनीक के विकास के साथ अर्थव्यवस्था में आए बदलाव का परिणाम रहा है। वे पाते हैं कि कि “तब के पत्रकार और आज के, उनमें जमीन आसमान का अंतर है। तब हमें (पत्रकारिता) का अ-आ भी नहीं आता था।” आज के मीडियाकर्मियों को संबोधित करते हुए वे कहते हैं “आप तो मैच्योर पत्रकार हैं। साधन सुविधाएं हैं। आप में क्षमता है, योग्यता भी।”  

उनके जमाने में स्थानीय दैनिक अखबार राजनेताओं से सम्बद्ध होने के कारण उनमें राजनीतिक समाचार उसी दृष्टि से कवर किए जाते थे। सामाजिक, आर्थिक, वाणिज्यिक, सांस्कृतिक, खेलकूद आदि गतिविधियां नगण्य होती थीं। अदालती के सिवाय, नगर परिषद तथा छोटी-मोटी स्थानीय समस्याओं के समाचार भी कम ही होते थे, केवल बयानबाजी के। दैनिकों के इने-गिने संवाददाता थे जिन्हें भुगतान शायद ही कोई करता होगा। मगर इसके साथ-साथ वे यह भी कहते हैं कि वैसी हालत में भी वे “उद्देश्यपूर्ण पत्रकारिता करते थे जिसका आज सहज अनुमान नहीं लगाया जा सकता।” अपने जमाने के बारे में वे मानते हैं कि “यह वह काल था जब पत्रकारिता व्यापार की बजाय एक मिशन था। तब के पत्रकार अपनी विधा को नहीं लांघते थे और सिद्धांतों एवं नैतिकता के आधार पर काम करते थे।” उन्हें अपने जमाने की पत्रकारिता पर इतना गर्व है कि वे यह भी जोड़ देते हैं कि “भारत की स्वतंत्र, निष्पक्ष, निर्भीक तथा उद्देश्यपूर्ण पत्रकारिता की विश्व में छाप थी”। हालांकि उन्होंने अपने इस कथन के समर्थन में कोई साक्ष्य नहीं दिया है।   

अपने शुरुआती दौर की यादों के गलियारों से गुजरते हुए वे तत्कालीन पत्रकारों की “दर्दनाक आर्थिक स्थिति” की चर्चा करते हुए तंज़ कसते हैं कि आज “समय ने ऐसी करवट ली है कि अब वह केवल रोजी-रोटी का ही रह गया है।”

उनका मानना है कि विश्व में पनपते अति राष्ट्रवाद ने पत्रकारिता की स्वतन्त्रता को छीन लिया है। उनकी यह टिप्पणी भी रेखांकित की जाने लायक है कि “राजनेताओं ने पत्रकार के धर्म को कुचल दिया, पंगु कर दिया या विवश कर दिया है।” परंतु वे अपनी इस टिप्पणी के विस्तार में नहीं गए और अधिक स्पष्ट नहीं नहीं किया कि यह कैसे हुआ या कैसे किया गया? 

पुस्तक में भंडारी जी ने अपनी पुस्तक में अधिकतर प्रिंट मीडिया के प्रमुखता वाले कालखंड की बातें की है। वे खुद देश की परतंत्रता की अंतिम घड़ी और स्वाधीनता के उदय की उपज हैं। एक ऐसा समय जब गरीबी पसरी पड़ी थी मगर समाज में सद् भाव का माहौल था। तब का पत्रकार श्रमजीवी था मगर वह जुनून से भरपूर था। उसमें आज के मीडिया वाली नंबर एक बनने की और सामने वाले को नेस्तनाबूद करने ज़िद नहीं थी। विजय भंडारी उसी पुरानी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसीलिए भले ही उनकी यादें राजस्थान पत्रिका से अधिक जुड़ी हुई है जिसके साथ उनके जीवन का अधिकांश समय गुजरा मगर वे अन्य अखबारों के बारे में बिना किसी पूर्वाग्रह के लिख पाये हैं। जैसा कि वे राष्ट्रदूत के बारे में लिखते हैं “सन् 1952 की एक अगस्त को प्रकाशित राष्ट्रदूत का बहुत लंबा इतिहास है। प्रारंभ होने के बाद वही राजस्थान का प्रतिनिधि दैनिक था। राज्य भर में बड़े चाव से पढ़ा जाता था। उसने समाचारों के साथ राज्य की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों को प्रकाशित करने पर पूरा ध्यान दिया तथा उसके साप्ताहिक एवं दीपावली अंक संग्रहणीय होते थे।” बीच में समय की दौड़ और मशीनीकरण में राष्ट्रदूत के पिछड़ जाने की भी वे बेलाग टिप्पणी करते हैं तो साथ में यह लिखने में भी संकोच नहीं करते कि यह अखबार “पिछले कुछ वर्षों से देश की राजनीति के विशेष समाचारों के कारण पुनः चर्चा में आ गया है। प्रसार संख्या भी बढ़ती जा रही है। जो देश की राजनीति का मर्म, पृष्ठभूमि तथा विश्लेषण पढ़ना चाहते हैं, वे इसे मंगाने लगे हैं”। राष्ट्रदूत के अलावा वे दैनिक नवज्योति का भी जिक्र करते हुए कहते हैं कि साठ के दशक के प्रारम्भ में नवयुग’, जिससे भंडारी जी ने अपनी पत्रकारिता की यात्रा शुरू की थी, के लडखड़ाने पर अजमेर से दैनिक नवज्योति के संपादक स्वतन्त्रता सेनानी कप्तान दुर्गा प्रसाद चौधरी उसे जयपुर ले आए...चौधरी साहब के रहते नवज्योति ने कांग्रेस का खुला समर्थन करने में कभी आगा पीछा नहीं सोचा। लेकिन उस ठप्पे के कारण वह जनता में अपनी पैठ नहीं बना पाया, हालांकि आज भी राज्य में कई स्थानों से वह प्रकाशित होता है।

अपनी सक्रिय पत्रकारिता का लगभग पूरा ही कार्यकाल राजस्थान पत्रिका में बिताने के कारण उनके आत्मकथ्य में उसकी और उसके लोगों की कहानी अधिकतर पसरी पड़ी है। उनके सम्पूर्ण लेखन में राजस्थान पत्रिका, जिसके वे लंबे समय तक प्रबंध संपादक तथा बाद में संपादक की भूमिका में रहे, के बारे उनका भरपूर आत्मीय प्रेम झलकता है जिसमें सिर्फ आदर, सम्मान और अनुग्रह की भावना के अलावा और कुछ नहीं है। मगर उसी संस्थान में उनका ही लेख अस्वीकार हो जाने का तंज़ उनमें जरूर झलक जाता है जब वे कहते हैं “नवंबर 2004 में जब विधान सभा के चुनाव थे तब मैंने अपने कॉलम में उन कारणों को लिखा जिसके लिए कांग्रेस को वोट देना चाहिए। लेख मेरे नाम से था। पहले भी पत्रिका तथा अन्य समाचार पत्रों में इस प्रकार के लेख छपते रहते थे, फिर भी संपादकीय विभाग ने उसे प्रकाशित नहीं किया तो मैंने पत्रिका में लिखना बंद कर दिया।”  

किताब में उन्होंने अपने पारिवारिक जीवन में अपने गोद चले गए पुत्र, अपनी पत्नी तथा अपने दामाद की असमय मृत्यु पर अपनी व्यथा का बड़ा ही मार्मिक वर्णन किया है। अपने शुरुआती जीवन, पढ़ाई लिखाई और खबरनवीसी से जुडने का फैसला करने के बाद उदयपुर से जयपुर आने और पत्रकारिता की कमाई से घर चलाने की जद्दोजहद का भी उन्होंने विस्तार से वर्णन किया है। वैसी आर्थिक स्थिति तब अमूमन सभी पत्रकारों की थी। इसलिए उनकी अपनी कहानी उस जमाने के सभी पत्रकारों की कहानी भी है। वे बताते हैं कि तब पत्रकारों पर वित्तीय दबाव बहुत था। वेतन बहुत कम था, उससे परिवार का खर्चा नहीं चल पाता था। समय पर वेतन नहीं मिलता था। मासिक वेतन भी टुकड़ों-टुकड़ों में मिलता था। पत्रकार हमेशा आर्थिक दवाव में रहते थे। दूकानदारों और मित्रों की उधारी समय पर चुका नहीं पाते थे।  वे कहते हैं शायद राष्ट्रदूत में यह समस्या नहीं थी।       

वास्तव में यह किताब कोई व्यवस्थित लेखन नहीं है। एक प्रकार का फुटकर रिपोर्ताज है जिसमें वे अपने प्रारम्भिक जीवन, स्कूल और कालेज के ऐसे मित्रवृन्दों का जिक्र करते हैं जिनके साथ उनकी घनिष्ठता रही। अपने बड़े भाई भगवत भंडारी को अपने सफल पत्रकारिता जीवन का श्रेय देते हुए वे बताते हैं कि कैसे उनकी प्रेरणा और मार्गदर्शन से वे इस पेशे में आए। किताब में एक श्रेणी “मित्रवत” लोगों की भी है जिनसे उनकी निकटता रही जैसे उच्च न्यायालय के न्यायधीश रहे विनोद शंकर दवे, लेखिका राजनेता रानी लक्ष्मी कुमारी चूंडावत, राजनेता श्रीराम गोटेवाला, चार्टर्ड एकाउंटेंट रमेश घीया, कॉमरेड दुष्यंत ओझा और प्रोफेसर रमेश अरोड़ा आदि।

उनके यादों के गलियारों में राज्य के कुछ प्रमुख राजनेता भी मिलते हैं जिनमें से भण्डारी जी सबसे अधिक प्रभावित मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से हैं। कह सकते हैं कि वे गहलोत के व्यक्तिगत व्यवहार से अभिभूत हैं। इसी दृष्टि से वे गहलोत के राजनीतिक और प्रशासनिक पक्ष को देखते हैं। दूसरे राजनेता जिनको उन्होंने आदर से याद किया वे हैं भैरोंसिंह शेखावत। जिन अन्य राजनेताओं से उनकी निकटता रही उनमें जयपुर से लोकसभा के सदस्य रहे सतीशचन्द्र अग्रवाल आदि शामिल हैं।  

पूर्व पीढ़ी के पत्रकारों में कलकत्ता के विश्वामित्र के प्रतिनिधि बन कर आये और यहां नवयुग दैनिक के संपादक बने ऋषि कुमार मिश्रा, स्टेट्समैन के डी. डी. भारद्वाज, टाइम्स ऑफ इंडिया के टी. एन. कौल, जयभूमि के गुलबचन्द काला, अजमेर से जयपुर आकार नाम कमाने वाले चन्द्रगुप्त वार्ष्णेय के अलावा दिनेश खरे और शिवपूजन त्रिपाठी का जिक्र भी उन्हों ने अपनी किताब में किया है। अपनी खुद की पीढ़ी के पत्रकारों में उन्होंने राजस्थान के राजनैतिक इतिहास का मूल्यवान दस्तावेजीकरण करने वाले सीताराम झालानी, पत्रकारों के संगठन के जरिये खबरनवीसों को सरकारी सुविधाएं दिलाने वाले तथा पत्रकारिता के अलावा सामाजिक सक्रियता वाले प्रवीण चंद्र छाबड़ा का विस्तार से जिक्र किया है। बेहतर पत्रकारिता, खास कर रिपोर्टिंग, की विधा और मर्यादित कर्म की सीख के लिए समाचार समिति यूएनआई के तत्कालीन ब्यूरो प्रमुख ए. एन. प्रभु को वे शिद्दत से याद करते हैं। पत्रिका से जुड़े रहे पुरानी और नई पीढ़ी के पत्रकारों को भी किताब में प्रेम से याद किया गया है जिनमें राजस्थान पत्रिका से निकल कर जनसत्ता के संपादक पद तक पहुंचे तथा वर्तमान में हरिदेव जोशी पत्रकारिता एवं जन संचार विश्व विद्यालय के कुलपति बने ओम थानवी प्रमुख हैं। अन्यों में कैलाश मिश्र, सदाशिव, राजेश माथुर, विश्वास कुमार, जगदीश शर्मा की यादें भी है। अपने बाद की पीढ़ी के चुपचाप अपना काम करने वाले आनंद जोशी को वे अतिरिक्त स्नेह से याद करते है।      

पुस्तक का एक बड़ा भाग लेखक के देश-विदेश के दौरों के बारे में है। सोवियत रूस, बुल्गारिया जैसे कम्युनिस्ट देशों के अलावा जापान, ओमान, नामीबिया,  मॉरीशस, तथा नेपाल की यादें हैं तो अपने ही देश के चार धामों के अलावा रामेश्वरम, तथा अजंता-एलोरा के वैभव भी उनकी यादों में दर्ज है। इसके अलावा गुजरात, मध्यप्रदेश, गोवा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु के दर्शनीय स्थल लेखक की स्मृति में आज भी सजीव है।

पुस्तक सहज सरल अखबारी भाषा में लिखी गई है जिसमें कोई साहित्यिक या अकादमिक आडंबर नहीं है। लेखक ने स्मृतियों में दर्ज लोगों और घटनाक्रमों का उल्लेख भर किया है, उनका कोई विश्लेषण नहीं किया है। वे खुद लिखते हैं कि पुस्तक में उनकी आधी – अधूरी यादें हैं जिनको कलमबंद करने के लिए उन्होंने कोई जानकारी नहीं जुटाई। एक प्रकार की यह डेस्क रिपोर्टिंग है। विगत को याद करना आनंद देता है। विगत के तकलीफदेह समय की याद भी आनंद देती है। इसलिए भंडारी जी कि यह पुस्तक रूमानियत शैली में नहीं लिखी जाने पर भी गुजरे जमाने में लौटने का सा आनंद देती है। इसे वे कुछ यूं कहते हैं “भूत वर्तमान को अच्छा लगता है तो भविष्य उसके गर्भ से ही जन्म लेता है।”   

पुस्तक के आमुख के अंत में वे कहते हैं कि पाठक, पुस्तक में बहुत सा दोहराव पा सकते हैं को संदर्भ के लिए आवश्यक था। फिर भी वे पाठकों से दोहराव के दोष के लिए यह कहते हुए क्षमा मांगते हैं: “क्षमा पाठकों से चाहिए, लेखकों से उत्पात”। यह उनकी विनयशीलता है कि वे अपने को उसी श्रेणी में मानते हुए अपने को उपस्थित करते हैं किन्तु यह बात दावे के साथ काही जा सकती है कि उनके लेखन में उत्पात तो बिलकुल नहीं है।     

                                             

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